हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२३ – बालकहानी –लिपि की कहानी – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी बालकहानी –लिपि की कहानी)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२३ ☆

☆ बालकहानी –लिपि की कहानी ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

मुनिया की सुबह तबीयत खराब हो गई। उसने एक प्रार्थनापत्र लिखा। अपनी सहेली के साथ स्कूल भेज दिया। प्रार्थनापत्र में उसने जो लिखा था, उसकी अध्यापिका ने उस प्रार्थनापत्र को उसी रूप में समझ लिया। और मुनिया को स्कूल से छुट्टी मिल गई।

क्या आप बता सकते है कि मुनिया ने प्रार्थनापत्र किस लिपि में लिख कर पहुंचाया था। नहीं जानते हो ? उसने प्रार्थनापत्र देवनागरी लिपि में लिख कर भेजा था।

देवनागरी लिपि उसे कहते हैं, जिसे आप इस वक्त यहाँ पढ़ रहे है। इसी तरह अंग्रेजी अक्षरों के संकेतों के समूहों से मिल कर बने शब्दों को रोमन लिपि कहते हैं।

इस पर राजू ने जानना चाहा, “क्या शुरु से ही इस तरह की लिपियां प्रचलित थीं?”

तब उस की मम्मी ने बताया कि शुरु शुरु में ज्ञान की बातें एक दूसरे को सुना कर बताई जाती थीं। गुरुकुल में गुरु शिष्य को ज्ञान की बातें कंठस्थ करा दिया करते थे। इस तरह अनुभव और ज्ञान की बातें पीढ़ी-दर-पीढ़ी जाती थीं।

मनुष्य निरंतर, विकास करता गया। इसी के साथ उस का अनुभव बढ़ता गया। तब ढेरों ज्ञान की बातें और अनुभव को सुरक्षित रखने की आवश्यकता महसूस हुई।

इसी आवश्यकता ने मनुष्य को प्रत्येक वस्तु के संकेत बनाने के लिए प्रेरित किया। तब प्रत्येक वस्तु को इंगित करने के लिए उस के संकेताक्षर या चिन्ह बनाए गए। इस तरह चित्रसंकेतों की लिपि का आविष्कार हुआ। इस लिपि को चित्रलिपि कहा गया।

आज भी विश्व में इस लिपि पर आधारित अनेक भाषाएं प्रचलित हैं। जापान और चीन की लिपि इसका प्रमुख उदाहरण है। शब्दाचित्रों पर आधारित ये लिपियों इसका श्रेष्ठ नमूना भी है।

चित्रलिपि का आशय यह है कि अपने विचारों को चित्र बना कर अभिव्यक्त किया जाए। मगर यह लिपि अपना कार्य सरल ढंग में नहीं कर पायी। क्यों कि एक तो यह लिपि सीखना कठिन था। दूसरा, इसे लिखने में बहुत मेहनत करनी पड़ती थी। तीसरा, लिखने वाला जो बात कहना चाहता था, वह चित्रलिपि द्वारा वैसी की वैसी व्यक्त नहीं हो पाती थी। चौथा, प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह आकर्षण का केंद्र नहीं थी। और यह दुरुह थी।

तब कुछ समय बाद प्रत्येक ध्वनियों के लिए एक एक शब्द संकेत बनाए गए। जिन्हें हम वर्णमाला में पढ़ते हैं। मसलन- क, ख, ग आदि। इन्हीं अक्षरों और मात्राओं के मेल से संकेत-चिन्ह बनने लगे। जो आज तक परिष्कृत हो रहे हैं।

हरेक वस्तु के लिए एक संकेत चिन्ह बनाए गए। विशेष संकेत चिन्ह विशेष चीजों के नाम बताते हैं। इस तरह प्रत्येक वस्तु के लिए एक शब्द संकेत तय किया गया। तब लिपि का आविष्कार हुआ।

इस तरह सब से पहले जो लिपि बनी, उसे ब्राह्मी लिपि के नाम से जाना जाता है। बाद में अन्य लिपियां इसी लिपि से विकसित होती गई।

ऐसे ही धीरे धीरे विकसित होते हुए आधुनिक लिपि बनी। जिसमें अनेक विशेषताएं हैं। प्रमुख विशेषता यह है कि इसे जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा भी जाता है। अर्थात् यह हमारे विचारों को वैसा ही व्यक्त करती है।

इनमें से बहुत सी लिपियों से हम परिचित हैं । ब्रिटेन में अंग्रेजी भाषा बोली जाती है। इस भाषा को रोमन लिपि में लिखते हैं। पंजाबी भाषा, गुरुमुखी लिपि में लिखी जाती है। इसी तरह तमिल, तेलगु, कन्नड़ तथा मलयालम आदि ब्राह्मी लिपि में लिखी जाती हैं।

अब यह भी जान लें कि विश्व की सबसे प्राचीन लिपियां निम्न हैं- ब्राह्मी, शारदा आदि।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य #२९६ – कविता – ☆ चलो एक काम करें… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “चलो एक काम करें…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  #२९६ ☆

☆ चलो एक काम करें… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

☆

चलो एक काम करें

जीना हराम करें

उनका जो रोज-रोज,

देश को बदनाम करे।

*

जिनके मन अहंकार

देश से करे न प्यार

निजी स्वार्थ के खातिर

तिकड़में चले हजार,

ऎसे अलगावियों के

नाम, खुलेआम करें

चलो एक काम करें।

*

जो पत्थरबाज हैं

दिल से दगाबाज हैं

हिंसक हत्यारों के

जो भी सरताज हैं,

सबक सिखायें इनको

सभी त्राहिमाम करें

चलो एक काम करें।

*

देश का विकास हो

मन में विश्वास हो

बाँटें सुख जन जन में

यही लक्ष्य खास हो,

देशद्रोही जो, उनका

समूल इंतजाम करें

चलो एक काम करें।

*

खेल हो कि जंग हो

व्यर्थ न हुड़दंग हो

पक्ष और विपक्ष सभी

देश हित में संग हो,

कामना खुशहाली की

सुबह और शाम करें

चलो एक काम करें।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा – चाय ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – लघुकथा – चाय ? ?

…..पापा जी, ये चार-चार बार चाय पीना सेहत के लिए ठीक नहीं है। पता नहीं मम्मी ने कैसे आपकी यह आदत चलने दी? कल से एक बार सुबह और एक बार शाम को चाय मिलेगी। ठीक है..?

..हाँ बेटा ठीक है.., कहते-कहते मनोहर जी बेडसाइड टेबल पर फ्रेम में सजी गायत्री को निहारने लगे। गायत्री को भी उनका यों चार-पाँच बार चाय पीना कभी अच्छा नहीं लगता था। जब कभी उन्हें चाय की तलब उठती, उनके हाव-भाव और चेहरे से गायत्री समझ जाती। टोकती, ..इतनी चाय मत पिया करो। मैं नहीं रहूँगी तो बहुत मुश्किल होगी। आज पी लो लेकिन कल से नहीं बनेगी दो से ज़्यादा बार चाय।

….पैंतालीस साल के साथ में कल कभी नहीं आया पर गायत्री को गये अभी पैंतालीस दिन भी नहीं हुए थे कि..! …तुम सच कहती थी गायत्री, देखो जो तुम नहीं कर सकी, तुम्हारी बहू ने कर दिखाया.., कहते-कहते मनोहर जी का गला भर आया। जाने क्यों उन्हें हाथ में थामी फ्रेम भी भीगी-भीगी सी लगी।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना सोमवार दि. 22 सितम्बर 2025 से बुधवार 1 अक्टूबर तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा-

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।

इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। माला जप के साथ मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार साधना चलेंगी। 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १२२ ☆ संग दिल रो पड़े सख्त थे… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “संग दिल रो पड़े सख्त थे…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १२२ ☆

✍ संग दिल रो पड़े सख्त थे… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

कौम इंसान की आजमाई हुई

स्वार्थ के बिन न इससे भलाई हुई

 *

आइने पर न तुहमत लगाया करो

सत्य दिखला दिया ये ढिठाई हुई

 *

वक़्त बिगड़ा अगर तो महल छूटते

लेटने को न हासिल चटाई हुई

 *

आज भाई बने दुश्मनों की तरह

ज़र ज़मीं की बड़ी बीच खाई हुई

 *

संग दिल रो पड़े सख्त थे जो बहुत

एक बेटी की जब भी विदाई हुई

 *

तख्त दौलत न होती किसी की सगी

आज है पास जो कल पराई हुई

 *

ज़र जमीं औरतें ही रहीं हैं वजह

इस जहां में जहाँ भी लड़ाई हुई

 *

वो गलत  बात चुपचाप करता सहन

पास जो शक्ति उससे सवाई हुई

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ग़ज़ल # २९ – बहुत उलझनें है यार… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यग़ज़ल क्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – बहुत उलझनें है यार…।)

✍ बहुत उलझनें है यार… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

गरचे यूं होता के मैं इक मुसव्विर होता

मेरे जेहन में तू और तेरा तसव्वुर होता

रंग, ब्रश, कैनवास मैं और तू संग रहते

मैं तिरी तस्वीरे बनाता और मुनव्वर होता

*

मिरा नसीब है के तू यहीं है, आसपास है

तू मिरे पास न होता तो मैं मुन्फरिद होता

*

अच्छा है कोई, ख़्वाहिश बाकी न रही

अब पुरसुकूँ हूँ मैं, वर्ना मुन्तजिर होता

*

बहुत उलझनें है यार सियासत में यहाँ

मैं चाहिता वर्ना तो क़ाबिज़े इक्तिदार होता

*

वो शाइर अच्छा है कहते हैं सभी

गर मशायरा पढता तो मुकर्रर होता

*

वो तो इक संग ने पनाह दे दी वरना

ये हक़ीर ठोकरें दर – ब- दर होता

*

‘हेमंत अब और नही, उसपे एतिमाद नही

वो सलीके से निभाता तो उसपे ऐतिबार होता

☆

(मुसव्विर = चित्रकार, मुनव्वर = प्रकाशमान/ प्रसिद्ध, मुन्फरिद = एकाकी, मुन्तजिर = पाने की चाह में प्रतिक्षित, काब़िज़ = मालिकाना हक, इक्तिदार = सत्ता, मुकर्रर = बार – बार का आग्रह, संग = पत्थर, हक़ीर = तुच्छ/ तिनका, एतिमाद = भरोसा, ऐतिबार = भरोसा / विश्वास)

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ३७ ☆ कविता – प्रतिबिम्ब… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भाव्प्रवान कविता – “प्रतिबिम्ब… “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ३७ ☆

✍ कविता  – प्रतिबिम्ब… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

 

विगत जब आगत बन सामने आता है

मैं बौना हो जाता हूँ

इज्जत का हर पहरेदार

बन जाता है मालिक।

तार तार इज्जत से चिपका हूँ

मालिकाना हक मुझे संतोष देता है

आखिर इज्जत ही तो जिंदगी है

ऐसा भी क्या जीना

कि इज्जत ही न हो

और तभी नजर आता है

अहम् वाद,

इज्जत वाले की इज्जत में

गरीब की गरीबी में

भूखे की भूख में

एक टुकड़ा नजर आता है

अपनी जिंदगी का

सोचता रह जाता हूँ

टुकड़ों टुकड़ों में

जिंदा कैसे हूँ

क्यों हूँ।

 

आइने में अपना ही अक्स

डरा जाता है

क्योंकि वहां

अक्स नहीं, टुकड़े होते हैं

टुकड़े भी नहीं बल्कि

होते हैं आधे अधूरे चेहरे

और अगर

इनसे फुरसत मिलती तो

मैं प्यार भी कर लेता

हाँ प्यार भी कर लेता

मगर किससे?

किस टुकड़े को ज्यादा चाहूँ

किस टुकड़े को कम

चटके काँच जैसी इज्जत से

किसी को ढक दूँ

यही सोचता सोचता

जीता चला जा रहा हूँ

प्रतिबिम्बों में।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ८७ – खुशियाॅं बाँटना… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – खुशियाॅं बाँटना।)

☆ लघुकथा # ८७ – खुशियाॅं बाँटना ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆ 

सफाई जोर शोर से चल रही रीना बहू आज चमत्कार कैसे?

हर कमरे से लेकर किचन तक सुंदर सजा हुआ दिख रहा है। बहु क्या आपके कुछ दोस्त घर पर खाने पर आ रहे हैं क्या?

कहीं भी धूल का एक कण नहीं, ऐसा लग रहा है किसी फाइव स्टार होटल में आ गए हैं पूरा घर फूलों से सजा है एक-एक चीज अपनी जगह पर है पहले तो कभी ऐसा नहीं किया?

क्या बात है मां क आज आपने तो बिल्कुल सवालों की झड़ी लगा दी रीना ने मुस्कुराते हुए कहा।

आप ही तो कहती है मां की साफ-सुथरे घर में लक्ष्मी का वास होता है और पितृपक्ष चल रहे हैं तो वह भगवान के रूप में हमारा घर देखने आए हैं बाबूजी बिखरा घर देखेंगे तो उन्हें कितना दुख होगा?

मां आज सफाई करते हुए मुझे बाबूजी की डायरी मिली जिसमें उन्होंने लिखा था कि उन्हें साफ सुथरा और फूलों से सजा घर बहुत अच्छा लगता है एकदम आप ही की तरह मैंने भी आज घर को सजाया है आज उनके श्राद्ध की तिथि है, पंडितों को बुलाया है और बाबूजी की पसंद का सारा खाना बना रही हूं मिठाई बस बाहर से आर्डर करती हूँ अभी थोड़ी देर में आ जाएगी आप एक बार देख लो कोई कमी तो नहीं है?

बाबूजी के साथ तो मुझे ज्यादा दिन रहने को नहीं हुआ क्योंकि मेरी शादी कम उम्र में हो गई थी लेकिन अब यह लग रहा है माँ कि बाद में यह श्राद्ध करने से तो अच्छा है कि आपको हम जीते जी खुशी दे दें।

क्या बात है बहू आजकल किसकी संगत में रह रही हो जो इतनी अच्छी बातें कर रही हो?

मां आपको मेरी हर बात मजाक क्यों लगती है?

नहीं तुम आजकल की बहुएं नौकरी करने वाली हो हमारी तरह कहां?

मैं पढ़ी-लिखी ज़रूर हूँ और अपने संस्कार समझती हूँ, आपको पता है मां सच बात तो यह है कि मैं जब अपने घर गई थी अपनी मां को देखा और पिताजी को देखा और भाभी का उनके साथ बर्ताव देखा तब मेरा मन रोने लगा। वहां से लौटी और तुरंत अपने घर को सजाने लग गई कि जो मेरे पास है उसे तो मैं ठीक कर सकती हूँ, सास कमल की ऑंखों में आंसू भर गए?

तू बहु नहीं बेटी है । पापा जी का श्राद्ध है, माँ ने बुलाया है। ऐसा फोन करके अपने मम्मी पापा को बोलो। फिर मैं उन्हें रोक लूंगी कुछ दिन हम सब साथ रहेंगे सब ठीक हो जाएगा।

जब इंसान नहीं रहता तब उसकी कीमत समझ में आती है।

कहाँ मैं तेरी बातों में लग गई पंडित जी आ रहे होंगे ।

चल पागली रोना छोड़? जीवन तो चलने का नाम है।

बस मेरी एक बात याद रखना जीवन में हमेशा खुशियाँ बांटना।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # २८६ ☆ गझल…  ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # २८६ ?

☆ गझल… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

(भुजंगप्रयात वृत्त)

☆

 जुईच्या फुलांचे बहर मागते मी

सुगंधी सुखाचा कहर मागते मी

 *

कधी शांत वारा कधी वादळी तू

तुझी जीवघेणी लहर मागते मी

 *

मुसाफीर तू मी तुझी वाट आहे

नवे आणखी ते शहर मागते मी

 *

नको दूर जाऊ जवळ तू रहा ना

तुझे मोरपंखी प्रहर मागते मी

 *

सदा भंगते का इथे स्वप्न माझे

पुन्हा वास्तवाचे जहर मागते मी

 *

जुने धाम माझे कुणी ध्वस्त केले?

पुराणे अता खंडहर मागते मी

☆

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ॥ त्रिपुरसुंदरी अष्टकम् ॥ – रचना : जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ☆ मराठी भावानुवाद – डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

डाॅ. निशिकांत श्रोत्री 

? इंद्रधनुष्य ?

☆ ॥ त्रिपुरसुंदरी अष्टकम् ॥ – रचना : जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ☆ मराठी भावानुवाद – डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

☆ ☆ ☆ ☆

कदम्बवनचारिणीं मुनिकदम्बकादम्बिनीं 

नितम्बजित भूधरां सुरनितम्बिनीसेविताम् ।

नवाम्बुरुहलोचनामभिनवाम्बुदश्यामलां 

त्रिलोचनकुटुम्बिनीं त्रिपुरसुन्दरीमाश्रये ॥ १॥

*

कदम्बवनवासिनीं कनकवल्लकीधारिणीं 

महार्हमणिहारिणीं मुखसमुल्लसद्वारुणीम् । 

दयाविभवकारिणीं विशदलोचनीं चारिणीं 

त्रिलोचनकुटुम्बिनीं त्रिपुरसुन्दरीमाश्रये ॥ २॥

*

कदम्बवनशालया कुचभरोल्लसन्मालया 

कुचोपमितशैलया गुरुकृपालसद्वेलया ।

मदारुणकपोलया मधुरगीतवाचालया 

कयाऽपि घननीलया कवचिता वयं लीलया ॥ ३॥

*

कदम्बवनमध्यगां कनकमण्डलोपस्थितां 

षडम्बुरुहवासिनीं सततसिद्धसौदामिनीम् ।

विडम्बितजपारुचिं विकचचंद्रचूडामणिं 

त्रिलोचनकुटुम्बिनीं त्रिपुरसुन्दरीमाश्रये ॥ ४॥

*

कुचाञ्चितविपञ्चिकां कुटिलकुन्तलालंकृतां 

कुशेशयनिवासिनीं कुटिलचित्तविद्वेषिणीम् ।

मदारुणविलोचनां मनसिजारिसंमोहिनीं 

मतङ्गमुनिकन्यकां मधुरभाषिणीमाश्रये ॥ ५॥

*

स्मरप्रथमपुष्पिणीं रुधिरबिन्दुनीलाम्बरां 

गृहीतमधुपात्रिकां मदविघूर्णनेत्राञ्चलां ।

घनस्तनभरोन्नतां गलितचूलिकां श्यामलां 

त्रिलोचनकुटुंबिनीं त्रिपुरसुन्दरीमाश्रये ॥ ६॥

*

सकुङ्कुमविलेपनामलकचुंबिकस्तूरिकां 

समन्दहसितेक्षणां सशरचापपाशाङ्कुशाम् ।

अशेषजनमोहिनीमरुणमाल्य भूषाम्बरां 

जपाकुसुमभासुरां जपविधौ स्मराम्यम्बिकाम् ॥ ७॥

*

पुरंदरपुरंध्रिकां चिकुरबन्धसैरंध्रिकां 

पितामहपतिव्रतां पटपटीरचर्चारताम् ।

मुकुन्दरमणीमणीलसदलंक्रियाकारिणीं 

भजामि भुवनांबिकां सुरवधूटिकाचेटिकाम् ॥ ८॥

*

॥ इति श्रीमद् शंकराचार्यविरचितं त्रिपुरसुन्दरीअष्टकं ॥

*

भावानुवाद … 

*

कदम्बविहरी ऋषीमुनि जिच्या पदा सेविता

जगा जिंकिले जिने असुन विश्व नीयंत्रिता

त्रिनेत्रि त्रयदेवि पद्मनयना जगा धारिणी

शिवास अति लाडकी शरण पातलो पद्मिनी ॥१॥

*

कदम्ब रहिवासिनी कनकवल्कले धारिणी

महामणि धरी सुरेख मुख ब्रह्म देहांगिणी

करूण धनदायिनी अमल नेत्र तेजस्विनी

शिवास अति लाडकी शरण पातलो पद्मिनी ॥२॥

*

निवासिनि वनी कदम्ब धनभार वक्षांवरी

नगासम विशाल वक्ष गुरुची कृपा सागरी

मधूर लहरी जिभेवर अरूण  भालावरी

सुरक्षि सकला जणू कवच दाट कायेवरी ॥३॥

*

कदम्ब वनि जाशि हेमवलयांकिता होउनी

षडम्बु कमलवासिनी सततसिद्ध सौदामिनी

सुशोभित सरोज तेज तुज चंद्रचूडामणी  

शिवास अति लाडकी शरण पातलो पद्मिनी ॥४॥

*

उरोज वरती विणा कुरळ कुंतला शोभुनी

विसाव कुश लेटुनी कुटिल बुद्धिची द्वेषिणी

मधाळ नयना अरूण  मनजास  संहारिणी

नमीत गजसाधु आश्रय मधूर संभाषिणी ॥५॥

*

प्रिया सुमन आद्य बिंदु रुधिरा सुनीलांगणी

मधूर मधुपात्र हाति फडके जिची पापणी

विशाल घन उन्नत स्तन बटा  वरी लोंबती

त्रिलोचन कलत्र आश्रयि पदा तुझ्या लागती ॥६॥

*

गळा सजविती  रुधीर कुसुमाम्ल गुंफीयले

करात  शरचाप अंकुश धरी नयन तोषले

समस्त जन मोहुनी तिज फुले वसन अर्पिती 

विधी जप करोनिया स्मरण पार्वती जागृती ॥७॥

*

पुरंदर पुरंध्रिका प्रिति चिकूर आभूषण

पितामह-पतिव्रता फडफडे पटा भूषण

गळावर उमेचिया बहुत मौक्तिके शोभुन

शिरी मणि मुकूट रूपवतिसी भजू पूजन ॥८॥

*

॥ इति श्रीमद् शंकराचार्यविरचित निशिकान्त भावानुवादित त्रिपुरसुन्दरीअष्टक संपन्न ॥

☆ ☆ ☆ ☆

मराठी भावानुवाद  © डॉ. निशिकान्त श्रोत्री

एम.डी., डी.जी.ओ.

मो ९८९०११७७५४ ईमेल nishikants@gmail. com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १२० – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २० ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२० – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २० ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

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प्यार में जीत, मात मत करना, 

दंभ की कोई बात मत करना, 

प्यार सबका समान होता है 

प्यार में जात-पाँत मत करना।

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दौलत का अभिमान शहर है, 

संस्कृति का अपमान शहर है, 

यहाँ खेत-खलिहान नहीं हैं 

राशन की दूकान शहर है।

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अखबारी सम्मान जहाँ है, 

आडम्बर अभिमान जहाँ है, 

गाँव भले हैं, उन शहरों से 

जीवन नर्क समान जहाँ है।

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यूँ कठोर संत्रास मिला है, 

खुशियों को वनवास मिला है, 

कुंठित हो, मर रही योग्यता 

जेबों में सल्फास मिला है।

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https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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