ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (9 मार्च से 15 मार्च 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (9 मार्च से 15 मार्च 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। आजकल मैं पंडित अनिल पाण्डेय हर सप्ताह आपके पास साप्ताहिक राशिफल के अलावा श्री हनुमान चालीसा के दो चौपाइयों को लेकर आता हूं जो आपकी विभिन्न परेशानियों में मंत्र काम करेगीं।

आज की पहली चौपाई है:-

कंचन बरन बिराज सुबेसा, कानन कुंडल कुंचित केसा॥

हनुमान चालीसा की इह चौपाई के संपुट पाठ करने से आर्थिक समृद्धि, अच्छा खानपान, अच्छा संस्कार और अच्छा पहनावा प्राप्त होगा।

इस सप्ताह राहु, मंगल और बक्री बुध कुंभ में, तथा शुक्र और शनि मीन राशि में गोचर करेंगे। सूर्य प्रारंभ में कुंभ राशि में रहेगा तथा 14 तारीख के 3:30 रात से मीन राशि में प्रवेश करेगा। प्रारंभ वक्री गुरु मिथुन राशि में रहेगा तथा 11 मार्च के 4:36 शाम से मिथुन राशि में ही मार्गी हो जायेगा। आईये अब हम राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का योग है। भाई बहनों के साथ संबंध नरम-गरम रहेंगे। धन आने की मात्रा भी कम रहेगी। आपका आपके माता-पिता जी का तथा आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य पहले जैसा ही रहेगा। छात्रों की पढ़ाई अच्छी चलेगी। संतान का आपके सहयोग प्राप्त होगा। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह ठीक है। इस सप्ताह आपको कचहरी के कार्य में सफलता प्राप्त हो सकती है परंतु उसके लिए आपको बहुत सतर्क होना पड़ेगा। शत्रुओं से आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 14 और 15 मार्च कार्यों को करने के लिए शुभ है। 9, 10 और 11 तारीख को अगर कोई दुर्घटना होती है तो उसे आप साफ-साफ बच जाएंगे। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है। ‌

वृष राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। अगर आप नौकरीपेशा है तो इस सप्ताह आपको थोड़ा सावधान रहना चाहिए और अपनी वाणी पर कंट्रोल करना चाहिए। अगर आप व्यापारी हैं तो आपके लिए यह सप्ताह ठीक है। जनप्रतिनिधियों के लिए भी यह सप्ताह अच्छा है। आप की प्रतिष्ठा बढ़ सकती है। संतान से आपको इस सप्ताह सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। इस सप्ताह आपके लिए 14 और 15 तारीख कार्यों को करने हेतु सफलता दायक हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सतर्क रहना चाहिए। अगर आप अविवाहित हैं तो इस सप्ताह 9, 10 और 11 को आपके पास विवाह के उत्तम प्रस्ताव प्राप्त हो सकते हैं। इस सप्ताह के सभी दिनों में आपको सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन तांबे के पात्र में जल अच्छत और लाल पुष्प लेकर भगवान सूर्य को जल अर्पण करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मिथुन राशि

अगर आप नौकरी करते हैं तो यह सप्ताह आपके लिए काफी अच्छा हो सकता है। व्यापारियों के लिए भी यह सप्ताह अच्छा है। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह थोड़ा कम ठीक रहेगा। भाग्य से आपको मदद कम मिलेगी। आपको अपने परिश्रम पर ज्यादा यकीन करना पड़ेगा। इस सप्ताह आपके लिए 12 और 13 तारीख सफलता प्राप्त करने के लिए उचित है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह भाग्य आपका पूर्ण रूप से साथ देगा। आपके जो भी कार्य भाग्य की वजह से रुके हुए हैं उनको करने का प्रयास करें। इस सप्ताह आपके खर्चे में वृद्धि हो सकती है। मकान खरीद सकते हैं या बच्चे की शादी वगैरह में पैसा खर्च कर सकते हैं। भाई बहनों के साथ आपके संबंध ठीक नहीं रह पाएंगे। मामूली पैसे आने का योग है। दुर्घटनाओं से इस सप्ताह आपको सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 14 और 15 तारीख सफलता हेतु उपयोगी है। 12 और 13 तारीख को आपको सजग रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान जी की पूजा करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। जन प्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। व्यापारियों के लिए भी यह सप्ताह उत्तम है। नौकरीपेशा लोगों के लिए यह सप्ताह सावधान रहने का है। भाग्य से इस सप्ताह आपको कोई विशेष लाभ नहीं हो पाएगा। आप अपने परिश्रम पर विश्वासकरें। कम धन आने की उम्मीद है। इस सप्ताह आपके लिए 9, 10 और 11 तारीख ठीक है। 14 और 15 तारीख को आपको सावधान रहकर कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

कन्या राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह उत्तम है। प्रेम के नए-नए संबंध भी बढ़ सकते हैं। विवाह के नए-नए संबंध आएंगे। आपका प्रेम संबंध में भी वृद्धि होगी। शत्रुओं को आप इस सप्ताह आसानी से पराजित कर सकते हैं। इस सप्ताह आपको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह उत्तम रहेगा। कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह ठीक है। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह सावधान रहने का है। इस सप्ताह आपके लिए 12 और 13 तारीख कार्यों को करने के लिए लाभदायक है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। 9, 10 और 11 तारीख को आपको अपने भाई बहनों और अपने पराक्रम के प्रति सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह आपका आपके जीवनसाथी का और माता-पिता जी का स्वास्थ्य पहले जैसा ही ठीक रहेगा। शत्रु शांत रहेंगे। प्रयास करने पर समाप्त भी हो सकते हैं। छात्रों की पढ़ाई में बाधा पड़ सकती है। आपको अपने संतान का बहुत कम सहयोग प्राप्त होगा। 10 और 11 तारीख को आपको धन के प्रति सतर्क रहना चाहिए। 14 और 15 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों हेतु अनुकूल हैं। 14 और 15 तारीख को आपके अधिकांश कार्य सफल हो सकते हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह आपके संतान को लाभ होगा। संतान का आपको अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह अगर आप कोई परीक्षा देंगे तो उसमें सफलता प्राप्त करेंगे। दुर्घटनाओं से आपको इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। जनप्रतिनिधियों के लिए सप्ताह अनुकूल नहीं है। व्यापारियों के लिए सप्ताह ठीक है। इस सप्ताह आपके लिए 9, 10 और 11 तारीख कार्यों के संपन्न करने के लिए शुभ है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपको भाग्य से मदद मिलेगी। आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह उत्तम रहेगा। व्यापारियों के लिए सप्ताह ठीक है। कर्मचारियों को इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। उन्हें अपनी जिव्हा को कंट्रोल में करना चाहिए। शत्रुओं को आप इस सप्ताह पराजित कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 12 और 13 तारीख कार्यों को करने के लिए परिणाम दायक हैं। 9, 10 और 11 तारीख को अगर आप प्रयास करेंगे तो कचहरी के कार्यों में आपको सफलता प्राप्त हो सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

मकर राशि

इस सप्ताह आपका आपके जीवनसाथी का और आपके माताजी पिताजी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। भाइयों से आपके संबंध अच्छे रहेंगे। आपके पराक्रम में वृद्धि होगी। पेट संबंधी रोगों के प्रति सतर्क रहें। छात्रों को सावधान रहना चाहिए। व्यापारियों और नौकरी पेशा लोगों के लिए सप्ताह ठीक है। इस सप्ताह आपके लिए 14 और 15 मार्च लाभदायक है। 12 और 13 मार्च को आपको किसी भी कार्य को बड़ी सतर्कता पूर्वक करना चाहिए। अगर आप सतर्कता से कार्य नहीं करेंगे तो कार्य संपन्न नहीं हो पाएंगे। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। नौकरी करने वालों के लिए भी यह सप्ताह ठीक है। इस सप्ताह आप अपने स्वास्थ्य के प्रति थोड़ा सतर्क रहें। आपके जीवनसाथी का तथा माता और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। जनप्रतिनिधियों को अपने प्रतिष्ठा के प्रति इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। दुर्घटनाओं के लिए भी आप को सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 9 10 और 11 तारीख विभिन्न प्रकार के राजकीय कार्यों के लिए उपयुक्त हैं। 14 और 15 तारीख को आपको सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मीन राशि

अगर आप अविवाहित हैं तो यह सप्ताह आपके लिए ठीक है। आपको विवाह के नए-नए प्रस्ताव प्राप्त होंगे। आपका, तथा आपके माता और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। जीवनसाथी के स्वास्थ्य में थोड़ी समस्या आ सकती है। कचहरी के कार्यों में अगर आप सावधानी से कार्य करेंगे तो सफलता मिल सकती है। भाई बहनों के प्रति आपका संबंध पहले जैसा ही रहेगा। उसमें कोई गिरावट या उछाल नहीं आएगा। इस सप्ताह आपके लिए 12 और 13 तारीख कार्यों को करने के प्रति उपयुक्त हैं। 9, 10 और 11 तारीख को आपको भाग्य के भरोसे कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

आईये अब हम श्रीहनुमान चालीसा के आज की दूसरी और तीसरी चौपाई के बारे में चर्चा करते हैं।

आज की दूसरी और तीसरी चौपाई है:-

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजे, काँधे मूँज जनेउ साजे।

शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग बंदन।

हनुमान चालीसा की ये चौपाइयां विजय दिलाती है। इनके संपुट पाठ से व्यक्ति के ओज और कांति में वृद्धि होती है।

“ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ संपादकीय निवेदन – The Art Avenue International Brooklyn Galleria Excellence Award 2026 – डॉ. भारती माटे – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

डॉ. भारती माटे

💐 अ भि नं द न !! 💐 हार्दिक अभिनंदन !!!💐

आपल्या ई-अभिव्यक्ती साहित्य मंचातर्फे आपण गेली चार वर्षे अतिशय देखणा असा दिवाळी विशेषांक प्रकाशित करतो आहोत. हे देखणेपण अंकाच्या मुखपृष्ठापासूनच वाचकांचे लक्ष वेधून घेते. या अंकांचे फार सुंदर आणि देखणे मुखपृष्ठ आपल्याला तयार करून देणाऱ्या चित्रकार सुश्री डॉ. भारती माटे यांचे आपल्या सर्वांतर्फे खास अभिनंदन करण्यासाठी आजचे हे खास संपादकीय… 

नुकताच डॉ. भारतीताई यांना “The Art Avenue International Brooklyn Galleria Excellence Award 2026 in the category of Paintings! “ हा आंतरराष्ट्रीय पुरस्कार देऊन गौरवण्यात आलेलं आहे. 


या संस्थेविषयी आणि पुरस्काराविषयी अगदी थोडक्यात सांगायचे तर – –  

Art Avenue is the leading International Art Competition & Exhibition in INDIA I UK & INTERNATIONAL ARTIST’S International Brooklyn Award by Art Avenue is an independent Art Center of Excellence that offers a platform for everyone to create, collaborate and reflect upon social issues & others through the arts.

या निमित्ताने डॉ. भारती माटे यांच्या इथपर्यंतच्या यशस्वी वाटचालीबद्दल थोडेसे जाणून घेऊ या. 

डॉ.भारती माटे – –  स्टेट बँकेत ३३ वर्ष नोकरी आणि बँकेत असतानाच छंद म्हणून जोपासायला सुरुवात केलेल्या चित्रांचं पुढे व्यवसायात रूपांतर करण्यात त्यांनी सुयश मिळवलेले आहे.. आत्तापर्यंत तीन आर्ट रिसर्च प्रोजेक्ट केले – – –                     

पहिला प्रोजेक्ट :

मध्यप्रदेशातील भीमबेटक्याच्या गुफांमधील, सात कालखंडातील काढलेल्या चित्रशैली आणि चित्रांचा प्रवास. साधारणपणे ४००००-१००००० वर्षांपूर्वीची शिलाचित्रे, आणि त्याचे विशेष म्हणजे रंगीत चित्रे, (pigmented Rock art) ह्यावर संशोधनात्मक  लेखन  व चित्र निर्मिती.

दुसरा प्रोजेक्ट :

सिंधू संस्कृतीतील कलाविष्कार – – त्यांनी साधारणपणे दहा ते बारा वर्षे ह्या प्रोजेक्टवर काम केलं.  त्याच्यातून आठ ते दहा एकल चित्र प्रदर्शने, 15 ते 20 ग्रुप शो, आणि हा प्रोजेक्ट लोकाभिमुख करण्याच्या दृष्टिकोनातून भेटपत्रे, चित्रे, चित्र प्रदर्शने, डायरी, कॅलेंडर अशा माध्यमातून लोकांपर्यंत पोहोचवण्याचा प्रयत्न केला.                 

 प्रोजेक्ट तिसरा :

ड्रायफ्रेस्कोज् ऑफ रंगावली ऑन कॅनव्हास.. .. .. त्यांनी जमिनीवर असणारी रांगोळी ड्रायफ्रेस्को पद्धतीने कॅनव्हासवर आणली. जमिनीवर असलेल्या रांगोळीला उभं करण्यात त्यांना यश प्राप्त करता आलं आहे . आपल्या दिवाळी अंकांची मुखपृष्ठे त्यांनी याच पद्धतीने चितारलेली आहेत. विशेष म्हणजे याच कलाविष्काराबद्दल Irvine, USA या अमेरिकन विद्यापीठाने त्यांना पी.एच.डी. प्रदान केलेली आहे. 

.. .. .. आजपर्यंत त्यांना दोन इंटरनॅशनलतीन नॅशनल आणि पाच स्टेट अवॉर्ड्स मिळाली आहेत.   त्याच्यात भर म्हणून आता नुकताच आर्ट अवेन्यू ब्रुकलीन इंटरनॅशनल कॉम्पिटिशन फॉर पेंटिंग अँड फोटोग्राफीमध्ये 2026 चे एक्सलन्स अवॉर्ड 2026′ त्यांना मिळालेले आहे.  

नुकत्याच मिळालेल्या या सुप्रतिष्ठित पुरस्काराबद्दल त्या सांगतात.. 

.. ..” या सदर प्रदर्शनात मी व माझे सहचित्रकार सुनील बलकवडे आम्ही दोघांनी वैयक्तिक सहभाग घेतला होता. पंतप्रधान श्री नरेंद्र मोदीजींच्या 75 व्या वाढदिवसानिमित्त केलेल्या ‘वसुधैव कुटुंबकम्‘, या विषयावरील सात चित्रांच्या मालिकेला हे बक्षीस मिळालं. 

.. .. .. भारतामध्ये साधारणपणे साडेसहाशे लोककला आहेत..  रांगोळी ही त्यापैकीच एक.  त्यातल्या अनेक कला आता संपत चाललेल्या आहेत.  अशा वेळेला तिला काय करून जपता येईल अशा प्रयत्नांमधून ही फ्रेस्को चित्रशैली जन्माला आली, त्याच्यावर आम्ही साधारणपणे दहा ते बारा वर्षे काम केलं आणि आता हे कॅनव्हास आपण जगभर कुठेही पाठवू शकतो इतकी सिद्धता आता प्राप्त झालेली आहे.   आपण स्वतःच  एक प्रोजेक्ट घेऊन ‘रांगोळी’ ही संपत असणारी कला कशी सांभाळून ठेवू शकू ? या विचारातून या प्रोजेक्टला सुरुवात झाली. 

.. .. .. भारतीय चित्रकलेत रांगोळीचा चेहरा हा मुळातच प्रतीकात्मक आहे आणि प्रतिकात्मक रांगोळी मधील रेषा ही त्यांची चैतन्य केंद्रे आहेत.

.. .. .. भारतीय कला विश्वात आपल्याकडे मुळामध्ये वेद आणि उपनिषदिक वाड्गमय हे अपौरुषेय आहे, परम आध्यात्मिक वैभव आहे .. इतके की त्यातील शब्द, श्लोक, सुभाषिते असतील, मंत्र जप असतील, बिजाक्षर असतील किंवा काही चांगली वाक्यं असतील, तर अशा सगळ्या ‘ स्क्रिपचर्स ‘ माध्यमातून ती आपल्यापर्यन्त पोचतात, कारण ही स्क्रिपचर्स म्हणजे थॉट फॉर्मस् आहेत, आणि हे थॉट फॉर्मस् आपल्याला चित्रांमध्ये परिवर्तित करता येतात हे जेव्हा मला कळलंतेव्हा काम करताना खूप मजा यायला लागली, आणि त्यामुळे या चित्रमालिकेमध्ये सुद्धा आपण वेदांनी उदघोषित केलेल्या वाक्यातून प्रेरणा घेऊन ‘वसुधैव कुटुंबकम्‘, चा विचार प्रत्येक वैयक्तिक चित्रातून मांडण्याचा प्रयत्न आम्ही केलेला आहे . नमुन्यादाखल सदर मालिकेतील एक चित्र सोबत जोडले आहे…ज्याचे शीर्षक आहे.. 

‘Save Nature, A Sacred Duty’. 

(कृपया enlarge करून पहावे). 


या पुरस्कारप्राप्त चित्राबद्दल मी इतकेच सांगेन की – 

“Our series of seven paintings on Vasudhaiva Kutumbakam—born from the sacred light of Prime Minister Narendra Modiji’s 75th birthday—has touched souls across oceans.

This isn’t mere award—it’s affirmation that art bridges hearts, just as Modiji’s vision, unites Bharat with the world…  From Pune’s studios to Brooklyn’s galleries!! “ 

भारती माटे. 

***** 

इतका व्यापक आणि अत्यंत मोलाचा विचार आपल्या कलेच्या माध्यमातून जगभरात पोहोचवण्याचा भारतीताईंचा हा यशस्वी प्रयत्न खरोखरच अपवादात्मक आणि अत्यंत गौरवास्पद आहे.  

– – आपल्या सर्वांतर्फे सुश्री डॉ.भारती माटे यांचे अतिशय मनःपूर्वक अभिनंदन आणि या आगळ्या वेगळ्या वाटेवरचा त्यांचा यापुढील प्रवासही असाच यशस्वीपणे सातत्याने चालू रहावा यासाठी त्यांना असंख्य हार्दिक शुभेच्छा. 

संपादक मंडळ

ई अभिव्यक्ती मराठी

 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – क्षण सृजनाचा ☆ ‘रंग… नको बेरंग..’ ☆ श्री दिवाकर बुरसे ☆

श्री दिवाकर बुरसे

☆ क्षण सृजनाचा ☆ ‘रंग… नको बेरंग..’ ☆ श्री दिवाकर बुरसे

होळी व धूलिवंदनाच्या सर्वांना शुभेच्छा! 

या शुभेच्छा देताना ‘यंत्रदास’ आम्हाला सुरक्षिततेच्या काही सूचनाही आवर्जून देतो. सणाच्या रंगांचा बेरंग होऊ नये म्हणून या सूचनांचे पालन करावे आणि सणाचा आनंद लुटावा अशी त्याची आग्रहाची विनंती आहे.

‘श्री सुरक्षितताबोध’ या ग्रंथाच्या ‘बालक्रीडनसुरक्षिततानाम’ अध्याय ५.  श्लोक १२ ते १४ मधे यंत्रदास सांगतोय.

 *

आहा.  बाळके खेळतीं रंग होळी

जळीं लोळतीं (लावुनी भांग गोळी?)

फुगे फोडितीं.  फेकितीं रंग नाना

सिनेमानटासारखे छंद नाना ll१२ll

 *

किती रंग ते.  काय त्यांची झळाळीं!

तेलातले रंग.  ख्याती निराळी

निळे.  तांबडे.  पांढरे वा रुपेरी

जरा लागता… त्याहुनी मिर्चि बsरी! ll१३ll

 *

मना! ऐशिं होळी न केव्हाच खेळीं

(रहावे सुखे खाउनी फक्त पोळी!)

असे रंग ते भंगवीतीं शरीरा

तसा लागतो रे करावा खरारा ll१४ll

*

टीप:-

खरारा: घोड्याचे अंग स्वच्छ करण्याच्या क्रियेला ‘खरारा करणे’ म्हणतात. त्यासाठी वापरल्या जाणा-या बोथट दातेरी.  काटेरी पत्र्यालाही ‘खरारा’ म्हणतात.

यंत्रदास: ‘यंत्रदास’ या टोपण नावाने १९९३ साली ‘ श्रीसुरक्षिततोध ‘ नावाचा.  ‘सुरक्षितता’ (Safety ) या विषयावर मी लिहिलेला ग्रंथ पुण्याच्या ‘टेल्को’ – आताची ‘टाटा मोटर्स’ या कंपनीने प्रकाशित केला होता. ‘ सुरक्षिततेविषयी सामाजिक जाणिवा प्रगल्भ करणारा उत्कृष्ट ग्रंथ’ म्हणून महाराष्ट्र शासनाने विशेष पुरस्कार देऊन या ग्रंथास सन्मानिले आहे.

© श्री दिवाकर बुरसे

पुणे

संपर्कः ९२८४३००१२५, ९५५२६२९२४५

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ स्त्री कालची आणि आजची… ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

?  विविधा ?

☆ स्त्री कालची आणि आजची…  ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

रामायण आणि महाभारत ही आपली महाकाव्ये. या दोन पौराणिक कथानकातून स्त्री ची विविध रूपे समोर आली. अहिल्या, द्रौपदी, सीता, तारा, मंदोदरी या

लेखक स्त्रिया महान पतिव्रता म्हणून जनमानसात रूजल्या गेल्या. यांचे केवळ स्मरण केल्याने महापातकांचा नाश होतो असे संस्कार या काळात केले गेले.

संत वाङमय, पंत वाड़मय आणि शाहिरी फड यातून वर्णिलेली स्त्री लोकसाहित्याचा विशेष भाग ठरली. जनमानसात खोलवर रूजलेली ही स्त्री, समस्त नारीशक्ती समाजाशी संवाद साधत गेली. माया, ममता आणि करूणा या भावनांच्या मुशीतून घडलेली ही स्त्री त्याग, समर्पण आणि विश्वास या त्रिसूत्रीतून स्वतःला, कुटुंबाला, समाजाला घडवीत गेली.

पौराणिक काळातील स्त्री पातिव्रत्य, हे अस्त्र समजून स्वसंरक्षण करीत गेली. सत्यवती, माद्री, कुंती गांधारी, सुनिती, सुरूची, आदिती, छाया, अनुसया, लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती, यशोदा, देवकी, रूक्मिणी सुभद्रा या, सर्व स्त्रियांनी उत्पत्ती, स्थितीआणि लय यांचा समतोल राखण्यासाठी वेळीवेळी सत्व परीक्षा दिली. पुरुष प्रधान संस्कृती चा संघर्ष त्या काळापासून आज तागायत ही स्त्री करीत आहे.

कालची स्त्री जेव्हा जेव्हा बंड पुकारून जागृत झाली तेव्हा तेव्हा ती समाजासाठी आदर्श ठरली. पण हे आदर्श पण टिकवायला तिला स्वतःला अतोनात कष्ट सहन करावे लागले. संत मीराबाई, संत जनाबाई, संत सखू, संत कान्होपात्रा, संत मुक्ताबाई यांचा जीवन प्रवास अत्यंत कष्टमय होता. यांच्या शब्द सुमनांची वैजयंती माळा विठ्ठलाच्या गळ्यात पडली पण त्यासाठी समाजकंटकाची वासनांध नजर, कर्मठ रूढी परंपरांची तीक्ष्ण धारधार सुई काळजात आरपार टोचून घ्यावी लागली.

ऐतिहासिक कालखंडात स्त्री ने पौराणिक काळातील शस्त्र विद्येचा अभ्यास करून न्यायासाठी, संघर्षासाठी रणांगणात उतरली. छत्रपती शिवाजी महाराज यांची जन्मदात्री एकमेव ठरली. यानंतर अशी स्त्री जन्मली नाही असे खेदाने म्हणावे लागेल. कारण आजतागायत प्रति शिवाजी जन्माला आलेला नाही. शिवाजी महाराजांनंतर शिवशाहीतील दोन स्त्रीयांनी वर्षानुवर्षे तुरूंग वास भोगला. महाराणी येसूबाई, आणि ताराबाई या दोन स्त्रिया होत. एकीने स्वराज्यासाठी यवनी कैद स्विकारली तर ताराबाई सवती सुभ्यामुळे स्वराज्यातच कैदेत होत्या. महाराणी जोधाबाई, झाशीची राणी, राणी चन्नमा, चांदबिबी, मुमताज, रमाबाई, आनंदी बाई या स्त्रिया शेवटपर्यंत लढा देत गेल्या.

या सर्व इतिहासाचा मागोवा घेत सावित्री, रमाई, अहिल्याबाई, आनंदी जोशी, रमाबाई रानडे या स्त्रिया स्वतः साक्षर झाल्या. मुलगी शिकली प्रगती झाली हे ब्रीदवाक्य इतिहासात कोरले गेले ते यांनी केलेल्या समाज कायामुळे. आज प्रत्येक क्षेत्रात महिला अत्यंत विश्वासाने मोठ मोठ्या पदांवर कार्यरत आहेत. कला, उद्यम आणि संस्कृती या क्षेत्रात महिला आघाडीवर आहेत. पण चार भिंतीच्या आत आजची स्त्री अजूनही असुरक्षित आहे. कौटुंबिक हिंसाचाराला बळी पडणार्‍या स्त्रिया त्यांच्या वेदना आजही कुठेतरी धुमसत आहेत.

कालची स्त्री आणि आजची स्त्री रूपे आणि स्वरूप बदलले आहे. पण त्याग, समर्पण, अवहेलना स्री ला आजही चुकलेली नाही. आजची स्त्री समाजात अर्थार्जनासाठी बाहेर पडताना आजही सर्व कौटुंबिक जबाबदाऱ्या पार पाडून पुरूषी अहंकाराचा सामना करीत कुटुंबाला सावरीत आहे. सत्ता, पैसा आणि वासना यांचा उपभोग घेण्यासाठी आजही स्त्री वापरली जाते, विकली जाते, रूढी परंपरांच्या नावाखाली नागवली जाते.

विभक्त कुटुंबाची वाढत जाणारी संख्या सासू सून संघर्ष, माहेरचे अती लाड, इगो प्राॅब्लेम, पैशाची गुर्मी यात अजूनही स्त्री प्रमुख पात्र म्हणून खेळवली जाते.

अनाथ आश्रम, वृद्धाश्रम, पाळणाघर या समस्येला सामोरे जाणारी स्त्री समाजाकडून आजही दोषी ठरवली जाते. माता, भगिनी, पत्नी, सखी या रूपात समोर येणारी स्री आजही पुरूषी अत्याचाराला बळी पडत आहेत.

काळ बदललाय, माणूस बदललाय, जमाना बदललाय. . .असः नेहमी ऐकतो आपण. कोणी घडवले हे बदल? माणसानच आपली विचारसरणी बदलली आणि दोष बदलत्या काळाला आणि स्त्री ला पुरूष वर्ग परस्पर देऊन मोकळा झाला. आपण समाजात रहातो. . . समाजाचे देणे लागतो. . . ही संकल्पना प्रत्येकाने सोइस्कर अर्थ लावून बदलून घेतली. स्वतःची जीवनसंहिता ठरवताना प्रत्येकाने माणसापेक्षा पैशाला अधिक महत्त्व दिले अन तिथेच नात्यात परकेपणा आला.

चार पायाच्या प्राण्यांना

 हौसेने पाळतात माणसं

 दोन पायाच्या आप्तांना

 मोलानं सांभाळतात माणसं .

हे आजचं वास्तव आहे. विभक्त कुटुंब पद्धतीतून जन्माला आलेली ही विचार सरणी. आज ”हम दो हमारा एक” चा नारा लावणारे सुशिक्षित पाळीव, मुक्या प्राण्यांवर अतोनात भूतदया दाखवतात. अन जन्मदात्या आईवडिलांना मात्र वृद्धाश्रमाचा रस्ता दाखवतात. मी मी म्हणणारे सुशिक्षित पतीपत्नी दिवसरात्र घराबाहेर रहातात. नवी पिढी सोशल मिडिया नेटवर्किंग मधून स्वतःचे भविष्य साकारताना दिसते. एकविसाव्या शतकातील घर संवाद साधताना कमी पण वाद घालताना जास्त दिसतात. वाद वाढले की माणस माणसांना टाळायला लागतात. अशी नात्यातली अंतरेच नात्यात विसंवाद आणि दरी निर्माण करतात.

नवीन पिढीला आता संस्कारापेक्षा व्यवहार जास्त महत्वाचा वाटतो. पैसा असेल तर माणूस ताठ मानेने जगू शकतो हा अनुभव त्याला आपल्या माणसात दुरावा निर्माण करायला भाग पाडतो. जुन्या पिढीतील नातवंडे सांभाळणारी जुनी पिढी, त्यांचे विचार, नव्या पिढीला नकोसे वाटतात. ”पैसा फेको तमाशा देखो ” हे ब्रीद वाक्य घेऊन नवीन पिढी माणुसकी पेक्षा मतलबी पणाला प्राधान्य देताना दिसते.

वृद्धापकाळी हवा असलेला मायेचा ओलावा, समदुःखी, समवयस्क व्यक्ती कडून मिळाल्यावर एकटा जीव वृद्धाश्रमात आपोआप रुळतो. स्वतःच दुःख विसरायला शिकतो. प्रत्येक व्यक्ती आपला राग आपल्या व्यक्ती वर किंवा पगारी नोकरावर काढू शकते. .वृद्धाश्रमात या दोन्ही गोष्टी शक्य नसल्याने माणूस नव्याने जगायला शिकतो. स्वतःच्या विश्वात रममाण होण्यासाठी स्वतःच्या भावनांना आवर घालतो आणि हा नवा घरोबा स्विकारतो.

नवीन पिढीला घडविण्यात आजची स्त्री कुठेतरी कमी पडत आहे का? याचा विचार करण्याची गरज आता निर्माण झाली आहे.

आपण कुणाचा आदर्श घ्यायचा? कुणाचा आदर्श समोर ठेवायचा? आपली जबाबदारी, आपली कर्तव्ये हे सारे जर आपण आपल्या आर्थिक परिस्थितीशी निगडीत केले तर हा गुंता सोडवायला अतिशय कठीण जाईल.

आपण आणि आपली जबाबदारी यात जोपर्यंत ”आई बाबा ‘, यांचा समावेश होत नाही तोपर्यंत ही पळवाट आडवाटेन या समाजव्यवस्थेला, कुटुंब व्यवस्थाला दुर्बल करीत रहाणार यात शंका नाही.

मी माणसाचा आहे, घरातील बाई माणूस माझ्या कुटुंबाचा घटक आहे त्याच मन जपणे ही माझी जबाबदारी आद्यर्तव्य आहे हे जोपर्यंत पुरुष प्रधान संस्कृती मान्य करीत नाही तोपर्यंत ही पळवाट अशीच निघत रहाणार. आपण घडायचं की आपण बिघडायचं स्री ला आधार द्यायचा की भार व्हायचं हे आता ज्याचं त्यानचं ठरवायचं.

कालची स्त्री आणि आजची स्त्री हा विचार करताना मन‌ मात्र खालील काव्यपंक्तीवर स्थिर होते.

थोर महात्मे होऊन गेले, चरीत्र त्यांचे पहा जरा

आपण त्यांच्या समान व्हावे हाची सापडे बोध खरा

या नररत्नांना जन्मणारी ही माऊली आज समाजात सुरक्षित आहे का? हा प्रश्न ऐरणीवर आला आहे.

 या देशाच्या सर्वोच्च पदी राष्ट्रपती पदावर राहण्याचा मान एका‌‌ स्त्री ला मिळूनही आजची स्त्री उपभोग्य वस्तू समजली जाते हे आपले दुर्दैव आहे. विश्वबंधुतेचा आणि समानतेच्या नारा देऊन आपण ही नारीशक्ती आद्य ईश्वराचे रूप मानून स्त्रीला संघटीत आणि सुरक्षित करण्याची जबाबदारी आपल्यावर आली आहे. तरच आपण अभिमानाने म्हणू शकू.

भारत माता की जय!

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ “स्वयंपाक घर आणि आंतरराष्ट्रीय घडामोडी…” ☆ श्री कौस्तुभ परांजपे ☆

श्री कौस्तुभ परांजपे

? विविधा ?

☆ “स्वयंपाक घर आणि आंतरराष्ट्रीय घडामोडी…” ☆ श्री कौस्तुभ परांजपे

 स्वयंपाक घरात होणारी चर्चा काहि ठराविक मुद्यांवरच होते. त्या मुद्यांचा जागतिक मुद्यांशी तसा संबंध नसतो. तसा असायचं कारणही नाही. कारण आज भाजी कोणती करु?… या प्रश्नाशी जागतिक बाजारातपेेठेेत मिळणार्‍या भाज्या कोणत्या. त्या पालेभाज्या आहेत का फळभाज्या. त्या करायच्या कशा… म्हणजे.  तेलावर का शिजवून.  पातळ भाजी का दाण्याचा कुट लावायचा. किंवा त्यांचे असलेले बाजारभाव याचा आपल्याशी काहीही संबंध नाही. अगदी खोबरं किंवा मिर्ची याचा ऊल्लेख आला तरी खोबर्याच्या बाबतीत राजापुरी खोबरं आणि मिर्ची बाबत सिमला मिर्ची अथवा लवंगी मिर्ची या पनवेेल किंवा सिमल्याची.  नाहीतर कोल्हापुरची सीमा ओलांडून पलिकडे आम्ही गेलो नाही.

 फारतर दिवाळी जवळ आली की फराळाचे पदार्थ करायचे का… कोणते… का विकत आणायचे… यावर चर्चा होते.  किंवा थांबते. तिथे काही दिवाळीत विकत घ्यायच्या फटाक्यांचे प्रकार किंवा बाण आणि संरक्षण क्षेत्राकडे असणारे अग्निबाण.  किंवा फटाक्यातले बाॅम्ब आणि सैन्याकडे असणारे बाॅम्ब यांंचा या र्चेचत संबंध नसतो.

 अधुुनमधूून कामवाली येणार नाही.  किंवा पाणी येणार नाही याचवेळी थोडी आणिबाणी जाणवायची. पण ती सुध्दा घरगुती. त्याचा जागतिक घडामोडींशी किंवा निर्माण झालेल्या आणिबाणी सद्रुष्य परिस्थितीशी संबंध नसायचा. त्यामुळे स्वयंपाक घरात जागतिक चर्चा होतच नव्हती. थोडक्यात स्वयंपाकघर आणि जागतिक घडामोडी यांच्या सीमा सुरक्षित ठेवल्या होत्या. कोणत्याही प्रकारे सिमोल्लंघन किंवा घुसखोरी नव्हती.

 दोन देशात काही बाबतीत शीतयुद्ध असत. पण आमची चर्चा शितकपाट म्हणजेच फ्रिज यात काय भरलंय याच विषयावर फ्रिज व्हायची. त्यामुळे तिथेही असणारा आंतरराष्ट्रीय प्रभाव तसा थंडच होता. पण आता मात्र त्या चर्चा बदलल्या होत्या.

 रशिया.  युक्रेन.  इस्रायल.  चिन.  अमेरिका आणि विशेषकरून डोनाल्ड ट्रंप यांचा विषय येतोच. म्हणजे भंंगार किंंवा रद्दी घेणारा.  भाजीवाला जस सहजपणे दोनचार वेळा दारावरून ओरडत जातो.  तितक्याच सहजपणे यांचा विषय होतो. कारण काय तर या सगळ्यांमुळे वाढत जाणारे सोन्या चांदिचे भाव. हमास या शब्दाचा वापर तर हमाम साबण जितक्या सहजतेने आणि सारखा सारखा वापरतो तेवढ्या सहजतेने वापरला जात होता.

 आता टमाटा आणि डोनाल्ड ट्रंप यांचा काहीच संबंध नाही. तरीही डोनाल्ड ची धोरणंतर टमाट्याच्या भावासारखी रोज बदलतात असा सूर लावत त्याच्या धोरणांना आम्ही सहज टमाट्याच्या बरोबर तोंडीलावायला घेतो. डोनाल्ड या नावाचाच राग आहे.

 मी मोबाईल वर ॲलन डोनाल्ड या क्रिकेट खेळाडूची एक ध्वनीचित्रफित बघत होतो. त्याच्या आवाजाने घरात विचारलं.  काय पाहताय येवढं. मी सहज म्हंटल.  ङोनाल्डचा व्हिडीओ आहे छोटासा.  छान आहे.

 झालं… डोनाल्डचा व्हिडीओ.  आणि चांगला.  यावरच आवाज इतका वाढला कि कदाचित ॲलन किंवा ट्रंप पैकी कोणताही डोनाल्ड जवळ असता.  किंवा दोघेही असते तर ते सुध्दा थोडावेळ गप्प बसले असते…

 काय म्हणतोय तो आता.. आता काय वाढवतोय… मग मला सांगाव लागलं कि हा वेगळा डोनाल्ड आहे. हा फास्ट बॉलर होता… तरीही डोनाल्ड या नावाचा राग काही गेला नव्हता…

 असेल फास्ट बॉलर… याची धोरणं डोक्यावरुन जातात. त्याचे बाॅल जात असतील. पण सगळं डोक्यावरुनच जात नं… त्याचा बॉल डोक्याला लागू नये म्हणून निदान हेल्मेट तरी वापरता येतं. याच्या डोक्यावरुन जाणाऱ्या गोष्टींसाठी काय वापरणार… डोक्यावरुन जाणारा चेंडू कसा टाकायचा.  यासाठी तरी तो तुुमचा डोनाल्ड डोकं वापरत असेल. पण या डोनाल्डच्या डोक्याच काय… आता या युक्तीवादावर मी काय बोलणार… मी आपलं अंपायर्स काॅल सारखा निर्णय मान्य केला.

 हा राग काहि येवढ्यावरच थांबला नाही. पुढे सुरुच होतं.

 याचा राग कशावर.  तर आम्ही दुसरीकडून घेत असलेल्या तेलावर. अरे तुला काय त्याच्याशी. तुला विकायच तर आम्हाला परवडेल त्या किमतीला विक… आम्ही पाच किलो तेल घ्यायला बाजारात गेलो तरी दोन ठिकाणी तेलाचे भाव पाहतो… तुला जमत असेल तर दे.  नाहीतर जा तेल लावत… हे याचं म्हणजे वडाच तेल वांग्यावर काढण्यासारख आहे. यावर तेलाचा आंतरराष्ट्रीय विचार थांबतो. नाहीतर हे तेल प्रकरण इतक गरम झालं असत कि भक्त प्रल्हाद सारखं यालाही गरम तेलात टाकण्याची शिक्षा दिली असती.

 हा संताप किंवा राग थांबला अस वाटत होत. तेवढ्यात एक मित्र सपत्नीक आला. त्याचा दात दुखत असल्याने संध्याकाळी तो दाताच्या डाॅक्टरांकडे जाऊन आला होता.

 तो म्हणाला.  डाॅक्टरांनी त्याचे सहज दिसणारे दात त्यांच्या भिंगाच्या सहाय्याने पाहिले. दोनचार प्रश्न विचारले आणि म्हणाले.  फार काहि नाही.  थोडी मोकळी जागा आहे तिथे फक्त थोडी चांदी भरावी लागेल. इतकच. झालं… त्यावरून परत चर्चा सुरु झाली…

 काय भाव वाढत चाललेत चांदिचे. यांना काय लागत फक्त थोडी चांदी भरा म्हणून सांगायला. अगोदर ब्लड रिपोर्ट करणारे यांच्या संबंधातले असतात अस म्हणत होतो. आतातर चांदिवालेपण मिळालेले वाटतात. आणि जी चांदी वरुन दिसणारच नाही ती भरुन करायचं काय.. चाटायची आहे… चाटायची म्हंटली तरी दाताच्या खालीच असणार… कशी पुरणार जिभ…

 माझ्या पायातली साखळी किंवा अंगठी केली तर दिसेल किंवा दाखवता येईल. पण दातातल्या चांदिच काय करणार… ते काही हत्तीचे दात आहेत दिसायला.

असं म्हणत मित्राची बायको माझ्या बायकोबरोबर स्वयंपाक घरात गेली… आणि परत स्वयंपाक घरातल्या चर्चेत आंतरराष्ट्रीय घडामोडींचा संदर्भ आला…

 

©  श्री कौस्तुभ परांजपे

मो 9579032601

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ घसरगुंडी… ☆ मकरंद पिंपुटकर ☆

श्री मकरंद पिंपुटकर

? जीवनरंग ?

☆ घसरगुंडी… ☆ श्री मकरंद पिंपुटकर 

दुपारचा एक वाजून गेला होता. मनोजची मालगाडी लोणावळा ओलांडून कर्जतच्या दिशेने निघाली होती. मनोज गेली पंचवीस वर्षे रेल्वेमध्ये मालगाडीचा गार्ड म्हणून कार्यरत होता. मनोजने आयुष्याचा मोठा भाग घाटातल्या या रूटवर घालवला होता. येथल्या वाऱ्याचा वेग, वळणे, उतारांचे रागरंग —सगळं सगळं त्याला पाठ होतं.

आज सिमेंटच्या गोणींनी भरलेल्या ५८ वाघिणी घेऊन तो मुंबईला निघाला होता. मालगाडीच्या डब्यांना वाघीण नाव कोणी बरं ठेवलं असेल? त्याला नेहमीच गंमत वाटायची.

पळसदरी स्टेशन येत होतं, इथून कर्जत यायला साधारण पाच किलोमीटर, तिथून कल्याणला पोचेपर्यंत आणखी एक तास, मग तासाभराने ठाणे आणि आणखी एखाद्या तासाभरात छत्रपती शिवाजी महाराज टर्मिनस – गाडीचे शेवटचे स्टेशन. मनोज मनातल्या मनात हिशेब करत होता. थोडेफार सिग्नल आणि सायडिंग जरी धरलं संध्याकाळी सहापर्यंत ड्युटी संपेल असा अंदाज तो बांधत होता.

घाट संपून कर्जत ओलांडले, की मग सोबत आणलेली पोळीभाजी खावी अशी गणितं तो करत असतानाच वॉकीटॉकी खरखरली, विनेशचा – गाडीच्या ड्रायव्हरचा आवाज ऐकू येत होता – “मनोज, वेग वाढतोय गाडीचा … ब्रेक नीट पकडत नाहीयेत बहुतेक. ”

मनोज क्षणभर थिजला.

…. घाट उतरताना ब्रेक नीट लागत नाहीयेत?

मनात थंड शिरशिरी उठली, जीवाची कालवाकालव झाली. त्याने खिडकीतून बाहेर पाहिलं.

दुनिया जरा जास्तच वेगाने मागे पडत होती. झाडं धावत असल्यासारखी दिसत होती.

वॉकीटॉकीवर काही सेकंदातच पुन्हा विनेशचा आवाज आला – आवाजातला कंप आता स्पष्ट जाणवत होता : “एअर ब्रेक्स प्रतिसाद देत नाहीत… डायनॅमिक ब्रेक लावतोय… पण अजून तो पुरेसा होत नाहीये. ”

मनोजने डोळे मिटले.

पंधरा वर्षांपूर्वी ऐकलेली एक गोष्ट आठवली—

…. “बिघडलेल्या ब्रेकसह घाट उतरणं म्हणजे डोंगराशी झुंज – मृत्यूशी झुंज. ”

आज ती झुंज त्याच्या वाट्याला आली होती.

मनोजने त्याच्या डब्यातील – ब्रेकव्हॅनमधील हँडब्रेकचे चक्र घट्ट पकडलं.

आणि हळूहळू, मोजक्या प्रमाणात त्याने ते चक्र फिरवत ब्रेक लावायला सुरुवात केली—

– – त्याला त्याच्या पहिल्या ट्रेनिंग ऑफिसरने शिकवलं होतं: “ब्रेक झटके देत लावू नकोस, एकदम अचानकही ब्रेक लावू नकोस….. गाडीसोबत बोल. तिच्याशी संवाद साध. ती तुला काय सांगते ते ऐक. त्यानुसार ब्रेक लाव. ”

गाडीची गती जास्त होती, हँडब्रेकचे चक्र फिरवणं कठीण होत चाललं होतं.

जोर लावून ते चक्र फिरवताना घाम फुटत होता, पण त्याने हातांची पकड सैल होऊ दिली नाही.

तिकडे रेल्वे इंजिनमध्ये, समोर, विनेश जिद्दीने लढत होता—एअर ब्रेक, डायनॅमिक ब्रेक वापरत होता, सोबत असलेली रेती ट्रॅकवर फेकत होता (सँडिंग) — मनोज आणि विनेश – दोघेही एकाच शत्रूशी झगडत होते—उतरण आणि त्या उतरणीवर गाडीचा कमी न होणारा वेग.

गाडी आता घाटात जोरात धावत होती. जिथे ताशी ६० किलोमीटरपेक्षा कमी गती असायला हवी तिथे वेग ताशी ७५ किलोमीटरच्या पुढे गेला होता.

– – वारा ब्रेकव्हॅनमध्ये चाबकासारखा घुसत होता.

– – डबे हलत होते, अडखळत होते, थरथरत होते.

मनोजचं हृदय प्रत्येक चाकासोबत धडधडत होतं.

तो हळू आवाजात पुटपुटला— “हळू धाव माझे आई, … शांत हो, … थांब ग…”

…. जणू गाडी त्याचा आवाज ऐकत होती.

विनेशचा आवाज आला – हताश, कमकुवत – “मी नाही थांबवू शकत आहे हिला, नियंत्रण सुटतंय, संपतंय सगळं. ”

मनोजचे श्वास थांबले…..

डोळ्यासमोर जीवाभावाच्या सगळ्यांचे चेहरे तरळून गेले –

सकाळी चहा करत असलेली बायको,

अजून झोपलेली मुलं,

…. आणि विनेशचाही चेहरा – विनेश आणि स्वतःला तो नेहमीच दोन डोळे म्हणायचा, “दोन डोळे शेजारी, भेट नाही संसारी” म्हणायचा. ५० च्यावर डबे, पाऊण किलोमीटर अंतर असायचं ड्रायव्हर आणि गार्डमध्ये, असायचे एकाच मालगाडीच्या दोन टोकांना, पण क्वचितच भेटायचे एकमेकांना.

मनोजने दीर्घ श्वास घेतला, स्वतःला स्थिर केलं आणि अवसान आणून, शांत स्वरात विनेशला म्हणाला: “हार मानू नकोस. आपण दोघं आहोत. दोघं मिळून थांबवू गाडीला. तू रेल्वे कंट्रोलला सूचना दे. ”

“पळसदरी कर्जत उतारावर मालगाडीचे ब्रेक लागत नाहीयेत” – कंट्रोल रूमवर जणू विजेच्या लोळासारखी बातमी कोसळली. प्रशिक्षण, अनुभव आणि धैर्य पणाला लागलं, सिग्नल adjust केले गेले, मालगाडीच्या मार्गात सुदैवाने अन्य कोणती गाडी नव्हती, कर्जत स्टेशनपुढील गाडीचा मार्ग बदलला गेला, वाहतुकीचा अडथळा नसलेला ग्रीन कॉरिडॉर तयार केला गेला, जास्त रहदारीच्या नेहमीच्या ट्रॅकवरून सायडिंगच्या कमी वापरातल्या ट्रॅकवर गाडी वळवली जाणार होती. दोन किलोमीटर नंतर या ट्रॅकला अशा प्रसंगांसाठीच बांधलेल्या कॅच सायडिंगची तयारी होती—

कर्जत स्टेशन जवळ येत होतं, स्टेशनवर रेल्वे स्टाफ सज्ज होता, सिग्नलमन, पॉईंटमन, स्टेशनमास्तर – सगळे डोळ्यात प्राण आणून धडाडत येणाऱ्या गाडीकडे पाहत होते.

विनेश ओरडला: “वेग अजून जास्त आहे! ”

मनोजने होता नव्हता तो सगळा जोर लावून हँडब्रेक पूर्ण ताकदीने फिरवला.

हात भरून आले होते, हातांना रग लागली होती…

– – – आणि गाडीचा वेग कमी होऊ लागला….

…. खरंच कमी होत होता का भास होऊ लागले होते?

नाही, हा भास नव्हता. वेग नक्की कमी होत होता, खूप नाही, पण पुरेसा.

उतरण जणू थोडी माघार घेत होती.

कर्जत स्टेशन कधीच मागे पडलं होतं, भिवपुरी स्टेशनही मागे गेलं होतं. वेग खूप कमी झाला होता, आणि शेवटी तो क्षण आला—

डायनॅमिक ब्रेक, हँडब्रेक, सँडिंग, आणि माणसांची इच्छाशक्ती — — सगळ्यांनी मिळून त्या ५८ डब्यांच्या राक्षसी गाडीला थांबवलं होतं.

गाडी एक क्षणभर थरथरली…

आणि मग घनघोर शांतता पसरली.

मनोज थकून एका बाकावर कोसळला.

डोळ्यातून घळघळा पाणी आलं. तो वॉकीटॉकीवर कसंबसं बोलला – “वाचलो आपण…”

अधिकारी आले, तपास सुरू झाला.

ड्रायव्हरचे हात अजूनही थरथरत होते.

मनोजच्या तळहातांवर टरटरून फोड आले होते.

ब्रेकच्या घर्षणाने चाकं गरम झाली होती, पण सुरक्षित होती.

लोकांनी विचारलं—

“नेमकं कशाने वाचवलं तुम्हाला? ”

मनोज फक्त एवढंच म्हणाला—

“घाट उतरायला सुरुवात करताना नियमानुसार ब्रेकची चाचणी केली होती, तेव्हा ब्रेक व्यवस्थित होते. नंतर काय बिनसलं, माहित नाही, पण आत्ता गाडी कशी थांबली विचाराल, तर रेल्वेने केलेला ग्रीन कॉरिडॉर, विनेश – मी आणि आमची ही गाडी … आणि मुख्य म्हणजे देवाने – डोंगराने – निसर्गाने आम्हाला दिलेली एक संधी – या सगळ्यांमुळे गाडी थांबली. ”

प्राथमिक तपास पूर्ण झाला, रात्री घरी आल्यावर त्याच्या लहानग्या मुलीने मनोजला विचारलं: “बाबा, आज मी बागेत खेळायला गेले होते. तिथे एक मस्त नवी घसरगुंडी आली आहे. मी तिच्यावर खूप खेळले. झूSSम करून खाली येताना पोटात गोळा येत होता. पण मज्जा आली. तुम्ही आज काय केलंत? आज काही विशेष झालं का? ”

त्याने तिच्याकडे पाहिलं…..

घाटातला गाडीचा वेग, तो सोसाट्याचा वारा, ती भीती, ते धैर्य, आणि सरतेशेवटी थांबलेल्या गाडीचा तो शांत क्षण – आजची त्याच्या गाडीची घसरगुंडी, त्याच्या पोटात आलेला गोळा – हे सगळं सगळं क्षणार्धात त्याच्या नजरेसमोर तरळून गेलं – तो हलकेच हसला…..

“हो, ” तो म्हणाला, “मी सुखरूप घरी आलो… हेच सर्वात विशेष झालंय आज. ”

(२७ फेब्रुवारी २०२६ रोजी पुणे मुंबई घाट उतरताना, पळसदरी रेल्वे स्टेशननंतर एका मालगाडीचा वेग नियंत्रणात येत नव्हता. या सत्यघटनेवर आधारित हा लेखन प्रपंच. पात्रांची नावे काल्पनिक आहेत.)

© श्री मकरंद पिंपुटकर

चिंचवड

मो ८६९८०५३२१५   

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ अहल्या… ☆ उज्ज्वला केळकर ☆

उज्ज्वला केळकर

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☆ अहल्या…  ☆ उज्ज्वला केळकर

अहल्या – – 

अहल्येची नि माझी ओळख माझ्या नकळत्या वयात झाली. आमचं बालपण, तिन्हिसांजेला घरी आल्यावर हात-पाय धुऊन, वडीलधार्‍यांना नमस्कार करून, ’शुभं करोती’ आणि नंतर पाढे-परवचे म्हणण्यात सरलं. ते झालं की आजी वेगवेगळे श्लोक शिकवायची. म्हणून घ्यायची. त्यानंतर गोष्टीचा खुराक असे. या विविध प्रकारच्या श्लोकांमुळे, मनावर आणि वाणीवर उत्तम संस्कार होतात, असं तेव्हा मानलं जायचं. तिने शिकवलेल्या श्लोकांमध्ये एक श्लोक असा होता- 

‘अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा मांदोदरी तथा। पंचकन्या स्मरे नित्यं महापटक नाशनम्।।‘ अर्थ न समजता, त्यावेळी पाठांतर म्हणून पाठ केलेला हा श्लोक.

प्राथमिक शाळेत गेल्यावर देव-देवतांच्या, रामायण-महाभारतातल्या कथा वाचायला-ऐकायला मिळाल्या. त्यातच रामाच्या पदस्पर्शाने शिळा झालेल्या अहिल्येचा उद्धार झाला, ही कथाही ऐकली-वाचली. त्याच काळात रामदासांचे मनाचे श्लोक पाठ केलेले आठवतात. त्यातच एक श्लोक असा होता, ‘अहल्या शिळा राघवे मुक्त केली. पदी लागता दिव्य होओनी गेली. ‘

अर्थात असा अहिल्येला उद्धारणारा श्रीराम, ज्याचे गुणवर्णन करताना वेदवाणीही शिणून गेली, त्या रामाच्या गैरवासाठीच या श्लोकाची रचना रामदासांनी केली होती.

हायस्कूलमध्ये गेले आणि हे असं का? ते तसं का, हे जाणून घेण्याचं कुतुहल वाढलं. त्यावेळी एकदा आजीला म्हंटलं, ‘ तू तो पंचकन्या स्मरे नित्यं ’ श्लोक शिकवलास ना, म्हणजे बघ…. आधी कितीही पापं केली, तरी चालतील… या पंचकन्यांचं स्मरण केलं की झालं! मिळाली सगळ्या पापांपासून मुक्ती… ’

‘फाजीलपणा करू नकोस! तुम्हाला पापं करायला परवानगी दिलीय, असा नाही याचा अर्थ होत! ’ आजी रागारागानं म्हणाली.

‘पण काय ग आजी, या पंचकन्यांचं स्मरण का करायचं?

‘अग, त्या महान पतिव्रता होत्या. ’

‘ मग मला सांग आजी, अहल्या पतिव्रता होती ना? मग गौतम ऋषींनी तिला शिळा होण्याचा शाप का दिला? ’

‘भ्रष्ट झाली होती ना ती? ’

‘पण ती भ्रष्ट झाली यात तिची काय चूक होती? मग तिला का शाप? ’

‘तुम्हा हल्लीच्या मुलींना काही सांगायची सोय नाही. सांगायला गेलं की टांगायला नेता तुम्ही! ’ आजीचं हे उत्तर म्हणजे स्वत: माघार घेताना दुसर्‍यावर ठेवलेलं ठेपर असे. पण अहल्येचं पातिव्रत्य आणि तिचं शिळा होणं याची तर्कशुद्ध सांगड काही आजीला घालता यायची नाही.

अभ्यास वाढला आणि विज्ञानाचा पगडा मनावर बसला, तेव्हा माणसाचं शिळा होणं, बुद्धीनं नाकारलं. या कथेवरची चमत्काराची पुटं खरवडून, त्यावेळी नक्की काय घडलं असेल, याचा शोध, मन नकळत घेऊ लागलं.

अहल्येकडे गौतमाच्या वेशात इन्द्र आला आणि अहल्या फसली, असं पुराणकथा सांगते. पण मला वाटतं, तसं नसणार. कारण ती गौतमांच्या स्ंनन्संध्येची ती वेळ. आपला पाती कोणत्या वेळी कोणती मागणी करेल आणि कोणती अपेक्षा बाळगेल, हे पत्नी या नात्याने अहल्येला निशितच माहीत असणार. ’गणेश पुराण’सारख्या काही पुराणातून अहल्येने इंद्राला ओळखलं होतं, असंही म्हंटलं आहे पण अहल्येने स्वखुशीने इंद्राला जवळ केलं, असं मानलं, तर परंपरेने एक पतिव्रता स्त्री म्हणून अहल्येचं नाव आपल्यापर्यंत पोचवलं नसतं. काळाच्या विस्मृतीत ते केव्हाच लोप पावलं असतं.

इंद्र, इंद्र म्हणूनच अहल्येकडे गेला असेल. त्याला वाटलं असेल, आपल्या वैभवाने, नाव-कीर्तीने आपल्या सौंदर्याने-शौर्याने-सत्तेने अहल्या दिपून जाईल पण प्रत्यक्षात तसे घडले नसेल. अहल्येच्या सौंदर्याने मोहित झालेल्या इंद्राने तिच्यावर बलात्कार केला असेल. या आकस्मित आघाताने ती इतकी बधीर, चेतनाशून्य झाली असेल, की आपल्याबाबतीत काय घडलं, याची जाणीवच ती हरवून बसली असेल. एखाद्या दगडाप्रमाणे, ती आपल्या जाणीवा, वास्तवाचं-परिसराचं भान हरवून बसली असेल. अहल्या शिळा झाली असेल, ती या अर्थाने. एखादा कटू प्रसंग विसरण्यासाठी, तो घडल्याचच मन-बुद्धी नाकारते, असं मानसशास्त्र सांगतं. अहल्येच्या काळातील समाजाची मानसिकता लक्षात घेतली, तर तेव्हा पातिव्रत्य या मूल्याला सगळ्यात जास्त महत्व होतं. त्यामुळे व्यक्तीगत पातळीवर अहल्येने स्वत:चं अस्तित्व नाकारलं असेल. तत्कालीन समजधारणेचा विचार केला तर, चूक आसो की नसो, अहल्या भ्रष्ट झाली, ही वस्तुस्थिती होती. त्यामुळे अहल्या एक प्रकारे वाळीत टाकली गेली असेल. तिच्यावर सामाजिक बहिष्कार टाकला गेला असेल. तिचे अस्तित्व नगण्य, अर्थशून्य मानले गेले असेल. अपराध इंद्राचा असेल, हे मनोमनी पटूनही इंद्रासारख्या देवराजाच्या विरुद्ध जाण्याची हिंमत कोण दाखवणार? त्यापेक्षा अहल्येला दोषी ठरवणं, अपराधी ठरवणं जास्त सोपं होतं. जास्त सोयीचं होतं. त्यामुळे त्यांनी तिच्याशी बोलणं टाकलं असेल. नातं तोडलं असेल. तिच्याबरोबर कुठलाही व्यवहार करणं टाळलं असेल. ती अगदी एकटी, एकाकी पडली असेल, रस्त्यावरच्या शीळेसारखी.

श्रीरामाने अहल्येचा उद्धार केला, याचा अर्थ एका बाजूने अहल्येच्या मनातली अपराधीपणाची भावना दूर केली असेल. संवेदनाशून्य आणि बधीर मनोवस्थेतून बाहेर यायला तिला मदत केली असेल. स्वत:च्या अस्तित्वाची जाणीव करून घ्यायला मदत केली असेल. तिच्यात संवेदना, चेतना निर्माण केल्या असतील. त्याचवेळी सामाजिकदृष्ट्या, अहल्या निरपराध आहे, हे ठामपणे सांगून, तिच्या कुटुंबियांनी आणि समाजाने तिचा स्वीकार करावा, असे आवाहन केले असेल.

‘नरेंद्र कोहली’ या हिन्दी लेखकाने रामायणावर आधारलेल्या आपल्या ‘दीक्षा’ या कादंबरीत ‘अहल्योद्धारा’चा हाच सामाजिक आशय उलगडून दाखवलेला आहे. राम हा युवराज. सम्राट दशरथाचा पुत्र. भावी सम्राट. तेव्हा त्याची मान्यता, ही सर्वसामान्य प्रजेच्या दृष्टीने महत्वाची ठरली. अनुकरणीय ठरली. अहल्येला रामाने समाजमान्यता मिळवून दिली. तिचं निर्दोषत्व ग्राह्य धरलं. तिला एक प्रकारे न्याय मिळवून दिला. या अर्थाने रामाने अहल्येचा उद्धार केला.

केव्हा तरी ‘विनय राजाराम’ या हिन्दी कवयित्रीची ‘तुम अहल्या नहीं हो’ ही कविता वाचली आणि ‘अहल्या’ या शब्दाचा एक वेगळाच अर्थ मनाशी उलगडला. इथे ‘अहल्या’ ही सामाजिक नीति-नियमांच्या, कल्पना- धारणांच्या प्रस्ताराखाली दबल्या गेलेल्या स्त्रीची प्रतिनिधी म्हणून यते. या स्त्रीला ना स्वत:चं मन, ना इच्छा-आकांक्षा, ना कल्पना-भावना, ना संवेदना-चेतना. म्हणून कवयित्री म्हणते, ‘समाजाच्या प्रतारणेच्या, फसवणुकीच्या प्रस्तराखाली दबलेल्या हे नारी, तू प्रस्तर (दगड) नाहीस. तू परमाणू आहेस. (या विश्वाचे सृजन परमाणूपासून झाले, असे मानणारे एक तत्वज्ञान आहे.) त्यादृष्टीने तू विश्वाची जननी आहेस. निर्माती आहेस. ऊठ. जाग. स्वत:ला ओळख. आपल्या स्वत:च्या उद्धारासाठी, उन्नतीसाठी तू स्वत:च राम बन.

आपल्या स्वत:च्या विकल परिस्थितीला आपण स्वत:च अनेकदा कारणीभूत असतो, नाही का सख्यांनो? आपल्यातील ऊर्जेची, कार्यशक्तीची आपल्यालाच ओळख नसते. म्हणूनच आपली सखी कवयत्री ‘विनय राजाराम’ आपल्याला सांगते, ‘तू निश्चय कर, तू निश्चल नाही, चल बनशील.

‘अहल्या नहीं, हल्या बनोगी

मन-मस्तिष्क और कर्मशक्तीसे

अनुर्वरा नहीं, उर्वरा बनोगी’

हल म्हणजे नांगर. ‘हल्या’ म्हणजे नांगरण्यायोग्य, अर्थात सुपीक जमीन. ‘अहल्या’ म्हणजे बरड जमीन. ज्या जमिनीत नांगरणी-पेराणी करता येणार नाही अशी जमीन. ज्या जमिनीवर संस्कार करताच येणार नाहीत, ज्याच्यावा पडलेलं बीज, तसंच निष्फळ राहील, अशी अहल्या तू नाहीस. मन-बुद्धी, कर्म- शक्तीच्या योगाने तू ‘अनुर्वरा’ नाही, ‘उर्वरा’ बनशील. म्हणजे सुफलीत, सृजनशील बनशील. चांगल्या विधायक विचारांचं बी तुझ्या मन-बुद्धीत वाढेल. विकासेल. चांगलं कार्य तुझ्या हातून घडेल. नवसृजन होईल. ‘तू अहल्या नाहीस… अहल्या नाहीस…’

सखयांनो, आपल्या आसपास, जवळच्या- दूरच्या परिवारात एखाद दुसरी शिळेतील अहल्या आढळते. तिला दिलासा देणं, तिचा आत्मसन्मान जागृत करणं, तिला क्रियाशील बनवणं, एवढं तरी आपल्याला करायलाच हवं नाही का?

©  उज्ज्वला केळकर 

संपर्क – निलगिरी, सी-५ , बिल्डिंग नं २९, ०-३  सेक्टर – ५, सी. बी. डी. –  नवी मुंबई , पिन – ४००६१४ महाराष्ट्र

मो. 836 925 2454, email-id – kelkar1234@gmail.com 

≈संपादक –  श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “जर मी… तू असते, आणि तू… मी असतास…” – हिन्दी लेखिका / कवयित्री : नादिरा बब्बर ☆ प्रा.भारती जोगी ☆

प्रा.भारती जोगी

? मनमंजुषेतून ?

☆ “जर मी… तू असते, आणि तू… मी असतास…” – हिन्दी लेखिका / कवयित्री : नादिरा बब्बर ☆ प्रा.भारती जोगी ☆

तर… प्रेमाची मितीच बदलली असती.

प्रेमातील दिवसांचे रूपच वेगळं असतं.


तू… तळमळत काढली असतीस आख्खी रात्र, आणि मी… गाढ झोपले असते.

तू… रात्रभर अश्रू गाळत बसला असतास, आणि मी आनंदात, हसत!


तेव्हा तू पत्र लिहिलं असतस, आणि मी… मी ते असच कुठेतरी पडू दिल असतं… विसरून ही गेले असते.

तू… एकटा, एकाकी उभा… खिडकीतून बाहेर बघत… आणि मी..


मी… रात्र रात्र मित्रांच्या मैफिलींमध्ये रंगून जात, त्यांना मोहवत, त्यांची भुलावण करत राहिले असते.

चूक माझी असतांनाही, तू माफी मागितली असतीस.

तेव्हा मी… आणखीनच ताठ होत, ऐट दाखवली असती.

 *जर मी… तू असते, आणि तू मी असतास… तर.. *.


तू आनंद, दु:ख, लज्जा… सगळी गुपिते कानी घातली असतीस माझ्या

आणि मी… मी ती उडवून लावली असती हवेत… निष्ठुर, भावनाहीन, बेपर्वा होऊन.


जेव्हा एकटेपणा असह्य होऊन तू कोसळला असतास पायावर माझ्या

मी… मोठ्या ताठ्याने तूला शहाणपण शिकवलं असतं.

तुझ्या छोट्या छोट्या गोष्टींचं कारण पुढे करत… रोज तुझ्या पासून, थोडी थोडी दूर होत गेले असते मी.


जर तू स्वाभिमानाची लाज राखण्यासाठी म्हणून माझ्याशी बोलला असतास ; तर…

मी… मौन धारण करून सुटका करून घेतली असती माझी.

 *जर मी तू असते, आणि तू मी असतास*

*तर… मितीच बदलली असती प्रेमाची*

जेव्हा तू नाईलाजाने माझी प्रत्येक गोष्ट मानून तडजोड केली असतीस

तेव्हा मी माझा हक्क समजून जीवनात आणखीनच मौज-मजा केली असती.

जीवनाच्या प्रत्येक वळणावर तूला माझी उणीव भासली असती.

पण मला तुझी प्रतिमा, माझ्या परिघात खूपच छोटी वाटली असती.


तू काही सांगत असतास तर मला ते ऐकूच आलं नसत.

तू वारंवार आला असतास, पण मी बोलावलं नसत तूला.

तू हात पुढे केला असतास… मी माझा हात मागे घेतला असता.

तूला हसावसं वाटलं असतं… मी पुन्हा पुन्हा रडवलं असत.


पण… हे सगळं कसं बरं झालं असत?

हे तर केवळ अशक्य ना??

भाग्यरेखा कशी बरं पुसता येईल?

तू तर तूच रहाणार आहेस, आणि मी मीच…

प्रेमाच्या तारखा, आणि मिती ही तशाच रहाणार…

युगानुयुगांची परंपरा ही… कोण बदलणार??

गा-हाणी… व्यथा… घुसमटलेल्या मनांच्या… कोण ऐकणार???

(नादिरा बब्बर यांच्या और तुम होते मैं या हिंदी कवितेचा स्वैर भावानुवाद!)

अनुवादिका / कवयित्री : प्रा.भारती जोगी.

पुणे. 

 फोन नंबर..९४२३९४१०२४.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ‘स्त्री सक्षमीकरण: राष्ट्रोन्नतीचा उन्नत राजमार्ग…’ – भाग – १ ☆ डाॅ. मीना श्रीवास्तव ☆

डाॅ. मीना श्रीवास्तव

? इंद्रधनुष्य ?

☆ ‘स्त्री सक्षमीकरण: राष्ट्रोन्नतीचा उन्नत राजमार्ग…’ – भाग – १ ☆ डाॅ. मीना श्रीवास्तव ☆

नमस्कार प्रिय मैत्रांनो!

“मी एकटी जग बदलू शकत नाही, पण मी पाण्यात दगड टाकून अनेक लाटा निर्माण करू शकते.” 

 – मदर तेरेसा

स्त्री सक्षमीकरण आणि तिच्या शैक्षणिक अर्हतेशी समांतर असलेले आर्थिक स्वातंत्र्य यांचा अत्यंत जवळचा संबंध आहे. किंबहुना तिच्या सक्षमीकरणासाठी योग्य शिक्षणाधारित आर्थिक उत्त्पन्न हे सर्वाधिक महत्वाचे आहे. स्त्रीशिक्षणाचे महत्व अनन्यसाधारण आहे. मुलगी शिकली तर ती दोन घरांमध्ये ज्ञानाचा प्रकाश उजळू शकते ही संकल्पना जुनी असली तरी आज देखील कधी नव्हे इतकी प्रासंगिक आणि समर्पक वाटते. यंदाच्या ८ मार्च या ‘जागतिक महिला दिन’ या विशेष दिनानिमित्य २०२६ ची थीम अतिशय बोलकी आणि आकर्षक आहे. या थीमचा प्रमुख संदेश आहे: “गिव्ह टू गेन” अर्थात ‘कांही हवे असल्यास आधी द्या! ‘ यातील देवाणघेवाणीचा व्यवहार स्त्रिया युगानुयुगे करीत आल्या आहेत. ‘कोहळा देऊन आवळा घेणे’ असे या व्यवहाराचे उफराटे तत्वज्ञान आहे. जीवनभर दुसऱ्यांसाठी चंदनासारखे झिजत राहा, सुगंध येईल तेवढ्यावर आनंद मानीत राहा, कधी त्यागमूर्ती, तर कधी मखरातली देवी बनून राहा पण कांही मागू नकोस, अशी उपजतच शिकवणी घरातील थोरामोठ्या बायांकडून मिळाल्यावर परत तीच दामदुपटीने आपल्या मुलीकडे फॉरवर्ड करणे हे कांही एकल भारतीय स्त्रीचे वर्णन नाही. कमी-अधिक प्रमाणात हेच चित्र जगभरात जगात आढळून येते. नाही तर वेगळ्या महिला दिनाची गरज पडती ना!

२०२६ च्या महिला दिनी सकारात्मक दृष्टिकोनातून बघितल्यास हा जो देणे – घेणे नामक उपक्रम आहे त्यात ‘महिला सक्षमीकरण’ महत्वाचे पुढचे पाऊल आहे. हे प्रारूप मांडणारे विचारवंत म्हणतात, “ही वजाबाकी नसून प्रगतीचा हेतुपुरस्सर जोडलेला गुणाकार आहे. ” याला अनुषंगून मला एक सर्वविदित उदाहरण आठवते आहे. मॅट्रिकच्या परीक्षांचा हंगाम सुरु आहे. त्यांच्यापैकी कुठल्याही निकालाची टक्केवारी बघा, मुलींनीच आघाडी मारलेली असते. मंडळी, जेव्हां एखादी मुलगी कसून मेहनत करीत ज्ञानार्जन करीत असते तेव्हां ती तिच्या आयुष्यातील प्रगतीच्या मार्गातील अडथळे दूर करीत यशाच्या शिखराकडे वाटचाल करीत असते. मात्र आश्चर्याची गोष्ट की इयत्ता १२ वी नंतर पुढील शिक्षणाकरता आपल्या देशात ४९. ६% मुलांच्या तुलनेत ४७. २% मुली टिकून राहतात. महाराष्ट्रातील अलीकडली आकडेवारी आशादायक आहे. २०२३-२४ च्या आकडेवारीवरून असे दिसून आले आहे की माध्यमिक स्तरावर (माध्यमिक शाळा) १२. ३% मुलांनी शाळा सोडली, तर मुलींच्या बाबतीत हे प्रमाण ९. ४% होते. मुलींच्या उच्चशिक्षणाच्या आड कौटुंबिक आणि सामाजिक प्रतिबंध, लेकीचे हात पिवळे करण्याची तत्परता, घराजवळ महाविद्यालयांचा अभाव, आर्थिक विपन्नता, शैक्षणिक संस्थांच्या आवारात मुलींच्या मूलभूत गरज भागविण्याविषयी उदासीनता यासारखी कारणे दिलेली आहेत. मुलींची सुरक्षितता हा मुद्दा पालकांसाठी नेहमीच ऐरणीवर राहिला आहे. स्त्रीचे प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष लैंगिक शोषण ही सार्वकालीन समस्या आहे. दुर्दैवाने तिला भौगोलिक, आर्थिक व शैक्षणिक पातळ्यांचा अडसर नाही. सध्या जगभरात गाजत असलेल्या एपस्टीन फायलींच्या प्रकरणाने हा विषय वैश्विक आहे हे सिद्ध केले आहे. मात्र समाधानाची गोष्ट ही की मुलींसाठी शिक्षणातून माघार घेण्यात शिक्षणाविषयी उदासीनता हे कारण अभावानेच आढळते. जर समाज, संस्था आणि सरकार या अडचणींवर मात करण्यासाठी उदारकर्त्या दात्यांची भूमिका घ्यायला तयार झाले तर त्या संधीचे सोने करायला बहुतांश मुली तयार होतील असे वाटते. हाच तो समजून उमजून केलेला भविष्याप्रतीचा गुणाकार समजावा. दात्यांनी एक पट दिले तर गरजू मुली दहा किंवा अधिक पटीने समाजाचे ऋण फेडण्यास कंबर कसून मेहनत घेतील हे नक्की

 प्रिय मैत्रांनो, मला एक भविष्यकालीन आकडेवारी अचंभित करून गेली. २०२५ पर्यंत जागतिक लोकसंख्या पुरुषांना थोडेच झुकते माप देत आली आहे, दर १०० महिलांमागे अंदाजे १०१ ते १०२ पुरुष (अंदाजे ५०. ३% पुरुष: ४९. ७% महिला) असे! मुले जन्माला येत असताना (१०० मुलींमागे अंदाजे १०६ मुले) असा मामला असूनही पुरुषांमध्ये मृत्युदर अधिक आहे. त्यामुळे वृद्ध वयोगटात महिलांची संख्या समान किंवा अधिक आहे. त्यामुळेच जागतिक स्तरावर २०५० पर्यंत स्त्री-पुरुष प्रमाण समसमान होईल असा तज्ज्ञांचा अंदाज आहे. हे जर सत्य म्हणून गृहीत धरले तर महिलांची भरभराट पुरुषांइतक्याच गतीने व्हायला हवी. प्रत्यक्षात वस्तुस्थितीचा अंदाज लावायला उच्चभ्रू समाजातील स्त्रिया, जन्मापासूनच एकल संतती म्हणून सर्वप्रकारच्या सुख-सोयी-सुविधा लाभलेल्या स्त्रिया किंवा मोजक्या सुधारक मनोवृत्तीच्या दानशूर पालकांच्या भाग्यवान कन्यका यांच्याकडे अंमळ दुर्लक्ष करावे लागेल. म्हणजे बघा, एखाद्या राज्यात मोठा राजवाडा आहे. सभोवती नोकर-चाकर मंडळींचा वावर असल्याने राजवाड्याच्या आसपास थोडीफार घरे आहेत. या राजवाड्याच्या परिसरात संपन्नता ओसंडून वाहत आहे. एखाद्या हुशार प्रवाश्याला राज्याच्या वैभवाचा अंदाज घ्यायचा असेल तर तो या राजवाड्याच्या परिसरात जाईल कां? नाही! तो एखाद्या गरीब नागरिकाच्या झोपडीत आसरा मागायला जाईल. अर्थात राजाच्या राज्याचा अंदाज लावायला त्याच्या राज्यातील निर्धनातील निर्धनांच्या झोपड्यांची परिस्थिती बघायला हवी.

श्रीमंती किंवा संपत्ती ही मर्यादित नसते, ती नवनिर्मित केली जाऊ शकते. एकाची गरिबी दूर करण्यासाठी दुसऱ्याला गरीब बनवण्याची गरज नाही, तर संधी, शिक्षण आणि कौशल्याच्या माध्यमातून गरिबांना सक्षम करणे आवश्यक आहे. हे प्रमेय मांडण्याचे कारण लाडकी बहीण योजना व तत्सम विद्यमान रेवडी वाटणाऱ्या तथाकथित समाजकल्याण योजना! या योजनांतून कुणाचे किती आणि कसे कल्याण होते, हे सांगायची मुळीच आवश्यकता नाही. या योजनांतून आपण आर्थिक सुस्थितीकडे जात नसून यांचा उपयोग एखाद्या बाळबोध पांगुळगाड्यासारखा करीत आहोत. मुळात फुकट पैसे मिळाले की त्यांची किंमत शून्य होते. असे आर्थिक गणित सोडवण्यासाठी महत्त्वाची आर्थिक आणि सामाजिक संकल्पना समजून घेण्याची आवश्यकता आहे.

 या संकल्पनेचे निम्नलिखित मुख्य पैलू स्त्रीच्या आर्थिक आणि सामाजिक उत्कर्षासाठी अत्यंत महत्वाचे आहेत असे माझे मत आहे.

– क्रमशः भाग पहिला 

©  डॉ. मीना श्रीवास्तव

ठाणे

मोबाईल क्रमांक ९९२०१६७२११, ई-मेल – drmeenashrivastava21@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ सज्जनांचे मौन : एक दाहक वास्तव… ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ सज्जनांचे मौन : एक दाहक वास्तव… ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

 (जागतिक महिला दिनाच्या पार्श्वभूमीवर..) 

परवा टीव्हीवर महाभारतातला द्रौपदी वस्त्रहरणाचा प्रसंग पाहत होतो. हा प्रसंग अनेक वेळा पाहिलेला असला तरी प्रत्येक वेळी तो मनाला नव्याने अस्वस्थ करून जातो. खरे तर हा प्रसंग इतका हृदयविदीर्ण करणारा आहे की तो पाहवत नाही. भर दरबारात उभ्या असलेल्या द्रौपदीचा आक्रोश, तिने लज्जा रक्षणासाठी केलेली धडपड, तिचाआकांत, तिच्या डोळ्यांत दाटलेले अश्रू आणि तिची असहाय्यता पहावत नाही.

पण त्या प्रसंगात सर्वांत जास्त अस्वस्थ करणारी गोष्ट कोणती आहे हे माहिती आहे का? तर ती आहे सभेत बसलेली महान पराक्रमी अशी धुरंधर मंडळी. पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण, कृपाचार्य, विदुर यांसारखे धर्मनिष्ठ आणि विद्वान मानले जाणारे लोक त्या दरबारात उपस्थित असतात. पण त्या वेळी ही सगळी मंडळी आपल्या तोंडात जणू मिठाची गुळणी धरून असतात. अन्याय डोळ्यांसमोर घडत असताना ते हातावर हात धरून शांत बसलेले दिसतात. त्यांची हतबलता पहावत नाही.

त्याशिवाय ज्यांनी अशा प्रसंगी उसळून उभे राहावे असे द्रौपदीचे पराक्रमी म्हणून ओळखले जाणारे पाच पतीदेखील त्या वेळी असहाय्य होऊन बसलेले असतात. त्यांच्या डोळ्यांसमोर त्यांच्या पत्नीचा अपमान होत असताना ते हात चोळत बसण्यापलीकडे काही करू शकत नाहीत. ज्यावेळी आपल्या पत्नीच्या पदराला कोणी हात घालते आहे अशा वेळी राजशिष्टाचार, द्युताचे नियम इत्यादी सगळ्या गोष्टी बाजूला सारून भीम, अर्जुन यांच्यासारखी धुरंदर मंडळी उभी राहिली असती तर पुढील महाभारत कदाचित घडले नसते. शेवटी द्रौपदीचा कृष्ण सखा मदतीला धावतो.

हे सगळे पाहून अस्वस्थ व्हायला होते. ज्याप्रमाणे श्रीकृष्णाने गीता फक्त अर्जुनाला सांगितली नाही. अर्जुन हा निमित्त आहे परंतु गीतेचा उपदेश हा सर्वांसाठी आहे. त्याचप्रमाणे मला असे वाटते की हा द्रौपदी वस्त्रहरणाचा प्रसंग केवळ द्रौपदी पुरता मर्यादित राहत नाही द्रौपदी ही प्रातिनिधिक आहे. ती केवळ ऐतिहासिक व पौराणिक व्यक्तिरेखा म्हणून सोडून देता येणार नाही. ती जगातील सगळ्या स्त्रियांची प्रतिनिधी आहे. दुर्योधनादि कौरव सोडले तर दरबारात बसलेली सगळी मंडळी म्हणजे सज्जन मंडळी आहेत असे म्हणूया. हे तथाकथित सज्जन देखील सार्वकालिक सज्जनांचे प्रतिनिधी आहेत असे मला वाटते आणि अशा सज्जनांचे मौन किंवा त्यांची निष्क्रियता समाजासाठी किती घातक आहे याचे हे इतिहासाने दिलेले तेव्हापासूनचे उदाहरण आहे.

द्रौपदी वस्त्रहरणाचा महाभारतातील हा प्रसंग केवळ एका स्त्रीच्या अपमानाची कथा नाही, तो समाजातील सज्जनांच्या निष्क्रियतेचा आरसा आहे. अन्याय करणारा दुर्जन नक्कीच दोषी असतो; पण त्याच्याइतकाच दोष त्या सज्जनांचाही असतो, जे आपल्या डोळ्यासमोरअन्याय घडत असताना शांत बसलेले दिसतात. अशावेळी त्यांनी घेतलेल्या शिक्षणाचा, त्यांच्या पराक्रमाचा काय उपयोग! त्यांचे शिक्षण व्यर्थच म्हणायचे!

आता आपल्या लज्जा रक्षणासाठी कोणी येणार नाही हे जेव्हा द्रौपदीला लक्षात आले, तेव्हा तिने अनन्य स्वराने श्रीकृष्णाचा धावा केला. त्याला आर्त हाक मारली. द्रौपदीचा हा सखा त्या हाकेला प्रतिसाद देत धावून आला आणि त्याने तिची लाज वाचवली. तिच्या साडीचे अंतहीन वस्त्र झाले. तिचे वस्त्र ओढणारे हात थकून जमिनीवर पडले आणि भर दरबारात तिचे जे वस्त्रहरण होणार होते ते टळले.

त्या प्रसंगी संकटाच्या क्षणी श्रीकृष्ण धावून आले. आजही ते तसेच येतील का? त्यांची वाट पाहायची का? आजच्या काळात तसे होणे शक्य आहे का?

आजच्या या काळात कोणा अबलेच्या आर्त हाका ऐकून श्रीकृष्ण धावून येतील आणि तिची दुष्टांच्या तावडीतून सुटका करतील अशी अपेक्षा करणे व्यर्थ आहे.

आजची परिस्थिती वेगळी आहे. आज प्रत्येक सज्जन माणसालाच स्वतःमध्ये कृष्ण जागवावा लागेल. आपण भगवद्गीता वाचतो. अनेकदा तिचे पारायणही करतो. तिच्या श्लोकांचा आदर करतो. पण गीतेचा संदेश केवळ वाचण्यासाठी नाही; तो आचरणात आणण्यासाठी आहे. अन्यायासमोर उभे ठाकणे, दुर्बलांच्या पाठीशी उभे राहणे आणि अधर्माला विरोध करणे हाच गीतेचा खरा अर्थ आहे. आपल्या कर्तव्यापासून च्युत झालेल्या अर्जुनाला कर्मप्रवृत्त करणे हाच गीतेचा उद्देश होता आपल्याला देखील गीता कर्म प्रवण करते.

समाजात अनेक ठिकाणी स्त्रियांवर वेळोवेळी अन्याय होतो. कधी घराच्या चार भिंतीत, कधी भर रस्त्यावर, तर कधी तिच्या कार्यक्षेत्रात. अशा वेळी अनेकदा सभोवताली उभे असलेले (सज्जन) लोक गप्प राहणे पसंत करतात. सत्तेची भीती, पैशाचा मोह किंवा स्वतःच्या सुरक्षिततेची चिंता या कारणांमुळे सज्जन लोक मौन बाळगतात.

पण इतिहास सांगतो की समाजाचे सर्वांत मोठे नुकसान दुर्जनांच्या शक्तीने होत नाही; ते सज्जनांच्या मौनामुळे होते. लोकशाहीत जेव्हा निवडणुका होतात, तेव्हाही बऱ्याचदा सज्जनशक्ती मौन राहते त्यामुळेच नको असलेल्या व्यक्ती सत्तेवर येण्याचा धोका असतो.

८ मार्चला जागतिक महिला दिन साजरा होतो आहे. त्या दिवशी आपण स्त्रीशक्तीचा गौरव करतो, तिच्या कर्तृत्वाचा सन्मान करतो. तिचे अभिनंदन करून मोकळे होतो. परंतु तिचा खरा सन्मान केवळ अभिनंदनाच्या संदेशांत नाही. तो त्या वेळी सिद्ध होतो, जेव्हा अन्यायाच्या प्रसंगी समाजातील सज्जन लोक धैर्याने उभे राहतात. असे जेव्हा होईल तेव्हाच स्त्रीला आपण सुरक्षित असल्याचा विश्वास निर्माण होऊ शकेल. एक व्यक्ती म्हणून तिला तिचे अधिकार देणे ही त्या पुढची पायरी आहे.

वर उल्लेख केलेला महाभारतातील प्रसंग आपल्याला सांगतो की सज्जनांचे मौन हेही अनेकदा अधर्माला बळ देणारे असते. आजच्या काळात श्रीकृष्ण प्रत्यक्ष येणार नाहीत. कारण त्यांनी गीतेच्या माध्यमातून विवेकाची ज्योत आपल्या हातात दिली आहे.

आता सज्जनशक्ती हीच कृष्णशक्ती व्हावी ही काळाची गरज आहे. कदाचित स्त्रीसन्मानाचा खरा उत्सव तेव्हाच साजरा होईल, जेव्हा समाजातील सज्जनांचे मौन तुटेल.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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