हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ज़िम कार्बेट-नैनीताल – भाग-२७ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग- २७ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

ज़िम कार्बेट-नैनीताल

जिम ने कुछ समय छोटी हल्द्वानी में भी बिताया, जिसे उन्होंने गोद लिया था और जिसे कॉर्बेट्स विलेज के नाम से जाना जाने लगा। जंगली जानवरों को परिसर से बाहर रखने के लिए कॉर्बेट और ग्रामीणों ने 1925 में गांव के चारों ओर एक दीवार का निर्माण किया। 2018 तक दीवार अभी भी खड़ी है, और ग्रामीणों के अनुसार इसे बनाने के बाद से दीवार ने ग्रामीणों पर जंगली जानवरों के हमलों को रोका जा सका था। उनकी यादों को मोती हाउस के रूप में बरकरार रखा गया था, जिसे कॉर्बेट ने अपने दोस्त मोती सिंह के लिए बनवाया था, और कॉर्बेट वॉल, एक लंबी दीवार (लगभग 7.2 किमी) गाँव के चारों ओर फसलों की जंगली जानवर से रक्षा के लिए बनाई गई थी। उन्होंने जंगली बिल्लियों और अन्य वन्यजीवों की घटती संख्या के बारे में लिखना और चेतावनी देना जारी रखा।

1947 के बाद, कॉर्बेट और उनकी बहन मैगी न्येरी, केन्या चले गए थे, जहां वे होटल आउटस्पैन के मैदान में ‘पक्सटू’ कॉटेज में रहते थे, जो मूल रूप से उनके दोस्त लॉर्ड बैडेन-पॉवेल के लिए बनाया गया था। जिम कॉर्बेट अपनी बहन मैगी कॉर्बेट के साथ गुर्नी हाउस में रहते थे। नवंबर 1947 में केन्या जाने से पहले उन्होंने श्रीमती कलावती वर्मा को घर बेच दिया। घर को एक संग्रहालय में बदल दिया गया है और इसे जिम कॉर्बेट संग्रहालय के रूप में जाना जाता है। आज हम कालाढुंगी के उसी संग्रहालय के प्रांगण में उन्हें याद करके आदरांजलि अर्पित कर रहे हैं।

केन्या भी कभी ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा रहा था। रानी एलिज़ाबेथ द्वितीय केन्या गई थीं। तब उनके लिए ट्रीटॉप हट बनाई है थी जिसमें कॉर्बेट 5-6 फरवरी 1952 को राजकुमारी एलिजाबेथ के अंगरक्षक के रूप में ट्रीटॉप्स पर (एक विशाल फ़िकस के पेड़ की शाखाओं पर बनी एक झोपड़ी) साथ रहे। उस रात राजकुमारी के पिता, किंग जॉर्ज VI की मृत्यु हो गई, और एलिजाबेथ रानी बन गई। दुनिया के इतिहास में पहली बार एक युवा राजकुमारी के रूप में पेड़ पर चढ़ी और अपने सबसे रोमांचक अनुभव के रूप में वर्णित करने के बाद वह अगले दिन पेड़ से इंग्लैंड की रानी बनकर नीचे उतरी। अपनी छठी पुस्तक, ट्री टॉप्स को समाप्त करने के कुछ दिनों बाद दिल का दौरा पड़ने से कार्बेट की मृत्यु हो गई, और उन्हें न्येरी में सेंट पीटर्स एंग्लिकन चर्च में दफनाया गया।  कॉर्बेट और उनकी बहन की लंबे समय से उपेक्षित कब्रों की मरम्मत और जीर्णोद्धार जिम कॉर्बेट फाउंडेशन के संस्थापक और निदेशक जैरी ए. जलील द्वारा 1994 और 2002 में किया गया।

जिम कॉर्बेट की कुल सात किताबें भारत में प्रकाशित हुई हैं। जिनके हिंदी संस्करण भी  आ चुके हैं। वन्य जीवन में रूचि रखने वालों के लिए उनका साहित्य अद्भुत ख़ज़ाना से कम नहीं है। 

1.जंगल की कहानियां। 1935 में निजी तौर पर प्रकाशित (केवल 100 प्रतियां)

सामग्री: गांव में वन्य जीवन: एक अपील, पीपल पानी टाइगर, मेरे सपनों की मछली, एक खोया स्वर्ग, आतंक जो रात में चलता है, पूर्णा लड़की और इसकी रहस्यमय रोशनी, चौगढ़ टाइगर्स।

2.कुमाऊं के आदमखोर। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, बॉम्बे 1944

सामग्री: लेखक का नोट (आदमखोर होने के कारण), चंपावत मानेटर, रॉबिन, चौगढ़ टाइगर्स, द बैचलर ऑफ पोवलगढ़, द मोहन मानेटर, फिश ऑफ माय ड्रीम्स, द कांडा मैनेटर, द पीपल पानी टाइगर, द ठक मैन-ईटर, जस्ट टाइगर्स।

3.रुद्रप्रयाग का आदमखोर तेंदुआ। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1947

सामग्री: द पिलग्रिम रोड, द मैन-ईटर, आतंक, आगमन, जांच, पहली हत्या, तेंदुए का पता लगाना, दूसरा किल, तैयारी, जादू, ए नियर एस्केप, द जिन ट्रैप, द हंटर्स हंटेड, रिट्रीट, फिशिंग इंटरल्यूड, एक बकरी की मौत, साइनाइड जहर स्पर्श, सावधानी में एक सबक, एक जंगली सूअर का शिकार, एक देवदार के पेड़ पर सतर्कता, आतंक की मेरी रात, तेंदुए से लड़ता है तेंदुए, अंधेरे में एक शॉट, उपसंहार।

4.मेरा भारत। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1952

सामग्री: समर्पण और परिचय, गांव की रानी, ​​कुंवर सिंह, मोती, पूर्व लाल टेप दिन, जंगल का कानून, ब्रदर्स, सुल्ताना: भारत का रॉबिन हुड, वफादारी, बुद्धू, लालाजी, चमारी, मोकामा घाट पर जीवन।

5.जंगल विद्या। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1953

सामग्री: मार्टिन बूथ, डैनसे, लर्निंग टू शूट, मागोग, लुकिंग बैक, जंगल एनकाउंटर, कैटेगरी, जंगल विद्या, जंगल की पुकार, स्कूल के दिन / कैडेट, जंगल की आग और बीट्स, गेम ट्रैक्स, जंगल संवेदनशीलता परिचय।

6.कुमाऊं का टेंपल टाइगर और अन्य आदमखोर। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1954

सामग्री: द टेंपल टाइगर, द मुक्तेसर मैन-ईटर, द पनार मैन-ईटर, द चुका मैन-ईटर, द तल्ला देस मैन-ईटर, उपसंहार।

7.माई कुमाऊं: अनकलेक्टेड राइटिंग्स। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2012

सामग्री: प्रकाशक का नोट; समयरेखा; प्रस्तावना: ‘मैं कैसे लिखने आया’; ए लाइफ वेल लिव्ड: एन इंट्रोडक्शन टू जिम कॉर्बेट बाय लॉर्ड हैली; खंड एक: अप्रकाशित कॉर्बेट—रात जार का अंडा; ‘हम में से एक’; माई जंगल कैंप से; रुद्रप्रयाग पत्र; रुद्रप्रयाग के आदमखोर तेंदुए पर कॉर्बेट; द मेकिंग ऑफ कॉर्बेट्स माई इंडिया: कॉरेस्पोंडेंस विद हिज एडिटर्स; ‘शूटिंग’ टाइगर्स: कॉर्बेट एंड द कैमरा; गांव में वन्यजीव: एक पर्यावरण अपील; भारत में एक अंग्रेज; केन्या में जीवन; खंड दो: कॉर्बेट एंड हिज़ ऑडियंस-‘द आर्टलेसनेस ऑफ़ हिज़ आर्ट’; द मैन रिवील्ड: कॉर्बेट इन हिज़ राइटिंग्स; जिम कॉर्बेट की सार्वभौमिक अपील: पत्र और समीक्षाएं; रुद्रप्रयाग के लिए उद्धार: कॉर्बेट द्वारा आदमखोर तेंदुए की हत्या पर प्रतिक्रिया; कॉर्बेट का प्रभाव: कुमाऊं के आदमखोर और छिंदवाड़ा कोर्ट केस; सूक्ति

उनकी किताब  मैन-ईटर ऑफ कुमाऊं (कुमाऊं के आदमखोर) भारत, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका में एक बड़ी सफलता थी, अमेरिकन बुक-ऑफ-द-मंथ क्लब का पहला संस्करण 250,000 प्रतियां था। बाद में इसका 27 भाषाओं में अनुवाद किया गया। कॉर्बेट की चौथी पुस्तक, जंगल लोर, उनकी आत्मकथा है। 1948 में, कुमाऊं की सफलता के आदमखोरों के मद्देनजर, एक हॉलीवुड फिल्म, मैन-ईटर ऑफ कुमाऊं, बायरन हास्किन द्वारा निर्देशित और साबू, वेंडेल कोरी और जो पेज अभिनीत, बनाई गई थी। फिल्म ने कॉर्बेट की किसी भी कहानी का अनुसरण नहीं किया; एक नई कहानी का आविष्कार किया गया था। फिल्म फ्लॉप रही, हालांकि बाघ के कुछ दिलचस्प फुटेज फिल्माए गए। कॉर्बेट ने कहा है कि “सर्वश्रेष्ठ अभिनेता बाघ था” ‘कॉर्बेट लिगेसी’ का निर्माण उत्तराखंड वन विभाग द्वारा किया गया था और बेदी ब्रदर्स द्वारा निर्देशित किया गया था, जिसमें कॉर्बेट द्वारा शूट की गई मूल फुटेज थी। 1986 में, बीबीसी ने जिम कॉर्बेट की भूमिका में फ्रेडरिक ट्रेव्स के साथ मैन-ईटर्स ऑफ़ इंडिया नामक एक डॉक्यूड्रामा का निर्माण किया।

कॉर्बेट की किताबों पर आधारित एक आईमैक्स फिल्म इंडिया: किंगडम ऑफ द टाइगर, 2002 में क्रिस्टोफर हेअरडाहल द्वारा कॉर्बेट के रूप में अभिनीत थी। 2005 में जेसन फ्लेमिंग अभिनीत रुद्रप्रयाग के आदमखोर तेंदुए पर आधारित एक टीवी फिल्म बनाई गई थी। पूरी शाम प्रिय शिकारी और वाइल्ड लाइफ़ पर रोचक व रोमांचक किताबें देने वाले बेहतरीन इंसान की यादों में गुज़ारी। उनकी सभी किताबें और उनके हिंदी अनुवाद सब आसानी से आमेजोन पर उपलब्ध हैं। जिम कार्बेट के संग्रहालय में गुज़ारी। उनके द्वारा उपयोग की है सामग्रियों को निहारा। उनके फ़ोटोग्राफ़ कुर्सियाँ मेज़ कटलरी सब कुछ देखा। रात आठ बजे के आसपास नैनीताल पहुँचे।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २५ – कविता – सार… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “तो जानें“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २५ ?

? कविता – सार… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

-1-

ये तथ्य हैं उनींदे, जगाओ झिंझोड़कर

रखा गया है जिनको, गर्दनें मरोड़ कर

-2-

ये तो मुँह तलक़ हैं, लबालब भरे हुए

ज़ोख़िम ले कौन ऐसे चिकने घड़े फोड़कर

-3-

भूमिका पढ़ी न, उपसंहार ही पढ़ा

रख दी क़िताब उसने, एक पृष्ठ मोड़कर

-4-

न दी ज़मीन जिसने, सुई की नोंक बराबर

एक दिन चला गया वो साम्राज्य छोड़कर

-5-

मांग सजाने की थी जो, मांग तुम्हारी

लाया हूँ आसमाँ से, चाँद-तारे तोड़कर

-6-

सरकार बना डाली, गुणा-भाग जोड़कर

खा रहे हैं माल आप, कथरी ओढ़कर

-7-

चिंतन की धूप बिन लगे, ज़ेहन में फफूँदी

‘राजेश’ ने लाया है, सार यह निचोड़कर

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १९८ ☆ मुक्तक – ।। हे माँ दुर्गा पापनाशनी, तेरा वंदन बारम्बार है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १९८ ☆

☆ मुक्तक ।। हे माँ दुर्गा पापनाशनी, तेरा वंदन बारम्बार है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

सुबह शाम की  आरती और माता का जयकारा।

सप्ताह का हर दिन बन गया शक्ति का भंडारा।।

केसर चुनरी चूड़ी रोली हे माँ करें तेरा सब श्रृंगार।

सिंह पर सवार माँ दुर्गा आयी बन भक्तों का सहारा।।

=2=

तेरे नौं रूपों में समायी शक्ति बहुत असीम है।

तेरी भक्ति से बन जाता व्यक्ति संस्कारी प्रवीण है।।

हे वरदायनी पपनाशनी  चंडी रूपा कल्याणी तू।

लेकर तेरे नाम मात्र से हो जाता व्यक्ति दुखविहीन है।।

=3=

नौं दिन की  नवरात्रि मानो कि ऊर्जा का संचार है।

भक्ति में लीन तेरे  भजनों  की नौ दिन भरमार है।।

कलश सकोरा जौ और  पानी आस्था के  प्रतीक।

हे जगत पालिनी माँ दुर्गा  तेरा वंदन बारम्बार है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६१ ☆ कविता – जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !! ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६१ 

☆ जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !! स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

दर्शन के लिये, पूजन के लिये, जगदम्बा के दरबार चलो

मन में श्रद्धा विश्वास लिये, मां का करते जयकार चलो !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

है डगर कठिन देवालय की, माँ पथ मेरा आसान करो

मैं द्वार दिवाले तक पहुँचू, इतना मुझ पर एहसान करो !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

 *

उँचे पर्वत पर है मंदिर, अनुपम है छटा, छबि न्यारी है

नयनो से बरसती है करुणा, कहता हर एक पुजारी है !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

 *

मां ज्योति तुम्हारे कलशों की, जीवन में जगाती उजियाला

हरयारी हरे जवारों की, करती शीतल दुख की ज्वाला !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

 *

जगजननि माँ शेरावाली ! महिमा अनमोल तुम्हारी है

जिस पर करती तुम कृपा वही, जग में सुख का अधिकारी है !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

 *

तुम सबको देती हो खुशियाँ, सब भक्त यही बतलाते हैं

जो निर्मल मन से जाते हैं वे झोली भर वापस आते है !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४९ ⇒ चरण-पादुका ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चरण-पादुका ।)

?अभी अभी # ९४९  ⇒ आलेख – चरण-पादुका ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जिसे हम कलजुग में जूता कहते हैं, उसे रामराज्य में चरण-पादुका कहा जाता था। भगवान रामचंद्र को जब वनवास हुआ था, तब वे लछमन-जानकी सहित, चौदह वर्ष के लिए, नंगे पाँव, अर्थात bare-foot जंगल प्रस्थित हो गए थे, और उनके भ्राता भरत ने उनकी चरण-पादुकाओं को सिंहासन पर विराजमान कर, अजोध्या का राजपाट संभाला था।

चरण-पादुका शब्द से ऐसा प्रतीत होता है कि कोई ऐसी भी पादुका रही होगी, जिसे हाथों में पहना जाता होगा, और उसे शायद हस्त-पादुका कहा जाता होगा। लेकिन रामायण में ऐसी किसी हस्त-पादुका का जिक्र नहीं है, हाँ एक मुद्रिका का वर्णन ज़रूर आता है, जिसे हनुमानजी अशोक वाटिका में सीता जी को भेंट करते हैं, और जिसे आज अंगूठी कहा जाता है, लेकिन जिसे अंगूठे के बजाय अनामिका में धारण किया जाता है।।

पादुका उतनी ही पवित्र मानी जाती है, जितने संत-महात्माओं के चरण। मांगी नाव न केवट आना, प्रसंग में केवट पहले रामचंद्रजी के चरण धोता है और फिर उन्हें अपनी नाव में प्रवेश देता है। सज्जनों! बड़ा मार्मिक प्रसंग है। जिनके चरण-रज से पत्थर की मूरत, अहिल्या बन गई, अगर वे ही चरण केवट की नाव पर पड़ गए, तो उसकी रोजी-रोटी का क्या होगा? और हज़ारों वर्षों बाद प्रयागराज में उल्टी गंगा बहने लगी जब कोई प्रधान-सेवक, नमामि गंगे के स्वच्छता-सेवकों के चरण धोता है, तो कलेजा मुँह को आ जाता है। धन्य है भारत भूमि, और यहाँ के महान अवतारी पुरुष।

महान विभूतियों का केवल पाद-प्रक्षालन ही नहीं होता, उनकी पादुकाओं का विधिवत पूजन भी होता है, जिसे सद्गुरु-पादुका-पूजन कहते हैं। गुरु-पूर्णिमा के पर्व पर सद्गुरु एवं उनकी पादुका-पूजन का विशेष महत्व होता है। यह आस्था का विषय है, जिसके लिए तुलसी और राम भक्त हनुमान की तरह श्रीराम को हृदय में विराजमान करना पड़ता है।।

ये कहाँ आ गए हम! आइए, वर्तमान में प्रवेश करते हैं। चरण अब सामान्य पाँव हो गए हैं, जिनकी साँप-बिच्छू, धूल-मिट्टी, काँटे और कंकड़-पत्थर से सुरक्षा के लिए पाँवों में जूता धारण किया जाता है। ऐसा नहीं है कि केवल मर्द ही पाँवों में जूता पहन सकते हैं, लेकिन महिलाओं को चप्पल पहनने में आसानी होती है, और साड़ी के साथ न जाने क्यों, जूते को कुछ शर्म सी महसूस होती है।

दूसरी बात! कुछ मजनुओं की पूजा के लिए, पाँव से चप्पल निकालकर पूजा करने में बड़ी आसानी होती है। अभी-अभी एक सांसद ने पाँव से जूता निकालकर एक विधायक की पूजा कर दी। जहाँ चाह है, वहाँ राह है, और आवश्यकता, आविष्कार की जननी है। किसे पता था, जिस पादुका की श्रद्धा और समर्पण से पूजा होती है, वही पादुका, जूते का विकराल रूप धारण कर, समय आने पर, किसी के सर की पूजा के काम आएगी।।

उपनयन संस्कार की ही तरह घरों में एक और संस्कार होता था, जिसे कोई विधिवत नाम तो नहीं दिया जाता था, लेकिन जब भी बच्चों की अकल ठिकाने लगाना होती थी, उनकी बाबूजी द्वारा जूतों से पूजा की जाती थी। कालांतर में किसी की भी अकल ठिकाने लगाने के लिए, इस विधि का उपयोग किया जाने लगा। राग दरबारी में इस विधि को जुतियाना कहा गया है। सुधिजन इसे पढ़कर लाभान्वित हों, और यह ज्ञान उन्हें वक्त ज़रूरत काम आवे।।

वैसे समय बड़ा बलवान है और आदमी महान है ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ ऋतूंची फुलमाला… ☆ सुश्री उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे ☆

सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

☆ ऋतूंची फुलमाला ☆ सुश्री उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे ☆

वसंत येईल राजा बनुनी,

चैतन्याने भरली अवनी!

नवसृजनाचे दालन उघडूनी,

नवल उमटले माझिया मनी! .. १

*

ग्रीष्म झळा त्या घेता भुवनी,

तगमग होई सजीव जीवनी!

शोधित जाई गारवाही मनी,

चाहूल घेई वर्षेची आंतुनी! .. २

*

वर्षे चा पहिला शिडकावा,

चराचराला देई गारवा!

वाट पाहतो ऋतू हिरवा,

दिसेल तेव्हा बदल नवा! .. ३

*

शरदाचे दिसताच चांदणे,

आनंदाला काय उणे!

चंद्र चकोरी नभात बघणे,

धरतीवर स्वप्नात रंगणे! .. ४

*

हेमंताची लागताच चाहूल,

पडे थंडीचे घरात पाऊल!

दाट धुक्याची घेऊन शाल,

निद्रिस्त राही निसर्ग विशाल! . ५

*

शिशिराची ती थंडी बोचरी,

पान फुलांना निद्रिस्त करी!

जोजवते आपल्या अंकावरी,

शांत मनोरम सृष्टी साजरी! .. ६

*

सहा ऋतूंची ही फुलमाला,

निसर्ग वेढीतो ती सृष्टीला!

प्रत्येक ऋतू बहरून आला,

अस्तित्वाने मनात फुलला! .. ७

© सुश्री उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

वारजे 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – क्षण सृजनाचा ☆ जागतिक कविता दिन विशेष – मानसउत्सव… ☆ श्री सुनील देशपांडे ☆

श्री सुनील देशपांडे

📚 क्षण सृजनाचा 📚

☆ जागतिक कविता दिन विशेष – मानसउत्सव… ☆ श्री सुनील देशपांडे 

(२१ मार्च जागतिक काव्य दिनाच्या निमित्ताने)

सध्याचा पुणेकर असलेला मी अंतर्मनाने मूळ कविता प्रेमी नाशिककर.

दरवर्षी २८ फेब्रुवारी कुसुमाग्रज जयंती हा मराठी दिन, परंतु विशेषतः ‘मराठी कविता दिन’ म्हणून माझ्या मनात कायम घर करून राहिलेला आहेच. १० मार्च हा कुसुमाग्रजांचा स्मृतिदिन. त्यामुळे नाशिक मध्ये असताना २८ फेब्रुवारी ते १० मार्च हा मराठी उत्सव म्हणून आम्ही साजरा करत असू. 

खरं म्हणजे कवितेचे प्रेम निर्माण करणारी पहिली कविता कुसुमाग्रज उर्फ आमचे लाडके तात्या यांची… 

‘उठा उठा चिऊताई सारीकडे उजाडले’ तेव्हापासून वेगवेगळ्या वयामध्ये पाठ्यपुस्तकातून तसेच कवी संमेलनातून त्यांच्या अनेक कवितांनी वेड लावले. अगदी ‘स्वातंत्र्यदेवतेच्या विनवणी’ पर्यंतच्या लोकप्रिय कवितांना रोजच वंदन करावेसे वाटते. 

सध्या शारीरिक कारणामुळे फारसे बाहेर पडू शकत नसलो तरी २८ फेब्रुवारी ते १० मार्च या दिवसात मनातून हा ‘मानसउत्सव’ मी साजरा करतच असतो. आणि काव्य प्रेमामुळे त्यानंतरही वेगवेगळ्या विविध दिवशी कवितेचे ‘मानसउत्सव’ साजरे करण्याची माझी प्रथा खालील दिवशी मनापासून चालूच असते. रसिकांच्या माहितीसाठी हे  दिवस सादर करीत आहे.

१) २१ मार्च : आंतरराष्ट्रीय कविता दिन किंवा जागतिक कविता दिन :

१९४५ मध्ये स्थापन झालेल्या युनायटेड नेशन्स एज्युकेशनल सायंटिफिक अँड कल्चरल ऑर्गनायझेशन अर्थात युनेस्को या संस्थेने काव्य अभिव्यक्तीद्वारे भाषिक विविधतेला पाठिंबा देण्याच्या आणि लुप्त होत असलेल्या भाषांना ऐकण्याची संधी वाढवण्याच्या उद्देशाने २१ मार्च हा जागतिक काव्य दिन म्हणून १९९९ मध्ये प्रथम स्वीकारला आणि त्यानंतर संपूर्ण जगामध्ये विविध भाषांमध्ये २१ मार्च हा दिवस जागतिक काव्य दिन म्हणून साजरा केला जातो.

२) २८ एप्रिल: राष्ट्रीय महान कविता दिन. 

भूतकाळात होऊन गेलेल्या खूप मोठ्या आणि महान कवींच्या कविता आठवणे त्यांचे पठण करणे मनन करणे आणि अशा कवींच्या काव्यवाचनाचे कार्यक्रम करणे यासाठी राष्ट्रीय महान कविता दिन साजरा केला जातो. 

३) ३० एप्रिल

अमेरिकेमध्ये ‘पोएम इन युअर पॉकेट डे’ म्हणजेच तुमच्या खिशातली कविता. असा एक अभिनव दिवस साजरा केला जातो. लघु कविता, छोट्या कविता, चारोळ्या, पाचोळ्या, रुबाई, शायरी वगैरे  पद्धतीच्या कविता अशा प्रकारच्या कवितांना उठाव येण्यासाठी आणि अशा प्रकारच्या कविता सध्या अमेरिकेमध्ये खूपच लोकप्रिय असून भारतात सुद्धा सध्या अशा प्रकारच्या कविता अत्यंत लोकप्रिय होत आहेत. अशा कवितांसाठी अनेक लोकप्रिय कवीं मार्फत हा दिवस साजरा केला जातो.

४) ७ मे : कविवर्य रवींद्रनाथ टागोर जयंती 

हा दिवस सहसा संगीतकविता किंवा उत्तम अशा वृत्तबद्ध कविता किंवा संगीतिका अशा पद्धतीच्या काव्य अविष्काराने साजरा करण्याची पद्धत आहे. विशेषतः बंगाली साहित्यिकांमध्ये हा दिवस खूप मोठ्या प्रमाणात साजरा केला जातो. भारतातही काव्यप्रेमी व्यक्ती या दिवशी विविध प्रकारचे उत्तम संगीतमय काव्याचे व संगीतीय कविता अथवा काव्यगायन, संगीत नृत्य गायन अशा प्रकारच्या कार्यक्रमांच्या आयोजनाने हा दिवस साजरा केला जातो.

५) आषाढ शुद्ध प्रतिपदा 

(हा दिवस साधारणपणे जुलै महिन्यात येतो)

आषाढ महिन्याचा पहिला दिवस हा संस्कृत भाषेतील महान कवी व नाटककार कवी कुलगुरू कालिदास यांच्या सन्मानार्थ हा दिवस साजरा होतो. याला ‘महाकवी कालिदास दिन’ किंवा ‘कवि कुलगुरू कालिदास दिन’ म्हणतात. महान कवि कालिदास यांच्या मेघदूत या महान काव्याचा निर्मिती दिवस मानला जातो. हा दिवस कालिदास जयंती दिन म्हणूनही समजला जातो. या दिवशी विविध कवी संमेलने व कवितांचे उत्सव साजरे करण्याचा प्रघात आहे. वर्षा ऋतू मधील हा काव्योत्सव. पाऊस अर्थात वर्षा ऋतू हा काव्य भावना जागृत करणारा काव्यात्मक वातावरण निर्माण करणारा ऋतू म्हणून समजला जातो. यामुळेच कवी मंडळींचा सगळ्यात आवडता दिवस त्यांच्या सगळ्यात आवडत्या ऋतूमध्ये म्हणजेच सिझनमध्ये येणारा हा स्फूर्तीदायक दिवस.

६) २१ ऑगस्ट : राष्ट्रीय कवी दिवस 

हा दिवस कवींच्या सन्मानासाठी साजरा केला जातो. कवितांमधून सामाजिक जागृती आणि सामाजिक संस्कार करणाऱ्या प्रसिद्ध कवींचा त्यादिवशी सन्मान केला जातो. त्यांच्या कवितांचे कार्यक्रम. विविध काव्य स्पर्धा व उत्कृष्ट कविता पारितोषिके देऊन अशा विविध पद्धतीने राष्ट्रीय कवी दिवस साजरा केला जातो. हा दिवस कवींचा दिवस म्हणून साजरा केला जातो. 

७) ऑक्टोबर महिन्याचा पहिला गुरुवार: राष्ट्रीय कविता दिन

एका सर्वेक्षणामध्ये असे आढळून आले आहे की ८ ते १६ वर्षा दरम्यान शिक्षण घेणारी पिढी कवितेवर मनापासून प्रेम करते. सर्वसाधारणपणे या वयोगटातील ४८.८% विद्यार्थी कविता प्रेमी असतात. अशा नव्या पिढीतील उदयोन्मुख कवींना प्रोत्साहन देण्यासाठी आणि त्यांच्यातील कवी गुणांना उजाळा देण्यासाठी राष्ट्रीय कविता दिन साजरा करण्याची परंपरा सुरू झाली आहे. प्रथमत: हा दिवस इंग्लंडमध्ये राष्ट्रीय कविता दिन म्हणून साजरा होत असे. त्यावेळी अनेक देश ब्रिटिश राजसत्ते खाली असल्यामुळे त्या देशांमध्ये हा दिवस साजरा करण्याची पद्धत सुरू झाली. विशेषतः प्रसिद्ध कवींनी नवीन पिढीतील कवींचे काव्यविश्वात स्वागत करून त्यांच्या मनात कवितेविषयी प्रेम जिव्हाळा व नवीन पिढीच्या काव्य कल्पनांना प्रोत्साहन देण्यासाठी प्रयत्न करणे हे उद्दिष्ट या दिवसाचे असते. नव्या पिढीतील काव्य कल्पनांना जुन्या पिढीतील कवींनी केलेला सलाम म्हणजे राष्ट्रीय कविता दिन.

८) अश्विन पौर्णिमा (कोजागिरी पौर्णिमा) : महर्षी वाल्मिकी जयंती 

(हा दिवस साधारणपणे ऑक्टोबर महिन्यामध्ये येतो)

महर्षी वाल्मिकी यांना आद्यकवी मानले जाते. या विश्वातील पहिली कविता ज्यांना स्फुरली ते महर्षी वाल्मिकी. म्हणून त्यांना कवितेचे जन्मदाते संबोधले जाते. महर्षी वाल्मिकी यांच्या जयंती दिनी कवितेच्या निर्मात्याचा जन्मदिवस म्हणून अनेक ठिकाणी कवितांचे कार्यक्रम आणि कवींचा सन्मान अशा पद्धतीच्या कार्यक्रमाचे आयोजन केले जाते. या दिवशी स्वच्छ चांदण्यामध्ये सहसा रात्रीच्या वेळी काव्य रंगात रंगून जाणे आणि केशरी दुधा बरोबर काव्याचा आस्वाद घेणे हा अत्यंत लोकप्रिय कार्यक्रम सगळीकडे भारत देशामध्ये साजरा केला जातो. सर्व अबालवृद्ध स्त्री पुरुष मध्यरात्री नंतर पर्यंत सुद्धा या कार्यक्रमामध्ये रंगून जातात.

असे हे मला ज्ञात असणारे वर्षातील विविध पद्धतीने साजरे होणारे कवितांचे दिवस. या दिवसांच्या आठवाच्या निमित्ताने माझी एक कागदावर न उठलेली कविता .. कल्पनेमध्येच लपून असलेली कविता..  त्या कवितेबद्दलची ही कविता रसिकांच्या चरणी अर्पण…

****

☆ नवीन कविता… ☆ श्री सुनील देशपांडे 

सुचते आहे मनात का ही नविन कविता

रुजते आहे बीज घेउनी नवीन कविता. 

*

या बीजातुन नवीन कांही फुटते आहे,

या बीजातुन खरेच येईल नवीन कविता ?

*

मनात माझ्या जे जे आहे व्यक्त व्हायचे,

घेऊन येईल का ते सारे नवीन कविता ?

*

नाविन्याचे कपडे लेऊन जुनीच येईल, किंवा

दिव्य देहिनी असेल का ती नवीन कविता ?

*

संचित प्रश्नांचे जे जाळे मनात माझ्या,

सोडवील का गुंता थोडा नवीन कविता ?

*

गुंता माझ्या मनातला ती सोडवील जर,

मुक्ती देईल मलाच माझी नवीन कविता.

*
ज्या मुक्तीची वाट आजवर पहातो आहे,

त्या मुक्तीची वाट दाखविल नवीन कविता.

 — श्री सुनील देशपांडे

© श्री सुनील देशपांडे

पुणे, मो – 9657709640 ईमेल  : sunil68deshpande@outlook.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ माणुसकी… लेखिका : सुश्री ज्योती निंबाळकर ☆ प्रस्तुती – श्री मेघ:श्याम सोनावणे ☆

श्री मेघ:श्याम सोनावणे

🌸 जीवनरंग 🌸

☆ माणुसकी… लेखिका : सुश्री ज्योती निंबाळकर ☆ प्रस्तुती – श्री मेघ:श्याम सोनावणे ☆

दरवाजा अर्धवट उघडाच होता. आत ऑफिसमध्ये प्रचंड शांतता होती… फक्त एका जुन्या छडीचा जमिनीवर टेकतांना टक-टक आवाज येत होता. रिसेप्शनवर बसलेल्या मुलीने वर मान करून पाहिलं, दारात एक कृश, वृद्ध माणूस उभा होता. पांढरे केस, जुना फाटलेला सदरा, आणि हातात निळे प्लास्टिक फोल्डर… कदाचित बायोडाटा. तो हळूहळू आत आला… जणू प्रत्येक पाऊल उचलताना त्याला वेदना होत होत्या.

रिसेप्शनिस्ट मुलीने विचारलं.. “आपण? ”

तो वृद्ध म्हणाला, “नोकरीसाठी… अर्ज द्यायचा होता. ”

त्या एका वाक्याने संपूर्ण ऑफिस अवाक् झालं. HR मॅनेजर अभिषेक त्याच्याकडे पाहून थक्क झाला. ६८–७० वर्षांचा माणूस, काठी टेकत चालत… नोकरी मागण्यासाठी आला होता. अभिषेकने अचंबित होऊन विचारलं,

“आजोबा, नोकरी? कोणती नोकरी हवी तुम्हाला? ”

वृद्धाने फोल्डर पुढे केला. त्यांचे हात थरथरत होते. “काहीही काम चालेल बेटा. मी शिकून घेईन.” त्याच्या आवाजात अशी वेदना जाणवत होती की, जणू आयुष्याने त्यांचं सगळं काही हिरावून घेतलं होतं.

अभिषेकने त्यांचा बायोडाटा उघडला आणि वाचताच त्याचे डोळे पाणावले.

बायोडाटा:

नाव: सुरेश पाटील

वय: ६९ वर्षे

शिक्षण: बारावी पास

अनुभव: ३२ वर्षं सरकारी शाळेत शिपाई. शाळा उघडणे, साफ- सफाई, मुलांना मदत, चहा-पाणी.

निवृत्ती: ९ वर्षांपूर्वी

पण शेवटची ओळ वाचून अभिषेक थबकला –

“पेन्शनचे पैसे फसवणुकीने गेले, घरात कोणी कमावणारा नाही,

दोन नातवंडे शाळेत जातात, सुनेची तब्येत बरी नसते. नोकरी नाही मिळाली तर घर चालवणं अवघड होईल. ” 

अभिषेकने त्याच्याकडे पाहिलं.

त्या डोळ्यांत फक्त नव्हती तर विवंचना होती.

ऑफिसमध्ये कुजबुज सुरू झाली..

“या वयात नोकरी?”,

“आता या वयात काय काम करणार?”

“चॅरिटी थोडी चाललीये इथे?”

पण अभिषेकच्या डोळ्यांसमोर त्याच्या वडिलांचा चेहरा आला. ‘जर माझ्या बाबांवर कधी अशी वेळ आली तर? ’ त्याचं मन ढवळून निघालं. तो म्हणाला, “आजोबा, बसा ना. छोटासा इंटरव्ह्यू घेऊया.”

वृद्ध थोडा गोंधळला… “बेटा, इंटरव्ह्यू नको… फक्त काम दे. मी सगळ्यात आधी येईन, मेहनत करीन.”

अभिषेक हसला. “ठीक आहे, पण सांगा ना… नोकरी का हवी आहे?”

ते ऐकून वृद्धाचा गळा भरून आला. “बायको गेली तीन वर्षांपूर्वी…

मोठा मुलगा ट्रक अपघातात गेला. सून एकटी आहे, दोन नातवंडं शाळेत शिकत आहेत. लहान भावाने फसवून पेन्शन घेतली… केस चालू आहे पण न्याय कुठे इतक्या लवकर मिळतो?” त्याने हलकेच हसत म्हटलं.. “सून आजारी आहे, मुलं शिकत आहेत… शाळेची फी भरू शकत नाही, म्हणून झोप येत नाही… घरात धान्यही नाही राहिलं. शेजाऱ्यांकडून उधार मागितले तेव्हा तर खूप अपमानित वाटलं होतं, ” त्याचे डोळे पाणावले. म्हणूनच बेटा, नोकरी हवी आहे… कोणतीही.”

अभिषेक गप्प झाला… मग तो थेट मालकीण मीरा किल्लेदार यांच्याकडे गेला.

सगळं ऐकल्यावर मीरा म्हणाल्या, “अशा लोकांना आपण टाळतो अभिषेक… काहीतरी करायला हवं.”

अभिषेक म्हटला, “मॅडम, त्यांना दया नको… सन्मान हवा आहे.

मीरा म्हणाल्या, “ठीक आहे. त्यांना ऑफिस असिस्टंटची नोकरी द्या. हलके फुलके काम द्या.. आणि प्रत्येक महिन्याला थोडं जास्त पेमेंट देऊया, पण त्यांना असं वाटलं पाहिजे की हा त्यांचा कष्टाचा पैसा आहे, मदत नाही.”

जेव्हा दोघे बाहेर आले, ते वृद्ध आजोबा हातात फोल्डर घट्ट पकडून उभे होते… कदाचित आता नकार मिळेल… असा भाव त्यांच्या डोळ्यांत होता.

मीरा हसून म्हणाल्या, “श्री सुरेश पाटील?”

वृद्ध दचकून उभा राहिला.

“तुमची नियुक्ती झाली आहे.”

क्षणभर त्याला विश्वासच बसला नाही. “ख…खरच?” त्याच्या डोळ्यातून अश्रू वाहू लागले.

“हो आजोबा, उद्यापासून काम सुरू.”

तो फोल्डर छातीशी घट्ट धरून रडू लागला… “बेटा, आज तुम्ही माझं अंधारं घर उजळून टाकलं.”

अभिषेक म्हणाला, “आता तुम्ही आमच्या ऑफिसचे आजोबा आहात.”

दुसऱ्या दिवशी तो वृद्ध व्यक्ती स्वच्छ कुर्ता घालून आला, दाढीही थोडी ट्रिम केली होती. पाणी ठेवणे, फाइल्स नेणे, झाडांना पाणी देणे..

सगळी कामं प्रेमाने करत होता. एका महिन्यानंतर त्याला पगार मिळाला ८, ००० रुपये + ३, ००० बोनस.

आजोबा सदगदित होऊन म्हणाले… “इतके पैसे मी कधीच पाहिले नाहीत बेटा…” त्यांच्या डोळ्यांत आनंदाश्रू आले.

अभिषेक म्हणाला.. “हे पैसे तुम्ही कमावले आहेत आजोबा…

ही तुमची स्वाभिमानाची कमाई आहे. “

पण दोन महिने झाल्यावर एका सकाळी तो कामावर आला नाही. फोन करून तपास केला तर सून म्हणाली – “दादा, बाबा आजारी आहेत… आम्ही रुग्णालयात आहोत…”

अभिषेक आणि मीरा धावत दवाखान्यात गेले. बेडवर आजोबांना ऑक्सिजन लावलेला होता. अभिषेकला पाहताच आजोबा हसले. म्हणाले, “बेटा… कामावर येऊ शकलो नाही… सॉरी…”

अभिषेकचे डोळे भरून आले.

आजोबा म्हणाले, “आज नातवाची फी भरायची होती… तेवढी तू भरशील ना बेटा?”

अभिषेक म्हणाला, “आजोबा, ती मी आधीच भरली आहे.. तुमच्या नावाने.” 

आजोबांच्या डोळ्यांत पाणी आलं. “देव तुझं भलं करो बेटा…

तू मला पुन्हा माणूस असल्याची जाणीव दिलीस…” आणि पुढच्याच क्षणी त्यांचा हात सैल झाला… आजोबा गेले…

त्या दिवशी ऑफिसमध्ये कुणाचंही कामात मन लागलं नाही…

सगळ्यांनी दोन मिनिटे शांत राहून मौन पाळलं.

मीरा म्हणाल्या, “श्री सुरेश पाटील आमचे कर्मचारी नव्हते, ते आमच्या कुटुंबाचा भाग होते. त्यांच्या नातवंडांच्या शिक्षणाचा खर्च कंपनी उचलेल.”

अभिषेकने त्यांचा फोल्डर उघडला, त्यात एक चिठ्ठी होती. “जर मला नोकरी मिळाली, तर माझा नातू शिकेल. नाही मिळाली, तर तो शाळा सोडेल… माझी एकच इच्छा.. तो माझ्यापेक्षा चांगला माणूस बनो.”

अभिषेकच्या डोळ्यात पाणी आलं. तो म्हणाला, “आजोबा, तुमचा नातू नक्की काहीतरी मोठं काम करेल.”

कंपनीने आजोबांच्या नावाने शिष्यवृत्ती सुरू केली.. ‘सुरेश पाटील स्मृती शिष्यवृत्ती’. अनेक गरीब मुलांची फी त्या निधीतून भरली जाऊ लागली.

काही लोक बायोडाटामध्ये कौशल्य लिहितात, पण त्या आजोबांनी माणुसकी लिहिली होती. कारण कधी कधी नोकरी म्हणजे फक्त पोट भरणं नसतं, ती एखाद्या घराची आशा, एखाद्या नातवाचं भविष्य, आणि एका वृद्ध बापाची इज्जत असते.

‘आणि सुरेश आजोबा शेवटपर्यंत इज्जतीने जगले…’

तुम्हीही कुणाच्या आयुष्यात ‘अभिषेक’ आणि ‘मीरा’ होऊ शकता का?

**

लेखिका : सुश्री ज्योती निंबाळकर

प्रस्तुती : श्री मेघ:श्याम सोनावणे 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “खासियत जुन्या मैत्रीची…” ☆ श्री सुधीर करंदीकर ☆

श्री सुधीर करंदीकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ “खासियत जुन्या मैत्रीची” ☆ श्री सुधीर करंदीकर

शाळा / कॉलेज सोडून बरीच वर्ष सरतात. तेव्हाच्या बऱ्याच मित्र / मैत्रिणींचे आपल्याकडे मोबाईल नंबर नसतात त्यामुळे कधी बोलणे नसते आणि भेट पण नसते. त्यातल्या कुणाची अचानक ५० वर्षांनंतर अचानक भेट व्हावी, आणि नुसती नजरानजर होताच त्यांनी एकमेकांना नावासकट ओळखावे, हे शक्यच नाही, असेच सगळे म्हणतील. कारण चेहेऱ्यात बदल झालेला असतो, डोक्याचे केस पांढरे झालेले असतात, माणसांना टक्कल पडलेले असते, आवाजात बदल झालेला असतो, वगैरे वगैरे. पण जुन्या मैत्रीत जर काही खासियत असेल, तर मात्र अशक्य वाटणाऱ्या गोष्टी पण शक्य होतात. यावरचा माझा अनुभव वाचायला आवडेल.

– – – – –  

नेहमीप्रमाणे आज सकाळी ८ वाजता एकटाच फिरायला बाहेर पडलो. कोथरुडजवळ मृत्युंजय मंदिरासमोरून फुटपाथवरून जात होतो. अधून मधून इथे भेटणाऱ्या मैत्रिणी मनवा आणि मेघना यांची आठवण झाली. त्या परदेशी गेल्या असल्यामुळे त्यांची भेट होणार नव्हतीच. चहाच्या टपरी जवळ आलो, चहावाल्यांना हात केला, आणि पुढे निघालो. समोरून एक मॅडम येत होत्या.

यांना केंव्हातरी खूप जवळून बघितलंय असं जाणवलं. मॅडम ना पण तसंच वाटलं असावं, असे त्यांच्या चेहऱ्यावर भाव दिसले. एकमेकांकडे बघत बघत आम्ही एकमेकांना क्रॉस झालो. दोघं थोडं पुढे गेलो, आणि दोघांनी एकदमच मागे वळून बघितलं. खूप जवळची ओळख आहे असं दोघांनाही जाणवलं.

आणि गंमत म्हणजे आम्ही दोघेही उलटं म्हणजे मागे मागे चालायला लागलो. चालत चालत शेजारी शेजारी आलो आणि हसत हसत आपोआपच एकमेकांशी हात मिळवणी झाली.

आणि दोघे एकदमच म्हणालो

मॅडम : अरे, सुधीर तू…

मी : अरे, छाया तू…

(आम्हाला रस्त्यावर उलटं चालताना बघून जाणारे येणारे पण जरा थबकलेच की हा काय प्रकार आहे.)

दोघे एकदम : ग्रेट सरप्राईज. कॉलेज सोडल्यानंतर म्हणजे ५० वर्षानंतर आज अचानक भेट.

छाया : सुधीर, तुझा एकदम सेम स्मायलींग फेस. नो चेंज

मी : छाया तुझा पण तोच आनंदी चेहरा, नो चेंज

दोघेही : आणि तेच उलटं चालणं. आणि म्हणून तर एकदम ओळखू शकलो ५० नाही ५२ वर्षांनंतर

जुन्या आठवणी आणि गप्पा सुरू होत्या, एवढ्यात बाजूला असलेल्या चहाच्या टपरी चे मालक आले आणि

म्हणाले : दादा, चहा इथेच आणून देऊ, का, दुकानात येऊन घेणार.

मस्त चहा झाला. ५२ वर्षात भेट तर नाहीच आणि एकमेकांचे मोबाईल नंबर माहित नसल्यामुळे कधी फोनवर बोलणे पण नव्हते. भरपूर जुन्या जुन्या म्हणजे कॉलेजमधे ५ वर्ष बरोबर होतो त्या वेळच्या गप्पा सुरू झाल्या. किती वेळ बोलत होतो, हे समजलंच नाही. चहावाले सांगायला आले, दादा ऊन वाढतंय, दुकानासमोर सावलीत खुर्चीवर बसून गप्पा मारा.

दोघंही भूतकाळातून वर्तमान काळात आलो.

पुन्हा असंच भेटायचं ठरलं आणि इथेच भेटायचं ठरलं.

बाय-बाय झालं आणि जुन्या आठवणीं मध्ये रमत रमत आपापल्या मार्गाला लागलो.

घरी गेल्यानंतर ही आगळी वेगळी भेट कॉलेजच्या ग्रुपवर सविस्तर टाकली. आणि माझी पोस्ट वाचून एका कॉलेज मित्राचा मेसेज आला –

तुझी आणि छायाची इतक्या वर्षानंतर अचानकपणे भेट होणे / गप्पा होणे आणि ते पण रस्त्यावरती सहज फिरता फिरता, म्हणजे आश्चर्यच आहे. तू लिहिलेली घटना वाचता वाचता मी पण कॉलेज डेज मधल्या भूतकाळात गेलो. मला चांगलं आठवतंय, कुठलाही पिरियेड संपला, आणि पुढच्या पिरेडला वेळ असला, तर सगळे मुलं मुली क्लास बाहेरच्या मोठ्या पॅसेजमध्ये गप्पा मारत उभे असायचे, काहीजण क्लास रूम मध्ये अभ्यासाचे वाचत असायचे. तू आणि छाया मात्र अशा वेळेस कायम पॅसेज मध्ये उलटे चालत चालत गप्पा मारत असायचे. मला आठवतं पूर्ण कॉलेजमध्ये उलटे चालत गप्पा मारणे ही तुमची खासियत होती.

आज पण तुम्ही दोघांनी उलटे चालून तेच दोघेजण आहात ही खात्री मात्र मस्त करून घेतली. नाहीतर कुणीही दोघांची बऱ्याच वर्षानंतर अचानक भेट होते तेव्हा त्यांचे बोलणे साधारण असे असते –

तुम्ही सुधीर करंदीकर ना! किंवा तुमचं नाव अमुक अमुक आहे ना! तुम्ही भोपाळच्या कॉलेजमध्ये होता ना! अशी सुरुवात होते.

आणि तुमची ५२ वर्षानंतर भेट झाली तेव्हा, डायरेक्ट ओळख पटल्यासारखेच, सुधीर तू … छाया तू… अशी सुरुवात झाली. ग्रेट, सिंपली ग्रेट.

मी पण तिथे असतो तर मजा आली असती. बहूदा गप्पा मारता मारता संध्याकाळ झाली असती. आणि चहा वाल्यानी पुढच्या चहाबरोबर ब्रेड पण दिली असती.

भेटत रहा, मजा करा, जुन्या आठवणी कळवत चला…

बाय-बाय.

दुसऱ्या दिवशी कॉलेजच्या मित्रांचा व्हाट्सअप वर ग्रुप मिटिंग कॉल आला – माझ्या आणि छायाच्या अचानक भेटीचे सगळ्यांनाच आश्चर्य वाटत होते. आणि ५२ वर्षांनंतर आम्ही एकमेकांना एका क्षणात ओळखले यावर आधी कुणाचाच विश्वास बसत नव्हता. पण कॉलेजच्या आम्ही काय काय गप्पा मारल्या, ते सांगितल्यावर सगळ्यांची खात्री पटली. एक जण म्हणाला मला जरा छाया चा मोबाईल नंबर दे. फोन लावून बघतो ओळखते का मला पण! आणि जरा कॉलेजच्या गप्पा मारू. मज्जा येईल.

मी म्हटलं देतो देतो, आणि लक्षात आलं, काल गप्पांच्या ओघामध्ये, आपण छायाला ती पुण्यात कुठे राहते, पास आउट झाल्यानंतर कुठे नोकरी केली, इथे घरी कोण कोण असतं, आणि मुख्य म्हणजे तिचा मोबाईल नंबर काय आहे, हे सगळेच विचारायला विसरलो होतो.

मित्रांचा आधी विश्वास बसला नाही. पण नंतर त्यांना पटलं की इतक्या वर्षांनंतर जुन्या गप्पां मध्ये रंगल्या नंतर असे होऊ शकते.

आता असेच सकाळी फिरताना छाया कधी भेटते, तिच्याबरोबर रस्त्यावर उलटे कधी चालतो, याच्या मी प्रतिक्षेत आहे.

भेट होणार हे नक्की आणि ती पण मृत्युंजय मंदिराच्या समोरच हे पण शंभर टक्के पक्के.

ही माझी गोष्ट वाचल्यानंतर तुमच्या मनामध्ये पण तुमच्या शाळेतल्या / कॉलेजमधल्या मैत्रिणीं बरोबरच्या / मित्रांबरोबरच्या आठवणी जाग्या होतील, आणि त्या आठवणींमध्ये तुम्हाला छान रमता येईल, कदाचित माझ्यासारखी अशी अनपेक्षित भेट पण होईल, हे नक्की.

चलो, बाय बाय ….

© श्री सुधीर करंदीकर

मो. 9225631100 – ईमेल – srkarandikar@gmail. com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ आदरणीय छत्रपती शिवाजी महाराज… – ☆ राधिका भांडारकर ☆

राधिका भांडारकर

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☆ आदरणीय छत्रपती शिवाजी महाराज…  ☆ राधिका भांडारकर ☆

आदरणीय छत्रपती शिवाजी महाराज

यांना सविनय दंडवत..

राजा कसा असावा? हा प्रश्न जगात कुणालाही विचारला तर त्याचे उत्तर एकच, ”राजा असावा तर शिवाजी सारखा”.

महाराज! नुसत्या आपल्या नामोच्चाराने आम्ही रोमांचित होतो! शिवरायासारखा एक जाणता राजा या देशात, महाराष्ट्राच्या मातीत जन्माला आला, आणि त्याने कधीही विसर न पडणाऱ्या पराक्रमाचा, संस्काराचा, नैतिकतेचा, महान इतिहास घडवला, याचा आम्हाला सार्थ अभिमान आहेच.

व्हिएतनाम आणि अमेरिकेत वीस वर्षे युद्ध चालले. अमेरिकेला वाटत होते की या देशाला नष्ट करण्यासाठी अगदीच थोडा वेळ लागेल. पण युद्ध लांबले. अमेरिकेस माघार घ्यावी लागली. व्हीएतनामचा विजय झाला. त्यानंतर पत्रकारांनी त्यांच्या राष्ट्रपतींना त्यांच्या विजयाचे रहस्य विचारले असता, ते उत्तरले,

“युद्धकाळात हिंदुस्थानातील एका शूर राजाचे चरित्र माझ्या हाती आले. त्यांच्याकडून प्रेरणा घेऊनच आम्ही युद्धनीती ठरवली. आणि ती ठामपणे राबवली. आणि आम्ही विजयी झालो. ”

पत्रकारांनी विचारले, “तो हिंदुस्थानी राजा कोण? ”

राष्ट्रपती उत्तरले, छत्रपती शिवाजी महाराज. हा महापुरुष आमच्या देशात जन्माला आला असता तर आज आम्ही जगावर राज्य केले असते. ”

याच राष्ट्रपतींनी स्वतःच्या मृत्यूपूर्वी आपली अंतिम इच्छा लिहून ठेवली होती की,

“माझ्या समाधीवर खालील वाक्य लिहिले जावे”

“छत्रपती शिवाजी महाराजांचा एक मावळा समाधीस्थ झाला! ”– — आणि आजही त्यांच्या कबरीवर हे वाक्य वाचायला मिळते.

महाराज असे तुम्ही! जगाचे आदर्श राजे. आपल्याबद्दल म्या पामराने काय आणि किती बोलावे?

शिव म्हणजे पावित्र्य, मांगल्य, सौंदर्य आणि शक्तीही. आपल्या नावानेच आमचे हृदय उचंबळते.

पण महाराज आज या पत्राच्या निमित्ताने, एक खेदही व्यक्त करावसा वाटतोय्. आज कुठेतरी आपल्या ऐतिहासिक नावाचा, आदर्शाचा, पराक्रमाचा केवळ दुरुपयोग केला जातोय. स्वार्थी माणसे निमित्त साधून भांडणे, दंगली माजवतात. झुरळ मारायची ही शक्ती नसलेली ही माणसे, केवळ मतांसाठी छाती फुगवून, “आम्ही शिवरायांचे वंशज आहोत! ” अशा आरोळ्या ठोकतात. याचे प्रचंड दुःख होते. मान खाली जाते. लाज वाटते.

महाराज! या अशा रणछोडदासांसाठी मी आपली नम्रपणे क्षमा मागते. आणि यांना सद्बुद्धी दे अशी प्रार्थना ही करते. शिवाजीचे वंशज म्हणून त्यांना खरोखरच अभिमान असेल तर त्यांनी शिवचरित्राचा सखोल अभ्यास करावा. लोकनेता कसा असावा याचे ज्ञान मिळवावे.

आपली,

प्रयत्नपूर्वक आपले आदर्श जपणारी कुणी एक…

©  राधिका भांडारकर

पुणे

मो.९४२१५२३६६९

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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