श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अलाव से लगाव …“।)
अभी अभी # ८६० ⇒ आलेख – अलाव से लगाव
श्री प्रदीप शर्मा
अगर अंधेरा है तो अक्सर दीया जलाने की सलाह दी जाती है। सुना है, हमारे संगीत सम्राट तानसेन तो दीपक राग से ही दीपक रोशन कर लिया करते थे।
हमने प्रज्ञा चक्षु अष्ट छाप के महाकवि सूरदास के पद, एक और सुर सम्राट स्व.कुंदनलाल सहगल के स्वर में सुने हैं जिसके बोल कुछ इस प्रकार के हैं ;
दिन सूना सूरज बिना
और चन्दा बिन रैन।
घर सूना दीपक बिना
ज्योति बिन दो नैन। ।
जगमग जगमग,
जगमग जगमग,
दीया जलाओ,
दीया जलाओ …
जिस तरह दीपक अंधकार को दूर करता है, ठीक उसी तरह रात्रि में ठंड के मौसम में, किसी मैरिज गार्डन के मांगलिक जलसे में, लोहे की तगारियों में लकड़ियों से जलता हुआ एक अलाव कम परिधान में आकर्षण बिखेरते मेहमानों को ठंड और तीखी खुली हवा से राहत प्रदान करता है।
अलाव को तापा जाता है।
आजकल कहां घरों में लोगों को लकड़ी का चूल्हा और कच्चे कोयले की सिगड़ी नसीब होती है।
गर्मी में एअर कंडीशनर और ठंड में रूम हीटर भले ही तापमान को ठंडा गरम कर दें लेकिन ये उपकरण हमें प्राकृतिक वातावरण से दूर ले जाते हैं। सुहानी सुबह और सुहानी शाम तो वही है जो खुले आसमान के नीचे है। ।
ठंड के मौसम में दिन में गर्मी का इंतजाम तो मिस्टर Sun of Universe यानी सूर्यनारायण, हमें धूप स्नान करवाकर, कर ही देते हैं, लेकिन दिसंबर और जनवरी की सर्द रातें तो घर में कंबल और रजाई, और घर से बाहर, तो जलते हुए अलाव से ही काटी जा सकती हैं।
ठंड के मौसम में, शादियों की सारी रौनक रात की ही तो होती है। शहर से जितनी दूर, उतना ही शानदार विवाह स्थल और शादी के मुख्य दो आकर्षण, डीजे के शोर में चूर, महिला संगीत और छप्पन प्रकार के व्यंजन सहित प्रीतिभोज ! खुले में खड़े खड़े खाने की खुली स्पर्धा। ।
भोजन की गर्मी भी कहां ठंड का इलाज है, इसलिए खुले आसमान के नीचे अलाव जलाये जाते हैं, शरीर को ताप मिले, इसलिए अलाव के पास बैठकर तापा जाता है। कितना सुखद तप है यह अलाव तापना।
लोग खसक खसक कर अलाव के करीब आते जा रहे हैं। अलाव की गर्मी अनजान रिश्तों को आपस में जोड़ रही है। एक सांझा सुख, जो सिर्फ महसूस किया जा सकता है। बच्चे, बूढ़े, जवान, स्त्री पुरुष, नहीं कोई अलगाव, जब तक जल रहा अलाव। ।
मुझे न तो गर्मागर्म जलेबी आकर्षित करती है और न ही मटर पुलाव, अलाव मेरा प्रिय मन बहलाव है।
पुलाव तो शरीर का भोजन है और अलाव आत्मा का ! क्या करूं, पेट ही नहीं भरता। खाते हुए इंसान इतना निश्चिंत नजर नहीं आता, जितना तापते वक्त आता है। गर्म ठंडी होती आंच, बीच में उठता हुआ धुआं, हमें कभी अलाव के करीब लाता है तो कभी थोड़ा दूर कर देता है।
एक उम्र में स्काउट के दिनों में कैंपफायर होता था, अनजान, वीरान, सुनसान जगहों पर। आजकल शहर से दूर, ठंडी रातों में, गर्मी समेटने का अगर आनंद लेना है, तो अलाव जलाएं, यकीन मानिए गर्मजोशी के साथ गर्मी और आप जागते भी रहेंगे। अलाव में कोई नहीं ऊंघता। अलाव शरीर ही नहीं, आत्मा का भी जागरण है। ।
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈














