हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२४ ☆ शब्द-शब्द साधना… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख शब्द-शब्द साधना। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मोहे ले चल मांझी उस पार / स्वर- रुखसार खान, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२४ ☆

☆ शब्द-शब्द साधना… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘शब्द शब्द में ब्रह्म है/ शब्द शब्द में सार। शब्द सदा ऐसे कहो/ जिन से उपजे प्यार।’ वास्तव में शब्द ही ब्रह्म है और शब्द में ही निहित है जीवन का संदेश…इसलिए सदा ऐसे शब्दों का प्रयोग कीजिए, जिससे प्रेम भाव प्रकट हो। कबीरदास जी का यह दोहा ‘ऐसी बानी बोलिए/ मनवा शीतल होय। औरहुं को शीतल करे/ ख़ुद भी शीतल होय’ …उपरोक्त भाव की पुष्टि करता है। हमारे कटु वचन दिलों की दूरियों को इतना बढ़ा देते हैं; जिसे पाटना कठिन हो जाता है। इसलिए सदैव मधुर शब्दों का प्रयोग कीजिए, क्योंकि ‘शब्द से खुशी/ शब्द से ग़म। शब्द से पीड़ा/ शब्द ही मरहम’ शब्द में निहित हैं ख़ुशी व ग़म के भाव– परंतु उनका चुनाव आपकी सोच पर निर्भर करता है।

वास्तव में शब्दों में इतना सामर्थ्य है कि जहाँ वे मानव को असीम आनंद व अलौकिक प्रसन्नता प्रदान कर सकते हैं; वहीं ग़मों के सागर में डुबो भी सकते हैं। दूसरे शब्दों में शब्द पीड़ा है और शब्द ही मरहम है। शब्द मानव के रिसते ज़ख्मों पर कारग़र दवा का काम भी करते हैं। यह आप पर निर्भर करता है कि आप किस मन:स्थिति में किन शब्दों का प्रयोग किस अंदाज़ से करते हैं।

‘हीरा परखै जौहरी/ शब्द ही परखै साध। कबीर परखै साध को/ ताको मतो अगाध’ हर व्यक्ति अपनी आवश्यकता व उपयोगिता के अनुसार इनका प्रयोग करता है। जौहरी हीरे को परख कर संतोष पाता है, तो साधु शब्दों व सत्य वचनों अर्थात् सत्संग को ही महत्व प्रदान करता है और आनंद प्राप्त करता है। वह उनके संदेशों को जीवन में धारण कर सुख व संतोष प्राप्त करता है; स्वयं को भाग्यशाली समझता है। परंतु कबीरदास जी उस साधु को परखते हैं कि उसके भावों व विचारों में कितनी गहनता व सार्थकता है; उसकी सोच कैसी है और वह जिस राह पर लोगों को चलने का संदेश देता है; वह उचित है या नहीं? वास्तव में संत वह है; जिसकी इच्छाओं का अंत हो गया है और उसकी श्रद्धा को आप विभक्त नहीं कर सकते; उसे सत्मार्ग पर चलने से नहीं रोक सकते–वही श्रद्धेय है, पूजनीय है। वास्तव में साधना करने व ब्रह्मचर्य को पालन करने वाला ही साधु है, जो सीधे व सपाट मार्ग का अनुसरण करता है। इसके लिए आवश्यकता है कि जब हम अकेले हों, तो अपनी भावनाओं पर अंकुश लगाएं अर्थात् कुत्सित भावनाओं व विचारों को अपने मनोमस्तिष्क में दस्तक न देने दें। अहं व क्रोध पर नियंत्रण रखें, क्योंकि ये दोनों मानव के अजात शत्रु हैं, जिसके लिए अपनी कामनाओं-तृष्णाओं को नियंत्रित करना आवश्यक है।

अहं अर्थात् सर्वश्रेष्ठता का भाव मानव को सबसे दूर कर देता है, तो क्रोध सामने वाले को तो हानि पहुंचाता ही है; वहीं अपने लिए भी अनिष्टकारी सिद्ध होता है। अहंनिष्ठ व क्रोधी व्यक्ति आवेश में न जाने क्या-क्या कह जाता है; जिसके लिए उसे बाद में प्रायश्चित करना पड़ता है। परंतु ‘अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत’ अर्थात् समय गुज़र जाने के पश्चात् हाथ मलने अर्थात् पछताने का कोई औचित्य अथवा सार्थकता नहीं रहती। प्रायश्चित करना हमें सुख व संतोष प्रदान करने की सामर्थ्य तो रखता है, ‘परंतु गया वक्त कभी लौटकर नहीं आता।’ शारीरिक घाव तो समय के साथ भर जाते हैं, परंतु शब्दों के ज़ख्म कभी नहीं भरते; वे तो नासूर बन आजीवन रिसते रहते हैं। परंतु कटु वचन जहाँ मानव को पीड़ा प्रदान करते हैं; वहीं सहानुभूति व क्षमा-याचना के दो शब्द बोलकर आप उन पर मरहम भी लगा सकते हैं। शायद! इसीलिए कहा गया है गरीब से गरीब व्यक्ति भी अपनी मधुर वाणी द्वारा दूसरे के दु:खों को दूर करने का सामर्थ्य रखता है। आपका दु:खी व आपदाग्रस्त व्यक्ति को ‘मैं हूं ना’ कह देना ही उसमें आत्मविश्वास जाग्रत करता है और वह स्वयं को अकेला व असहाय अनुभव नहीं करता। उसे ऐसा लगता है कि आप सदैव उसकी ढाल बनकर उसके साथ खड़े हैं।

एकांत में व्यक्ति के लिए अपने दूषित मनोभावों पर नियंत्रण करना आवश्यक है तथा सबके बीच अर्थात् समाज में रहते हुए शब्दों की साधना करना भी अनिवार्य है… सोच- समझकर बोलने की सार्थकता से आप मुख नहीं मोड़ सकते। इसलिए कहा जा सकता है कि यदि आपको दूसरे व्यक्ति को उसकी ग़लती का एहसास दिलाना है, तो उससे एकांत में बात करो, क्योंकि सबके बीच में कही गई बात बवाल खड़ा कर देती है। अक्सर उस स्थिति में दोनों के अहं का टकराव होता है। अहं से संघर्ष का जन्म होता है और उस स्थिति में वह दूसरे के प्राण लेने पर उतारु हो जाता है। गुस्सा चाण्डाल होता है… बड़े-बड़े ऋषि मुनियों के उदाहरण आपके समक्ष हैं। परशुराम का क्रोध में अपनी माता का वध करना व ऋषि गौतम का अहिल्या का श्राप देना आदि हमें संदेश देता है कि व्यक्ति को बोलने से पहले सोचना अर्थात् तोलना चाहिए। उस विषम परिस्थिति में कटु व अनर्गल शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए और दूसरों से वैसा व्यवहार करना चाहिए; जिसे सहन करने की क्षमता आप में है। सो! आवश्यकता है, हृदय की शुद्धता व मन की स्पष्टता की अर्थात् आप अपने मन में किसी के प्रति ईर्ष्या, दुर्भावना व दुष्भावनाएं मत रखिए, बल्कि बोलने से पहले उसके औचित्य-अनौचित्य का चिन्तन-मनन कीजिए। दूसरे शब्दों में किसी के कहने पर उसके प्रति अपनी धारणा मत बनाइए अर्थात् कानों-सुनी बात पर विश्वास मत कीजिए, क्योंकि विवाह के सारे गीत सत्य नहीं होते। कानों-सुनी बात पर विश्वास करने वाले लोग सदैव धोखा खाते हैं और उनका पतन अवश्यंभावी होता है। कोई भी उनके साथ रहना पसंद नहीं करता। बिना सोच-विचार के किए गए कर्म केवल आपको ही हानि नहीं पहुंचाते; परिवार, समाज व देश के लिए भी विध्वंसकारी होते हैं।

सो! दोस्त, रास्ता, किताब व सोच यदि ग़लत हों, तो गुमराह कर देते हैं; यदि ठीक हों, तो जीवन सफल हो जाता है। उपरोक्त उक्ति हमें आग़ाह करती है कि सदैव अच्छे लोगों की संगति करें, क्योंकि सच्चा मित्र आपका सहायक, निदेशक व गुरु होता है; जो आपको कभी पथ-विचलित नहीं होने देता। वह आपको ग़लत मार्ग व ग़लत दिशा की ओर जाने पर सचेत करता है तथा आपकी उन्नति को देख कर प्रसन्न होता है; आप को उत्साहित करता है। पुस्तकें मानव की सबसे अच्छी मित्र होती हैं। इसलिए कहा गया है कि ‘बुरी संगति से इंसान अकेला भला’और एकांत में अच्छे मित्र के साथ न होने की स्थिति में सद्ग्रथों व अच्छी पुस्तकों का सान्निध्य हमारा यथोचित मार्गदर्शन करता है।

हाँ! सबसे बड़ी है मानव की सोच अर्थात् जो मानव सोचता है, वही उसके चेहरे के भावों से परिलक्षित होता है और व्यवहार उसके कार्यों में झलकता है। इसलिए अपने हृदय में दैवीय गुणों स्नेह, सौहार्द, त्याग, करुणा, सहानुभूति आदि  को पल्लवित होने दीजिए… ईर्ष्या-द्वेष व स्व-पर की भावना को दूर से सलाम कीजिए, क्योंकि सत्य की राह का अनुसरण करने वाले की राह में अनगिनत बाधाएं आती हैं। परंतु यदि वह उन असामान्य परिस्थितियों में अपना धैर्य नहीं खोता; दु:खी नहीं होता, बल्कि उससे सीख लेता है तो वह अपनी मंज़िल को प्राप्त कर अपने भविष्य को सुखमय बनाता है। वह सदैव शांत भाव में रहता है, क्योंकि ‘सुख- दु:ख तो अतिथि हैं’…’जो आया है, अवश्य जाएगा’ को अपना मूल-मंत्र स्वीकार संतोष से अपना जीवन बसर करता है। सो! आने वाले की खुशी व जाने वाले का ग़म क्यों? इंसान को हर स्थिति में सम रहना चाहिए, ताकि दु:ख आपको विचलित न करें और सुख आपके सत्मार्ग पर चलने में बाधा उपस्थित न करें अर्थात् आपको ग़लत राह का अनुसरण न करने दें। वास्तव में पैसा व पद-प्रतिष्ठा मानव को अहंवादी बना देते हैं और उससे उपजा सर्वश्रेष्ठता का भाव अमानुष। वह निपट स्वार्थी हो जाता है और केवल अपनी सुख-सुविधाओं के बारे में सोचता है। इसलिए ऐसा स्थान यश व लक्ष्मी को रास नहीं आता और वे वहां से रुख़्सत हो जाते हैं।

सो! जहां सत्य है; वहां धर्म है, यश है और वहीं लक्ष्मी निवास करती है। जहां शांति है; सौहार्द व सद्भाव है; मधुर व्यवहार व समर्पण भाव है और वहां कलह, अशांति, ईर्ष्या-द्वेष आदि प्रवेश पाने का साहस नहीं जुटा सकते। इसलिए मानव को कभी भी झूठ का आश्रय नहीं लेना चाहिए, क्योंकि वह सब बुराइयों की जड़ है। मधुर व्यवहार द्वारा आप करोड़ों दिलों पर राज्य कर सकते हैं…सबके प्रिय बन सकते हैं। लोग आपके साथ रहने व आपका अनुसरण करने में स्वयं को गौरवशाली व भाग्यशाली समझते हैं। सो! शब्द ब्रह्म है; उसकी सार्थकता को स्वीकार कर जीवन में धारण करें और सबके प्रिय बनें, क्योंकि हमारी सोच, हमारे बोल व हमारे कर्म ही हमारे भाग्य-निर्माता हैं और हमारी ज़िंदगी के प्रणेता हैं।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०१० ⇒ शुद्ध घी और चित्त शुद्धि ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “शुद्ध घी और चित्त शुद्धि…।)

?अभी अभी # १०१० ⇒ आलेख – शुद्ध घी और चित्त शुद्धि ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या शुद्ध घी और शुद्ध चित्त का आपस में कोई संबंध है,शुद्ध घी स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है,इसमें दो मत नहीं,अधिकांश लोग बाजार का अमूल घी अथवा केबीसी ब्रांड गोवर्धन घी पर भरोसा करते हैं । कुछ भाग्यशाली गुजरात की गिर देसी गाय पालते हैं,और उसके शुद्ध सात्विक,ऑर्गेनिक देशी घी का सेवन करते हैं ।

कुछ लोग होते हैं, जो अपने ही घर पर उपलब्ध दूध का घी बनाकर उसका सेवन करते हैं । घर पर बनाए जाने वाला शुद्ध घी

का तरीका हमारे चित्त शुद्धि के तरीके से बहुत मेल खाता है । गुरु को रंगरेज तो कहा गया है,लेकिन किसी हलवाई को सदगुरु नहीं कहा गया । गुरु रंगरेज की तरह हमारे चित्त को अगर रंग सकता है तो घी बनाने का तरीका हमारे चित्त को शुद्ध करने के तरीके से पूरी तरह मेल खाता है ।।

काश जितनी चिंता हम शुद्ध घी की करते हैं,उतनी ही चिंता हमें अपने चित्त की शुद्धि की भी होती । घी बनाने से चित्त शुद्ध करने का नुस्खा हमने ईजाद किया है,लेकिन इस पर हमारा कोई कॉपीराइट नहीं, मैं जब घर पर घी बनाता हूं तो मुझे ऐसा लगता है, मैं अपना चित्त शुद्ध कर रहा हूं । एक पंथ दो काज ।।

सबसे पहले हम दूध को गर्म करते हैं,दूध की चाय बनती है,बच्चे दूध पीते हैं और हम उसकी मलाई निकाल लेते हैं । बिना मलाई के घी नहीं बनता । अपने आपको तपाए बिना चित्त कभी शुद्ध नहीं हो सकता ।जप,तप,साधन,सेवा,सत्संग सभी चित्त शुद्धि के साधन माने गए हैं ।

लो जी दूध को तपाया और मलाई निकाल ली । जितना दूध है,उतने की ही मलाई निकलेगी,इसलिए रोज दूध गर्म होगा,तपेगा,और उसकी मलाई निकलेगी,जिसे एक बर्तन में एकत्रित कर लिया जाएगा । मलाई निकालने अथवा खाने से चित्त शुद्ध नहीं होता । थोड़ा धैर्य धारण करना पड़ता है । इस मलाई में चाहें तो थोड़ा दही मिलाते जाएं,और मलाई फ्रीजर में रखते जाएं । पहले तप और उसके बाद धीरज, मन ललचाता है,मलाई के लिए । मन पर कंट्रोल भी जरूरी है चित्त शुद्धि के लिए ।।

चलिए कुछ दिन यही चलता रहा । अच्छी मलाई जमा हो गई । अब इसे एक बड़े बर्तन अथवा मटकी में रवई से ,खूब सारा पानी डालकर मथ लिया । थोड़ा परिश्रम और ऊपर मक्खन तैरने लग गया । कृष्ण की सभी बाल लीलाएं,मटकी,माखन और गोपियों के आसपास ही घटित होती रहती हैं । माखन चोर की तरह किसी का दिल चुराएं,मक्खन नहीं ।

लो जी यहां तो मक्खन देखते ही मुंह में पानी आ गया,और साथ में मलाई वाली छाछ भी । हम तो तर गए । लेकिन महाराज,अभी कहां चित्त शुद्धि हुई,घी तो अभी निकला ही नहीं । कंट्रोल कंट्रोल, नो चित्त शुद्धि विदाउट कंट्रोल ।।

जी हां अब मक्खन छाछ से अलग होगा,जैसे विकार चित्त से अलग होते हैं,चित्त शुद्धि के समय । लेकिन अभी तो मक्खन की भी परीक्षा होगी,उसको भी संयम और विवेक की अग्नि में तपना होगा । बिना भाड़ में गए कभी चना सिका है,बिना भट्टी के कभी रसोई पकी है।

तेज आंच में मक्खन की तरह चित्त की परीक्षा हो रही है,कड़ी परीक्षा,तेज आंच,धैर्य की परीक्षा,और आखिर वह घड़ी आ ही जाती है,जब शुद्ध विकार युक्त घी चित्त शुद्ध की तरह कढ़ाई में तैरने लगता है ।

साथ में कुछ विकार जलकर खाक नहीं होते,मावा बन जाते हैं । नर,सत्संग से क्या से क्या हो जाए । संसार में असार कुछ भी नहीं,फिर ज्ञानियों द्वारा सार सार ही ग्रहण किया जाता है,और थोथा उड़ा दिया जाता है ।।

हमने घी बनाने का तरीका नहीं सीखा,चित्त शुद्धि का तरीका सीखा । सतगुरु की सीख ऐसी ही होती है,इसीलिए उसे रंगरेज कहते हैं । आप अपने गुरु स्वयं बनें,घर पर ही घी बनाएं,अपना चित्त शुद्ध करें । मैंने अपनी मां से सीखा,तेरा तुझको अर्पण,क्या लागा मेरा ..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८८ ☆ अधिक मास : स्वयं परिवर्तन का पावन अवसर… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना अधिक मास : स्वयं परिवर्तन का पावन अवसर। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८८ ☆

अधिक मास : स्वयं परिवर्तन का पावन अवसर… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

अधिक मास भारतीय संस्कृति में केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मपरिवर्तन का सुंदर समन्वय है। यह हमें स्मरण कराता है कि संसार को बदलने की अपेक्षा यदि हम स्वयं को बदलना प्रारंभ करें, तो हमारी दृष्टि बदलती है और उसी के साथ हमारी सृष्टि भी बदलने लगती है।

हम प्रायः जीवन में परिस्थितियों, लोगों अथवा भाग्य को दोष देते हैं, जबकि वास्तविक परिवर्तन भीतर से प्रारंभ होता है। जब हम अपने विचारों, आदतों और कार्यशैली में सुधार लाते हैं, तब उसके सकारात्मक परिणाम हमारे संबंधों, कार्यों और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई देने लगते हैं।

अधिक मास हमें थोड़ी देर रुककर स्वयं से प्रश्न करने का अवसर देता है—क्या मैं कल से आज बेहतर हूँ? क्या मेरे व्यवहार, धैर्य, संवेदनशीलता और कर्म में गुणवत्ता बढ़ी है? यदि प्रतिदिन केवल एक छोटा-सा सुधार भी हो, तो समय के साथ वही परिवर्तन जीवन को नई दिशा दे सकता है।

जैसे माली पौधे की जड़ों को सींचता है और फिर हरियाली स्वयं प्रकट होती है, वैसे ही आत्मविकास के बीज बोने पर सफलता, संतोष और प्रसन्नता स्वतः फलित होते हैं। अधिक मास का वास्तविक संदेश भी यही है कि बाहरी उपलब्धियों से पहले अपने भीतर के दीप को प्रज्वलित किया जाए।

जब स्वयं में परिवर्तन आता है, तब वही संसार, वही लोग और वही परिस्थितियाँ भी नई प्रतीत होने लगती हैं। यही अधिक मास की साधना है और यही उसके आध्यात्मिक महत्व का सार।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००९ ⇒ बुरी नजर दूर हट (थू थू थू) ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बुरी नजर दूर हट (थू थू थू)।)

?अभी अभी # १००९ ⇒ आलेख – बुरी नजर दूर हट (थू थू थू) ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सन् १९६१ में एक फिल्म आई थी ससुराल जिसका एक गीत बड़ा लोकप्रिय हुआ था, तेरी प्यारी प्यारी सूरत को, किसी की नजर ना लगे, चश्मे बद्दूर ! तब मेरी सूरत कोई खास प्यारी नहीं थी, लेकिन मैं तब भी नजर का चश्मा लगाता था। चश्मे का संबंध नजर से जरूर है लेकिन किसी चश्मा लगाने वाले का चश्मे बद्दूर से कोई लेना देना नहीं। लोग मुझे चश्मे बद्दूर सिर्फ इसलिए कहते थे, क्योंकि मैं चश्मा लगाता था।

अंग्रेजी और उर्दू में वैसे भी हमारा हाथ तंग ही रहता है। हमारे फिल्मी शायर इसीलिए इतने लोकप्रिय हो जाते हैं। कर्णप्रिय संगीत का श्रोता, शब्दों के फेर में नहीं पड़ता, वह गायक की मधुर आवाज और धुन में ही उलझ जाता है। शायर हसरत जयपुरी ने तो बस गीत लिख दिया और लोगों की ज़ुबान पर रातों रात यह गीत चढ़ गया, चश्मे बद्दूर ! जिसका आम भाषा में अर्थ होता है, बुरी नजर, दूर हट।।

जहां नजर है,  वहां चश्मा है, और अगर सूरत प्यारी हुई तो उस ओर नजर उठ ही जाती है और अनायास मुंह से निकल ही जाता है,  चश्मे बद्दूर। शायर ने अपना काम बखूबी किया, चश्मे बद्दूर का अर्थ भी बताया, किसी की नजर ना लगे। लेकिन रहा सहा काम हम जैसे नासमझों ने कर दिया। जहां किसी प्यारी सी सूरत पर चश्मा नज़र आया, उसे चश्मे बद्दूर कहना शुरू कर दिया।

आज पहले जैसी स्थिति नहीं। लोग पढ़ लिख गए हैं,  गुलज़ार की शायरी पढ़ते हैं और जगजीत सिंह को सुनते हैं, और समझकर उसका आनंद भी लेते हैं।

बात नजर की हो रही है।

बहुत दिनों से हिंदी के ही एक शब्द का प्रयोग मुझे विचलित कर रहा है। कोई आश्चर्य नहीं अगर आज का शायर कुछ इस तरह का गीत लिख मारे ;

तेरी प्यारी प्यारी सूरत को

किसी की नजर ना लगे

थू थू थू !

यह क्या वाहियात मजाक है,  आपको अनफ्रेंड किया जाता है। मैने भी जब पहली बार किसी के मुंह से थू थू थू सुना, तो मुंह फेर लिया। थू शब्द में क साइलेंट है। स्वच्छ भारत के पहले जहां दीवारों पर लिखा रहता था, यहां थूकना मना है, वहां पहले,  मना,  शब्द रंगबिरंगी पिचकारियों के बीच छुप जाता था और बाद में पूरी हिदायत को पान और पान पराग की बौछारों से नहला दिया जाता था।।

कोविड काल का मास्क अभी भी पूरी तरह से हमारे चेहरों से उतरा नहीं है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य भी है कि हमारे थूक में बीमारियों के कीटाणु रहते हैं, इसलिए जिन लोगों के मुंह से बोलते वक्त फूल झरने की जगह थूक के छींटे स्प्रे मारते हैं, उनसे दो गज की दूरी बनाए रखें। लेकिन उन शुभचिंतकों का क्या किया जाए जो आपको बुरी नजर से बचाने के लिए पहले थू थू थू करते हैं और बाद में सफाई पेश करते हैं।

आप अन्यथा ना लें, लेकिन स्टार प्लस की अनुपमा भी बहुत थू थू थू करती है और उसी की देखा देखी मैंने आज की युवा पीढ़ी को भी पहले किसी की तारीफ और बाद में चश्मे बद्दूर की तरह थू थू थू करते देखा है। पहले थू, बाद में थू थू और उसके बाद थू थू थू, इस तरह नफरत से मोहब्बत की जानिब,  तय की हमने मंजिलें। हमारी मोहब्बत को किसी की नजर ना लगे। चश्मे बद्दूर, थू थू थू।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००८ ⇒ साहब बीवी और श्वान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “साहब बीवी और श्वान।)

?अभी अभी # १००८ ⇒ आलेख – साहब बीवी और श्वान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ताश के बावन पत्तों में गुलाम बेगम और बादशाह के अलावा एक जोकर भी होता है जो खेल के अलावा सर्कस में भी अपना महत्व रखता है।

आपने विमल मित्र के उपन्यास पर आधारित, और मीनाकुमारी और गुरुदत्त अभिनीत फिल्म साहब बीवी और गुलाम भी देखी ही होगी। साहब अंग्रेज ने जब कलकत्ते से व्यापार के बहाने हमारे देश में प्रवेश किया था तब वे अपनी मेम साथ में लाए थे। उनकी मेम भी मेम साहब ही कहलाती थी। देश गुलामी से तो आजाद हो गया, लेकिन साहब और मेम साहब हमारी नौकरशाही व्यवस्था में रच बस गए।

साहब का एक दूसरा नाम नौकरशाह भी होता है। नौकरशाह, एक ऐसा साहब होता है, जिसका बिना नौकर के काम नहीं चलता। आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था में आप किसी से गुलामी तो नहीं करवा सकते लेकिन अगर कोई मानसिक रूप से गुलाम है तो उसका कोई इलाज नहीं।।

हर व्यक्ति आजकल अपने अधिकारों और दायित्व के प्रति सजग है। गए जमाने नौकरों से बेगार करवाने के। साहब के रिटायर होते ही नौकरशाही का ताना बाना इस तरह बिखर जाता है मानो किसी ने मधुमक्खी के छत्ते को छेड़ दिया हो। कब तक वाहन, बंगले और ड्राइवर की सुविधा रहेगी। कभी तो बंगला खाली करना पड़ेगा। बेटी बेटे अच्छा हुआ, समय रहते विदेश सेटल हो गए। आजकल तो साहबों की औलादें भी बिगड़ने लगी हैं।

जिस तरह डूबते को तिनके का सहारा होता है, एक सेवानिवृत्त अफसर दंपति को एक अदद श्वान का सहारा होता है। वह बेचारा साहब का आदेश भी सुन लेता है और डांट खाने पर भी पूछ हिलाता रहता है।

साहब का दिल ही जानता है एक मंत्री के आगे उनकी क्या हालत हो जाती थी। आज उन्हें अपने श्वान से सहानुभूति है। एक सेवामुक्त साहब और मेम साहब का अगर कोई अपना है,  तो बस यही एक बेजुबान श्वान।।

आज महानगरों के जंगल में ऐसे कई साहब बीवी हैं जिनके बुढ़ापे और अकेलेपन का सहारा सिर्फ एक श्वान है। बुढ़ापे की लाठी आजकल औलाद नहीं,  एक वॉकिंग स्टिक ही होती है। एक जानवर वैसे भी इंसान से ज्यादा वफादार होता है। कानून भी आजकल यही कहता है। अगर घर में कोई नौकर रखो तो सावधानी के लिए पहले नजदीक के थाने में उसकी पूरी जानकारी दो।

युवा पीढ़ी हो अथवा कोई वरिष्ठ नागरिक, हर परिवार में कुत्ता पालना एक जरूरत है अथवा फैशन, यह कहना इतना आसान नहीं। हमारी लुप्त होती मानवीय संवेदनाओं की ओर यह स्पष्ट संकेत है। क्या हम इतने आत्म केंद्रित हो गए हैं कि केवल एक मूक प्राणी से ही हमारा संवाद संभव है।

स्वार्थ, राजनीति, राग द्वेष और एकाकीपन भले ही इसके लिए जिम्मेदार हो, लेकिन आर्थिक आधार कतई नहीं। लोग भले ही किसी कुत्ते को मुंह नहीं लगाएं, लेकिन रोज सुबह आगे कुत्ता और पीछे उसकी डोर थामे, उन्हें आसानी से घूमते देखा जा सकता है। एक और बुकर पुरस्कार साहब बीवी और श्वान। अनुवाद जारी है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ ग़ज़ल की रूह है मोहब्बत—बशीर बद्र ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ आलेख ☆

☆  ग़ज़ल की रूह है मोहब्बत—बशीर बद्र ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

“न जी भर के देखा न कुछ बात की।

बड़ी आरजू थी मुलाकात की।।

उजालों की परियाँ नहाने लगीं

नदी गुनगुनाई ख़यालात की।।”

रेशमी रूमान जो दिल को पहली बारिश सा भिगो दे, वो भीने भीने जज़्बात जो शब्दों की पकड़ में आते ही जैस्मिन से महकने लगें ,वो नफासत, वो बारीकी जैसे किसी संगतराश की कला में होती है, शब्दों की सुर लहर जो कुछ पल के लिए दूसरी दुनिया में ले चले ,जर्रे-जर्रे में रोशनी का दीदार करवाए ,इन्द्रधनुष धरती पर उतार लाए,ऐसी है शायरी बशीर बद्र की ।

शब्दों पर उनकी हुकूमत के क्या कहने ,मजाल है जो मखमली एहसास का कोई भी सिरा  छूट जाए।

दुष्यंत कुमार और शरद जोशी जी का भोपाल और उसी की फिज़ाओं में उनकी शायरी ने धड़कना सीखा और धड़कन के रंग में रंग जाना भी।

मोहब्बत ,बशीर बद्र की ग़ज़ल की रूह है ।जज़्बातों की महीन, बेहद महीन कारीगरी। उनकी ग़ज़लों का रुमान अहा क्या ! वो कशिश, वो कसक, सादगी, गहराई और खूबसूरती है कि उनका हर चाहने वाला सोचता है यही तो है जो मैं कहना चाहता था ।

ज़िंदगी का फलसफा  कदम दर कदम साथ चलता है और आत्मविश्वास का हिमालय तभी छुआ जाता है ,और तभी पाँवों को छूती हुई नदियाँ संगीत सुनाती हैं।हवाएं सुरीली हो उठती हैं।

“हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है!

 जिस तरफ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा।।

दूसरी तरफ माशूक के लिए दिलेरी भी।

बेमिसाल दरियादिली या खुद को समझाने का सलीका।वे कहते हैं—

“कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,

कोई यूँ ही बेवफा नहीं होता।।

उनके शेर आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने कि कभी थे। भारत-पाकिस्तान के बंटवारे में वे पाकिस्तान नहीं गए। अयोध्या में जन्मे बशीर बद्र का घर साम्प्रदायिक दंगों में जला दिया गया, तो वे नवाबों के शहर भोपाल में आ बसे। तब उन्होंने लिखा–‘

“लोग टूट जाते हैं, एक घर बनाने में।

तुम तरस नहीं खाते, बस्तियाँ जलाने में।।”

समाज का बदलता हुआ रंग-रूप उन्हें टीस से भर देता है। वे हकीकत से जी नहीं चुराते, बल्कि हमें हिदायत देते हैं —

“कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से।

 ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो।।”

यादों का काफिला हमेशा साथ चलता है, वह वक्त और मौसम का मोहताज नहीं, और उसी ने उनसे उर्दू शायरी का खजाना भर दिया।

भारी भरकम उर्दू फ़ारसी के शब्दों से भाराक्रांत ग़ज़ल को उन्होंने इतना सरल बना दिया कि वो हर जुबान पर चढ़ गई और अपना रस घोलती रही। पाठकों और शायरी के बीच की दूरी पूरी तरह ख़त्म हो गई।

वे कहते थे “भाषा तो एक माध्यम है, संस्कृत माँ तो उर्दू हिंदी बेटियाँ हैं।” 

उन्हें भारत का “सांस्कृतिक राजदूत” कहा गया ।

वे जितने अपनेपन से आगाह करते हैं, जितना कोई करीबी भी नहीं करता कि–

“परखना मत परखने से कोई अपना नहीं रहता ।

किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता ।।”

कभी-कभी यकीन नहीं होता कि कोई इतना महीन भी लिख सकता है कि हृदय के सारे तार झनझना उठें और हम शब्दों को शब्द न समझकर अपने एहसास की तर्ज पर उन्हें अपने मन में समा लें —

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में कि मेरी नजर को खबर न हो।

मुझे एक रात नवाज़ दे, मगर इसके बाद सहर न हो।।

कभी दिन की धूप में झूम के,कभी शब के फूल को चूम के

यूँ ही साथ साथ चलें सदा कभी खत्म अपना सफर न हो।।

एक और बानगी पेश है कि

ग़ज़लों का हुनर अपनी आँखों को सिखाएंगे। रोएंगे बहुत लेकिन आंसू नहीं आएंगे।

 कह देना समुंदर से हम ओस के मोती हैं, दरिया की तरह तुझसे मिलने नहीं आएंगे।।

शब्दों की बाजीगरी और एहसासों की शिल्पी ग़ज़ल जो हर हृदय की धड़कन बन जाती है और देर तक रुनझुन करती रहती है। कभी बांसुरी की धुनें सुनाती हैं तो कभी अल्गोजे की। फिल्म “मसान” में उनकी शायरी इस्तेमाल की गई।

बशीर बद्र का निधन शायरी के स्वर्णिम अध्याय का एक भौतिक अवसान है। पर शायर तो रूहों पर राज करते हैं। चौदह वर्ष डिमेंशिया के शिकार रहे इक्यानवे वर्षीय बद्र आज हमारे बीच नहीं हैं पर ये भी कोई बात हुई? अपनी ग़ज़लों की देह में वे प्राण बनकर धड़कते रहेंगे—

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो।

 न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७९ – देश-परदेश – हमारे जीवन पर सोशल मीडिया के साइड इफ़ेक्ट ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७९ ☆ देश-परदेश – हमारे जीवन पर सोशल मीडिया के साइड इफ़ेक्ट ☆ श्री राकेश कुमार ☆

सोशल मीडिया अपने आप को समाज का बहुत बड़ा शुभचिंतक मानता है। इसकी पैरवी करने वाले तो ये तक कह देते हैं, कि “सोशल मीडिया ही समाज का वास्तविक आईना है”।

दिल को बहलाने के लिए ख्याल बुरा नहीं है, ग़ालिब! अलग अलग तरह के आईने भी आपकी शक्ल को विभिन्न  आकारों में दिखा देते हैं। पतले व्यक्ति को मोटा और मोटे व्यक्ति को पतला बताने वाले आईने हमने भी बहुत देखें हैं।

आज प्रातःकालीन भ्रमण पर एक परिचित के घर के सामने से निकलते हुए, एक पेशे से सेवानिवृत वकील साहब मिल गए, उनके चाय के आग्रह को मना नहीं करते हुए, हम उनके घर चले गए।

उनकी पत्नी टीवी के सामने कापी पेन लेकर बैठी थी। वो बोली अभी दस मिनट सब शांत बैठे रहें, उसके बाद ही चाय की व्यवस्था करूंगी।

टीवी के किसी समाचार चैनल पर भविष्य वक्ता कुछ जानकारी दे रहे थे, वो कॉपी में लिखती जा रही थीं। वकील साहब भी अपनी डायरी में कुछ लिख रहे थे। दस मिनट बाद बड़ी कठिनाई के बाद काग़ज़ के छोटे से कप में एक बड़ी चम्मच की मात्रा के बराबर चाय प्राप्त कर, हम अपने होठ ही गीले कर पाए।

वकील साहब की पुत्री एक बड़े हॉस्पिटल में महिला चिकित्सक हैं। भाभी जी भविष्य वक्ता द्वारा “सिजेरियन ऑपरेशन” के लिए अच्छे समय की जानकारी नोट कर रही थी। उनकी पुत्री उस समय किए जाने वाले ऑपरेशन का अधिक/ विशेष चार्ज, वसूल सकें। वकील साहब भी मुकदमा दायर करने का सबसे बढ़िया समय कौन सा है, की जानकारी बार काउंसिल को प्रतिदिन देते है, ताकि वकील उस विशेष समय के लिए अतिरिक्त राशि फीस के नाम पर लूटी जा सके।

चाय के समय वकील साहब बोले, कल ही बिटिया की सगाई टूट गई है। हमें भी आश्चर्य हुआ,  तब वो बोले लड़के वाले कहते है, किसी भी वकील की बेटी से विवाह नहीं करेंगे, वर्ना भोपाल वाली त्रिशा जैसा कुछ हो ना जाए। वो बहुत दुखी मन से बोले, समाज में लोग वकीलों से पारिवारिक संबंध जोड़ने से मना करने लगे हैं। आगे बोले पड़ोस में रहने से भी लोग डरते हैं। वकील के घर के आस पास जमीन भी तो सस्ती मिल जाती है।

बहुत देरी से मुंह में रखे हुआ गुटखा थूकने का समय आ गया है। इसलिए लेखनी को विराम देता हूँ।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००७ ⇒ उबासी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उबासी।)

?अभी अभी # १००७ ⇒ आलेख – उबासी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो सुबह बासी मुंह उठते ही आ आए, उसे उबासी कहते हैं। सुबह जब, रात भर की थकान के कारण आँखें खुलने से इंकार कर देती हैं, तब मजबूरन मुंह को अपना मुंह खोलना पड़ता है। उबासी बिना किसी ऑक्सीजन के सिलेंडर के, शरीर को निःशुल्क प्राणवायु सप्लाय करती है, बिना किसी शुक्रिया, करम, मेहरबानी के।

उबासी को अंग्रेजी में yawn याॅन कहते हैं। भले ही उबासी आए न आए, यॉन शब्द का उच्चारण करने के लिए पूरा मुंह तो खोलना ही पड़ता है। उबासी आलस्य और सुस्ती का प्रतीक है। जब सामने वाला आपके मन की नहीं, उबाऊ, अनावश्यक और बेतुकी बातें करने लगता है, तो आपके दिमाग़ का दही हो जाता है, और आप कितना भी कंट्रोल करें, अपनी जबान को लगाम दें, मुंह खुल ही जाता है, और उबासी अपनी असहमति प्रकट कर ही देती है।।

जिनकी सुराही सी गर्दन होती है, और छोटा, मासूम सा मुंह, उन्हें उबासी लेते वक्त बड़ी तकलीफ होती है। उबासी के वक्त मुंह अपनी मनमानी करता है, किसी की नहीं सुनता, और अपनी हैसियत से भी ज्यादा खुल जाता है। जिस कारण चेहरे की नसें भी तन जाती हैं और कभी कभी मुंह भी दुखने लगता है। बेचारे नवजात शिशु भी इस उबासी से नहीं बच पाते और जब उबासी के कारण उनका मुंह उनकी चेहरे की रचना से अधिक खुल जाता है, तो तनाव के दर्द के कारण, वे बेचारे अनायास ही रो पड़ते हैं। उस समय अगर आसपास कोई ना हो, तो बच्चे के रोने का कारण भी पता नहीं चल पाता।

हिचकी, डकार और उबासी वायु के अवरोध के शारीरिक विकार हैं। अधिक खाने से डकार, दिमागी थकान के कारण उबासी और हिचकी की तो पूछिए ही मत।

न जाने क्यों, हिचकी को किसी की याद से जोड़ दिया गया है। डकार और उबासी को गंभीरता से नहीं लिया जाता लेकिन कभी कभी जब हिचकियां बंद ही नहीं होती तो इसे हलके में नहीं लिया जाता। एक तरह का सांस का अवरोध ही तो है हिचकी। छींक और खांसी भी नाक और गले के ही सामान्य अवरोध हैं जिनकी सतत उपेक्षा नजला, सर्दी जुकाम और दमा – खाँसी को जन्म दे सकती है।।

एक वायु विकार और है जिसका असर वातावरण पर ही नहीं, ओज़ोन की परत तक पड़ता है, शालीन भाषा में इसे गैस की ट्रबल कहते हैं। उबासी अगर ठंडी बासी है, तो यह तो भयंकर बदबू है। लोग भी अजीब हैं, मूली के परांठे खा खाकर दुश्मनी निकालते हैं। उबासी अगर यॉन है तो यह अंग्रेजी का fart फार्ट है। आपने किशोर कुमार का वह गीत तो सुना ही होगा ; फार्ट मेरी जान, फटाफट फट। बात मेरी मान फटाफट फट।

यकीन मानिए, उबासी हो या डकार, हिचकी हो या फार्ट, सभी शरीर के नैसर्गिक साफ सफाई की युक्तियां हैं। ये ऐसे संकेत हैं, जिनकी अनदेखी करने से ही शरीर में विकार उत्पन्न होते हैं। एक तरह का अलार्म सिस्टम है यह। रात को सोने का वक्त हो गया, उबासी संकेत देती है, आप ध्यान नहीं देते। जब तक डकार नहीं आती, खाते ही रहते हैं। शरीर हिलेगा डुलेगा नहीं तो वायुमंडल तो डोलेगा ही। अगर आपका ड्राइवर वाहन चलाते वक्त उबासी ले रहा हो, तो तत्काल पैदल हो लें, या उसे पैदल कर दें। अभी हमें खुदा के पास नहीं जाना।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ विश्व तम्बाकू निषेध दिवस – तम्बाकू का जाल और युवाओं का भविष्य… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ तम्बाकू का जाल और युवाओं का भविष्य…  ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

(विश्व तम्बाकू निषेध दिवस (31 मई) पर विशेष)

“बस एक बार ट्राय कर रहा हूँ…

आदत थोड़ी लगेगी।”

कॉलेज के बाहर खड़े उस किशोर ने हँसते हुए अपने दोस्त से कहा।

कुछ दोस्तों ने भी मुस्कुराकर उसका साथ दिया।

लेकिन शायद किसी ने यह नहीं सोचा था कि कई बार “सिर्फ एक बार” से शुरू हुई चीज़ पूरी जिंदगी पर भारी पड़ जाती है।

 

आज का दौर आधुनिकता, तकनीक और तेज़ जीवनशैली का दौर है।

लेकिन इसी चमकदार दुनिया के पीछे एक ऐसा खतरा भी तेजी से फैल रहा है, जो चुपचाप लाखों लोगों की जिंदगी निगल रहा है – तम्बाकू।

तम्बाकू केवल एक नशा नहीं है।

यह धीरे-धीरे शरीर, मन, परिवार और समाज को कमजोर करने वाला एक ऐसा जहर है, जो अक्सर शुरुआत में दिखाई नहीं देता।

हर वर्ष 31 मई को “विश्व तम्बाकू निषेध दिवस” मनाया जाता है।

यह दिन केवल जागरूकता का अभियान नहीं, बल्कि समाज को यह याद दिलाने का अवसर है कि तम्बाकू उद्योग किस प्रकार लोगों की कमजोरियों, जिज्ञासाओं और भावनाओं का उपयोग करके उन्हें अपने जाल में फँसाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर वर्ष दुनिया भर में लगभग 80 लाख लोगों की मृत्यु तम्बाकू सेवन के कारण होती है। भारत में भी लाखों लोग कैंसर, हृदय रोग और श्वसन संबंधी बीमारियों के कारण अपनी जान गंवा देते हैं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि तम्बाकू उद्योग का सबसे बड़ा निशाना युवा पीढ़ी बन चुकी है। पहले सिगरेट और बीड़ी तक सीमित यह बाजार अब ई-सिगरेट, वेपिंग और फ्लेवर्ड निकोटीन उत्पादों के माध्यम से किशोरों तक पहुँच रहा है।

इन उत्पादों को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है मानो वे आधुनिक जीवनशैली का हिस्सा हों। रंगीन पैकेजिंग, मीठे फ्लेवर, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और फिल्मों में धूम्रपान का ग्लैमर –

यह सब किसी संयोग का हिस्सा नहीं है।

यह एक सुनियोजित रणनीति है।

तम्बाकू उद्योग अच्छी तरह जानता है कि यदि किशोर अवस्था में किसी को निकोटीन की आदत लग जाए, तो वह लंबे समय तक ग्राहक बना रह सकता है।

“तम्बाकू उद्योग उत्पाद नहीं बेचता,

वह धीरे-धीरे निर्भरता बेचता है।”

आज सोशल मीडिया पर वेपिंग को “कूल”, “स्टाइलिश” और “स्ट्रेस रिलीफ” के रूप में दिखाया जाता है।

कई युवा यह मान बैठते हैं कि ई-सिगरेट सामान्य सिगरेट की तुलना में सुरक्षित है।

लेकिन वैज्ञानिक शोध स्पष्ट रूप से बताते हैं कि वेपिंग भी शरीर के लिए गंभीर रूप से हानिकारक है।

इन उत्पादों में निकोटिन, भारी धातुएँ और ऐसे रसायन पाए जाते हैं, जो फेफड़ों, मस्तिष्क और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।

सबसे खतरनाक बात यह है कि निकोटिन केवल शरीर को नहीं, सोचने की क्षमता और भावनात्मक संतुलन को भी प्रभावित करता है। किशोर अवस्था में मस्तिष्क अभी विकसित हो रहा होता है। ऐसे समय में निकोटिन की लत ध्यान क्षमता, स्मृति और निर्णय लेने की शक्ति को कमजोर कर सकती है।

कई युवा तनाव और चिंता से बचने के लिए धूम्रपान या वेपिंग शुरू करते हैं। उन्हें लगता है कि इससे मानसिक राहत मिलेगी।

लेकिन सच इसके बिल्कुल विपरीत है।

निकोटिन कुछ समय के लिए दिमाग को उत्तेजना देता है, लेकिन धीरे-धीरे वही बेचैनी, चिड़चिड़ापन और मानसिक निर्भरता का कारण बन जाता है। यही कारण है कि जो व्यक्ति शुरुआत में “तनाव कम करने” के लिए तम्बाकू लेता है, वही कुछ समय बाद उसके बिना असहज महसूस करने लगता है।

तम्बाकू का प्रभाव केवल सेवन करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता।

परोक्ष धूम्रपान यानी सेकेंडहैंड स्मोक भी उतना ही खतरनाक है। घर में धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के कारण बच्चे, बुजुर्ग और गर्भवती महिलाएँ भी गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करती हैं।

बच्चों में अस्थमा, फेफड़ों की कमजोरी और बार-बार संक्रमण जैसी समस्याएँ बढ़ने लगती हैं।

तम्बाकू का एक बड़ा प्रभाव आर्थिक और सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है। कई परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा नशे पर खर्च कर देते हैं। बीमारियों के इलाज में आर्थिक स्थिति कमजोर होती जाती है।

धीरे-धीरे यह लत व्यक्ति के आत्मविश्वास, रिश्तों और सामाजिक जीवन को भी प्रभावित करने लगती है।

हालाँकि सकारात्मक बात यह है कि तम्बाकू छोड़ने का लाभ बहुत जल्दी दिखाई देने लगता है।

धूम्रपान छोड़ने के कुछ ही घंटों बाद शरीर में ऑक्सीजन का स्तर सुधरने लगता है। कुछ महीनों में फेफड़ों की कार्यक्षमता बेहतर होती है और कुछ वर्षों बाद कैंसर तथा हृदय रोग का खतरा काफी कम हो जाता है।

लेकिन तम्बाकू छोड़ना केवल इच्छाशक्ति का विषय नहीं होता। यह शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की लड़ाई होती है। इसलिए परिवार, मित्रों और समाज का सहयोग बहुत जरूरी है।

विद्यालयों और घरों में बच्चों के साथ खुलकर संवाद होना चाहिए। उन्हें केवल डराकर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और भावनात्मक दोनों स्तरों पर जागरूक करना होगा।

माता-पिता को यह भी समझना होगा कि बच्चे केवल शब्दों से नहीं सीखते, वे व्यवहार से सीखते हैं।

यदि घर का वातावरण तम्बाकू मुक्त होगा तो बच्चों पर उसका सकारात्मक प्रभाव अवश्य पड़ेगा।

सरकार द्वारा बनाए गए कानून, चेतावनी चित्र और प्रतिबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन केवल कानून पर्याप्त नहीं हैं। जब तक समाज स्वयं जागरूक नहीं होगा, तब तक इस समस्या पर पूरी तरह नियंत्रण पाना कठिन रहेगा।

आज आवश्यकता केवल तम्बाकू विरोधी अभियानों की नहीं है, बल्कि ऐसी जीवनशैली विकसित करने की है जहाँ युवा तनाव से बचने के लिए नशे नहीं, बल्कि खेल, संवाद, योग, संगीत और सकारात्मक गतिविधियों का सहारा लें।

क्योंकि अंततः तम्बाकू केवल शरीर को ही नहीं जलाता, वह धीरे-धीरे जीवन की संभावनाओं को भी धुएँ में बदल देता है।

शायद इसलिए विश्व तम्बाकू निषेध दिवस हमें केवल यह नहीं सिखाता कि तम्बाकू कितना हानिकारक है।

यह हमें यह भी याद दिलाता है कि जागरूकता, आत्मसंयम और सही निर्णय ही स्वस्थ समाज की सबसे बड़ी शक्ति हैं।

“तम्बाकू छोड़ना केवल एक आदत छोड़ना नहीं,

“बल्कि अपने जीवन, अपने परिवार और अपने भविष्य को बचाने का निर्णय है।”

© डॉ रीटा अरोड़ा

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००६ ⇒ पंचनामा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पंचनामा।)

?अभी अभी # १००६ ⇒ आलेख – पंचनामा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

न जाने क्यों, पंच से मुंशी प्रेमचंद की कहानी पंच परमेश्वर याद आ जाती है। परमेश्वर तो एक होता है,लेकिन जब पाँच सयाने एक जगह इकट्ठा हो जाते हैं, तो वे परमेश्वर ही तो कहलाते हैं। पंच विक्रमादित्य की तरह पंचायत में न्याय तो करते ही हैं,दोषी को दंड भी सुनाते हैं। न्याय का हथौड़ा जब प्रहार करता है, तब वह भी एक तरह का punch ही तो होता है।

पुलिस बरामद सामग्री का पंचनामा बनाती है। कुछ गवाहों के सामने वस्तुओं को सील कर दिया जाता है और एक दस्तावेज तैयार किया जाता है, जिस पर सभी के हस्ताक्षर होते हैं। बैंकों में लॉकर भी सील किए जाते हैं और अदालत बजावरी भी चस्पा करती है। एक महान मुक्केबाज मोहम्मद अली भी हुए थे, जिनका पंच, विरोधी मुक्केबाज को दिन में तारे दिखला देता था।।

कार्टून और व्यंग्य सृजन की ऐसी विधा है, जिसमें punch का प्रयोग किया जाता है। Punch तत्कालीन व्यवस्था एवं विसंगति पर एक ऐसा करारा तमाचा है कि जिसका न तो बचाव संभव है और न ही प्रतिकार। तानाशाहों को इस प्रहार की आदत नहीं होती इसलिए अक्सर अभिव्यक्ति की आज़ादी के इन पंचों पर उनकी सदा वक्र दृष्टि ही रहती चली आई है। कई बार इन पंचों का ही पंचनामा बना दिया जाता है और उन्हें सेंसर यानी प्रतिबंधित कर दिया जाता है।

कलम तलवार से अधिक खतरनाक होती है। इसका जितनी बार सर कलम करो, यह उतनी ही पैनी होती चली जाती है। कार्टून और व्यंग्य में अगर पंच ना हो वह किसी बिना तड़के वाली फीकी दाल से कम नहीं।

इंग्लैंड से प्रकाशित कार्टून मैग्जीन punch अपने १५१ वर्ष पूर्ण कर सन् १९९२ में आख़िरी सांसें लेने को मजबूर हो गई। वे लोग भाग्यशाली रहे जिन्होंने अंग्रेजी में प्रकाशित पत्रिका Shankar’s Weekly का आनंद लिया। हिंदी में भी शंकर्स वीकली का कुछ समय के लिए प्रकाशन हुआ, लेकिन इसका भी बेड लक खराब ही निकला।

टाइम्स ऑफ इंडिया में आर.के.लक्ष्मण लगातार कई वर्षों तक व्यवस्था की परवाह किए बगैर अपने तीखे, करारे और तिलमिलाते कार्टून परोसते रहे। व्यवस्था को जनता से उतना खतरा नहीं होता जितना प्रिंट मीडिया से होता है। एक आपातकाल ने ऐसा सबक सिखाया, सब लाइन पर आ गए। आज न आर.के.लक्ष्मण का कॉमन मैन है और न ही धर्मयुग के कार्टून कोने में ढब्बू जी। बस व्यंग्य और कार्टून के नाम पर लालू,पप्पू और ममता से ही काम चला लो। साफ सुथरे,शालीन व्यंग्य और कार्टून जो आप घर में बच्चों के साथ भी देख सकें।।

एक चेन्नई के पत्रकार,कार्टूनिस्ट चो रामास्वामी हुए थे और एक मुंबई के शिवाजी बाल ठाकरे,जो राजनीति के घिघौने चरित्र पर प्रहार ही नहीं करते थे, उसका डटकर सामना भी करते थे और आज हालत देखिए।

व्यंग्य और कार्टून की खेती के लिए भूमि का उर्वरा होना भी जरूरी है। श्रीलाल शुक्ल कांग्रेस के जमाने में शिवपालगंज ढूंढ पाए, तो राग दरबारी का सृजन संभव हुआ,  आर.के.लक्ष्मण के समय में नेहरू और इंदिरा जैसे चरित्र थे, जिनके चेहरे को देख, कम से कम कूची तो चलाई ही जा सकती थी। आज सभी साफ सुथरे, कोमल, निष्पाप, निष्कलंक चेहरों पर क्या कार्टून बनाए जाएं और क्या वर्तमान राज पर व्यंग्य लिखा जाए। बड़ा धर्मसंकट है। डर है, कहीं कार्टून और व्यंग्य जैसी विधा का पंचनामा ही ना बनाना पड़ जाए …!!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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