हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६८ ☆ # “बेटियां…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता बेटियां…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६८ ☆

☆ # “बेटियां…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

हमारा एक मित्र सुबह मॉर्निंग वॉक में मिला

मिलते ही  करने लगा

आजकल नहीं मिलने का गिला

यार दिन भर क्या करते हो ?

क्या यहां पर नहीं रहते हो ?

 

मैंने कहा मित्र

मैं अपनी पत्नी के संग बच्चों के पास चला जाता हूं

कुछ दिन वहां रहता हूं

इसलिए रोज नहीं आता हूं

उसने पूछा,

बच्चे कहां पर रहते है?

मैंने कहा,

एक बेटा और तीन बेटियां हैं

सभी विवाहित है

वे देश के तीन कोने में है

और हम यहां इस कोने में है

 

उसने लंबी सांस भरी

और बोला,

एक बात करूं खरी खरी

तुम बहुत भाग्यशाली हो

जो बच्चों के साथ समय बिताते हो

खुशी खुशी रिटायरमेंट के दिन बिताते हो

 भाई,

हमारे साथ तो प्रश्न चिन्ह है

परिस्थितियों बहुत भिन्न है

एक ही बेटा और बेटी है

दोनों अपने परिवार में व्यस्त है

अपने परिवार संग मस्त है

हम जब भी बहु बेटे के पास जाते हैं

कुछ दिन मुश्किल से रह पाते हैं

हमारी पत्नी और बहू में

रोज होती जंग है

पारिवारिक शांति होती भंग है

वैसे ही वृद्धावस्था में बीमारियों की समस्याएं क्या कम है

बेटे का उदास चेहरा देखकर

लगता है कि अपराधी हम है

मन मारकर घर वापस आ जाते हैं

दोबारा नहीं जा पाते है

आप ही बताओ यार

कहां जाए ?

कहां मान सम्मान और प्यार पायें ?

क्या सब कुछ हमारे लिए छलावा है ?

रिश्तो में प्यार बस एक दिखावा है ?

 

मैंने कहा नहीं मित्र

तुम्हें प्यार, सम्मान, अपनापन

इज्जत, प्रतिष्ठा, आदर और मान

एक ही जगह मिल सकता है

तुम्हारे जीवन में खुशियों का फूल खिल सकता है

तुम्हें खुशी प्रसन्नता मन से सत्कार

दिल से तुम्हें प्रेम का व्यवहार

तुम्हें मनपसंद व्यंजन

मनपसंद सुकून भरी रातें

मन में ताजगी भर दें

ऐसी ममतामयी बातें

एक ही जगह मिल सकती है

जो तुम्हें अपना समझती है

वह है तुम्हारी बेटी

उसका परिवार

जो करती है तुमसे मन से प्यार

बाकी सब रिश्ते पानी के बुलबुले है

जो स्वार्थ में अपने तुमको जीवन भर छले है

 

आजकल बेटिंया

जीते जी  बेटे का फर्ज निभा रही है

और

मरने के बाद भी अंतिम संस्कार का भार

खुद के कंधे पर उठा रही है

 

मित्र वह लोग धन्य है

जिनकी बेटियां है

वह बुढ़ापे का सहारा ही नहीं

घी, शक्कर में लिपटी

रोटियां है

यह आज की

कटु सच्चाई है

जो स्वार्थी संसार ने

हमें दिखाई है/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१८) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१८) ? ?

शब्दों का सृजक

भला कोई

कैसे कहला सकता है?

शब्द

उधार के होते हैं

आदमी

चुप्पी ही रचता है।

 

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 9:07 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ६ – !!पिता!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !!पिता!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ६ ☆

☆ !!पिता!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

लेखनी बोलती अपना मन खोलती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

*

जिनकी क्षमताएंँ ऊंँची हो आकाश से,  मन में सपने सजाते तुम्हारे लिए ।

देखना चाहते खुद से उत्तम तुम्हें , करते हैं सब समर्पित तुम्हारे लिए ।‌‌।

शब्द भी श्रेष्ठ से सदा खोजती,  क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।

लेखनी बोलती अपना मन खोलती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

*

मन में गहराई रखकर वे पाताल सी,  दर्द दुनियाँ के तुमसे छुपाते सदा ।

असीमित प्रेम करते हैं संतान से, रौब बातों में अपनी दिखाते सदा ।।

रौब से झांँकता उनका डर टोहती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

लेखनी बोलती अपना मन खोलती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

*

उनका साया हिमालय सा दे हौसला,  वो कहें धैर्य खोना न चलते रहो ।

हर कदम पर खड़ा हूंँ मैं परछाई सा, पीछे देखो नहीं आगे बढ़ते रहो ।।

पिता तुल्य पाया न रिश्ता कोई, जग के रिश्तों को जब-जब भी मैं तोलती ।

लेखनी बोलती अपना मन खोलती,  क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

लेखनी बोलती अपना मन खोलती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३४ – कविता – सलामी… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “सलामी“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३३ ?

? कविता – सलामी… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

चापलूसों द्वारा ये गुलामी देखिये

डूबते सूरज को उफ़ सलामी देखिये

=2=

जनता हलाकान है कोहराम हर तरफ़

चुनी हुई सरकार की नाकामी देखिये

=3=

अच्छे दिनों की बात उनके भाषणों में है

परिणाम इसका आप दूरगामी देखिए

=4=

कल के फटीचर जो आज कुर्सी पा गये

अब हुए करोड़ों के आसामी देखिये

=5=

हो गये हरामी सभी नामी गिरामी

आगामी साजिशों पे उनकी हामी देखिए

=6=

त्राहिमाम पानी पे मचा है देश में

पी रहा शरबत कोई बादामी देखिये

=7=

‘राजेश’ नुक्ताचीनी बेवज़ह की छोड़िये

खूबियाँ औरों में, ख़ुद में ख़ामी देखिए

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०७ ☆ मुक्तक – ।। चार दिन की जिंदगानी बनाएं बेमिसाल कहानी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०७ ☆

☆ मुक्तक ।। चार दिन की जिंदगानी बनाएं बेमिसाल कहानी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

इस दुनिया के रैन -बसेरे में चार दिन रहना है।

जीत लो बस दिल सबका  ही यही कहना है।।

तेरे कर्म तेरे मीठे बोल बस यही साथ जाएंगे।

मिले सबका संग-साथ यही जीवन का गहना है।।

=2=

बहुत कम समय मिलता बस साथ बिताने को।

मत गवां देना   इसे बस  तुम रूठने मनाने को।।

शिकवा शिकायत में ही यह वक्त न निकल जाए।

बस तैयार रहना हमेशा  हर रिश्ता निभाने  को।।

=3=

नजर के फेर में तुम नजारों को मत गवां देना।

खो कर  यकीन तुम सहारों को मत गवां देना।।

उठो ऊपर कितना भी जुड़े रहना जमीन के साथ।

भगा कर तेज नाव  किनारों को मत गवां देना।।

=4=

जीवन प्रतिध्वनि सा लौटकरआती आवाज वही है।

अच्छा बुरा झूठ सच करना हमेशा अच्छी बात नहीं है।।

जैसा दोगे वैसा पाओगे   यही नियम है सृष्टि का।

सुखी सफल जीवन का   बस एक  जवाब यही है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२७० ☆ कविता – स्वामी विवेकानंद… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – स्वामी विवेकानंद। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २७०

☆ स्वामी विवेकानंद…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

युवा तापस जिसने ऊंची उठाई धर्म-ध्वजा शिकागो में जिसकी वाणी,

मुग्ध जग सुनता रहा विवेकी, अध्यात्म ज्ञानी तेज था

बंगाल का इसी भारत का समर्पित देश प्रेमी लाल था ।।।।

*

जगो, उठो, बढ़ो आगे बराबर बढ़ते रहो

लक्ष्य जब तक पा न जाओ सतत् संकल्पित रहो।

*

शक्ति संचय, साधना हो मनुज सेवा के लिए

सदा जागृत भावना हो देश सेवा के लिए ।।2।।

*

सिखाया जिसने हमें अपने प्रखर व्यक्तित्व से

विचारों से धर्म से सत्कर्म को अस्तित्व दे।

ज्योति जिसकी आज भी देती है हमको रोशनी

उन विवेकानन्द की तप त्यागमय थी जीवनी ।।3।।

*

देती है सबको सहज कर्तव्य की नित प्रेरणा

भरती है हरेक के मन को एक पावन चेतना

उस व्रती के चरणों मेंरख भाव के श्रद्धा सुमन

विश्व सेवा के लिए आओ करें हम आज प्रण ।।4।।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९८ – गीत – जीवित हम जलते गाँधी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – जीवित हम जलते गाँधी

? रचना संसार # ९८ ☆

☆  गीत – जीवित हम जलते गाँधी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

सत्य अहिंसा प्रेम खो गया,

जीवित हम जलते गाँधी।

छलनी बंदूकों से छाती,

बस आँसू बहते गाँधी।।

*

रोती फिरती भावुक विमला,

नोचे बन दानव सारे।

पुरबी हवा हुई बोझिल है,

आये पश्चिम के धारे।।

भूले वेद धर्म सनातनी,

सत्य बात कहते गाँधी।

*

घाव प्रदूषण देता गहरा,

जले धूप से है काया।

आहत मंदिर-मस्जिद दोनों

नेताओं की है माया।।

बजता डंका महँगाई का

दंश सभी सहते गाँधी।

*

वैचारिक मतभेद हुए हैं,

घुन लगती सुविधाओं में।

मधुमक्खी के छत्ते लगते,

संत रहें दुविधाओं में।।

मंगल गीतों का टोटा है,

हम दुख में पलते गाँधी।

*

अनुशासन का नाम नहीं अब,

आँधी हैं हड़तालों की।

कुहरा छाया है युद्धों का,

कूटनीति घडियालों की।।

ओढ़े चादर लाचारी की,

हाथ सभी मलते गाँधी।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१७) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१७) ? ?

क्या आजीवन

बनी रहेगी तुम्हारी चुप्पी?

प्रश्न की

संकीर्णता पर

मैं हँस पड़ा,

चुप्पी तो

मौत के बाद भी

मेरे साथ ही रहेगी!

 ?

© संजय भारद्वाज   

( 2.9.2018, प्रातः 9:01 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०७ ☆ संतोष के दोहे  – टूटा सबका धीर… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके विचारणीय संतोष के दोहे  – टूटा सबका धीर..  आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०७ ☆

संतोष के दोहे  – टूटा सबका धीर☆ श्री संतोष नेमा ☆

दहल गया दिल देख कर,दिल्ली की तस्वीर |

वीभत्स अग्नि कांड से,टूटा सबका धीर ||

*

टूटा सबका धीर,संकट बड़ा गहराया |

बहे नयन से नीर,किसी को समझ न आया ||

*

कहते कवि “संतोष”,करें अब जांच की पहल |

बढ़े न जन आक्रोश,शहर फिर न जाए दहल ||

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २६ – कविता – मनवा बैरी… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता मनवा बैरी।)

☆ शशि साहित्य # २६ ☆

? कविता – मनवा बैरी…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

हृदय हो रहा वैराग्य का,

ढूंढ रहा शून्य में विस्तार का,

दौर है आज और अभी में जीने का,

पाल रहा सपना जन्म-जन्मांतर का,

दुनिया ठहरी निपट निराली,

क्यों ढूंढ रहा खुद अपना सा,

अति वृहद विशाल जगत में,

क्यों रचे है, स्वयं की दुनिया का,

पल पल बदलती दुनिया में,

ठीक नहीं,  तटस्थ हो जाना तेरे कदमों का,

दुश्वार मगर बहुत यह काम,

खुद को समझा लेने का,,

खुशियां भर लो जीवन में,

अल्प समय है जीने का,,,

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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