हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३६ – हास्य-व्यंग्य – “कहीं सूखा कहीं बाढ़ : देवराज क्यों कुपित” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  कहीं सूखा कहीं बाढ़ : देवराज क्यों कुपित

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३६ 

☆ व्यंग्य ☆ “कहीं सूखा कहीं बाढ़ : देवराज क्यों कुपित” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

झब्बूलाल ने पान लपेट कर मेरी ओर बढ़ाया और हमेशा की तरह मेरे सामने एक लंबा प्रश्न पटक दिया। भाई साहब, देवभूमि भारत में कदम-कदम पर देवालय हैं, जहां प्रति दिन शंख और घंटों की ध्वनि के बीच दिन भर ईश्वर की आराधना होती है, साधु-संतों, महंतों, जगत गुरुओं के प्रवचन होते हैं, देवी-देवताओं की शोभा यात्राएं निकलती हैं। लाउडस्पीकर लगा कर अखंड रामायण, भागवत पाठ, नर्मदा, शिव, विष्णु एवं गरुड़ पुराण होते हैं, भंडारे होते हैं, उस भारत भूमि वासियों से देवराज इंद्र के सम्मान में क्या गुस्ताख़ी हो गई जो इस वर्ष वे कहीं तो सिर्फ छिड़काव कर रहे हैं और कहीं बेहिसाब पानी उड़ेल रहे हैं ?

मैंने कहा, झब्बू भाई, मैं ऑफिस जाने के लिए घर से निकला हूं मुझे प्रश्नों के जाल में मत उलझाओ। वह बोला, भैया मैं कल से इस बारे में कई लोगों से पूंछ चुका हूं, किसी ने संतोषजनक समाधान नहीं किया। आप पत्रकार हैं कुछ तो बताएं। जब तक मैं आपके ऑफिस के लिए पानों की पुड़िया बनाता हूं। मैंने कहा, झब्बू भाई मैं पृथ्वी लोक का पत्रकार हूं। ट्रंप, पुतिन, मोदी, योगी, राहुल की प्रसन्नता, दुख  और नाराजी की वजह बता सकता हूं देवलोक वासी इंद्र की नाराजी अथवा उनके मूड के बारे में जानने के लिए तो तुम्हें देवलोक के पत्रकार नारद जी से संपर्क करना होगा। यदि लोगों को ऐसा लग रहा है कि देवराज रुष्ठ हैं इसलिए वर्षा को प्रभावित कर रहे हैं तो उन्हें खुश करने का प्रयत्न करें।

झब्बू बोला, भाई साहब अखबारों में छप रहा है कि अच्छी वर्षा के लिए लोग जगह-जगह पूजा-पाठ, यज्ञ करवा रहे हैं। टोना टोटके भी हो रहे हैं, कहीं गधों को गुलाबजामुन खिलाए जा रहे हैं, कहीं मेंढक-मेंढकी के विवाह कराए जा रहे हैं, जमीन में उल्टे घड़े गड़ाए जा रहे हैं फिर भी इंद्र देव खुश नहीं हो रहे!

पान लगाते हुए झब्बू ने मेरी ओर नजर फेंकी और पुनः कहा, भाई साहब कहीं ऐसा तो नहीं कि दुश्मन देशों ने हमारे देश के खिलाफ इंद्र के कान भर दिए हों? मैंने कहा यह भी हो सकता भाई जी क्योंकि हमारे देश के कुछ नेता भारत को विश्व गुरु बनाने पर तुले हैं जबकि अनेक देश हमें गुरु नहीं मानना चाहते।

झब्बू बोला – भाई साहब, इंद्र देव की नाराजी के और क्या कारण हो सकते हैं ? मैंने झब्बू से पान की पुड़िया ली और कहा प्यारे भाई, जाने के पहले मुझसे इंद्र देव की नाराजी का सबसे बड़ा कारण सुन लो। झब्बू मेरी ओर झुका, मैंने धीरे से कहा – तुमने सुना होगा कि जब-जब भारत भूमि पर कोई धर्मनिष्ठ, तपस्वी, लोकप्रिय राजा हुआ है तब-तब इंद्रासन डोला है। इंद्र के मन में आशंका पैदा हुई है कि भारत का वह धर्मनिष्ठ राजा कहीं उनसे उनका सिंहासन न छीन ले, तो भाई शायद यही आशंका इस समय भी इंद्र के मन में समा गई है और संभवतः इंद्र देव इस कारण ही कुपित होकर वर्षा को अस्त्र बना कर भारत भूमि के शासक को अशक्त करके उससे अपनी गद्दी बचाना चाहते हैं। मेरी बात सुनकर झब्बूलाल की आँखें खुली रह गईं। मैंने उसे हतप्रभ छोड़ कर अपने स्कूटर में किक मारा और आगे बढ़ गया।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४४ ☆ व्यंग्य – शीतल भाई और शान्ति  की खोज ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय कथा – ‘शीतल भाई और शान्ति  की खोज’ इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४४ ☆

☆ व्यंग्य ☆ शीतल भाई और शान्ति  की खोज ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

शीतल भाई रिटायर हुए तो पानी से निकली मछली हो गये। लगा जैसे पांव के नीचे से ज़मीन खिसक गयी। समझना मुश्किल हो गया कि क्या करें और कहां जाएं। पहले सवेरे आठ बजे उठकर दफ्तर की तैयारी में लग जाते थे। टहलने- घूमने, पूजा-पाठ में कभी रुचि नहीं रही। ‘जेही विधि राखे राम, तेही विधि रहिए’ की नीति पर चलते रहे। शरीर को ज़्यादा कष्ट देने के कभी पक्षधर नहीं रहे।

अब रिटायर हुए तो नौ बजे तक पलंग पर ही लुढ़कते-पुढ़कते रहते। जब पत्नी उलाहना देती, ‘क्या अहदी बने पड़े हो, दिन कितना चढ़ गया, उठो’, तब उठते।

आदत के मारे कभी-कभी अपने पुराने दफ्तर में पहुंच जाते। कुर्सी लेकर किसी कर्मचारी के बगल में गपियाने को बैठ जाते। लेकिन कुछ दिन बाद वे प्रबंधकों की नज़र में खटकने लगे। आदेश निकल गया कि कर्मचारी किसी भी बाहरी आदमी को बगल में बैठने न दें।

दफ्तर में कार्यरत साथी भी अब उनसे कटने लगे थे। रिटायर्ड आदमी से क्या बात की जाए? शीतल भाई किसी कर्मचारी को फोन लगाते तो वह थोड़ी देर बाद ही बात बन्द करने के बहाने ढूंढ़ने लगता।

अब शीतल भाई को गांव की याद आने लगी। सोच लिया कुछ दिन गांव में रहेंगे तो मन बहलेगा। ताज़ा हवा मिलेगी, शान्ति मिलेगी। वहां अभी रिश्तेदार थे, पुराना पैतृक मकान था। पिता-माता के जीवन काल में साल दो साल में चक्कर लगाते थे, लेकिन वहां मन नहीं लगता था। शहर और दफ्तर बुलाता रहता था। एक-दो दिन में ही ऊब कर भाग खड़े होते। लेकिन अब दफ्तर का दबाव नहीं है। जाएंगे और जब तक मन लगेगा, रहेंगे।

पत्नी से पूछा तो उन्होंने अपनी गठिया का हवाला देकर जाने से मना कर दिया। शीतल भाई अकेले ही निकल पड़े। गांव पहुंचे तो भाइयों, भतीजों ने स्वागत किया। हाल-चाल का लेनदेन हुआ। पुरानी पोथियों के पन्ने पलटे गये।

रात को शीतल भाई आंगन में लेटे तो तारों से भरा आकाश दिखा। शीतल भाई चौंके। ऐसा आकाश अभी तक कहां था? शहर में तो यह कभी दिखा नहीं।

सवेरे गांव में निकले तो पाया कि गांव बदल गया है। अब उन्हें पहचानने वाला कोई नज़र नहीं आता। ढूंढ़ते हुए दो-तीन परिचितों के घर पहुंचे तो लोग उन्हें परिचय देने के बाद ही पहचान पाये। जो ठीक से पहचान पाये वे काफी बूढ़े हो चुके थे।

शीतल भाई को लगा कि यहां आकर ज़िन्दगी जैसे ठहर गयी है। सब कुछ मंथर गति से चलता है, कहीं कोई जल्दबाज़ी नहीं।

शाम को डेढ़ दो किलोमीटर टहलने निकल गये। सड़क के दोनों तरफ खेत दिखते थे। दूर जाकर नदी के पुल पर बैठ गये। बगल में पुराना मन्दिर था। सब तरफ सन्नाटा था। दो चार लोग मन्दिर में आते जाते दिखते थे। थोड़ी देर बैठकर शीतल भाई ऊब कर उठ आये।

शीतल भाई के घर से थोड़ी दूर एक सेठ की किराने की दुकान और मकान था। दूसरी रात को वहां से किसी के गुस्से से बकने- झकने की आवाज़ें आने लगीं। पूछने पर पता चला कि गांव के एक बिगड़े रईस अक्सर शराब पीकर सेठ को गालियां सुनाते हैं और सेठ जी शांत चित्त से सुनते हैं। कारण यह बताया गया कि सवेरे यही सज्जन सेठ के पास हाथ जोड़ते हुए आते थे और घर  की चीज़ें उनके पास गिरवी रख जाते थे। इस क्रम में सेठ जी उनकी खेती की ज़मीन और घर की बहुत सी चीजों के मालिक हो गये थे। इसीलिए वह गालियां सुनकर भी स्थितप्रज्ञ बने रहते थे।

तीन-चार दिन में ही शीतल भाई गांव से उकताने लगे। यहां का सन्नाटा और जीवन की सुस्त रफ़्तार उन पर भारी पड़ रही थी। शहर में थे तो दिन भर गाड़ियों का आना-जाना, ट्रेनों का हूटर, पास-पड़ोस की खटर-पटर कानों में आती रहती थी। चौराहे पर खड़े आदमी को भी शहर अपनी रफ़्तार में लपेट लेता था। ज़िन्दगी उसी रफ़्तार की आदी हो गयी थी, इसलिए सुस्त गति वाली ज़िन्दगी में ‘एडजस्ट’ होना मुश्किल लग रहा था।

शीतल भाई को याद आया कई साल पहले वे मुंबई गये थे। वहां स्टेशन पर एक आदमी ने उनसे उनके शहर का नाम पूछा और फिर बताया कि एक बार वह तीन-चार घंटे के लिए उनके शहर में गया था और वहां की ज़िन्दगी उसे इतनी सुस्त लगी कि उसका जी घबराने लगा। उसकी बात याद करके शीतल भाई को लगा कि हर जगह की ज़िन्दगी की अपनी रफ़्तार होती है और एक रफ़्तार वाली जगह के आदी आदमी को दूसरी जगह समायोजित होना आसान नहीं होता।

एक हफ्ते बाद ही शीतल भाई वापस शहर पहुंच गये। पत्नी बोलीं, ‘बड़ी जल्दी वापस आ गये ? कुछ दिन और शान्ति से रह लेते।’

शीतल भाई ने जवाब दिया, ‘वहां शान्ति कुछ ज़्यादा ही है। हम शहर वालों को ज़्यादा शान्ति की आदत नहीं रही। ज़्यादा शान्ति हो तो मन घबराने लगता है। जैसा भी है हमारे लिए शहर ही ठीक है।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२३ – वीआईपी संस्कृति और आम आदमी – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – वीआईपी संस्कृति और आम आदमी)  

☆  चुभते तीर # १२३ – व्यंग्य  – वीआईपी संस्कृति और आम आदमी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

हमारे देश में वीआईपी होना एक दैवीय अधिकार है। जब किसी मंत्री का काफिला निकलता है, तो एम्बुलेंस को भी किनारे लगा दिया जाता है क्योंकि मंत्री जी का समय देश के किसी भी बीमार नागरिक की जान से ज़्यादा कीमती है। हूटर की आवाज़ सुनते ही आम आदमी इस तरह सहम जाता है मानो कोई आदमखोर शेर आ रहा हो। इन वीआईपी लोगों को लाइन में लगना अपनी तौहीन लगता है। सुरक्षा के नाम पर इनके आगे-पीछे कमांडो इस तरह चलते हैं जैसे वे किसी जंग के मैदान में हों। आम आदमी टैक्स भरता है ताकि इन वीआईपी लोगों की गाड़ियों का पेट्रोल मुफ्त मिल सके। सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि ये सभी खुद को ‘जनता का सेवक’ कहते हैं, और सेवक की सेवा में पूरी जनता दिन-रात लगी रहती है।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६५ ☆ व्यंग्य – “बक यहाँ कहीं नहीं ठहरता…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  बक यहाँ कहीं नहीं ठहरता…” ।)

☆ शेष कुशल # ६५ ☆.☆ व्यंग्य – “बक यहाँ कहीं नहीं ठहरता – शांतिलाल जैन 

उधर सात समंदर पार निज़ाम-ए-अमेरिका अपनी कामकाज की मेज़ पर लिखवा कर रखते हैं – ‘बक स्टॉप्स हियर’.  इधर आर्यावर्त में ‘बक स्टॉप्स नो व्हेयर’. अंग्रेजी का बक श्रीमान्, आला हाकिम से लेकर अदने से मुलाज़िम तक कोई उसे अपनी डेस्क पर ठहरने नहीं देता. पास देने में सब प्रवीण. हॉकी फुटबाल में होते तो खूबसूरत पास दे रहे होते. बहरहाल, मैंने बक को जबरन रोककर पूछा – यार ये परीक्षाओं के पेपर बार बार लीक हो रहे हैं –  तुम किसी की डेस्क पर जाकर तो रुकोगे?

उसने कहा – ठहरेंगे तो मारे जाएँगे शांतिबाबू. हमें जहाँ ठहरना चाहिए वहाँ शिकारी बैठे होते हैं. समय आने पर जो आदमखोर हो जाने का भी दम रखते हैं. मुझ निरीह गरीब प्राणी को क्या ही छोड़ेंगे?  आदम जो कभी किसान के रूप में मरता है कभी छात्र के तौर पर,  कभी महिला पहलवानों के तौर पर तो कभी रिटायर्ड सैनिक के तौर पर. हमें ठहरना तो वहीं चाहिए जिनके कारण वे मरते हैं. मगर, क्या मजाल है कि हाकिम की नाक पर मक्खी और कामकाज की डेस्क पर कोई बक ठहर जाए. ठहरने का तो इन दिनों हमने सोचना ही बंद कर दिया है.

‘कभी, कहीं तो ठहरे होगे तुम?’  –  मैंने पूछा.

‘लाल बहादुर शास्त्री के समय ठहरे थे हम. ट्रेन अरियालुर में दुर्घटनाग्रस्त हुई और हम  दिल्ली में रेलमंत्री की डेस्क पर जा कर ठहर गए. अब हम कहीं नहीं ठहरते. आर्यावर्त के  ओहदेदार ‘पास द बक’ में निपुण जो हो गए हैं. जो जितना बड़ा ओहदेदार पास देने की कला में वो उतना ही माहिर.’

आर्यावर्त का मामला श्रीमान्,  मैं भी क्या ही कहता उसे. उसी ने कहना जारी रखा – ‘यहाँ हर संकट के साथ तीन चीज़ें तत्काल पहुँचती हैं — कैमरा,  बयान और उच्च स्तरीय जांच समिति. समिति जवाबदेही तय करेगी. रियाया उम्मीदें पाल लेती है,  समिति के निष्कर्ष आएँगे,  जिम्मेदार लोग दोषी ठहराए जाएँगे, समिति कहेगी मुझसे बक, यू स्टॉप हियर.  मगर ऐसा होता नहीं. वो क्या है कि समिति उच्च स्तरीय होती है. रियाया निच्च. उच्च भी इतनी कि सीढ़ी आप चढ़ नहीं पाएँगे और लिफ्ट आपको कोई देगा नहीं.  गर्दन दुखने लगती है तो जनता उच्च स्तर पर देखना ही बंद कर देती है. समिति उच्च स्तर पर जाँच करती है, निष्कर्ष हैं कि नीचे तक आ नहीं पाते.’

पिछले दिनों एक पुल टूट गया, सैकड़ों की संख्या में लोग मर गए. मैंने बक से कहा – ‘सेतु निगम के अधकारियों से लेकर लोक निर्माण विभाग के वज़ीर तक किसी की डेस्क पर तो तुम्हें रुकना ही पड़ेगा?’

उसने कहा – ‘बहुत भोले हैं आप शांतिबाबू,  बल्कि बेवकूफ़ हैं. गिरनेवाला यह पहला पुल नहीं है. न ओहदेदार नए हैं, न मेरे जैसा बक ही नया है. कुछ क्लासिक पास देखिएगा – निर्माण एजेंसी दोषी है. एजेंसी कहेगी तकनीकी स्वीकृति प्रशासन ने दी थी. प्रशासन कहेगा बजट सीमित था. वित्त विभाग कहेगा वैश्विक परिस्थितियाँ प्रतिकूल थीं. पुल कमज़ोर था, चेतावनी लिखी थी फिर भी बड़ी संख्या में लोग पुल पर आ गए.’  कुछ हुआ कि मरहूम मासूमों को याद करते करते गला भर आया बक का. बोला – ‘कभी किसी रसूखदार को टूटते पुल पर मरते हुए देखा है ? वे पुलों को न पैदल पार करते हैं, न टूटने से मरते हैं.’

बोला – ‘इस तरह पास दिए जाने से बेहतर है हाराकिरी कर ली जाए. यूँ भी सफलता के सौ बाप होते हैं,  विफलता अनाथ. सड़क समय पर बन जाए तो यह दूरदर्शी नेतृत्व का परिणाम है. सड़क बरसात में बह जाए तो यह अप्रत्याशित वर्षा का परिणाम है. महँगाई घटे तो नीति सफल है,  बढ़े तो अंतरराष्ट्रीय कारण हैं. परीक्षा अच्छे से हो जाए तो प्रशासन दक्ष है,  प्रश्नपत्र लीक हो जाए तो कुछ शरारती तत्व सक्रिय थे. निज़ाम का फण्डा क्लियर है,  काम अच्छा हुआ तो यह दूरदर्शी नेतृत्व का परिणाम है. खराब हुआ तो यह मौसम के कारण हुआ. ईरान युद्ध के कारण हुआ. तकनीकी खामी के चलते हुआ. स्थानीय प्रशासन दोषी है. विपक्ष के समय भी हुआ. आला हाकिम का कोई कसूर नहीं.’

‘आपके आर्यावर्त की रियाया शांतिबाबू, एकदम उदारमना!! हर बार भरोसा कर लेती है बक कभी तो किसी विभाग में किसी की डेस्क पर जा कर ठहरेगा. उधर निज़ाम भी उतने ही मुतमइन हैं – अगली घटना घटने तक रियाया पिछली घटना भूल जाएगी. जब कोई नहीं मिलेगा तो नेहरू है ना! बक स्टॉप्स देयर.’ – उसने धीमे से कान में कहा –  ‘बौने कद के ओहदेदार और कामकाज की ऊँची मेज़ें,  तो कैसे लिखवाईएगा – ‘बक स्टॉप्स हियर’. फिर वह चला गया.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२२ – नेताओं के चुनाव पूर्व वादे – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – नेताओं के चुनाव पूर्व वादे)  

☆  चुभते तीर # १२२ – व्यंग्य  – नेताओं के चुनाव पूर्व वादे ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

चुनाव आते ही देश के नेता इतने विनम्र हो जाते हैं कि सड़क पर चलते कुत्ते को भी नमस्ते कर लें। उनके वादों की लिस्ट इतनी लंबी होती है कि अगर आधी भी पूरी हो जाए तो देश मंगल ग्रह पर अपनी कॉलोनी बना ले। वे हर गरीब के खाते में पैसे, हर हाथ को काम और हर घर को मुफ्त बिजली देने का दावा करते हैं। मंच पर खड़े होकर वे इस तरह दहाड़ते हैं मानो देश की सारी समस्याएं बस अगले रविवार तक खत्म होने वाली हैं। जनता भी इस तमाशे को ताली बजाकर स्वीकार करती है, क्योंकि उसे पता है कि जीतने के बाद यही नेता पाँच साल तक केवल वीआईपी सुरक्षा के घेरे में दिखाई देंगे। वादे तो वैसे भी टूटने के लिए ही बनते हैं, और नेताओं के वादे तो बिना गारंटी वाले चीनी सामान जैसे होते हैं।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२१- अंग्रेजी मीडियम स्कूल और चंदा – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – अंग्रेजी मीडियम स्कूल और चंदा)  

☆  चुभते तीर # १२१ – व्यंग्य – अंग्रेजी मीडियम स्कूल और चंदा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

आजकल बच्चों को स्कूल भेजना किसी बड़ी कंपनी में शेयर खरीदने जैसा है। एडमिशन के नाम पर माता-पिता का जो इंटरव्यू लिया जाता है, उसे देखकर लगता है कि बच्चा स्कूल में नहीं, बल्कि नासा में जा रहा है। स्कूल की फीस इतनी होती है कि पिता अपनी एक किडनी बेचने का मन बना लेता है। ‘इंटरनेशनल स्कूल’ के नाम पर बच्चों को टाई और कोट पहनाकर गर्मियों में भी घुमाया जाता है। बच्चा घर आकर अपनी दादी से अंग्रेजी में बात करता है, जिसे बेचारी दादी सिर्फ आशीर्वाद समझकर मुस्कुरा देती है। स्कूल में पढ़ाई से ज़्यादा ज़ोर एनुअल फंक्शन के डांस और विदेशी टूर पर होता है। अगर आपका बच्चा अंग्रेजी में गाली भी दे, तो माता-पिता गर्व से कहते हैं, “देखिए, हमारा मुन्ना कितनी फ्लुएंट इंग्लिश बोलता है।”

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३५ – हास्य-व्यंग्य – “परीक्षा, प्रश्न पत्र और लीकेज ?” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  परीक्षा, प्रश्न पत्र और लीकेज ?

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३५

☆ हास्य – व्यंग्य ☆ “परीक्षा, प्रश्न पत्र और लीकेज ?” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

मैं सुबह का अखबार पढ़ते हुए चाय का इंतजार कर रहा था, तभी डोर वेल बजी। दरवाजा खोला तो सामने मेरे पड़ोसी वर्मा जी खड़े थे। नमस्कार करते हुए वे अंदर आये और सोफे पर बैठते ही प्रश्न दाग दिया। भाई साहब यह पेपर लीक का क्या लफड़ा है, इस पर इतना हंगामा क्यों हो रहा है ? पेपर लीक क्यों होते हैं ? इसे रोका क्यों नहीं जाता ?

मैंने कहा भाई जी पेपर लीक पर सड़कों से संसद तक बातें, हंगामें चल रहे हैं वह क्या कम हैं ? मुझे इसमें शामिल नहीं होना। तभी मेरी श्रीमती जी ने चाय लेकर कमरे में प्रवेश किया, वर्मा जी को चाय देते हुए उन्होंने कटाक्ष किया – वर्मा जी, घर के छत पर रखी पानी की टंकी का लीक तो श्रीमान जी अभी तक बंद नहीं करवा पाए और आप इनके सामने देश के प्रश्न पत्रों के लीक होने का मुद्दा उठा रहे हैं ! मैंने कहा प्रिये दो बार टंकी का लीकेज बंद करवा चुका हूं, हर 5/6 माह में किसी न किसी नल में लीकेज हो जाता है और मैं उसे सुधरवाता हूं। लीकेज का कोई स्थाई समाधान नहीं है। वह तो समय के साथ रास्ता और जगह बदल कर होता रहेगा। मेरी बात सुनकर मेरी श्रीमती जी ने वर्मा जी की ओर रुख किया और कहा वर्माजी आपको आपके प्रश्न का उत्तर मिल गया। कितना भी सुधार कर लो एक समय के बाद किसी न किसी नए रास्ते से लीकेज होने ही लगता है। लीकेज रोकना कभी भी स्थाई नहीं होता यह निरंतर होने और रोकते रहने वाली प्रक्रिया है। मेरी श्रीमती जी की बात सुनकर वर्मा जी ने खड़े हो कर उनके समाधान पर उन्हें धन्यवाद दिया। मैंने गर्व से पत्नी की ओर देखा, उन्होंने वर्मा जी के प्रश्न से मेरी जान छुड़ाई थी।.. लेकिन यह क्या वे रुकी नहीं., बोलीं, “वर्मा जी कभी गैस पाइप लीक होने लगता है, बरसात में छत से पानी लीक होने लगता है, नगर निगम की पानी की पाइप लाइनें भी जब – तब लीक हो जाती हैं, बिजली के तारों से करंट लीक होने लगता है। सरकार की/ विपक्ष की गुप्त योजनाएं लीक हो जाती हैं, दस्तावेज लीक हो जाते हैं, वैज्ञानिकों के शोध लीक हो जाते हैं, कहावत है कि”दीवारों के कान होते हैं” – हमारी बंद कमरों में की गई बातें/ मीटिंग में लिए गए निर्णय लीक हो जाते हैं। दुनिया में ऐसा क्या है जो लीक नहीं होता ? यहां  विचार, बातें, गैस, द्रव तो लीक होते ही हैं, ठोस तक लीक हो जाते हैं। लीकेज कोई नहीं रोक सकता, वह तो होगा ही। हां, लीकेज होने पर सुधार किया जा सकता है पर स्थाई नहीं। लीक होने वाली चीजें रुकती नहीं वे सुधार के कुछ समय बाद ही बाहर निकलने का नया रास्ता खोज लेती हैं।

पुरानी सरकार के समय भी पेपर लीक होते रहे हैं, वर्तमान सरकार के समय भी हो रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे। भ्रष्ट लोग इसके नए – नए रास्ते बनाते रहेंगे। सफेदपोश भ्रष्टों की पहचान आसान नहीं है। वे या तो पकड़े ही नहीं जाते और पकड़े जाएं तो रुतबे और धन बल से छूट जाते हैं अथवा छुटभैया साथियों को फंसा कर स्वयं बेदाग बने रहते हैं।

     बोलते – बोलते पत्नी ने सांस ली तो मैंने कमान सम्हाल ली। मैंने कहा भाई जी, सामान्य मानव की प्रवृत्ति है कि उसके दिमाग और पेट में कोई बात नहीं पचती फिर जो जानकारी बताने में फायदा है उसे वह कैसे छुपा सकता है ? तमाम गोपनीय विभागों में भी तो आम आदमी हैं, गोपनीय बात पचाने में सक्षम लोग बिरले ही होते हैं। एक बात और है, सभी चाहते हैं कि उनकी कोई भी महत्वपूर्ण जानकारियां व दस्तावेज लीक न हों, सुरक्षित रहें किंतु दूसरों की गोपनीय जानकारियां लीक करने / कराने के लिए घात लगाए रखते हैं। दुनिया भर के देशों ने तो एक दूसरे की जानकारियों को लीक करने के लिए जासूसों का जाल फैला रखा है। इतनी देर से बातें सुन रहे वर्मा जी का धीरज टूट गया। वे उठ खड़े हुए बोले – आदरणीय भाई साहब और भाभी जी मैं पूरी बात समझ गया हूं कृपया अब मुझे जाने दें। मैंने कहा – भाई जी रुकिये, आप आंदोलन प्रिय हैं। पेपर लीक विरोध का एक जवाबी आंदोलन कराइये जिसमें ऐसा कानून बनाने की मांग हो कि भले ही परीक्षा फीस बढ़ा दी जाए किन्तु  सभी परीक्षाओं के एक दिन पूर्व परीक्षार्थियों के मोबाइल पर प्रश्न पत्र प्रेषित कर दिए जाएं। इस कानून के आने से पेपर लीक होना बंद हो जाएंगे, बिचौलियों का धंधा चौपट हो जाएगा, परीक्षार्थियों का आत्मविश्वास बढ़ेगा। आत्म हत्याएं बंद होंगी। पेपर लीक हो जाने पर होने वाले आंदोलन और विपक्षी राजनीत के रास्ते बंद हो जाएंगे। सरकार सीना ठोक कर कह सकेगी कि हम पहले से प्रश्न बताकर परीक्षा लेते हैं। मेरी बात सुनकर वर्मा जी खुशी से उछल पड़े। बोले –  भाई साहब आपने तो मुझे राजनीति पकाने का नया मुद्दा दे दिया। बहुत बहुत धन्यवाद।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४३ ☆ व्यंग्य – बाबाओं का स्वर्णकाल ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय व्यंग्य  – ‘बाबाओं का स्वर्णकाल‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४३ ☆

☆ व्यंग्य ☆ बाबाओं का स्वर्णकाल ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

शिब्बू ऐसे ही दोस्तों के कहने पर बाबा के दरबार में चला गया था। दरबार में हज़ारों की भीड़ थी, महिलाएं संख्या में ज़्यादा। बाबा का प्रवचन चल रहा था। एक तरफ गायन-मंडली बैठी थी। बाबा प्रवचन के बीच में कोई धुन छेड़ देते और फिर गायन मंडली उसे उठा लेती। इस तरह बाबा को थोड़ी राहत मिल जाती थी।

बाबा की शोहरत कुछ दिनों में बड़ी तेज़ी से फैली थी। चर्चा थी कि वे  बड़े ज्ञानी थे। सब शंकाओं का समाधान कर देते थे। इसीलिए देर रात तक आश्रम में भक्तों की भीड़ बनी रहती थी।

शिब्बू और उसके दोस्त बाबा की गद्दी के पास ही बैठे थे। बाबा के दाढ़ी-मूंछ से ढंके चेहरे को देखते-देखते शिब्बू को लगा बाबा को उसने पहले देखा है। अचानक वह उठकर खड़ा हो गया, बाबा को संबोधन करके बोला, ‘आप तिरलोकी नाथ मासाब तो नहीं हैं?’

सवाल सुनकर बाबा का चेहरा उतर गया, संभल कर बोले, ‘अरे शिवदयाल, तुम यहां कैसे?’

शिब्बू बोला, ‘बस ऐसे ही दोस्तों के साथ आ गया।’

बाबा बोले, ‘इस सत्संग के बाद हमारे कक्ष में मिलना।’

सत्संग खत्म हुआ तो शिब्बू बाबा के कक्ष में पहुंचा। बाबा मसनद के सहारे उठंगे थे। शिब्बू उनके चरन छूकर बैठ गया। फिर पूछा, ‘आपने तीन साल मुझे स्कूल में पढ़ाया था। आप बाबा कैसे बन गये?’

बाबा कुछ असमंजस में दिखे, फिर बोले, ‘यह मेरा दूसरा जनम है। पिछला सब छोड़ दिया है।’

शिब्बू बोला, ‘आप तो अच्छा पढ़ाते थे, फिर यह बाबा बनने की बात कैसे आपके मन में आयी?’

बाबा कुछ देर आंखें बंद किये मौन बैठे रहे, फिर बोले, ‘एक घटना के बाद मेरा मन अचानक मास्टरी से उचट गया। हमारे क्षेत्र के मंत्री चमनलाल के पास एक दिन स्कूल के लिए अतिरिक्त फंड मंज़ूर कराने का प्रस्ताव लेकर गया था। मंत्री जी अपने चुनाव क्षेत्र का दौरा करके लौटे थे। सोफे पर लंबे लेटे थे। मुझे जानते थे लेकिन देख कर भी उठे नहीं। लेटे ही लेटे बात की। बीच-बीच में झपकी लेते रहे। मुझे बैठने को भी नहीं कहा। कहा कि आवेदन बाहर पीए को दे दूं। तीन चार दिन बाद स्थानीय अखबार में देखा कि वे एक बीस पच्चीस साल के बारहवीं पास बाबा के चरणों में औंधे पड़े हैं। बस तभी मास्टरी छोड़कर बाबा बनने का निश्चय कर लिया। हमारे पास इन बाबाओं से ज़्यादा ज्ञान है, बोलने की कला है, लेकिन ये अनपढ़ बाबा हमसे ज्यादा इज़्ज़त पाते हैं। यही ऐसा धंधा है जिसमें पैसा और सम्मान दोनों एक साथ मिलते हैं। जो बाबा भक्तों को माया से दूर रहने का उपदेश देते हैं वे खुद चार करोड़ की गाड़ी में घूमते हैं और पांच करोड़ का सोना शरीर पर पहनते हैं। पूछने पर जवाब मिलता है सब भक्तों का दिया हुआ है, उनकी नज़र में तो सोने और मिट्टी में कोई फर्क नहीं है। पुलिस वाले इन पर हाथ डालने से डरते हैं। इन पर आयकर लागू नहीं होता। मास्टर को देश की भावी पीढ़ी का निर्माता कहा जाता है, लेकिन समाज में बाबा ज़्यादा पुज रहे हैं। हमारी क्लास में बीस छात्र भी नहीं जुटते, इनके दरबार में लाखों जुटते हैं क्योंकि इनके अनुसार इनके पास आदमी के हर दु:ख की दवा मिलती है।

‘मास्टर से अपेक्षा की जाती है कि मेहनत से पढ़ाये और अच्छा रिज़ल्ट लाये। अच्छा रिज़ल्ट न लाने पर मास्टर को दंड मिलता है। लेकिन एक बाबा बिना पढ़े पास होने का नुस्खा बताते हैं और उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। इन बाबा के हिसाब से पढ़ाई-लिखाई की कोई ज़रूरत नहीं है। यही बाबा भक्तों से पूछते हैं कि उन्हें रात में सफेद साड़ी और बड़ी बिन्दी वाली चुड़ैल दिखी थी या नहीं। एक बाबा सीधे रावण और हनुमान जी से बात करते हैं और अपने दरबार में प्रेतबाधा से ग्रस्त आदमी को बीस पच्चीस फीट दूर से थप्पड़ मारते हैं। आदमी भी उनके हाथ की हरकत के साथ ज़मीन पर लुढ़कता पुढ़कता है, जैसे कि बाबा का थप्पड़ उसे लग रहा हो। विडंबना यह है कि सैकड़ों उच्च शिक्षा प्राप्त लोग दरबार में हाजि़र होकर चुपचाप यह तमाशा देखते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश और सेनाध्यक्ष उनके सामने सिर नवाते हैं। कई साल पहले उत्तर प्रदेश के एक बाबा भक्तों से कहते थे कि रात को उनके घर शिवजी आये थे, फिर पूछते थे कि क्या उन्होंने डमरू की आवाज़ सुनी थी, और भक्त एक स्वर में जवाब देते थे कि उन्होंने सुनी थी।

‘स्वतंत्रता के पचहत्तर साल बाद तरक्की यह हुई है कि बाबागीरी का विस्फोट हुआ है। रोज़ दस बीस बाबा पैदा हो रहे हैं। कोई जीभ निकाले दौड़ रहा है तो कोई आंखें फाड़े। एक युवा साध्वी दिखीं जो शरीर पर भभूत लपेटे थीं और भभूत को घिस घिस कर, उतारकर भक्तों में बांट रही थीं। संविधान के मूल कर्तव्यों में कहा गया है कि देश में वैज्ञानिक सोच को प्रोत्साहन मिलना चाहिए, लेकिन वैज्ञानिक सोच कितना बढ़ रहा है यह सबके सामने है। ऐसे में बेचारा मास्टर बच्चों को क्या पढ़ाये?

‘बाबाओं के दरबार में शंका करने की इजाज़त नहीं होती। ज़्यादा सवाल पूछोगे तो भक्त लाठी लेकर दौड़ेंगे और शंकालु की कपाल-क्रिया हो जाएगी। बाबा स्त्रियों पर ज़्यादा भरोसा करते हैं क्योंकि वे सवाल नहीं पूछतीं, बाबा जिस तरफ इशारा करे उधर ही सिर पर कलश रखकर चल पड़ती हैं।’

शिब्बू ने पूछा, ‘तो क्या आप अब बाबा ही बने रहेंगे?’

मासाब बोले, ‘हम धर्म का असली मर्म समझाने के लिए इस लाइन में आये हैं। अभी धर्म के नाम पर महज़ कर्मकांड और अंधानुकरण हो रहा है। हम तो कुछ अच्छा करने की कोशिश करेंगे, लेकिन देखना यह है कि ये धंधे वाले बाबा हमें कब तक टिकने देते हैं।’

—–

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२० – महानगरों का ट्रैफिक और धैर्य – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – महानगरों का ट्रैफिक और धैर्य।)  

☆  चुभते तीर # १२० – व्यंग्य  – महानगरों का ट्रैफिक और धैर्य ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

महानगरों का ट्रैफिक इंसान को अध्यात्म की ओर ले जाता है। जब आप तीन घंटे तक एक ही जगह पर खड़े होकर सामने वाली गाड़ी की नंबर प्लेट पढ़ रहे होते हैं, तो आपको जीवन की नश्वरता का अहसास होता है। हॉर्न बजाना यहाँ का राष्ट्रीय शगल है; लोगों को लगता है कि जितना तेज़ हॉर्न बजाएंगे, सामने वाली गाड़ी उतनी ही जल्दी गायब हो जाएगी। रेड लाइट पर हरा रंग होते ही पीछे से ऐसे हॉर्न बजते हैं मानो कोई एम्बुलेंस सीधे सीधे यमराज के घर जा रही हो। सड़कें इतनी गड्ढों से भरी हैं कि समझ नहीं आता कि गड्ढे में सड़क है या सड़क में गड्ढा। सरकार हर साल टैक्स बढ़ाती है ताकि आपको और बेहतर तरीके से जाम में फंसने का अवसर मिल सके। इस ट्रैफिक में सिर्फ गाड़ियां ही नहीं रुकतीं, बल्कि इंसान का विकास भी रुक जाता है।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # ११९ – सोशल मीडिया पर दिखावा – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सरकारी फ़ाइल की अमरता)  

☆  चुभते तीर # ११९ – व्यंग्य  – सोशल मीडिया पर दिखावा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

अगर आप अपनी सुबह की चाय की तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट नहीं करते, तो माना जाएगा कि आपकी सुबह ही नहीं हुई। आज का इंसान हर पल को जीने के बजाय उसे रिकॉर्ड करने में व्यस्त है। एक्सीडेंट हो जाए तो लोग एम्बुलेंस बुलाने से पहले रील्स बनाना शुरू कर देते हैं। ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ आज की नई मुद्रा हैं। जितने ज़्यादा लाइक्स, इंसान उतना ही सुखी। लोग महंगी गाड़ियों के सामने खड़े होकर इस तरह पोज़ देते हैं मानो वह गाड़ी उनके दादाजी वसीयत में छोड़ गए हों। फ़िल्टर्स ने चेहरों का भूगोल इतना बदल दिया है कि आधार कार्ड वाले भी अपनी असली पहचान भूल जाएं। विडंबना देखिए कि जिस इंसान के घर में कोई उससे बात नहीं करता, उसके सोशल मीडिया पर दस हज़ार ‘फॉलोअर्स’ हैं जो उसकी हर बकवास बात पर तालियाँ बजाते हैं।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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