हिन्दी साहित्य – कविता ☆ डॉ. सुमित्र विशेष – पिता का प्यार… ☆ डॉ कामना तिवारी श्रीवास्तव ‘कौस्तुभ’ ☆

डॉ कामना तिवारी श्रीवास्तव ‘कौस्तुभ’

 ☆ कविता ☆

☆ पिता का प्यार…☆ डॉ कामना तिवारी श्रीवास्तव ‘कौस्तुभ’ ☆ 

पिता का प्यार

सृष्टि का सबसे अनमोल उपहार

पिता के लिए क्या लिखूं

शब्द कम पड़ जाते हैं

केवल भाव ही समझ आते हैं

मेरे लिए मेरे पिता एक पूरी दुनिया है

हर समस्या के लिए जादू की पुड़िया हैं

जीवन के उलझते प्रश्नों का समाधान है

मेरी आन बान और मेरी शान है कामना की कामना है

ऐसे ही आप के हजारों जन्मदिन मनाऊ

और हर जन्म में आपकी ही बेटी कहलाऊं

 

© डॉ कामना तिवारी श्रीवास्तव ‘कौस्तुभ’

मो 9479774486

जबलपुर मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सत्य ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – सत्य ? ?

पहले ने कहा-

सत्य मेरे साथ है,

दूसरे ने कहा-

सत्य मेरे साथ है,

तीसरे ने कहा-

सत्य मेरे साथ है,

चौथे ने कहा-

सत्य मेरे साथ है,

इसने कहा-

सत्य मेरे साथ है,

उसने कहा-

सत्य मेरे साथ है,

एक-एक ने कहा-

सत्य मेरे साथ है,

प्रत्येक ने कहा-

सत्य मेरे साथ है,

फिर समय ने

उलट दी सबकी आँखें..,

सार्वभौम सत्य

अब विहँस रहा है,

अपना-अपना सत्य

सबको दिख रहा है!

?

© संजय भारद्वाज

दोपहर 12:59 बजे, 13.01.2020

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी. 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १८० ☆।। मुक्तक ।। बुलबुले सा जीवन और पल का भी पता नहीं है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १८० ☆

☆ ।। मुक्तक ।। बुलबुले सा जीवन और पल का भी पता नहीं है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

=1=

न जाने फूल सा क्यों खिलता   नहीं है मन।

न जाने हवा सा उड़ता   क्यों  नहीं है मन।।

क्यों मन रहता एक अनजान डर से डरा हुआ।

न जाने एक दूजे से घुलता क्यों नहीं है मन।।

=2=

प्यार से किसी को गले लगाए बरस बीत गए हैं।

यों लगता है सब प्रेम के घड़े ही रीत गए हैं ।।

ईर्ष्या से ही तकता है    मानव   एक दूजे को।

यों लगता वस्त्र हरजन के घृणा से भीग गए हैं।।

=3=

सहन शक्ति  विवेक लुप्त प्राय ही हो गए हैं।

संवेदना विश्वास भी सुप्त प्रायः ही हो गए हैं।।

आचरण आवरण  अति आधुनिक हैं दिखते।

मधुर व्यवहार सहयोग गुप्त प्रायः ही हो गए हैं।

=4=

बुलबुले सा जीवन एक  पल का पता नहीं है।

आचार विचार रखो शुद्ध कल का पता नहीं है।।

आज और अभी बदलो  जीवन की दिशा-दशा।

किसओर बहेगा इस जीवन का जल पता नहीं है।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेलीईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२४४ ☆ कविता – क्यों है ? ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – क्यों है ?” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २४४ ☆

☆ क्यों है ? ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

 जब जानते हैं, सब यह है चार दिन का जीवन

तब साथ-संग रहते भी द्वेष भाव क्यों है ?

 *

हिलमिल के साथ रहने में सबको मिलती खुशियाँ

तो रिश्तेदारों से भी मन में दुराव क्यों है ?

 *

सद्‌भाव ही हवा में खिलते हैं फूल मन के

तब दूरियाँ बढाते  मन‌ मुटाव क्यों है?

 *

खुद अपना मन जलाते औरों को भी दुखाते

अनुचित तथा अकारण टकराव भाव क्यों है?

 *

दुनियाँ समझ न आती बाहर दिखाव होते भी

नाखुरा बने रहने का कुछ का स्वभाव क्यों है

 *

जब अपने अपने  घर में, खुशहाल हैं सभी तब

 मन में खिंचाव क्यों है अनुचित तनाव क्यों है?

☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ७ – करवा चौथ… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “करवा चौथ…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ # ७  ?

? कविता – करवा चौथ… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

करा लिए

चरण-स्पर्श?

लगवा लिए तिलक??

करा लिए अपनी पूजा???

सुन लिए अपनी आरती????

हो गया आपका अहं तुष्ट?

और…

अभिमान पुष्ट??

पुरुषो !

तुम्हारी इसी विषम दुर्भावना ने

समानता को

धता बताया है

और…

नारियो !

तुम

चाँद देखने तक ही

सिमटी रहोगी

या कभी

चाँद तक

पहुँचने का

यत्न भी करोगी ??

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – पहेली ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – पहेली ? ?

वह कहती है ‘रचो‘,

दृश्य से दृष्टि उभरती ह़ै,

अक्षरा झरने लगती है..,

तुम बिखेरते हो रंग,

छटाएँ घटती-बढ़ती हैं,

सृष्टि सिरजने लगती है..,

हम तो लेखनी के वश में हैं,

उसकी कही लिखते हैं हर बार,

पर एक बात बताओ,

यह पहेली बुझाओ,

तुम किसके वश में हो

…..सिरजनहार ?

?

© संजय भारद्वाज  

रात्रि 3:12 बजे, 13.5.21

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #६९ – नवगीत – मेघदूत… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम गीत – मेघदूत…।

? रचना संसार # ६९ – गीत – मेघदूत…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

मेघदूत सँग मेघा लाए,

कहती धरती है प्यारी ।

काले बादल झूम रहे हैं,

हिय में बदली है कारी ।।

*

बंजर धरती फूल खिलाती,

बरखा सबको है भाती।

पावस ऋतु है बड़ी सुहानी,

कंचन देखो बरसाती।।

धरा चूमती नभ को देखो,

मन ही मन है मुस्काती।

ओढ़ी चुनर प्रीति की उसने,

प्रेम गीत प्रिय है गाती ।

नाच दिखाते चमचम तारे,

धरती तन-मन है वारी ।।

*

बूँदें चमकें मोती जैसी,

मिट्टी सौंधी भी भाती।

बरखा ऋतु देती सौगातें,

शुभ संदेशा भी लाती ।।

चमकी बिजली बदन काँपता,

गोरी देखो घबराती।

रिमझिम बूँदें आस जगाती,

स्वाति बूँद भी इठलाती।।

मेघदूत का स्वागत करिए,

करे कृपा हम पे भारी।

*

हर्षित भी देखो किसान है,

भरती है उनकी झोली।

कोयल कूके बगिया में भी,

मधुरिम लगती है बोली।।

तटबंधों को तोड़ बह रही,

उफनी नदिया है भोली।

विरहिन के तन आग लगी है,

चलती हो जैसे गोली।।

रिमझिम बूँदें शीतल करतीं,

बगिया की देखो क्यारी।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #२९८ ☆ भावना के दोहे ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # २९८ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

मन में कबसे चल रहे, कितने झंझावात।

कहा अभी तक कुछ नहीं,  होगा कभी प्रभात।।

*

मन भावन की भावना, यही हमारे भाव।

नहीं हमारे पास है, भावों का आभाव।।

*

देख रहे  बुद्ध इन्हें, करते नहीं कराह।

लेते अंतिम वो विदा,  बीच छोड़ गए राह।।

*

यशोधरा कहती नहीं , नहीं कभी वो क्रुद्ध।

उसने त्याग बहुत  किया, आचरण था बुद्ध।।

*

तेरे मेरे प्यार की,  चमक  फैलती साफ।

कहा चांद ने आज तो, करो चांदनी माफ।।

*

मुखड़ा तेरा चांद सा, प्यारा सा आभास।

तुझे देख होने लगा, प्यार भरा  अहसास।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२७९ ☆ संतोष के दोहे – दीप ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है – संतोष के दोहे – दीप। आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

 ☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २७९ ☆

☆ संतोष के दोहे – दीप ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

रात अमावस सहम कर, खड़ी रही चुपचाप

इक छोटे से दीप की, सुनते ही पदचाप

*

रोशन रखिये दिल सदा, मन में रख विश्वास

झूमें शशि की रश्मियाँ, घर घर करें उजास

*

दीप, तेल अरु वर्तिका, इनका अनुपम खेल

रोशन करे जहान को, इन तीनों का मेल

*

चंदा छिपकर देखता, दीपों की बारात

तारे भी अब चमककर, करते दिल की बात

*

मात शारदे पूजते, लक्ष्मी और गणेश

चौक द्वार तोरण लगें, करते तभी प्रवेश

*

अवध नगरिया सज गई, चहुँ दिशि हुआ उजास

राम आगमन देख सब, सब में है उल्लास

*

चकरी चलतीं बम चलें, करें फटाके धूम

फुलझड़ियाँ हँस कर कहें, रहो प्रेम सँग झूम

*

रखें सभी यह लालसा, लक्ष्मी आए द्वार

आँगन सजी रंगोलियाँ, द्वारे वंदनवार

*

आज हवा से लड़ रहा, एक अकेला दीप

लिए चुनौती सामने, हरता तिमिर प्रदीप

*

दीवाली के नाम पर, विज्ञापन भरमार

सजे हुए बाजार हैं, किंतु जेब लाचार

*

निर्धन के मन में तिमिर, काहे का त्योहार

खींचतान कर चल रहा, निर्धन का परिवार

*

शुभ, स्वास्थ, धन संपदा, हो सबका कल्यान

सब के हिय “संतोष” हो, दीपक ज्योति  महान

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ जुगनू चाहे जितनी कोशिश कर ले… ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण गीत – जुगनू चाहे जितनी कोशिश कर ले… ।

☆ ॥ गीत ॥ – जुगनू चाहे जितनी कोशिश कर ले… ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

☆

जिसका अपना धर्म-ईमान नहीं है,

जहान में होता उसका मान नहीं है।

* 

अपने  मुख अपनी तारीफ करने से,

मनुज कोई हो जाता महान नहीं है।

 *

जुगनू चाहे जितनी कोशिश कर ले,

बिना अंशुमान होता विहान नहीं है।

 *

जब तक नामे-दर्ज नहीं चढ़ जाता,

घर वो हो जाता मालिकान नहीं है।

 *

बड़बोलेपन से नामी नहीं हो जाता,

बिना कर्म के होती पहचान नहीं है।

☆

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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