हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६७ ☆ # “मेरी अर्ज…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “मेरी अर्ज…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६७ ☆

☆ # “मेरी अर्ज…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

तुम क्या जानो

घर से बेघर होने का दर्द

एक झोपड़ी बनाने पर भी

सर पर चढ़ जाता है कर्ज

 

जो फतवे दे रहे हैं

बस्तियां उजाड़ दो

वह मद में चूर है

उनका है ना इलाज मर्ज

 

एक तरफ मौसम का कहर

एक तरफ नफरत का जहर

एक तरफ आंखें आंसुओं से है तरबतर

इंसा कितना हो गया है खुदगर्ज

 

किससे करें शिकायत

किससे करें फरियाद

हाकिम इस शहर का

बड़ा ही है बेदर्द

 

अहं के होड़ में

हथियारों की दौड़ में

युद्ध रुकने पर बचेगी

बस गर्द ही गर्द

 

जो निशक्तों के आंसू पोंछे

सदा उनके हित सोंचे

हक के लिए लड़े दुनिया से

वही है सच्चा मर्द

 

प्रीत का मंदिर बनाओ

रिश्तो से सजा घर बसाओ

मुस्कुराते हर पल बिताओ

यही है सबसे मेरी अर्ज/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभिव्यक्ति # -११० – धार्मिक कथा – श्रद्धा और ज्ञान… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक आलेख  धार्मिक कथा – श्रद्धा और ज्ञान।)

☆ अभिव्यक्ति # ११० ☆

☆  आलेख – धार्मिक कथा – श्रद्धा और ज्ञान☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

 बचपन से धार्मिक ग्रंथो में पढ़ते आए हैं, कि हनुमान जी ने बचपन में ही सूर्य को निगल लिया था, थोड़े बड़े हुए, तो शंका होने लगी, अभी भी बहुत से लोग अंधविश्वास कहते हैं और बहुत से लोग इसे आदिशक्ति कहते हैं. सनातन धर्म के मानने वाले, इस बात को ईश्वर की लीला कहते हैं, आखिर धर्म में ऐसा क्या बताया कि हम इसे नहीं मानते या मानते हैं, तो ईश्वरीय महिमा बताते हैं. धार्मिक कथाओं के दो स्तर होते हैं –

  1. श्रद्धा का स्तर
  2. ज्ञान का स्तर

वास्तव में हनुमान जी चेतना के प्रतीक हैं, और सूर्य ज्ञान के प्रतीक हैं, जब चेतना जागृत होती है तो वह ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करती है, जब वह ज्ञान प्राप्त करने लगती है या ज्ञान प्राप्त करती है तो हम साधारण भाषा में कहते हैं कि उसने तो पुस्तकों को निगल लिया, घोंट लिया, पुस्तक ज्ञान का भंडार होती हैं, ज्ञान को निगल लिया, और इसी क्रम में आगे चला, यह शब्द कि, हनुमान जी ने सूर्य को निगल लिया, यह सिंबॉलिज्म है और यह बताता है कि हनुमान जी में जब चेतना जागृत हुई तो उन्होंने ज्ञान प्राप्त कर लिया और ज्ञान को पूर्ण रूप से आत्मसात कर लिया. इसे प्रतीक के रूप में देखा जाए, तो सारी बात समझ में आ जाती है.

सनातन धर्म की खूबसूरती यही है. वह कथा, प्रतीक और दर्शन को एक साथ लेकर चलता है..

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३७ ☆ कथा-कहानी – समाधान ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय कथा – ‘समाधान‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३७ ☆

☆ कथा-कहानी ☆ समाधान ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

रोज़ शाम को शुभा का इंतज़ार होता है। पांच बजे के बाद दरवाज़े पर आहट होने पर सबकी  निगाहें इसी उम्मीद के साथ उठती हैं कि दरवाज़े पर शुभा होगी।

दो महीने पहले शुभा की नियुक्ति एक सरकारी महाविद्यालय में  व्याख्याता के पद पर हुई थी। नियुक्ति में कोई दिक्कत नहीं हुई। परेशानी तब हुई जब पोस्टिंग ऐसे  महाविद्यालय में हुई जो शहर से करीब साठ मील दूर था। अब रोज़ सुबह आठ बजे तीन चार मील दूर स्टेशन जाना पड़ता है। उसके बाद दो घंटे की ट्रेन यात्रा के बाद महाविद्यालय पहुंचना पड़ता है। फिर भी अपने पैरों पर खड़े होने और समाज में अपनी जगह बनाने के ख़याल से अच्छा लगता है। शुभा का संसार अब बड़ा हो गया है। समाज में अब उसकी हैसियत बन गयी है। अभी ट्रेन में अकेले यात्रा करने की आदत नहीं थी। शुरू शुरू में काफी मुश्किल महसूस होती थी। सिमट सिकुड़ कर यात्रा पूरी करनी पड़ती थी। कभी किसी के  उड़ते हुए फ़िकरे को सुनकर अनसुना करना पड़ता था। फिर धीरे-धीरे आदत होने लगी। शुभा को भी लगने लगा कि सब कुछ इतना ख़तरनाक नहीं होता जितना  दूर से महसूस होता है।

संबंधियों, पड़ोस और नगर में अब शुभा का अपना वजूद है। कहीं आयोजनों, कार्यक्रमों में जाती है तो लोगों की निगाहें उसकी तरफ उठतीं और टिकतीं हैं। उसकी बात कान देकर सुनी जाती है। परिवार में भी उसकी बात लगभग निर्णयात्मक होती है।

लेकिन ज़िन्दगी का रास्ता हमवार नहीं होता। एक शाम शुभा लौटी, लेकिन रोज़ की तरह नहीं। जब लौटी तो ख़ामोश, चेहरे पर परेशानी। घर में आकर बिना किसी से बात किये पलंग पर लेट गयी। सब हतप्रभ। मां के प्राण हलक में आये। कौन सी मुसीबत आयी?

पूरा घर से शुभा के आसपास इकट्ठा हो गया। सब तरफ से चिन्तित सवाल। पूछताछ से पता चला कि कुछ लड़के थे जिन्होंने लौटते में पूरे रास्ते शुभा को तंग किया। पूरे रास्ते फ़िकरेबाज़ी। अपने स्टेशन तक पहुंचना पहाड़ हो गया। डिब्बे के सारे यात्री तटस्थ बने रहे। कुछ ऐसे भी थे जो ख़ुद शरीफ़ बने स्थिति का आनंद लेते रहे। अब शुभा भयभीत थी। पता नहीं वे लड़के कहां के थे। उन्होंने अगर उसे ही लक्ष्य बनाकर रोज़ परेशान करना शुरू कर दिया तो आना जाना संकट का काम हो जाएगा।

उसकी रिपोर्ट सुनकर घर के सभी बड़े लोग अपराध-बोध से ग्रस्त हो गये। सभी को लगा लड़की से नौकरी करा के गलती की। सदियों से लड़कियां घर में बैठती रही हैं। सिर्फ शादी करके दूसरे के घर की शोभा बनती रही हैं। अगर शुभा भी नौकरी न करती तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता। जिन  जिन सदस्यों ने पहले शुभा की पीठ ठोंकी थी उन्हें लगने लगा कि उनसे गलती हो गयी।

सबसे पहले टिप्पणी शुभा के बूढ़े दादाजी की तरफ से आयी। वे शुरू से ही लड़कियों की नौकरी के खिलाफ थे। उन्होंने अपना गुस्सा बेटे-बहू पर उतारा। तमतमाकर बोले, ‘हमने पहले ही कहा था कि लड़कियों को घर में ही रखो, लेकिन तुम्हें तो लड़कियों की कमाई से घर भरने की पड़ी है।’

बेटा-बहू चुप, जैसे चोरी करते पकड़े गये हों। शुभा फिलहाल अकेले यात्रा करने को तैयार नहीं है। मन में भय बैठ गया है, उससे मुक्ति पाने में समय लगेगा।

मां पति से पूछती हैं, ‘शुभा का ट्रांसफर अपने शहर में नहीं हो सकता?’

शुभा के पिता पहले ही अपने पिता की डांट खाकर झल्लाये हैं। खीझ कर कहते हैं, ‘ट्रांसफर रातोंरात नहीं होते। रातोंरात ट्रांसफर उनके होते हैं जिनकी लंबी पहुंच होती है। अपनी बेटी की तो नौकरी लग गयी, यही बहुत समझो।’

शुभा छुट्टी लेकर घर बैठ गयी है। फिलहाल कुछ सोचना नहीं है। पिता कई बार कह चुके हैं, ‘बेटा, नहीं चलती तो छोड़ो नौकरी वौकरी। तुम्हारे नौकरी न करने के बावजूद गृहस्थी  तो चलेगी ही। अभी हमारे हाथ  पांव चलते हैं।’ लेकिन उनकी आवाज़ में दम नहीं है। शुभा की तनख्वाह से घर में रौनक आयी है। घर के अविवाहित बच्चों की कमाई ज़्यादातर चमक-दमक और शौक पूरे करने में जाती है, इसलिए उसका असर तत्काल दिखायी पड़ता है। अब बेटी घर में बैठी है इसलिए वीर-भाव के प्रदर्शन के बावजूद पांव के नीचे से खिसकती ज़मीन का एहसास होता है।

शुभा के दादाजी एकदम तुले हैं कि नौकरी से तत्काल इस्तीफा दे दिया जाए और शुभा के पिता उनसे कन्नी काटते घूमते हैं। घर में चूहा- बिल्ली का खेल चलता है। दादाजी पुराने ज़माने के, आज की ज़मीन से कटे हैं। उनके पुत्र सारी मान्यताओं और परंपराओं के बावजूद आज के दबावों को समझते हैं।

इस बीच शुभा के पिता कॉलेज के प्रिंसिपल से मिल आये हैं। वहां से कोई उत्साहवर्धक जवाब नहीं मिला। प्रिंसिपल ने कहा, ‘नौकरी करना है तो कुछ दिक्कतें उठानी पड़ेंगीं, कुछ रिस्क लेना पड़ेगा। आप उन लड़कों के बारे में जानकारी दे सकें तो मैं पुलिस में रिपोर्ट करा दूंगा।’ शुभा के पिता को लड़कों की कुछ जानकारी मिली थी, लेकिन वे बड़े झमेले में नहीं फंसना चाहते थे। पूरे रास्ते पुलिस उनकी बेटी की चौकीदारी करने से रही।

चार-छ: दिन गुज़रने पर विचार बदलने लगे। शुभा को भी कुछ अटपटा लगने लगा और घर के लोगों के स्वर बदलकर कुछ ऐसे हो गये कि लंबी छुट्टी लेना ठीक नहीं है। नयी नौकरी है, कोई अड़चन आ सकती है। मोटी तनख्वाह वाली  नौकरी पर इस तरह लात मार देना अक्लमंदी की बात नहीं।

तय हुआ कि शुभा का छोटा भाई मुन्नू उसके साथ रोज़ सफर करेगा। पुरुष का होना ज़रूरी है, भले ही छोटा भाई हो। घर के वातावरण को देखते हुए मुन्नू ने मना नहीं किया। अब फिर शुभा की कॉलेज यात्रा शुरू हो गयी। तीन-चार दिन सब ठीक-ठाक चलता रहा, फिर मुन्नू ने असहयोग शुरू कर दिया। कहा, ‘सब कुछ तो ठीक चल रहा है। फालतू मुझको इतनी दूर दौड़ना पड़ता है।’ उसने जानबूझ कर हीला-हवाला करना शुरू कर दिया। कभी सो कर उठने में घंटों लगाता, कभी बाथरूम में घुसकर समाधि लगा लेता।

तीन-चार दिन बाद उसने विद्रोह का झंडा खड़ा कर दिया। अब यह व्यर्थ का काम उसके वश का नहीं। उसका पूरा दिन नाश हो जाता है। पढ़ाई लिखाई का नुकसान अलग होता है। शुभा के माता-पिता के सामने फिर समस्या खड़ी हुई। आज के ज़माने में बेटी के साथ रोज़ जाने वाला कौन है, और फिर हर किसी पर भरोसा कैसे किया जाए? किसी पराये व्यक्ति के साथ रोज़ जाने पर लोगों को टिप्पणी करने का मौका मिलता है।

मुन्नू के मना करने के बाद शुभा के पिता ने दो-तीन दिन की छुट्टी ली। लेकिन अब शुभा को इस इंतज़ाम से कष्ट होने लगा। पहले  मुन्नू कॉलेज के आसपास वक्त गुज़ारने के लिए निरर्थक घूमता था, अब पिता कॉलेज के किसी कोने में बैठकर ऊंघते थे। कॉलेज के लोगों के सामने कैफियत देते शुभा को शर्म आती थी। और भी शिक्षिकाएं थीं जो निर्द्वंद्व आती जाती थीं और वे कभी रास्ते में हुई दिक्कतों का रोना नहीं रोती थीं। ऐसी भी शिक्षिकाएं थीं जो अकेले शहर में कमरा लेकर रह रही थीं और फिर भी कभी कोई शिकायत नहीं करती थीं।

पिता तीसरे दिन शुभा के साथ जाने की तैयारी कर रहे थे कि शुभा ने उन्हें रोक दिया, कहा, ‘मैं चली जाऊंगी। आप अपनी नौकरी पर जाइए।’

पिता अचकचाये, बोले, ‘बेटा रास्ते में फिर कुछ गड़बड़ हुआ तो?’

शुभा ने संयत स्वर में जवाब दिया, ‘चिन्ता छोड़ दीजिए। वहां प्रिंसिपल हैं, पुलिस है, इतने सारे साथी हैं। फिर ये छेड़छाड़ करने वाले किस सीमा तक जाएंगे यह मेरी समझ में आ गया है। मैं आराम से वापस लौट आऊंगी।’

बहुत दिनों बाद पिता के मन से एक भारी बोझ हटा। धूप का एक टुकड़ा जो इतने दिनों तक ग़ायब था, फिर घर में कौंध कर उसे रौशन कर गया।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०९ – श्रद्धा सुमन… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– श्रद्धा सुमन…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०९ — श्रद्धा सुमन — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

भारतीय आप्रवासी मजदूरों में से बहुतों ने मॉरिशस में साहसिक जीवन शैली की छाप छोड़ी थी। मैंने उन पर आधारित खूब लिखा है। मैं अपने शब्द लेखन को उनके प्रति श्रद्धा सुमन मानता हूँ। आज मैं आप्रवासी भारतीय मजदूर हल्कू को शब्दों का श्रद्धा सुमन समर्पित कर रहा हूँ। जवान अविवाहित हल्कू बिहार से आया था। वह बेल्ज़ामें नाम के आततायी फ्रांसीसी गोरे जमींदार का बंधुआ सा मजदूर था। उसने किसी तरह युक्ति से बेल्ज़ामें की हत्या की और दूसरे इलाके में भाग गया। उसने वहीं बस कर शादी कर ली। नब्बे बरस के बुढ़ापे में उसकी मृत्यु के दिन उसकी पत्नी ने कहा उसे मालूम था वह एक नीच को जान से मार कर यहाँ आया था। इतने बरस दर बरस दोनों समानता के स्तर पर बड़े ही प्रेमल पति पत्नी हुए। आज जाने वाला उसका पति उसके लिए देवता बन कर चला। इनकी संतान नहीं थी।

 © श्री रामदेव धुरंधर

19 — 04 — 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३९ – तादात्म्य ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३९ तादात्म्य… ?

प्रकृति के चौरासी लाख प्राणियों में एक अदृश्य तादात्म्य है। इस तादात्म्य को हर सजीव अनुभव  करता है। इस अनुभूति की तीव्रता परिवेश के आधार पर कम या अधिक हो सकती है। इस तादात्म्य से जुड़ी कुछ घटनाओं का स्मरण हो रहा है।

उस दिन दर्शन के बाद मैं मंदिर से बाहर निकला। सीढ़ियों पर बैठकर जूते के फीते बाँध रहा था। स्पोर्ट्स शूज़ थे, फलत: फीते अधिक लंबे थे और बाँधने की प्रक्रिया में कुछ समय लग रहा था। एक जूता बाँधने  के बाद गरदन ऊपर उठाई तो देखता हूँ कि भूरे रंग का एक श्वान मुश्किल से एक हाथ की दूरी पर आकर खड़ा है। अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मुझे निशब्द देख रहा है। मैंने उसकी आँखों में तैर रहे भावों को पढ़ने का प्रयास किया। फिर स्नेह से पूछा, “क्या बात है? कोई परेशानी है?” वह और निकट आया और अपना चेहरा मेरे घुटनों के पास रगड़ने लगा। मेरे घुटनों के नीचे अपना सिर डालने का प्रयास करने लगा। मैंने प्रेम से उसे अपने पास लिया। उसके चेहरे के बाएँ हिस्से को कुछ देर सहलाया। वह पूँछ हिलाते हुए उसका आनंद लेता रहा।

फिर उससे कहा कि अब दाईं तरफ का चेहरा ला। भाषा से अधिक भाव और संकेत समझ में आते हैं। अब उसके चेहरे का दायाँ भाग सहलाया गया। उसकी पीठ थपकाई और थपथपाई भी।

उसकी आँखों में कृतज्ञता के भाव थे। मैंने कहा, “तेरा काम हो गया न! अब जा।” वह थोड़ी दूर जाकर बैठ गया।

तादात्म्य का ऐसा ही अनुभव प्रचंड ट्रैफिक वाली एक सड़क को पार करते समय आया था। ट्रैफिक कम होने की प्रतीक्षा में जब मैं खड़ा था, मेरे साथ आकर एक श्वान खड़ा हो गया। हम दोनों की आँखें मिली। केवल आँखें मिलने तक मामला नहीं रुका। उसने मेरे साथ कदमताल की और सड़क पार हो गया।

अनुभवों की शृंखला में किसी शिकारी प्रजाति-सी खूँखार दिखती पूरी काली देह और उसमें काँच-सी चमकती पीली आँखों वाली बिल्ली भी याद हो आई। पार्क और एक सरकारी पाठशाला के बीच की साझा दीवार के पास बैठी वह मेरे इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगी थी। फिर उछल-उछल कर म्याऊँ-म्याऊँ कर अपने पंजे मेरे पैरों पर टिका कर कुछ कहने लगी। उसके उछलने से मैंने अनुमान लगाया कि वह उस ऊँची दीवार पर जाना चाहती है। संभव है कि उस पार उसके बच्चे हों। मैंने उसे पुचकार कर धीरे से उठाकर दीवार पर बैठा दिया। उसकी म्याऊँ-म्याऊँ में अब धन्यवाद का भाव था।

प्रसिद्ध साहित्यकार अनातोले फ्रांस ने कहा था कि मनुष्य की आत्मा का एक अंश तब तक सुप्तावस्था में रहता है, जब तक वह किसी पशु या पक्षी से प्रेम नहीं करता। बिल्ली विशेषज्ञ पशु चिकित्सक डॉ. लुईस जे कम्युटी ने लिखा है, “बाई लविंग एंड अंडरस्टैंडिंग एनिमल्स, परहेप्स वी ह्यूमेन शेल कम टू अंडरस्टैंड ईच-अदर।” पशुओं से स्नेह करना और उन्हें समझना, हमें एक-दूसरे को व्यापक स्तर पर समझने में सहायक होता है।

प्रकृति के जीवों में परस्पर तादात्म्य के मूल में एक समान आवश्यकताएँ रही होंगी। यह तादात्म्य एक-दूसरे के प्रति संवेदना जगाता है, करुणा उपजाता है। साथ ही एक प्राणी द्वारा दूसरे प्राणी पर हमला करने पर अपनी सुरक्षा का भाव या प्रत्याक्रमण भी उतने ही तेजी से जगाता है।

जो भी हो लेकिन प्रकृति के विशाल और विस्तृत परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मनुष्य का तादात्म्य उसे असीम आनंद और विशेष दृष्टि प्रदान करता है। इस दृष्टि पर अपने-अपने अनुभव के आधार पर हरेक का अलग-अलग मत हो सकता है। तथापि मत-मतांतर के परे यदि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का भाव जाग्रत रहे तो जगत अधिक सुंदर और अधिक आत्मीय बन सकता है।

 

© संजय भारद्वाज 

15:17 बजे, 6.6.2026

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८२ – पर्यावरण दिवस विशेष – अशआ’र ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है पर्यावरण दिवस पर विशेष रचना  अशआ)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८२ ☆

☆ पर्यावरण दिवस विशेष – अशआ’र ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

पर्यावरण है दोस्त लेकिन आदमी दुश्मन बना।

आज खतरा आदमी को आदमी से हो गया।।

पर्यावरण का दोस्त हो तो, आदमी महफूज हो।

यह हकीकत आदमी को, कब समझ में आएगी?

*

पाँव पर अपने कुल्हाड़ी, मारता खुद आदमी?

काटता है वृक्ष घटती आक्सीजन जान ले।।

*

पर्वतों को खोदकर, तालाब-नदियाँ पाटता।

काटता जंगल हरे, क्यों कब्र अपनी खोदता?

*

मारता-मरता जमीं के नाम पर जब आदमी।

ग़मजदा पर्यावरण हो, अश्रुधार बहा रहा।।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

५.६.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (8 जून से 14 जून 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (8 जून से 14 जून 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम! मैं पंडित अनिल पाण्डेय आज आपके सामने 8 जून से 14 जून 2026 तक के सप्ताह का साप्ताहिक राशिफल लेकर आया हूं। मगर सबसे पहले हम श्री हनुमान चालीसा के आज की चौपाई के बारे में चर्चा करेंगे। आज की चौपाई है :-

नासै रोग हरे सब पीरा | जपत निरन्तर हनुमत बीरा ||

इस चौपाई के संपुट पाठ करने से समस्त प्रकार के रोग और पीड़ाओं का अंत हो जाता है।

“नासै रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

आइये अब मैं आपको इस सप्ताह अर्थात 8 जून से 14 जून 2026 तक के सप्ताह के, ग्रहों के विचरण की जानकारी दे रहा हूं।

इस सप्ताह सूर्य वृष राशि में, मंगल मेष राशि में, बुध मिथुन राशि में, गुरु और शुक्र कर्क राशि में शनि मीन राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे।

आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। माता जी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। भाई बहनों के प्रति प्रेम बढ़ेगा। व्यापारियों के व्यापार में वृद्धि होगी। नौकरी पेशा वालों के लिए यह सप्ताह सचेत रहने का है। आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त होगा। कचहरी के मामलों में बहुत सावधानी वरतना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 जून कार्यों को करने के लिए सफलता दायक है। 9 और 10 जून को आपको सतर्क रहना चाहिए। 13 और 14 जून को आपको धन की प्राप्ति हो सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

वृष राशि

कचहरी के कार्यों में इस सप्ताह आपको विजय मिल सकती है। परंतु आपको सभी कार्य पूरी सावधानी के साथ करने होंगे। भाई बहनों के साथ संबंध अच्छा रहेगा। व्यापार में वृद्धि होगी। धन आने की उम्मीद है। नौकरी पेशा लोगों को अपनी जिव्हा को काबू में रखना होगा। किसी से फालतू की बहस में उलझना नहीं चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए आठ और 13 था 14 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उत्तम है। 11 और 12 तारीख को आपको कोई भी कार्य करने के पहले पूरी सावधानी बरतना चाहिए। 13 और 14 तारीख को आपका मन काफी प्रसन्न रह सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन स्नान करने के उपरांत तांबे के पात्र में जल अक्षत और लाल पुष्प लेकर भगवान सूर्य को जल अर्पण करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मिथुन राशि

यह सप्ताह आपके लिए काफी शुभ रह सकता है। आपके व्यापार में वृद्धि होगी। धन आने की उम्मीद की जा सकती है। थोड़े मेहनत से ज्यादा धन प्राप्त होगा। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। आपको अपने संतान से सहयोग नहीं मिल पाएगा। नौकरीपेशा लोगों के लिए भी सप्ताह ठीक-ठाक है। परंतु आपको अपने सकर्मियों से थोड़ा सावधान रहना चाहिए। भाग्य से इस सप्ताह आपको बहुत कम मदद मिल पाएगी। भाग्य की जगह अपने कर्मों पर विश्वास करें। इस सप्ताह आपके लिए 9 और 10 जून लाभदायक है। 13 और 14 जून को आपको सचेत रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कर्क राशि

यह सप्ताह आपके लिए उत्तम रहेगा। भाग्य भी आपका साथ देगा। आपके संतान के लिए भी यह सप्ताह ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपको दुर्घटनाओं से बचने का प्रयास करना चाहिए। कचहरी के कार्यों में लाभ हो सकता है परंतु अत्यधिक धन लगाना पड़ेगा। नौकरी करने वालों के लिए यह सप्ताह उत्तम रहेगा। आपके पिताजी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। भाई बहनों के साथ संबंध थोड़े कटु हो सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 तारीख फलदायक हैं। 8 तारीख को आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने की अच्छी उम्मीद है। आपका व्यापार बहुत उत्तम चलेगा। भाग्य भी आपका साथ देगा। कुछ अच्छे काम हो सकते हैं जिसमें अत्यधिक धन व्यय हो जैसे विवाह आदि। दुर्घटनाओं से सावधान रहने का प्रयास करें। नौकरी करने वालों के लिए इस सप्ताह सावधान रहना आवश्यक है। उनको अपने अधिकारियों से बहुत सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 8 और 13 तथा 14 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उपयोगी है। 9 और 10 तारीख को आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कन्या राशि

कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह बहुत अच्छा है। आपका कार्य बहुत अच्छा चलेगा। अधिकारी और साथी दोनों ही आपसे प्रसन्न रहेंगे। धन आने का भी अच्छा योग है। भाग्य से इस सप्ताह आपको थोड़ा सावधान रहना चाहिए। भाग्य के भरोसे कार्य करने के प्रयास कम करें। हालांकि भाग्य आपका एकाएक मदद करेगा। आपके शत्रु शांत रहेंगे परन्तु समाप्त नहीं हो पाएंगे। आप दुर्घटनाओं से आराम से बच जाएंगे। इस सप्ताह आपके लिए 9 और 10 तारीख अनुकूल है। आठ और 11 तथा 12 तारीख को आपको जागरूक रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें तथा शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

तुला राशि

अगर आप अधिकारी या कर्मचारी हैं तो आपके लिए यह सप्ताह उत्तम रहेगा। कार्यालय में आपकी स्थिति मजबूत होगी। आप सही स्थान पर पहुंच सकते हैं। भाग्य आपके साथ पूर्ण सहयोग करेगा। भाग्य की मदद आपको विभिन्न कार्यों के लिए लेना चाहिए। धन आने का भी योग है। आपके शत्रु शांत रहेंगे परंतु यह संभव है कि वे समाप्त नहीं हो। दुर्घटनाओं से इस सप्ताह आपको सतर्क रहना चाहिए। आपके सन्तान को थोड़ा कष्ट हो सकता है। आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 तारीख परिणाम दायक है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सतर्क रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह भाग्य आपका अच्छा साथ देगा। व्यापारियों का व्यापार अच्छा चलेगा। भाग्य के सहयोग के कारण आपके कई कार्य हो जाएंगे। इस सप्ताह आप शत्रुओंको थोड़े से प्रयास से ही समाप्त कर सकते हैं। उनको समाप्त करने का आपको निरंतर प्रयास करना चाहिए। आपको संतान से मामूली सहयोग मिल पाएगा। छात्रों की पढ़ाई थोड़ी ठीक-ठाक चलेगी। आपको अपने माताजी और पिताजी के स्वास्थ्य के प्रति इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपके जीवनसाथी के स्वास्थ्य में थोड़ी समस्या हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए आठ तथा 13 और 14 जून विभिन्न प्रकार के कार्यों हेतु शुभ हैं। 11 और 12 तारीख को आपको कार्यों के प्रति बहुत सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपके व्यापार में वृद्धि होगी। आपको लंबी यात्रा का योग है। यात्रा सफल रहेगी। आपको अपने संतान से अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। संतान की मानसिकता उत्तम रहेगी। आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। धन आने के मार्ग में कुछ परेशानियां आ सकती हैं। कृपया उन परेशानियों को समाप्त करने का प्रयास करें। इस सप्ताह आपको अपने दुश्मनों से भी सतर्क रहना चाहिए। दुश्मन कुछ बुरा करने का प्रयास कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 9 और 10 तारीख परिणाम मूलक हैं। 13 और 14 तारीख को आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

मकर राशि

यह सप्ताह अविवाहित जातकों के लिए बहुत उत्तम है। विवाह के बहुत अच्छे-अच्छे प्रस्ताव आएंगे। विवाह होने का या तय होने का पूर्ण योग है। इस सप्ताह आप अपने विवाह हेतु प्रयास करें। प्रेम संबंधों के भी बढ़ने का योग है। नए प्रेम संबंधों के बनने का भी अच्छा योग है। इस सप्ताह आपका अपने भाई बहनों से संबंध पहले जैसा ही रहेगा। आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि संभव है। अधिकारी एवं कर्मचारियों को अपने कार्यालय में थोड़ा सावधान रहना चाहिए। आपको पेट संबंधी कष्ट हो सकता है। धन आने का योग है। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 तारीख लाभप्रद है। सप्ताह के बाकी के दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

कुंभ राशि

यह सप्ताह आपके संतान के लिए उत्तम रहेगा। संतान की उन्नति हो सकती है। आपके व्यापार में बुद्धि संभव है। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेगा। आपके शत्रु शांत रहेंगे। नए शत्रु नहीं बन सकते हैं। पुराने शत्रुओं से भी संबंध सुधर सकते है। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको अपने भाग्य से विशेष मदद नहीं मिल पाएगी। इस सप्ताह आपके लिए 8 और 13 तथा 14 तारीख प्रभावशाली है। सप्ताह के बाकी दिनों में भी आप छोटे-मोटे कार्य कर सकते हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि संभव है। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। भाई बहनों के साथ आपके संबंध थोड़े खराब हो सकते हैं। धन आने की उम्मीद है। आपके संतान को सुख प्राप्त होगा। संतान से आपको भी अच्छी मदद मिल सकती है। आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाग्य से आपको अच्छी मदद मिल सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 9 और 10 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों में उपयोगी है। 8 जून को आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ५३ आणि ५४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ५३ आणि ५४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ५३ – – 

सदा आर्जवी प्रिय जो सर्व लोकी ।

सदा सर्वदा सत्यवादी विवेकी |

न बोले कदा मिथ्य वाचा त्रिवाचा |

जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा ||५३||

अर्थ : नेहमी नम्रतेने बोलणारा आणि आपल्या मधुर वाणीने लोकांना आपलेसे करणारा, सत्यवचनी आणि विवेकी असणारा, त्याचप्रमाणे कधीही वायफळ आणि असत्य न बोलणारा असा जो परमेश्वराचा भक्त असतो तो जगामध्ये खरोखरच धन्य होय.

(आर्जवी – नम्र, मिथ्य वाचा – खोटे बोलणे, त्रिवाचा – त्रिवार /निश्चित / ठामपणे. परंतु येथे बोलण्यात एकवाक्यता नसलेला असा अर्थ घेता येतो)

विवेचन : भक्ताने कसे असावे ते या श्लोकातही समर्थ सांगत आहेत. त्याचे बोलणे आर्जवी असते. आर्जवी म्हणजे नम्र. आर्जवी म्हणजे लाचार नव्हे. ज्याला (ईश्वराचे) ज्ञान झाले आहे असा भक्त आपोआपच नम्र होतो. फळांनी लगडलेले झाड जसे झुकलेले दिसते त्याप्रमाणे खरा ज्ञानी, विद्वान आणि भगवंताचा भक्त नम्र असतो. ही नम्रता त्याला कोठून उसनी आणावी लागत नाही. ती त्याच्या आतूनच उत्स्फूर्तपणे येते.

समर्थांना मधुर बोलणे अतिशय प्रिय आहे. दासबोधामध्ये ते म्हणतात,

पेरिले ते उगवते, बोलण्यासारखे उत्तर येते|

तरी मग कर्कश बोलावे ते, काय निमित्ये ||

आपण जसे बोलू तसे उत्तर समोरून मिळेल. मग विनाकारण दुसऱ्याला लागेल असे बोलण्यात काय अर्थ? काही लोक बोलण्यात अत्यंत फटकळ असतात. आपल्या बोलण्याने लोकांची मने दुखावतात. अशी माणसे अप्रिय होतात. मग भलेही ती स्वतःला स्पष्टवक्ता म्हणवून घेतात. परंतु त्यांचा स्पष्टवक्तेपणा इतरांना जखम करणारा असतो. आपण गोंदवलेकर महाराजांची प्रवचने वाचली असतील तर त्यातील भाषा किंवा कधी के वि बेलसरे यांचे निरूपण ऐकले असेल तर त्यांचे बोलणे किती नम्र आणि मधुर होते याचा प्रत्यय आपल्याला येतो. हीच खऱ्या भक्ताची लक्षणे आहेत.  

“सत्यम ब्रूयात, प्रियम ब्रूयात. ” गोडही बोलायचे आणि सत्यही बोलायचे ही तारेवरची कसरत असते. परंतु दुसऱ्याला न दुखवता देखील सत्य सांगता येते. असा भक्त समर्थांनी सांगितल्याप्रमाणे सदा सर्वदा म्हणजे नेहमी सत्य बोलतो. परंतु या सत्य बोलण्यात विवेकाचा वापर तो करतो. एखाद्या अत्यवस्थ किंवा शेवटच्या घटका मोजत असणाऱ्या रुग्णाला जर आपण भेटायला गेलो आणि त्याला म्हटले की आता ही तुझी शेवटची अवस्था आहे. त्यातून तू बरा होणार नाहीस. असे बोलणे सत्य जरी असले तरी ते अविवेकाचे आहे. म्हणून अशा वेळी विवेकाचा वापर करून, ” तू बरा होणार आहेस. तुला लवकरच बरे वाटेल. ” अशा प्रकारचा धीर देणे उपयुक्त ठरते.

खोटे बोलणे आणि स्वतःच्या असत्य वागण्याचे लटके समर्थन करीत राहणे ही सवय बऱ्याच लोकांना असते. परंतु काही काळानंतर लोकांना अशा माणसांचा स्वभाव लक्षात येतो आणि मग त्यांच्या बोलण्यावर ते फारसा विश्वास ठेवत नाहीत. ते बोलतात एक करतात दुसरे आणि वागतात तिसऱ्या प्रकारचे. अशा वागणाऱ्यांसाठी समर्थांनी त्रिवाचा हा शब्द वापरला आहे. म्हणजे ज्यांच्या वागण्याबोलण्यात एकवाक्यता नसते अशा व्यक्ती. परमेश्वराचा खरा भक्त कधीही असत्य बोलून आपली जीभ विटाळत नाही. त्याला खोटे बोलण्याची गरजही भासत नाही. कारण त्याला काही लपवायचे नसते. खोटे ते बोलणाऱ्या माणसाला आपल्या बोलण्याची वेगवेगळी कारणे सांगावी लागतात. आणि आपण आधी काय बोललो होतो हे लक्षात ठेवावे लागते. भक्त हा निर्मळ मनाचा आणि सरळ स्वभावाचा असतो. त्यामुळे त्याच्या वागण्या बोलण्यात एकवाक्यता असते. त्यामुळे तो जे बोलतो ते सत्यच असते. त्याचे शब्द त्याच्या निर्व्याज आणि निरलस व्यक्तिमत्त्वाचे प्रतिबिंब असतात.

– – आणि ज्याच्या शब्दांत सत्य, नम्रता आणि विवेक असतो, तोच खरा “सर्वोत्तमाचा दास” ठरतो.

स्वसंवाद :

१) माझ्या बोलण्यात नम्रता आणि माधुर्य आहे का?

२) “स्पष्ट बोलतो” या नावाखाली मी कधी दुसऱ्याला दुखावतो का?

३) सत्य बोलताना मी विवेकाचा वापर करतो का?

४) माझे विचार, बोलणे आणि वागणे यात सुसंगती आहे का?

– – – – 

श्लोक क्र. ५४

सदा सेवि आरण्य तारुण्यकाळी |

मिळेना कदा कल्पनेचेनि मेळी |

चळेना मनी निश्चयो दृढ ज्याचा |

जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा |५४|

अर्थ : जो भक्त तरुणपणी एकांतात राहून आपला काळ घालवतो, कल्पनेच्या राज्यात जो रमत नाही, ज्याची भगवंतावरील श्रद्धा अढळ असते, असा भक्त खरोखरच त्या सर्वोत्तम असलेल्या भगवंताचा जगामध्ये धन्य असलेला दास आहे.

(सेवि – काळ घालवणे, आरण्य – एकांतवास, मिळेना – मिसळत नाही, मेळी – समूह, चळणे – परावृत्त होणे)

विवेचन : ज्या व्यक्तीला भगवंताची ओढ लागलेली अशी व्यक्ती तरुणपणातच एकांतात राहून त्याचे ध्यान किंवा नामस्मरण करणे पसंत करते. इथे समर्थांनी अरण्य हा शब्द जरी वापरलेला असला तरी प्रत्यक्षात अरण्यातच जाऊन राहिले पाहिजे असा त्याचा अर्थ नाही तर भगवंत प्राप्तीसाठी एकांतात जाऊन तपश्चर्या करणे आवश्यक आहे हा त्याचा अर्थ घेता येतो. आजच्या काळात ही गोष्ट थोडीशी विचित्र वाटेल. तरुणपणातच कसे काय एकांतात राहायचे आणि भगवंताचे ध्यान करायचे? ती तर म्हातारपणी करण्याची गोष्ट आहे अशी आपली समजूत असते. पण साधना ही पुढे ढकलण्याची गोष्ट नव्हे तर तरुणपणीच करण्याची गोष्ट आहे.

एकांताची सवय होण्यासाठी घरातील एखादा निवांत कोपरा किंवा जवळचे एखादे शांत मंदिर अशा ठिकाणी जाऊन स्वसंवाद करता येईल. काही काळ टीव्ही, मोबाईल यासारख्या गोष्टींपासूनही दूर राहण्याची सवय करावी लागेल.

पण समर्थ या अनुभवातून गेले आहे. “आधी केले मग सांगितले” असेच त्यांचे बोल आहेत. अगदी तरुणपणी त्यांनी नाशिक जवळील टाकळी येथे राहून बारा वर्षांचा काळ एकांतात घालवला. ज्ञानेश्वरादी भावंडांनी एकांतात राहूनच तपश्चर्या केली. संत तुकाराम महाराज भंडारा डोंगरावर एकांतात आपला काळ घालवित असत.

तरुण वयात उत्साह असतो, काहीतरी करण्याची जिद्द असते अशावेळी एकांताचे सेवन सहज होऊ शकते. जेव्हा सगळी गात्रे थकलेली असतात अशावेळी एकांतात राहणे मनुष्याला शक्य होत नाही. वृद्धापकाळी मुलांशी पटत नाही म्हणून जंगलात जाऊन राहणे हे लादलेले वैराग्य म्हणता येईल. तीर्थयात्रा, निरनिराळ्या ग्रंथांचा अभ्यास, भजन, प्रवचन, कीर्तन इत्यादी गोष्टी तरुणपणीच उत्तमरीत्या करता येतात. मुखात रामाचे नाव तरुणपणीच यायला हवे. आयुष्यभर जर जिभेवर राम नाही आला तर अंतिम समयी तरी तो कसा येईल? त्यावेळीही कामच आठवेल.

तरुणपणीच भगवत भजनात रमलेला माणूस चुकूनही कल्पनेच्या राज्यात रममाण होत नाही. जी माणसे कल्पनेच्या राज्यात रमतात, ती कोणतेच कर्तव्य नीट पार पाडू शकत नाहीत. एकांताची सुद्धा सवय व्हावी लागते. एकांत पचावा लागतो. त्याची सवय व्हावी लागते. काही लोकांना समूहात राहण्याची एवढी सवय असते की ते एकांत सहन करू शकत नाहीत. पण सदैव लोकांमध्ये राहिले तर काही काळाने माणसाचे मन मलिन होते आणि मग अशा वेळी एकांत आणि स्व चिंतन आवश्यक असते. म्हणूनच पूर्वीची माणसे काही काळ साधनेसाठी म्हणून घरातून निघून जात असत. आणि काही काळानंतर परत येत असत. दैनंदिन जीवनातील ताणतणाव, धावपळ इत्यादी गोष्टींना कंटाळलेली काही माणसे वर्षातून काही दिवस नियमितपणे विपश्यनेसाठी जातात त्याचाही उद्देश हाच असतो.

एखाद्याला भगवंत प्राप्तीची ओढ लागली तरी त्याचा उत्साह काही दिवस टिकतो आणि पुन्हा येरे माझ्या मागल्या सुरू होते. कारण लोकांमध्ये राहून त्याच्या मनात वेगवेगळे विचार येतात. तर कधी त्याचा बुद्धिभेद होतो आणि त्याचा जो निश्चय असतो तो ढळतो. माणसाचे मन अतिशय चंचल असते. बंधनात राहणे, एकच एक गोष्ट करणे त्याला आवडत नाही. म्हणून करुणाष्टकामध्ये समर्थ म्हणतात, ” घडी घडी बिघडे हा निश्चयो अंतरीचा, म्हणवुनी करुणा हे बोलतो दीनवाचा… “परंतु परमेश्वराचा जो खरा भक्त असतो आणि तरुणपणापासूनच जाऊ भगवंत प्राप्तीसाठी प्रयत्नशील असतो अशा व्यक्तीचा निश्चय कधीही ढळत नाही अशी व्यक्ती म्हणजे परमेश्वराची खरोखरच प्रिय भक्त असते.

स्वसंवाद :

१) मी साधना/नामस्मरण “नंतर करू” असे पुढे ढकलतो आहे का?

२) माझ्या दिवसात मला एकांतासाठी किती वेळ मिळतो? की मी तो जाणीवपूर्वक टाळतो?

३) मी वास्तवात कृती करतो का, की कल्पनांच्या जगातच रमतो?

४) माझा आध्यात्मिक निश्चय किती दृढ आहे? अडचणी आल्या की तो ढळतो का?

५) आजपासून मी एक छोटी पण सातत्यपूर्ण साधना सुरू करू शकतो का? 

– क्रमशः श्लोक ५३ आणि ५४.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “यह कैसा स्वागत ?” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “यह कैसा स्वागत ?” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

अस्पताल में एक उच्च पद पर कार्यरत महिला ने बच्ची को जन्म दिया । अस्पताल की सबसे सीनियर महिला डाॅक्टर आई और उस।अधिकारी को बुरा सा मुंह बना कर कहने लगी-हमने सोचा था कि आप पढ़ी लिखीं हैं और आपने अल्ट्रासाउंड करवा रखा होगा । पर हमें क्या मालूम था कि आपने भगवान् भरोसे सब कुछ छोड़ रखा है ।

महिला अधिकारी चौंकी । फिर पूछा -यदि मैंने पहले से सब कुछ करवा रखा होता तो फिर क्या फर्क पड़ता?

– कम से कम हमारे स्टाफ को तो इनाम मिल जाता । महिला डाॅक्टर ने बड़ी बेशर्मी से कहा ।

– बस । इसी कारण आपने मेरी नवजात बच्ची का स्वागत् नहीं किया ?

– हां । हमारे स्टाफ को कुछ ऐसी ही उम्मीद थी आपसे ।

– कोई बात नहीं । आप स्टाफ को बुलाइए ।

सारा स्टाफ आ गया और महिला अधिकारी ने सबको इनाम दिया लेकिन उसके बाद अपने पति को बुलाकर अपना सारा सामान समेट लिया । पति ने पूछा -ऐसा क्यों कर रही हो ?

महिला अधिकारी ने पति के गले लगकर रोते कहा -इस अस्पताल में मैं एक पल और नहीं रहूंगी क्योंकि इन लोगों ने मेरी बच्ची का स्वागत् नहीं किया ।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

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संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५४ – लघुकथा ☆ पिता की चिंता ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५४ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ पिता की चिंता ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

ट्रेन में बड़ी भीड़ थी, लेकिन देवीदयाल को अपनी बिटिया के घर जाना जरुरी था। बेटी की ससुराल की तरफ से आयी एक खबर ने देवी दयाल को डरा दिया था । उन्हें हर हाल में आज ही अपनी बेटी की ससुराल जाना था । ट्रेन में बहुत भीड़ थी, लेकिन उन्हें हर हाल में ट्रेन पर चढ़ना ही था।

आइए बाबूजी, आप ऊपर आ आइए,यह कहते हुए उस युवक ने देवीदयाल की बांह को पकड़कर ट्रेन के अंदर खींच लियाl बाबूजी आपने अपने इन्हीं हाथों से सुधा का हाथ मेरे हाथ में दिया थाl आप सुधा की चिंता मत कीजिए, उसे कोई भी इस घर से निकाल नहीं सकताl अब वह मेरे पास ही रहेगीl देवीदयाल ने युवक के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,बेटा..मेरी यात्रा का उद्देश्य पूरा हो गया, अब अगले स्टेशन पर उतर जाऊँगाl

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

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