हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ # 5 – विशाखा की नज़र से ☆ कल, आज और कल  ☆ – श्रीमति विशाखा मुलमुले

श्रीमति विशाखा मुलमुले 

 

(हम श्रीमती  विशाखा मुलमुले जी  के  ह्रदय से आभारी हैं  जिन्होंने  ई-अभिव्यक्ति  के लिए  “साप्ताहिक स्तम्भ – विशाखा की नज़र से” लिखने हेतु अपनी सहमति प्रदान की. आप कविताएँ, गीत, लघुकथाएं लिखती हैं। आपकी रचनाएँ कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं/ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती  रहती हैं.  आपकी कविताओं का पंजाबी एवं मराठी में भी अनुवाद हो चुका है।  आज प्रस्तुत है उनकी रचना कल, आज और कल.  अब आप प्रत्येक रविवार को श्रीमती विशाखा मुलमुले जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे. )

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 5  – विशाखा की नज़र से

 

☆  कल, आज और कल ☆

 

रखते हैं तानों भरा तरकश हम अपनी पीठ पर

देते हैं उलाहनों भरा ताना अपने अतीत को

जो, आ लगता है वर्तमान में,

हो जाते हैं हम लहूलुहान ..

 

भविष्य को तकते, रखते है

उम्मीदों की रंग- बिरंगी थाल दहलीज़ पर

निगरानी में खुली रखतें हैं आँखे ,

पर रंगों की उड़ती किरचों से हो जाती है आँखें रक्तिम …

 

कल और कल के बीच क्षणिक से “आज” में

झूलते हैं  दोलक की तरह

बजते, टकराते है अपनी ही चार दिवारी में

और,

काल बदल जाता है

इसी अंतराल में ।

 

© विशाखा मुलमुले  

पुणे, महाराष्ट्र

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ मी_माझी – #24 – ☆ अपेक्षा ☆ – सुश्री आरूशी दाते

सुश्री आरूशी दाते

 

(प्रस्तुत है  सुश्री आरूशी दाते जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “मी _माझी “ शृंखला की अगली कड़ी अपेक्षा .  सुश्री आरूशी जी  के आलेख मानवीय रिश्तों  को भावनात्मक रूप से जोड़ते  हैं.  सुश्री आरुशी के आलेख पढ़ते-पढ़ते उनके पात्रों को  हम अनायास ही अपने जीवन से जुड़ी घटनाओं से जोड़ने लगते हैं और उनमें खो जाते हैं।  यह मानव जीवन में संभव ही नहीं है कि कोई किसी से अपेक्षा न रखे. जबकि हम जानते हैं और स्वीकार भी करते हैं की किसी से अपेक्षा मत रखो. यदि हम अपेक्षा नहीं रखेंगे और कुछ पा जायेंगे तो अत्यंत प्रसन्नता होगी और यदि अपेक्षानुरूप कुछ न पा सकेंगे तो कष्ट होगा. फिर भी अपेक्षा रखना मानवीय स्वभाव ही है.  सुश्रीआरुशी जी के संक्षिप्त एवं सार्थकआलेखों  तथा काव्याभिव्यक्ति का कोई सानी नहीं।  उनकी लेखनी को नमन। इस शृंखला की कड़ियाँ आप आगामी प्रत्येक रविवार को पढ़  सकेंगे।)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मी_माझी – #24 ☆

 

☆ अपेक्षा ☆

 

ह्या शब्दाचा नक्की काय अर्थ असेल?

बऱ्याच वेळा एखाद्या प्रश्नाने सुरुवात केली की मग उत्तराचा मागोवा घेत असताना खूप गोष्टी विचार करायला लावतात, नाही !

म्हटलं तर अतिशय सोप्पा आणि म्हटलं तर फार खोल अर्थ दडलेला आहे…

प्रत्येक नाते संबंधांमध्ये पुरून उरलेला… नात्यातील एक अनिवार्य घटक असं म्हटलं तर अतिशयोक्ती होऊ नये… हे आयुष्य, देणे आणि घेणे ह्या व्यावहारिक तत्वावर चालत असताना अपेक्षा निर्माण होणं हा मनुष्याचा स्थायी भाव आहे…

निर्व्याज प्रेमाची संकल्पना कितीही भावली तरी कधी ना कधी ह्या अपेक्षा रूपी साधनांमुळे निर्व्याज प्रेमाला तडा जातो… मग त्यातून अपेक्षाभंगाला सामोरे जावे लागणे, ह्या सारखे दुःख फार बोचरे असते… तरीही माणूस त्याच गुंत्यात अडकलेला असतो… कुठे तरी ती सुप्त भावना असतेच ना, की आपल्याला जे हवे ते मिळेल… पण मग कधी कधी नशीब आपली खेळी खेळून अनेक गोष्टी हिरावरून नेते तर कधी आपणच अव्वा च्या सव्वा अपेक्षांनी स्वतःला दुःखाचा दरीत ढकलून देतो…

नशिबाने साथ दिली तर उत्तमच, सगळंच आपल्याला हवं तसं घडेल, पण जर तसं घडलं नाही, आणि आपली अपेक्षा अपूर्ण राहिली तर काय? त्याला सामोरे कसे जाणार, हा विचार बऱ्याचवेळा अपेक्षाभंगानंतर येतो आणि तेव्हा हातातून बऱ्याच गोष्टी निसटून गेलेल्या असतात… खरं तर, एखाद्या व्यक्तीकडून अपेक्षा ठेवण हे योग्य की अयोग्य हे व्यक्तिसापेक्ष असलं तरी अपूर्ण अपेक्षांनाबरोबरही जमवून घेता आलं पाहिजे, ह्याचा खूप उपयोग होईल. पण त्यासाठी बऱ्याच वेळा भावनिक न होता थोडा प्रॅक्टिकल विचार करणं गरजेचं आहे… गुंता सुटला नाही तरी गुंता अजून वाढत जाणार नाही ह्याची खात्री आहे…

-आरुशी दाते

 

© आरुशी दाते, पुणे

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – षष्ठम अध्याय (40) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

षष्ठम अध्याय

( योगभ्रष्ट पुरुष की गति का विषय और ध्यानयोगी की महिमा )

 

श्रीभगवानुवाच

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।

न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ।।40।।

 

भगवान के कहा-

पार्थ ! न ही इस लोक में न ही परलोक विनाश

थोडे भी शुभ कर्म का कभी न होता नाश।।40।।

            

भावार्थ :  श्री भगवान बोले- हे पार्थ! उस पुरुष का न तो इस लोक में नाश होता है और न परलोक में ही क्योंकि हे प्यारे! आत्मोद्धार के लिए अर्थात भगवत्प्राप्ति के लिए कर्म करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।।40।।

 

O Arjuna, neither in this world, nor in the next world is there destruction for him; none, verily, who does good, O My son, ever comes to grief!  ।।40।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

 

(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆☆ आँसूओं की भी एक फितरत होती है ☆☆ – श्री शांतिलाल जैन

श्री शांतिलाल जैन 

 

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। आज  प्रस्तुत है श्री शांतिलाल जैन जी का सार्थक  एवं सटीक  व्यंग्य   “आँसूओं की भी एक फितरत होती है।  इस व्यंग्य को पढ़कर निःशब्द हूँ। मैं श्री शांतिलाल जैन जी के प्रत्येक व्यंग्य पर टिप्पणी करने के जिम्मेवारी पाठकों पर ही छोड़ता हूँ। अतः आप स्वयं  पढ़ें, विचारें एवं विवेचना करें। हम भविष्य में श्री शांतिलाल  जैन जी से  ऐसी ही उत्कृष्ट रचनाओं की अपेक्षा रखते हैं। ) 

 

☆☆ आँसूओं की भी एक फितरत होती है ☆☆

 

कुदरत हैरान थी. इतना पानी बरसाया, बांध भरा भी, मगर लबालब नहीं हो पाया. हार मानने को ही थी कुदरत कि कचरू पिता मांगीलाल निवासी ग्राम चिखल्दा की आँख से एक आँसू छलका, सरोवर में गिरा और झलक गया बांध. विकास के लिये तैयार – चारों और पानी ही पानी. बैकवाटर है श्रीमान. एक चुल्लू पीकर तो देखिये. मीठा  लग रहा है ना ! आँसूओं की एक फितरत होती है, जब इंसान अपने स्वयं के पीता है तो वे खारे लगते हैं, जब दूसरों के पीता है तो फीके लगते हैं, जब दूसरों के एंजॉय करता है तो मीठे लगते हैं. विकास जिनके घरों का बंधुआ है – मीठे आंसुओं की उनकी प्यास बुझती नहीं.

तो आईये श्रीमान, दिलकश नज़ारा है. जहाँ गाँव थे वहाँ पानी ही पानी है. वाटर स्पोर्ट्स के लिये फेसिनेटिंग डेस्टिनेशन. एक्वाजॉगिंग, वाटर एरोबिक्स, स्कीईंग, कयाकिंग, केनोइंग या फिर रिवर राफ्टिंग हो जाये. क्या कहा आपने – राफ्टिंग कैसे करते हैं ? कमाल करते हैं आप. कभी बाढ़ में डोंगियों पर जिंदगी बचाने का संघर्ष करते मज़लूम नहीं देखे आपने ? कुछ ऐसी ही डोंगियों पर खाये-पिये अघाये लोग रोमांच के लिये जब बहते हैं तो वे बहते नहीं हैं, राफ्टिंग करते हैं. उनके पीछे–पीछे चलती है लाइफ सेविंग बोट. आईये, उन खूबसूरत तितलियों को उड़ते हुये एंजॉय कीजिये जो थैले में से मुक्त कर दी गईं हैं. ये सवाल बेमानी है वे किसने कैद की थीं और क्यों? आईये, जंगल सफारी एंजॉय कीजिये. अब ये आदिवासी मुक्त क्षेत्र है. झोपड़े थे उनके, मिट्टी के चूल्हे, हंडा, थाली, कड़छी, चटाई, मुर्गा, बकरी, छोटी सी ही सही पूरी एक दुनिया, जो अब डूब गई है. बस एक जिंदगी बची थी जिसे लेकर वे मजदूरी करने शहरों की ओर निकल गये हैं. मिलेंगे आपको, शहर के लेबर चौक पर.

यहाँ से देखिये, एक सौ चालीस मीटर ऊपर से, जहां तक नज़र जायेगी, पानी ही पानी दिखेगा आपको. डूबने को तो गाँव के गाँव डूब गये हैं मगर चुल्लू भर पानी में कोई नहीं डूबा. डूबेगा भी नहीं. जो दूसरों को डुबोने के प्लान्स पर काम करते हैं वे चुल्लू भर पानी के पास भी नहीं फटकते हैं. बोतल में कैद करके साथ लिए चलते हैं, लीटर भर. वाटर ऑफ कार्पोरेट, वाटर फॉर कार्पोरेट. पूरी नदी उनकी कैद में. विकास की अट्टालिकाओं के निर्माण में पानी आँख का लगता है श्रीमान और जिनकी ये अट्टालिकायेँ हैं उनकी आँखों में बचा नहीं, सो कचरू, दत्तू, मोहन, बेनीबाई, कमलाबाई या मानक काका की आँखों से छलकवा लेते हैं. कुदरत नदी में पानी लाती है, वे मज़लूमों की आँख में लाते हैं. मीठे आँसू पीने का चस्का जो है उनको. बहरहाल, तब भी बद्दुआएँ देना कचरुओं की तासीर में नहीं है, एक आँसू ढलका कर जी हल्का कर लेते हैं, फिर निकल जाते है खंडवा, इंदौर, भोपाल की ओर. मीठे आंसुओं के चस्केबाज जीने नहीं देते, जिजीविषा मरने नहीं देती. जिजीविषा कुदरत को परास्त नहीं कर पाती मगर वो उसे हैरान तो कर ही देती है. कुदरत हैरान थी. कुदरत हैरान है.

 

© श्री शांतिलाल जैन 

F-13, आइवोरी ब्लॉक, प्लेटिनम पार्क, माता मंदिर के पास, टी टी नगर, भोपाल – 462003  (म.प्र.)

मोबाइल: 9425019837

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हिन्दी साहित्य – ☆ कविता ☆ महानगर की काया पर चाँद ☆ – सुश्री निर्देश निधि

सुश्री निर्देश निधि

 

(आज प्रस्तुत हैं सुश्री निर्देश निधि जी  की एक भावप्रवण कविता “महानगर की काया पर चाँद”. )

 

(इस कविता का अंग्रेजी भावानुवाद आज के ही अंक में  ☆ Moon’s hide and seek with the metropolis☆ शीर्षक से प्रकाशित किया गया है. इसअतिसुन्दर भावानुवाद के  लिए हम  कॅप्टन प्रवीण रघुवंशी जी के ह्रदय से आभारी हैं. )  

 

☆ महानगर की काया पर चाँद ☆

 

महानगर की काया पर तैरता चाँद

उसकी चकाचौंध से अकसर मात खाता है

खींच लेता है अपनी,चाँदी की चादर,

छिप जाता है, ऊंची इमारतों के पीछे

डरता फिरता है इंसानी इरादों से

नहीं पीना चाहता है वो धुएँ

ईर्ष्या की सुलगती आग के

वो नहीं देख सकता

अपनी ठंडी हथेलियों पर टपकता गरम मानवी रक्त

नहीं चाहता सहना अपने नरम सीने पर

हमशकल मासूम ललनाओं की

तार – तार  हुई आबरू की कड़ी चोट

जीना चाहता है अंतहीन भ्रम में

खुद के चेहरे के लिए दीवानगी देखकर इंसान की

जानता तो खुद भी है शायद

अपना भी फंस जाना

इंसानी महत्वाकांक्षाओं में

तभी तो सीखता फिरता है

विधा चक्रव्यूह ध्वंस की

सारे आकाश में इस ओर से उस छोर तक।

 

संपर्क – निर्देश निधि, विद्या भवन, कचहरी रोड, बुलंदशहर, (उप्र ) पिन – 203001

ईमेल – nirdesh.nidhi@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – लघुकथा – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – आग ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। ) 

 

☆ संजय दृष्टि  – आग

 

दोनों कबीले के लोगों ने शिकार पर अधिकार को लेकर एक-दूसरे पर धुआँधार पत्थर बरसाए। बरसते पत्थरों में कुछ आपस में टकराए। चिंगारी चमकी। सारे लोग डरकर भागे।

बस एक आदमी खड़ा रहा। हिम्मत करके उसने फिर एक पत्थर, दूसरे पर दे मारा। फिर चिंगारी चमकी। अब तो जुनून सवार हो गया उस पर। वह अलग-अलग पत्थरों से खेलने लगा।

वह पहला आदमी था जिसने आग बोई, आग की खेती की। आग को जलाया, आग पर पकाया। एक रोज आग में ही जल मरा।

लेकिन वही पहला आदमी था जिसने दुनिया को आग से मिलाया, आँच और आग का अंतर समझाया। आग पर और आग में सेंकने की संभावनाएँ दर्शाईं। उसने अपनी ज़िंदगी आग के हवाले कर दी ताकि आदमी जान सके कि लाशें फूँकी भी जा सकती हैं।

वह पहला आदमी था जिसने साबित किया कि भीतर आग हो तो बाहर रोशन किया जा सकता है।

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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English Literature – Poetry – ☆ Moon’s hide and seek with the metropolis ☆ – Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(We are extremely thankful to Captain Pravin Raghuvanshi Ji for sharing his literary and artworks with e-abhivyakti.  An alumnus of IIM Ahmedabad, Capt. Pravin has served the country at national as well international level in various fronts. Presently, working as Senior Advisor, C-DAC in Artificial Intelligence and HPC Group; and involved in various national-level projects.

 

(We present an English Version of  Ms.  Nirdesh Nidhi’s Hindi poem ☆ महानगर की काया पर चाँद☆   published in today’s issue .  We extend our heartiest thanks to Captain Pravin Raghuvanshi Ji for this beautiful translation. )

 

☆ Moon’s hide and seek with the metropolis ☆

 

Moon obsessedly floating above

corporeal frame of the metropolis,

Often loses to its glitzy glare…

Pulls out its silver sheet,

Keeps hiding behind

the towering skyscrapers

Afraid of human intentions,

it keeps running away…

It doesn’t want to inhale that

smoke of the inferno of envy

It can’t see the hot human blood

dripping on its innocent palms

Doesn’t want to endure the hurt

of a young innocent damsel’s

dignity being ripped apart,

on its soft chest…

Probably knows about its

own weaknesses of getting

snared in human falacies

Still, wants to live in endless euphoria of man’s madness

about its charming face…

That’s why it keeps wandering

endlessly all over the sky

to learn the art of demolishing the **Chakravyuh* …

 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

 

* Chakravyuh  –  A mythological multi-tiered defensive formation that looked like a disc (chakra) when viewed from above. The warriors at each interleaving position would be in an increasingly tough position to fight against. The formation was used in the battle of Kurukshetra in the   Mahabharat epic, which was considered as an extremely maze to crack

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 13 – महासंग्राम ☆ – श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

 

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है   “महासंग्राम ।)

Amazon Link – Purn Vinashak

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 13 ☆

 

☆ महासंग्राम 

 

रावण की ओर से एक के बाद एक, महान राक्षस योद्धा युद्ध के मैदान में आ रहे थे। किमकारा राक्षस के अंत के बाद, सेना का संचालन रावण के पुत्र ‘देवान्तक’ के हाथ में दिया गया, कुछ लोगों का कहना था कि उसके नाम का अर्थ ‘देव’ ‘अंत’ ‘तक’ या देवो के अंत तक वह पराजित नहीं होगा है ।

लेकिन वास्तव में देवान्तक का अर्थ है, कि वह देवताओं के आने तक नहीं मरेगा । भगवान राम की सेना भगवानों और देवताओं के अवतारों से भरी थी। भगवान राम स्वयं भगवान विष्णु के अवतार थे, भगवान हनुमान भगवान शिव के अवतार थे, सुग्रीव सूर्य देवता के और अन्य कई अन्य देवताओं के।

देवान्तक अपने रथ में भगवान राम की ओर जा रहा था लेकिन भगवान हनुमान रास्ते में उनके रथ के आगे आ गए और उनका रथ रोक दिया। तब देवान्तक ने कहा, “हे ताकतवर हनुमान ! तुम मुझे नहीं जानते, मैं देवान्तक हूँ – रावण का पुत्र, और मुझे यह नाम भगवान ब्रह्मा से तब मिला जब मैंने तुम्हारे पिता, वायु के देवता को हराया था।तो ब्रह्मा ने मुझे यह नाम दिया है, इसका अर्थ है कि मैं सभी देवताओं के अंत तक जीवित रहूँगा। तो मेरे रास्ते से दूर जाओ अन्यथा मैं तुम्हें मार दूँगा”

भगवान हनुमान मुस्कुराते हैं और रावण के पुत्र देवान्तक को संस्कृत भाषा के कुछ बुनियादी सिद्धांत सिखाते है। भगवान हनुमान ने कहा, “हे रावण के महान योद्धा! क्या तुम अपने नाम का अर्थ भी नहीं जानते हो। यहाँ तक ​​कि तुम्हारे पिता रावण, जो स्वयं को संस्कृत भाषा का ज्ञानी बोलता है, उसने भी तुम्हें यह नहीं बताया है कि संस्कृत भाषा के नियम के अनुसार तुम्हारा नाम देवान्तक है, इसमें ‘ना’ धातु शामिल है, जो कुछ समय अवधि को परिभाषित करता है, और तुम्हारी स्थिति में वह समय की अवधि तब तक है जब तक देवता तुम्हारे साथ लड़ने नहीं आते हैं और तुम्हें शायद नहीं पता की हमारी सेना देवताओं के अवतारों से भरी है। तुमने कभी मेरे पिता को हराया होगा, तो अब यह मेरा समय की मैं तुमसे अपने पिता की हार का बदला लूँ तो अब मैं तुम्हें मारने जा रहा हूँ।”

भगवान हनुमान पूर्ण गति से देवान्तक के रथ की ओर दौड़ते हैं और उसके रथ को अपने शरीर की मजबूत टक्कर से नष्ट कर देते हैं। फिर देवान्तक को अपनी बाहों में उठाते हैं और पृथ्वी पर वापस पटक देते हैं। और इस तरह देवान्तक के जीवन का अंत हो जाता है ।

 

© आशीष कुमार  

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 11 ☆ इस जहाँ में ☆ – सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे

(सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य  विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं ।  वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है सौ. सुजाता काळे जी की  एक भावप्रवण कविता  “इस जहाँ में “।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 11 ☆

☆ इस जहाँ में 

कुछ आँसू कम लिखते
मुकद्दर लिखने वाले
इस जहाँ में कमी नहीं है
बेकस (अकेला) रूलाने वालों की।

जहाँ में बेमुकम्मल बनाया
कोई गम न था।
इस जहाँ में कमी नहीं है
गुमराह करने वालों की ।

फितरत-ए- फरेब का
कदम कदम पर जाल
आलिम (विद्वान) कोई नहीं है
पहचानने के लिए ।

परवाना जला करता था
इश्क -ए- रोशनी की लौ में
बेखुद जला रहा है
गुलशन-ए-इश्क को।

डूबते हैं लोग रोज
खयालों के पियालों में
जो बूँदों से महकते हैं
उन्हें किनारा नहीं मिलता।

© सुजाता काले
पंचगनी, महाराष्ट्रा।
9975577684

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मराठी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होत आहे रे # 10 ☆ श्रीदासबोधाची  शिकवण ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

 

(वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है. इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है. श्रीमती उर्मिला जी के    “साप्ताहिक स्तम्भ – केल्याने होतं आहे रे ”  की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  उनकी कविता श्रीदासबोधाची  शिकवण जो श्री दासबोध की शिक्षा पर आधारित है. यह शिक्षा सामजिक सरोकार से सम्बन्ध रखती है एवं सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ समाज के सर्वांगीण उत्थान की प्रेरणा देती है. श्रीमती उर्मिला जी को ऐसी सुन्दर कविता के लिए हार्दिक बधाई. )

 

☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 10 ☆

 

☆ श्रीदासबोधाची  शिकवण ☆

 

श्रीरामाचा मंत्र जपोनि करुया शुद्धी चित्ताची  !

चला मुलांनो शिकवण घेऊ आपण दासबोधाची !!धृ.!!

 

धर्म भ्रष्टण्या काळ ठाकला !

उसळतसे हैवान पहा!

देव धर्म भगिनी मातांचा ,

विध्वंस मांडला कसा पहा !!

दुष्कृत्याच्या प्रतिकारास्तव कास धरुन हनुमंताची !!१!!

चला मुलांनो शिकवण घेऊ आपण दासबोधाची !!१!!

 

बुद्धी बलाच्या संगमताने

कुविचारांचा ऱ्हास करु

सुविचारांची करु पेरणी

सद्भावांना हाती धरु!

वाढवू शक्ती ऐक्याची !

संघटना करु नीतिची!!२!!

चला मुलांनो शिकवण घेऊ आपण दासबोधाची!!२!!

 

शिक्षणाच्या पवित्र क्षेत्री!

लुडबुड लबाड लांडग्यांची !

ज्ञानयज्ञातही सत्ता चाले!

राजकारणी धनदांडग्यांची!

उभे ठाकूया तोंड द्यावया

असल्या पढतमूर्खांची !!३!!

चला मुलांनो शिकवण घेऊ आपण दासबोधाची!!३!!

 

शिकवू मुलगी करु हुषार !

दुबळी मुळी नच ती राहणार !

स्वाभीमानाचा करुनीजागर !

हिंमत तिची वाढवणार!

स्वसंरक्षाणास्तव स्वयंसिद्धा ती होणार !

सुवर्ण पदके जिंकून आणून!

होई देशाची ती शान !

होई देशाची ती शान !!४!!

 

श्रीरामाचा मंत्र जपोनि !

करुया शुद्धी चित्ताची!

चला मुलांनो शिकवण घेऊ आपण दासबोधाची!!

आपण दासबोधाची!!

 

“जय जय रघुवीर समर्थ “!

©®
उर्मिला इंगळे
!!श्रीकृष्णार्पणमस्तु !!

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