हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९४ – नवगीत – मन की सरिता… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतमन की सरिता

? रचना संसार # ९४ – गीत – मन की सरिता…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

काली छाया देख तिमिर की,

तन जलता ही चला गया।

मन की सरिता को पीड़ा का

जल खलता ही चला गया।।

*

व्यथित  रहा है जीवन सारा ,

थी उधार की तो साँसें।

शूल हृदय में चुभे हुए थे,

चुभी गले में थीं फाँसें।।

उलझन में था जीवन मेरा,

भ्रम पलता ही चला गया।

*

विरह व्यथा से व्याकुल अंतस ,

बरखा बरसे आँखों से।

निष्ठुर काल हमेशा कुचला,

झरती कलियाँ शाखों से।।

जर्जर तन अरु आहत मन था,

अरि छलता ही चला गया।

*

 रहा अनसुना क्रन्दन मेरा,

 तम का घेरा गहरा है।

 साँस- साँस पर विपदाओं का,

 लगा रात दिन पहरा है।।

 लिए हौसलों  की पतवारें,

 मैं चलता ही चला गयाl

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२२ ☆ भावना के दोहे – सूरज ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – सूरज)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२२ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – सूरज ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

सूरज का पारा चढ़े, दिन भर रहती धूप।

ताप लिए विकराल वो, बदला उसने रूप।।

 *

गर्मी के आतंक का, बढ़ा बड़ा ही जोर।

पशु पक्षी को खटकती, नहीं नाचते मोर।।

 *

सूरज कबसे जल रहा, निकले भारी आग।

सुर गर्मी के गा रहा, ये तो उसका  भाग।।

 *

करना तुम कम तेज तो, रहे जोड़ते हाथ।

विनती सूरज आपसे, बना रहे यह साथ।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०४ ☆ जनगणना पर एक कविता – घर-घर दस्तक देती टोली… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता  – घर-घर दस्तक देती टोली आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०४ ☆

कविता – घर-घर दस्तक देती टोली☆ श्री संतोष नेमा ☆

(जनगणना पर एक कविता)

घर-घर  दस्तक   देती  टोली |

लेकर  प्रश्नों  की  इक  झोली ||

नाम  पता  और  उम्र  पूछती |

वह  पूछती   आपकी   बोली ||

*

कितने   बच्चे   कितनी   बेटी |

क्या   पढ़ते   क्या  रोजी रोटी ||

धर्म  कौन  सा  भाषा  क्या  है |

कितनी   दूर   केंद्र  मत – पेटी ||

कब  से   रहते  इसी  पते  पर |

कब   की बनी   तुम्हारी  खोली  ||

घर-घर    दस्तक   देती   टोली |

*

एक  दशक   में   ये   है   होती |

पर   विश्वास   कभी  ना  खोती ||

भारत    की   तस्वीर   दिखाती |

जब  भी  यह  जनगणना  होती ||

गणना   से   ही    बनें   नीतियाँ |

चले    न    झूठमूठ     बड़बोली  ||

घर-घर     दस्तक   देती   टोली |

*

इसे  महज  गणना  मत  समझो |

प्रगणक को छलना मत समझो ||

इससे  चले   देश   की  धड़कन |

आफत  से  लड़ना मत समझो ||

दें  विवरण  सब  जनगणना  में |

जनता  भी  अब  बने  न भोली ||

घर-घर     दस्तक   देती   टोली |

*

कश्मीर       से      कन्याकुमारी |

एक    सूत्र    में   गणना    सारी ||

शालाएं,    अस्पताल    कितनी |

ताल  कुंए  नल   बिजली  भारी ||

गणना    के    रंगों   से   सजती |

भारत    माँ   की    नई   रँगोली ||

घर-घर     दस्तक   देती   टोली |

*

अलग – अलग   भाषा  भाषी  हैं |

फिर   भी   सब  भारत  वासी  हैं ||

बने   महान   देश  हम  सब  का  |

जिसके  सब  अब अभिलाषी  हैं ||

अब “संतोष”  प्रगति के  पथ पर |

जनता  खुद ही  शामिल  हो  ली ||

घर-घर     दस्तक    देती   टोली |

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १० ☆ कविता – मंजिरी  की कुंडलिया – भोजन ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी मंजिरी  की कुंडलिया – भोजन ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १० ☆

? मंजिरी  की कुंडलिया – भोजन ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ??

?

=१=

साधा भोजन ज्यो करे, बने सरल आहार l

खाना खाओ वक़्त पर, भोजन शाकाहार ll

भोजन शाकाहार, बने ऊर्जा का धारक l

अन्न कोष की जान, उदर अनशन सन्हारक ll

कहे मंजिरी आज, सभी करते हैं योजन l

उत्तम जीवन सार, करो ज्यों साधा भोजन ll

=२=

हलधर बोते धान को, करते जग उद्धार l

माटी को वे पूजते, मिलती ख़ुशी अपार ll

मिलती ख़ुशी अपार, काम से लौटे हारे l

भोजन करने बैठ, सभी मिलजुल कर सारे ll

कहे मंजिरी आज, नहीं रुकते ये क्षणभर l

भोजन सबका प्राण, धान ये बोते हलधर ll

=3=

लें पोषित आहार सब, रखता रोगी दूर l

मानव जीवन सार है, करे कुपोषण चूर ll

करे कुपोषण  चूर, द्वार पर खुशियाँ आती l

भोजन पोष्टिक साथ, सही सेहत बन जाती ll

कहे मंजिरी आज, करो ना जन को शोषित l

रखो स्वास्थ्य का ख्याल, सदा भोजन लें पोषित ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २३ – कविता – तेरा साथ… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता तेरा साथ।)

☆ शशि साहित्य # २३ ☆

? कविता – तेरा साथ…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

अद्भुत सुकून है, हे सृजन नाथ,

जब से थामा, पावन तेरा हाथ..

इस मिथ्या जग में,

ना कभी छोड़ना मेरा साथ..

नयन मूंद मैं चलूं,

मन में रख विश्वास,

कंटक हो या कली बिछे,

पार करूं यह पाथ..

अंतस पावन प्रीत लिए,

मगन रहूं दिन रात..

अनवरत रक्षित हो गई,

कोई करे आघात..

ठाना उत्कृष्ट लक्ष्य को,

सौंप दिया सब भार..

सुख दुख स्वीकार करूं,

समक्ष झुका के माथ..

दुर्लभ जीवन यह मिला,

मंगल सृजन, हो प्रयास..

सिद्ध हो मनोरथ सारे,

थाम कर तेरा हाथ..

हे प्रियवर, हे दीनानाथ,

ना छोड़ना मेरा साथ…..

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ पृथ्वी और स्त्री पर तीन कविताएँ ☆ श्री जयपाल ☆

श्री जयपाल

 

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय  “पृथ्वी और स्त्री पर तीन कविताएँ ”

☆ पृथ्वी और स्त्री पर तीन कविताएँ ☆  श्री जयपाल ☆

=1=

पृथ्वी

यह पृथ्वी

किसी शेषनाग के सिर पर नहीं

नंदी बैल के सींगों पर भी नहीं

स्त्री के हाथों पर टिकी हुई है

=2=

पृथ्वी और स्त्री

पृथ्वी

जब तक स्त्री के हाथों में रहेगी

सुरक्षित रहेगी

पुरुष के हाथ तो खून से रंगे हैं

=3=

विस्थापित बहनें

बहने विस्थापित कर दी गई

कहा गया उनकी शादी हो गई है

विस्थापन का दर्द दिल में दबाये

उन्होंने बसाए घर-परिवार

गांव-नगर-बस्तियां

ताकि विस्थापित न रहे कोई दुनिया में

 

© श्री जयपाल 

संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108

jaipalambala62@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (३) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (३) ? ?

‘मैं और मेरी चुप्पी’

युग-यगांतर से रच रहा हूँ

बस यही एक महाकाव्य,

जाने क्या है कि

सर्ग समाप्त ही

नहीं होते! 

 

?

© संजय भारद्वाज  

(रात 11:31 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मरहम की रौशनाई… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आई आई एम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। आप सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत थे साथ ही आप विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में भी शामिल थे।)

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी ने अपने प्रवीन  ‘आफ़ताब’ उपनाम से  अप्रतिम साहित्य की रचना की है। आज प्रस्तुत है आपकी अप्रतिम रचना “मरहम की रौशनाई…

? मरहम की रौशनाई ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆ ?

इज़हार-ए-ग़म है

हर लफ़्ज़ मेरा

रातों की तीरगी से निकला है

हर शेर मेरा

एक अधूरी साँस का सिलसिला है

मेरी हर ग़ज़ल

 *

दर्द-ए-दिल की अज़ीम दास्ताँ है

अब जब सुकून के

दो-चार पल मिले हैं

तो ज़ख़्म भी कुछ

चुप-से रहने लगे हैं

यार पूछते हैं मुझसे

कि अगली ग़ज़ल

कब लिखोगे…?

 *

कैसे समझाऊँ उनको कि

ग़ज़लें दर्द की रौशनाई

से लिखी जाती हैं

और मैं अभी

दर्द की नहीं

सुकून के मरहम की

रौशनाई ढूँढ रहा हूँ

~ प्रवीन रघुवंशी ‘आफताब’

© कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

पुणे

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ कविता ☆ यूं ही बैठे – बैठे ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

श्री ओमप्रकाश पाण्डेय

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जी भारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त.  सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंकविता , विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “यूं ही बैठे – बैठे “.)

 ☆ कविता ☆ यूं ही बैठे – बैठे ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

तुम मुस्कुराने की वजह

क्यों खोजती हो

आईना देख लो,

चेहरा खिल उठेगा -1

 

यूॅं  अकेले बैठकर

शिकायत क्यों करें

खुद से कुछ देर

बातें कर लो

मन यूॅं ही हल्का हो जाएगा -2

 

दुनिया जैसी है,

यह वैसी ही रहेगी

खुद को बदल सको तो,

जिंदगी आबाद होगी -3

 

बहुत से ग़म हैं  जमाने में

कुछ ग़म तुम्हारे ,

कुछ हमारे भी

अगर आपस में बांट सको

तो खुशी ही मिलेगी -4

 

खुशी की तलाश में,

क्यों वक्त जाया करते हो

खुद से मोहब्बत करना सीख लो

फिर किसी तलाश की

जरूरत नहीं रहेगी -5

 

हार -जीत जिंदगी में तो

चलती ही रहेगी

गिर कर अगर उठ सको,

तो जीत तुम्हारी ही होगी -6

 

माना खुशी हमेशा कहाॅं  रहती

पर ग़म का भी कोई

स्थायी मुकाम नहीं होता -7

 

हर मुकाम हासिल ही हो

कोई ज़रुरी नहीं

कुछ मुकाम बेवजह छोड़ दो

सुकून  ही मिलेगी -8

 

यूं अकेले बैठकर

रोने से क्या फायदा

मेरे कंधे पर सर रख लो

मन हल्का हो जाएगा -9

 

खुद का मुस्कुराना,

कोई बड़ी बात नहीं

किसी रोते हुए चेहरे पर

मुस्कुराहट ला सको

तो फिर कोई बात हुई -10

 

जुगनुओं से उजाले की

उम्मीद मत कर

उठ कर एक दीपक जला लो

अंधेरा दूर हो जायेगा -11

 

© श्री ओमप्रकाश पाण्डेय 

29.04.2026

संपर्क – 1901 साई आराध्य, प्लाट नंबर- 18, सेक्टर- 35F, खारघर, नवी मुंबई – 410210

ई-मेल – om1955prakashpandey@gmail.com मो – 9619885135

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २९६ ☆ बाल गीत – ओम-ओम की जय हो भैया… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २९६ ☆ 

☆ बाल गीत – ओम-ओम की जय हो भैया ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

ओम-ओम की जय हो भैया,

जय-जय-जय बलिदानी है।

भारत माता की भी जय हो,

जय वेदों की वाणी है।

ऋषियों को भी भूल न जाना,

जिनने जीवन दान दिया।

अमर हो गए जो सेनानी ,

उनने अपना प्राण दिया।

 *

जय-जय बोलो राम-कृष्ण की,

प्रेरक सदा कहानी है।

 **

भूल न जाना पंच-तत्व को,

जिनसे हमें शरीर मिला।

स्वच्छ सदा इनको है रखना,

वायु आदि सब नीर मिला।

 *

ईश्वर की सृष्टि निराली है,

वह ही राजा दानी है।

 **

सूर्य-चंद्र-सा मिलकर दमको,

परहित में भी जी लेना।

मानव जीवन यह अमूल्य है,

प्रेम-सु़धा  भी पी लेना।

 *

जय- जय – जय – जय  दयानंद की,

ना ही कोई सानी है।

 **

जिए देश के हित में जो भी,

उनका भी गुणगान करें।

सत्य मार्ग पर चलें सभी जो,

उनका भी सम्मान करें।

 *

श्रद्धानंद संत की जय-जय,

वेद पताका तानी है।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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