हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८६० ⇒ अलाव से लगाव  ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अलाव से लगाव ।)

?अभी अभी # ८६० ⇒ आलेख – अलाव से लगाव  ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अगर अंधेरा है तो अक्सर दीया जलाने की सलाह दी जाती है। सुना है, हमारे संगीत सम्राट तानसेन तो दीपक राग से ही दीपक रोशन कर लिया करते थे।

हमने प्रज्ञा चक्षु अष्ट छाप के महाकवि सूरदास के पद, एक और सुर सम्राट स्व.कुंदनलाल सहगल के स्वर में सुने हैं जिसके बोल कुछ इस प्रकार के हैं ;

दिन सूना सूरज बिना

और चन्दा बिन रैन।

घर सूना दीपक बिना

ज्योति बिन दो नैन। ।

जगमग जगमग,

जगमग जगमग,

दीया जलाओ,

दीया जलाओ … 

जिस तरह दीपक अंधकार को दूर करता है, ठीक उसी तरह रात्रि में ठंड के मौसम में, किसी मैरिज गार्डन के मांगलिक जलसे में, लोहे की तगारियों में लकड़ियों से जलता हुआ एक अलाव कम परिधान में आकर्षण बिखेरते मेहमानों को ठंड और तीखी खुली हवा से राहत प्रदान करता है।

अलाव को तापा जाता है।

आजकल कहां घरों में लोगों को लकड़ी का चूल्हा और कच्चे कोयले की सिगड़ी नसीब होती है।

गर्मी में एअर कंडीशनर और ठंड में रूम हीटर भले ही तापमान को ठंडा गरम कर दें लेकिन ये उपकरण हमें प्राकृतिक वातावरण से दूर ले जाते हैं। सुहानी सुबह और सुहानी शाम तो वही है जो खुले आसमान के नीचे है। ।

ठंड के मौसम में दिन में गर्मी का इंतजाम तो मिस्टर Sun of Universe यानी सूर्यनारायण, हमें धूप स्नान करवाकर, कर ही देते हैं, लेकिन दिसंबर और जनवरी की सर्द रातें तो घर में कंबल और रजाई, और घर से बाहर, तो जलते हुए अलाव से ही काटी जा सकती हैं।

ठंड के मौसम में, शादियों की सारी रौनक रात की ही तो होती है। शहर से जितनी दूर, उतना ही शानदार विवाह स्थल और शादी के मुख्य दो आकर्षण, डीजे के शोर में चूर, महिला संगीत और छप्पन प्रकार के व्यंजन सहित प्रीतिभोज ! खुले में खड़े खड़े खाने की खुली स्पर्धा। ।

भोजन की गर्मी भी कहां ठंड का इलाज है, इसलिए खुले आसमान के नीचे अलाव जलाये जाते हैं, शरीर को ताप मिले, इसलिए अलाव के पास बैठकर तापा जाता है। कितना सुखद तप है यह अलाव तापना।

लोग खसक खसक कर अलाव के करीब आते जा रहे हैं। अलाव की गर्मी अनजान रिश्तों को आपस में जोड़ रही है। एक सांझा सुख, जो सिर्फ महसूस किया जा सकता है। बच्चे, बूढ़े, जवान, स्त्री पुरुष, नहीं कोई अलगाव, जब तक जल रहा अलाव। ।

मुझे न तो गर्मागर्म जलेबी आकर्षित करती है और न ही मटर पुलाव, अलाव मेरा प्रिय मन बहलाव है।

पुलाव तो शरीर का भोजन है और अलाव आत्मा का ! क्या करूं, पेट ही नहीं भरता। खाते हुए इंसान इतना निश्चिंत नजर नहीं आता, जितना तापते वक्त आता है। गर्म ठंडी होती आंच, बीच में उठता हुआ धुआं, हमें कभी अलाव के करीब लाता है तो कभी थोड़ा दूर कर देता है।

एक उम्र में स्काउट के दिनों में कैंपफायर होता था, अनजान, वीरान, सुनसान जगहों पर। आजकल शहर से दूर, ठंडी रातों में, गर्मी समेटने का अगर आनंद लेना है, तो अलाव जलाएं, यकीन मानिए गर्मजोशी के साथ गर्मी और आप जागते भी रहेंगे। अलाव में कोई नहीं ऊंघता। अलाव शरीर ही नहीं, आत्मा का भी जागरण है। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३८९ ☆ आलेख – “स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी : वैश्विक स्वतंत्रता की प्रतीकात्मक मूर्ति” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८९ ☆

?  आलेख – स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी : वैश्विक स्वतंत्रता की प्रतीकात्मक मूर्ति ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

स्वतंत्रता का कोई  आकार नहीं होता, पर जब वह न्यूयॉर्क हार्बर के मध्य लिबर्टी द्वीप पर अथाह जलधारा के बीच खड़ी हो कर हवाओं से बातें करती है तो वह एक वैश्विक जीवंत प्रतीक बन जाती है। स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी अर्थात “लिबर्टी इनलाईटिंग द वर्ल्ड” की कहानी फ्रांस द्वारा वर्ष 1886 में अमेरिका को भेंट किया गया विचारों, संघर्षों और दोस्ती की उस स्वतंत्र यात्रा की प्रतीकात्मक भेंट  है जो मनुष्य को मनुष्यता के पथ पर चलने की राह दिखाती है।

फ्रांस में बैठे बुद्धिजीवियों ने जब उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में यह सोचा कि अमेरिका को एक ऐसी भेंट दी जाए जो आज़ादी और मानव गरिमा की आकांक्षा को व्यक्त कर सके, तब शायद उन्होंने भी कल्पना न की होगी कि यह प्रतिमा एक दिन पूरी दुनिया में  अमेरिका का भावनात्मक प्रतीक बन जाएगी। यह प्रतिमा रोमन देवी लिबर्टस से प्रेरित है। मूर्ति के हाथों में अमेरिका की स्वतंत्रता ,  4 जुलाई 1776 की तारीख की तख्ती है । फ्रांस ने अमेरिकन क्रांति में दोस्ती के प्रतीक स्वरूप  इसे अमेरिका को भेंट किया था। 28 अक्टूबर 1886 को इस स्मारक का उद्घाटन हुआ था। स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी की मूर्ति 151 फीट ऊंची है। पैडस्टल सहित स्मारक की कुल ऊंचाई 305 फीट है। तांबे की आवरण परत के कारण ऑक्सीडेशन से इसका रंग हरा पड़ गया है।1984 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर घोषित किया था।

फ्रांसीसी विचारक और सहयोगियों ने आज़ादी और मानवाधिकारों का संदेश देती  विराट प्रतिमा का विचार रखा और मूर्तिकार बार्थोल्डी ने उसे रूप देना शुरू किया। यह मूर्ति कठोर सम्मिश्रित धातु की चादरों से गढ़ी गई, पर इसमें मानवीय भावनाओं का भावनात्मक ताप भी भरा हुआ था। इसके भीतर का ढांचा इंजीनियरों की बुद्धिमत्ता का प्रमाण है, जिसने इसे समुद्री हवाओं की मार से भी सुरक्षित रखा हुआ है। यह प्रतिमा अपने आप में कला और विज्ञान का संगम था, जैसे किसी छंद में पिरोई सुंदर कविता के पीछे पंक्तियों में छिपा  गणित ।

जब प्रतिमा आकार ले रही थी, तब उसे अमेरिका में खड़े करने के लिये मजबूत पेडेस्टल बनाने की ज़िम्मेदारी अमेरिकी जनता ने उठाई। फंड जुटाने के अनगिनत प्रयास हुए, नाटकों से लेकर प्रदर्शनियों तक, व्यापक जन भागीदारी हुई और अंततः यह सहयोग दोनों देशों की आम जनता की मित्रता की एक अनूठी मिसाल बन गया। तैयार प्रतिमा सैकड़ों टुकड़ों में  समुद्र पार भेजी गई और जब वह न्यूयॉर्क पहुंची, तब लोगों ने उसे सिर्फ धातु का ढांचा नहीं, एक उम्मीद का पैगाम समझ दिल से उसका स्वागत किया। पेडेस्टल पूरा होते ही , स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी खड़ी की गई और उसकी ऊंचाई आसमान को छूते हुए मनुष्य की वैश्विक स्वतंत्रता की मुखर नैसर्गिक आकांक्षा का स्थायी स्मारक बन गई। जिस दिन इसका लोकार्पण हुआ, उस दिन यह तय हो गया कि यह प्रतिमा सिर्फ अमेरिका की नहीं, उन सबकी अभिव्यक्ति का भाव है जो प्रगति और  स्वतंत्रता में विश्वास रखते हैं।

स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी के हर हिस्से की अपनी प्रतीकात्मक भाषा है।  हाथों में  मशाल एक राह दिखाती है जो तमाम अंधेरों को पीछे छोड़ कर प्रकाश की ओर चलने की प्रेरणा देती है। दूसरी भुजा में टेढ़े मेढ़े रास्तों का संक्षेप है, जिस पर तख्ती में अमेरिकन क्रांति की वह तिथि अंकित है जब मनुष्यों ने यह घोषित किया था कि किसी भी शासन से ऊपर मानव की स्वतंत्र इच्छा है। उसके चरणों के समीप टूटी जंजीरें इस बात की गवाही देती हैं कि गुलामी चाहे कितनी भी पुरानी क्यों न हो, उसे तोड़ने का साहस एक दिन जरूर जागता है। यही साहस इस प्रतिमा को वैचारिक रूप से उसकी ऊंचाई से भी ऊंचा स्थान देता है।

बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों में जब लाखों प्रवासी समुद्र पार कर अमेरिका की ओर चले, तब यह प्रतिमा उनके लिये खुले सपनों की पहली झलक थी जिसने दिल को आश्वस्त किया कि वे एक नए वैश्विक स्वतंत्र अध्याय की रचना करने बढ़ रहे हैं। अनगिनत आंखों ने इसे देखा और अपनी उम्मीदों को इसके साथ जोड़ लिया। यही वह क्षण है जब यह प्रतिमा मनुष्य के सामूहिक सपने की प्रहरी बन गई। आगे चलकर इसे राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा मिला और समय समय पर इसके संवर्द्धन होते रहे, पर इसके अर्थ की भावनात्मक ऊंचाई कभी नहीं घटी।

आज जब आधुनिक दुनिया की जटिलताएं बढ़ रही हैं, तब भी स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी अपनी जगह पर अडिग खड़ी है और मानवता को याद दिलाती  है कि स्वतंत्रता किसी राष्ट्र की नहीं, पूरी मानव जाति की प्राकृतिक आवश्यकता है। वह सिखाती है कि अधिकार सिर्फ मिलते नहीं, उनकी रक्षा भी करनी पड़ती है। वह यह भी याद दिलाती है कि आज़ादी का कोई अंत नहीं, उसका सफर हमेशा चलता रहता है।

समुद्र की लहरें उसके पांवों से टकराती हैं, हवाएं उसकी मशाल को छूकर आगे निकल जाती हैं, पर वह डगमगाती नहीं। उसे पता है कि वह केवल तांबे और लोहे का ढांचा नहीं, बल्कि मनुष्य की आंतरिक शक्ति का जीवंत रूप है। इसी कारण हर आने वाला युग हर नई पीढ़ी उसे अपने संदर्भ में पढ़ती है और हर देखने वाली आंख उसके अर्थ को अपने अंतस में खोजती है। यही स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी की असली महानता है कि वह स्मारक होकर भी जीवित है और प्रतीक होकर भी मनुष्य के दिल की धड़कनों से बात करती है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी के निहित संदेश और भी प्रासंगिक हो चले हैं।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

न्यूयॉर्क से

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८५९ ⇒ गुरुत्वाकर्षण ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गुरुत्वाकर्षण।)

?अभी अभी # ८५९ ⇒ आलेख – गुरुत्वाकर्षण ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

 ✓ GRAVITY ✓

हम यहां गुरुत्वाकर्षण के सैद्धांतिक अथवा वैज्ञानिक पक्ष की जगह सिर्फ गुरुत्व और आकर्षण पर ही अपना ध्यान केंद्रित करेंगे।

Gravity का g किसी के लिए God, तो किसी के लिए गुरु अथवा किसी के लिए यह जमीन भी हो सकती है, जिसे हम पृथ्वी अथवा earth कहते हैं।

कवि और वैज्ञानिक में अंतर होता है। विज्ञान खोज और आविष्कार में विश्वास करता है, उसकी खोज सत्य की खोज होती है। जब कि कवि की उड़ान तो रवि से भी ऊपर की होती है। दुष्यंतकुमार जब एक पत्थर तबीयत से आसमान में उछालते हैं तो गुरुत्वाकर्षण बीच में नहीं आता, कवि के लिए आसमान ही थोड़ा नीचे आ जाता है और आसमान में सूराख हो जाता है और पत्थर वापस जमीन पर आ जाता है।।

सृष्टि पर किसका शासन है और किसका अनुशासन है, कोई नहीं जानता। यह कैसा आकर्षण है कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और चंद्रमा पृथ्वी की। सौरमंडल में भी यही परिक्रमा का चक्कर है। ग्रह नक्षत्र हों अथवा हमारे लिए टिमटिमाते तारे, ज्योतिष और खगोल शास्त्र के अनुसार उनका अस्तित्व और क्रियाशीलता का आधार अमूर्त, अस्पष्ट और मानवीय समझ से परे है। बस एक शब्द है manifestation जिसे आप चाहें तो प्रकट अथवा प्रकाशित कह सकते हैं।

हमारे सर पर आसमान है, चांद सितारे हैं। नवग्रहों को हम देवता मानते हैं, सौरमंडल की तरह पूजा और हवन में उनका भी मंडल स्थापित होता है। हम वहां तक पहुंचे अथवा ना पहुंचे, हमारे जीवन में उनका प्रवेश अप्रत्यक्ष रूप से तो है ही। क्या यह प्रभाव आकर्षण नहीं।।

इस धरा में ऐसा क्या आकर्षण है कि देवता भी यहां मानव जन्म पाने के लिए तरसते हैं। यही गुरुत्व ही तो वह गुरु तत्व है, ईश्वर तत्व है जो हर जीव के आ#e-abhivyaktiकर्षण का केंद्र है। कहीं आकर्षण है तो कहीं चुंबकीय प्रभाव। एक पक्षी केवल अपने पंखों के सहारे गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव के विपरीत आसमान में उड़ लेता है, विज्ञान उसे गुरु मान वायुयान में पंख लगा लेता है और इंसान भी हवा में उड़ने लग जाता है।

मनुष्य के पंख भले ही नहीं हों, उसकी कल्पना और इच्छा शक्ति की उड़ान की कोई सीमा नहीं। उसकी प्रकृति के छुपे हुए रहस्यों को जानने की प्रवृत्ति और जिज्ञासा कभी शांत नहीं होती। अपने से बेहतर के प्रति लगाव और आस्था ही, अपने से गुरु के प्रति आकर्षण है।।

महर्षि अरविंद ने जिस महामानव की कल्पना की है वह कोई superman नहीं, superhuman है और वह और कोई नहीं हमारा आत्म गुरु ही है।

गुर से ही गुरु शब्द अस्तित्व में आया है। शायद इसीलिए गुरु अथवा ईश्वर के प्रति हमारा स्वाभाविक रूप से आकर्षण होता है। जिस तरह यह पवित्र धरा अपने गुणों के कारण देवताओं को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेती है हम भी गुरुत्व अर्थात् अच्छाई की ओर आकर्षित हों।

गुण के गाहक सहस नर, यूं ही नहीं कहा किसी ने।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ आनंद ही आनंद ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट (लाफ्टर योगा मास्टर ट्रेनर) ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌱 आनंद ही आनंद 🌷

सर्दियों में आलस्य स्वाभाविक है।

रजाई से बाहर निकलने का जी ही नहीं करता! लेकिन सुबह उठकर, सैर– morning walk पर निकल जाना ही उत्तम है।

सूर्योदय के आसपास, खुली सड़क पर या किसी पार्क में टहलने के लिए निकल पड़ें, धीमे-धीमे थोड़ी दौड़ लगाएं– jogging, थोड़ा व्यायाम करें– stretching and bending, प्राणायाम करें, और कुछ मिनिट ध्यान– meditation के लिए बैठ जाएं।

घर वापस लौटकर अदरक, निंबू और शहद की चाय– ginger-lemon-honey tea बनाएं। इसके लिए, अदरक को पानी में उबाल लें, थोड़ा ठंडा कर उसमें कुछ बूंद निंबू निचोड़ें और शहद मिलाकर सेवन करें।

नतीजा– उत्तम स्वास्थ्य, भरपूर vitamin D, पूरी immunity और दिन भर आनंद ही आनंद!

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १५७ – देश-परदेश – वकील दिवस: 3 दिसंबर ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १५७ ☆ देश-परदेश – वकील दिवस: 3 दिसंबर ☆ श्री राकेश कुमार ☆

देश के प्रथम राष्ट्रपति स्वर्गीय श्री राजेंद्र प्रसाद जी के जन्मदिवस को अधिवक्ता दिवस के रूप में मनाया जाता है। साधारण भाषा में अधिवक्ता को वकील कह कर संबोधित किया जाता हैं। कानून के हाथ लंबे होते हैं, कानून अंधा होता है, जैसी अनेक किवदंतियां वकीलों से जुड़ी हुई हैं।

वकीलों से बच कर रहना चाहिए कहने वाले तो यहां तक ज्ञान देते हैं, कि वादी और परिवादी वकील के द्वारा कोर्ट में इतने पैसे खर्चवा देते है, उससे अच्छा तो दोनों पक्ष अपनी अपनी पूंजी लेकर जलती हुई आग के समक्ष बैठ कर करेंसी नोट जलाते जाएं, जिसके पैसे पहले समाप्त हो जाए, वो पक्ष हारा हुआ कहलाएगा।

लोग वकील के घर के पास घर भी नहीं लेना चाहते है, डरते हैं, कोई ना कोई झगड़ने का मुद्दा बन जाएगा इसलिए वकीलों के घर के पास प्रॉपर्टी अपेक्षाकृत सस्ती उपलब्ध रहती हैं।

कानून की डिग्री वाले वकीलों के अलावा भी अनेक प्रकार के वकीलों का सामना जीवन में हुआ हैं। मोहल्ले या परिवार के झगड़े सलटाने वाले भी हमारे समाज में पाए जाते हैं।

कार्यालय में कुछ लोग बात बात पर नियम की बात करते हैं, तो लोग उनको भी वकील की संज्ञा से नवाज़ देते हैं। इस प्रकार के लोगों से लोग दूरी बनाना उचित समझते हैं।

दो बिल्लियों की रोटी के एक टुकड़े को लेकर लड़ाई को बंदर वकील सलटा देता है, वाली पुरानी कहानी हम सब ने बचपन में खूब सुनी थीं।

वर्तमान में तो वकील पुलिस तक को डराते हैं। किसी वकील के साथ दुर्घटना हो या किसी वकील ने आपकी गाड़ी को टक्कर भी मारी हो, वकील संगठित होकर सड़कों पर उतर आते हैं।

वकील का पेशा कभी बहुत सम्मानित पेशा होता था, वर्तमान में लोग उनका सम्मान भय के कारण ही करते हैं। न्याय प्रणाली और हमारे न्यायधीश भी इस सब के लिए उतने ही जिम्मेवार है जितने हमारे वकील लोग हैं।

देश के कुछ वकीलों ने समाज के लिए बहुत अच्छा कार्य भी किया है। राष्ट्रीय मुद्दे और गरीबों के लिए भी समय समय पर वकीलों ने पूर्व में बहुत सारे कार्य भी किए गए हैं, जिनको भुलाया नहीं जा सकता हैं।

अब लेखनी को विराम देता हूं, वर्ना आप लोग कहेंगे वकीलों की बहुत वकालत कर रहा हूं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८५८ ⇒ भस्मासुर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतिम साँसें।)

?अभी अभी # ८५८ ⇒ आलेख – अंतिम साँसें ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

वह असुर जो उसे ही भस्म कर दे, जो उसे भस्म करने का वरदान दे, भस्मासुर कहलाता है। ये असुर भी बड़े जीवट हीते हैं !मनचाहा वरदान पाने के लिए कठिन तप, साधना और इष्ट की भक्ति किया करते हैं। और इनके आराध्य देव इतने भोले होते हैं कि इन पर प्रसन्न हो ही जाते हैं।

समय के साथ असुरों ने समझौता कर लिया। अवतारों का जन्म केवल असुरों का नाश करने के लिए होता है। अब कलयुग में केवल एक कल्कि अवतार बचा है। अवतारों का स्टॉक अब खत्म। अब आप ही अवतार पैदा करो। अब एंड्राइड फ़ोन की तरह हाड़ माँस के इंसान में ही भगवान ने असुर, दैत्य, राक्षस, डाकू, और शैतान का app डाल दिया है।

सब इंसान ऊपर से एक जैसे हैं, किसी में साधु विराजमान है, तो किसी में शैतान। ।

इंसान हो या शैतान, भगवान के बिना किसी का काम नहीं चलता। किसी के गुरु द्रोणाचार्य होते हैं, तो किसी के शुक्राचार्य ! ईश्वर की भक्ति के बिना शक्ति, दिव्यास्त्र और वरदान प्राप्त नहीं होते। दैत्य उनका दुरुपयोग करते हैं, और देवता, सदुपयोग।

कहते हैं, कलयुग सोने के साथ पृथ्वी पर आया। सोने का मुकुट प्रिवीपर्स चबा गया, एक ले-देकर कुर्सी बची, जो आज भी लोकतंत्र की लाज रख रही है। एक लोकसेवक को कुर्सी पर पाँच वर्ष बैठने का अधिकार है, और अफसर को उससे कई गुना अधिक। एक लोक-सेवक को कुर्सी पर 18-18 घंटे जागते रहना पड़ता है। कहीं कुर्सी छिन न जाए। ससुरी कुर्सी नहीं, चौकीदारी हो गई। ।

भरत की यह भूमि भारतवर्ष कभी असुरों से मुक्त नहीं रही !

यह देश जो कभी सोने की चिड़िया रहा, जहाँ घी-दूध की नदियां बहीं, वहीं महाभारत भी हुआ, खून की नदियाँ भी वहीं।

पहले मुगल, फिर अंग्रेज़ भी आए, और बाद में आज़ादी के बाद सफेदपोश लुटेरे भी आए।

लोकतंत्र में जनता भगवान हो गई और नेता कस्मों-वादों से उसे लुभाने लगे। जनता जिस पर प्रसन्न हुई, उसे सिंहासन सौंप दिया। अब कोई कंस और रावण निकल जाए, तो जनता क्या करे। जनता का चुना हुआ, जनता को ही खा जाए, तो क्या वह भस्मासुर नहीं हुआ। ।

लग रहा था कि कांग्रेस रूपी भस्मासुर का अंत निकट है, लेकिन किसी ने चिराग घिस दिया, और राहुल गाँधी अलादीन का चिराग लेकर फिर उपस्थित हो गए। अब बोलिये, क्या हुक्म है आका ?

जनता शिवजी की ओर देख रही है ! कौन भस्मासुर और कौन अलादीन, अब फैसला शंकर का तीसरा नेत्र ही करेगा। अगला वर्ष मंगलमय हो। ।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१५ ☆ आलेख – विश्वग्राम के नागरिक (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय आलेख – ‘विश्वग्राम के नागरिक (वैचारिकी) ‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३१५ ☆

☆ आलेख ☆ विश्वग्राम के नागरिक (वैचारिकी)

आज के अखबार में पढ़ने को मिला कि भारत की पवित्र भूमि को त्याग कर लगभग 2 लाख नागरिक हर वर्ष विदेश में बस रहे हैं। पिछले 5 सालों में 9 लाख नागरिकों ने भारत की नागरिकता छोड़ी। पढ़कर आश्चर्य हुआ। जहां हम ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ गाते थकते नहीं हैं, वहां इस देश की तरफ बेरुखी से मुंह फेर लेने वाले कौन हैं?

देश छोड़ने की वजहें ढूंढ़ें तो अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान जैसे देशों में रहन-सहन का बेहतर स्तर, बेहतर कमाई की बात समझ में आती है। कुछ देशों को लोग टैक्स से बचने के लिए जाते हैं। ऐसे कम टैक्स वाले देशों को ‘टैक्स हेविन’ कहा जाता है। अभी प्रदूषण के कारण दिल्ली के 80% लोग दिल्ली छोड़ने की सोच रहे हैं। इनमें से कितने विदेश उड़ जाएंगे और कितने भारत में ही कोई अन्य शहर ढूंढ़ेंगे कह पाना मुश्किल है।

कुछ चतुर लोग देश के बैंकों से भारी भरकम कर्ज़ लेकर विदेश पलायन कर गये और वहां सुखी जीवन जी रहे हैं। सामान्य आदमी यही समझने में लगा है कि उनके कर्ज की रकम के 9 हजार करोड़ या 12 हजार करोड़ होते कितने हैं और इसके लिए 9 या 12 में कितने ज़ीरो लगते हैं। यह समझना भी मुश्किल है कि इतना रुपया देश से निकलने पर संबंधित बैंकों की स्थिति पर क्या फर्क पड़ा है।

जो भी हो, देश छोड़कर जाने की कूवत उन्हीं में होती है जिन पर लक्ष्मी की पर्याप्त कृपा होती है। पक्षियों की तरह इनके लिए भी कोई बॉर्डर नहीं होता। ये विश्व नागरिक होते हैं। इनके लिए कोई गंदगी, कोई प्रदूषण नहीं होता। ये जहां भी जाते हैं वहां बैठकर खिड़की से बाहर प्रकृति की सुषमा निहार कर ‘सुजलां, सुफलां, मलयज शीतलां’ का आनंद लेते हैं।

इसके विपरीत देश का सामान्य आदमी मिलावट वाली चीज़ों का उपयोग करने और बाढ़, प्रदूषण झेल कर ‘जीना यहां, मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां’ की स्थिति को झेलता है। ऐसे में यदि आदमी कमाई के लिए अनैतिक तरीकों का उपयोग करे तो उसे कैसे रोका जाए?

यह भी पढ़ा कि दुनिया के धनी लोग धीरे-धीरे सभी संस्थाओं पर हावी होते जाते हैं। सारे नियम कायदे उनकी सुविधा के हिसाब से बदल जाते हैं। उन पर कोई कानून काम नहीं करता। इस संबंध में तुलसीदास जी की चौपाई ‘समरथ को नहिं दोस गुसाईं’ इन पर खूब फिट बैठती है।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३१५ – पहाड़ के पार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३१५ पहाड़ के पार… ?

‘पहाड़ के पार एक एक राक्षस रहता है। उसकी सीमा में प्रवेश करने वालों को वह खा जाता है।’ बचपन में सुनी कहानियों में प्रायः इस राक्षस का उल्लेख मिलता है। बालमन यों भी कच्चा होता है। जो उकेरा गया, वह अंकित हो गया। यह अंकित डर जीवनभर पहाड़ लांघने नहीं देता।

मज़े की बात यह है कि पहाड़ के उस पार रहने वालों के बीच, इस पार के राक्षस के किस्से हैं। इस पार हो या उस पार, पार उतरने वाले नगण्य ही होते हैं।

पहाड़ भौगोलिक संरचना भर है। जलवायु को अधिनियमित करने और प्रकृति के संतुलन के लिए पहाड़ होना चाहिए, सो है। पहाड़ को पार किया जा सकता है। थोड़ा अपभ्रंश का सहारा लिया जाए तो पहाड़, पहार, पार…! जिन्हें पार किया जा सकता है, वे ही पहाड़ हैं। ये बात अलग है कि पृथ्वी पर के पहाड़ों की सफल चढ़ाई करनेवालों में भी बिरले ही हैं जो मन का पहाड़ पार कर पाए हों।

मन के पहाड़ कई प्रकार के होते हैं। वर्जना से ग्रस्त, लांछना से भयभीत। वर्जना और लांछना, वांछना से दूर करते हैं। परिणामस्वरूप खंडित व्यक्तित्व जन्म लेने लगता है।

किसी कार्य के संदर्भ में एक उपासिका से मिलने गया। वे प्रवचन कर रही थीं। प्रवचन उपरांत चर्चा हुई। कुछ पृष्ठ मैंने उन्हें दिये। पृष्ठ देते समय उनकी अंगुली से स्पर्श हो गया होगा। मुझे तो पता भी नहीं चला पर वे असहज हो उठीं। सहज होने में कुछ समय लगा। पता चला कि पंथ के नियमानुसार उपासिका के लिए पुरुष का स्पर्श वर्जित है।

सत्य तो यह है कि स्त्री या पुरुष का क्रमशः पुरुष या स्त्री से स्पर्श एक विशिष्ट भाव जगाता है, यह वर्जना उनके अभ्यास में कूट-कूट कर भर दी गई थी। धर्म के पथ पर जिस ईश्वर की आराधना की जा रही है, अधिकांश पंथों में वह पुरुष देहाकार ही है। पुरुष होना दैहिक रचना है, पिता, भाई, मामा, चाचा, ताऊ, दादा, नाना, पुत्र या पति होना आत्मिक भाव है। स्पर्श के पार का राक्षस उपासिका के मन में बसा दिया गया था। फलतः उनके चेहरे पर कुछ देर असहजता छलकी था।

मनुष्य का सामर्थ्य अपार है, बस वह पार जाने का मन बना ले। साथ चाहिए तो एक समर्थ मित्र, गुरु या मार्गदर्शक चुने। मार्गदर्शक भी ऐसा जो आगे नहीं, साथ चले। जिसके सानिध्य में एक निश्चित दूरी के बाद पथिक को भी मार्ग का दर्शन होने लगे। मार्गदर्शन होने लगे तो पहाड़ के पार जाना कौनसा पहाड़-सा काम है!

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८५७ ⇒ मैं तो तर गयो ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मैं तो तर गयो।)

?अभी अभी # ८५७ ⇒ आलेख – मैं तो तर गयो ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

देशभक्ति क्या होती है, हम इंदौरी नहीं जानते। कोई उधौ हमें ज्ञान न सिखाए। हमारे लिए इंदौर ही देश है, आप चाहो तो हमें कूप मंडूक कह लो, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि हमारा कुआं अब इतना विशाल हो गया है कि अब आप इसे स्मार्ट कुआं भी कह सकते हैं।

मध्यप्रदेश के भी मध्य में, दो ज्योतिर्लिंगों के बीच स्थित यह इंदौर मेरी जान है, जान है, शान है। आज भी कई जूनी इंदौरी, इंदौर छोड़कर विदेश तो क्या, स्वर्ग में जाना भी पसंद नहीं करते। उनके लिए तो इंदौर ही हमी अस्तो, हमी अस्तो है।।

स्वच्छता की हैट्रिक तो खैर अपनी जगह है, हमें तो स्वच्छता के छक्के जड़ना भी आता है। शुरू से ही, अपने शहर पर हमें नाज़ है। जैसा भी है, मेरा इंदौर, मेरा इंदौर है। इसे हम मेरा नहीं, अपना इंदौर कहते हैं, जैसे आप अपने बच्चे के बारे में शान से कहते हो, यह अपना बच्चा है।

शहर की छोटी मोटी उपलब्धि पर खुश होना, हमारी आदत में शुमार है। लता मंगेशकर से लेकर राहत इंदौरी तक के नाम हमें बहुत राहत देते हैं, क्योंकि ये इंदौर से जुड़े हैं। देवी अहिल्या तो हमारी माता है। तुकोजीराव और यशवंतराव के नाम पर इंदौर में क्या क्या नहीं है। एम् वाय अस्पताल और एम टी क्लॉथ मार्केट का नाम सुना है। कभी यशवंत क्लब गए हो।

सारे क्रिकेट मैचेस कहां होते हैं। कर्नल सी के नायडू, और कैप्टन मुश्ताक अली को जानते हो।।

आखिर आज इंदौर का इतना गुणगान क्यों ? अरे कोई कारण होगा। जी हां, ज़रूर है। बात ही कुछ ऐसी है। मेरे एक पुराने परिचित हैं, इंदौर प्रेमी हैं। वैसे एक बात बता दूं, सभी इंदौरी प्रेमी होते हैं। जो बाहर से आता है, इंदौर का होकर रह जाता है। और अगर इंदौर का कहीं जाता है, तो इंदौर के गुण ज़रूर गाता है।

इन इंदौर प्रेमी को आप इंदौरी लाल भी कह सकते हो। कल बहुत दिनों बाद इनके दर्शन हुए ! मुझे देखते ही उछल पड़े। कहां हो आजकल, दिखाई नहीं पड़ते। पता है, इंदौर में क्या हो रहा है ? मुझे बोलना पड़ता है, नहीं पता। तब उनकी गाड़ी चल निकलती है। दोनों हाथ सर तक ले जाकर बोले, साहब मैं तो तर गया। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरे जीते जी इंदौर में मेट्रो जैसी चीज आ जाएगी। जब बीच सड़क में आई बस चलती थी, तो मेरा सीना गर्व से फूल जाता था, और अब मेट्रो। साहब मैं तो तर गया, मेरा जीवन सफल हो गया।।

जब उसकी गाड़ी चल निकलती है, तो उसको रोकना आसान नहीं होता। वह भावुक हो गया ! कोई व्यक्ति बनारस जाए, और भला गंगा स्नान करके न आए, कोई वी आई पी, इंदौर आए और सराफा की चाट न खाए, ऐसा कभी हुआ है। भले ही क्रिकेट के खिलाड़ी सायाजी और होटल रेडिसन में रुकें, जब छप्पन दुकान पर विजय चाट का पेटिस खाते हैं, तो हर इंदौरी का सीना छप्पन इंच का हो जाता है साहब। जो इंदौर से करे प्यार, वो देशप्रेम से कैसे करे इंकार। इंदौर के पोहे जलेबी वर्ल्ड फेम हैं, आप जानते हो।

हमारे दामू अण्णा की दुकान और जेलरोड की प्रशांत होटल पर ऐसी ही बातें होती हैं। हम इंदौरी ऐसे ही हैं। मेट्रो के इंदौर आने की खबर से ही हर इंदौरी तर गया है। वह उस दिन का इंतज़ार कर रहा है, जब वह मेरे साथ मेट्रो में बैठकर सराफा में नागौरी की शिकंजी पीने चलेगा। आप भी आमंत्रित हैं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ३५ – आलेख – संकल्प ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३५ ☆

☆ आलेख ☆ ~ “संकल्प” (एक शब्द विशेष) ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

जानने का प्रयास करते हैं। इस सम्बन्ध में मैं एक शब्द विशेष आप सभी के सम्मुख रखने का प्रयास कर रहा हूँ।

वह शब्द विशेष जिसके विषय में मैंने न सिर्फ मनन – चिंतन किया है, बल्कि अध्ययन भी किया है।

शब्द जो स्वयं में सामर्थ्य रखता हो और ऐसा सामर्थ्य जो किसी व्यक्ति को या व्यक्तियों के समूह को निर्धारित लक्ष्य के पार ले जाता हो। आज मैं एक ऐसे शब्द की बात करने जा रहा हूँ-

वह शब्द विशेष है –

☆ “संकल्प” ☆

यदि किसी एकल शब्द को साहित्यिक, आध्यात्मिक एवं भौतिक भाव से देखे तो –

इस अति महत्वपूर्ण शब्द “संकल्प” का कोई विकल्प है ही नहीं। संकल्प का आश्रय लेकर और संकल्प के साथ कार्य को प्रतिपादित करने वाले महामना जन का मानना है, कि संकल्प शब्द, शब्द के प्रभाव की ऐसी पराकाष्ठा है, जो विश्वास को आधार बनाकर स्व्यं को उस पर स्थापित कर, किसी विशेष उद्देश्य को प्राप्त कराने सहायक होती है।

संकल्प के साथ कार्य करने में दुश्वारी यह है कि लक्ष्य की प्राप्ति हेतु निद्रा का त्याग करना होगा, स्वयं को अहं दूर रखना होगा, विश्वास को साथ लेकर चलना होगा।

संकल्प को सिद्धि तक ले जाने हेतु सत्य का आश्रय लेना आवश्यक एवं श्रेयस्कर होता है।दुनिया की कोई भी बड़ी से बड़ी समस्या ही क्यों न हो। संकल्प उसे पूर्ण समाधान की ओर ले जाता है। यदि इस शब्द को विभिन्न संदर्भों में ले तो इसका प्रभाव क्या होगा, इसके एक दो उदाहरण आपके सामने रखता हूं।

प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठानो में संकल्प का बड़ा ही महत्व है।

निश्चित संकल्प के साथ मन्त्रोंचार के माध्यम से किया गया अनुष्ठान सिद्धि को प्राप्त करता है।

क्षय मुक्ति आंदोलन पर आधारित मेरा ऐतिहासिक उपन्यास ‘तुमसे क्या छुपाना’ के आवरण पृष्ठ पर लिखा मेरा मूल वाक्य –

“क्षय मुक्त भारत की संकल्पना पर आधारित उपन्यास”

का परिणाम यह कि इस उपन्यास में परम ऊंचाई को प्राप्त किया।

क्षय मुक्ति पर लिखी हुई मेरी पहली कविता जो एन. टी. आई. बेंगलुरु में पढ़ी गई थी, वह यह थी कि –

संकल्प सिद्धि का ले मन में आगे हर कदम बढाना है।

एक सफल उद्घोषक के रूप में पहचान दिलाने में सहायक हुई।

यदि हम संकल्प के आध्यात्मिक पक्ष को देखें तो मां सती ने जब भेष बदलकर भगवान श्री राम के होने की परीक्षा ली तो उन्हें शिव के क्रोध का भाजन बनना पड़ा-

गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि-

शिव संकल्प कीन्ह मन माही

एहि तन सती भेंट अब नाहीं

यह संकल्प को शिव संकल्प नाम दिया गया। 

वहीं यदि मैं अपने जनपद बलिया की बात करूं,तो मेरे जनपद में कला एवं संस्कृति से जुडी हुई एक संस्था है जो साहित्य संस्कृति और कला को प्रोत्साहित करती है और जिसके संस्थापक अध्यक्ष वरिष्ठ रंगकर्मी श्री आशीष त्रिवेदी हैं – उस संस्था का नाम है – “संकल्प”

मैं इस संस्था के अनवरत प्रदर्शन को देखकर कह सकता हूँ कि यह संस्था अपने नाम के अनुरूप प्रभाव के साथ स्वयं के संकल्प पर खरी ही नहीं उतरी बल्कि ने संस्था ने अपने निरंतर प्रयास एवं अभ्यास से शिखर को स्पर्श किया है। आज यह संस्था अपना बीसवा अपना स्थापना वर्ष मना रही है।

इस प्रकार कह सकते हैं कि “संकल्प” एक विशेष प्रभावपूर्ण शब्द है।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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