हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९८ – व्यंग्य – एलन मस्क की नानी और हमारी सनातन ‘टेस्ला’ ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – एलन मस्क की नानी और हमारी सनातन ‘टेस्ला’।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९८ – व्यंग्य  – एलन मस्क की नानी और हमारी सनातन ‘टेस्ला’ ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

एक सुबह जब एक सबसे आधुनिक, बिना ड्राइवर वाली चमचमाती विदेशी कार भारत की एक धूल भरी सड़क पर उतरी, तो उसे सामने से आती अपनी सगी परदादी यानी हमारी सनातन बैलगाड़ी से आमना-सामना होने की बिल्कुल उम्मीद नहीं थी। कार के भीतर बैठे कृत्रिम बुद्धि के सारे सॉफ्टवेयर और सेंसर वैसे ही चकरा गए जैसे किसी संस्कारी वीआईपी शादी में बिना घूंघट वाली आधुनिक बहू के सामने अचानक गांव की घूंघट वाली बुजुर्ग महिला आकर खड़ी हो जाए। कार की बड़ी सी स्क्रीन पर लाल बत्तियां इस कदर भभकने लगीं मानो वह इस आदि-स्वदेशी सवारी को देखकर सम्मान में अपनी सांसें रोक रही हो। सच कहूं तो हमारी बैलगाड़ी ही दुनिया की सबसे पहली और असली स्वचालित गाड़ी है। जब पश्चिमी देशों के पुरखे पेड़ों की छाल लपेटकर पत्थरों से आग जलाना सीख रहे थे, तब हमारे पुरखों ने बिना किसी लिथियम-आयन बैटरी के, सीधे दो बैलों के कंधों पर ‘ऑटोपायलट’ मोड एक्टिवेट करके इतिहास रच दिया था। इस आदि-सवारी में न तो कभी ब्रेक फेल होने का कोई डर रहता है और न ही इसके जीपीएस को किसी इंटरनेट नेटवर्क की बैसाखी की जरूरत पड़ती है, क्योंकि इसका पूरा नेविगेशन सिस्टम बैलों की पूंछ और उनकी पुरानी स्मृतियों से जुड़ा होता है; जिसके सामने आज की यह संकर विदेशी कार पानी भरती नजर आती है।

इस प्राचीनतम गाड़ी के अनोखे गुणों का लेखा-जोखा अगर बारीक और पैनी नजर से देखा जाए, तो इसमें ‘जीरो मेंटेनेंस’ का ऐसा शाश्वत दर्शन छुपा है जिसे समझने में विदेशी कंपनियों की सात पीढ़ियां गंजी हो जाएं। इसमें न तो हर तीन महीने में कीमती मोबिल ऑयल बदलने की झंझट है और न ही किसी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दफ्तर में जाकर घूस देने की आत्मग्लानि होती है। इसका ईधन पूरी तरह से जैविक और सस्ता है। दो मुट्ठी हरी घास सामने डालो और गाड़ी बिना किसी कार्बन उत्सर्जन के पूरे आठ किलोमीटर प्रति घंटे की कछुआ चाल से दौड़ने को तैयार हो जाती है। मजे की बात देखिए कि इसका साइलेंसर पीछे से जो ‘बायो-वेस्ट’ छोड़ता है, वह देश के खेतों के लिए सोना उगलने वाली खाद बन जाता है, जबकि विदेशी कारों का धुआं फेफड़ों को छलनी करता है। आधुनिक कार में अगर कोई तकनीकी खराबी आ जाए तो आपको सीधे विदेश से कोई सॉफ्टवेयर इंजीनियर बुलाना पड़ेगा या फिर अपनी जमीन बेचकर उसका पुर्जा बदलना पड़ेगा, मगर हमारी इस सनातन गाड़ी का टायर अगर बीच सड़क पर टूट भी जाए, तो राह चलता कोई भी बढ़ई या पास के नीम के पेड़ की मजबूत टहनी इसका तुरंत सफल ऑपरेशन करके इसे दोबारा जीवनदान दे देती है।

अरे साहब, इस गाड़ी की सबसे बड़ी खूबी तो इसका ‘ऑटो-क्रैश प्रिवेंशन सिस्टम’ है जिसे देखकर बड़ी-बड़ी बीमा कंपनियां दिवालिया हो जाएं। आज की आधुनिक गाड़ियां एक्सीडेंट होने के वक्त हवा वाला बैलून फुलाती हैं ताकि आपकी खोपड़ी स्टीयरिंग व्हील से न टकराए, मगर हमारी इस स्वदेशी गाड़ी के दोनों इंजन यानी हमारे प्यारे बैल, इतने दयालु और समझदार होते हैं कि सामने कोई गड्ढा या किसी नेता की चमचमाती गाड़ी देखकर खुद ही अपने पैर जाम कर लेते हैं। इन्हें किसी मंहगे कैमरे या राडार की कोई जरूरत नहीं होती, इनकी बड़ी-बड़ी आंखें ही इनका असली राडार होती हैं जो रात के घाघ अंधेरे में भी सामने से आ रहे किसी शराबी या आवारा सांड को दूर से ही पहचानकर गाड़ी की गति को अपने आप इको-मोड पर ले आती हैं। इस गाड़ी में बैठने वाले मुसाफिर को जीवन में कभी जिम जाकर पसीना बहाने की आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि इसके भारी लकड़ी के पहियों से जो प्राकृतिक वाइब्रेशन पैदा होता है, वह बैठे-बैठे ही इंसान के पेट की चर्बी को वैसे ही पिघला देता है जैसे सावन के महीने में तेज धूप देसी घी को पिघला देती है। यह केवल एक सवारी नहीं है, बल्कि यह तो साक्षात चलता-फिरता एक योग केंद्र है।

एक ठहरे हुए, अलसाए हुए शहर के किसी मस्तमौला किरदार की तरह यह गाड़ी कभी अपनी जिंदगी में हड़बड़ी नहीं मचाती। यह हमें शांत रहकर सिखाती है कि मंजिल पर पहुंचना उतना जरूरी नहीं है जितना कि रास्ते के धूल-धक्कड़ और बगल के खेतों से आ रही सोंधी महक का आनंद लेना जरूरी है। जब आप इस सनातन गाड़ी पर पूरे रौब से सवार होते हैं, तो आपके पीछे हॉर्न बजाने वाले शहर के सारे रईस और उनकी मर्सिडीज-ऑडी गाड़ियां खुद-ब-खुद शांत होकर आपके पीछे एक संस्कारी कतार में लग जाती हैं, मानो वे किसी बहुत बड़े वीआईपी के काफिले का हिस्सा हों और उन्हें आगे निकलने की अनुमति न हो। इसमें न तो कोई महंगा चोर अलार्म लगाने की जरूरत होती है और न ही इसे रात में गैराज में बंद करके बड़ा सा ताला ठोकने की नौबत आती है, क्योंकि दुनिया का कोई भी शातिर चोर इस बीस क्विंटल की भारी-भरकम लकड़ी की कलाकृति को अपने कंधे पर उठाकर भागने की जुर्रत नहीं कर सकता। इसके इंटीरियर की बात करें तो विदेशी कारों की मखमली सीटें इसके सामने बिल्कुल फीकी हैं। हमारी गाड़ी में बिछी हुई सूखी पियरी और पुआल की जो खुशबूदार गद्दी होती है, उस पर लेटकर जो गहरी नींद आती है, वह दुनिया के किसी भी आलीशान पांच सितारा होटल के मखमली गद्दे पर करोड़पति इंसानों को जीवन भर नसीब नहीं हो सकती।

आजकल के जो नौजवान स्मार्ट कनेक्टिविटी और ब्लूटूथ के पीछे अपनी सुध-बुध खोए फिरते हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि हमारी इस पुरानी गाड़ी में वॉयस कमांड की ऐसी अचूक व्यवस्था है कि ड्राइवर को अपनी जीभ हिलाने की भी जरूरत नहीं पड़ती। ड्राइवर सिर्फ ‘हुर्र-हुर्र’ या ‘तित-तित’ जैसी हल्की सी आवाज निकालता है और गाड़ी का पूरा सिस्टम तुरंत अपनी दिशा बदल लेता है; इसके लिए किसी हाई-स्पीड इंटरनेट या किसी विदेशी नेटवर्क की गुलामी नहीं करनी पड़ती। बैलों और इंसानों के बीच का यह अनूठा ब्लूटूथ बिना किसी जटिल पासवर्ड के, सीधे दिल से दिल के कनेक्शन पर काम करता है। सुरक्षा के मामले में तो यह गाड़ी इतनी अभेद्य और खतरनाक है कि अगर कोई लुटेरा या डाकू आधी रात को गाड़ी को रोकने की कोशिश करे, तो इसके दोनों ‘इंजन’ अपने पिछले पैरों से ऐसा ‘एंटी-थेफ्ट’ किक मारते हैं कि चोर सीधे परलोक सिधार जाता है। आधुनिक कार तो जरा सी बाढ़ या घुटने भर पानी में आते ही शॉर्ट-सर्किट होकर अपनी जान दे देती है, मगर हमारी यह स्वदेशी सवारी गंगा-यमुना की उफनती लहरों को भी ऐसे आसानी से पार कर जाती है जैसे कोई बत्तख किसी शांत तालाब में तैर रही हो।

इस गाड़ी की छत पूरी तरह से खुले आसमान के नीचे होती है, जिसे आजकल के अमीर लोग सनरूफ कहकर अपनी जेब से लाखों रुपये फालतू फूंकते हैं; हमारी गाड़ी में तो बिना एक पैसा खर्च किए चौबीसों घंटे ‘पैनोरमिक स्काईव्यू’ मिलता है, जहां से आप दिन में चिलचिलाती धूप का और रात में मुफ्त के चमकते तारों का आनंद ले सकते हैं। इसके ‘हॉर्न’ की आवाज भी किसी चाइनीज भोंपू जैसी कर्कश और कानफाड़ू नहीं होती, बल्कि जब इसके भारी पहिए सड़क पर घूमते हैं, तो उनकी सूखी लकड़ी से ‘चर्र-चूं, चर्र-चूं’ का जो सुरीला संगीत निकलता है, वह कानों में किसी शास्त्रीय तानपुरा की तरह रस घोलता है जिसे सुनकर सड़क किनारे सोए हुए आवारा कुत्ते भी सम्मान में अपनी दुम हिलाने लगते हैं। इसके ब्रेक लगाने की तकनीक तो इतनी क्रांतिकारी है कि जब ड्राइवर अपनी पुरानी चप्पल निकालकर पहिए और लकड़ी के फ्रेम के बीच फंसा देता है, तो गाड़ी वहीं की वहीं ऐसे सन्नाटे में आ जाती है मानो किसी मुंशी ने रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़े जाने पर अपनी जीभ दांतों तले दबा ली हो। यह गाड़ी कभी भी समय की पाबंद नहीं रही, और यही इसकी सबसे बड़ी दार्शनिक खूबी है।

उस दिन कुछ ऐसा हुआ जब वह चमचमाती विदेशी कार हमारी इस सनातन परदादी बैलगाड़ी के ठीक सामने आकर रुकी, तो उसके कृत्रिम दिमाग ने बैलों के बड़े-बड़े सींगों को कोई नया और खतरनाक सेंसर समझ लिया और वह घबराहट में खुद-ब-खुद रिवर्स गियर में जाने लगी। बैलगाड़ी पर बैठे हमारे देहाती भाई ने, जिसके मुंह में बनारसी पान दबा था, अपनी नशीली आंखों से उस हांफती कार को देखा और बड़े ही दार्शनिक अंदाज में मुस्कुराते हुए अपने दाहिने बैल की पूंछ को जरा सा मरोड़ दिया। पूंछ मरोड़ते ही गाड़ी का ‘सिस्टम’ ऐसा एक्टिवेट हुआ कि बैल ने सीधे कार के चमचमाते बोनट पर अपनी पूंछ से ‘सेंसर-रिबूट’ वाला एक जोरदार स्वदेशी चांटा जड़ दिया। इस एक चांटे से उस कार का लाखों रुपये का सॉफ्टवेयर ऐसा पगलाया कि कार ने वहीं सड़क के बीचों-बीच अपनी चारों बत्तियां जलाकर, जोर-जोर से ‘बां-बां’ करके बछड़े की तरह रंभाना शुरू कर दिया और अपनी हेडलाइट्स को बार-बार बंद-चालू करते हुए बैलों के पैरों में ऐसे गिर पड़ी मानो कोई भटका हुआ पोता अपनी परदादी के चरणों में साष्टांग दंडवत प्रणाम करके अपनी भूल सुधार रहा हो।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९७ – व्यंग्य – हे रिमोट महाराज! और कितना पिटोगे! ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – हे रिमोट महाराज! और कितना पिटोगे!)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९७ – व्यंग्य – हे रिमोट महाराज! और कितना पिटोगे! ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

ड्राइंग रूम की धुंधली रोशनी में टीवी रिमोट किसी दिव्य ब्रह्मास्त्र की तरह सोफे के कुशन पर आराम फरमा रहा था। हम सब जानते हैं कि जब उसकी स्क्रीन धुंधली होती है और चैनल बदलने की गति कछुए से भी धीमी हो जाती है तब घर का हर सदस्य एक मूक वैज्ञानिक बन जाता है। हमारी रगों में बहता स्वदेशी जुगाड़ हमें प्रेरित करता है कि हम नई बैटरी खरीदने के बजाय उस प्लास्टिक के टुकड़े को उसकी औकात याद दिलाएं। जैसे ही स्टार स्पोर्ट्स पर अंतिम ओवर की पहली गेंद फेंकने की तैयारी हुई रिमोट ने अचानक दम तोड़ दिया। पिताजी के चेहरे पर वैसे ही भाव उभरे जैसे किसी अंतरिक्ष यात्री का ऑक्सीजन सिलेंडर अंतरिक्ष में खत्म हो गया हो। उन्होंने रिमोट को हाथ में लिया और उसे इस तरह निहारा जैसे कोई जौहरी नकली हीरे को परख रहा हो। पहली बार में उन्होंने उसे हौसले के साथ सोफे की गद्दी पर पटका ताकि उसके भीतर सोए हुए रासायनिक कण जाग जाएं। यह भारतीय परिवारों का वह आदिम विश्वास है जो मानता है कि दुनिया की हर तकनीकी समस्या का समाधान केवल दो थप्पड़ मारकर ही निकाला जा सकता है। रिमोट को ठोकना सिर्फ एक शारीरिक क्रिया नहीं है बल्कि यह हमारे भीतर छुपे उस इंजीनियर का जागना है जो मानता है कि घर्षण से ही अग्नि पैदा होती है और ठोकर से ही इंसान और रिमोट सुधरते हैं।

जब पहली चोट के बाद भी चैनल नहीं बदला तो माताजी ने मोर्चा संभाला और उनके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान तैर गई। उनका मानना था कि रिमोट को सिर्फ पीटना काफी नहीं है बल्कि उसे सही कोण और सही दिशा में घुमाना भी जरूरी है। उन्होंने रिमोट को अपने आंचल से पोंछा जैसे कोई मां अपने लाडले को परीक्षा से पहले तिलक लगा रही हो। फिर उन्होंने उसे टीवी की तरफ ऐसे ताना मानो वह कोई तीर कमान हो जिससे सीधे महिषासुर का वध करना हो। हमारा यह अंधविश्वास कितना गहरा है कि हम रिमोट के सेल को निकालने के बजाय अपनी कलाई की ताकत पर ज्यादा भरोसा करते हैं। माताजी ने रिमोट के पिछले ढक्कन को खोला और दोनों सेलों की आपस में अदला बदली कर दी। यह वैसा ही था जैसे ट्रांसफर ऑर्डर देकर किसी सुस्त सरकारी कर्मचारी को दूसरे विभाग में भेज दिया जाए ताकि वह काम करने लगे। इस प्रक्रिया के पीछे छिपी मानसिकता यह है कि शायद बायां सेल दाएं वाले से ज्यादा वफादार हो और आपस में मिलकर वे दोनों कुछ नया चमत्कार कर दिखाएं। पूरा कमरा इस समय एक अदृश्य प्रयोगशाला में बदल चुका था जहां सांसें थमी हुई थीं और रिमोट अगली मार खाने के लिए पूरी तरह तैयार खड़ा था।

तभी बड़े भाई साहब ने अपनी बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन करते हुए रिमोट को अपने दांतों के बीच दबा लिया। यह दांतों से सेल को दबाने की कला हमारे पूर्वजों से हमें विरासत में मिली है जिसे हम सबने कभी न कभी आजमाया ही है। दांतों का दबाव पड़ते ही सेल की जस्ता धातु थोड़ी पिचक जाती है और रासायनिक ऊर्जा को लगता है कि अब अगर बाहर नहीं निकले तो जान चली जाएगी। भाई साहब ने रिमोट को ऐसे चबाया जैसे वह कोई कड़क रेवड़ी खा रहे हों और उनके चेहरे पर एक अजीब सा सस्पेंस था कि अब टीवी का पर्दा खुलेगा या नहीं। हम सब इस बात पर पूरी तरह सहमत थे कि नया सेल खरीदना सीधे सीधे हमारी हार होगी क्योंकि बाजार से पचास रुपये का सेल लाना हमारी जेब से ज्यादा हमारी मर्दानगी पर चोट होती। हम उस अंतिम सांस तक लड़ना चाहते थे जब तक कि रिमोट का प्लास्टिक खुद रोकर न कह दे कि मुझे बख्श दो। इस दौरान टीवी पर विज्ञापन आ रहे थे और मैच का रोमांच बढ़ता जा रहा था जिससे हमारी धड़कनें भी रिमोट की धड़कनों के साथ ताल मिला रही थीं। हर कोई अपनी अपनी थ्योरी दे रहा था कि रिमोट को दीवार पर मारना ज्यादा फायदेमंद होगा या फर्श पर पटकना।

पिताजी ने फिर से कमान संभाली और इस बार उनके प्रहार में एक अनूठा सम्मोहन और गुस्सा दोनों शामिल था। उन्होंने रिमोट को सोफे के हत्थे पर इस तरह तीन बार पटका जैसे कोई धोबी घाट पर कपड़े धो रहा हो। इस बार रिमोट के भीतर से एक खड़खड़ाहट की आवाज आई जिसने हमें यह यकीन दिलाया कि आत्मा अभी भटकी नहीं है बल्कि शरीर के भीतर ही कहीं छुपी है। हमारी मानसिकता यह होती है कि अगर रिमोट को दो दिन और चला लिया जाए तो हम देश की जीडीपी में अपना बहुत बड़ा योगदान दे देंगे। हम उस हर थप्पड़ के साथ यह सोचते हैं कि हम महंगाई के खिलाफ एक मौन युद्ध लड़ रहे हैं जिसमें हमारी जीत तय है। रिमोट को पीटने की इस कला में एक अजीब सा सुकून मिलता है जो हमें किसी महंगे स्पा में भी नहीं मिल सकता। ऐसा लगता है कि रिमोट को मारना वास्तव में दिनभर के तनाव को निकालने का एक वैध और पारिवारिक माध्यम है। पूरे मोहल्ले में शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहां शाम को टीवी देखते समय थप थप की यह पावन ध्वनि सुनाई न देती हो जो हमारी संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है।

हालत तो तब बुरी हुई जब रिमोट को इतनी प्रताड़ना देने के बाद भी स्क्रीन पर कोई हलचल नहीं हुई और मैच की आखिरी दो गेंदें बची थीं। अबकी बार मैंने रिमोट को अपने हाथों में लिया और उसे अपनी शर्ट से रगड़ना शुरू किया ताकि स्थैतिक ऊर्जा का संचार हो सके। हम भारतीयों का यह भी एक दृढ़ विश्वास है कि रगड़ने से तो अल्लादीन का जिन भी बाहर आ जाता है तो यह मामूली बैटरी क्या चीज है। मैंने रिमोट को टीवी के बिल्कुल करीब ले जाकर बटन को इतनी जोर से दबाया कि मेरी उंगली का नाखून नीला पड़ गया। इस समय कमरे का माहौल किसी थ्रिलर फिल्म के क्लाइमेक्स जैसा हो चुका था जहां बम को डिफ्यूज करने के लिए आखिरी तार काटना बाकी होता है। हम सब एक दूसरे को इस तरह देख रहे थे जैसे अगर मैच छूट गया तो इसके जिम्मेदार हम खुद होंगे न कि वह बेजान रिमोट। रिमोट पर बने बटन अब अपनी जगह से हिल चुके थे और वॉल्यूम वाला बटन तो अंदर ही धंस गया था पर हमारी उम्मीदें अभी भी आसमान छू रही थीं। हमें लग रहा था कि हमारी सामूहिक इच्छाशक्ति की ताकत से टीवी खुद ब खुद मान जाएगा और चैनल बदल देगा।

तभी पिताजी ने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा जुआ खेलने का फैसला किया और रिमोट को सीधे धूप में ले जाने की बात कही पर रात के नौ बज रहे थे। रात के समय धूप कहां से लाएं इस बात पर विचार किए बिना उन्होंने रिमोट को गर्म तवे के पास रख दिया ताकि उसकी सोई हुई गर्मी वापस आ सके। यह वैज्ञानिक सोच इतनी अद्भुत थी कि न्यूटन और आइंस्टीन भी अपनी कब्र में करवट बदल लेते। बैटरी के रसायनों को गर्म करके उन्हें पुनर्जीवित करने का यह नुस्खा केवल हमारे देश के महान विचारकों के पास ही मिल सकता है। तवे की गर्मी पाकर रिमोट का प्लास्टिक थोड़ा पिघलने लगा और उससे एक अजीब सी गंध आने लगी जिसने सस्पेंस को अपने चरम पर पहुंचा दिया। भाई साहब ने चिल्लाकर कहा कि देखो अब लाल बत्ती जलने वाली है और हम सब अपनी आंखें फाड़कर रिमोट की उस नन्ही एलईडी लाइट को देखने लगे। वह लाइट हमारे लिए किसी डूबते को तिनके का सहारा जैसी थी जिसके जलते ही हमारी दुनिया रोशन हो जाती। पूरा परिवार उस बेजान प्लास्टिक के टुकड़े के चारों तरफ इस तरह मंडरा रहा था जैसे कोई तांत्रिक किसी आत्मा को बुलाने का अनुष्ठान कर रहा हो।

अंतिम ओवर की आखिरी गेंद फेंकने का समय आ चुका था और पिताजी ने पूरी ताकत से रिमोट का लाल बटन दबाया। अचानक टीवी की स्क्रीन चमकी और चैनल बदल गया पर जो सामने आया उसे देखकर पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। टीवी पर मैच नहीं चल रहा था बल्कि पड़ोस के शर्मा जी का नया वाईफाई नेटवर्क हमारे स्मार्ट टीवी की स्क्रीन पर पासवर्ड मांग रहा था। असल में हमारे हाथ में जो रिमोट था वह टीवी का था ही नहीं बल्कि वह तो पिछले साल खराब हो चुके हमारे पुराने एयर कंडीशनर का रिमोट था जिसे हम पिछले आधे घंटे से पीट रहे थे। असली टीवी रिमोट तो सोफे के नीचे आराम से तकिए के पीछे छुपा हुआ अपनी किस्मत पर हंस रहा था। इस महासत्य के उजागर होते ही पिताजी ने रिमोट को ऐसे देखा जैसे वह कोई लावारिस वस्तु हो और माताजी जोर से हंस पड़ीं। भाई साहब ने अपने दांतों को साफ किया और मैंने चुपचाप उठकर सोफे के नीचे से असली रिमोट निकाला जिसके सेल बिल्कुल नए थे। इस तरह रिमोट को पीटने का हमारा वह महान वैज्ञानिक प्रयोग एक ऐतिहासिक कॉमेडी में बदल गया और हम सब अपनी ही बेवकूफी पर लोटपोट होते रहे।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २७ – हास्य-व्यंग्य – “सरकारी सांड़ और आवारा सांड” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  सरकारी सांड़ और आवारा सांड

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २७

☆ व्यंग्य ☆ “सरकारी सांड़ और आवारा सांड” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

किसी पुराने समाचार पत्र के टुकड़े में मैंने एक समाचार पढ़ा कि एक जगह – “अच्छी नस्ल तैयार करने के लिए शासन से उपलब्ध सांड़ दुबला हो रहा है जबकि वहां के डॉक्टर के पालतू पशु मोटे हो रहे हैं। मुझे इस समाचार से बिल्कुल आश्चर्य नहीं हुआ। चिकित्सक रूपी सांड़ के सामने आखिर मूक पशु रूपी सांड़ की क्या हैसियत? समाचार में बताया गया कि डॉक्टर सांड़ की खुराक में कटौती कर उसे अपने पालतू पशुओं को खिला रहा था।

सरकार चाहे केंद्र की हो अथवा राज्यों की नेताओं, अधिकारियों, कर्मचारियों रूपी सांड़ों से भरी पड़ी हैं। शायद ही कोई सरकारी विभाग हो जिसमें सांड़ न हों, देखा तो यह गया है कि प्रत्येक विभाग में नीचे से ऊपर तक अलग – अलग शक्लों, कद – काठियों, स्वभावों और खुराकों वाले सांड़ भरे पड़े हैं। क्यों न हों सरकार और उसके विभाग सांड़ों के लिए सर्वश्रेष्ठ चारागाह जो हैं। सांड़ या तो सरकार और उसके अधीन विभिन्न विभागों में होते हैं या फिर आवारा। स्वभाव और प्रकृति में सरकारी सांड़ों और आवारा सांड़ों में कोई खास अंतर नहीं होता, किंतु सरकारी सांड़ों को सरकारी होने का सम्मान और जोर – जबरदस्ती से माल हड़पने के लिए एक निश्चित क्षेत्र का मालिक होने का संतोष, नियमित खुराक मिलते रहने की निश्चिंतता तो रहती ही है। सरकारी सांड़ अपने कार्यालय की कुर्सी पर बैठे – बैठे अथवा मात्र अपने कार्य क्षेत्र में रह कर ही वह सब प्राप्त कर लेते हैं जो वह चाहते हैं। लेकिन आवारा सांड़ों को इसके लिए अपेक्षाकृत अधिक मेहनत करना पड़ती है। इनका कार्य क्षेत्र भी विस्तृत होता है जो सरकारी विभागों से लेकर जनता तक फैला रहता है। देखा गया है कि सशक्त आवारा सांड़ों से सरकारी सांड़ डरते हैं और इसी कारण अधिकांश आवारा सांड़ों को सरकारी सांड़ों का संरक्षण व सहयोग प्राप्त रहता है। बहुत से सरकारी कर्मचारी/अधिकारी रूपी सांड़ लोगों को फंसाकर उनको चरने का कार्य दलाल रूपी आवारा सांड़ों के माध्यम से ही सम्पन्न करते हैं किन्तु इस अघोषित संरक्षण के बाद भी सरकारी और आवारा सांड़ों में अंतर तो है ही। सरकारी सांड़ मिलकर आवारा सांड़ की सारी सांड़गिरी धूल में मिलाकर उसे बैल बनने पर मजबूर कर सकते हैं। यदि सरकारी सांड़ चाहें तो समाज को लूटने खसोटने और आतंक मचा कर परेशान करने वाले आवारा सांड़ों से मुक्ति दिला सकते हैं, किन्तु वे मजबूर हैं ऐसा नहीं चाह सकते। आखिर आवारा सांड़ों के सहयोग से ही तो उनकी अवैध कमाई का धंधा – पानी और सांड़ गिरी चलती है। अतः समाज में सरकारी सांड़ों और आवारा सांड़ों का तालमेल सदा बना रहता है। सुरक्षित रिश्वत पाकर सरकारी सांड़ खुश, कमीशन पाकर आवारा सांड़ खुश।

सामान्यतः नेताओं की तरह अधिकारी, कर्मचारी भी सांड़ों की तरह तंदरुस्त होते हैं। मेरा अर्थ नेताओं को सांड़ कहना नहीं है। नेता सांड़ की सुधरी हुई परिष्कृत रचना है वह सरकारी और आवारा सांड़ों को पालने, उन्हें वश में करने में सक्षम होता है क्यों न हो, वह भी तो इन्हीं से मिले क्लाइंटों को निचोड़ता है। ज्यादातर नेता अपनी मुफ्तखोरी, लूट खसोट, रिश्वत आदि की चाह के कारण सांड़ रूपी सरकारी अधिकारियों – कर्मचारियों और दलाल रूपी आवारा सांड़ों को प्रश्रय देते हैं उनसे दूरी नहीं बनाते। इसीलिए तो सरकार में मलाईदार पदों पर खींचतान बनी रहती है। मैं समझता हूं कि सरकारी और आवारा सांड़ों पर लंबी चर्चा व्यर्थ है क्योंकि आप भी अपने क्षेत्र के ऐसे अनेक सांड़ों से परिचित होंगे।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९६ – व्यंग्य – तेल कम, गैस फुल ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका  विचारणीय व्यंग्य – तेल कम, गैस फुल)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९६ – व्यंग्य  – तेल कम, गैस फुल ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

अरे भाई, अपुन का भेजा एकदम कड़क चकरघिन्नी हो गया जब अपुन ने उस तेल की टपरी पे कदम रखा। लोग बोलते हैं दुनिया गोल है, अपुन बोलता है दुनिया ‘जीरो’ है! जैसे ही अपुन अपनी खटारा स्कूटी लेकर गया, वो सेल्समैन लड़का एकदम हीरो माफिक मुस्कराया और चबाते हुए गुटके को गाल में सेट करके बोला, “भाई, मीटर पे जीरो देख लो!” अपुन भी चौड़ में आकर कोहनी चमकाते हुए बोला, “देख लिया भिडू, एकदम सन्नाटा पसरा है मीटर में।” पर असली झोल तो उस जीरो के पीछे का ‘मशाल’ था बॉस। वो जीरो देखना ऐसा है जैसे शादी के बायोडाटा में लड़के का ‘संस्कारी’ होना देखना, अंदर से भाई साहब, साठ-सत्तर झोल की कोडिंग करके बैठे हैं। अपुन को लगा सिर्फ जेब ढीली होगी, पर यहाँ तो स्कूटी का इंजन ऐसे रो रहा था जैसे विदाई में दुल्हन की सहेलियाँ दहाड़ मारती हैं। तेल क्या डाला साला, लगा कि पेट्रोल में थम्स-अप और कफ सिरप मिलाकर पिला दिया गाड़ी को, पूरा सिस्टम ही हिल गया बॉस!

अब सुनो उस पंप वाले के तिकड़मों का ऐसा कच्चा चिट्ठा कि सुनकर तुम्हारा भेजा फ्राई हो जाए। उनका पहला झोल तो ‘हवा का रुख’ था, नोजल ऐसे पकड़ते हैं जैसे मोगैम्बो की बंदूक हो, आधा पेट्रोल तो भाप बनकर बादलों से वाट्सएप चैट करने निकल जाता है। वो जो मीटर का कांटा है ना, वो कसम से कतररी चूहे की तरह कुदकता है, सीधा अंक गायब कर देते हैं, जैसे क्लास से बैकबेंचर गायब होते हैं। अगला तिकड़म वो तेल की डेंसिटी का मीटर है, जो हमेशा एक ही जगह पे ऐसे चिपका रहता है जैसे सरकारी दफ्तर में बाबू की कुर्सी फेविकोल से चिपकी हो। नोजल को टंकी में डालने के बाद वो लड़का ऐसे खटका दबाता-छोड़ता है जैसे कोई डीजे डिस्को में रीमिक्स बजा रहा हो—कट, कट, कट! पेट्रोल की खुशबू भी ऐसी कि सूँघो तो चमड़े के पुराने जूते की पॉलिश जैसी बास आती है, मिलावट का ऐसा कड़क लेवल की केमिस्ट्री लैब का प्रोफेसर भी जहर खा ले। फिल्टर पेपर मांगने पे ऐसे मुंह बनाते हैं जैसे अपुन ने उनकी पुश्तैनी जायदाद मांग ली हो। कार्ड स्वाइप मशीन का नेटवर्क हमेशा उस वक्त कौवा उड़ हो जाता है जब आपकी जेब में छुट्टे पैसे नहीं होते। फिर वो राउंड फिगर का ऐसा खेल खेलते हैं कि अगर कुछ ऊपर का बिल हुआ, तो बोलेंगे “मैडम, सर, टॉफी ले लो ना, चिल्लर नहीं है,” जैसे बैंक के बदले चॉकलेट फैक्ट्री खोल रखी हो!

उनकी टंकी का ढक्कन खोलने की स्पीड इतनी बिजली जैसी होती है कि आपको लगे आप पेट्रोल पंप पे नहीं, पीसी सरकार के जादू के शो में बैठे हैं। नोजल से आखिरी बूंद टपकाने से पहले ही वो नली को ऐसे झटकते हैं जैसे धोबी घाट पे भीगा कपड़ा पछाड़ रहे हों, आधी बूंद वापस खींच के अपनी तिजोरी में डाल लेते हैं। प्रीमियम पेट्रोल का ऐसा झांसा देंगे कि “सर, इसमें एक्स्ट्रा माइलेज का कैप्सूल मिक्स है,” और साला वो एक्स्ट्रा माइलेज सिर्फ उनके बैंक बैलेंस को मिलता है, अपनी गाड़ी तो कछुए की चाल चलती है। डिजिटल मीटर की लाइट इतनी डिम रखते हैं कि रात को मोमबत्ती जलाकर सीआईडी के प्रद्युम्न की तरह दया को बुलाना पड़े। फ्री हवा भरने वाला कंप्रेसर हमेशा ‘कल ही खराब हुआ है भाई’ के बोर्ड के साथ खर्राटे मार रहा होता है। जब आप कंप्लेंट बुक मांगो, तो वो ऐसे देखते हैं जैसे आपने उनकी दोनों किडनियाँ दान में मांग ली हों। नोजल का पाइप इतना लंबा रखते हैं कि आधा लीटर तेल तो साला उसी नली की अंतड़ियों में सोया रह जाता है। वो बिलिंग मशीन का कागज ऐसा होता है, जिसका प्रिंट दो मिनट बाद धूप लगते ही ऐसे गायब हो जाता है जैसे गधे के सिर से सींग!

पेट्रोल का रंग कभी-कभी वो इतना सफेद रखते हैं कि लगता है भैंस का टोंड दूध डाल दिया हो, गाड़ी चलेगी नहीं बल्कि दही जमाएगी। वो मीटर चालू होने की टिक-टिक की आवाज आपके दिल की धड़कन से तेज भागती है, जैसे पीछे यमराज का भैंसा लगा हो। सेल्समैन का ध्यान भटकाने का स्टाइल तो एकदम कड़क है—”अरे भाई, पीछे देखो कौन जा रहा है!” और जैसे ही आपने मुंडी घुमाई, कुछ रुपयों का तेल हवा में गुल हो जाता है। वो पानी की मिलावट चेक करने वाला पेस्ट हमेशा ‘खत्म हो गया’ की श्रेणी में रहता है, जैसे दुनिया का सारा पेस्ट वही चाट गए हों। नोजल की रबर ग्रिप कटी होती है, जिससे फ्यूल लीक होकर वापस उनकी मशीन में गिरता है और अपनी जेब कटती है। बड़े नोट देने पे वो ऐसे गिनते हैं जैसे रिजर्व बैंक के गवर्नर खुद नकली नोट की चेकिंग कर रहे हों, टाइम वेस्ट करने का एकदम निंजा टेक्निक है बॉस। वो वीआईपी लेन जहाँ नॉर्मल पब्लिक को भेजकर एक्स्ट्रा चार्ज का झोल करते हैं, साला अमीर बनने का शॉर्टकट है। उनकी मशीन का कीपैड ऐसा, जहाँ कोई बटन दबाओ तो कुछ और दबता है और बिल का कबाड़ा हो जाता है। वो तेल की प्योरिटी वाली मशीन का कांच इतना धुंधला होता है कि उसमें खुद का चेहरा भी भूत जैसा दिखे।

एक और तिकड़म है, उनका नोजल होल्डर जो हमेशा ढीला रहता है ताकि प्रेशर कम आए और हवा ज्यादा घुसे। पेट्रोल में जो सॉल्वेंट मिलाते हैं, उसकी वजह से गाड़ी का कार्बोरेटर ऐसे खांसता है जैसे किसी बूढ़े दादाजी को दमा हो गया हो। वो सुबह-सुबह तेल डलवाने का मिथक है—जब डेंसिटी सही होती है, तब वो कहते हैं “साहब, अभी स्टॉक खाली है, टैंकर आ रहा है,” मतलब जब मौका सही हो, तब दुकान बंद! दोपहर की कड़क धूप में तेल बेचते हैं, जब लिक्विड फैल जाता है और आपको तेल कम, गैस ज्यादा मिलती है, मानो गाड़ी को एलपीजी पे चला रहे हों। उनकी मशीन के पीछे छुपा वो छोटा सा रिमोट, जो साला बटन दबाते ही मीटर की स्पीड को चीते की रफ़्तार दे देता है और अपनी खोपड़ी का फ्यूज उड़ जाता है। नोजल के मुंह पर लगी वो छोटी सी जाली तेल को झाग बना देती है; टंकी में झाग भर जाता है और मीटर बाबू बोलते हैं “फुल हो गया बॉस!” जब आप कहो ‘हजार का डालो’, तो वो बीच में ही रोक कर बोलते हैं, “अरे भाई, सुना नहीं, अभी और डाल देता हूँ,” और पुराना मीटर रीसेट किए बिना ही गेम बजा देते हैं!

उनकी वो मीठी जुबान तो सुनो, कसम से कान से खून आ जाए—”भाईसाहब, आपकी गाड़ी का इंजन ऑइल एकदम कड़कड़ा के काला हो गया है, बदल लो नहीं तो पिस्टन ब्लास्ट हो जाएगा।” ऐसी भविष्यवाणी करते हैं जैसे नास्त्रेदमस के सगे साले हों। वो नाइट्रोजन हवा के नाम पर नॉर्मल ऑक्सीजन को ही एक्स्ट्रा पैसे लेकर टायर में ठूस देते हैं, जैसे चिप्स के पैकेट में हवा बेची जा रही हो। वो कैशलेस पेमेंट का बहाना बनाते हैं—”क्यूआर कोड स्कैन नहीं हो रहा है, कैश ही दो ना भाई,” ताकि टैक्स के लूपहोल में अपनी फेरारी घुसा सकें। जब आप बोलो कि बोतल में तेल दो, तो कानून का ऐसा वास्ता देंगे कि ‘बोतल में बैन है जी’, क्योंकि बोतल में तो उनकी चोरी सरेआम नंगी हो जाएगी ना! उनके स्टाफ की वो आपस की कोडिंग होती है, जैसे बोलेंगे कि ‘जरा उस तरफ पोछा मारना’, जिसका मतलब होता है कि उस मशीन का प्रेशर धीमा करो और ग्राहक को चूना लगाओ। नोजल का नथुना हमेशा टेढ़ा रखते हैं ताकि तेल सीधा न गिरे। वो मीटर का रीसेट बटन दबाने पे कटकट करता है पर अंक पुरानी जगह से ही शुरू होते हैं, एकदम स्कैम!

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९५ – व्यंग्य – इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९५ – व्यंग्य  – इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

शादी से पहले की बातचीत और चाय की पत्ती में एक समानता होती है। शुरुआत में दोनों खूब रंग देती हैं खुशबू ऐसी कि पूरा मोहल्ला जान जाए कि कुछ उबल रहा है। फिर धीरे धीरे समय बीतता है और वही चाय की पत्ती बर्तन के कोने में पड़ी सूखी घास जैसी लगने लगती है। हमारे बीच भी यही हुआ। शादी के फेरों के समय जिस इंसान ने सात जन्मों का वादा किया था उसने सात महीने में ही खुद को एक स्क्रीन के भीतर बंद कर लिया। अब वह घर आता है तो सोफे पर लेटकर बस अंगूठा चलाता रहता है। रील्स की वो पंद्रह सेकंड की दुनिया मेरे पूरे जीवन से ज्यादा कीमती हो गई है। उसकी उंगलियां स्क्रीन पर ऐसे फिसलती हैं जैसे कोई जादूगर ताश के पत्ते पलट रहा हो। मैं बगल में बैठी चाय का कप लिए ताकती रहती हूँ पर उसकी नजरें कभी नहीं भटकतीं। ऐसा लगता है कि मैं उस घर का कोई पुराना फर्नीचर हूँ जिस पर धूल जम चुकी है और जिसे हटाने की जहमत भी कोई नहीं उठाना चाहता।

एक दिन मैंने कहा “सुनो मुझे कुछ बात करनी है।“ उसने बिना आंखें ऊपर किए कह दिया “अभी बिजी हूँ यार बाद में देखेंगे” यह “बाद में“ कभी नहीं आता। मर्द जब व्यस्त होने का नाटक करता है तो वह असल में अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहा होता है। इस अकेलेपन के सन्नाटे को तोड़ने के लिए मैंने एक नया रास्ता निकाला। मैं अपने ही मोबाइल से अपने ही नंबर पर फोन लगा देती। जब उधर से आवाज आती कि आपके द्वारा डायल किया गया नंबर अभी व्यस्त है तो मेरे सीने में एक अजीब सा सुकून उतर आता। कम से कम कोई तो कह रहा था कि मैं व्यस्त हूँ। कोई तो था जो मेरी मौजूदगी को दर्ज कर रहा था भले ही वह एक कंप्यूटर की रिकॉर्डेड आवाज ही क्यों न हो। यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा वियोग था कि मुझे खुद को यह समझाने के लिए अपने ही नंबर का सहारा लेना पड़ता था कि दुनिया में मेरा भी एक वजूद है।

तभी घर के सामने एक नया युवक रहने आया था। वह मुझसे उम्र में दो साल छोटा था और शायद इसीलिए दुनिया की चालाकियों से थोड़ा दूर था। वह मेरे अकेलेपन को मेरे चेहरे की उदासी से भांप गया था। जब घर का मालिक सोफे पर रील्स स्क्रोल करने में व्यस्त रहता तब वह लड़का मेरी खामोशी को पढ़ रहा था। पति के घर पर न रहने के समय वह कभी नमक के बहाने तो कभी चाय पत्ती के बहाने मेरे घर पर आता था। उसकी आँखों में एक अजीब सी हमदर्दी थी जो मुझे इस मरुस्थल जैसी जिंदगी में ठंडी फुहार जैसी लगती थी। उसने बातों बातों में एक दिन बड़ी सादगी से बताया कि उसकी अभी शादी नहीं हुई है। मुझे लगा कि विधाता ने मेरे इस एकांतवास को समाप्त करने के लिए ही उसे मेरे सामने वाले मकान में भेजा है।

हमारी मुलाकातें जब बढ़ने लगीं तो मेरे भीतर की सूखी नदी में फिर से बाढ़ आने लगी। हर बार जब मैं उसके साथ इस घुटन भरे माहौल से दूर भागने की योजना बनाती तो वह मुस्कुराकर कहता “जल्दबाजी मत करो। कल कुछ प्लान बनाते हैं” मुझे लगता कि वह हमारी सुरक्षा के लिए ऐसा कह रहा है। पुरुष का कल कभी कभी स्त्री की पूरी जिंदगी का इंतजार बन जाता है। वह हर बार कोई न कोई बहाना बना देता और मैं फिर से उसी रील्स वाले सोफे के किनारे आकर बैठ जाती। प्रेम जब किश्तों में मिलने लगे तो उसकी कीमत और बढ़ जाती है। मैं उसके दिए उसी झूठे दिलासे के सहारे अपने दिन काट रही थी और खुद को दिलासा दे रही थी कि एक दिन यह अंधेरा छंटेगा।

एक दिन अचानक उसने खुद सामने से आकर मुझसे कहा “कल हम हमेशा के लिए कहीं दूर चले जाएंगे। सामान बांधकर तैयार रहना” उस दिन मुझे लगा कि मेरी सालों की तपस्या सफल हो गई। मैंने चुपचाप अपनी अलमारी से अपनी पसंदीदा साड़ियां निकालीं और उन्हें सूटकेस में बंद करने लगी। पतिदेव बगल वाले कमरे में मोबाइल पर किसी प्रैंक वीडियो को देखकर ठहाके लगा रहे थे। उनकी हंसी मेरे कानों में किसी नुकीली कील की तरह चुभ रही थी। मुझे तरस आ रहा था उस इंसान पर जिसे यह भी नहीं पता था कि उसकी छत के नीचे से जमीन खिसकने वाली है। मैंने अपनी जिंदगी के सबसे कड़वे सच को एक पोटली में बांधा और उस सुबह का इंतजार करने लगी जो मेरी विदाई की गवाह बनने वाली थी।

जब मैं उसके पास अपना सारा सामान बांधकर पहुंची तब तक वह वहां से जा चुका था। सामने वाले मकान का ताला लटक रहा था और वहां सिर्फ धूल उड़ रही थी। मेरी सांसें जैसे गले में ही अटक गईं और सूटकेस हाथ से छूटकर जमीन पर गिर गया। अगल बगल देखने पर जब कोई नहीं मिला तो मैंने पास के एक दुकानदार से उसके बारे में पूछा। दुकानदार ने जो सच बताया उसने मेरे पैरों के नीचे से जमीन ही गायब कर दी। दुकानदार ने तंबाकू थूकते हुए बड़े सहज भाव से कहा “अरे वो तो शादीशुदा था उसकी पत्नी बेंगलूरु में रहती है और वह सुबह तड़के ही उसे लेने आई थी दोनों पहली बस से निकल गए”

यह सुनते ही मेरे भीतर का सब कुछ बिखर गया। जिस लड़के को मैं अपने अकेलेपन का मसीहा समझ रही थी वह खुद एक छलावे के सिवा कुछ नहीं था। वह तो बस अपने खाली समय को काटने के लिए मेरे घर की चाय पत्ती और नमक का इस्तेमाल कर रहा था। वियोग का इससे वीभत्स रूप और क्या हो सकता था कि जिसे मैंने अपनी मुक्ति का मार्ग समझा उसने मुझे और गहरे कुएं में धकेल दिया था। मैं उस सूने मकान की दहलीज पर बैठकर हंसने लगी क्योंकि रोने के लिए मेरे पास आंसू कम पड़ गए थे। पूरा खेल बस टाइमपास का था चाहे वह रील्स देखना हो या पड़ोस में नमक मांगना।

मैंने कांपते हाथों से अपना सूटकेस उठाया और वापस अपने उसी पुराने घर की तरफ कदम बढ़ा दिए जहां सन्नाटा मेरा इंतजार कर रहा था। मुख्य दरवाज़ा खुला हुआ था और सोफे से अभी भी वही रील्स की आवाजें आ रही थीं। पति ने मेरी तरफ देखा भी नहीं और स्क्रीन देखते हुए ही कहा “अरे आ गई तुम जरा देखना नमक खत्म हो गया है क्या” मैंने बिना कुछ बोले रसोई की तरफ देखा जहां नमक का डिब्बा पहले से ही आधा भरा हुआ था। मुझे समझ आ गया कि इस संसार में हर कोई अपनी अपनी स्क्रीन और अपनी अपनी कहानियों में व्यस्त है और दूसरों की भावनाएं बस मनोरंजन का साधन हैं।

मैंने अपना फोन निकाला और फिर से अपने ही नंबर पर डायल कर दिया। उधर से फिर वही जानी पहचानी आवाज आई कि आपके द्वारा डायल किया गया नंबर अभी व्यस्त है। मैंने फोन को कान से सटाए रखा और उस व्यस्त टोन के सुकून को महसूस करने लगी। अब मुझे इस बात का पूरा यकीन हो गया था कि इस मतलबी और फरेबी दुनिया में सिर्फ मेरा अपना नंबर ही था जो मेरे एकांत को कभी धोखा नहीं दे सकता था भले ही वह हमेशा व्यस्त रहने का ढोंग ही क्यों न करता हो। प्रेम की इस अंतिम विदाई ने मुझे पूरी तरह से आत्मनिर्भर बना दिया था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१५ ☆ व्यंग्य –  हम पूछेंगे तो बोलोगे की पूछता है!  ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१५ ☆

? व्यंग्य –  हम पूछेंगे तो बोलोगे की पूछता है! ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

इन दिनों देश-विदेश के राजनीतिक मौसम की रंगत बड़ी अजब है। बाहर हवा ठंडी हो या गरम, लेकिन सत्ता के गलियारों में अंतरराष्ट्रीय दबाव का पारा अचानक सातवें आसमान पर पहुंच गया है। कल तक जो विदेशी नुमाइंदे हमारे देश में  सिर्फ पर्यटन के खूबसूरत ठिकानों की बातें करते थे, व्यापारिक सौदों पर दस्तखत करते थे और हमारे विशाल बाजार को देखकर लार टपकाते थे, वे आज अचानक हाथ में माइक थामकर और चेहरे पर दुनिया भर की फिक्र ओढ़कर हमारे अभिभावक की भूमिका में नजर आने लगे हैं।

अभी हाल ही में, जब देश के सर्वोच्च ‘प्रधान’ सुदूर यूरोप के एक खूबसूरत, ट्यूलिप के फूलों और पवन चक्कियों वाले साइकिल-प्रिय मुल्क की यात्रा पर थे, तब वहां की एक तीखे तेवरों वाली विदेशी महिला पत्रकार साहिबा ने सात समंदर पार से लोकतंत्र, अल्पसंख्यकों और प्रेस की आजादी के कुछ  सुलगते हुए सवाल दाग दिए कि दिल्ली की चिलचिलाती गर्मी में भी पूरे सचिवालय का एसी अचानक फेल होने लगा।

इस नजारे को देखकर पृष्ठभूमि में वही पुराना और घिसा-पिटा फिल्मी गाना बजने लगता है, “जोशी पड़ोसी कुछ भी बोले, हम कुछ नहीं बोलेगा!”

हमारे विदेश मंत्रालय को इन विदेशी पड़ोसियों का यह मुफ्त में बंटने वाला ज्ञान और अपनी धोती को छोड़कर पूरे जमाने की चिंता करने की आदत बड़ी नागवार और चिंतनीय लग रही है। उनका पत्रकारिता इंडेक्स नम्बर एक होगा , हम अपने 157 नम्बर में ही खुश बने रहना चाहते हैं।

पड़ोसियों का तो शाश्वत धर्म ही यही होता है कि वे अडोस-पड़ोस के हर फटे में टांग अड़ाएं। जब आपका घर एकदम सुचारू रूप से चल रहा हो, रसोई से पकवानों की खुशबू आ रही हो, तब वे अपनी खिड़की से झाँककर बड़े मासूम चेहरे से पूछते हैं कि, “अरे भाई, आपके घर में जो कड़ाही चढ़ी है, उसके तेल की बू कुछ तीखी सी आ रही है। सब खैरियत तो है?”

उस नीले-सफेद आसमान वाले ठंडे मुल्क की उन विदेशी पत्रकार महोदया को भी हमारे यहाँ की इस तपती हुई लोकतांत्रिक गर्मी की कुछ ज्यादा ही फिक्र हो रही थी। उनकी यह फिक्र बिल्कुल वैसी ही दिखाई देती है जैसे किसी मोहल्ले की कोई  बुजुर्ग ‘ताई’ किसी नए-नवेले दूल्हे को घेरकर पूछने लगे कि, “सुना है तुम अपनी दुल्हन को बोलने ही नहीं देते, उसकी आवाज बाहर तक क्यों नहीं आती?”

ताई रूपी इन जोशी पड़ोसियों के तीखे सवालों पर हमारे सिस्टम का बिल्कुल खामोश हो जाना और अपने फोन को साइलेंट मोड पर डाल लेना एक बेहद मजेदार और सोची-समझी प्रतिक्रिया थी। यह एक ऐसी सधी हुई ‘कूटनीतिक चुप्पी’ थी जो बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कह जाती है। एक ऐसी चुप्पी जो सामने वाले के चेहरे पर देखकर मुस्कुराते हुए कहती है कि, “तुम ठहरे परदेसी, तुम्हें हमारे घर के अंदरूनी झगड़ों की कड़वाहट और हमारे आपसी प्यार की गहराई के बारे में भला क्या खाक पता होगा!”

जब उस अंतरराष्ट्रीय मंच से लोकतंत्र और जन अधिकारों जैसे भारी-भरकम शब्दों के गोले फेंके जा रहे थे, तब हमारा पूरा तंत्र मन ही मन सोच रहा था कि तुमने पूछा तो पूछा, पर हम तुम्हें जवाब देकर मुफ्त का फुटेज और टीआरपी क्यों दें? आखिर कैमरे के सामने ‘नो कॉमेंट्स’ कहकर रहस्यमयी मुस्कान बिखेरने की जो कला हमारे साहब को आती है, वह दुनिया की किस यूनिवर्सिटी में सिखाई जाती है?

 इस पूरे अंतरराष्ट्रीय नाटक का सबसे दिलचस्प और यू-टर्न वाला मोड़ तब आता है, जब यही सुलगता हुआ सवाल देश के भीतर का ही कोई विपक्षी या अपना स्वदेशी और घरेलू पत्रकार पूछ बैठता है। यहाँ आकर सत्ता का व्याकरण और नियम एकदम सीधे और स्पष्ट हो जाते हैं।

सात समंदर पार का  गोरी चमड़ी वाला विदेशी पत्रकार सवाल पूछे, तो हम होठों पर वैश्विक मुस्कान बिखेरकर और ‘जोशी पड़ोसी’ गाते हुए बगल से सुरक्षित निकल सकते हैं। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर ‘अतिथि देवो भव’ का पालन करते हुए उन्हें चाय-समोसा खिलाना और हाथ मिलाकर विदा करना हमारी कूटनीति की महान कला है।

लेकिन जैसे ही वही सुलगता हुआ सवाल अपने ही घर का कोई पत्रकार पूछ लेता है, तो तंत्र की भौहें तन जाती हैं और आँखों में अंगारे उतर आते हैं कि,”अच्छा! तुम्हारी इतनी जुर्रत कि तुम सवाल करो? तुम देशद्रोही हो या किसी विदेशी टूलकिट का हिस्सा?”

विदेशी मेहमानों के सामने जिस खामोशी को कूटनीति का मास्टरस्ट्रोक बताया जाता है, वही चुप्पी जब घर के अंदर देश के नागरिकों पर लागू होती है तो उसे ‘अनुशासन’ और ‘राष्ट्रभक्ति’ से  जोड़ दिया जाता है। घरेलू पत्रकार अगर ज्यादा समझदार या सयाना बनने की कोशिश करे तो उसे बहुत सलीके से याद दिला दिया जाता है कि, “बेटा! इस मोहल्ले का राशन कार्ड, तुम्हारी नौकरी और तुम्हारी फाइलें हमारे ई डी, आई  टी दफ्तर की दराजों में ही बंद हैं।

हमारे यहाँ अब सवालों की भी  ‘नागरिकता’ तय कर दी गई है। अगर सवाल विदेशी पासपोर्ट के साथ आए तो उसे ‘इंटरनेशनल प्रोपेगेंडा’ बताकर खारिज किया जाता है, और अगर सवाल देसी जुबान में निकले तो उसे ‘देश को बदनाम करने की साजिश’ मानकर सीधे कूड़ेदान के हवाले कर दिया जाता है।

महामंत्र है , हे संजय !  “तू पूछता बहुत है, पूछ मत , सुन और ताली बजा!”

इसलिए अगली बार जब भी समाज, तंत्र या दफ्तर में कोई ऐसा तीखा सवाल पूछ ले जिसका सीधा जवाब  मौजूद न हो, या जिसे सुनते ही ब्लड प्रेशर बढ़ने लगे, तो बिल्कुल घबराने की जरूरत नहीं है।

बस एक गहरी सांस लीजिए, सामने लगे कैमरे की तरफ देखकर एक सम्मोहक, टेलीप्रॉम्प्टर वाली मुस्कान बिखेरिए और मन ही मन गुनगुनाना शुरू कर दीजिए, “जोशी पड़ोसी कुछ भी बोले, हम कुछ नहीं बोलेगा…”

सच तो यह है कि ट्यूलिप के फूल तो सिर्फ कुछ दिन महकते हैं, असली खुशबू तो अपनी कड़ाही के तीखे तेल में ही होती है!

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ परजीवी आखिर कौन है ? ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ परजीवी आखिर कौन है ? ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

काक्रोच देखकर दो फुट ऊपर उछलने वाली गृहपत्नी, गृहप्रबंधक, गृहनिर्मात्री ललना इस तरह आतंकित हो उठती है मानो उसने डायनासोर देख लिया हो। आपदा में अवसर देखते ही पतिदेव सक्रिय हो उठते हैं। काक्रोच पर हिट छिड़कते हैं या जूते-चप्पल के प्रहार से उसका काम तमाम कर अजेय योद्धा के रूप में पत्नी के सामने अवतरित होते हैं। पत्नी गदगद ,भला ऐसा हर्क्यूलियन टास्क करना सबके बूते की बात नहीं है। वे धन्यता भाव से भर उठती हैं।

शास्त्र कहते हैं, पृथ्वी पर जो कुछ भी पाया जाता है उसमें कुछ भी निरुपयोगी नहीं होता। सभी का कोई न कोई मकसद या जरूरत जरूर है। काक्रोच के निर्माण के पीछे ऊपर वाले का क्या मकसद हो सकता है, मई दो हज़ार छब्बीस में समझ में आया। कहते हैं ना, कभी न कभी घूरे के दिन भी फिरते हैं।

एक बात चिंतन-मनन को विवश करती है कि क्या काक्रोच को जिंदा रहने , देश के किसी भी हिस्से में स्वतंत्रतापूर्वक विचरण करने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संवैधानिक अधिकार है या नहीं? काक्रोच की भाषा मनुष्य नहीं जानता। पर मनुष्य की आहट से ही काक्रोच भयभीत हो जाता है। वह जानता है इस खतरनाक जीव की मंशा क्या है।दिखता है वैसा कभी नहीं होता।काक्रोच मौका देखकर चाल चरित्र चेहरा नहीं न बदलता।

सियासत, धर्म, क्रिकेट, फिल्म या अन्य कोई भी इलाका क्यों न हो, वर्तमान के विज्ञापनजीवी जमाने में दिखने-दिखाने का चलन जोरों पर है। काक्रोच को रूप के नाम पर ईश्वर ने ठेंगा दिखाया है, पर किसी भी सूरत में जिंदा रहने की ललक से नवाज़ा है। है कोई मनुष्य  ऐसा जिसका सिर कट जाए और फिर भी वो जिंदा रहे ? है कोई ऐसा जो हफ्तों बिना खाए पिए भी अपने जीवन की घोषणा करे और फिर भी काक्रोच परजीवी?

अभी तक समझ में नहीं आया कि आखिर परजीवी कहते किसे हैं? जीवी तो कई तरह के हैं- श्रमजीवी,मिथ्याजीवी, स्वप्नजीवी, कैमराजीवी, मसिजीवी और न जाने कितने। पर सभी किसी न किसी रूप में परजीवी तो हैं।

बेशक काक्रोच के पांव और शरीर पर बैक्टीरिया, वायरस और परजीवी कृमि होते हैं जो मनुष्य का नुकसान करते हैं। पर क्या मनुष्य किसी का नुकसान नहीं करता? वह तो काक्रोचों से भी ज्यादा डरावना है।उसे गिरगिट की तरह रंग बदलने में महारत है।

दरअसल काक्रोच प्रकृति के सफाईकर्मी हैं। सिर्फ शक्ल-सूरत के डरावने और घिनौने हो जाने से उसके मन का पता नहीं लगता। दुनिया में शक्ल ही तो सब कुछ नहीं, कुछ कारनामे भी देखने चाहिए। अच्छी शक्लवालों के भी खयाल बदसूरत पाए जाते हैं ।काक्रोच के नसीब ही ऐसे हैं कभी वे मानवाकृति नजर आ सकते हैं तो  कभी मानव भी काक्रोचाकृति । सारा माया का खेल है ।अब उनके बीच में जो पाए जाते हैं जेन जी और अल्फा काक्रोच उनकी मंशा का पता लगाना बहुत कठिन है। संभवत प्रकृति के विकास क्रम में उनमें भी कोई परिवर्तन आया हो।

ये काक्रोच पढ़ते-लिखते नहीं तो क्या !  कितने ही पढ़े-लिखों ने कौन सा तीर मार लिया आज भी लकीर के फकीर बने हुए हैं ।अक्ल को घुटनों में छुपाए रहते हैं ।

गंदगी को साफ करने का बीड़ा उठाने वाले इस दुनिया में हमेशा तकलीफ झेलते हैं, सलाखों के पार पाए जाते हैं, फांसी के तख्ते पर झूल जाते हैं या फिर मार दिए जाते हैं ।उन पर कई किस्म की तोहमत लगाई लगती फिर भी काक्रोच अपना धर्म नहीं भूलते। मनुष्य भूल रहा है । हैरानी तो देखिए जो धर्म भूल रहा है वही आरोप लगा रहा है । जो धर्म भूल रहा है उसे छोड़कर इल्जाम काक्रोचों पर लगाया जा रहा है। संभवतः इसे ही कलियुग कहते हैं।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३५ ☆ व्यंग्य – दलबदलुओं के लिए सहूलियत ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘दलबदलुओं के लिए सहूलियत ‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३५ ☆

☆ व्यंग्य ☆ दलबदलुओं के लिए सहूलियत ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

संसद और विधानसभा में दल-बदल की बढ़ती घटनाओं के मद्देनज़र सरकार ने दलबदलुओं की सहूलियत के लिए कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लिये हैं। अभी अपनी पार्टी से तलाक लेने की इच्छा होने पर दलबदलू को नयी पार्टी के नेताओं के दरबार में जाकर चरण-वरण छूने पड़ते हैं, कुछ शर्मिन्दगी झेलनी पड़ती है। उन्हें इस जिल्लत से बचाने के लिए यह निर्णय लिया गया है कि संसद और राज्यों की विधानसभाओं के बाहर ‘असंतुष्ट प्रतिनिधि कक्ष’ का निर्माण किया जाए।  जब भी किसी दलबदलू के पेट में मरोड़ होगी, पुराने दल को छोड़कर किसी मलाईयुक्त पार्टी में संतरण करने की इच्छा बलवती होगी, तब वह वह इस कक्ष के भीतर प्रवेश कर आसन पर बैठ जाएगा और यह खबर तत्काल जंगल की आग की तरह फैल जाएगी कि नेताजी की ‘अक्कल दाढ़’ निकल आयी है और वे दल बदलने की मंशा से पीड़ित हैं। फिर नेताजी उम्मीद करेंगे कि दूसरी पार्टी वाले उन पर डोरे डालेंं और उन्हें बाइज़्ज़त, गाजे-बाजे के साथ अपनी पार्टी में शामिल करने के लिए ले जाएं।

पुराने ज़माने में यह काम राजाओं के ‘कोप भवन’ के द्वारा होता था। जब रानियां किसी बात पर रुष्ट हो जाती थीं तो वे कोप भवन में प्रवेश कर जाती थीं और सबको पता चल जाता था कि रानी रूठ गयी हैं। फिर राजा साहब सारा राज- काज छोड़कर रानी की रुसवाई को दूर करने में लग जाते थे। कुछ ऐसा ही असर नेताजी के ‘असंतुष्ट प्रतिनिधि कक्ष’ में प्रवेश करने से अपेक्षित है।

दलबदलुओं के साथ एक  गड़बड़ यह होती है कि दल बदलने के साथ उनके ‘सुर’ में ज़रूरी तब्दीली नहीं हो पाती। आदत न होने की वजह से कई बार असावधानी में वे पुराने दल और पुराने नेता का गुणगान और नई पार्टी को पूर्ववत गरियाना शुरू कर देते हैं। ऐसा एक दो दलबदलुओं के साथ हो चुका है। ज़्यादा दल बदलने वालों के सामने यह संकट अक्सर खड़ा हो जाता है। हमारे गायक मन्ना डे ने सही सुर साधने की इसी समस्या को एक गीत में व्यक्त किया है— ‘सुर ना सधे, क्या गाऊं मैं? सुर के बिना जीवन सूना।’ राजनीति ‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’ वाली चीज़ होती है। दलबदलू  की सही सुर पकड़ने की असावधानी उसके भविष्य के लिए घातक हो सकती है। इसलिए निर्णय लिया गया है कि संसद और विधानसभाओं के निकट ‘सुर’ सुधारने वाले क्लिनिक स्थापित किये जाएंगे जहां ऑपरेशन के द्वारा दलबदलुओं के स्वर-यंत्र में ज़रूरी सुधार किये जाएंगे ताकि वे अपने पुराने दल की भर्त्सना और नये दल की तारीफ बिना चूके कर सकें। इन क्लिनिक्स में चिकित्सा के लिए सरकार ‘सब्सिडी’ प्रदान करेगी।

इसके बाद भी जिन दलबदलुओं का सुर नहीं सुधरेगा, जो अपराध-बोध या आत्मग्लानि से पीड़ित रहेंगे, या जिनकी अंतरात्मा उन्हें फटकारती  रहेगी, उनके लिए बाकायदा ‘हार्ट ट्रांसप्लांट क्लिनिक’ स्थापित किए जाएंगे जहां दिल बदलने का काम किया जाएगा, ताकि दिल और आत्मा की खटखट ही ख़त्म हो जाए। यानी दल-बदल और दिल-बदल का कार्यक्रम साथ-साथ संपन्न होगा। इसके लिए भी सरकार ‘सब्सिडी’ का प्रावधान करेगी।

सरकार को भरोसा है कि इन सुविधाओं से प्रभावित होकर ज़्यादा से ज़्यादा सदस्य सरकारी दल में शामिल होकर उसकी ताकत में इज़ाफ़ा करेंगे।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६२ ☆ व्यंग्य – “कोरट-कचहरियों की सम्मानजनक विदाई का स्वर्णिम दिन…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  कोरट-कचहरियों की सम्मानजनक विदाई का स्वर्णिम दिन…” ।)

☆ शेष कुशल # ६२ ☆

☆ व्यंग्य – “कोरट-कचहरियों की सम्मानजनक विदाई का स्वर्णिम दिन – शांतिलाल जैन 

सूरज आज पूरब से तो नहीं ही निकला होगा. लोकतंत्र की स्थापना के आठ दशक से भी कम में मुल्क का भ्रष्टाचारियों, अपराधियों से मुक्त हो जाना कोई छोटी मोटी कामयाबी नहीं है. ऐसी कामयाबी उसी दिन मिला करती है जिस दिन सूरज पूरब से ना निकला हो. मुझे पक्का यकीन है आज सूरज पूरब से तो नहीं ही निकला होगा.

आज हुआ ये श्रीमान् कि इसके पहले कि आला कचहरी में वकील सा. अपने मुवक्किल के निर्दोष होने की अपील-दलील पेश कर पाते, जिरह होती, गवाहों सबूतों की बिला पर अपने मुवक्किल को दोषमुक्त करा पाते – प्रॉसिक्यूशन ने केस ही वापस ले लिया!!! अभियुक्त पिछली रात नौ बजे तक अपोजिशन में था, अगली सुबह नौ बजे हाकिम के दल में शामिल हो गया. सुबह का भूला था श्रीमान्, अगले दिन सुबह घर आ गया था, सो आप उसे भूला नहीं कह सकते. कभी मिला करती थी क्लीन चिटें अदालतों से, अब हाकिम ने मुकदमा वापिस लेकर उसकी जरूरत ही ख़तम कर दी है. रख लें अदालतें अपनी चिटें अपने पास.

हाकिम ने पार्टी का बड़ा और भव्य दफ्तर बनवाया है मगर बाहर डोर-बेल नहीं लगवाई. दरवज्जे पे न्याय का घंटा जो लटकवा लिया है. बजाईए. अंदर जाईए. क्लीन चिट पाईए और पाईए एक मलाईदार ओहदा भी. स्मार्ट लीडर्स करप्शन करके कारागार का रुख नहीं करते, उनके गेट पर लटका न्याय का घंटा बजा लेते हैं और सेफ झोन में प्रवेश कर जाते हैं. ‘सत्तापक्ष में कोई भ्रष्टाचारी नहीं होता और विपक्ष में कोई ईमानदार नहीं होता.’ न्यायशास्त्र का ये नया सिद्धांत है, जो इस अवधारणा को स्थापित करता है कि एक विपक्षमुक्त मुल्क ही भ्रष्टाचार मुक्त मुल्क का पर्याय होता है. देखते देखते न विपक्ष में न कोई नेता बचा है न मुल्क में भ्रष्टाचार का कोई आरोपी. इस तरह आज का मुकदमा दीवानी अदालतों में आख़िरी मुकदमा साबित हुआ.

क्रिमिनल केसेस पहले ही अदालतों में पेश होना बंद हो चुके थे. इसे आप कल्लू मिर्ची के केस से समझिए. उसकी बदमाशी का मुआमला सामने आया और हाकिम के नुमाईंदे जेसीबी पर सवार होकर निकल पड़े. देखते देखते उसका मकान ध्वस्त कर दिया गया. लो साहब, हो गया न्याय. धरा रह गया सत्र न्यायालय और बैठे रह गये ‘युवर ऑनर’. पड़ीं रह गईं एफआईआर, तफ़्तीश, साक्ष्य, विवेचना, केसडायरी, रिमांड, जमानत, चार्जशीट, भारतीय न्याय संहिता, वकील, मुवक्किल. कोर्ट-कचहरी के चक्कर में अब ना हाकिम पड़ता है न उसके नुमाईंदे. उनकी मर्ज़ी ही ‘ड्यू प्रोसेस ऑफ लॉ’ है. मुल्क के आईन में अब अदालतों की जरूरत ही नहीं बची. पूरी न्यायपालिका एक झटके में बेरोज़गार हो गई है. वकीलों, न्यायाधीशों, कचहरी के कारकूनों का रोज़गार छिन गया हैं. जस्टिस सर की बेंच पर नया कोई केस लिस्ट हो नहीं रहा. कारकून खाली बैठे हैं. वकील मुवक्किलों की तलाश में भटक रहे हैं. ‘हाजिर हो’ की आवाजें गुम हैं, निस्तब्ध निरापद सन्नाटा पसरा पड़ा है. आज का दिन न्यायपालिका की सम्मानजनक विदाई का दिन है.

लोकतंत्र की स्थापना के आठ दशक से भी कम में ही न्यायपालिका की जरूरत का ख़त्म हो जाना कोई छोटी मोटी कामयाबी नहीं है. ऐसी कामयाबी उसी दिन मिला करती है जिस दिन सूरज पूरब से ना निकला हो. मुझे पक्का यकीन है आज सूरज पूरब से तो नहीं ही निकला होगा.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३४ ☆ व्यंग्य – ‘बेजोड़’ जी की पीड़ा और परसाई ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – बेजोड़’ जी की पीड़ा और परसाई  इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३४ ☆

☆ व्यंग्य ☆ ‘बेजोड़’ जी की पीड़ा और परसाई ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

छोटेलाल ‘बेजोड़’ नगर के वज़नदार लेखक हैं। व्यंग्य लिखते हैं और व्यंग्य में ही बात करते हैं। अब तक पैंतालीस किताबें छपवा चुके हैं और  एक सौ अस्सी सम्मान या अभिनंदन करवा चुके हैं। उनकी तमन्ना भारत के हर शहर में सम्मान कराने की थी, जो पूरी हो चुकी है। हर शहर में उनका कोई न कोई चेला बैठा है जो सम्मान का जुगाड़ बैठाता रहता है।

यों तो ‘बेजोड़’ जी खासे मशहूर हैं, लेकिन लेखन में उन्हें वह मुकाम नहीं मिला जिसके वे आकांक्षी हैं। गंभीर साहित्य की दुनिया में उनकी पूछ-कदर नहीं है। यही बात ‘बेजोड़’ जी को सालती रहती है। उनकी सबसे ज़्यादा दुखती रग परसाई जी हैं। जब कहीं भी वे अपनी रचनाओं की चर्चा का जुगाड़ बैठाते हैं, घूम-घाम कर परसाई जी  रचनाओं से तुलना होने लगती है। हर बार निष्कर्ष यह निकलता है कि  ‘बेजोड़’ जी अच्छा  लिख रहे हैं, लेकिन परसाई जी से कुछ सीख लेते तो अच्छा होता। सुनकर ‘बेजोड़’ जी खिन्न हो जाते हैं। आयोजन वे जमाते हैं और तारीफ परसाई जी बटोर ले जाते हैं।

अपने वक्तव्यों में ‘बेजोड़’ जी अक्सर कहते हैं— ‘अब परसाई जी का ज़माना लद गया। अब हम जैसे लेखकों का ज़माना है। आलोचकों से  कहो कि परसाई जी को लांघ कर हम तक आयें।कब तक ‘परसाई’ ‘परसाई’ जपते रहेंगे?’

परसाई जी के वामपंथी होने पर भी बेजोड़ जी तल्ख टिप्पणी करते हैं। कहते हैं— ‘वामपंथी अच्छा लेखक हो ही नहीं सकता। वह एक विचारधारा में कैद हो जाता है, जड़ हो जाता है, कूपमंडूक हो जाता है। उसे अपनी नाक से आगे का कुछ दिखायी नहीं पड़ता। वह एक आंख से ही दुनिया को देखता है, दूसरी नहीं खोलता। इसीलिए मैं परसाई को महान लेखक नहीं मानता। लेखक को तो समुद्र की तरह विशाल हृदय वाला होना चाहिए। विचारधारा के फेर में नहीं पड़ना चाहिए। वामपंथियों ने ज़बरदस्ती तारीफ कर कर के परसाई को महान बना दिया है।’

कई बार वे कहते हैं— ‘परसाई जी ने लिखा क्या है? कहीं वे लिखते हैं कि जिन राज्यों में दंगे हुए हैं उन्हें गणतंत्र दिवस की झांकी में दंगे ही दिखाना चाहिए। कहीं कहते हैं कि लड़कों को अपने बाप का आदेश नहीं मानना चाहिए। कहीं लिखते हैं कि पुरानी पीढ़ी नयी पीढ़ी के कंधों पर सवार हो गयी है। कहीं सुशीला उस लड़की को कहते हैं जो भाग कर शादी कर लेती है और बाप का पीएफ का पैसा बचा देती है। यह सब नयी पीढ़ी को बरगलाना नहीं तो और क्या है? नयी पीढ़ी को उत्तम संस्कार देने के बजाय ऊलजलूल बातें सिखा रहे हैं और फिर भी महान बने हुए हैं।’

कुछ दिनों से ‘बेजोड़’ जी एक नयी थियरी लेकर सामने आये हैं। कहते हैं, ‘एक रात मुझे सोचते-सोचते अचानक समझ में आया कि परसाई को महान क्यों माना जाता है। दरअसल  वे इसलिए बड़े माने जाते हैं क्योंकि विरोधियों के हाथों उनकी पिटाई हो गयी थी। इसमें कोई शक नहीं कि व्यंग्यकार के जीवन में प्रताड़ना का बहुत महत्व होता है। पिटाई हो जाए तो व्यंग्यकार एकदम ऊपर उठ जाता है। परसाई जी के बड़प्पन का यही राज़ है।

‘यह समझ में आने के बाद मैं लगातार कोशिश में हूं कि मेरी भी वाजिब पिटाई हो जाए ताकि मैं परसाई जी से आगे निकल जाऊं। इसी कोशिश में दो बार पटना में छात्रों के धरने में शामिल हो गया, लेकिन मेरे बालों की सफेदी देखकर पुलिस ने छोड़ दिया। उत्तर प्रदेश के किसी आंदोलन में शामिल होने की सोची थी, लेकिन हिम्मत नहीं हुई क्योंकि वहां पिटाई से ज़्यादा ‘एनकाउंटर’ होते हैं। अब राजस्थान जाने की सोच रहा हूं, वहां बेरोज़गारों के आंदोलन की संभावना है। हरयाणा में एक कज़िन पुलिस में हैं, उनसे भी कह रखा है। वे बुलाएंगे तो वहां चला जाऊंगा। वे पिटाई का इंतज़ाम कर देंगे। परसाई जी का पैर खराब था, चलने फिरने से मजबूर थे, इसलिए उन्हें जबलपुर में ही पिटना पड़ा। मैं तो देश में कहीं भी पिट सकता हूं। पिटने  के बाद फोटो के साथ अखबारों में भेज दूंगा। छपते ही मेरा  कद एकदम बढ़ जाएगा। फिर परसाई को न कोई याद करेगा, न कोई पढ़ेगा। सब तरफ हम ही हम होंगे।’

अब ‘बेजोड़’ जी के चेले मनाते हैं कि ‘बेजोड़’ जी की मनोकामना शीघ्र पूरी हो और वे साहित्य में ऐसी बुलन्दी पर पहुंचें जहां उन्हें चुनौती देने वाला कोई न हो, परसाई भी नहीं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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