हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २७७ ☆ बाल गीत – बाल गीत – बमचक-बमचक करें गिलहरीं… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २७७ ☆ 

☆ बाल गीत – बमचक-बमचक करें गिलहरीं… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

☆

बमचक-बमचक करें गिलहरीं।

एक नहीं हैं , सात गिलहरीं।

 *

इधर-उधर को भागा करतीं।

बदन फुला गुड़िया-सी दिखतीं।

बाल हैं कोमल लगतीं बहरी।

बमचक-बमचक करें गिलहरीं।

 *

पौधों से ये करें दुश्मनी।

नौचतीं तुलसी , प्लांट मनी।

पहुँच गाँव से हो गईं शहरी।

बमचक-बमचक करें गिलहरीं।

 *

अपनी धुन में मस्त मगन हैं।

फल,दाना इनका भोजन है।

चिड़ियों की शत्रु हैं गहरी।

बमचक-बमचक करें गिलहरीं।

* 

तीन तिरंगी पट्टी ओढ़े।

इतराएँ यह बदन को मोड़े।

बच्चों की रक्षक हैं प्रहरी।

बमचक-बमचक करें गिलहरीं।।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३०६ – कविता – ☆ धन जीवन की दौड़… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपके विचारणीय दोहे “धन जीवन की दौड़…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३०६ ☆

☆ धन जीवन की दौड़… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

(दोहा संग्रह ‘शब्दों की चौपाल’ से उदधृत धन विषय के दोहे)

☆

धन के रूप अनेक हैं, धन का बड़ा महत्व।

धन जीवन आधार है, धन जीवन का तत्व।।

*

धन की कई कहानियाँ, धन के कई मुकाम। 

धन ही राम रहीम है, धन ही सुबहो-शाम।।

*

धन शाश्वत परिपूर्ण है, धन अमृत की खान।

धन है जिसके पास में, मिले मान-सम्मान।।

*

ऊर्जा का संचार धन, धन जीवन का जोड़।

धन बिन विद्या बुद्धि जड़, धन की कहीं न होड़।।

*

धन से स्वर्णिम सुख मिले, धन से विद्या दान।

पुण्य लाभ धन से मिले, धन से बने महान।।

*

धन सुख की बुनियाद है, धन जीवन आधार।

पिंडदान धन से करें, हों  वैतरणी पार।।

*

सबके मन चलती रहे, धन की धुन अविराम।

धन से व्रत तीरथ सभी, धन से चारों धाम।।

क्रमशः..

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १२७ ☆ मीलों लंबी खामोशी है ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “मीलों लंबी खामोशी है” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १२७ ☆ मीलों लंबी खामोशी है ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

तड़क भड़क है

खुली सड़क है

मीलों लंबी खामोशी है।

 

जंगल सारा

ऊँघ रहा है

चिड़िया गाती नहीं सवेरे

नभ के नीचे

मेघ उदासी

पहने बैठे घोर अँधेरे

हवा बाँटती

घूम रही है

ठिठुरन वाली मदहोशी है।

 

रात पहरुआ

चुप्पी साधे

उढ़ा रहा है भरी रज़ाई

दरवाज़ों से

झाँका करती

सन्नाटा पहने परछाई।

भीगे भागे

लम्हे अजब सी

साँस-साँस में सरगोशी है।

 

सरपट दौड़े

यहाँ ज़िंदगी

अपनेपन से दूर भागती

वीरानों में

पड़ी अकेली

दुख-दर्दों को रही बाँचती

यंत्र चलित

बन गया आदमी

इसके लिए कौन दोषी है।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ३८ – प्रारब्ध… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – प्रारब्ध…।)

✍ प्रारब्ध… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

अमूमन,

ऐसा होता नहीं

कि

पहुँचे कोई

पहुँचना है जहाँ

यूँ ही

बैठे – बिठाये ।

 

लाज़िमी है निकलना

ग़र

पहुँचना है कहीं ।

 

हाँ,

हो सकता है

पहुँचे कोई,

गिरते – पड़ते

और कोई, पहुँचे वहाँ

ज्यों

चल पड़ा हो

झोंका

हवा का कोई ।

 

यही है

प्रारब्ध

अपना अपना,

पर

लाज़िमी है निकलना

ग़र

पहुँचना है कहीं ।

 

क्या वो अभागे नहीं ?

जो

निकलते ही नहीं

पर

पहुँच जाते हैं

पहुँचना है जहाँ

यों ही

बैठे  – बिठाये ।

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १३१ ☆ तरक़्क़ी की हक़ीक़त वो नहीं जो आंकड़े कहते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “तरक़्क़ी की हक़ीक़त वो नहीं जो आंकड़े कहते…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १३१ ☆

✍ तरक़्क़ी की हक़ीक़त वो नहीं जो आंकड़े कहते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

ये भीगी और सियह जुल्फें कहानी अपनी कहती हैं

तुम्हारी मदभरी आँखें कहानी अपनी कहती हैं

*

बताएं क्या कि मँहगाई ने कैसे घर उजाड़ा है

टपकती छत से बरसातें कहानी अपनी कहती हैं

*

तरक़्क़ी की हक़ीक़त वो नहीं जो आंकड़े कहते

दबे कुचलों की ये आहें कहानी अपनी कहती है

 *

सयानी घर पे हो बेटी तो कितनी फ़िक़्र बाबुल को

तनी जो झुक गई मूछें कहानी अपनी कहती है

*

ये सीधपन ये ख़ामोशी दलीलें हैं शराफ़त की

लचकती फल भरी डालें कहानी अपनी कहती हैं

*

नई कोपल से पेड़ों का पुराना पन नहीं छिपता

तने की खुरदरी छालें कहानी अपनी कहती हैं

*

मुहब्बत का अरुण इज़हार वो करता नहीं मुझसे

मुहब्बत से भरीआँखें, कहानी अपनी कहती हैं

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४६ ☆ कविता – भारत की पहचान… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय कविता – “भारत की पहचान… “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४६ ☆

✍ कविता – भारत की पहचान… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

☆

आज हवा का रुख कुछ बदला सा है

पक्षियों का गान कुछ चहका सा है,

मन मोहने वाले  तिरंगे की शान है

मित्रों, यही तो भारत की पहचान है।

*

अपनी आजादी को बनाए रखना

अपने उसूल बना, उन्हीं पर चलना,

न भूलना कुर्बानियों को, कसमों को

नई क़सम खाकर आगे, आगे बढ़ना,

क़दम जमीन पर तो सर आसमान है

मित्रों, यही तो भारत की पहचान है।

*

अंदर बाहर पनपे शत्रु जंजाल कभी

तोड़ देता है  सजग जन-जाल तभी

बस केवल रहते हैं नियम और क़ानून

जन-जन पालके गणतंत्र बनाते सभी

हर मोड़ पर देखो त्याग व बलिदान है

मित्रों, यही तो भारत की पहचान है।

*

सीमाओं पर डटे योद्धाओं की जान

घायलों बीमारों के कष्ट का  त्राण

घर-घर मोहल्ले के सजग प्रहरी अड़े

सभी बन गए आज राष्ट्र के अरमान।

तन-मन की जीत लख जग हैरान है,

मित्रों, यही तो भारत की पहचान है।

*

आओ मित्रों, एक नई क़सम  खाएँ

भारत को इक नई पहचान दिलाएँ

न डगमगाएंगे न झुकने देंगे शीश,

आए दुनिया को नया पाठ पढाएँ।

अखंड एकता  ही बनी नई आन है,

मित्रों, यही तो भारत की पहचान है।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १२८ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २७ ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।) 

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२८ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २७ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

आज जिन्हें अधिकार मिले हैं, 

करने अत्याचार मिले हैं, 

अपराधी बेखौफ घूमते, 

उनसे, थानेदार मिले हैं।

0

नहीं इश्क का जब जुनून था, 

मेरे जीवन में सुकून था, 

उफनाया तो रोक न पाया, 

नई आशिकी, नया खून था।

0

चाल वो दुश्मनी की चलते हैं, 

पैंतरे नित-नये बदलते हैं, 

एक दिन तो, पनाह माँगी थी 

आज छाती पे मूंग दलते हैं।

0

कतरा-कतरा जुबान रखता है, 

चश्मदीदी बयान रखता है, 

घाव, अपनी जुबान खोलेगा 

जुल्म की दास्तान रखता है।

0

स्वार्थ में इन्सानियत, ईमान बेचे जा रहे, 

अब दया, आशीष औ‘ सम्मान बेचे जा रहे, 

राजनैतिक मंडियों में मजहबी व्यापार है, 

आज दौलत के लिए भगवान बेचे जा रहे।

0

रेशमी रिश्ते न तोड़ो फूलकर अभिनन्दनों में, 

सूत्र नाजुक हैं मगर दृढ़शक्ति रक्षाबन्धनों में, 

सद्गुणों की हो सुरभि तो दुष्ट भी वश में रहेंगे, 

विष चढ़ा पाते नहीं हैं नाग जैसे चन्दनों में।

0

अब प्रगति तो फाइलों परचों में है, 

लूट, हत्या, बेबसी चरचों में है, 

आदमी पशु से अधिक बदतर हुआ 

राष्ट्र गिरवी, कर्ज औ’ खर्चों में है।

☆

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – प्याऊ ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – प्याऊ ? ?

खारा पानी था

उनके पास,

मीठे पानी का

सोता रहा

तुम्हारे पास,

तब भी, उनके

खड़े होते रहे

महल-चौबारे,

और तुम, उसी

कुटिया के सहारे..,

सुनो..!

बोतलबंद पानी बेचना

उनकी प्रवृत्ति रही,

प्याऊ लगना

मेरी प्रकृति रही,

जीवन के आयामों का

अनुसंधान, अपना-अपना…

जीवन के अर्थ पर

संधान, अपना-अपना…!

?

© संजय भारद्वाज  

(प्रात: 9:07 बजे, 8 दिसम्बर 2024)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ मार्गशीर्ष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २०१ – मैंने सत्-साहित्य पढ़ा है… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “मैंने सत्-साहित्य पढ़ा है…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २०१  – मैंने सत्-साहित्य पढ़ा है… ☆

☆

जीवन को जीना है सीखा,

हर गहरे तल में झाँका है।

मैंने सत्-साहित्य पढ़ा है,

उसके भावों को बाँचा है।।

 

लिखना पढ़ना शौक रहा है,

शब्दों से शृंगार किया है।

भावों के सागर में डूबा,

जग को कुछ संदेश दिया है।।

 

पहन मुखौटे जो आये हैं,

उनके चेहरों को भाँपा है।

चाहा नहीं हैं मुझको फिर भी,

सबको प्रेम सदा बाँटा है।।

 

कर्तव्यों के डगर चले हैं,

आदर्शों के पाठ पढ़ेे हैं।

अधिकारों को पाकर फिर भी,

नहीं कभी भी हम अकड़े हैं।।

 

जीवन भर मैंने खोजा है,

कोई ऐसा मिला नहीं है।

जिसको मैं दुनियाँ में कह दूँ,

इससे बढ़कर सगा नहीं है।।

 

जिसने मुझको जनम दिया है

उनसे ही जीना सीखा है।

उंगली पकड़ राह दिखलायी,

लगते प्रिय ही मात-पिता हैं।।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कविता ☆ संदली छांह ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ कविता ☆ ☕ संदली छांह ☕ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

(विश्व चाय दिवस की शुभकामनाएं)

☆

रजाई से मुंह निकालकर

पहली किरण ने कहा

सुप्रभात —

 

छू ली चाय की प्याली

अपने होठों से

उठती हुई भाप में

मिला दी टटकी मुस्कान–

 

कोहरे का गुब्बारा फूटा

सोने की मोहरें

बरसीं आँगन में–

 सीढ़ियां दरो दीवार

दरख़्त दमके

फूलों के ओसिया नेत्र चमके

पंख सेंके पाखियों ने–

 

ठिठुरते एहसासों का कारवां

ठहर गया–

खूबसूरत

सुनहरी धूप के गांव में

समय की संदली छांह में –!

☆

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

नागपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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