हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१५) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१५) ? ?

‘चुपचाप रहो’

दो शब्दों का मेल

कहने वाले-सुनने वाले

के भीतर

मचा देता है

विचारों का कोलाहल!

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, 8:36 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २९८ ☆ बाल सजल – फुर्र – फुर्र उड़ जाते मिट्ठू… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २९८ ☆ 

☆ बाल सजल – फुर्र – फुर्र उड़ जाते मिट्ठू ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

दूध-जलेबी खाते मिट्ठू।

मीठा गीत सुनाते मिट्ठू।।

 *

रोज हमें विज्ञान पढ़ाते

खुशियाँ रोज लुटाते मिट्ठू।।

 *

पढ़ते रामायण , गीता हैं

सच में ज्ञान बढ़ाते मिट्ठू।।

 *

कभी न करते ऊधमबाजी

जीवन कला सिखाते मिट्ठू।।

 *

कितने प्यारे लगें दुलारे

बिस्किट ,चावल खाते मिट्ठू।।

 *

रोज भोर में जग जाते हैं

कभी न आलस लाते मिट्ठू।।

 *

संग – साथ में रहें सदा ही

फुर्र – फुर्र उड़ जाते मिट्ठू।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – चित्रकाव्य ☆ ही जिवतीची पणती… ☆ रेणुका धनंजय मार्डीकर ☆

रेणुका धनंजय मार्डीकर

?️?  चित्रकाव्य  ?️?

? ही जिवतीची पणती? रेणुका धनंजय मार्डीकर ☆

रानात दिसती वेलीत हसती

रानभाजीची फुले 

नाजूक चांदण्या देखण्या देखण्या 

पाहून मन माझे खुले

*

पावसाच्या सरीत वारा भिरभिरित

वेलींवर हिंदोळे घेती

झुपक्यात देखणे फुले नजराणे

चैतन्य जणू हे देती 

*

जंगलची राणी किती देखणी

चवीला रुचकर मेजवानी

फुलांना खुडता झिरमिर येते

झिरमिर पावसाचे पाणी

*

डुडी कुणी म्हणती हिला 

झटुलीही म्हणती

झुटेल, दवडी आणि

शेरी म्हणून गणती

*

दाटी वाटी किती हिची 

हिरव्या बदामात बाई

पर्णपाती दाट किती

गगनाला उंच जाई 

*

शुभ्रांगी दिसते कधी

कधी हसते पोपटली 

ओंजळ भरून घेता

गोरी गोरी दिसते कळी

*

दीर्घायु वेल असे

आदिवासी मान देती

जिवतीची पणती ही

आरोग्य देणारी खाशी

© रेणुका धनंजय मार्डीकर

औसा.

मोबा. नं.  ८८५५९१७९१८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४७ ☆ धूप का किला☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “धूप का किला” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४७ ☆

☆ धूप का किला ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

पानी रे पानी रे

चोंच नहीं डूबी चिड़िया की

कितना उथला पानी रे।

 

बह गया पसीना

काया तो गीली तक

हुई नहीं

बादल ने धरती की

छाया भी अभी तलक

छुई नहीं

 

छानी रे छानी रे

खपरैलों से झरती,गढ़ती

धूप का क़िला छानी रे।

 

मारती है चाँटा

रेत नदिया के गालों पर

टँगते हैं कलश

भरें अब तक शिवालों पर

 

धानी रे धानी रे

चाहती है धरती की देह

चूनर उजली धानी रे

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१४) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१४) ? ?

मेरी चुप्पी

तुम्हारी चुप्पी

इसकी, उसकी

हम सबकी चुप्पी,

हवा को

मुट्ठी में कैद करने की

नादान युक्ति,

कोई कुछ कहता नहीं

अंधेरा घुप है,

सब चुप्पी लगा गये

और तो और

सर्वज्ञ भी चुप है।

?

© संजय भारद्वाज  

(2.9.2018, प्रातः 8:31 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५४ ☆ गुमान छोड़ के जीना है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “गुमान छोड़ के जीना है“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५४ ☆

✍ गुमान छोड़ के जीना है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

गुनाह मौन जो देखो छुपी रज़ा होती

बशर गलत न सहे दिल में जो अना होती

 *

दरख़्त नीम के जैसी पिता की फ़ितरत है

घनी दे छाँव भले कड़वी जायका होती

 *

ग़ुरूर जिस्म पै इतना न करो तुम साहिब

जो रूह ओढ़े है वो ख़ाक की रिदा होती

 *

किसी भी मुद्दे की उड़ती ख़बर पे आँख रखें

न सच हो झूठ सरासर नहीं हवा होती

 *

गुमान छोड़ के जीना है आजज़ी अपना

ये मर्ज़ ऐसा है कुछ और कब दवा होती

 *

ये ख़ास होते नुमाइंदे मान लो रब के

फ़कीर की  ज़ुबाँ पै सबको है दुआ होती

 *

हसीन कोई न मेकप से सिर्फ लगता है

हसीन वो है अगर आँख में हया होती

 *

अगर हाँ , देखते हैं, बोले तो, सही नेता

कोई भी काम बताओ नहीं मना होती

 *

अरुण ज़ुदा है जो महबूब से उसे पूछो

फ़िज़ा खिज़ा सी जुदाई में बारहा होती

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५८ – देखें हैं पतझड़… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – देखें हैं पतझड़।)

☆ हेमंत साहित्य # ५८ ☆

✍ देखें हैं पतझड़… ☆ श्री हेमंत तारे  

सब्ज़ थे, अब ये ज़र्द होने लगे हैं

पत्तों के रंग, अब बदलने  लगे हैं

देखें हैं पतझड़,  बहारें भी इन ने

उमंगों के दिन  अब ढलने लगे हैं

 

शजर संजीदा ओ गुमसुम खडे हैं

पतझड  के डर से  सहमने लगे हैं

 

सुक़ूं से था मैं, हसरते थी ग़ाफ़िल

नज़र आये वो अरमां सुलगने लगे हैं

 

मैख़ाना था बन्द हम प्यासे खडे थे

साक़ी  के आते  ही बहकने लगे हैं

 

खौफ़ ए सैय्याद अब बाकी रहा ना

परिंदों के बच्चे  अब चहकने लगे हैं

 

ग़ुंचे तो हसीं थे पर ख़ुशबू नदारद

आते ही उनके ग़ुल महकने लगे हैं

 

कुछ तो हुआ है ‘हेमन्त’ यहां पर

अपने भी अब तो परखने लगे हैं

 

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १५१ – बुन्देली कविता – ”अंगरेजन से जौन लड़ी है” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – अंगरेजन से जौन लड़ी है।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५१ ☆

☆  बुन्देली कविता – अंगरेजन से जौन लड़ी है ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

अंगरेजन सें जौन लड़ी है

हमने ऊ की किसा पढ़ी है

समर भूम में झाँसी बारी

सीना ताने रई अड़ी है

 *

प्रान निछावर करे देश पै

दुश्मन खें दै दई तड़ी है

 *

खूब लड़ी मर्दानी बारी

कविता कई-कई बार पढ़ी है

 *

झाँसी में लक्ष्मी बाई की

ऊँची मूरत उतइ खड़ी है

 *

अमर भई झाँसी की रानी

हर दिल में तस्वीर जड़ी है

 *

भगवतनाँव लेत रानी कौ

जयकारों की लगत झड़ी है

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२३ – मानवता की ज्योति जलाएँ  ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “मानवता की ज्योति जलाएँ । आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२३ ☆

☆ मानवता की ज्योति जलाएँ  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

मनुज परिस्थिति से लड़ता है।

जीवन को जीना पड़ता है।।

*

मानवता की ज्योति जलाएँ ।

किसी धर्म में कुछ जड़ता है।।

*

मधुरिम-मधुर सँवारो जीवन।

बुरी सोच से मन सड़ता है।।

*

गलत कर्म से दूरी रखिए।

लज्जित हो भू में गड़ता है।।

*

चिंताओं से चिता सँवरती।

वय का पौधा तब झड़ता है।।

*

सद्पुरुषों की धरा रही यह।

कट्टरता पर कब अड़ता है??

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८७ – महा-प्रस्थान के क्षण १☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – महा-प्रस्थान के क्षण…१।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८७ – महा-प्रस्थान के क्षण…१ ✍

 काल दशित दस दिशाएँ

दग्ध दिनकर मौन हैं।

चन्दन चिता पर सो गया

लेकर विदा

यह कौन है?

आह इसका मुख

कि जिससे हो रहा

आलोक प्लावन,

सम्पुटित ज्यों पुण्यगीता

वेद के श्लोक पावन!

सिद्धि के सोपान वर से

वे अधर

कि जैसे शांति के स्वर है

हारी कितनी उम्र के

मुखर होकर, बोलना ही चाहते हैं।

पाँव हैं या प्रगति के पर्याय!

संभावना के ये सफल समुदाय के

मानो डोलना ही चाहते हैं

कि

स्यात् यह निद्रा 

अरुक छंदी यात्रा की श्रांति है.

किन्तु यह निष्कंप है

कैसी भयाकुल शांति है!

वातावरण में भ्रान्ति है!

जलती चिता की गोद मे

जो शीश रखकर सो रहा

कितना तरुण है!

झेल वज्राघात

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

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