सौ. सुजाता काळे
नील गगन से
यह नीलमोहर
जाने क्या क्या
बात करें ।
आसमान को
अपना रंग देकर
फिर आकर
धरती से मिले।
शाखाओं पर
आसमान ही
लेकर अपने
साथ चले।
फिर क्यों धूल में
नीलाभ बनकर
धरती पर आँचल
ओढ़ चले।
© सुजाता काळे
पंचगनी, महाराष्ट्र, मोबाईल 9975577684
सौ. सुजाता काळे
नील गगन से
यह नीलमोहर
जाने क्या क्या
बात करें ।
आसमान को
अपना रंग देकर
फिर आकर
धरती से मिले।
शाखाओं पर
आसमान ही
लेकर अपने
साथ चले।
फिर क्यों धूल में
नीलाभ बनकर
धरती पर आँचल
ओढ़ चले।
© सुजाता काळे
पंचगनी, महाराष्ट्र, मोबाईल 9975577684
श्री संजय भारद्वाज
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )
आज इसी अंक में प्रस्तुत है श्री संजय भरद्वाज जी की कविता “ सीढ़ियों “ का अंग्रेजी अनुवाद “Stairs…” शीर्षक से । हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी के ह्रदय से आभारी हैं जिन्होंने इस कविता का अत्यंत सुन्दर भावानुवाद किया है। )
☆ संजय दृष्टि ☆ सीढ़ियाँ ☆
आती-जाती
रहती हैं पीढ़ियाँ
जादुई होती हैं
उम्र की सीढ़ियाँ,
जैसे ही अगली
नज़र आती है
पिछली तपाक से
विलुप्त हो जाती है,
आरोह की सतत
दृश्य संभावना में
अवरोह की अदृश्य
आशंका खो जाती है,
जब फूलने लगे साँस
नीचे अथाह अँधेरा हो
पैर ऊपर उठाने को
बचा न साहस मेरा हो,
चलने-फिरने से भी
देह दूर भागती रहे
पर भूख-प्यास तब भी
बिना लांघा लगाती डेरा हो,
हे आयु के दाता! उससे
पहले प्रयाण करा देना
अगले जन्मों के हिसाब में
बची हुई सीढ़ियाँ चढ़ा देना!
मैं जिया अपनी तरह
मरूँ भी अपनी तरह,
आश्रित कराने से पहले
मुझे विलुप्त करा देना!
कृपया घर में रहें, सुरक्षित रहें।
© संजय भारद्वाज, पुणे
प्रातः 8:01 बजे, 21.4.19
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
डॉ भावना शुक्ल
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 46 – साहित्य निकुंज ☆
☆ भावना के दोहे ☆
उथल-पुथल है हृदय में,
कर लो तुम संवाद।
जीवन हो तुम राधिके,
गूंजा अनहद नाद।।
जीवन में चारों तरफ,
फैला है अँधियार
बिना ज्ञान-दीपक भला,
कौन करे उजियार।।
इस अनंत संसार का,
कोई ओर न छोर
हरि सुमिरन से ही मिले,
मंगलकारी भोर
कोरोना के काल में,
बढ़ी पेट की आग।
सुनने वाला कौन है
भूख तृप्ति का राग।।
जीवन के नेपथ्य से,
कौन रहा है भाग।
करो आज का सामना,
छोड़ कपट खटराग।।
© डॉ.भावना शुक्ल
सहसंपादक…प्राची
प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120, नोएडा (यू.पी )- 201307
मोब 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com
श्री संतोष नेमा “संतोष”
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत है श्री संतोष नेमा जी का “बुंदेली गीत – बड़ो कठिन है बुजर्गों को समझावो …. ”। आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 37 ☆
☆ बुंदेली गीत – बड़ो कठिन है बुजर्गों को समझावो .... ☆
कोरोना खों समझ ने पा रए का हुई है
परे परे कछु भव बतिया रए का हुई है
सरकार कहत रखो दो गज दूरी
गइया से जबरन रंभा रए का हुई है
निकर निकर खें घर सें बाहर झाँखे
हाथ धोउन में शरमा रए का हुई है
बऊ खुदई लगीं दद्दा खों समझावें
दद्दा बऊ को आँख दिखा रए का हुई है
हमने कही सोशल डिस्टेंस बनाओ
सुनतई सें हम खों गरया रए का हुई है
बतियाबे खों अब कौनउ नइयाँ
पूछत हैं सब कहाँ हिरा गए का हुई है
बड़ो कठिन है बुजर्गों को समझावो
सांची हम”संतोष” बता रए का हुई है
जीवन में गर चाहिए, सुख समृद्धि “संतोष”
माटी से नाता रखें, माटी जीवन कोष
© संतोष कुमार नेमा “संतोष”
सर्वाधिकार सुरक्षित
आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)
मो 9300101799
श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी का ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है। आप भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं । सेवारत साहित्यकारों के साथ अक्सर यही होता है, मन लिखने का होता है और कार्य का दबाव सर चढ़ कर बोलता है। सेवानिवृत्ति के बाद ऐसा लगता हैऔर यह होना भी चाहिए । सेवा में रह कर जिन क्षणों का उपयोग स्वयं एवं अपने परिवार के लिए नहीं कर पाए उन्हें जी भर कर सेवानिवृत्ति के बाद करना चाहिए। आखिर मैं भी तो वही कर रहा हूँ। फिर शुरुआत भी तो ऐसी ही कविता से होनी चाहिए, जैसे “रिटायरमेंट के बाद ”। हम श्री खापर्डे जी की चुनिंदा कवितायेँ समय-समय पर आपसे साझा करते रहेंगे। )
☆ रिटायरमेंट के बाद ☆
मैं आजाद हो गया हूं,
यह सोचकर बहुत खुश होता हूं
ना सुबह उठने की झंझट
ना पत्नी की खट-खट
ना खाने की लटपट
खूब लंबी तान कर सोता हूं
मै आजाद हो गया हूं
यह सोचकर बहुत खुश होता हूं
ना तो ट्रेन पकड़ने की भागमभाग
ना वो ट्रेनमे भीड़ के बीच सुलगती आग
ना वो नयी ड्रेस पर लगते तंबाकू और पान के दाग़
अब उस कड़वाहट को मुस्कराहट से धोता हूं
मै आजाद हो गया हूं
यह सोचकर खुश होता हूं
आफिस में टेलीफोन, मोबाइल की बजती घंटियां
टेबल पर छुट्टी की अर्जियां
स्टाफ की मनमौजी मनमर्जिंयां
अब इस टेंशन को चाय की चुस्कियों में उड़ाता हूं
मैं आजाद हो गया हूं
यह सोचकर बहुत खुश होता हूं
वो मोबाइल पर बास का नंबर देखकर थरथराहट
वो बात-बात पर बास की डांट से घबराहट
वो ट्रांसफ़र की धमकी भरी गुर्राहट
आज बेखौफ होकर बास को ससम्मान भिगोता हूं
मैं आजाद हो गया हूं
यह सोचकर बहुत खुश होता हूं
अब ना किसी से शिकायत
ना उनको तकरार है
एक हाथ में चाय
दूसरे में अखबार हैं
पास बैठी पत्नी की आंखों में
बेशुमार प्यार है
अब हर नई सुबह
नयी सोच को संजोता हूं
मैं आजाद हो गया हूं
यह सोचकर बहुत खुश होता हूं।
© श्याम खापर्डे
फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़)
मो 9425592588
श्री राघवेंद्र तिवारी
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत है। पत्रकारिता, जनसंचार, दूर शिक्षा एवं मानवाधिकार में शिक्षित एवं दीक्षित यह रचनाकार 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक “अभिनव गीत”।)
|| अभिनवगीत ||
विरहाकुल कनखियाँ
ढूँड रहीं अपनापन और में
कुंतल के कानन से,
दिखतीं कुमकुम रेखें
पहली ही गौर में
दहक रहे होंठों के
किंचित नम हैं पलाश
काली इन भौहों में
गुम सा गया प्रकाश
कमतर कुछ भी नहीं
चेहरे के मानचित्र
कोयल छिप जाती ज्यों
आमों के बौर में
बदली भरे जल को
उमड़ती घुमड़ती सी
साँसों में अटकी है
आह एक उड़ती सी
बहती है नर्मदा
सतपुड़ा की बाहों से
कुंठित सारे मुमुक्षु
सूखे के दौर में
आधी है ओट और
आधे में है पहाड़
फूले वैसाख- जेठ
रोके जबरन अषाढ़
वाट में पपीहे की
सूख रही टिटहरी
जैसे छोटी बहू
नई -नई पौर में
© राघवेन्द्र तिवारी
08-05-2020
संपर्क : ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-112, भोपाल- 462047, मोब : 09424482812
डॉ राकेश ‘ चक्र’
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। अब आप डॉ राकेश ‘चक्र’ जी का साहित्य प्रत्येक गुरुवार को उनके “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं आपकी एक समसामयिक रचना “देश के मजदूरों के नाम दोहे”.)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 27 ☆
☆ देश के मजदूरों के नाम दोहे ☆
कोरोना ने कर दिया, श्रमिकों को बेहाल।
शहर छोड़कर चल दिए, लिए हाथ में काल।।1
पाँव थके हैं,तन थका, पग में हो गए घाव।
पत्नी, बच्चे साथ में, देखे मौत पड़ाव।।2
नियति नटी के खेल से, हुए मार्ग सब बन्द।
कहीं मिले जयचंद हैं, कहीं प्रेम के छन्द।।3
रेल मार्ग से जो चले, करते पत्थर हास्य।
मानव का दुर्भाग्य है, लिखे स्वयं ही भाष्य।।4
भूख-प्यास से तन थका, सिर पर गठरी बोझ।
पटरी पर जब सो गए, मृत्यु कर रही भोज।।5
कभी गाँव, कभी शहर में, यही श्रमिक का चक्र।
जिस घर में हूँ मैं सुखी, करता उन पर फक्र।।6
कोई जाए ट्रेन में, कोई पग-पग डोर।
घर की राह न दीखती, रोज थकाए भोर।।7
साइकिल लेकर कुछ चले , कोई रिक्शा ठेल।
मौसम के दुख झेलकर, बना स्वयं ही मेल।।8
कोरोना सबसे लड़ा, करे मौत से संग।
बिन देखा भारी पड़ा, हुआ सबल भी दंग।।9
ईश्वर करना तुम कृपा, सकुशल पहुँचें गाँव।
खुली हवा में श्वास लें, मिले गाँव की छाँव।।10
देश चुनौती ले रहा, बढ़ी समस्या रोज।
समाधान है खोजता, मिले सभी को भोज।।11
डॉ राकेश चक्र
(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)
90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001
उ.प्र . 9456201857
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी की कोरोना योद्धाओं को समर्पित एक समसामयिक एवं सार्थक कविता “वीर करोना योद्धा तेरा सादर है आभार”। श्री विवेक जी की लेखनी को इस अतिसुन्दर व्यंग्य के लिए नमन । )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य # 48 ☆
☆ कविता – वीर करोना योद्धा तेरा सादर है आभार ☆
सादर है आभार तुम्हारा सादर है आभार
वीर करोना योद्धा तेरा सादर है आभार
अपने घर तक जा ना पाते
कारों में कुछ रात बिताते
जगते सोते सेवा में हैं
हों नर्सेज या डाक्टर्स अपने
ईश्वर के अवतार
सादर है आभार तुम्हारा
सादर है आभार
सादर है आभार तुम्हारा सादर है आभार
वीर करोना योद्धा तेरा सादर है आभार
स्वच्छ सड़क ये कौन है करता
कौन उठा कचरा ले जाता
पता न चलता शोर न मचता
कौन गंदगी से ना डरता
उसका है आभार
सादर है आभार
सादर है आभार तुम्हारा सादर है आभार
वीर करोना योद्धा तेरा सादर है आभार
दानवीर ये कौन हैं जिनको
उस गरीब की फिकर लगी है
जो भूखे और दूर घरों से
हर उस भामाशाह का
सादर है सत्कार
सादर है आभार
सादर है आभार तुम्हारा सादर है आभार
वीर करोना योद्धा तेरा सादर है आभार
हम तो घर में हुये सुरक्षित
किन्तु कौन जो जगे हुये हैं
पहुंचाने को बिजली पानी लगे हुये हैं
डाटा , आटा सब्जी राशन ,
उनका हो सत्कार
सादर है आभार
खुद घर से जो बाहर रहकर
सारे खतरे स्वयं झेलकर
सहकर के भी सबकी गाली
कर्तव्यों में जुटे हुये हैं
वर्दी में वे डटे हुये हैं
ऐसे पुलिस और प्रशासन
का होवे सत्कार
सादर है आभार
वीर करोना योद्धा तेरा सादर है आभार
सादर है आभार तुम्हारा सादर है आभार
© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर
ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८
मो ७०००३७५७९८
Captain Pravin Raghuvanshi, NM
(We are extremely thankful to Captain Pravin Raghuvanshi Ji for sharing his literary and artworks with e-abhivyakti. An alumnus of IIM Ahmedabad, Capt. Pravin has served the country at national as well international level in various fronts. Presently, working as Senior Advisor, C-DAC in Artificial Intelligence and HPC Group; and involved in various national-level projects.
Captain Pravin Raghuvanshi ji is not only proficient in Hindi and English, but also has a strong presence in Urdu and Sanskrit. We present an English Version of Mr. Laxmi Shankar Bajpai’s Classical Poetry वे लोग with title “Those people.”Mr. Laxmi Shankar Bajpai (Ex-Dy Director General – All India Radio) is a renowned Poet, Gazalkar and Communicator. We extend our heartiest thanks to Captain Pravin Raghuvanshi for this beautiful translation.)
आपसे अनुरोध है कि आप इस रचना को हिंदी और अंग्रेज़ी में आत्मसात करें। इस कविता को अपने प्रबुद्ध मित्र पाठकों को पढ़ने के लिए प्रेरित करें और उनकी प्रतिक्रिया से इस कविता के मूल लेखक श्री लक्ष्मी शंकर बाजपेयी जी (पूर्व उपमहानिदेशक आकाशवाणी ) व प्रख्यात साहित्यकार एवं गजलकार एवं अनुवादक कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी को अवश्य अवगत कराएँ.
वे लोग
डिबिया में भर कर पिसी हुई चीनी
तलाशते थे चीटियों के ठिकाने
छतों पर बिखेरते थे
बाजरे के दाने
कि आकर चुग सकें चिड़ियां
भोजन प्रारंभ करने से पहले
वे लोग, निकालते थे गाय और दूसरे प्राणियों का हिस्सा
सूर्यास्त के बाद, वे लोग
नहीं तोड़ने देते थे,
पेड़ से एक पत्ती तक
कि खलल न पड़ जाए
सोए हुए पेड़ों की नींद में
जब चिड़ियों के झुंड के झुंड
आ जुटते थे उनकी फसलों पर
तो वे उन्हें भगाने की बजाय
कहते थे.. राम की चिड़ियां..
राम के खेत..
खाओ री चिड़ियो भर भर पेट
वे अपनी तरफ से शुरू कर देते थे बात..
अजनबी से पूछ लेते थे उसका परिचय
ज़रूरतमंद की करते थे दिल खोलकर मदद
बस्ती में कोई पूछे किसी का मकान
तो पहुंचा कर आते थे उस मकान तक..
कोई भूला भटका अनजान
मुसाफिर आ जाए रात बिरात
तो करते थे भोजन और विश्राम की व्यवस्था
संभव है अभी भी दूरदराज
किसी गांव या क़स्बे में
मौजूद हों उनकी प्रजाति के कुछ लोग
काश ऐसे लोगों का
बन सकता एक संग्रहालय
कि आने वाली पीढ़ियों के लोग
जान पाते
कि जीने का एक अंदाज़
ऐसा भी था..
© लक्ष्मी शंकर बाजपेयी
मोबाईल – 9899844933
Those were the people who used
to carry powdered sugar in a tiny casket…
And, search painstakingly
For the anthills to feed the ants…
They used to scatter the
millet grains on the roofs
For the birds to come and feed…
They would keep water cauldrons outside their houses
For the desperate animals to quench their thirst…
Before partaking their meals
They would keep a part of it
For the cows and other animals to feed on…
After sunset, they would never allow plucking of
even a leaf from the trees…
Ensuring that the sleeping trees
are not disturbed…
When the flocks of birds
Would gather on their crops
Then, instead of driving them away
They would welcome them
Saying, God’s birds, God’s fields…
Have your stomach’s fill…
They used to start talking first
on their own, even with strangers
Asking their whereabouts and well-being…
They would help needy
people wholeheartedly,
If someone inquired about someone’s address
They would accompany him to that house…
If chanced upon any stray
unknown traveller
They would make arrangement for his food and overnight stay…
It may still be possible,
That, somewhere in some remote village or town,
Some people of this breed are still left…
How I wish
A museum could be built
of such people
For the coming generations to
know that
Such people existed, and
This was their style of living…
Translated by: Captain (IN) Pravin Raghuvanshi, NM
श्री संजय भारद्वाज
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )
☆ संजय दृष्टि ☆ चुप्पियाँ-6 ☆
कोलाहल
निपट पहली
संख्या हो
या असंख्येय
हो चुका हो,
कोलाहल
संख्यारेखा के
बायें हो या दायें हो,
हर बार
कोलाहल की
परिणति
चुप्पी ही होती है..,
चुप्पी शाश्वत है
शेष सब नश्वर!
कृपया घर में रहें, सुरक्षित रहें।
© संजय भारद्वाज, पुणे
( कविता-संग्रह *चुप्पियाँ* से।)
( 2.9.18, प्रातः 6:59 बजे )
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603