हिन्दी साहित्य- पितृ पक्ष विशेष – कथा-कहानी – लघुकथा – ☆ पितर चले गये ☆ – डॉ . प्रदीप शशांक

डॉ . प्रदीप शशांक 

 

(डॉ प्रदीप शशांक जी द्वारा 16 वर्ष पूर्व लिखी गई लघुकथा “पितर चले गये ” आज भी सामयिक लगती  है.)

 

☆ लघुकथा – पितर चले गये  ☆

 

कौआ सुबह सुबह एक छत से दूसरी छत पर कांव कांव करता हुआ उड़ उड़ कर बैठ रहा था किंतु उसे आज कुछ भी खाने को नहीं मिल रहा था ।

कल ही पितृ मोक्ष अमावस्या के साथ पितृ पक्ष समाप्त हो गए । इन पन्द्रह दिनों में कौओं को भरपेट हलुआ पूड़ी एवम तरह तरह के पकवान खाने को मिले थे । इसी आस में आज भी कौआ इस छत से उस छत पर भटक रहा था ।

थक हार कर वह एक छत की मुंडेर पर बैठ गया । उसे महसूस हो गया था कि पितर चले गए हैं ।अतः वह पुनः कचरे के ढेर में अपना भोजन तलाशने उड़ गया ।

 

© डॉ . प्रदीप शशांक 
37/9 श्रीकृष्णपुरम इको सिटी, श्री राम इंजीनियरिंग कॉलेज के पास, कटंगी रोड, माढ़ोताल, जबलपुर ,मध्य प्रदेश – 482002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 10 – अहंकार दहन ☆ – श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

 

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है   “अहंकार दहन”।)

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 9 ☆

 

☆ अहंकार दहन ☆

 

राहु और केतु राहु हिन्दू ज्योतिष के अनुसार असुर स्वरभानु का कटा हुआ सिर है, जो ग्रहण के समय सूर्य और चंद्रमा का ग्रहण करता है । इसे कलात्मक रूप में बिना धड़ वाले सर्प के रूप में दिखाया जाता है, जो रथ पर आरूढ़ है और रथ आठ श्याम वर्णी घोड़ों द्वारा खींचा जा रहा है । वैदिक ज्योतिष के अनुसार राहु को नवग्रह में एक स्थान दिया गया है । दिन में राहुकाल नामक मुहूर्त (24 मिनट) की अवधि होती है जो अशुभ मानी जाती है । समुद्र मंथन के समय स्वरभानु नामक एक असुर ने धोखे से दिव्य अमृत की कुछ बूंदें पी ली थीं । सूर्य और चंद्र ने उसे पहचान लिया और मोहिनी अवतार में भगवान विष्णु को बता दिया । इससे पहले कि अमृत उसके गले से नीचे उतरता, विष्णु जी ने उसका गला सुदर्शन चक्र से काट कर अलग कर दिया । परंतु तब तक उसका सिर अमर हो चुका था । यही सिर राहु और धड़ केतु ग्रह बना और सूर्य- चंद्रमा से इसी कारण द्वेष रखता है । इसी द्वेष के चलते वह सूर्य और चंद्र को ग्रहण करने का प्रयास करता है । ग्रहण करने के पश्चात सूर्य राहु से और चंद्र केतु से, उसके कटे गले से निकल आते हैं और मुक्त हो जाते हैं ।

केतु भारतीय ज्योतिष में उतरती लूनर नोड को दिया गया नाम है । केतु एक रूप में स्वरभानु नामक असुर के सिर का धड़ है । यह सिर समुद्र मन्थन के समय मोहिनी अवतार रूपी भगवान विष्णु ने काट दिया था । यह एक छाया ग्रह है । माना जाता है कि इसका मानव जीवन एवं पूरी सृष्टि पर अत्यधिक प्रभाव रहता है । कुछ मनुष्यों के लिये यह ग्रह ख्याति दिलाने में अत्यंत सहायक रहता है । केतु को प्रायः सिर पर कोई रत्न या तारा लिये हुए दिखाया जाता है, जिससे रहस्यमयी प्रकाश निकल रहा होता है । भारतीय ज्योतिष के अनुसार राहु और केतु, सूर्य एवं चंद्र के परिक्रमा पथों के आपस में काटने के दो बिन्दुओं के द्योतक हैं जो पृथ्वी के सापेक्ष एक दुसरे के उलटी दिशा में (180 डिग्री पर) स्थित रहते हैं । चुकी ये ग्रह कोई खगोलीय पिंड नहीं हैं, इन्हें छाया ग्रह कहा जाता है । सूर्य और चंद्र के ब्रह्मांड में अपने-अपने पथ पर चलने के कारण ही राहु और केतु की स्थिति भी साथ-साथ बदलती रहती है । तभी, पूर्णिमा के समय यदि चाँद केतु (अथवा राहू) बिंदु पर भी रहे तो पृथ्वी की छाया पड़ने से चंद्र ग्रहण लगता है, क्योंकि पूर्णिमा के समय चंद्रमा और सूर्य एक दुसरे के उलटी दिशा में होते हैं । ये तथ्य इस कथा का जन्मदाता बना कि “वक्र चंद्रमा ग्रसे ना राहू”। अंग्रेज़ी या यूरोपीय विज्ञान में राहू एवं केतु को क्रमशः उत्तरी एवं दक्षिणी लूनर नोड कहते हैं । तथ्य यह है कि ग्रहण तब होता है जब सूर्य और चंद्रमा इन बिंदुओं में से एक पर सांप द्वारा सूर्य और चंद्रमा की निगलने की समझ को जन्म देता है । प्राचीन तमिल ज्योतिषीय लिपियों में, केतु को इंद्र के अवतार के रूप में माना जाता था । असुरो के साथ युद्ध के दौरान, इंद्र पराजित हो गया और एक निष्क्रिय रूप और एक सूक्ष्म राज्य केतु के रूप में ले लिया । केतु के रूप में इंद्र अपनी पिछली गलतियों, और असफलताओं को अनुभव करने के बाद भगवान शिव की आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर हो गया ।

दरअसल रावण ने सभी नौ ग्रहों के देवताओं का अपहरण कर लिया था और उन्हें लंका में ले आया था, लेकिन जल्द ही भगवान ब्रह्मा लंका आये और रावण से सभी ग्रहों को मुक्त करने का अनुरोध किया ताकि ब्रह्मांड में जीवन का चक्र प्रभावित न हो । रावण ने उन्हें एक शर्त पर मुक्त किया कि रावण प्रत्येक ग्रह की एक प्रतिलिपि बनायीं, और उन्हें बनाने के बाद उसने सभी ग्रहों के देवताओं को अपने ग्रहों की शक्तियो के सार को प्रत्येक प्रतिलिपि में प्रविष्ट करने का आदेश दिया,एक-एक करके मुख्य ग्रह के अनुसार । इसलिए सूर्य ने रावण द्वारा बनाए गए सूर्य की प्रतिलिपि में अपनी शक्तियों के सार को डाला, चंद्रमा ने रावण द्वारा बनाए गए चंद्रमा की प्रतिलिपि में अपनी शक्तियों को सम्मिलित किया आदि आदि अन्य ग्रहो ने भी किया । इसके बाद रावण ने सभी नौ ग्रहो को मुक्त कर दिया ।

तब रावण ने लंका का अपना निजी राशि चक्र बनाया जिससे लंका के प्रत्येक हिस्से पर एक ही तरह का प्रभाव पड़े और सभी प्रतिलिपि ग्रहों को रावण द्वारा परिभाषित गति के साथ आगे बढ़ने का आदेश दिया गया, इसका अर्थ है कि लंका में कभी भी कोई नुकसान या खतरा नहीं होगा किसी भी परिस्थिति में । भगवान हनुमान, रावण की शक्ति और बुद्धि से आश्चर्यचकित थे । फिर उन्होंने अपने मस्तिष्क में सोचा कि लंका को यदि कोई नुकसान पहुँचाना है, तो इन प्रतिलिपि ग्रहों को किसी भी तरह से मुक्त करना होगा । रावण भी भगवान हनुमान को लगभग एक मिनट तक देखता रहा, आखिर में उन्होंने भगवान हनुमान से कहा, “तो तुम हो वो शरारती वानर जिसने मेरे सबसे खूबसूरत बगीचे को नष्ट कर दिया और मेरे बेटे अक्षय कुमार को भी मार डाला, क्या तुम सजा के लिए तैयार हो?”

 

© आशीष कुमार  

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 7 ☆ अब कहाँ है रास्ता? ☆ – सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे

(सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य  विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं ।  वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है सौ. सुजाता काळे जी की  एक भावप्रवण कविता  ‘अब कहाँ है रास्ता?’।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 8 ☆

☆ अब कहाँ है रास्ता?☆

अमन के नाम पर झगड़े होते हैं
खून -खराबे, आगजनी, मारकाट होती है
इन्सा का इन्सा से नहीँ रहा वास्ता
अब कहाँ है रास्ता?

 

दिन में गलबाँहें डालते हैं दोस्त जो
पीठ में खंज़र वे ही चुभाते हैं
दोस्तों का दोस्तों से मिट गया है राब्ता
अब कहाँ है रास्ता?

 

आज़ाद देश में नारी पर होता अत्याचार है
मासूम सी कलियों को ये ही कुचलते हैं
नारी के जीवन की करूण है दास्ताँ
अब कहाँ है रास्ता?

 

© सौ. सुजाता काळे

पंचगनी, महाराष्ट्र।

9975577684

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मराठी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 7 ☆ डोंगर दऱ्या ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

 

(वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है. इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है. श्रीमती उर्मिला जी के    “साप्ताहिक स्तम्भ – केल्याने होतं आहे रे ”  की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  उनकी  भावप्रवण कविता  डोंगर दऱ्या.  श्रीमती उर्मिला जी  के द्वारा ग्राम्य परिवेश का शब्द चित्र अत्यंत मोहक है  एवं  नेत्रों के सम्मुख  एक सुन्दर ग्राम का सम्पूर्ण  दृश्य परिलक्षित होता है. श्रीमती उर्मिला जी  को ऐसी सुन्दर कविता के लिए हार्दिक बधाई. )

 

☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 7 ☆

 

☆ डोंगर दऱ्या ☆

 

माझ्या म्हायेरास्न आईनं सांगावा धाडला!

सुटीत पोरास्नी घिऊन ये की, महाडला !

 

आठव आली मला माज्या देखन्या गावाची !

लगबगीनं तयारी केली मी

आईकडं जान्याची !

आई म्हनं वाट वळनावळनाची  लागती तुला गाडी !

रित्यापोटी नग निगूस ,खा आवळ्याची वडी !!

 

निसर्गातल्या कुशीतलं देखनं माज गाव !

हायती धा बारा घरं आन् येकच बाव !

भातखाचरातनं चालल्यात पान्याचं पाट !

पुलाजवळ उभी -हाऊन यस्टी बगं प्यासेंजरची वाट !!

 

डोंगरदऱ्यातंन व्हात्यात

झुळुझुळू झरं. !

साऱ्या रस्त्यानं कोसळत्यात धबाबा धबधबं !!

ल ई छान रंगीबेरंगी फूलपाखरांचं थवं !

थुईथुई नाचत्यात मोर फुलवून सुंदर पिसारं !!

 

डोंगरघाटातनं गेल्याव दिसं  रांगड गाव छान !

हिरवंहिरवं गालिचे अन् पाचूचं रान !

गोठ्यात शेपूट हालवीत बघं

देखनी कपिला गाय !

हाती भाकरतुकडा घिऊन दारी हुबी माजी माय !!

 

©® उर्मिला इंगळे, सातारा

!! श्रीकृष्णार्पणमस्तु !!

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 17 ☆ औरत धूर्त और खतरनाक नहीं – एंजेलीना ☆ – डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से आप  प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है  डॉ मुक्ता जी  का  आलेख “औरत धूर्त और खतरनाक नहीं – एंजेलीना”.  डॉ . मुक्ता जी ने इस आलेख के माध्यम से  यू• एन• एच• सी• आर• की गुडविल एंबेसेडर हॉलीवुड अभिनेत्री  एंजेलीना के कथन को व्यापक विस्तार दिया है और नारी के सम्मान एवं अधिकारों के प्रति समाज में सजगता का सन्देश दिया है. साथ ही वे कदापि नहीं मानती  कि पुरुषों एवं बच्चों  के खिलाफ अपराध को किसी भी तौर से कमतर आँका जाये. उन्होंने  इस विषय पर अपनी बेबाक राय रखी है। अब आप स्वयं पढ़ कर आत्म मंथन करें  कि – हम इस दिशा में क्या कर सकते हैं?  आदरणीया डॉ मुक्ता जी  का आभार एवं उनकी कलम को इस पहल के लिए नमन।) 

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य – # 17 ☆

 

☆ औरत धूर्त और खतरनाक नहीं – एंजेलीना ☆

 

हॉलीवुड की अभिनेत्री एंजेलीना का यह कथन समाज के तथाकथित सफेदपोश लोगों को कटघरे में खड़ा कर देता है, जो अपने अधिकार छीने जाने पर आवाज़ दबाने को तैयार नहीं. वे ऐसी महिलाओं के पक्षधर नहीं हैं। परंतु एंजेलिना उस अवधारणा को बदलने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहती हैं, “जो अन्याय से थक चुकी महिलाओं को ‘अस्वाभाविक और खतरनाक’ बताते हैं… समाज में निर्मित नियमों के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाली महिलाओं को असामान्य करार देते हुए, उनके लिए ‘अजीब, चरित्रहीन और खतरनाक’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं।”

आधुनिक युग में ऐसी सोच पर कायम रहना लज्जा-स्पद है। यू• एन• एच• सी• आर• की गुडविल एंबेसेडर अभिनेत्री ने कहा कि – “उनके इस आलेख का मतलब पुरुषों व बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराध को कमतर आंकना नहीं है।”

आश्चर्य होता है यह देख कर कि 21वीं सदी में भी ऐसी मानसिकता हावी है। समान अधिकारों व अन्याय के विरुद्ध मांग उठाने वाली महिलाओं को अस्वाभाविक व असामान्य करार करना,उन्हें विचित्र, चरित्रहीन, धूर्त व खतरनाक कहना…क्या यह महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं है? क्या गीता का संदेश त्याज्य है ‘यदि अधिकार मांगने से न मिले तो उसे छीन लेना श्रेयस्कर है’…अपराध नहीं है? क्या ऐसी नकारात्मक पुरुष मानसिकता को स्वीकारना अनिवार्य है?

शायद नहीं…संसार के प्रत्येक जीव को अपने ढंग से जीने का अधिकार है। यदि परिस्थितियां उसके प्रतिकूल हैं, तो उनका विरोध न करने वाले मनुष्य को आप क्या कहेंगे… शायद ज़िन्दा लाश…क्योंकि जिस इंसान में आत्मसम्मान,स्वाभिमान व अधिकारों के प्रति सजगता नहीं है, वह अस्तित्वहीन है,त्याज्य है।

हाँ !अधिकार व कर्त्तव्य अन्योन्याश्रित हैं। एक का अधिकार दूसरे का कर्त्तव्य है। सो! आवश्यकता है दायित्व-वहन की, एक-दूसरे के प्रति प्यार,सम्मान व समर्पण की… जिसकी अनुपालना दोनों के लिए आवश्यक है।

स्त्री व पुरुष गाड़ी के दो पहिए हैं। यदि एक कमज़ोर होगा, तो दूसरे की गति स्वतः धीमी पड़ जाएगी।

दूसरे शब्दों में समाज की उन्नति के लिए तालमेल व सामंजस्य आवश्यक है अन्यथा समाज में मासूमों की भावनाओं पर कुठाराघात होता रहेगा और लूट- खसोट, दुष्कर्म व हत्या के मामले बढ़ते रहेंगे, इनकी संख्या में निरंतर इज़ाफा होता रहेगा…चहुं ओर अव्यवस्था का साम्राज्य बना रहेगा।

सो!इसके लिये आवश्यकता है…नारी की भावनाओं, सोच व दृष्टिकोण को अहमियत देने की, उसके द्वारा समाज हित में किए गए योगदान व उसकी प्रति- भागिता अंकित करने की… यह तभी संभव हो पायेगा, जब वर्षों से प्रचलित रूढ़ियों, अंधविश्वासों व दकियानूसी मान्यताओं द्वारा दासता की ज़ंजीरों से मुक्त करवा पाना संभव होगा…उसे दोयम दर्जे का न स्वीकार कर, मात्र कठपुतली नहीं, संवेदनशील समाज के विशिष्ट अंग के रूप में स्वीकारेगा। यदि हम समाज को उन्नत करना चाहते हैं, तो हमें नारी को मात्र भोग्या व उपयोगिता की वस्तु नहीं, समाज के अभिन्न अंग के रूप में  स्वीकारना होगा। जैसाकि सर्वविदित है कि एक सुशिक्षित बालिका दो घरों को सुव्यवस्थित करती है, आगामी पीढ़ी को सुसंस्कृत करने में संस्कारित करती है और समाज को एक नई दिशा प्रदान करती है।

बच्चे,सुखद परिवार की सुदृढ़ नींव होते हैं और माता -पिता की अनमोल विरासत व अभिन्न दौलत।अर्थात् जिनके बच्चे शिक्षित ही नहीं, सुसंस्कारित व शालीन होते हैं, मर्यादा का अतिक्रमण नहीं करते…वे माता-  पिता संसार में सबसे अधिक सौभाग्यशाली व निर्धन हो कर भी सबसे अधिक धनी होते हैं।

चलिए!विचार करते हैं इसके मुख्य उपादान पर। ..यदि आप अपनी पत्नी की भावनाओं का सम्मान कर, उसे बराबर का दर्जा देते हैं, उसका तिरस्कार नहीं करते, उसके त्याग व योगदान की सराहना करते हैं… सामाजिक विषमता, विश्रृंखलता व विसंगतियों का विरोध करने पर, दाहिने हाथ की भांति उसके साथ खड़े रहते हैं…उसकी भावनाओं का तिरस्कार कर, उसे अपमानित नहीं करते तो आप एक-दूसरे के प्रतिपूरक हैं, एक महत्वपूर्ण कड़ी है तथा आप परिवार व समाज को उन्नत व समृद्ध  बना सकते हैं।

स्मरण होंगे.. आपको अंग्रेज़ी के यह मुहावरे ‘चैरिटी बिगिंस एट होम और ‘निप दी इविल इन दी बड ‘ अर्थात् घर से ही प्रारंभ होती, बुराई को प्रारंभ में ही दबा देना चाहिए अन्यथा वह कुत्तों की तरह समाज को दूषित कर देगी स्वस्थ समाज की शांति को लील जाएगी। महिलाओं को सम्मान व समान दर्जा देना, उसकी सद्भावनाओं व सत्कर्मों का बखान करना… आगामी पीढ़ी को सुसंस्कारों से सिंचित कर सकता है। हां! आवश्यकता है उसके बढ़ते कदमों को व यथोचित योगदान को देख सराहना करना। यदि वह उसे अपनी जीवनसंगिनी, हमसफ़र व शरीक़ेहयात समझ उससे शालीनता से व्यवहार करेगा तो वह यह सबके हित में होगा अन्यथा समाज से आतंक व अराजकता का शमन कभी नहीं होगा…समाज में सदैव भय, डर व आशंका का माहौल बना रहेगा… समाज में फैली कुरीतियों-दुष्प्रवृत्तियों का अंत नहीं कभी सम्भव नहीं होगा। राम राज्य की स्थापना का स्वप्न व समन्वय-सामंजस्य का स्वप्न कभी साकार नहीं होगा। शायद यह  कपोल-कल्पना बनकर रह जाएगी। आइए! हम सब इस यज्ञ में अहम् की समिधा डालें क्योंकि अहम द्वंद्व व संघर्ष का जनक है, जिसका परिणाम हम परिवारों में माता-पिता के अलगाव के रूप में तथा बच्चों को एकांत की त्रासदी से जूझते हुए एकाकीपन के रूप में देखते हैं। संयुक्त परिवार व्यवस्था के टूटने पर वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या, महिलाओं की असामाजिक कृत्यों में प्रतिभागिता, फ़िरौती, हत्या आदि संगीन जुर्मों में लिप्तता हमारी नकारात्मक सोच को उजागर करती है। आइए!हम सब स्वस्थ समाज की संरचना में  योगदान दें,जहां सब को यथोचित सम्मान मिल पाये। अंत में मैं यही कहना चाहूंगी कि अधिकारों की मांग करना, न मिलने पर प्रतिरोध कर बग़ावत का झंडा उठाना,अन्याय को सहन करने की प्रतिबद्धता को नकारना, महिलाओं के चरित्र का प्रमाण-पत्र नहीं है और न ही ऐसी महिलाओं का,जो समाज में व्याप्त अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाती हैं…उन्हें अस्वाभाविक व  खतरनाक समझने का कोई औचित्य है। इस लाइलाज रोग से निज़ात पाने का एकमात्र उपाय है…समाज की सोच को परिवर्तित कर, नारी को दोयम दर्जे का न समझ, समानता का दर्जा प्रदान किया जाये। शायद!इसके परिणाम- स्वरूप लोगों की दूषित मानसिकता में परिवर्तन हो जाये।

 

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 15 ☆ अक्सर ☆ – डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची ‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। उनके  “साप्ताहिक स्तम्भ  -साहित्य निकुंज”के  माध्यम से आप प्रत्येक शुक्रवार को डॉ भावना जी के साहित्य से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है डॉ. भावना शुक्ल जी की एक  प्रेरणास्पद एवं भावप्रवण कविता  “अक्सर ”। ) 

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – # 15  साहित्य निकुंज ☆

 

☆ अक्सर ☆

 

अपने ही दिखाते है

सपना

और अपने ही देते हैं धोखा

अक्सर।

 

वक्त देती है

तरह तरह के इम्तिहान

सिखाती है जंग

अक्सर।

 

टूटे हुए अहसास

मिलता है जख्म

दे जाते है सीख

अक्सर।

 

मुश्किलों का तूफान

डराने का

करें प्रयत्न

कोशिश होती विफल

अक्सर।

 

मंजिल की करतें है तलाश

करते रहेंगे प्रयत्न

जीवन में

मानेंगे नहीं हार

अक्सर।

 

असफलता ही

दिलाती सफलता

मिलती है प्रेरणा

अक्सर।

 

© डॉ भावना शुक्ल
सहसंपादक…प्राची

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 3 ☆ जब होता जीवन का अस्त ☆ – श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

 

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष”  की अगली कड़ी में प्रस्तुत है उनकी रचना  “जब होता जीवन का अस्त ” . अब आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार पढ़ सकेंगे . ) 

 

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 3 ☆

☆  जब होता जीवन का अस्त ☆

 

राम नाम कहते हैं सत्य,

जब होता जीवन का अस्त।

 

जीवन अहंकार में जीते।

अंतिम समय छोड़ सब रीते।

लोभ-मोह,आसक्ति न छोड़ा।

सदा सत्य से मुँह को मोड़ा।।

 

ढली उमरिया साँसें पस्त…….जब होता

 

झूठ बोल कर माया जोड़ी।

साथ गई न फूटी कौड़ी।।

रिश्ते-नाते रखे ताक पर।

अहम् झूलता रहा नाक पर।।

 

बीमारी से तन-मन ग्रस्त……जब होता

 

दान-धरम का ध्यान नहीं था।

अपनों का भी मान नहीं था।।

पल-छिन डूबे रहे स्वार्थ में।

लिप्त वासनाएँ यथार्थ में।।

 

चूर नशे में हैं अलमस्त… जब होता

 

धर्म आचरण नहीं निभाते।

अंत समय सब खेद जताते।।

पंडित आ कर गीता पढ़ता।

जबरन खुद ही मन को भरता ।

 

शिखर सत्य के सारे ध्वस्त…..जब होता

 

आंखे जब होती हैं बंद।

याद तभी आते छल-छंद।।

रखते गर मन में “संतोष”

यह जीवन रहता निर्दोष।।

 

मिट जाते दुख,पाप समस्त…..जब होता

 

राम नाम कहते हैं सत्य  ।

जब होता जीवन का अस्त ।।

 

© संतोष नेमा “संतोष”

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मोबा 9300101799

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मराठी साहित्य – समाजपारावरून साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ पुष्प सोळावे # 16 ☆ वेड सेल्फीचे ☆ – कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते

 

(समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन “माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक,  सांस्कृतिक  एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं ।  इस साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से वे किसी न किसी सामाजिक  अव्यवस्था के बारे में चर्चा करते हैं एवं हमें उसके निदान के लिए भी प्रेरित करते हैं।  आज श्री विजय जी ने एक गंभीर विषय “सेल्फी” चुना है।  श्री विजय जी ने  इस आलेख  “वेड सेल्फीचे ” में सेल्फी के कारण होने वाली मृत्यु जैसे गंभीर मुद्दे पर चर्चा की है।  ऐसे ही  गंभीर विषयों पर आप प्रत्येक शुक्रवार को उनके मानवीय संवेदना के सकारात्मक साहित्य को पढ़ सकेंगे।  )

 

☆ साप्ताहिक स्तंभ –समाज पारावरून – पुष्प सोळावे # 16 ☆

 

☆ वेड सेल्फीचे ☆

 

बाह्य रूप छायांकन

सुंदरता चित्रांकन

भारवाही…. !

 

छबी काढण्यात

सान थोर मोहावले

झणी वेडावले

सेल्फीपायी…. !

या सेल्फीपायी मृत्युमुखी  पडलेले  अनेक व्यक्ती  त्यांची उदाहरणे समोर असताना हे सेल्फीचे वेड काही कमी होत नाही.  अजूनही सेल्फी  काढताना झालेल्या अपघातात भारतचआघाडीवर आहे. हा आधुनिक तंत्रज्ञान अवलंबिण्याचा अतिरेक  आहे असे मला वाटते. समाज पारावरून हा विषय चर्चेला येतो आहे याचे कारण हे सेल्फी वेड एक गंभीर समस्या निर्माण करीत आहे.  आत्मकेंद्रित माणसाची मानसिक विकृती म्हणून याचे वर्णन करता येईल.

वेड सेल्फीचे

करी मानव्याचा र्‍हास

जाणिवांचा श्वास

रोखलेला…. !

 

सेल्फी काढताना

कधी बेते जीवावर

पडे कलेवर

क्षणार्धात…. !

अतीउत्साहात भावनावश होऊन सेल्फी काढण्याचा मोह होतो. आणि हाचअतिरेक  जीवावर बेततो.  एका क्षणात  आपण सारे जग विसरून सेल्फी साठी नको ते धाडस करायला तयार होतो  आणि आपला जीव गमावून बसतो.

महाविद्यालयीन  तरुण – तरुणी  सेल्फीसाठी जास्त  आकर्षित होत आहेत.  कारण सुंदरता आणि बडेजाव यांची  एकमेकात असलेली स्पर्धा आणि याचे प्रतिनिधीत्व  आपण किती छान करू नकतो यांचे  सचित्र  छायांकन म्हणजे आजचं *सेल्फी वेड*.

फेसबुकी रोज

सोशल नेटवर्किंग नारा

प्रसिद्धीचा मारा

पदोपदी…. !

 

वेड सेल्फीचे

करी खंडित संवाद

द्वेषवाही वाद

नात्यातून…. !

नात्या नात्यातील संवाद कमी होत चालला आहे.   हा  मानसिक आजार नाही. पण विकृती आहे.  धोका लक्षात घेऊनही आपण दाखवलेला निष्काळजी पणा  आपले संपूर्ण  आयुष्य बरबाद करू शकतो.  अशा मोहापायी जीव गेला तर सुटका झाली  असे म्हणून समाधान मानावे लागते. पण जर  अपघात होऊन अपंगत्व आले तर मात्र त्याचे दुष्परिणाम त्या व्यक्तीसह संपूर्ण कुटुंबाला भोगावे लागतात.

हात मदतीचा

सेल्फी काढण्यात चूर

अपघाती पूर

आसवांचा…. !

जीव धोक्यात घालुन सेल्फी घेणे,  सोशल नेटवर्किंग साईट वर  आपल्या धाडसी पणाचे शक्तीप्रदर्शन  करणे, ही विकृती आपण थांबवायला हवी.. अशा  विचित्र सेल्फी ना  आपण डिसलाईक करायला हवे.  उलटा अंगठा दाखवून  अशा सेल्फी छायाचित्रांचा विरोध केल्याशिवाय हे वेड थांबणार नाही.

लहान मुले, अबालवृध्द, तरूण पिढी  असे  धाडसी फोटो घेण्यासाठी मुद्दाम ट्रेकिंग सहलीचे आयोजन करीत आहे.  गड किल्ले,  ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, प्राचीन नैसर्गिक पर्यटन स्थळे यांना भेटी देणे केव्हाही चांगले. पण ही भेट  ज्ञानवर्धक न ठरता पौढी मिरवणारी स्तुतीसंवर्धक भेट ठरत आहे. हे कुठेतरी थांबायला हवे.

सेल्फी काढण्याची हौस समस्या प्रधान होऊ नये यासाठी केवळ  मी माझे विचार पोटतिडकिने मांडतो आहे.  कारण कोणते ही सण, उत्सव, वाढदिवस निमित्ताने गेट टूर गेदर  आयोजित केले जाते.  आणि हे सेल्फी सेल्फी प्रदर्शन सुरू होते.  असतं. एरवी  एकाच घरात याहूनही  एकमेकांशी दिवस दिवस संवाद न साधण्या-या व्यक्ती सेल्फीत मात्र प्रसन्न, हसतमुख चेहर्‍याने,  एकमेकाच्या गळ्यात गळा घालून कौटुंबिक स्नेहाचे प्रदर्शन करतात. याने आपण स्वतः आपल्याला  बेगडी दुनियेचे झापड लावून घेतो असे मला वाटते.

अत्यंक धोकादायक ठिकाणी जावुन सेल्फी काढणे हे  अशा सहलींचे मुख्य आकर्षण. त्याशिवाय यांचे एकत्रिकरण अशक्य. तेव्हा सेल्फी वेड हे कुणी कसे जोपासायचे हा  वैयक्तिक प्रश्न  असला तरी यातून मनुष्य हानी होऊ नये  आणि या हव्यासाला समाजविघातक वळण लागू नये, इतकीच माझी प्रामाणिक  इच्छा आहे. धन्यवाद.

 

© विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798.

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक के व्यंग्य – # 15 ☆ ये सड़कें ये पुल मेरे हैं ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक के व्यंग्य”  में हम श्री विवेक जी के चुनिन्दा व्यंग्य आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं. अब आप प्रत्येक गुरुवार को श्री विवेक जी के चुनिन्दा व्यंग्यों को “विवेक के व्यंग्य “ शीर्षक के अंतर्गत पढ़ सकेंगे.  आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का व्यंग्य “ये सड़कें ये पुल मेरे हैं”.  धन्यवाद विवेक जी , मुझे भी अपना इन्वेस्टमेंट याद दिलाने के लिए. बतौर वरिष्ठ नागरिक, हम वरिष्ठ नागरिकों ने अपने जीवन की कमाई का कितना प्रतिशत बतौर टैक्स देश को दिया है ,कभी गणना ही नहीं की.  किन्तु, जीवन के इस पड़ाव पर जब पलट कर देखते हैं तो लगता है कि-  क्या पेंशन पर भी टैक्स लेना उचित है ?  ये सड़कें ये पुल  विरासत में देने के बाद भी? बहरहाल ,आपने बेहद खूबसूरत अंदाज में  वो सब बयां कर दिया जिस पर हमें गर्व होना चाहिए. )

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक के व्यंग्य – # 15 ☆ 

 

 ☆ ये सड़कें ये पुल मेरे हैं ☆

 

रेल के डिब्बे के दरवाजो के ऊपर लिखा उद्घोष वाक्य  “सरकारी संपत्ति आपकी अपनी है”, का अर्थ देश की जनता को अच्छी तरह समझ आ चुका  है. यही कारण है कि भीड़ के ये चेहरे जो इस माल असबाब के असल मालिक हैं, शौचालय में चेन से बंधे मग्गे और नल की टोंटी की सुरक्षा के लिये खाकी वर्दी तैनात होते हुये भी गाहे बगाहे अपनी साधिकार कलाकारी दिखा ही देते हैं. ऐसा नही है कि यह प्रवृत्ति केवल हिन्दोस्तान में ही हो, इंग्लैंड में भी हाल ही में टाइलेट से पूरी सीट ही चोरी हो गई, ये अलग बात है कि वह सीट ही चौदह कैरेट सोने की बनी हुई थी. किन्तु थी तो सरकारी संपत्ति ही, और सरकारी संपत्ति की मालिक जनता ही होती है. वीडीयो कैमरो को चकमा देते हुये सीट चुरा ली गई.

हम आय का ३३ प्रतिशत टैक्स देते हैं. हमारे टैक्स से ही बनती है सरकारी संपत्ति. मतलब पुल, सड़कें, बिजली के खम्भे, टेलीफोन के टावर, रेल सारा सरकारी इंफ्रा स्ट्रक्चर गर्व की अनुभूति करवाता है. जनवरी से मार्च के महीनो में जब मेरी पूरी तनख्वाह आयकर के रूप में काट ली जाती है,  मेरा यह गर्व थोड़ा बढ़ जाता है. जिधर नजर घुमाओ सब अपना ही माल दिखता है.

आत्मा में परमात्मा, और सकल ब्रम्हाण्ड में सूक्ष्म स्वरूप में स्वयं की स्थिति पर जबसे चिंतन किया है, गणित के इंटीग्रेशन और डिफरेंशियेशन का मर्म समझ आने लगा है. इधर शेयर बाजार में थोड़ा बहुत निवेश किया है, तो  जियो के टावर देखता हूँ तो फील आती है अरे अंबानी को तो अपुन ने भी उधार दे रखे हैं पूरे दस हजार. बैंक के सामने से निकलता हूँ तो याद आ जाता है कि क्या हुआ जो बोर्ड आफ डायरेक्टर्स की जनरल मीटींग में नहीं गया, पर मेरा भी नगद बीस हजार का अपना शेयर इंवेस्टमेंट है तो सही इस बैंक की पूंजी में, बाकायदा डाक से एजीएम की बैठक की सूचना भी आई ही थी कल. ओएनजीसी के बांड की याद आ गई तो लगा अरे ये गैस ये आईल कंपनियां सब अपनी ही हैं. सूक्ष्म स्वरूप में अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई बरास्ते म्युचुएल फंड देश की रग रग में विद्यमान है. मतलब ये सड़के ये पुल सब मेरे ही हैं. गर्व से मेरा मस्तक आसमान निहार रहा है. पूरे तैंतीस प्रतिशत टैक्स डिडक्शन का रिटर्न फाइल करके लौट रहा हूँ. बेटा अमेरिका में ३५ प्रतिशत टैक्स दे रहा है और बेटी लंदन में, हम विश्व के विकास के भागीदार हैं, गर्व क्यो न करें?

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #17 ☆ कुंठा ☆ – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी लघुकथा  “कुंठा ”। )

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #17 ☆

 

☆ कुंठा ☆

 

रात की एक बजे सांस्कृतिक कार्यक्रम का सफल का संचालन करा कर वापस लौट कर घर आए पति ने दरवाज़ा खटखटाना चाहा. तभी पत्नी की चेतावनी याद आ गई. “आप भरी ठण्ड में कार्यक्रम का संचालन करने जा रहे है. मगर १० बजे तक घर आ जाना. अन्यथा दरवाज़ा नहीं खोलूँगी तब ठण्ड में बाहर ठुठुरते रहना.”

“भाग्यवान नाराज़ क्यों होती हो?” पति ने कुछ कहना चाहा.

“२६ जनवरी के दिन भी सुबह के गए शाम ४ बजे आए थे. हर जगह आप का ही ठेका है. और दूसरा कोई संचालन नहीं कर सकता है?”

“तुम्हे तो खुश होना चाहिए”, पति की बात पूरी नहीं हुई थी कि पत्नी बोली, “सभी कामचोरों का ठेका आप ने ही ले रखा है.”

पति भी तुनक पडा, “तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि तुम्हारा पति …”

“खाक खुश होना चाहिए. आप को पता नहीं है. मुझे बचपन में अवसर नहीं मिला, अन्यथा मैं आज सब सा प्रसिद्ध गायिका होती.”

यह पंक्ति याद आते ही पति ने अपने हाथ वापस खींच लिए. दरवाज़ा खटखटाऊं या नहीं. कहीं प्रसिध्द गायिका फिर गाना सुनाने न लग जाए.

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

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