हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #८१ – नवगीत – परदेशी साजन… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – परदेशी साजन

? रचना संसार # ८१ – गीत – परदेशी साजन…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

आजा सजन बने परदेशी ,

 बरखा करे पुकार।

पावस ऋतु मनभावन आई,

 रिमझिम बरसे प्यार।।

 

नभ में गरज रहे बादल अब,

वन में नाचे मोर।

रिमझिम बूंदे शोर मचातीं,

मनवा भाव विभोर।।

श्यामल मेघ में चपला चमके,

भ्रमर करेंं गुंजार।

 

पावस ऋतु मनभावन आई,

रिमझिम बरसे प्यार।।

 

ढ़ोल नगाड़े गगन बजाता,

बादल गाते गीत।

साज संगीत नहीं सुहाता,

भूले सजना प्रीत।।

कोयल कू कू पीर बढ़ाती

छूटा है शृंगार।

 

पावस ऋतु मनभावन आई,

रिमझिम बरसे प्यार।।

 

अंग -अंग पुलकित धरती का,

जागा है अनुराग ।

ओढ़ हरी चुनरिया सजी है,

प्रियतम अब तो जाग।।

हँसी ठिठोली सखियों की अब,

चुभती है भरतार।

 

पावस ऋतु मनभावन आई,

रिमझिम बरसे प्यार।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कविता ☆ पुलवामा… ☆ ☆ सौ.वनिता संभाजी जांगळे ☆

सौ.वनिता संभाजी जांगळे

🌸 कविता 🌸

☆ पुलवामा… ☆ सौ.वनिता संभाजी जांगळे ☆

(१४ फ़रवरी २०१९)

शायद वो भी करने चले थे

अपने प्यार का इज़हार

एक अनजान राह पे हो गये

भारत माँ के लिए कुर्बान

*

शहादत से था उन्हे प्यार

घर पेर वह कर रही थी इंतजार

तिरंगे में लपेटकर आया

रक्त से भीगी वर्दी में रंग लाल

*

उनके प्यार का ये रास्ता

लाल रंग में नहा गया

जिस दिन हमने तो

व्हॅलेंटाइन डे मनाया

*

दुश्मनों की बारूद से

सीना उनका चिर-चिर गया

प्यार का वो ढाई लफ्ज़ 

होठों पर ही थम गया

*

हर व्हॅलेंटाइन डे पर याद आयेगी

माँ के लालों के शहीद की कहानी

भारत माँ की हिफाज़त में दी

चौदह फरवरी की हर कुर्बानी

© सौ.वनिता संभाजी जांगळे 

जांभुळवाडी-पेठ, ता. वाळवा, जि. सांगली, दुरभाष्य क्रमांक- 9327282419

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१० ☆ भावना के दोहे – जीवन ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – जीवन)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१० – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – जीवन ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

चंचलता से चल रहा, मन का  यह अभियान।

पागल मन ही रख रहा, केवल अपना ध्यान।।

 *

नैतिकता का कर रहा, मन में शुद्ध विचार।

सत्यनिष्ठ जीवन रहे, रहती शक्ति अपार।।

 *

लोलुपता की आग में, झुलस रहा परिवार।

जीवन अब बचता नहीं, छूट रहा संसार।।

मौलिकता देती रही, साहित्यिक उत्थान ।

मिथ्या कब साहित्य में, पाती है सम्मान।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९१ ☆ बुन्देली गीत – मैं तो राधे राधे गें हों… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक बुन्देली गीत – मैं तो राधे राधे गें हों आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९१ ☆

बुन्देली गीत – मैं तो राधे राधे गें हों☆ श्री संतोष नेमा ☆

प्रेम भरा जिसने जीवन में, गुरु पद उन खों दें हों

राधे राधे जपा कृष्ण ने, मैं भी अब जप लें हों

जाकी शरण सबहिं जन चाहें, शरण तिहारी जें हों

पूजा पाठ भजन न जानू, प्रेमहिं मन भर लें हों

जब भी मिल हैं श्याम सलोने, देखत ही हरषे हों

भटक रहा है मन माया में, ओखों अब समझें हों

मन “संतोष” धन्य दर्शन से, जनम सफल कर लें हों

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १२ – कविता – राधा कृष्ण प्रीत… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘राधा कृष्ण प्रीत।)

☆ शशि साहित्य # १२ ☆

? कविता – राधा कृष्ण प्रीत…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

कृष्ण तुम मीत हो,

राधा तुम  प्रीत हो,

जग में चहुं ओर,

फिर प्रेम की रीत हो,

निस्वार्थ भाव की,

जीत ही जीत हो,,

बज उठे मधुर तरंग,

प्रेम भरे गीत हों,,

दूरी भी कोई ना,

दिल को प्रतीत हो,,

सारे भाव ही अंतस,

से पूर्ण समर्पित हो,,

तुम मे मैं, और मुझमें ,

तुम परावर्तित हो,,

मन के प्रेम मंदिर में,

मूरत तुम्हारी प्रतिष्ठित हो,,

हर क्षण में सम्मिलित तुम,

ऐसा समय व्यतीत हो,,

कृष्ण तुम मीत हो,

संग राधा की प्रीत हो…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २७७ ☆ महाशिवरात्रि: अध्यात्म, आधुनिकता और प्रकृति से जुड़ाव… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “महाशिवरात्रि: अध्यात्म, आधुनिकता और प्रकृति से जुड़ाव…। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २७७ ☆ महाशिवरात्रि: अध्यात्म, आधुनिकता और प्रकृति से जुड़ाव… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

☆ ॐ नमः शिवाय ☆

भोले भंडारी भरें, भक्तों के भंडार ।

भस्म लगा धूनी रमा, कैलाशी सरकार ।।

*

शिव सह गौरा सोहतीं, कार्तिकेय, गणराज ।

बाघम्बर धारण किए, बाजे डमरू साज ।।

*

बम- बम भोले बोलिए, शिव शम्भू कैलाश।

सच्चे मन से प्रार्थना, रोके सभी विनाश।।

*

शीष विराजे चंद्रमा, केशों गंगा धार ।

भस्म रमा धूनी सहित, गले सर्प का हार।।

*

शिव शंकर जग मोहते, माॅं गौरा के साथ।

अपने भक्तों पर कृपा, करते  दीना नाथ।।

आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में युवा मन अक्सर बाहर की दुनिया में उलझा रहता है—कैरियर, स्क्रीन, प्रतिस्पर्धा और लगातार बदलती अपेक्षाएँ। ऐसे समय में महाशिवरात्रि हमें एक सरल लेकिन गहरा संदेश देती है: बाहर नहीं, भीतर लौटो। शिव किसी दूर बैठे देवता नहीं, बल्कि हमारे भीतर की स्थिरता, संतुलन और सजगता का नाम हैं।

अध्यात्म का अर्थ दुनिया से भागना नहीं, बल्कि दुनिया में रहते हुए भी अपने मन को स्पष्ट और शांत रखना है। यह बात आज की युवा पीढ़ी के लिए और भी ज़रूरी है। महाशिवरात्रि की रात हमें याद दिलाती है कि थोड़ी देर रुककर, मोबाइल की स्क्रीन से नज़र हटाकर, अपने भीतर झाँकना भी उतना ही ज़रूरी है जितना आगे बढ़ना।

शिव की पूजा में प्रयुक्त वस्तुएँ—बेलपत्र, धतूरा, भांग, फूल,फल, दूध, दही,घी, शहद, भस्म, धूप,दीप—सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति से जुड़े रहने का सुंदर प्रतीक हैं। ये चीज़ें सरल हैं, सहज हैं और हमें “ग्रीन मोटिवेशन” देती हैं कि जीवन की मूल ज़रूरतें दिखावे में नहीं, सादगी में पूरी होती हैं। प्रकृति के साथ यह तालमेल ही असल में शिव का संदेश है—संतुलन, संयम और स्वीकार।

आज का युवा अगर शिव को इस रूप में समझे—एक आंतरिक शक्ति, एक स्थिर चेतना और प्रकृति से जुड़ा जीवन-दर्शन—तो महाशिवरात्रि सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर दिशा देने का अवसर बन सकती है। क्योंकि जब भीतर स्थिरता आती है, तभी बाहर की दुनिया भी सही मायनों में सँवरती है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – यमदूत ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – यमदूत ? ?

मुझे प्रायः

दिखते हैं यमदूत,

सुरक्षा रक्षक बनते

साथ कदमताल करते,

एस्कॉर्ट का यह घेरा

अभेद्य होता है,

दुनियावी ऐबों से

रक्षा करता है,

व्यसन मेरे पास

फटक नहीं पाते,

स्थितियों के व्यूह

डिगा नहीं पाते,

आदमी का भीतर

जगाये रखने का

साधन सच्चा होता है,

यमदूत का साथ

मनुष्य के लिए

अच्छा होता है!

?

© संजय भारद्वाज  

संध्या 5:31, दि. 25 दिसंबर 2015

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 21 दिवसीय आशुतोष साधना रविवार दि. 8 फरवरी से शनिवार 28 फरवरी तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ भी करेंगे 💥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

💥 मालाजप शिव पंचाक्षर स्तोत्र के साथ आत्मपरिष्कार एवं मौन-साधना भी नियमित रूप से चलेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २८५ ☆ गीत – तुझको स्वयं बदलना होगा… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २८५ ☆ 

☆ गीत – तुझको स्वयं बदलना होगा ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

देख रहा घर – घर में रगड़े

तुझको स्वयं बदलना होगा।

जीवन की हर बाधाओं से

हँसते – हँसते लड़ना होगा।।

 *

कर्तव्यों से हीन मनुज जो

अधिकारों की लड़े लड़ाई।

प्रकृति के अनुकूल न चलता

आत्ममुग्ध हो करे बड़ाई।

झूठे सुख के लिए सदा ही

देख रहा ना पर्वत – खाई।

धन  – संग्रह की होड़ लगी है

मन कपटी है चिपटी काई।

 *

हे मानव ! तू सँभल ले अब भी

तुझको स्वयं भुगतना होगा।

देख रहा घर – घर में रगड़े

तुझको स्वयं बदलना होगा।।

 *

जो सन्तोषी इस धरती पर

वह ही सुख का मूल्य समझता।

वैभवशाली, धनशाली का

सबका ही सिंहासन हिलता।

उद्यम कर, पर चैन न खोना

अपना लक्ष्य बनाकर चलना।

परहित – सा कोई धर्म नहीं है

देवदूत बन सबसे मिलना।

 *

समय कीमती व्यर्थ न खोना

तुझको स्वयं समझना होगा।

देख रहा घर – घर में रगड़े

तुझको स्वयं बदलना होगा।।

 *

सामानों की भीड़ लगाकर

अपने घर को नरक बनाए।

सारा बोझा छूटे एक दिन

उल्टे – पुल्टे तरक चलाए।

उगते सूरज योग करें जो

उनकी किस्मत स्वयं बदलती।

कर्म और पुरुषार्थ, भलाई

यहाँ – वहाँ ये साथ हैं चलतीं।

 *

परिस्थितियां जो भी हों साथी

तुझको स्वयं ही ढलना होगा।

देख रहा घर – घर में रगड़े

तुझको स्वयं बदलना होगा।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३१२ – कविता – ☆ विचलित मधुमास… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “विचलित मधुमास…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३१२ 

☆ विचलित मधुमास… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

मिश्रित आवाजों की गंध से

विचलित मधुमास

पुष्प भ्रमर हो रहे उदास।

 

पैरों में छिपने को, आतुर परछाइयाँ

शंकित सरगम, सूनी-सूनी शहनाइयाँ

कोमल कलिकाओं के आहत मन

भूले परिहास

पुष्प भ्रमर हो रहे उदास।

 

स्नेह रहित शैशव की, तेज हुई सिसकियाँ

बाती के हक का घी, दीपक ने पी लिया

सठियाते यौवन के आँगन में

सूखता पलाश

पुष्प भ्रमर हो रहे उदास।

 

छंदों के चौखट पर तालों के जमघट हैं

प्यासी नदिया निर्जीव तट सूने पनघट हैं

ऋतुओं के गंधमयी गीतों पर

छाया सन्यास

पुष्प भ्रमर हो रहे उदास।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १३३ ☆ दीप जलाओ ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “दीप जलाओ” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १३३ ☆ दीप जलाओ ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

लो फिर साँझ हुई मटमैली

तुम देहरी पर दीप जलाओ।

 

सूरज डूबा बुझी आग सा

लटका खूँटी पर दिन,

चिड़ियों के स्वर वापस लौटे

लेकर ख़ुशियाँ अनगिन,

रात आँख में लगे कसैली

तुम आकर मत नींद चुराओ।

 

मंदिर की सीढ़ी पर नदिया

ठहर आरती गाये,

पावन पूजा कर्म पुजारी

धर्म ध्वजा लहराये,

बहती नावें लहरें मैली

तुम तट की पीड़ा दुलराओ।

 

चुप्पी साधे पेड़ खड़े हैं

पसर गया सारा तम,

तारों की चादर पर लेटा

उजयारे का है भ्रम,

ख़ामोशी राहों में फैली

तुम यात्रा के अलख जगाओ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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