हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९२९ ⇒ नाड़ी दोष ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नाड़ी दोष।)

?अभी अभी # ९२९ ⇒ आलेख – नाड़ी दोष ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कबीर कोई नाड़ी वैद्य नहीं थे और ना ही कोई ज्योतिषी, जो लोगों की जन्म पत्री में नाड़ी दोष निकालते बैठते। वे कोई हठयोगी भी नहीं थे, महज एक जुलाहे थे, जो ताना बाना बुनते थे और सहज रूप से ईड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की बातें करते थे। साधो ! सहज समाधि भली।

जितनी कृष्ण की रानियां थीं, उससे अधिक तो हमारे शरीर में नस -नाड़ियां हैं। हम श्रीकृष्ण नहीं, हमें सिर्फ या तो नारियों में दोष दिखाई देता है, या फिर इंसानों में नाड़ी – दोष ! ठीक है, अगर किसी में नाड़ी दोष है तो किसी नाड़ी – वैद्य को बताओ। नहीं ! वे नाड़ी – दोष के लिए किसी ज्योतिषी की सलाह लेते हैं। बस यहीं कबीर का दिमाग खराब हो जाता है। वह अपने कुल को ही दोष देने लग जाता है :

बूढ़ा वंश कबीर का,

उपजा पूत कमाल।।

ज्योतिषी कुंडली में विवाह के पूर्व वर – वधू के गुण मिलाते हैं। नक्षत्रों का मिलान करते हैं। दो सितारों का ज़मीं पर है मिलन, पहले बत्तीस गुण, फिर सगाई और उसके बाद बारात। अगर फिर भी बात ना बने तो ! नाड़ी दोष और क्या। महाराज कोई निदान ? हां यजमान गऊ दान, तुरंत समाधान।

पहले उन्हें नाड़ी वैद्य कहते थे, विज्ञान उन्हें न्यूरो सर्जन कहता है। कलाई गोरी हो या काली, उसे थामने का अधिकार सिर्फ डॉक्टर, वैद्य अथवा एक चूड़ी वाले को ही होता है। नाडी वैद्य अगर नाड़ी देखकर मर्ज पहचान जाता है तो डॉक्टर अपने यंत्र द्वारा पल्स रेट और दिल की धड़कन जानकर। डॉक्टर आपके दिल पर हाथ नहीं रखता, बस यंत्र द्वारा बीमारी को टटोल लेता है। ज़ोर से सांस लो, छोड़ो। आंखों से आंखें नहीं मिलाता, टॉर्च से रोशनी फेंकता है। इन आंखों का रंग हो गया, गुलाबी गुलाबी ! कहीं कंजेक्टिवाइटिस तो नहीं ? नहीं, नहीं सब ठीक है। हल्की सी हरारत है। सब ठीक हो जाएगा एंटीबायोटिक से।।

तब लक्स अंडरवियर और बनियान का प्रचलन नहीं था। बंबइया पट्टेदारी चड्डी और जेब वाले बनियान मां घर पर ही सीती थी। बाहर के लिए कुर्ता पायजामा। तब भी हम नाड़ी दोष से परेशान रहते थे। पुराने टूथ ब्रश की डंडी से ही नाड़ी दोष दूर हो जाता था। बाद में तो इस धर्म संकट से बचने के लिए एक सेफ्टी पिन पायजामे के साथ ही नत्थी कर दी जाती थी। आज इलेस्टिक ने एक आम इंसान की इज्जत बचा ली। उसे नाड़ी दोष से मुक्त कर दिया।

आज सी टी स्कैन और एम आर आई जैसी आधुनिक तकनीक से रीढ़ की हड्डी से लेकर मस्तिष्क तक की सभी नस नाड़ियों की जांच संभव है, फिर भी मर्ज बढ़ता ही गया, ज्यूं ज्यूं दवा की।

कहीं नाड़ी दोष तो कहीं पितृ दोष। दान पुण्य, ज्योतिष, नीम हकीम। क्या क्या न किए हमने खट करम आपकी खातिर।।

नाड़ी वैद्य ना सही, उत्तम स्वास्थ्य के लिए हम नियमित व्यायाम और नाड़ी शोधन प्राणायाम भी कर सकते हैं। नाड़ी दोष से भी अधिक खतरनाक आजकल राजनीतिक दोष हो गया है जहां कहीं भी किसी को गुण नजर ही नहीं आता। किसी की कलाई मरोड़ी तो किसी की कलाई खोली। काश कोई नाड़ी वैद्य इन बीमारों की बीमारी जड़ से पकड़ ले तो समाज का नाड़ी दोष दूर हो जाए। हमारी संस्कृति और सभ्यता की गाड़ी वापस रास्ते पर आ जाए। डर है, कहीं कोई यहां भी पितृ दोष ना निकाल दे ..!!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २७९ ☆ पलाश : फागुन की अग्नि और प्रकृति का आध्यात्मिक स्पर्श… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना पलाश : फागुन की अग्नि और प्रकृति का आध्यात्मिक स्पर्श। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २७९ ☆ पलाश : फागुन की अग्नि और प्रकृति का आध्यात्मिक स्पर्श

भारतीय ऋतुचक्र में वसंत केवल मौसम का परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रकृति के अंतर्मन में जागते उत्सव का समय है। इसी ऋतु में वन-वन दहक उठता है पलाश (Butea monosperma) के केसरिया फूलों से। पत्तों से लगभग रिक्त शाखाओं पर जब ये अग्नि-सी आभा लिए पुष्प खिलते हैं, तब दूर से पूरा वन मानो दीपशिखाओं से आलोकित दिखाई देता है। इसीलिए पलाश को ‘वनाग्नि’ या ‘जंगल की ज्वाला’ भी कहा गया है।

भारतीय परंपरा में पलाश केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि पवित्रता और ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। वैदिक अनुष्ठानों में इसकी लकड़ी और पत्तों का उपयोग होता रहा है। कहीं इसे यज्ञ की पवित्र अग्नि का प्रतीक माना गया, तो कहीं यह आस्था और तप की आभा से जुड़ गया। लोकविश्वास यह भी कहता है कि इसके केसरिया फूलों में तप, त्याग और उत्सव — तीनों का संगम दिखाई देता है।

फागुन के दिनों में जब कई वृक्षों से पत्ते झर जाते हैं और वन का स्वर कुछ विरल-सा लगने लगता है, तभी पलाश अपनी दहकती छटा से उस सूनेपन को भर देता है। उसकी शाखाएँ जैसे घोषणा करती हैं कि जीवन की अग्नि कभी बुझती नहीं, वह समय-समय पर नए रंगों में प्रकट होती रहती है। यही अनुभूति कवि के मन में दोहों के रूप में प्रस्फुटित होती है—

*

वन में खिले पलाश जब, धधके जैसे धाम।

प्रकृति रचाए अग्नि सा, रंगों वाला ग्राम॥

*

पात झरे सब वृक्ष के, सूना लगे समाज।

खिलते हुए पलाश से, वन में बना सुराज॥

*

टेसू की ये आग सी, डाली-डाली झूम।

धरती में जैसे मचे, फागुन वाली धूम॥

*

रंग केसरी फूल का, जिससे जगे उजास।

सूखे मन में भी हुआ, आशा का विश्वास॥

*

वन में टेसू बोलता, सुनते सारे लोग।

धरा सजाए दिव्यता, भक्ति भाव संजोग॥

*

दरअसल पलाश का खिलना केवल प्रकृति का दृश्य नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म आध्यात्मिक संकेत भी है। यह हमें स्मरण कराता है कि जैसे सूखी शाखाओं पर भी अग्नि-सी आभा वाले फूल खिल उठते हैं, वैसे ही जीवन के निर्जन क्षणों में भी आशा और प्रकाश का उदय संभव है। शायद यही कारण है कि फागुन की हवा में झूमता पलाश हमें प्रकृति के साथ-साथ ईश्वर की सृजनात्मक लीला का भी आभास कराता है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९२८ ⇒ ताऊ उपनिषद् ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ताऊ उपनिषद् ।)

?अभी अभी # ९२८ ⇒ आलेख – ताऊ उपनिषद् ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

लाओत्से एक चीनी दार्शनिक हुए हैं! लाओ-सू एक सम्मान जताने वाली उपाधि है। लाओ का अर्थ आदरणीय वृद्ध और सू का अर्थ गुरु है। उनका ताओ उपनिषद् एक दार्शनिक ग्रंथ है, जिस पर ओशो पर्याप्त प्रकाश डाल चुके हैं।

हम यहां हरियाणा के वृद्ध और सम्मानजनक व्यक्तित्व ताऊ पर अपने विचार केन्द्रित करेंगे। इसका महत उद्देश्य भी यही है कि भविष्य में एक उपनिषद् ताऊ पर भी रचा जाए। ओशो नहीं तो कोई और सही। ऐसो मतो हमारो।।

वैसे ताऊ संबोधन पर हरियाणा का एकाधिकार नहीं है। हम ताऊ को अधिक सम्मान देकर उनके आगे जी लगाते हैं। पिताजी से छोटे अगर चाचाजी हुए तो पिताजी से बड़े ताऊ जी।

रिश्ता संबोधन का भूखा नहीं! कुछ लोग पिताजी को बाबू जी कहते हैं तो कुछ पापा और कुछ डैडू। दादा जी भी आजकल आधुनिक होते होते दादू हो गए हैं, और नाना नानू।

जब ताऊ की बात होगी, तो दाऊ का भी जिक्र जरूर होगा! कृष्ण के बड़े भाई थे दाऊ। मैया मोहे दाऊ बहुत खिजायो। फिर ताऊ तो पिताजी के बड़े भाई हुए। यह भी संयोग ही है कि ताऊ और दाऊ का संबंध भी कुरुक्षेत्र ही से है। कल दाऊ थे, आज ताऊ हैं।।

हम जात-पांत को नहीं मानते! लेकिन धरम पाजी जाट हैं, यह तो वे खुद भी मानते हैं। केवल हरियाणा में ही नहीं, राजस्थान और पंजाब में भी जाट बहुतायत से हैं। सेना में एक जाट रेजिमेंट भी है और उनकी देशभक्ति पर शंका नहीं की जा सकती। ढाई किलो का हाथ आखिर किसका है? फिल्म शहीद का वह गीत याद कीजिए! पगड़ी संभाल जट्टा, तेरा लुट गया माल।।

ताऊ बिना पगड़ी के नहीं होते! खाट, लाठी और हुक्का ही इनकी पहचान होती है।

हरियाणा में कोई ताऊ यूं ही नहीं बन जाता! पहले उसे लाल बनना पड़ता है। आपातकाल के बंसीलाल को कौन भूल सकता है। ताऊ शब्द की गरिमा को अगर किसी ने हरियाणा में निभाया है, तो वे हैं एकमात्र देवीलाल। बाद में तो एक भजनलाल भी हुए हैं, जो भजन करते करते पूरी पार्टी सहित ही दलबदल कर बैठे।

लाली तेरी लाल की

जित देखूं तित लाल

लाली देखन मैं चली

मैं भी हो गई लाल

अगर हरियाणा के इन तीनों लालों के राष्ट्रीय योगदान पर प्रकाश डाला जाए तो एक नहीं तीन उपनिषद् की रचना हो सकती है। इनमें सबसे वरिष्ठ देवीलाल जिन्हें देश सम्मान से ताऊ कहता था, ने अगर देश के उप-प्रधानमंत्री पद को सुशोभित किया, वहीं दूसरे लाल भजनलाल तीन बार हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे।।

पूत के पांव पालने में! देवीलाल के लाल ओमप्रकाश चौटाला ने पांच बार हरियाणा के मुख्यमंत्री का पद संभाला। लालू की तरह हरियाणा के, ये लाल भी आज जेल की शोभा बढ़ा रहे हैं।।

भारत माता के 135 करोड़ लाल हैं, कोई मोती है, कोई जवाहर है, तो कोई लाल बहादुर है। लाल जब छोटे होते हैं, तब उन्हें लल्ला भी कहते हैं! बड़े होने पर इनमें से कुछ लाला भी निकल जाते हैं। कोई पंजाब केसरी लाला लाजपतराय कहलाता है, तो कोई लाला अमरनाथ। कितने लोगों ने Hints for Self Culture, के लेखक, स्वतंत्रता सेनानी लाला हरदयाल का नाम सुना है। ईश्वर किसी को फिल्म उपकार के किरदार कन्हैयालाल वाला लाला न बनाए। भले ही एम डी एच के मसाले वाला साफा धारी लाला धर्मपाल गुलाटी ही क्यूं न बना दे।

जो जाट है, उसके ठाठ हैं! हमारे मुख्य चरित्र ताऊ को सम्मान के साथ चौधरी भी कहते हैं। वे सिर्फ देवीलाल नहीं चौधरी देवीलाल थे। कुछ चौधरी, लाल नहीं, सिंह भी होते हैं। चौधरी चरणसिंह कभी देश के प्रधानमंत्री हुआ करते थे। नाम की महिमा देखिए, किसी चौधरी के चरण, जब सिंहासन तक पहुंचते हैं, तो वे सिंह नहीं चरणसिंह हो जाते हैं।।

जो ताऊ है, वही चौधरी है, और वही देश का सच्चा लाल भी है। देवी जिसका नाम है, हरियाणा का वह लाल है। ऐसे सभी

ताऊ चौधरियों को बारम्बार प्रणाम है।।

( सभी ताऊ-ओं को सादर समर्पित )

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९२७ ⇒ निःशुल्क ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “निःशुल्क।)

?अभी अभी # ९२७ ⇒ आलेख – निःशुल्क ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

निःशुल्क कहें या मुफ़्त ! क्या कोई फर्क पड़ता है। मुफ़्तखोर पहले तो मुफ्त का माल ढूँढते हैं और बाद में निःशुल्क शौचालय तलाश करते हैं। 25 %डिस्काउंट और बिग बाजार के महा सेल में एक के साथ एक फ्री को आप क्या कहेंगे। वहाँ छूट भी है, मुफ्त भी है और शुल्क भी। लेकिन निःशुल्क कुछ भी नहीं है।

हमारे घर अखबार आता है, उस पर शुल्क लिखा होता है। वही अखबार अगर आप पड़ोसी के यहाँ अथवा वाचनालय में पढ़ते हैं, तो निःशुल्क हो जाता है।।

गर्मी में दानदाता और पारमार्थिक संस्थाएँ जगह जगह ठंडे पानी की प्याऊ खोलते थे, वे निःशुल्क होती थी लेकिन उन पर ऐसा लिखा नहीं होता था, क्योंकि तब पीने के पानी के पैसे नहीं लिए जाते थे। जब से पीने का पानी बोतलों में बंद होने लगा है, वह बिकाऊ हो गया है।

घोर गर्मी और पानी के अभाव में नगर पालिका पानी के टैंकरों से निःशुल्क जल-प्रदाय करती थी। लोग पानी के टैंकर के आगे बर्तनों की लाइन लगा दिया करते थे। सार्वजनिक स्थानों के नल और ट्यूब वेल की भी यही स्थिति होती थी। लेकिन पानी बेचा नहीं जाता था।।

समय के साथ पानी के भाव बढ़ने लगे। नई विकसित होती कालोनियों के बोरिंग सूखने लगे। पानी बेचना व्यवसाय हो गया। प्राइवेट पानी के टैंकर सड़कों पर दौड़ने लगे। अब पानी निःशुल्क नहीं मिलता।

शहरों में चिकित्सा बहुत महँगी है ! एलोपैथी के डॉक्टर कंसल्टेशन फीस लेते हैं, वे मुफ्त में इलाज नहीं करते। आयुर्वेदिक चिकित्सा में निःशुल्क परामर्श उपलब्ध होता है। पातंजल औषधालय हो अथवा कोई आयुर्वेदिक दुकान, निःशुल्क चिकित्सा के बोर्ड लगे देखे जा सकते हैं। बस दवाइयों की कीमत मत पूछिए।।

कुछ नागरिक, समाजसेवी संस्थाओं को अपनी स्वैच्छिक सेवाएँ प्रदान करते हैं। मुफ़्त सलाह और निःशुल्क सेवाएं देने वाले को मानद भी कहते हैं। उनकी निःशुल्क सेवाओं को सम्मान प्रदान करने के लिए अंग्रेज़ी में एक शब्द गढ़ा गया है, ऑनरेरी।

समाज की विभिन्न विधाओं में निःस्वार्थ सेवाएं प्रदान करने वाले विशिष्ट व्यक्तियों को ऑनरेरी डॉक्टर ऑफ लॉज़ की डिग्री से विभूषित किया जाता है। इनमें ललित कलाओं में पारंगत विद्वानों और कलाकारों को बिना डिग्री के डॉक्टर बना दिया जाता है। किसी भी सेलिब्रिटी को ऐसा डॉक्टर बनने में ज़्यादा वक्त नहीं लगता।।

क्या मनुष्य जीवन हमें माँगने से मिला है, या फिर हमने इसकी कोई कीमत चुकाई है ? मुफ़्त में कहें, या निःशुल्क मिली यह ज़िन्दगी कितनी अनमोल है। ‌अक्सर लोग बड़े शिकायत भरे लहजे में कहते हैं, हमने पूरी ज़िंदगी निःस्वार्थ सेवा और त्याग में बिता दी और बदले में हमें क्या मिला।

‌वे भूल जाते हैं, इतना बहुमूल्य मानव जीवन उन्हें बिना कौड़ी खर्च किये मिला है। जिसने आपको यह जीवन दिया है, यह उसकी अमानत है। इसमें खयानत न करते हुए, कबीर की तरह इस चदरिया को ज्यों की त्यों रख देंगे तो यही एक बड़ा अहसान होगा। जो ज़िन्दगी आपको मुफ्त में मिली, आप उसकी क़ीमत लगा रहे हैं। मुझको क्या मिला।।

कुछ लोग निःशुल्क खुशियाँ बाँटते हैं। कितनी भी परेशानियां हों, हमेशा मुस्कुराहट उनके चेहरे पर नज़र आती है। दो शब्द मीठा बोलने में पैसे नहीं लगते। व्यक्तित्व की महक, तड़क-भड़क और महँगे प्रसाधनों से नहीं होती। प्रसन्नता travel करती है। बस में यात्रा करते समय, किसी माँ की गोद में खिलखिलाता बच्चा, बरबस सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। वह जिसकी ओर मुस्कान फेंकता है, वह मुग्ध हो जाता है। यह सब बस किराये में शामिल नहीं होता। निःशुल्क होता है।

गर्मियों में जब सुबह ठंडी हवा चलती है, और आप सैर के लिए निकलते हैं, तो वातावरण में रातरानी की खुशबू शामिल होती है। प्रकृति ने यह सब व्यवस्था आपके लिए निःशुल्क की है। आप इसकी कीमत केवल खुश रहकर, प्रसन्न रहकर, और औरों को प्रसन्न रखकर ही चुका सकते हैं। जो निःशुल्क मिला है, उसे अपने पास नहीं रखें, निःशुल्क ही आपस में बांट लें।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९२६ ⇒ अपना अपना सच ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अपना अपना सच।)

?अभी अभी # ९२६ ⇒ आलेख – अपना अपना सच ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हम सब सच्चे, मेहनती और ईमानदार हैं, हमें यह किसी को बताने की, अथवा सिद्ध करने की जरूरत नहीं। वैसे हम स्वयं भी यह अच्छी तरह से जानते हैं कि हम कितने सच्चे, मेहनती और ईमानदार हैं। आपकी आप जानो, हम तो सिर्फ अपनी बात कह रहे हैं।

सच तो खैर हम बचपन से ही बोलते आ रहे हैं। क्या आपने सुना नहीं, सच्चे का बोलबाला, झूठे का मुंह काला ! हम तो बस, सुबह उठकर आईने में अपना मुंह देख लेते हैं और तसल्ली कर लेते हैं कि कहीं हमारा मुंह काला तो नहीं। हमें और हमारे सच को कहीं नज़र ना लगे, इसलिए सावधानी के लिए, एक काला टीका और लगा लेते हैं। सांच को आंच नहीं, फिर भी क्या भरोसा कहीं हमारे सच को किसी की नज़र लग गई तो।।

अब सच कोई ओढ़ने बिछाने की चीज तो है नहीं, न तो इसे घर में सजाया जा सकता है और न ही इसे अकेले घर में छोड़ा जा सकता है। जहां जाते हैं, इसे साथ में ले जाते हैं, कहते हैं अगर सच का साथ हो, तो कभी झूठ पास नहीं फटकता। कभी कभी जब गलती से सच का साथ अगर छूट जाता है तो झूठ उसका फायदा उठाकर हमारे साथ हो लेता है। वैसे अगर हम सच्चे हैं तो झूठ भी हमारा क्या बिगाड़ लेगा।

बचपन में हम ज्यादा सच झूठ नहीं समझते थे। हम सबको सच ही समझ लेते थे। फिर हमें समझाया गया, झूठ से बचकर रहो।

अब अगर झूठ कोई दोस्त हो तो समझ जाएं, कि इससे दूर रहा करो। जहां दोस्ती दुश्मनी जैसी ही कोई चीज ना हो, वहां क्या सच और क्या झूठ। सभी अपने लगते थे। सभी सच्चे लगते थे।।

बचपन में जब हम सही गलत ही नहीं समझ पाते थे, तो सच झूठ क्या समझेंगे। अब किसी नादान बच्चे ने मुंह में मिट्टी भर ली और मुंह नहीं खोल रहा तो उससे पूछा जाता है, नन्हे मुन्ने बच्चे तेरे मुंह में क्या है, और वह सर हिला कर कह देता है, कुछ नहीं।

मां को भरोसा नहीं होता, मुंह खोलकर मिट्टी निकालकर कहती, झूठ बोलता है, मिट्टी खाता है और कहता है, मुंह में कुछ नहीं। कुछ भी कहो, मिट्टी के साथ, झूठ का स्वाद भी मुंह को लग ही जाता है। वह बार बार झूठ बोलता है, मार खाता है।

सच यूं ही नहीं उगला जाता। पहले मां की मार, फिर मास्टरजी की मार, थाने में पुलिस की मार भले ही कितना भी सच उगलवा ले, परिस्थिति की मार एक ऐसा कड़वा सच है जो न तो निगलते बनता है और न ही उगलते।।

सत्य की सदा विजय होती है, यह हम अदालतों में देख ही रहे हैं, अतः इस पर ज्यादा प्रकाश डालने की जरूरत नहीं। आपसे सच बुलवाने के लिए शपथ पत्र लिया जाता है, जिसे हलफनामा अथवा एफिडेविट कहा जाता है।

शपथ ही कसम है, एक तरह की सौगंध। कसमें, वादे, प्यार, वफा सब बातें हैं, बातों का क्या, यह हम नहीं, फिल्म उपकार के प्राण ऊर्फ लंगड़ कह गए हैं।

कसम भी क्या चीज है कसम से ! पत्नी स्वादिष्ट भोजन परोस रही है। स्वाद में अधिक खाने में आ ही जाता है। एक फुल्का और ले लीजिए, अरे नहीं भाई, पेट भर गया है। लगता है खाना अच्छा नहीं बना, वर्ना एक तो और ले ही लेते। अच्छा, चलो नहीं मानती तो एक रख दो। पत्नी उत्साह में थोड़े चावल और ले आती है, आप परेशान हो जाते हैं। सच में अब बिल्कुल जगह नहीं है। आपको मेरी सौगंध, इतना सा तो ले ही लो। बेचारा सच, इस सौगंध से परेशान हो जाता है।।

सच भले ही परेशान हो, पराजित नहीं होता। आज कौन परेशान है और कौन विजयी, यह कहने की आवश्यकता ही नहीं है। सच का धंधा मंदा है, झूठ का कारोबार खूब फल फूल रहा है। सब अपने अपने सच और ईमान को सभाले हुए हैं। तेरी गठरी में लागा चोर, मुसाफिर जाग जरा।

कलि के बाद कलयुग आया, जिसे हमने मशीनी युग नाम दिया। अटल युग के बाद अब डिजिटल युग आ गया है, इंसान की चतुराई धरे रह गई है, झूठ को पकड़ने के लिए सच अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का रूप धारण कर आया है। शायद अब सच के नहीं, झूठ के परेशान होने के दिन आ गए हैं।।

मौसम की तरह सच झूठ का चोला पहनने वालों की अब खैर नहीं। जब झूठ के कपड़े उतारे जाते हैं, तब ही नंगा सच नजर आता है। अगर आपने सच में, सच का दामन थामा है, तो आपको झूठ और पाखंड से डरने की जरूरत नहीं।

सच के सौदागरों और ठेकेदारों की कमी नहीं आजकल। उनके बहकावे में आकर कोई झूठा सच्चा सौदा ना कर बैठें। आपके सच को संभालें, क्योंकि आज के डिजिटल सच को भी साइबर क्राइम का खतरा है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १६७ – देश-परदेश – चाय ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १६७ ☆ देश-परदेश – चाय ☆ श्री राकेश कुमार ☆

डोकरी की चाय हो या डोकरे की चाय, इस को बेचने वाले फुटकर दुकानों ने भी नए से नए नाम रख लिए हैं। गुलाबी नगर जयपुर में एक चाय की दुकान “आर ए एस चाय वाला” लिखा हुआ था, हमने उसके मालिक से पूछा इस का क्या तात्पर्य होता है ?

वो तुनक कर बोला “आई ए एस” चाय वाले  से जाकर पूछो ? उसकी दुकान पर अपनी मित्र मंडली के साथ चाय पीने का कार्यक्रम था। दुकानदार ने एक और बाण छोड़ दिया। कि ये “एम बी ए” चाय वाला ब्रांड अपनी फ्रेंचाइजी पूरे देश में खोल रहा हैं, हमारे नाम पर प्रश्न क्यों ?

चाय की छोटी छोटी दुकानों को भी अब नाम की क्यों आन पड़ी ? समय ही ऐसा चल पड़ा है, खाद्य वस्तुएं जैसे आटा, बेसन, चावल, सत्तू इत्यादि भी अब ब्रांड के टैग से विक्रय किए जा रहें हैं।

दिल्ली से जयपुर सड़क मार्ग पर एक दशक पूर्व तक अनेक चाय की गुमटियां हुआ करती थी, अब सब बंद हो चुकी हैं। एक कप चाय के लिए भी किसी बड़े ढाबे जो अब विशाल रूप लेकर बड़े बड़े होटलों को मात दे रहें है, से ही आपकी च्यास (चाय की तलब) पूरी हो सकती हैं।

स्पष्ट है, साधारण खाद्य वस्तुएं भी बड़े और कॉरपोरेट सेक्टर की झोली में जा चुकी हैं। इसी चक्कर में हमारी दो रुपए की चाय दस रुपए से पंद्रह की हो जाएगी।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९२५ ⇒ जल तत्व और प्रेम तत्व ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जल तत्व और प्रेम तत्व।)

?अभी अभी # ९२५ ⇒ आलेख – जल तत्व और प्रेम तत्व ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जल बिच मीन प्यासी, हमें सुन सुन हांसी भले ही न आए, लेकिन मछली के लिए जल ही जीवन है, यह तो मछली भी जानती है।

मत्स्यावतार हुआ तो क्या, जीव: जीवस्य भोजनं, जल से बाहर आते ही इस इंसान के लिए वह एक भोज्य पदार्थ बन जाती है। आप हमें तारो, हम आपको तारें।

पंच तत्व में जल तो पहले से ही मौजूद है। पृथ्वी पर भी तीन चौथाई जल ही है, फिर भी हमारी प्यास है कि कभी बुझती ही नहीं। गला अक्सर सूखता ही रहता है। प्यास तो हमारी पानी से भी बुझ सकती है लेकिन हमारी रसेंद्रियों का क्या करें, जो कभी फलों का रस तो कभी शहद की आस करती है। प्याले पर प्याले पी लिए, लेकिन अगर प्रेम पियाला नहीं पिया, तो क्या पीया। क्या है यह प्रेम तत्व और कहां से प्रकट होता है यह।।

तोरा मन बड़ा पापी सांवरिया रे।

मिलाए, छल बल से नजरिया रे।।

मन को चंद्रमा की तरह चंचल माना गया है। यह मन पापी ही नहीं, चोर भी है। एक बृजवासी कृष्ण हैं, जो चितचोर हैं, बांसुरी बजाते हैं, माखन चुराते हैं, ग्वाल बाल संग गईया चराते हैं, गोपियों संग रास रचाते हैं और इंद्र के कोप से, केवल उंगली के बल पर, लोगों को बचाकर गिरधारी कहलाते हैं। कभी कंस को मारते हैं तो कभी द्रौपदी की लाज बचाते हैं। विदुर का साग और सुदामा के चावल खाते हैं और सारथी बन अर्जुन का रथ हांकते हैं। क्या यह सबसे ऊंची प्रेम सगाई नहीं।

पानी रे पानी, तेरा रंग कैसा ? जवाब सभी जानते हैं। यही हाल प्रेम का है। प्रेम के भी हजार रंग हैं।

बस दृष्टि स्थूल नहीं, सूक्ष्म होनी चाहिए। हमारा प्रेम रिश्तों में बंट जाता है, माता पिता का प्रेम, भाई बहन का प्रेम, प्रेयसी, पत्नी, मित्र और पड़ोसी का प्रेम। जहां राग होता है, वहां द्वेष भी सिक्के के दूसरे पहलू की तरह प्रकट हो जाता है और प्रेम की वाट लग जाती है।।

हमने तुमको प्यार किया है जितना, कौन करेगा इतना। अगर वाकई इतना प्यार इस दुनिया में होता तो ये नफरत और बेवफाई तो शायद जन्म ही नहीं लेती।

क्यों इतने युद्ध होते, हिंसा होती, क्यों इतने अवतार होते। लगता है मनुष्य ने प्यार कर तो लिया, लेकिन प्यार का मतलब नहीं जाना।

प्रकृति बांटती है, समेटती नहीं ! पतझड़ हो या बहार, सर्दी, गर्मी और बरसात, प्रकृति सहनशील है, क्योंकि उसे वसुंधरा की गोद नसीब हुई है। वृक्ष फल देता है, खाता नहीं, नदियां अपना पानी नहीं पीती। बीज से वृक्ष बनता है, पर्यावरण की रक्षा करता है। प्रकृति देती ही देती है। इसीलिए प्रकृति में प्रेम है। कहने को हम भी प्रकृति प्रेमी हैं, पर्यावरण प्रेमी हैं।।

जल तत्व की तरह, आसानी से घुल मिल जाना ही प्रेम तत्व है। हमें तो गर्व है कि हमारे रोम रोम में राम है और हमारा मन हमेशा गंगा जमना और सरयू तीर जाने के लिए ही मचलता रहता है, तब तो जोत से जोत जलती रहनी चाहिए और हमारे देश में सतत, प्रेम की गंगा बहती रहनी चाहिए।

या तो हमारा हृदय इतना विशाल नहीं, या फिर प्रेम गली अति सांकरी। हम प्रेम में मीरा और राधा नहीं बनना चाहते। प्यास लगी तो पानी पी लिया, और प्यास बुझी तो ग्लास फेंक दिया। हमने कभी पानी का महत्त्व नहीं समझा, हम प्यार का मतलब क्या समझेंगे। जल और प्रेम जब एकरूप होता है, तब अंदर से प्रेम प्रकट होता है। वास्तविक प्रेम बंधनों को काटता है, जहर को अमृत बनाता है। मीरा जहर का प्याला पीकर भी यही कहती रहती है ;

अंसुवन जल सींचि सींचि

प्रेम बेली बाई।

अब तो बेलि फैल गई

आणंद फल होई।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३२५ – भाषाई अस्मिता ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३२४ भाषाई अस्मिता… ?☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

कुछ वर्ष पहले की घटना है। प्रश्नमंजूषा का एक कार्यक्रम चैनल पर चल रहा था। प्रश्न पूछा गया कि चौरानवे में से चौवन घटाने पर कितना शेष बचेगा? सुनने पर यह प्रश्न बहुत सरल लगता है पर प्रश्न के मूल में 94 – 54 = 40 है ही नहीं।  प्रश्न के मूल में है कि उत्तरकर्ता को चौरानवे और चौवन का अर्थ पता है या नहीं।

हमारी धरती पर हमारी ही भाषा के अंक और शब्द जिस तरह से निरंतर हमसे दूर हो रहे हैं, उनके चलते संभव है कि भविष्य में किसी प्रश्नमंजूषा में पूछा जाए कि माँ और बेटा साथ जा रहे हैं, बताओ कि उम्र में दोनों में कौन बड़ा है? प्रश्न बचकाना लग सकता है पर केवल उनको जिन्हें माँ और बेटा का अर्थ पता होगा। बाकियों को तो उत्तर से पहले इन शब्दों के परदेसी अर्थ क्रमश: ‘मदर’ और ‘सन’ तक पहुँचना होगा। कुछ मित्रों की दृष्टि में यह अतिश्योक्ति हो सकती है पर अतिश्योक्ति होते तो हम हर दिन देख रहे हैं।

आज, हमारी भाषाओं के अंकों का उच्चारण न केवल कठिन मान लिया गया है, बल्कि मज़ाक का विषय भी बनने लगा है। भविष्य में शब्द समाप्त होने लगेंगे.., लेकिन ठहरिए, समय अधिक नहीं है। भविष्य दहलीज़ पर खड़ा है। कुछ शब्द तो उसने वहाँ खड़े-खड़े ही गड़प लिए हैं। बकौल डेविड क्रिस्टल, ‘एक शब्द की मृत्यु, एक व्यक्ति की मृत्यु के समान है।’

प्रश्न है कि हमारी भाषाई संपदा की अकाल मृत्यु के लिए उत्तरदायी कौन है? क्या केवल  व्यवस्था पर इसका दोष मढ़ देना उचित है?  निश्चित ही व्यवस्था, विशेषकर शिक्षा के माध्यम का इसमें बड़ा हाथ है। तथापि लोकतांत्रिक व्यवस्था की इकाई नागरिक होता है। इकाई की भूमिका क्या है? अब यह बहाना न तलाशा जाय कि दिन भर रोज़ी-रोटी के लिए खटने के बाद समय और शक्ति कहाँ बचती है कि कुछ और किया जाय? समाचार, क्रिकेट, फिल्में, सोशल मीडिया, शेयर मार्केट, सीरियल, ओ.टी.टी. सबके लिए समय है पर अपनी भाषा की साँसें बचाये रखने के नाम पर विवशता का रोना है।

कहा गया है, ‘धारयेत इति धर्म:।’ अनेक घरों में अकादमिक शिक्षा के अलावा निजी स्तर पर अनिवार्य धार्मिक शिक्षा का प्रावधान है। क्या अपनी सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी भाषा और  मातृभाषा में बच्चों को पारंगत करना हमारा धर्म नहीं होना चाहिए?  इकाई यदि सुप्त होगी तो समुदाय भी सुप्त होगा और जो सुप्त है, उसका ह्रास और कालांतर में विनाश निश्चित है।

अपने पुत्रों की मृत्यु से आहत गांधारी ने महाभारत युद्ध की समाप्ति पर श्रीकृष्ण को श्राप दिया कि उनके वंश का नाश हो जाएगा। माधव सारी स्थितियों से भली-भाँति परिचित थे। बोले, ‘जैसे आशीष, वैसे आपका श्राप भी सिर-माथे पर।..हाँ एक बात है, आप श्राप देती या न देती, हम जिस प्रकार अपने कर्मों से दूर होकर सुप्त हुए जा रहे हैं, उसे देखते हुए उनका नाश तो यूँ भी निश्चित है।’

मुद्दा यही है। अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था का श्राप तो है ही, प्रश्न हमारी अपनी सुप्त अवस्था का भी  है। शब्दों का भाषा से दूर होते जाना एक तरह से भाषा का चीरहरण है। शनै: शनै: चीर और छोटा होता जाएगा। क्या हम भाषाई अस्मिता को इसी कुचक्र में फँसते देखना चाहते हैं?

अभी भी समय है। सामूहिक प्रयत्नों से हम सब मिलकर योगेश्वर की भूमिका में आ सकते हैं, ताकि चीर अपरिमित हो जाए और उतारने वालों के हाथ थक कर चूर हो जाएँ।

आइए साथ में जुटें। अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस है और आपकी भाषा को आपकी प्रतीक्षा है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 21 दिवसीय आशुतोष साधना रविवार दि. 8 फरवरी से शनिवार 28 फरवरी तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ भी करेंगे 💥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

💥 मालाजप शिव पंचाक्षर स्तोत्र के साथ आत्मपरिष्कार एवं मौन-साधना भी नियमित रूप से चलेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर- ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर- ? ?

आज अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस है। विभाजन के बाद पाकिस्तान ने उर्दू को अपनी राजभाषा घोषित किया था। पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) बांग्लाभाषी था। वहाँ छात्रों ने बांग्ला को द्वितीय राजभाषा का स्थान देने के लिए मोर्चा निकाला। बदले में उन्हें गोलियाँ मिली। इस घटना ने तूल पकड़ा। बाद में 1971 में भारत की सहायता से बांग्लादेश स्वतंत्र राष्ट्र बन गया।

1952 की इस घटना के परिप्रेक्ष्य में 1999 में यूनेस्को ने 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस घोषित किया।

आज का दिन हर भाषा के सम्मान , बहुभाषावाद एवं बहुसांस्कृतिक समन्वय के संकल्प के प्रति स्वयं को समर्पित करने का है।

मातृभाषा मनुष्य के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मातृभाषा की जड़ों में उस भूभाग की लोकसंस्कृति होती है। इस तरह भाषा के माध्यम से संस्कृति का जतन और प्रसार भी होता है। भारतेंदु जी के शब्दों में, ‘ निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल/ बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।’

हृदय के शूल को मिटाने के लिए हम मातृभाषा में आरंभिक शिक्षा की मांग और समर्थन सदैव करते रहे। आनंद की बात है कि करोड़ों भारतीयों की इस मांग और प्राकृतिक अधिकार को पहली बार भारत सरकार ने शिक्षानीति में सम्मिलित किया। राष्ट्रीय  शिक्षानीति-2020, आम भारतीय और भाषाविदों-भाषाप्रेमियों की इच्छा का प्रलेखन है। हम सबको इस नीति से  अपरिमित आशाएँ हैं। 

विश्वास है कि यह संकल्प दिवस, आनेवाले समय में सिद्धि दिवस के रूप में मनाया जाएगा। अपेक्षा है कि भारतीय भाषाओं के संवर्धन एवं प्रसार के लिए हम सब अखंड कार्य करते करें। सभी मित्रों को शुभकामनाएँ।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 21 दिवसीय आशुतोष साधना रविवार दि. 8 फरवरी से शनिवार 28 फरवरी तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ भी करेंगे 💥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

💥 मालाजप शिव पंचाक्षर स्तोत्र के साथ आत्मपरिष्कार एवं मौन-साधना भी नियमित रूप से चलेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९२३ ⇒ हठ – कड़ी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हठ – कड़ी।)

?अभी अभी # ९२३ ⇒ आलेख – हठ – कड़ी ? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

जो किसी अपराधी को हाथों में बांधी जाती है, वह हथकड़ी होती है। आज बँधी है, कल छूट जाएगी, हो सकता है, वह अपराधी न हो। और अगर हो भी तो सज़ा काटने के बाद रिहा भी हो सकता है। देश के लिए मर मिटने वालों के लिए क्या फाँसी और क्या हथकड़ी। फिल्मों और आजकल के टीवी सीरियल ने वैसे भी हथकड़ी को मज़ाक बना दिया है। एकता कपूर का ऐसा कोई सीरियल नहीं होगा, जिसमें नायक-नायिका ने हथकड़ी न पहनी हो, जेल न तोड़ी हो, और फाँसी के फंदे से वापस न आया हो।

हम इसीलिए हथकड़ी की नहीं हठ-कड़ी की बात कर रहे हैं। हठ एक रोग भी है, और योग भी। आज हम बाल-हठ, त्रिया-हठ और राज-हठ की चर्चा तो करेंगे ही, बाबा रामदेव के हठ-योग पर भी सर्च-लाइट डालेंगे।।

तो क्यों न त्रिया चरित्र के बजाय बाबा के हठयोग से ही शुरुआत की जाए। हठयोग प्रदीपिका के अनुसार ह (हकार) हमारी सूर्य नाड़ी अर्थात इड़ा है, और ठ (ठकार )चंद्र नाड़ी सुषुम्ना है। साधारण भाषा में प्राणायाम द्वारा सूर्य-चंद्र (उष्ण-शीतल)का सम अवस्था में सुषुम्ना में प्रवेश होता है, लेकिन अगर योग के नाम पर केवल कठिन आसन और स्वाभिमान यात्राएं ही निकाली जाएँ, तो वह केवल एक स्वदेशी हठ के नाम पर बाजारवाद फैलाना ही है, जिसका समय समय पर राजनैतिक फायदा वैसे ही उठाया जा सकता है, जैसा धर्म के नाम पर राजनीति में होता आया है। कबीर जिस इड़ा पिंगला सुषुम्ना की बात करते हैं, वही अध्यात्म है, वास्तविक हठ योग है।

हठ को आप ज़िद कह दें, जुनून कह दें, चाहें तो एक तरह का पागलपन कह दें। सभी प्रकार के हठ में बाल-हठ निर्दोष और मासूम होते हुए भी दिलचस्प और श्रेष्ठ है। बच्चों जैसी ज़िद कभी कभी बड़े-बूढ़े भी करते हैं, लेकिन अगर एक बार बच्चा ज़िद पर आ गया, तो आकाश पाताल एक कर देता है। वह केवल माँ की सूझ-बूझ ही होती है, जो बच्चे की ज़िद पूरी करने के लिए आसमान के चाँद को जल के थाल में उतरने के लिए मज़बूर कर देती है। बच्चे के पहाड़ जैसे हठ को एक छोटा सा खिलौना पल भर में समतल कर उसके मन को बहला सकता है।।

त्रिया हठ पर अधिक कहना उचित नहीं ! हम सब अपनी गृहस्थी लिए बैठे हैं। जो गुज़र रही है मुझ पर, उसे कैसे मैं बताऊँ। सबके अपने अपने किस्से हैं, अनुभव हैं। एक त्रिया का हठ हमने देखा, जब उसमें राजहठ भी शामिल हो गया। यानी करेला और नीम चढ़ा।

राज हठ में टके सेर भाजी और टके सेर खाजा बिकना कोई बड़ी बात नहीं ! जब यह राजहठ हिटलर बन जाता है तो दुनिया में तबाही खड़ी कर देता है। दुर्योधन के हठ और धृतराष्ट्र के पुत्रमोह के कारण अगर महाभारत हो सकता है, तो एक चाणक्य के अपमान के कारण समूचे नंद-वंश का संहार। यही हठ अगर नेताजी सुभाषचंद्र बोस को अंग्रेजों के खिलाफ आज़ाद हिंद फ़ौज़ खड़ी करने की हिम्मत देता है तो एक लाठी लंगोटी वाले को न केवल महात्मा का दर्ज़ा दिलवाता है, अपितु बँटवारे का दोषी भी करार दिया जाता है।

नमक सत्याग्रह और जेल भरो आंदोलन से क्या कभी किसी देश को आज़ादी मिली है। स्वदेशी भावना के लिए विदेशी कपड़ों की होली जैसी नौटँकी में अगर दम होता, तो बाबा रामदेव कब के गाँधीजी के अनुयायी हो जाते।।

गुलज़ार साहब ने एक गीत लिखा, चप्पा चप्पा चरखा चले ! उससे प्रेरित हो, एक बार मोदीजी ने चरखा चला भी दिया। लेकिन किसी ने प्रेरणा नहीं ली। जिस देश में गर्मी के मौसम में भी, गन्ने की चरखी को भी कोई नहीं पूछ रहा, वहाँ चरखे का क्या औचित्य ? अब गाँधी-भक्त मोदीजी डिजिटल चरखा लाने से तो रहे।

हथकड़ी तो इंसान को केवल एक अपराधी ही घोषित करती है, लेकिन हठ, एक ऐसी हथकड़ी है, जो इंसान खुद अपने हाथ से ही पहन लेता है। उसे हठधर्मिता कहते हैं। केवल अपना नुकसान तो ठीक, महापुरुषों का हठ तो देश के साथ भी खिलवाड़ कर गुजरता है। समझौता एक्सप्रेस भले ही न चलाएं, लेकिन जब हठ का मामला हो, थोड़ा ठहर जाएँ।

किसी का कहा मान जाएँ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares