सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतविश्वासों की होरी

? रचना संसार # ७२ – गीत – विश्वासों की होरी…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

बुझी नहीं अब तक दुनिया में,

जलते विश्वासों की होरी।

मिला प्रीति में देख छलावा,

रोती जीवन भर ये गोरी ।।

*

खंडित युगों-युगों से होती,

विश्वासों की नैया देखो।

खेवनहार डुबोते इसको,

बीच भँवर में भैया देखो।।

मिलता इसको कहाँ किनारा,

लिपटी घातों की है डोरी।

*

बुझी नहीं अब तक दुनिया में,

जलते विश्वासों की होरी।।

**

स्वार्थ भरा नाते-रिश्तों मे,

मानवता भी घायल होती।

बाजारों में छम-छम बजती

पायल की रुन-झुन भी रोती।।

डसने को अजगर बैठे हैं,

नित्य करे वे जोरा -जोरी।

*

बुझी नहीं अब तक दुनिया में,

जलते विश्वासों की होरी।।

**

दौलत में अंधा हर कोई,

छुरी पीठ पर नित चलती है।

धर्म-कर्म सब भूले बैठे,

मानवता हरपल छलती है।।

बुझी नेह की ज्योति जगत् में,

भूले बचपन की भी लोरी।

*

बुझी नहीं अब तक दुनिया में,

जलते विश्वासों की होरी।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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