श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७० ☆
आलेख – भाषा में स्व का बोध बनाम सर्वनाम से संज्ञा की यात्रा
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
मनुष्य को अन्य प्राणियों से विशिष्ट बनाने वाली सबसे प्रबल क्षमता भाषा ही होती है। भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम मात्र नहीं है; वह एक सर्जनात्मक प्रक्रिया है, एक ऐसा प्रिज़्म है जिसके माध्यम से हम दुनिया के सात रंग देखते, समझते और उनके विविध अर्थ निकालते हैं। इसी प्रक्रिया का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और आधारभूत पहलू है, ‘स्व’ का बोध। ‘स्व’ यानी ‘आत्म’, ‘अहं’, ‘स्वयं’। यह वह चेतन सत्ता है जो हमें ‘मैं’ और ‘तुम’ में विभाजित करती है, जो हमारे अस्तित्व की नींव है।
स्व के निर्माण का शिल्प हमारा व्यक्तित्व गढ़ता है।
मनुष्य का ‘स्व’ कोई पूर्व निर्मित, स्थिर इकाई नहीं है। यह एक निरंतर गतिशील प्रक्रिया है जिसका निर्माण सामाजिक अंत:क्रिया और विशेष रूप से भाषा के माध्यम से होता है। एक शिशु जन्म के समय ‘स्व’ और ‘पर’ के बीच कोई स्पष्ट सीमा नहीं रखता। धीरे-धीरे, जैसे-जैसे उसके भाषिक परिवेश से संपर्क बढ़ता है, वह ‘नाम’ के माध्यम से अपनी पहचान बनाना शुरू करता है। माता-पिता द्वारा दिया गया नाम उसकी पहचान का प्रथम और सबसे स्थायी भाषिक चिन्ह बन जाता है। जब वह भाषा का प्रयोग सीखता है, तब एक क्रांतिकारी मोड़ आताा है। ‘मैं’ एक अद्भुत भाषिक उपकरण है, यह सार्वभौमिक है, किंतु इसका अर्थ वक्ता के अनुसार परिवर्तित होता रहता है। यह सर्वनाम ही बालक को यह एहसास दिलाता है कि वह दुनिया से अलग एक स्वतंत्र इकाई है, जिसकी अपनी इच्छाएं, भावनाएं और विचार हैं। इस प्रकार, भाषा ‘स्व’ के निर्माण का प्राथमिक शिल्प या टूल कहा जा सकता है।
भाषा का व्याकरणिक ढांचा ‘स्व’ की अवधारणा को गहराई से प्रभावित करता है। सर्वनाम प्रणाली (मैं, तुम, वह, हम, आप) केवल शब्द नहीं हैं; ये सामाजिक और पारस्परिक संबंधों के द्योतक हैं। उदाहरण के लिए, हिंदी और कई अन्य भाषाओं में ‘तू’ और ‘आप’ के बीच का अंतर केवल शिष्टता का नहीं, बल्कि ‘स्व’ और ‘पर’ के बीच की दूरी, आदर और घनिष्ठता का भी सूचक है। जब हम किसी से ‘आप’ कहते हैं, तो हम एक सामाजिक दूरी और सम्मान का निर्माण कर रहे होते हैं, जबकि ‘तू’ अंतरंगता या कभी-कभी असम्मान की भावना पैदा करता है। इसी प्रकार, ‘हम’ सर्वनाम का प्रयोग सामूहिक स्व (Collective Self) की भावना को जन्म देता है, जहाँ व्यक्तिगत ‘स्व’ एक बड़े समूह की पहचान में विलीन हो जाता है, जैसे “हम भारतीय हैं”। इस तरह, भाषा का व्याकरणिक ढांचा हमें बताता है कि हम स्वयं को दूसरों के संबंध में कैसे अधिरोपित तथा स्थापित करें।
हम जो अनुभव करते हैं, उसे अभिव्यक्त करने के लिए हमारे पास जो शब्द हैं, वे ही हमारे ‘स्व’ के दायरे को परिभाषित करते हैं। एडवर्ड सपीर और बेंजामिन ली व्हॉर्फ की ‘भाषिक सापेक्षतावाद’ (Linguistic Relativity) की परिकल्पना इसी ओर इशारा करती है। उदाहरण के लिए, संस्कृत में ‘प्रेम’ के अनेक रूप और शब्द हैं, स्नेह, अनुराग, काम, ममता, रति आदि। प्रत्येक शब्द संबंध की एक विशिष्ट गुणवत्ता, गहराई और प्रकृति को दर्शाता है। एक संस्कृत-भाषी का ‘स्व’ इन सूक्ष्म अंतरों को पहचान सकता है और उनके अनुसार अपने भावनात्मक अनुभव को वर्गीकृत कर सकता है। इसके विपरीत, एक भाषा जहाँ भावनाओं के लिए शब्दों की कमी है, वहाँ व्यक्ति के लिए अपने उन जटिल भावनात्मक अनुभवों को समझ पाना और अभिव्यक्त कर पाना कठिन हो सकता है। इस अर्थ में, हमारी शब्दावली हमारे ‘स्व’ के भावनात्मक और बौद्धिक भूगोल का नक्शा (Map) है। इसलिए अनुवाद कार्य मशीनी से ज्यादा भावना प्रधान होता है।
‘स्व’ केवल वर्तमान क्षण में ही अस्तित्व में नहीं होता; उसकी एक अतीत से वर्तमान और भविष्य तक की निरंतरता होती है। इस निरंतरता का निर्माण हम ‘कथा’ (Narrative) के माध्यम से करते हैं। हम अपने जीवन को एक कहानी की तरह देखते और सुनाते हैं “मैं यह हूँ क्योंकि मेरे साथ वह घटना घटी, मैंने वह निर्णय लिया, मैंने उस संघर्ष का सामना किया। ” यह आत्म-कथा (Autobiography) हमारे ‘स्व’ को स्थायित्व और अर्थ प्रदान करती है। भाषा ही वह माध्यम है जो इस कथा को बुनने में सहायक होती है। जब हम अपने अनुभवों को शब्द देते हैं, उन्हें एक क्रम में व्यवस्थित करते हैं, तो हम अपने ‘स्व’ को एक सुसंगत पहचान दे रहे होते हैं। इस प्रकार, भाषा के बिना ‘स्व’ का यह नैरेटिव और निरंतरता संभव नहीं है।
हमारा ‘स्व’ केवल आंतरिक नहीं है; उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा समाज के साथ संवाद से निर्मित होता है। समाजशास्त्री चार्ल्स कूली ने ‘लुकिंग ग्लास सेल्फ’ (Looking Glass Self) की अवधारणा दी थी। उसके अनुसार, हम अपने ‘स्व’ की छवि दूसरों की प्रतिक्रियाओं के आईने में देखते हैं। यह प्रक्रिया मुख्य रूप से भाषिक ही है। जब कोई हमें ‘बुद्धिमान’, ‘मेहनती’, ‘हास्यप्रिय’ या ‘अनाड़ी’ कहता है, तो वे शब्द हमारे ‘स्व’ के बारे में धारणा को आकार देते हैं। इस तरह, भाषा के माध्यम से होने वाला सामाजिक संवाद एक दर्पण का काम करता है जिसमें हम स्वयं को देखते और परिभाषित करते हैं।
भाषा सांस्कृतिक पहचान की वाहक है। एक भाषा अपने में एक संस्कृति का इतिहास, मूल्य, परंपराएँ और विश्वदृष्टि समेटे होती है। जब कोई व्यक्ति अपनी मातृभाषा बोलता है, तो वह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं कर रहा होता। वह उस सांस्कृतिक विरासत को अभिव्यक्त कर रहा होता है जिससे उसका ‘स्व’ जुड़ा है। मातृभाषा में ‘स्व’ का बोध सर्वाधिक सहज, गहरा और संपूर्ण होता है। किसी दूसरी भाषा को सीखना केवल व्याकरण और शब्दावली सीखना नहीं, बल्कि एक नए ‘स्व’ को, एक नई सांस्कृतिक चेतना को आत्मसात करना है। इसीलिए, मातृभाषा के साथ छेड़छाड़ या उसके ह्रास को व्यक्ति और समुदाय के ‘स्व’ पर हमला माना जाता है।
यद्यपि भाषा ‘स्व’ के निर्माण के लिए अनिवार्य है, तथापि यह उसकी सीमाएँ भी निर्धारित कर सकती है। भाषा में निहित पूर्वाग्रह, लैंगिक रूढ़ियाँ (जैसे वह का प्रयोग), और सामाजिक वर्ग के सूचक शब्द ‘स्व’ की अभिव्यक्ति को रोक सकते हैं। कभी-कभी, गहन दु:ख, आनंद या आध्यात्मिक अनुभव इतने गहरे होते हैं कि भाषा उन्हें पूरी तरह व्यक्त कर पाने में असमर्थ हो जाती है “शब्दों में बयाँ नहीं होता। ” इस स्थिति में भाषा ‘स्व’ की अभिव्यक्ति की सीमा बन जाती है।
किंतु, भाषा ही इसकी मुक्ति का मार्ग भी है। कवि, लेखक और विचारक नए शब्द गढ़ते हैं, भाषा को नए अर्थ देते हैं और उसके दायरे का विस्तार करते हैं। वे भाषा के माध्यम से ही ‘स्व’ की अकथनीय गहराइयों को छूने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार, भाषा एक द्वंद्व है, यह सीमा भी है और उस सीमा को तोड़ने का उपकरण भी है।
निष्कर्षतः, भाषा और ‘स्व’ का बोध अटूट रूप से परस्पर जुड़े हुए हैं। भाषा ‘स्व’ के निर्माण, विकास और अभिव्यक्ति का मौलिक माध्यम है। यह व्याकरण से संबंधों को परिभाषित करती है, शब्दावली के माध्यम से हमारे अनुभवों का दायरा तय करती है, कथा के जरिए हमारी पहचान को निरंतरता प्रदान करती है, और सामाजिक संवाद के सूत्र से एक दर्पण का काम करती है। यह सांस्कृतिक पहचान की आधारशिला है। भले ही यह कभी-कभी एक सीमा के रूप में भी कार्य करती है, लेकिन इसकी सर्जनात्मक शक्ति हमें सीमाओं को रेखांकित करने का सामर्थ्य भी देती है। इसलिए, भाषा में ‘स्व’ का बोध कोई स्थिर अवधारणा नहीं है, बल्कि यह एक सतत चलने वाली, गतिशील प्रक्रिया है जहाँ भाषा ‘स्व’ को गढ़ती है और ‘स्व’ अपनी अभिव्यक्ति के लिए भाषा को नया रूप देता है। अंततः, हमारी भाषा ही हमारे अस्तित्व की सबसे सारगर्भित और मौलिक अभिव्यक्ति है।
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© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈










