(डॉ प्रदीप शशांक जी द्वारा रचित एक समसामयिक विषय पर आधारित सार्थक एवं प्रेरणास्पद लघुकथा “रंगमंच”. )
☆ लघुकथा – रंगमंच ☆
मनोहर रंगमंच का कलाकार था। स्थानीय स्तर पर होने वाले नाटकों में वह विभिन्न पात्रों को बखूबी निभाता था। उसके अभिनय की बहुत प्रशंसा होती थी।
विगत 6 माहों से वह घर पर ही बैठा था। इस विषम काल में नाटकों का मंचन भी बंद था। वह मानसिक अवसाद की स्थिति में पहुंच गया था, उसे महसूस हो रहा था कि उसकी कला में जंग लग रही है।
एक दिन वह शहर के रंगमंच हाल में पहुंच गया। मंच के आगे पीछे सन्नाटा पसरा हुआ था। कुर्सियां भी दर्शकों के अभाव में टिमटिमाते बल्ब की रोशनी में ऊँघती सी प्रतीत होरही थीं। यह वही हाल था जो कभी रोशनी से जगमगाता रहता था जिसमें दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट गूंजती रहती थी। अब न दर्शक, न श्रोता और न कोई नायक न खलनायक, बस आज चारों ओर खामोशियाँ पसरी पड़ी थीं।
मंच के ऊपर लगी दीवार घड़ी अब भी टिकटिक की आवाज करती चल रही थी। समय निरंतर अपनी गति से भाग रहा था। उसे महसूस हुआ कि ऊपर बैठा सबसे बड़ा नाटककार उससे कह रहा है – समय गतिशील है, आज का यह समय भी निकल जायेगा धैर्य रखो। समय की डोर अपने हाथों में थामे रखो। अचानक उसके अंदर नई ऊर्जा का संचार हुआ और वह जिंदगी के रंगमंच में अपनी नई भूमिका निभाने तेज कदमों से आगे बढ़ गया।
(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में सँजो रखा है । प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ की अगली कड़ी में श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी की एक सार्थक लघुकथा – विसर्जन । )
☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 64 ☆
☆ लघुकथा – विसर्जन ☆
एक बार कबूतरों के झुंड से एक कबूतर को निकाल दिया गया, तो उस कबूतर ने एक तखत में कब्जा कर प्रवचन देने प्रारंभ कर दिए,श्रोता जुड़ते गए… अच्छा विचार विमर्श होता रहता।
जीवन में अनुशासन और मर्यादा की खूब बातें होती, फिर प्रवचन देने का काम बारी बारी से दो और कबूतर करने लगे। बढ़िया चलने लगा, तखत से नये नये प्रयोग होने लगे, और ढेर सारे कबूतर श्रोता बनके जुड़ने लगे, अनुशासन बनाए रखने की तालीम होती रहती,नये नये विषयों पर शानदार प्रवचनों से श्रोता कबूतरों को नयी दृष्टि मिलने लगी, विसंगतियों और विद्रूपताओं पर ध्यान जाने लगा।
एक कबूतरी पता नहीं कहां से आई, और सबके रोशनदान से घुसकर गुटरगू करने लगी, सबको खूब मज़ा आने लगा, प्रवचन देने वाले पहले कबूतर का ध्यान भंग हो गया, कबूतर अचानक संभावनाएं तलाशने लगा, कबूतरी महात्वाकांक्षी और अहंकारी थी, आत्ममुग्धता में अनुशासन और मर्यादा भूल जाती थी।
एक दिन प्रवचन चालू होने वाले थे तखत में प्रवचन करने वाले दोनों कबूतर बैठ चुके थे ,क्रोध में चूर कबूतरी तखत के चारों ओर उड़ने लगी, प्रवचन चालू होने के पहले बहसें होने लगीं, श्रोता कबूतरों ने कहा ये तो महा अपकुशन हो गया, शुद्ध तखत के चारों तरफ अशुद्ध कबूतरी को चक्कर नहीं लगाना था। फिर उसी रात को ऐसी आंधी आयी कि जमा जमाया तखत उड़ गया। सारे कबूतर उड़ गए, दो दिन बाद किसी ने बताया कि भीषण आंधी से तखत उड़ कर टूट गया था इसीलिए उसका विसर्जन कर दिया गया।
☆ जीवनरंग ☆ गांधींना येऊ दे ☆ श्रीमती उज्ज्वला केळकर ☆
`वर्मा सर, आपण या कार्यालयात सगळ्यात ईमानदार ऑफीसर म्हणून सुप्रसिद्ध आहात. म्हणूनच आपण आपल्या केबीनमध्ये गांधिजींच्या दोन तसबिरी लावल्या आहेत का? एक मागे आणि एक पुढे? वर्मांच्या हाताखाली काम करणारे शर्मा आपल्या वरिष्ठांना विचारत होते.
`ते अशासाठी शर्मा, माझ्यासमोर बसलेल्या अपरिचिताने माझ्यामागे लावलेला गांधीजींचा फोटो बघून खोटे बलू नये आणि मी जेव्हा खोटे बोलेन, तेव्हा निश्चिंत असेन, की मला खोटं बोलताना गांधीजी बघत नाही आहेत. ‘आता काय सांगायचं, दहात आठ वेळा तरी मला खोटं बोलावं लागतं’ वर्मांच्या मनात आलं, पण ते बोलले नाहीत.
`पण सर, गांधीजींचा फोटो तर आपल्या पुढेही लावलेला आहे. त्याचं काय?’
`त्याचं काय आहे, मी. शर्मा, तुम्ही बघितलं असेल, की मी शिपायाला वारंवार बोलावून फोटो स्वच्छ पुसून आणायला सांगतो.’
`होय! बर्याचवेळा… म्हणूनच आपल्या समोरील फोटावर कधी धूळ दिसत नाही. पण मागचा फोटो मात्र धुळीनं भरलेला आहे.’
`त्याचं असं आहे शर्मा, जेव्हा मला खोटं बोलण्याची वेळ येते, तेव्हा, त्यापूर्वी मी शिपायाला बोलवून फोटो स्वच्छ पुसून आणायला सांगतो. शिपाई तसंही कुठलंही काम दोन तासांच्या आधी करतच नाही. भिंतीवरून फोटो हटवला जाताच, मी दोन-तीन फ्रॉड ठेके निपटून टाकतो.
‘वा:! काय बोललात! आता यावर चहा झालाच पाहिजे.’
`जरा थांबा. गांधीजी येऊ देत. तसंही कुठल्याही सरकारी कार्यालयात चहा पिण्याइतकं खरं काम दुसरं कोणतं होत असेल?’ आणि दोघेही हास्य-विनोदात बुडून गेले.
मूळ हिंदी कथा – गांधी को आने दो मूळ लेखिका- मृदुला श्रीवास्तव
भावानुवाद – श्रीमती उज्ज्वला केळकर
176/2 ‘गायत्री’, प्लॉट नं 12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ, सांगली 416416 मो.- 9403310170
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन ” के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं। आज प्रस्तुत है एक हाइबन “जलमहल”। )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन # 65 ☆
☆ जलमहल ☆
चित्तौड़गढ़ का किला जितना अद्भुत है उतनी ही अद्भुत पद्मिनी की कहानी है। कहते हैं कि रानी पद्मिनी अति सुंदर ही थी। जिसकी एक झलक देखने के लिए अलाउद्दीन खिलजी बेताब था। उस ने सब तरह के यतन किए। तब वह अंततः रानी पद्मिनी को देखने की अनोखी तरकीब के कारण कामयाब हुआ था।
उस तरकीब के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी को पद्मिनी रानी के दर्शन कराए गए थे । रानी पद्मिनी की विश्व प्रसिद्ध महल में पद्मिनी रानी बैठी थी । पास के कमल जल तालाब में स्वच्छ पानी भरा था । अलाउद्दीन खिलजी को इसी तालाब के पानी में रानी के प्रतिबिंब यानी छायाकृति दिखाई गई थी।
यहां के महल की अद्भुत कृतित्व और रानी पद्मिनी के अद्वितीय सौंदर्य ने उस समय अलाउद्दीन खिलजी को अभिभूत कर दिया था। उस के मन में रानी पद्मिनी को पाने की उत्कट इच्छा जागृत हो गई थी। जिस की परिणति युद्ध में हुई थी।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ दो लघुकथायें ☆
एक : अपने आदमी
यह तीसरी बार हो रहा था ।
मैंने तीसरी बार किसी लड़के को नकल करते पकड़ा था औ, बदकिस्मती से वह भी किसी मास्टर, का अपना आदमी निकल आया था। मुझे फिर ठंडी चेतावनी ही मिली थी।
पहली बार हैड का लड़का ही मेरी पकड़ में आ गया था । जब मैं उसे किसी विजयी भावना में लिए जा रहा था तो पीठ पीछे सभी साथी मुस्कुरा रहे थे । नया होने की वजह से मुझे किसी के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था । और वे जानते बूझते मुस्कुरा रहे थे । हैड ने उसे यह कह कर छोड़ दिया था कि अपना शरारती बेटा है , आपसे मज़ाक कर रहा होगा ।
दूसरी बार मैंने फिर ईमानदारी से ड्यूटी करते हुए एक लड़के को रंगे हाथों नकल करते लपका था । उसकी वजह से मुझे उस प्राइवेट स्कूल के मैनेजर का सामना करना पड़ा था । वह उनका सुपुत्र जो था और मुझे नौकरी करनी थी ।
तीसरी बार खेल प्रशिक्षक भागे चले आए थे और मेरे कंधे पर आत्मीयता का भाव लादते हुए बता गये थे कि वह स्कूल का श्रेष्ठ खिलाड़ी है ।
अब मैंने कातर दृष्टि से अपने आसपास देखना शुरू कर दिया है कि जिससे मुझे मालूम हो जाये कि अपने आदमी कहां नहीं हैं ,,,
तब से मैं एक भी आदमी पर उंगली नहीं रख पाया हूं ,,,
दो : राजनीति के कान
– मंत्री जी , बड़ा कहर ढाया है ,,,आपने ।
-किस मामले में भाई?
– अपने इलाके के एक मास्टर की ट्रांस्फर करके ।
-अरे , वह मास्टर ? वह तो विरोधी पार्टी के लिए भागदौड़,,,
-क्या कहते हैं हुजूर ?
– उस पर यही इल्जाम है ।
– ज़रा चल कर कार तक पहुंचने का कष्ट करेंगे?
– क्यों ?
– अपनी आंखों से उस मास्टर को देख लीजिए । जो चल कर आप तक तो पहुंच नहीं पाया । बदकिस्मती से उसकी दोनों टांगें बेकार हैं । और भागदौड़ करना उसके बस की बात कहां ? जो अपने लिए भागदौड़ नहीं कर सकता , वह किसी के विरोध में क्या भागदौड़ करेगा ?
– अच्छा भाई । तुम तो जानते हो कि राजनीति के कान बहुत कच्चे होते हैं और आंखें तो होती ही नहीं । खैर । आपने कहा है तो मैं इस गलती को दुरुस्त करवा दूंगा ।
खिसियाए हुए मंत्री जी ने कहा जरूर लेकिन आंखों में कहीं पछतावा नहीं था ।
(आज प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध एवं प्रतिष्ठित पत्रिका शुभ तारिका के सह-संपादकश्री विजय कुमार जी की लघुकथा “आशीर्वाद ”।)
☆ लघुकथा – आशीर्वाद ☆
“अरे वाह मीनू, तुम्हारे तो ऑफिस के सारे के सारे लोग पहुंचे हुए हैं, रौनक लगवा दी तुमने तो,” अनिल ने कहा।
“बुलाने का तरीका होता है, ऐसे थोड़े ही कोई आता है,” मीनू ने मुस्कुराते हुए कहा।
“वह कैसे?” अनिल ने उत्सुकता से पूछा।
मीनू ने बताया, “मैं अपने ऑफिस में कार्ड के साथ सभी को मिठाई का डिब्बा दे रही थी। मैंने अपने सभी साथियों से कहा था, ‘मेरी बेटी की शादी में उसे आशीर्वाद देने अवश्य ही आइयेगा।’
इस पर सुशील बोला, ‘शायद मैं न आ पाऊँ, पर मैं प्रताप के हाथों शगुन का लिफाफा अवश्य ही भेज दूंगा।‘
इस पर मैंने कहा, ‘यदि आप नहीं आ सकते तो न आएं, किन्तु शगुन का लिफाफा भी मत भेजिएगा। मैं यह कार्ड और मिठाई शगुन के लिफाफे के लिए नहीं दे रही हूँ। ये मेरी अपनी ख़ुशी है जो मैं आप सब से साझा कर रही हूँ, और इसलिए दे रही हूँ कि यदि आप आएंगे तो मेरी बेटी की शादी में रौनक बढ़ेगी और उसे आप सबका आशीर्वाद भी मिलेगा। इसलिए मेरा निवेदन है कि आप सभी लोग शादी में अवश्य आएं। और हां, शगुन का लिफाफा मैं सिर्फ उसी से लूंगी जो मेरी बेटी को शादी में उसे आशीर्वाद देने पहुंचेगा, अन्यथा नहीं।‘
“तभी आज शादी में ऑफिस के सभी लोग बेटी को आशीर्वाद देने आए हुए हैं।” अनिल मुस्कुरा दिया।
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी स्त्री विमर्श पर आधारित लघुकथा किसी का कौन हुआ यूँ तो उम्र भर फिर भी…… । स्त्री जीवन के कटु सत्य को बेहद भावुकता से डॉ ऋचा जी ने शब्दों में उतार दिया है। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को मानवीय रिश्तों और दृष्टिकोण पर आधारित लघुकथा रचने के लिए सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 45 ☆
☆ लघुकथा – किसी का कौन हुआ यूँ तो उम्र भर फिर भी…..☆
सौम्या हर बार की तरह इस बार भी गर्मी की छुट्टियों में बच्चों को लेकर मायके चली गयी थी। जैसे-जैसे बच्चे बड़े हो रहे थे मायके से उसकी दूरियां बढ़ती जा रही थीं। कारण वह समझती थी। जिन बातों को वह आज तक नजरअंदाज करने की कोशिश करती थी वे बातें अब खुलकर बच्चों के सामने आने लगी थी। बच्चे नासमझ नहीं रह गए थे और वह भी किन-किन बातों पर पर्दा डालती। उसने भी जैसा चल रहा है चलने दो ,का भाव अपना लिया था।
उस दिन तो सौम्या भी सकते में आ गयी जब भाई ने घर के सामान के लिए दिए पैसों का हिसाब माँगते हुए कहा- सौम्या ! मुझे दो ना पैसों का हिसाब। पापा का इन्तजार क्यों कर रही हो। मैं और पापा एक ही तो हैं। मयंक मासूमियत से बोला- मतलब…..? और मेरी मम्मी ? वो भी तो नाना-नानी की बेटी हैं ?
सौम्या ने बच्चों के सामने बात बढ़ाना उचित नहीं समझा। बच्चों के मन में रिश्तों को लेकर कड़वाहट नहीं घुलनी चाहिए। सच, जब रिश्ते पूरी गरमाहट के साथ रजाई की तरह बच्चों को अपने में लपेट लेते हैं तो बच्चों की दुनिया ही बदल जाती है। और ऐसा ना होने पर अपनों के प्रति ही अविश्वास का भाव………।
सौम्या ने उस समय तो बात टाल दी लेकिन भाई का वाक्य उसे कचोटता रहा। उसे याद आया वह दिन जब शादी के बाद उसने भावुकतावश एक सादे लिफाफे में मुँह दिखाई में मिले रुपए रखकर भाई को भेज दिए थे। भाई के मोह में वह उस दिन यह भी नहीं सोच पाई कि सादे लिफाफे में रखकर रुपए नहीं भेजने चाहिए, मनीआर्डर करना चाहिए था। ऐसा एक लिफाफा तो मिल गया। दूसरा नहीं पहुँचा ,शायद किसी ने रुपए निकाल लिए होंगे। आज वही भाई उसे यह एहसास करा रहा है कि तुम अब इस परिवार से अलग हो। सौम्या ने उस दिन ही यह तय कर लिया था कि वह माता-पिता के लिए ही मायके जाएगी। हाँ इतना जरूर था कि अब वह मायके अकेले जाने लगी थी। पति और बच्चों के सामने मायके में अपमान सहना जरा कठिन होता है।
समय किसी के लिए रुकता नहीं। माँ-पापा की मृत्यु के बाद मायके जाना लगभग खत्म हो गया। जब रिश्तों में तरावट नहीं रही तो दीवारों का मोह क्या करना। धीरे-धीरे घर, शहर सब छूट गया। जब पलटकर देखती तो आश्चर्य होता कि जीवन के इतने साल जिस घर में बिताए वहीँ आज कदम रखना मुश्किल है। उसे फिराक गोरखपुरी का शेर याद आया-
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन ” के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं। आज प्रस्तुत है एक हाइबन “तोरणद्वार”। )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन # 64 ☆
☆ तोरणद्वार ☆
खोर ग्राम स्थित बिरला सीमेंट फैक्ट्री तहसील-जावद, जिला- नीमच के पास0 ग्रेनाइट पत्थर पर नक्काशीदार यह तोरणद्वार का एक महत्वपूर्ण स्थान है। इसका महत्व देखते हुए इसे पुरातत्व महत्व का स्थान घोषित किया गया है । मगर इस तरुणद्वार पर स्थापित शिलालेख पर 11वीं शताब्दी के संग्रहणीय इमारत का उल्लेख मिलता है।
सीमेंट फैक्ट्री के नजदीक स्थित्व यह खूबसूरत स्थान नक्काशीदार नंदी और तोरणस्तंभ की बारीक कारीगरी देखने लायक है । अरावली श्रंखला के नजदीक बसे इस स्थान के बारे में कहा जाता है कि प्राचीन समय में यहां से चित्तौड़गढ़ किले तक जमीन में एक गुप्त रास्ता जाता था । इस रास्ते से होकर राजा महाराजा, जासूस और उनकी सेनाएं गुप्त रूप से आतीजाती थी।
नीमच से चित्तौड़ या उदयपुर रास्ते में जाते समय राजस्थान सीमा से 8 किलोमीटर उत्तर में स्थित यह स्थान और बिरला फैक्ट्री के नजदीक स्थित है। जहां पर यत्रतत्र नक्काशीदार पत्थर बिखरे पड़े हैं जो किसी विशेष कहानी को अपनी भाषा में बयान करते नजर आते हैं।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत हैं मानवीय संवेदनशील रिश्तों पर आधारित एक अतिसुन्दर एवं सार्थक लघुकथा “ तुरपाई ”। निःस्वार्थ सेवा /सहयोग का फल ईश्वर आपको कब देंगे आप नहीं जानते। एक भावप्रवण एवं सुखान्त लघुकथा । इस सार्थक एवं भावनात्मक लघुकथा के लिए श्रीमती सिद्धेश्वरी जी को हार्दिक बधाई।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 64 ☆
☆ लघुकथा – तुरपाई ☆
गांव में एक अनाथ बच्चा ‘तरुण’। घूम – घूम कर माँग कर खाता था। पता नहीं कब और कहाँ से आया। छोटा सा था और सब की बातें सुनता रहता था।
बस्ती में एक एक घर उसे पहचानने लगे थे। धीरे-धीरे बड़ा होने लगा। अब वह कभी-कभी किसी का काम कर देता था और जो मिल जाता था खाकर अपना गुजारा करता। जहां नींद लगता एक पट्टी डाल सो जाया करता था।
गांव में एक दर्जी जिनके पास अपना कहने को कोई नहीं और संपत्ति के नाम पर कहने को कुछ भी नहीं था। एक सिलाई मशीन और टूटी फूटी झोपड़ी जो उन्होंने एक पेड़ और खंभे की आड़ से बना रखा था। जिसमें मशीन रखकर हर समय फटा पुराना सीते हुए दिखाई देते थे।
कभी-कभी तरुण वहीं पर आकर बैठता और कहता… बाबा मुझे कुछ बनना है कुछ काम सिखा दो। यहाँ पर कोई मुझे काम देना नहीं चाहता। दर्जी के मन में रोज सुनते सुनते दया की भावना उमड़ उठी। उन्होंने कहा.. चल मेरे भी कोई नहीं है और तू भी अनाथ है।
आज से तू और मैं एक नया काम करते हैं “रिश्तो की तुरपाई” तेरा भी कोई नहीं और मुझे भी एक सहारा चाहिए। फटे पुराने कपड़ों पर तरुण धीरे-धीरे तुरपाई का काम करने लगा।
मन में स्कूल जाने की चाहत हुई उसने कहा बाबा मुझे स्कूल जाना है। उन्होंने कहा.. चला जा और पढ़ाई कर धीरे-धीरे वह पढ़ाई से आगे बढ़ने लगा। गरीब जान सरकारी स्कूल से फीस माफ हो गई। उसे पढ़ने के लिए बाहर जाना पड़ा।
दर्जी ने सोचा चला गया। चलो अच्छा है जीवन सुधर जाएगा उसका। उसकी अपनी जिंदगी है।
कुछ वर्षों में सब भूल जाएगा।
वर्षों बाद एक दिन अचानक एक बार गाँव में अतिक्रमण हटाओ के अंतर्गत सभी झुग्गी झोपड़ियों को तोड़ा जा रहा था। सयाने हो चुके दर्जी परेशान हो इधर उधर भागने लगे और गिड़गिड़ा कर कहने लगे.. अब इस उमर में मैं कहाँ जाऊँगा। मुझे यहीं रहने दो मेरी जिंदगी कितनी बची है। परंतु उसमें से कुछ आदमी निकलकर सारा सामान गाड़ी में भरने लगे और कहने लगे अब तुम्हें यहाँ नहीं रहना है साहब का आदेश है। डरकर दर्जी एक किनारे खड़ा हो गया। तुम्हें जहां छोड़ना है चलो गाड़ी में बैठो।
असहाय दर्जी अपने टूटे फूटे सामान और एक सिलाई मशीन की लालच में गाड़ी में बैठ गया।
गाड़ी एक दुकान के पास जाकर रुक गई। दर्जी ने सोचा यहाँ पर क्यों रुक गए? चश्मे से देखा दुकान के बोर्ड पर लिखा हुआ था “तुरपाई घर”। उसे समझते देर नहीं लगी। हाँफते हुए इधर – उधर देख अपने तरुण की खोज करने लगा। तरुण भी वहाँ बाहें फैला अपने रिश्ते को समेटने के लिए बेताब खड़ा था। आज सचमुच तुरपाई से भरपाई हो गई। दोनों ने गले लग जी भर कर रोया। सभी कर्मचारी कभी फटे हाल दर्जी और कभी अपने साहब को देख रहे थे। उनका आदेश था एक-एक सामान को संभाल कर दुकान पर लगा दिया जाए।
(आज प्रस्तुत है डॉ कामना तिवारी श्रीवास्तव जी की एक विचारणीय लघुकथा बेघर। )
☆ लघुकथा – बेघर ☆
“पिताजी मेरा नाम क्यों नहीं लिखवाया?”
नन्ही सी नम्रता ने अपने नए घर की नेम प्लेट पर पिता और छोटे भाई का नाम लिखा देखकर पूछा।
“बेटियां तो पराई होती हैं तुम्हारा घर तो तुम्हारे पति का घर होगा” पिताजी ने कहा
बेटियां पराई होती हैं, जिम्मेदारी होती हैं सुनते सुनते नम्रता 18 साल में ही ब्याह दी गई। ससुराल आकर लगातार एक पैर पर चकरघिन्नी जैसे घूमते घूमते सास-ससुर की सेवा और बच्चों को पालने में लग गई। साथ साथ अपना घर… और घर पर लिखा अपना नाम के सपनों को जीती हुई उसे पूरा करने में जुट गई। पति की कम आय में गुजारा करना शुरू के दिया।
कामवाली भी नहीं लगवाई और बच्चों को ट्यूशन खुद ही सब निपटा लेती। फिर स्कूल में नौकरी और शाम को ट्यूशन के साथ आखिरकार लोन लेकर घर बनवाया।
बरसो के अथक प्रयासों के बाद नेमप्लेट पर केवल पति का और बेटे का नाम लिखा देख बचपन से पाला हुआ अरमान एक पल में ही धराशाई हो गया।