हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३१३ – कविता – ☆ पीपल बड़ की छाँव गाँव की बातें करते… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “पीपल बड़ की छाँव गाँव की बातें करते…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३१३ ☆

☆ पीपल बड़ की छाँव गाँव की बातें करते… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

☆

पीपल बड़ की छाँव, गाँव की बातें करते

दूर निकल आये, मुश्किल अब लौटें कैसे।

*

बदल गया है देश, वेश भाषा औ’ बोली

कहाँ रही वे सहज सरल इच्छाएँ भोली

जीवन के अब रंग-ढंग कुछ नये-नये से

दूर निकल आये मुश्किल अब लौटें कैसे

*

वह संझा की दीपक-बाती भजन आरती

गप-सप कथा वार्ताएँ,  दादी उचारती

यादें सँजो रखी अब तक हमने अच्छे से

दूर निकल आये, मुश्किल अब लौटें कैसे।

*

खेत और खलिहान बैलगाड़ी पर चलना

गेहूँ की बालियाँ सेंक, हाथों पर मलना

ताजे ऋतुफल खाते थे, तब बड़े मजे से

दूर निकल आये, मुश्किल अब लौटें कैसे।

*

माँ बापू के संघर्षों को, भूल न पाते

हाड़तोड़ मेहनत से, घर को रहे चलाते

है आशीष उन्हीं के हम हैं सजे-धजे से

दूर निकल आये मुश्किल अब लौटें कैसे।

*

भीड़ और बाजारों के, इस बड़े शहर में

मुरझाये मन से, वय के इस प्रथम पहर में

मूल्य यहाँ जीवन का, बस रुपये-पैसे से

दूर निकल आये, मुश्किल अब लौटें कैसे।

*

मौजू मन ये रोज, गाँव की सैर कराता

सुविधाभोगी तन को, गाँव नहीं है भाता

विवश जिंदगी बीत रही अब जैसे-तैसे

दूर निकल आये, मुश्किल अब लौटें कैसे।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १३४ ☆ फागुन और वसंत के दोहे ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “फागुन और वसंत के दोहे”।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १३४ ☆ फागुन और वसंत के दोहे ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

महुआ के रस में पगा, आ पहुँचा ऋतुराज

टेढ़ी नाक पलाश ले, स्वागत करता आज।

* 

पीर विचारी हो गई, ज्यों गरीब की आस

दुख के आगे कौन है, जो गाये मधुमास।

 *

कली-कली के होंठ से, टपक रहा मकरंद

भँवरों की हैं टोलियाँ, घूम रहीं स्वच्छंद ।

 *

फागुन के कालीन पर, सेमल के मनुहार

पीकर रस मकरंद के, कामदेव अवतार।

 *

फागुन रंग अबीर ले, आ पहुँचा है द्वार

सेमल टेसू कर रहे, रंगों का व्यापार।

 *

फागुन वाली हाट में, टेसू की दूकान

सेमल बाँटे मुफ्त में, रंग भरे पकवान।

 *

गुझिया खाओ भाँग की, लेकर हाथ गुलाल

फिर निकलो हुरयार बन, खूब करो भूचाल।

 *

महफ़िल रंग गुलाल की, छायी चारों ओर

कौन बड़ा हुरियार है, कौन बड़ा चितचोर।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १३९ ☆ कह रहे है सब ग़ज़ल… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “कह रहे है सब ग़ज़ल…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १३९ ☆

✍ कह रहे है सब ग़ज़ल… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

हम तने-तन्हा चले थे आसरा कोई न था

राह थी दुश्वार मंज़िल का पता कोई न था

* 

हो गए है हम ज़ुदा मर्ज़ी ये रब की मानकर

बेवफ़ा कोई नहीं था बावफ़ा कोई न था

 *

है नहीं बेटी सुरक्षित कोख में या जन्म ले

मर्द हक़ में  बोलने आगे बढ़ा कोई न था

 *

कौन गुलशन की फ़ज़ा में  ज़हर इतना भर गया

नफ़रतें ही नफ़रतें थी दूसरा कोई न था

 *

साथ चलती भीड़ से तुम मुतमइन क्यों हो रहे

सब किराए के है टट्टू काम का कोई न था

 *

तुमसे मिलने में रिवायत की खड़ी दीवार जब

सबसे की मैंने बगावत रास्ता कोई था

 *

कह रहे है सब ग़ज़ल उस्ताद खुद को मानकर

हो नहीं तनक़ीद अब और तब्सिरा कोई न था

 *

आज भी इंसानियत ज़िंदा अरुण संसार में

खून जो मुझको दिया था राब्ता कोई न था

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ४५ – महरी और ठण्ड का मौसम… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – महरी और ठण्ड का मौसम…।)

✍ महरी और ठण्ड का मौसम… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

एक साथ खिल गये,

गुलाब कई

देख कर महरी के चेहरे पर मुस्कान

जब मिला उसे गर्म पानी

बर्तन धोने,

पोछा लगाने l

 

अभागे

है वो,

सूझता नहीं जिन्हें,

गर्म पानी देना महरी को

बर्तन धोने,

पोछा लगाने

और तभी

देख नहीं पाते हैं वो

कभी भी

एक साथ खिलते

गुलाब कई l

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५३ ☆ कविता – फा़सला… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता – “फा़सला… “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५३ ☆

✍ कविता – फा़सला… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

तेरे मेरे बीच फा़सला

क्या है, कितना है

न मैं जानूँ, न तुम जानो।

 

हो सकता है

तुम जानते हो

पर मुझे नहीं मालूम कि

तुम जानते हो।

 

बस कुछ महसूस होता है,

न शब्द जानें, न अर्थ जानें।

 

कल्पना कैसे होती है भला,

बिन आधार कौन जाने।

 

तुमसे दूर रहने का दुख,

न दिल जाने, न दिमाग जाने,

पर होता है जरूर।

 

आकर तुम ही बताओ,

मेरे क्या माने?

तुम्हारे क्या माने?

 

कितना है, क्यों है

यह फ़ासला।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०२ – रेत की दीवार… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रेत की दीवार।)

☆ लघुकथा # १०२ – रेत की दीवार ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

शांति दास जी सोच रहे थे कि आसपास इतना सन्नाटा है।आजकल कोई सुबह की सैर को भी नहीं जाता?

सुबह हो गई अब चाय तो बना कर पी लेता हूँ, तभी आवाज आई कचरे वाली गाड़ी आई।

“चलो कचरा डालकर ही चाय पीता हूँ।”

कचरा उठाकर  बाहर डालने के लिए गए, तभी कचरे वाले  ने कहा – “बाबा आज बाहर बहुत ठंड है और आपने बस एक स्वेटर पहनना है, टोपी क्यों नहीं पहनी, आपको खांसी  आ रही है।”

शांति दास जी ने कहा- “बेटा बहू ऊपर की मंजिल में रहते हैं नीचे मुझे अकेला छोड़ दिया। पत्नी के गुजर जाने के बाद जिंदगी बोझ हो गई है। बुढ़ापे का  बोझ मुझसे अब सहन भी नहीं होता? ऐसा लगता है कि मरुस्थल के चारों ओर में गिरा हूँ। सब तरफ अंधेरा दिखाई दे रहा है।”

कचरे की गाड़ी वाले ने कहा- “बाबा आपकी बात तो मेरे सिर के ऊपर से जा रही है, ठीक है आपका जीवन आप जानो, मैं आगे के घर का कचरा लेता हूं।”

“बाबूजी आपने अपने आसपास रेत की दीवार क्यों खड़ी की है?”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३०२ ☆ हे शिव शंकर… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३०२ ?

☆ हे शिव शंकर… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

☆

 हे शिवशंकर, कर्पूरगौरांगा,

पार्वती पती, माथ्यावर गंगा,

*

महादेव, चंद्रशेखरा, केदारा,

शांभवी प्रिया, हे हरिहरा !

*

 करते पूजा शिवरात्रीला

ही सारी तर तुझीच लीला

*

 अभिषेक करते, बेल वाहते

व्रत, उपासना, आरती करते

*

 शिवशंभो कर रक्षण आता

तूच असशी भाग्य विधाता!

☆

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ मनामनातील वेताळ… लेख क्र. ८ ☆ श्री संदीप सुंकले (दास चैतन्य) ☆

श्री संदीप सुंकले (दास चैतन्य) 

? मनमंजुषेतून ?

☆ मनामनातील वेताळ… लेख क्र. ८ ☆ श्री संदीप सुंकले (दास चैतन्य) ☆

वेळ…

वेळ (Time) या विषयी अनेकांचे अनेक समज आणि गैरसमज आहेत. हल्ली तर लोकं वेळ मिळत नाही असे न म्हणता वेळ भेटतं नाही असे म्हणताना पाहतो…! काही ठिकाणी ती बोलीभाषा असू शकेल, पण ते खरे बोलतात असे मला आता वाटायला लागले आहे… , कारण लोकांना अनेक गोष्टी करायला वेळ मिळत नाही, पण गर्दी मात्र सर्वत्र आहे…

वाहतुकीच्या माध्यमांमध्ये प्रचंड वैविध्य आणि प्रगती झालेली असताना, दोन शहरांमधील अंतर कमी झालेले नसले तरी या माध्यमांमुळे प्रवासाचा वेळ नक्कीच कमी झाला आहे…

तरीही लोकांना एकमेकांकडे जायला, भेटायला, बोलायला, आपुलकीने चौकशी करायला, शिळोप्याच्या गप्पा मारायला वेळ नाही…

आज इतकी भयानक परिस्थिती आहे की कित्येक दिवसांत लोकांनी आपल्या शेजाऱ्याचे तोंड पाहिलेले नाही… , कित्येक दिवसांत मनुष्य आपल्या प्रियजनांना भेटलेला नाही, कित्येक दिवसांत त्याने मित्रांसोबत टपरीवर किंवा एकमेकांच्या घरी जाऊन चहा प्यायलेला नाही, अशा अनेक न केलेल्या गोष्टी आपल्याला आता आठवतील… , हो न? हातात फोन आहे, म्हणून मनुष्याने दूरच्या माणसांची सोडून देऊ, शेजारच्या माणसाची चौकशी केली आहे असे म्हणणे आता धाडसाचे ठरू शकेल…

पटतंय ना?

पूर्वी आळीमध्ये, चाळींमध्ये गप्पांचे फड पडायचे, मग एकेकाच्या घरातील लाडू, चिवडाचे, पोह्याचे डबे रिकामे व्हायचे, इकडे डबे रिक्कामे होत असताना, तिकडे माणसांची मने मात्र भरून पावायची… , माणसांना माणसांचा उबदार सहवास लाभायचा… , यातून मनुष्याच्या मनात असलेल्या अनेक गोष्टींचा, तणांचा आणि तणावांचा कळतनकळत निचरा व्हायचा…!

– – कारण… तेव्हा वेळ मिळत होता असे नाही, तर लोकं एकमेकांसाठी वेळ काढत होती… , त्यांना माणुसकीतील आनंद अत्यावश्यक वाटतं होता…

… आज लोकं वस्तू, त्यांचा संग्रह आणि त्याची जाहिरात करण्यात आनंद मानत आहेत… , असो…!!

आज आपल्या लक्षात येत आहे की मनुष्य, त्याने स्वतःच निर्माण केलेल्या जीवघेण्या स्पर्धेच्या चक्रव्यूहात आणि वेळेच्या कचाट्यात अडकत चालला आहे… , तो इतका अडकला आहे की तो आता फक्त घडाळ्याच्या काट्याप्रमाणे नुसता पळत चालला आहे… , त्याने जगायचे कधीच सोडून दिले आहे…

अनेकांची वेळ साधता साधता मनुष्य त्याच्यासाठी, खऱ्या स्वार्थासाठी, वेळ काढणे विसरून गेला आहे…

.. बरेच दिवसांत त्याने सूर्योदय पाहिलेला नाही…

.. द्वितीयेच्या चंद्राची कोर पाहिलेली नाही…

.. लेकराला कुशीत घेऊन चांदोमामा दाखवलेला नाही…

.. पतीचा किंवा पत्नीचा हात हातात घेऊन मूक संवाद साधलेला नाही…

.. आईच्या कृश झालेल्या मांडीवर डोके ठेवलेलं नाही…

.. बाबा, तुम्ही खूप कष्ट केलेत आता तुम्हाला हवे ते करा असे म्हटलेले नाही…

कारण…

कारण.. वेळ नाही..

या वेताळाला वेळीच आवर घालून आपण आपल्या प्रियजनांसाठी वेळ काढू…

चालेल ना?

– लेख क्र. ८

© श्री संदीप सुंकले (दासचैतन्य)

मो. 8380019676

 ≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – ११ ☆ डॉ. शोभना आगाशे ☆

डॉ. शोभना आगाशे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – ११ ☆ डॉ. शोभना आगाशे ☆

श्री रविंद्रनाथ टागोर  

विस्तीर्ण, ओसाड माळावरचे सप्तपर्णीचे दोन प्रचंड वृक्ष पाहून रविंद्रनाथांच्या वडिलांनी तो माळ विकत घेतला व तिथे ‘शांतिनिकेतन’ नावाची छोटीशी बंगली बांधली. तिथे ते दोघे, रविंद्रनाथ व त्यांचे वडिल राहू लागले. वडिलांबरोबर रविंद्रनाथांनी हिमालयात भ्रमंती केली. या तीन महिन्यांच्या प्रवासात ते त्यांच्याकडून खूप कांही शिकले. शाळेच्या भिंतींतून मुक्तता झाल्यानंतरच शिक्षणातील आनंद त्यांना गवसला. आणि शांतिनिकेतन च्या निर्मितीचं बीज त्यांच्या मनात रुजले.

शाळा सुरू करण्यासाठी ते १९०१ साली पत्नी व दोन मुलांसह शांतिनिकेतनात आले. तिथला शाळेचा व कुटुंबाचा खर्च भागविण्यासाठी त्यानी; जग्गनाथपुरीच्या समुद्रकिनाऱ्यावर मोठ्या हौसेने बांधलेला बंगला विकून टाकला. त्यांच्या पत्नीने आपले सर्व दागिने विकले.

निसर्गाला गुरू मानून, मुलांच्या मनातलं कुतूहल जिवंत ठेऊन, मुलांना समजणाऱ्या भाषेतून, त्यांच्या ओळखीच्या, आवडणाऱ्या प्रसंगवर्णनातून दिलेलं शिक्षण जास्त उपयुक्त ठरेल याबद्दल गुरूदेवांना खात्री होती. त्यासाठी त्यांनी स्वतः पाठ्यपुस्तके लिहिली. त्यांनी लिहिलेले ‘सहज पाठ’ आजही प. बंगालमधील शाळांत शिकविले जातात.

‘साधन’ असणाऱ्या पुस्तकांना ‘साध्य’ मानणाऱ्या परिक्षा पद्धतीचा त्यांना तिटकारा होता. त्यांच्या मते बुद्धीचा विकास म्हणजे कल्पनाशक्ती, सर्जनशील मुक्त विचार व जिज्ञासा यांचा विकास!

विद्यार्थ्यांना विषय निवडीचे स्वातंत्र्य असले पाहिजे यावर ते ठाम होते. एखादी व्यक्ती व्यावसायिक शिक्षण किंवा बौद्धिक शिक्षण किंवा मानवता केंद्रित शिक्षण निवडेल किंवा कुणी एखादा ब्रह्मचर्य पाळून आत्मसाक्षात्कार, व्यक्तित्वाचा व चारित्र्याचा विकास हे उद्देश ठेऊ शकतो. यासाठी त्यांनी ब्रह्मचर्य आश्रम सुरू केले होते. निरोगी शरीराचे महत्त्व ओळखून योग, खेळ यांचे शिक्षण अनिवार्य हवे अशी त्यांची धारणा होती.

अध्यापन वास्तविक व व्यावहारिक असले पाहिजे; कृत्रिम आणि सैद्धांतिक नको, यावर त्यांचा भर होता. टागोरांच्या मते, व्यक्ती स्वतःला मातृभाषेत जास्त चांगल्या प्रकारे व्यक्त करू शकते व योग्यरित्या संवाद साधू शकते. म्हणून त्यांनी शिक्षणाचे माध्यम म्हणून मातृभाषेवर जास्त भर दिला आहे.

ग्रामीण लोकांच्या गरिबीची चिंता त्यांना होती. शिक्षणाद्वारे गरिबी दूर झाली पाहिजे. त्यासाठी त्यांच्याशी संबंधित क्षेत्रातील विषयात त्यांना व्यावसायिक प्रशिक्षण दिले तर ते कुशल कारागीर बनू शकतात. याचसाठी त्यांनी श्रीनिकेतन ही संशोधन व प्रशिक्षण संस्था सुरू केली.

—–

☆ गीत : ३१ ☆

“PRISONER, tell me, who was it that bound you? ” 

“It was my master, ” said the prisoner‌. I thought I could outdo everybody in the world in wealth and power, and I amassed in 

my own treasure-house the money due to my king. When sleep overcame me I lay upon the bed that was for my lord, and on waking up I found I was a prisoner in my own treasure-house. “

“Prisoner, tell me who was it that wrought this unbreakable chain? ” 

“It was I, ” said the prisoner, “who forged this chain very carefully. I thought my invincible power would hold the world captive leaving me in a freedom undisturbed. Thus night and day I worked at the chain with huge fires and cruel hard strokes. When at last the work was done and the links were complete and gunbreakable, I found that it held me in its grip. “

—– 

☆ मराठी भावानुवाद : गीत ३१ ☆

संपत्तीने मिळवीन सत्ता

सत्ता देईल आणिक मत्ता

दुनिया होईल गुलाम माझी

हीच कल्पना सदैव चित्ता॥

*

याचसाठी झटलो रात्रंदिनी

वन्ही तापवुनि, घाव घालुनि

अभेद्य केल्या मीच साखळ्या

लोह कड्या चातुर्ये गुंफुनि॥

*

स्वतःसाठी तिजोरी भरता

इतरांसाठी बंध निर्मिता

दमुनि निजलो, स्वप्नी रमलो

हताश झालो, जागा होता॥

*

मनाजोगती करुनि व्यवस्था

अशी कशी हो माझी अवस्था

साखळदंडा मीच निर्मिले

बंधक झालो मीच सर्वथा॥

*

मूढ असे मी, फिरली मती

तुझीच सत्ता या देहावरती

ऐहिक माया ती क्षणभंगुर 

हे रघुराया, तूच निरंतर॥

☆

भावानुवाद © शोभना आगाशे

संपर्क: ९८५०२२८६५८

—– 

☆ गीत ३२ ☆

BY all means they try to hold me secure who love me in this world. But it is otherwise 

with thy love which is greater than theirs, and thou keepest me free.

Lest I forget them they never venture to leave me alone. But day passes by after day and thou art not seen.

If I call not thee in my prayers, if I keep not thee in my heart, thy love for me still waits for my love.

—– 

☆ मराठी भावानुवाद : गीत ३२ ☆

*

जे जे प्रेम मजवरी करिती

जखडून देती मज त्या प्रीती 

*

सावली सम येती मागुनी

भय हे जाईन मी विसरुनी

*

तुझी प्रीत त्याहुनि मोठी

मुक्त ठेविसी मज जगजेठी

*

मी नच करिते तुझी प्रार्थना

हृदयी माझ्या तुझी मूर्त ना

*

वाट पाहते प्रेम तुझे परी

जागेल का मम प्रीत हरी

☆

भावानुवाद © शोभना आगाशे

संपर्क: ९४५०२२८६५८

—– 

☆ गीत ३३ ☆

WHEN it was day, they came into my house and said, “We shall only take the smallest room here. ” 

They said, “We shall help you in the worship of your God and humbly accept only our own share of his grace”; and then they took their seat in a corner and they sat quiet and meek.

But in the darkness of night I find they break into my sacred shrine, strong and turbulent, and snatch with unholy greed the offerings from God’s altar.

—– 

☆ मराठी भावानुवाद : गीत ३३ ☆

☆

गरिबाच्या वेशात अतिथी आला

रात्रीपुरती थोडी जागा दे म्हणाला

*

तुझ्याबरोबर मी ही देवासमोर बसेन

प्रार्थनेचे फळ तुलाच द्यायला सांगेन

*

धन्य झालो मी उच्च विचार ऐकून

शांत झोपलो, शेजेला पाठ टेकून

*

रात्र होताच त्याची मती फिरली

आणि वासना उफाळून आली

*

देवाला वाहिलेली दाने सारी

ओढून झाली पसार स्वारी

*

कशी पोचेल प्रार्थना कुणाची

विवेकावर जर सत्ता षड्रिपूंची

☆

– क्रमशः भाग ११.

*

मूळ इंग्लिश काव्य : श्री. रविंद्रनाथ टागोर.

भावानुवाद : कवयित्री : © शोभना आगाशे

सांगली 

दूरभाष क्र. ९८५०२२८६५८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १३७ – बुन्देली कविता – “बुन्देली में प्रान बसत हैं ” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “बुन्देली में प्रान बसत हैं “।) 

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १३७ – बुन्देली कविता – बुन्देली में प्रान बसत हैं ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

गैल-गैल में ठग री गुँइयाँ

सबइ बोल रय लबरी गुँइयाँ

विथा कौन खें सुना रई है

जा दुनिया है बहरी गुँइयाँ

जाने का अनहोनी होने

रोउत कुतिया कबरी गुँइयाँ

रात दुखों की बीत रई है

भव भुनसारो जग री गुँइयाँ

भरी भक्ति रस सें मीरा नें

छलक रई है गगरी गुँइयाँ

बुन्देली में प्रान बसत हैं

छन्द-गन्ध है बगरी गुँइयाँ

‘भगवत ‘ नाम सुमर ने पायी

राम नाम अब जप री गुँइयाँ

☆

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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