श्री प्रतुल श्रीवास्तव
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य “कहीं सूखा कहीं बाढ़ : देवराज क्यों कुपित”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३६ ☆
☆ व्यंग्य ☆ “कहीं सूखा कहीं बाढ़ : देवराज क्यों कुपित” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
झब्बूलाल ने पान लपेट कर मेरी ओर बढ़ाया और हमेशा की तरह मेरे सामने एक लंबा प्रश्न पटक दिया। भाई साहब, देवभूमि भारत में कदम-कदम पर देवालय हैं, जहां प्रति दिन शंख और घंटों की ध्वनि के बीच दिन भर ईश्वर की आराधना होती है, साधु-संतों, महंतों, जगत गुरुओं के प्रवचन होते हैं, देवी-देवताओं की शोभा यात्राएं निकलती हैं। लाउडस्पीकर लगा कर अखंड रामायण, भागवत पाठ, नर्मदा, शिव, विष्णु एवं गरुड़ पुराण होते हैं, भंडारे होते हैं, उस भारत भूमि वासियों से देवराज इंद्र के सम्मान में क्या गुस्ताख़ी हो गई जो इस वर्ष वे कहीं तो सिर्फ छिड़काव कर रहे हैं और कहीं बेहिसाब पानी उड़ेल रहे हैं ?
मैंने कहा, झब्बू भाई, मैं ऑफिस जाने के लिए घर से निकला हूं मुझे प्रश्नों के जाल में मत उलझाओ। वह बोला, भैया मैं कल से इस बारे में कई लोगों से पूंछ चुका हूं, किसी ने संतोषजनक समाधान नहीं किया। आप पत्रकार हैं कुछ तो बताएं। जब तक मैं आपके ऑफिस के लिए पानों की पुड़िया बनाता हूं। मैंने कहा, झब्बू भाई मैं पृथ्वी लोक का पत्रकार हूं। ट्रंप, पुतिन, मोदी, योगी, राहुल की प्रसन्नता, दुख और नाराजी की वजह बता सकता हूं देवलोक वासी इंद्र की नाराजी अथवा उनके मूड के बारे में जानने के लिए तो तुम्हें देवलोक के पत्रकार नारद जी से संपर्क करना होगा। यदि लोगों को ऐसा लग रहा है कि देवराज रुष्ठ हैं इसलिए वर्षा को प्रभावित कर रहे हैं तो उन्हें खुश करने का प्रयत्न करें।
झब्बू बोला, भाई साहब अखबारों में छप रहा है कि अच्छी वर्षा के लिए लोग जगह-जगह पूजा-पाठ, यज्ञ करवा रहे हैं। टोना टोटके भी हो रहे हैं, कहीं गधों को गुलाबजामुन खिलाए जा रहे हैं, कहीं मेंढक-मेंढकी के विवाह कराए जा रहे हैं, जमीन में उल्टे घड़े गड़ाए जा रहे हैं फिर भी इंद्र देव खुश नहीं हो रहे!
पान लगाते हुए झब्बू ने मेरी ओर नजर फेंकी और पुनः कहा, भाई साहब कहीं ऐसा तो नहीं कि दुश्मन देशों ने हमारे देश के खिलाफ इंद्र के कान भर दिए हों? मैंने कहा यह भी हो सकता भाई जी क्योंकि हमारे देश के कुछ नेता भारत को विश्व गुरु बनाने पर तुले हैं जबकि अनेक देश हमें गुरु नहीं मानना चाहते।
झब्बू बोला – भाई साहब, इंद्र देव की नाराजी के और क्या कारण हो सकते हैं ? मैंने झब्बू से पान की पुड़िया ली और कहा प्यारे भाई, जाने के पहले मुझसे इंद्र देव की नाराजी का सबसे बड़ा कारण सुन लो। झब्बू मेरी ओर झुका, मैंने धीरे से कहा – तुमने सुना होगा कि जब-जब भारत भूमि पर कोई धर्मनिष्ठ, तपस्वी, लोकप्रिय राजा हुआ है तब-तब इंद्रासन डोला है। इंद्र के मन में आशंका पैदा हुई है कि भारत का वह धर्मनिष्ठ राजा कहीं उनसे उनका सिंहासन न छीन ले, तो भाई शायद यही आशंका इस समय भी इंद्र के मन में समा गई है और संभवतः इंद्र देव इस कारण ही कुपित होकर वर्षा को अस्त्र बना कर भारत भूमि के शासक को अशक्त करके उससे अपनी गद्दी बचाना चाहते हैं। मेरी बात सुनकर झब्बूलाल की आँखें खुली रह गईं। मैंने उसे हतप्रभ छोड़ कर अपने स्कूटर में किक मारा और आगे बढ़ गया।
© श्री प्रतुल श्रीवास्तव
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