हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६९ ⇒ रिश्ते और फरिश्ते ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रिश्ते और फरिश्ते ।)

?अभी अभी # ९६९ ⇒ आलेख – रिश्ते और फरिश्ते ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

रिश्ता क्या है तेरा मेरा !

मैं हूं शब, तू है सवेरा।।

कुछ रिश्ते हमें बांधते हैं और कुछ मुक्त करते हैं।

जो स्वयं मुक्त होते हैं, जब हम उनसे जुड़ते हैं, तो हमें भी मुक्ति का अहसास होता है लेकिन जिसे संसार ने जकड़ लिया है, और अगर हमने उसे पकड़ लिया है, तो वह हमारा भी बंधन का ही कारण सिद्ध होता है।

रिश्तों को बंधन का कारण माना गया है। बंधन में सुख है, थोड़ा प्रेम भी है, थोड़ी आसक्ति भी। कुछ बंधन इतने अटूट होते हैं जो टूटे नहीं टूटते, और कुछ बंधन इतने शिथिल और कमजोर होते हैं, कि संभाले नहीं संभलते। कहीं रिश्तों में गांठ आ जाती है तो कहीं तनाव

और कहीं सिर्फ एक प्रेम का धागा ही रिश्तों की बुनियाद बन जाता है।।

रिश्ता दर्द भी है और दवा भी। रिश्ते में कहीं फूल सी खुशबू है तो कहीं कांटों सी चुभन भी है। किसी की फुलवारी महक रही है तो कहीं घरों के बीच दीवार खड़ी हो रही है ;

रिश्तों में दरार आई

बेटा न रहा बेटा,

भाई न रहा भाई …

ऐसी मनोदशा में जब रिश्ते साथ नहीं देते, कहीं से एक फरिश्ता चला आता है। कहते हैं, फरिश्ते का किसी से कोई रिश्ता नहीं होता। वह तो बस फरिश्ता होता है। यह फरिश्ता हमारे आसपास ही होता है, लेकिन हमें कभी नजर नहीं आता।

आप सड़क के बीच, कुछ अनमने से, कुछ खाए खोए से चले जा रहे हैं, पीछे से एक वाहन हॉर्न दे रहा है, कहीं से अचानक एक अनजान व्यक्ति फुर्ती से आता है और आपको पकड़कर सड़क के किनारे ले जाता है। आप कुछ समझ नहीं पाते। वह आपकी जान बचाकर वहां से चला जाता है। कोई जान ना पहचान। आप सोचते हैं, जरूर कोई फरिश्ता ही आया होगा आपकी जान बचाने।

जीवन में ऐसे काई अवसर आते हैं, जब संकट की घड़ी में कहीं से अनायास ही ऐसा कुछ घटित हो जाता है, जिससे हम राहत की सांस लेने लगते हैं।।

रिश्ता अच्छा बुरा हो सकता है, फरिश्ता कभी बुरा नहीं होता। कभी कभी हमें रिश्तों में भी फरिश्ते नजर आते हैं तो कुछ रिश्ते असहनीय दर्द और मानसिक पीड़ा के कारण रिसते नजर आते हैं। ऐसी परिस्थिति में भी कोई फरिश्ता हमारा रहबर बनकर कहीं से प्रकट होता है और हमें उस पीड़ा से उबार लेता है।

फरिश्ते का भी क्या कभी नाम होता है, कोई पहचान होती है ! जी हां, कभी कभी हो भी सकती है।

हर नन्हा बच्चा एक नन्हा फरिश्ता होता है। कभी हमें अपनी मां ही फरिश्ता नजर आती है तो कभी बहन अथवा भाई। कृष्ण सुदामा तो दोनों ही फरिश्ते होंगे। राम लक्ष्मण जैसे भाई जहां हों, वहां तो फरिश्ते भी शरमा जाएं।।

हमें जहां भी भलाई और अच्छाई नजर आ रही है, वह सब उन फरिश्तों की बदौलत ही है। वे फरिश्ते हम आप भी हो सकते हैं। अच्छे रिश्तों को ही हमने फरिश्तों का नाम दिया हुआ है। किसी गिरते को थाम लेना, किसी मुसीबतजदा इंसान की मदद करना, यही तो एक फरिश्ते का काम होता है।

फरिश्ता स्वयं ईश्वर नहीं होता, लेकिन वह ईश्वर का दूत अवश्य होता है। फरिश्ते की ना तो आरती होती है और ना ही फरिश्ते का कोई मंदिर होता है। न आरती न अगरबत्ती, फिर भी कहीं से संकटमोचक की तरह प्रकट हो जाए, आपकी बिगड़ी बना दे, और गायब हो जाए।।

कितने फरिश्ते हमारे आसपास हैं, हमें मालूम ही नहीं। अच्छाई को महसूस करना ही फरिश्ते को पहचानना है।

जब रिश्तों में स्वार्थ और खुदगर्जी का स्थान प्रेम और त्याग ले लेगा। बुराई अच्छाई की चकाचौंध में कहीं नज़र नहीं आएगी, दूसरों का दुख हमें अपना लगने लगेगा, हर प्यासे तक कोई फरिश्ता कुआं बनकर आएगा, तब हम सब मिलकर यह तराना गाएंगे ;

फरिश्तों की नगरी में

आ गया हूं मैं,

आ गया हूं मैं …!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३१७ ☆ गुण और ग़ुनाह… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख गुण और ग़ुनाह। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३१७ ☆

गुण और ग़ुनाह… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘आदमी के गुण और ग़ुनाह दोनों की कीमत होती है। अंतर सिर्फ़ इतना है कि गुण की कीमत मिलती है और ग़ुनाह की उसे चुकानी पड़ती है।’ हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। गुणों की एवज़ में हमें उनकी कीमत मिलती है; भले वह पग़ार के रूप में हो या मान-सम्मान व पद-प्रतिष्ठा के रूप में हो। इतना ही नहीं,आप श्रद्धेय व वंदनीय भी बन सकते हैं। श्रद्धा मानव के दिव्य गुणों को देखकर उसके प्रति उत्पन्न होती है। यदि हमारे हृदय में उसके प्रति श्रद्धा के साथ प्रेम भाव भी जाग्रत होता है तो वह भक्ति का रूप धारण कर लेती है। शुक्ल जी भी श्रद्धा व प्रेम के योग को भक्ति स्वीकारते हैं। सो! आदमी को गुणों की कीमत प्राप्त होती है और जहां तक ग़ुनाह का संबंध है,हमें ग़ुनाहों की कीमत चुकानी पड़ती है; जो शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना रूप में हो सकती है। इतना ही नहीं,उस स्थिति में मानव की सामाजिक प्रतिष्ठा भी दाँव पर लग सकती है और वह सबकी नज़रों में गिर जाता है। परिवार व समाज की दृष्टि में वह त्याज्य स्वीकारा जाता है। वह न घर का रहता है; न घाट का। उसे सब ओर से प्रताड़ना सहनी पड़ती है और उसका जीवन नरक बन कर रह जाता है।

मानव ग़लतियों का पुतला है। ग़लती हर इंसान से होती है और यदि वह उसके परिणाम को देख स्वयं की स्थिति में परिवर्तन ले आता है तो उसके ग़ुनाह क्षम्य हो जाते हैं। इसलिए मानव को प्रतिशोध नहीं; प्रायश्चित करने की सीख दी जाती है। परंतु प्रायश्चित मन से होना चाहिए और व्यक्ति को उस कार्य को दोबारा नहीं करना चाहिए। बाल्मीकि जी डाकू थे और प्रायश्चित के पश्चात् उन्होंने रामायण जैसे महान् ग्रंथ की रचना की। तुलसीदास अपनी पत्नी रत्नावली के प्रति बहुत आसक्त थे और उसकी दो पंक्तियों ने उसे महान् लोकनायक कवि बना दिया और वे प्रभु भक्ति में लीन हो गए। उन्होंने रामचरित मानस जैसे महाकाव्य की रचना की, जो हमारी संस्कृति की धरोहर है। कालिदास महान् मूर्ख थे, क्योंकि वे जिस डाल पर बैठे थे; उसी को काट रहे थे। उनकी पत्नी विद्योतमा की लताड़ ने उन्हें महान् साहित्यकार बना दिया। सो! ग़ुनाह करना बुरा नहीं है,परंतु उसे बार-बार दोहराना और उसके चंगुल में फंसकर रह जाना अति- निंदनीय है। उसे इस स्थिति से उबारने में जहां गुरुजन, माता-पिता व प्रियजन सहायक सिद्ध होते हैं; वहीं मानव की प्रबल इच्छा-शक्ति,आत्मविश्वास व दृढ़-निश्चय उसके जीवन की दिशा को बदलने में नींव की ईंट का काम करते हैं।

इस संदर्भ में, मैं आपका ध्यान इस ओर दिलाना चाहूंगी कि यदि ग़ुनाह किसी सद्भावना से किया जाता है तो वह निंदनीय नहीं है। इसलिए धर्मवीर भारती ने ग़ुनाहों का देवता उपन्यास का सृजन किया,क्योंकि उसके पीछे मानव का प्रयोजन द्रष्टव्य है। यदि मानव में दैवीय गुण निहित हैं;  उसकी सोच सकारात्मक है तो वह ग़लत काम कर ही नहीं सकता और उसके कदम ग़लत दिशा की ओर अग्रसर नहीं हो सकते। हाँ! उसके हृदय में प्रेम,स्नेह,सौहार्द,करुणा, सहनशीलता,सहानुभूति,त्याग आदि भाव संचित होने चाहिए। ऐसा व्यक्ति सबकी नज़रों में श्रद्धेय,उपास्य,प्रमण्य  व वंदनीय होता है। ‘जाकी रही भावना जैसी,प्रभु तिन मूरत देखी तैसी’ अर्थात् मानव की जैसी सोच,भावना व दृष्टिकोण होता है; उसे वही सब दिखाई देता है और वह उसमें वही तलाशता है। इसलिए सकारात्मक सोच व सत्संगति पर बल दिया जाता है। जैसे चंदन को हाथ में लेने से उसकी महक लंबे समय तक हाथों में बनी रहती है और उसके बदले में मानव को कोई भी मूल्य नहीं चुकाना पड़ता। इसके विपरीत यदि आप कोयला हाथ में लेते हो तो आपके हाथ काले अवश्य हो जाते हैं और आप पर कुसंगति का दोष अवश्य लगता है। कबीरदास जी का यह दोहा तो आपने सुना होगा, ‘कोयला होय न ऊजरा,सौ मन साबुन लाय’ अर्थात् व्यक्ति के स्वभाव में परिवर्तन लाना अत्यंत दुष्कर कार्य है। परंतु बार-बार अभ्यास करने से मूर्ख भी विद्वान बन सकता है। इसलिए मानव को निराश नहीं होना चाहिए और अपने सत् प्रयास अवश्य जारी रखने चाहिए। यह कथन कोटिश: सत्य है कि यदि व्यक्ति ग़लत संगति में पड़ जाता है तो उसको लिवा लाना अत्यंत कठिन होता है,क्योंकि ग़लत वस्तुएं अपनी चकाचौंध से उसे आकर्षित करती हैं–जैसे माया रूपी महाठगिनी अपनी हाट सजाए  सबका ध्यान आकर्षित करने में प्रयासरत रहती है।

शेक्सपीयर भी यही कहते हैं कि जो दिखाई देता है; वह सदैव सत्य नहीं होता और हमें छलता है। सो! सुंदर चेहरे पर विश्वास करना स्वयं को छलना व धोखा देना है। इक्कीसवीं सदी में सब धोखा है, छलना है,क्योंकि मानव की कथनी- करनी में बहुत अंतर होता है। लोग अक्सर मुखौटा धारण कर जीते हैं। इसलिए रिश्ते भी विश्वास के क़ाबिल नहीं रहे। रिश्ते खून के हों या अन्य भौतिक संबंध–भरोसा करने योग्य नहीं हैं। संसार में हर इंसान एक-दूसरे को छल रहा है। इसलिए रिश्तों की अहमियत रही नहीं; जिसका सबसे अधिक खामियाज़ा मासूम बच्चियों को भुगतना पड़ रहा है। अक्सर आसपास के लोग व निकट के संबंधी उनकी अस्मत से खिलवाड़ करते पाए जाते हैं। उनकी स्थिति बगल में छुरी ओर मुंह में राम-राम जैसी होती है। वे एक भी अवसर नहीं चूकते और दुष्कर्म कर डालते हैं,क्योंकि उनकी रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई जाती। वास्तव में उनकी आत्मा मर चुकी होती है,परंतु सत्य भले ही देरी से उजागर हो; होता अवश्य है। वैसे भी भगवान के यहां सबका बही-खाता है और उनकी दृष्टि से कोई भी नहीं बच सकता। यह अकाट्य सत्य है कि जन्म-जन्मांतरों के कर्मों का फल मानव को किसी भी जन्म में भोगना अवश्य पड़ता है।

आइए! आज की युवा पीढ़ी की मानसिकता पर दृष्टिपात करें, जो ‘खाओ पीयो,मौज उड़ाओ’ में विश्वास कर ग़ुनाह पर ग़ुनाह करती चली जाती है निश्चिंत होकर और भूल जाती है ‘यह किराये का मकाँ है/ कौन कब तक ठहर पायेगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे/ खाली हाथ तू जाएगा।’ यही संसार का नियम है कि इंसान कुछ भी अपने साथ नहीं ले जा सकता। परंतु वह आजीवन अधिकाधिक धन-संपत्ति व सुख- सुविधाएं जुटाने में लगा रहता है। काश! मानव इस सत्य को समझ पाता और देने में विश्वास रखता तथा परहितार्थ कार्य करता तो उसके ग़ुनाहों की फेहरिस्त इतनी लंबी नहीं होती। अंतकाल में केवल कर्मों की गठरी ही उसके साथ जाती है और कृत-कर्मों के परिणामों से बचना सर्वथा असंभव है।

मानव के सबसे बड़े शत्रु है अहं और मिथ्याभिमान; जो उसे डुबा डालते हैं। अहंनिष्ठ व्यक्ति स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरों को हेय मानता है। इसलिए वह कभी दयावान् नहीं हो सकता। वह दूसरों पर ज़ुल्म ढाने में विश्वास कर सुक़ून पाता है और जब तक व्यक्ति स्वयं को उस तराजू में रखकर नहीं तोलता; वह प्रतिपक्ष के साथ न्याय नहीं कर पाता। सो! कर भला, हो भला अर्थात् अच्छे का परिणाम अच्छा व बुरे का परिणाम सदैव बुरा होता है। शायद! इसीलिए शुभ कर्मण से कबहुं न टरौं’ का संदेश प्रेषित है। गुणों की कीमत हमें आजीवन मिलती है और ग़ुनाहों का परिणाम भी अवश्य भुगतना पड़ता है; उससे बच पाना असंभव है। यह संसार क्षणभंगुर है,देह नश्वर है और मानव शरीर पृथ्वी,जल,वायु, अग्नि व आकाश तत्वों से बना है। अंत में इस नश्वर देह को पंचतत्वों में विलीन हो जाना है; यही जीवन का कटु सत्य है। इसलिए मानव को ग़ुनाह करने से पूर्व उसके परिणामों पर चिन्तन-मनन अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने के पश्चात् ही आप ग़ुनाह न करके दूसरों के हृदय में स्थान पाने का साहस जुटा पाएंगे।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ फॅमिली डे ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  फॅमिली डे।)

 

? आलेख – फॅमिली डे ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

वर्तमान समय में समाज जिस गति से आगे बढ़ रहा है, बदल रहा है, सभी जब भी आपस में मिलते हैं एक ही बात करते हैं कि पहले तो ऐसा नहीं होता थाl अब आपको नहीं लगता बहुत कुछ बहुत जल्दी बदल गया है? आखिर क्या बदला? पानी का रंग, फूलों की सुगंध, पक्षियों की आवाज, भवरों का गुनगुन या पत्तों का रंग? चलिए इन सब को छोड़ते हैंl कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारा देखने का नजरिया ही बदल गया हो? कहते हैं ना जैसी जाकि दृष्टि वैसी दिखे सृष्टिl जैसी नजर वैसा दिखे नजाराl हम इंसान एक दूसरे में बुराइयाँ ही खोज रहे हैंl यही हमारी दृष्टि का दोष हैl

किसी कवि ने क्या खूब लिखा है कि खिड़की की सलाखों से बाहर झाँक कर देखा तो नीचे कीचड़ और ऊपर चाँद पायाl

ये हमारा नजरिया ही तो है कि हम क्या ढूंढ़ रहे हैं हमें ज्ञात ही नहींl हम यहीं बातें अपने ड्राइंग रूम से लेकर ऑफिस के गलियारे तक, प्लेटफॉर्म से लेकर शादी के शामियाने तक सिर्फ और सिर्फ बुराइयाँ ही ढूंढ़ रहे हैं, बुराइयाँ ही देख रहे हैं और उन्हें ही बढ़ाचढ़ा कर एक दूसरे को बयां करते आ रहे हैंl हम समाज का एक ऐसा आइना बच्चों के सामने पेश कर रहे हैं जो उनकी परवरिश के दौरान सही नहींl इस तरह हम हमारे स्वयं के परिवार में भी पॉजिटिव एनवायरनमेंट क्रिएट नहीं कर पा रहे हैंl जब भी हम अपने परिवार के साथ बैठते हैं तो आस पडोस की, सगे संबंधियों की बुराइयाँ ही तो करते रहते हैंl

परिवार में बच्चों के साथ अच्छी बातें, अच्छी आदतें एवं अच्छे अनुभवों को साझा करेंl और एक पॉजिटिव एनवायरनमेंट क्रिएट करेंl

कुछ दिनों पहले हम फॅमिली डे मना रहे थेl सारा व्हाट्सप्प का इनबॉक्स भर गया थाl और बिना पढ़े ही डिलीट कर दिया गयाl

मैं सोच रही थी कि हम आज के दिन भी अपने परिवार में महज एक दिखावे की जिंदगी जी रहे हैंl हम कुछ बेशकीमती उपहारों के जरिये रिश्ते खरीद रहे हैंl क्या हम इतना भूल गये कि रिश्ते बिकाऊ नहीं होते?

इस खरीद फरोख्त कि दुनिया से बाहर आएंl अपने बच्चों को जीवन के अर्थ की सही पहचान कराएंl हमने तो नर्सरी के बच्चे को भी इस वैश्विक दौड़ का हिस्सा बना दियाl बच्चों की विशेषताओं एवं खूबियों को किनारे कर दियाl उनकी भावनाओं को कुचल कर रख दिया और बड़ी ही सहजता से ख दिया कि हमने यह तो नहीं कहा थाl

हम क्यों ऊँचे पद और प्रतिष्ठा के लालच में अपने बच्चों से उनका बचपना और साथ में उनकी मासूमियत जाने अंजाने में छीन रहे हैं ? अंत में मुझे सिर्फ इतना ही कहना है कि – प्यार, विश्वास और उम्मीद की जिंदगी अपने बच्चों को दीजिएl साथ ही उन्हें पहचानिए और महसूस कीजिएl

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६८ ⇒ मच्छर, छिपकली और मनुष्य ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मच्छर, छिपकली और मनुष्य।)

?अभी अभी # ९६८ ⇒ आलेख – मच्छर, छिपकली और मनुष्य ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जीवः जीवस्य भोजनम् ! मनुष्य को मच्छर खाता है, तो मच्छर को छिपकली। अपनी आबादी को बचाने के लिए और सुरक्षित रखने के लिए, मच्छरों और छिपकली पर नियंत्रण जरूरी है इसलिए मनुष्य युद्ध स्तर पर घरों में पेस्ट कंट्रोल करवाता है और मच्छरों, कॉकरोच और छिपकलियों से एकमुश्त छुटकारा पाता है।

एक मच्छर मनुष्य को पूरा नहीं खा सकता। कहां मच्छर और कहां मनुष्य ! लेकिन जिस तरह पुष्टि के लिए मनुष्य रोज रात को एक ग्लास दूध का सेवन करता है, एक अंडे के लिए जिस प्रकार मुर्गी को नहीं मारा जाता, कुछ बूंद खून की ही मच्छरों की पुष्टि वर्धनम् के लिए पर्याप्त होती हैं।

मच्छर भी समझदार है, वह सोने की मुर्गी को हलाल नहीं करता। रोज रात को उसे दुहा करता है, यानी उसका आसान किस्तों में लहू पिया करता है।।

रात को मेरा कमरा, धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र हो जाता है। जिस प्रकार सात तालों में भी मौत प्रवेश कर जाती है और यमदूत जिसके प्राण लेना होते हैं, लेकर निकल ही जाते हैं, एक मच्छर सभी सुरक्षा प्रयासों के बावजूद और cctv कैमरे की नजरों के सामने रात्रि-दहाड़े कमरे में प्रवेश कर ही जाता है। एक मच्छर के लिए वैसे क्या दिन और क्या रात। क्या अंधेरा और क्या उजाला। उसने तो गंदगी और अंधेरे में ही अपने परिवार को पैदा किया, और पाला।

मच्छर प्रकाश में नृत्य करते हैं, मनुष्य का इंतजार करते हैं। मनुष्य के पास कई सुरक्षा कवच हैं मच्छरों के हमले से बचने के लिए। मच्छरदानी, ओडोमॉस, ऑल आउट और हिट। फिर भी मच्छर रणछोड़ नहीं। डेंगू, चिकनगुनिया और मलेरिया इसके प्रमाण हैं।।

रात के बारह बजे हैं। कुछ मच्छर प्रकाशोत्सव में नृत्य का आनंद ले रहे हैं। कमरे में एक शिवजी की बड़ी तस्वीर लगी है जिनके भाल में चंद्र और जटाओं में गंगा को अभय मिला हुआ है।

सर्प भी सुरक्षित है नागेश्वर के गले में। बस इसी त्रिपुरारी की तस्वीर की आड़ में एक छिपकली ने भी शरण ले रखी है। जब भी कोई मच्छर उसके दायरे में आ जाता है, उसका भोजन बन जाता है।

मछली की आंख की तरह छिपकली और मच्छर के बीच कोई नहीं आ सकता। पूरे कमरे में वह बेखौफ मच्छरों का शिकार करा करती है। मच्छर मेरा शत्रु भी है। इस प्रकार वह मेरी भी शुभचिंतक ही हुई। मेरी कोप दृष्टि से बचने के लिए वह शिवजी की शरण में चली जाती है। छिपकली वहां छिपकर उतनी ही सुरक्षित है जितनी फूलों के बीच एक कली।।

स्वास्थ्य और सुरक्षा मनुष्य की पहली आवश्यकता है। बढ़ती जनसंख्या भी एक चेतावनी है। जनसंख्या नियंत्रण भी मनुष्य के लिए उतना ही जरूरी है। लेकिन उसके भी पहले बीमारियों की रोकथाम के मच्छर, छिपकली और कॉकरोच का इलाज भी जरूरी है। कंट्रोल कंट्रोल ! बर्थ कंट्रोल के पहले पेस्ट कंट्रोल..!!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१० ☆ आलेख – लघुकथा का ‘एक ही समय काल’ नियम: अभिव्यक्ति की बेड़ियाँ या आवश्यक संक्षिप्तता?☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१० ☆

?  आलेख – लघुकथा का ‘एक ही समय काल’ नियम: अभिव्यक्ति की बेड़ियाँ या आवश्यक संक्षिप्तता? ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

लघुकथा हिंदी साहित्य की एक संक्षिप्त विधा है, जो क्षणिक घटना पर आधारित प्रभावशाली कथन प्रस्तुत करती है। इसके मूल नियमों में ‘एक ही समय काल की घटना’ प्रमुख है, यानी कथा पूर्णतः एक ही क्षण या संकीर्ण समयावधि में समाहित हो। यह नियम प्रेमचंद काल के बाद के लघुकथाकारों शिवप्रसाद सिंह आदि के द्वारा प्रतिपादित हुआ, जो लघुकथा को उपकथा या लघु कहानी से अलग करने का प्रयास था।

लेकिन क्या यह नियम लघुकथा की अभिव्यक्ति क्षमता को अनावश्यक रूप से सीमित नहीं करता? यह प्रश्न आज प्रासंगिक है, क्योंकि यह विधा की गतिशीलता को बाँध देता है।

नियम की जड़ें और औचित्य ..

लघुकथा को ‘क्षण-कथा’ कहा जाता है, जहाँ उद्देश्य पाठक पर तत्काल प्रभाव छोड़ना है। एक ही समय काल का नियम अनावश्यक विस्तार रोकता है, पात्रों की संख्या सीमित रखता है और अंत को तीक्ष्ण बनाता है।

संक्षिप्तता ही लघुकथा को शक्तिशाली बनाती है। तात्कालिकता के नियम का औचित्य यही है, लघुकथा लंबी कहानी का संक्षिप्त संस्करण न हो, बल्कि स्वतंत्र विधा बने।

अभिव्यक्ति क्षमता पर समय सीमाबद्धता का नियम लघुकथा की अभिव्यक्ति को कृत्रिम रूप से बाँधता है। वास्तविक जीवन में कोई घटना शून्य काल में नहीं घटती । कारण-परिणाम की श्रृंखला घटना के समय को  फैलाती है। एक ही समय काल थोपने से जटिल सामाजिक मनोवैज्ञानिक मुद्दे इस विधा में व्यक्त नहीं हो पाते। अंतिम रूप से व्यंग्य, जो लघुकथा का मूल ट्विस्ट है, अक्सर ऐतिहासिक या सांस्कृतिक संदर्भ माँगता है, जो एक क्षण में समेटना संभव नहीं होता है।

एक काल्पनिक लघुकथा  की चर्चा करें।

मान लीजिए, एक आल्हा गायक गांव में आता है। यदि नियम पालन करें, तो “गायक ने तार छेड़ा। श्रोता चुप। एक सांड, भीड़ में घुस आया, अचानक भगदड़ मच गई। गायक भागा।”

लेकिन यदि हल्का समय विस्तार अनुमत हो, गायक का आगमन, गायन और सांड वाली घटना का संदर्भ, थोड़ी चर्चा परिदृश्य पर, तो प्रभाव गहरा हो सकता है।

एक और उदाहरण लें,

समकालीन मुद्दा, जैसे भोपाल गैस त्रासदी पर लिखें  तो, एक ही समय में ‘पीड़ित का दर्द’ दिखाना संभव नहीं, वह लंबी श्रृंखला रही है।

है से थी का सफर ।

कुछ आधुनिक लघुकथाकार इस समय सीमा का उल्लंघन करते हुए लघुकथा लिख भी  रहे हैं।

यह नियम तोड़ने से विधा ‘फ्लैश फिक्शन’ की वैश्विक धारा से जुड़ सकती है, जहाँ समय काल का लचीलापन स्वीकार्य है।

संतुलन की आवश्यकता..

निश्चित ही यह नियम लघुकथा को ‘चुटकुला’ बनने से बचाता है, लेकिन मेरी समझ में यह रचनात्मकता को कुंठित करता है। आलोचक विष्णु प्रभाकर ने कहा था कि लघुकथा ‘संक्षिप्तता’ है, न कि ‘काल-सीमा’। यदि नियम कठोर रहे, तो विधा अप्रासंगिक हो जाएगी, जैसे ताजा समाचारों पर आधारित कथाएँ जो शीघ्र पुरानी पड़ जाती हैं।

समाधान यह है कि ‘प्रमुख घटना एक काल में’ का लचीलापन स्वीकार किया जाए । इससे अभिव्यक्ति विस्तृत होगी, व्यंग्य गहरा होगा, और यह बिना कथा विस्तार के जाल में फँसे, संभव है।

लघुकथा को मुक्त करने का समय आ चुका है, आखिर यह कोई अंतिम कानूनी नियम नहीं, केवल साहित्यिक मान्यता ही है। लघुकथाकारो का दायित्व है कि विधा को व्यापक बनाया जाए ताकि यह साहित्य को समृद्ध और जीवंत करे। अन्यथा, यह नियम बाध्यता लघुकथा को हमारी ही बनाई बेड़ियों में सीमित बना कर व्यर्थ ही बांध रहा है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६७ ⇒ चिंतन शिविर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चिंतन शिविर।)

?अभी अभी # ९६७ ⇒ आलेख – चिंतन शिविर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

शिविर के वैसे तो कई अर्थ होते हैं, अस्थायी कैंप, डेरा, पड़ाव टैंट, छावनी, और अड्डा। कालांतर में छावनी, डेरा और अड्डा स्थायी हो जाते हैं। दिल्ली में डेरा काले खां भी स्थायी है और सराय रोहिल्ला भी। हमारे शहर में भी बहुत पुराना जूनी इंदौर गाड़ी अड्डा है। और छावनी की तो बस पूछिए ही मत ! अंग्रेज़ चले गए, छावनी छोड़ गए।

जिस स्थान पर चिंतन किया जा सके, उसे चिंतन शिविर कहा जा सकता है। चिंतन हमारे नियमित जीवन का प्रमुख अंग है। सुबह उठते ही सबसे पहले जो कर्म होता है, उसे नित्य कर्म कहते हैं। जो मुक्त चिंतन के आदी होते हैं, वे सदियों से खुले में शौच करते आ रहे हैं। युग बदलेगा, सोच बदलेगा।

युग भी बदला, शौच का तरीका भी बदला। शांतता, घर घर चिंतन शिविर, नई सोच, खुलकर शौच। बद्ध मल से कोई बुद्ध नहीं बनता।।

जो संबंध चिंतन का चिंतन शिविर से है, वही संबंध सोच का शौच से है। जिनका संकीर्ण सोच होता है, उन्हें कब्जियत होती है। उनके लिए दुनिया गोल नहीं, ईसबगोल है। जिन्हें अधिक फिक्र होती है, वे पहले फिक्र को धुएं में उड़ाते हैं, लेकिन फिर भी बात नहीं बनती। गुटका, चाय और डाबर का लाल मंजन, सब बेकार, महज मनोरंजन।

शौच, सोच का नहीं, कर्म का विषय है। सकारात्मक सोच का परिणाम भी सकारात्मक ही निकलता है। एक अच्छी शुरुआत से आधा काम हो जाता है।

A good start is half done. शेक्सपियर ने भी तो यही कहा है ; All is well that ends well.

अंत भला सो सब भला।।

कुछ लोगों के लिए यह चिंतन शिविर युद्ध शिविर से कम नहीं होता। हम तो जब भी शिविर में जाते थे, यही कहकर जाते थे, पाकिस्तान जा रहे हैं।

इधर सर्जिकल स्ट्राइक, उधर हमारी फतह। बड़ी कोफ़्त होती थी, जिस दिन युद्ध विराम की घोषणा हो जाती थी। सब करे कराए पर पानी फिर जाता था।

वाचनालय तो खैर वह पहले से ही था, जब अखबार घर में कहीं नज़र नहीं आता था, तो घर के सदस्य समझ जाते थे, जब तक कोई हल नहीं निकलेगा, अखबार बाहर नहीं आएगा। हमारा चिंतन शिविर तो एक तरह का अध्ययन कक्ष ही बन गया था। घर पोच वाचनालय की तरह, जासूसी उपन्यास वहां आसानी से उपलब्ध हो जाते थे। बस सस्पेंस के बाद क्लाइमैक्स का इंतजार रहता था।।

आजकल चिंतन शिविर अत्यधिक आधुनिक हो गए हैं। सृजन और विसर्जन दोनों का कार्य यहां बड़ी कुशलतापूर्वक संपन्न होता है। लेकिन जितना शौच को सुलभ बनाने की कोशिश की जा रही है, उतनी ही लोगों की सोच बिगड़ती जा रही है।

चिंतन शिविर का मुख्य उद्देश्य निरोगी काया और निर्मल मन ही तो है। केवल शौचालय ही नहीं, अपनी सोच भी बदलें। आपके विचारों से आपके चिंतन शिविर की बू नहीं, खुशबू आना चाहिए।

चिंतक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६६ ⇒ डबल सवारी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “डबल सवारी।)

?अभी अभी # ९६६ ⇒ आलेख – डबल सवारी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

यह तब की बात है, जब हर घर में एक साइकिल होती थी। साइकिल, जिसे बाइसिकल भी कहते हैं, एक ऐसा दुपहिया वाहन है, जिस पर मोटर व्हीकल एक्ट लागू नहीं होता, साइकिल का कोई रजिस्ट्रेशन नहीं होता और इसका कोई थर्ड पार्टी इंश्योरेंस भी नहीं होता।

हमने बचपन में एक पहिये की गाड़ी भी चलाई है और तीन पहिये की लकड़ी की हाथ गाड़ी भी। एक पहिये की छड़ीनुमा गाड़ी में एक हैंडल होता था, जिसके पहिये से एक घंटी भी जुड़ी रहती थी। इस साइकिल में बैठने का नहीं, साइकिल चलाने का सुख नसीब होता था। लकड़ी की, तीन पहिए की हाथ गाड़ी से तो हमने चलना सीखा था, साइकिल चलाना नहीं।।

हमें याद है, तीन पहिये की साइकिल, जिसमें एक सीट आगे होती थी और एक सीट पीछे, जिस पर छोटा भाई अथवा बहन भी आसानी से बैठ सकते थे।

वह सिंगल चाइल्ड का जमाना नहीं था।

दो पहिये की साइकिल सीखने के लिए कोई लर्निंग स्कूल नहीं था।

स्कूल के मैदान में, अथवा मोहल्ले की सड़कों पर ही यह ट्रेनिंग गिरते पड़ते संपन्न हो जाती थी। कैंची से शुरू होकर सीट पर बैठकर साइकिल चला लेना आपको एक कुशल साइकिल सवार सिद्ध कर ही देता था।।

साइकिल लेडीज भी होती थी और जेंट्स भी। हालां कि इसमें एक ही सीट होती थी, लेकिन पीछे साइकिल कैरियर भी होता था, जिसका अधिकतर उपयोग डबल सवारी के लिए किया जाता था।

भले ही तब साइकिल एक राष्ट्रीय सवारी हो, यह कहां सबके नसीब में होती थी।

बच्चों के लिए अगर साइकिल चलाना शौक था, तो बड़ों के लिए जरूरत। इन सबकी सुविधा के लिए कुछ ऐसे साइकिल की दुकानें थीं, जहां साइकिल रिपेयर भी होती थीं और प्रति घंटे की दर से किराए से भी मिल जाती थी।।

क्या साइकिल का भी चालान बनता था ? जी हां, हम भुक्तभोगी हैं। बड़ी दर्दनाक दास्तान है। तब शहर में न तो कहीं वन वे था और न ही ट्रैफिक सिग्नल ! बस चौराहों पर कुछ सिपाही मुस्तैदी से यातायात नियंत्रित करते रहते थे। अचानक एक दिन हम और हमारा दोस्त कृष्णपुरा पुल के थाने के पास डबल सवारी धर लिए गए।

हमें थाने ले जाया गया। डबल सवारी का चालान कटा, साइकिल जप्त हुई। इधर जेब में फूटी कौड़ी नहीं। पता चला, चालान कोर्ट में पेश होगा। कोर्ट में हमारी पेशी होगी, जज साहब जुर्माना वसूलेंगे, तब ही हम छूट पाएंगे। नाम, पिता का नाम, पता, सब तो नोट कर लिया गया। अगर पिताजी को पता चला तो एक तरफ कुआं और एक तरफ खाई।।

एकाएक नईदुनिया के एक

सिटी रिपोर्टर की हम पर नज़र पड़ी। वे पिताजी को जानते थे। लेकिन पुलिस बड़ी ईमानदार निकली। पत्रकार महोदय के कहने पर हमें साइकिल वापस मिल गई और हमें छोड़ भी दिया गया लेकिन अदालत का मुंह तो हमें फिर भी देखना ही था।

हमें समझा दिया गया था। जज साहब से ज्यादा बहस मत करना। चुपचाप अपना अपराध कबूल कर लेना। दो रुपए का जुर्माना भरना पड़ेगा। अगर सफाई पेश की तो जुर्माना डबल हो जाएगा।।

धर्मसंकट और आर्थिक संकट एक साथ। पिताजी तक बात भी नहीं जाए, और आर्थिक मदद भी कहीं से मिल जाए। ऐसे वक्त हमारे दाऊ यानी बड़े भाई साहब बहुत काम आते थे। उन्होंने सब संभाल लिया। कोर्ट में हमारी पेशी भी हो गई और आर्थिक दंड भरने के पश्चात हम लौटकर बुद्धू वापस घर भी आ गए।

आज वन वे में साइकिल क्या हाथी भी निकल जाए, तो कोई अपराध नहीं बनता। पूरी की पूरी बारात एकांगी मार्ग से गुजर जाती है, प्रशासन तमाशा देखता है, उधर डबल सवारी में हमारा तमाशा बन गया। आज हम कितने सुखी हैं

जो यह गीत गा रहे हैं ;

चक्के पे चक्का

चक्के पे गाड़ी।

गाड़ी पे निकली

अपनी डबल सवारी।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४०९ ☆ साहित्यिक पत्रकारिता की चुनौतियां ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०९ ☆

?  आलेख – साहित्यिक पत्रकारिता की चुनौतियां ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन और प्रकाशन वर्तमान समय में किसी दुर्गम हिमालयी चढ़ाई से कम नहीं है क्योंकि यह केवल मुद्रण का व्यवसाय नहीं बल्कि एक वैचारिक प्रतिबद्धता का अनुष्ठान है। आज के इस तीव्र गति वाले डिजिटल युग में जहाँ सूचनाएं पलक झपकते ही स्मृति से ओझल हो जाती हैं वहाँ एक गंभीर साहित्यिक पत्रिका का नियमित प्रकाशन करना अपनी संस्कृति और भाषा के प्रति अगाध प्रेम का ही परिणाम हो सकता है।

कितनी ही साहित्यिक पत्रिकाएं बड़े उत्साह से प्रारंभ की जाती हैं, किन्तु पाठकीय समर्थन ना मिलने से या आर्थिक समस्याओं के चलते, विज्ञापन नहीं मिल पाने से अनेक उतनी ही जल्दी बंद भी हो जाती हैं। साहित्यिक पत्रकारिता के समक्ष सबसे पहली और बुनियादी चुनौती आर्थिक आत्मनिर्भरता की ही है क्योंकि व्यावसायिक पत्रिकाओं की तरह इनके पास विज्ञापनों का बड़ा आधार नहीं होता और यह पूरी तरह से व्यक्तिगत अर्थ प्रबंधन या सुधि पाठकों के सहयोग पर टिकी होती है। जबलपुर से विश्व वाणी हिंदी संस्थान के बैनर तले दिव्य नर्मदा और मंडला से महिष्मति जैसी पत्रिकाओं के प्रकाशन के दौरान मैंने इन धरातलीय संघर्षों को करीब से जिया है जहाँ बढ़ती मुद्रण लागत और डाक व्यय की चुनौतियों के चलते कई बार उत्कृष्ट प्रयासों को भी विराम देना पड़ता है।

कागज की बढ़ती कीमतों और वितरण की जटिलताओं ने लघु पत्रिकाओं के अस्तित्व पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है, हम देख रहे हैं कि इसी कारण कई ऐतिहासिक प्रिंट पत्रिकाएं दम तोड़ रही हैं। हालांकि संकट के इसी दौर ने तकनीक के माध्यम से एक नया मार्ग भी प्रशस्त किया है जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण हमारा ई-अभिव्यक्ति पोर्टल है। वेब पत्रकारिता के नए प्रतिमान स्थापित करते हुए इस मंच ने सात लाख अड़सठ हजार से अधिक हिट्स प्राप्त कर यह सिद्ध कर दिया है कि यदि सामग्री स्तरीय हो, नियमित प्रकाशन किया जाए तो पाठक भौगोलिक सीमाओं को लांघकर जुड़ता है।

 त्वरित संपादन और वैश्विक पहुंच के कारण यह पोर्टल पारंपरिक साहित्यिक पत्रकारिता और आधुनिक तकनीक का एक प्रभावी संगम बनकर उभरा है जहाँ पंद्रह अक्टूबर दो हजार अठारह से हमारी टीम निरंतर साहित्यिक अलख जगा रही है।

प्रिंट मीडिया के अपने गौरव और डिजिटल की अपनी गति के बीच समन्वय साधना ही आज की सबसे बड़ी जरूरत है।

एक बड़ी चुनौती नई प्रतिभाओं के चयन और परिष्कार की भी है क्योंकि आज रचनाओं की बाढ़ तो है लेकिन गुणवत्ता का अकाल पड़ता जा रहा है। ऐसे में संपादक का दायित्व और भी बढ़ जाता है कि वह आत्ममुग्धता के इस दौर में श्रेष्ठ और कालजयी साहित्य को पहचानकर उसे स्थान दे। वैचारिक और संवैधानिक चुनौतियों के बीच निष्पक्षता बनाए रखना भी किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मर्यादा के बीच एक महीन संतुलन साधना पड़ता है।

ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से फ्लिप बुक बनाना, जैसे नवाचारों ने यह दिखाया है कि कैसे दीपावली विशेषांकों की परंपरा को आधुनिक बदलते प्रकाशन चोले में जीवित रखा जा सकता है, और बढ़ते डाक व्यय से निपटकर एक क्लिक में उसे दुनिया में कही भी पहुंचाया जा सकता है।

आब ओ हवा पोर्टल पर मैं नियमित स्तंभ लिख रहा हूं, मेरा अनुभव यही है कि अब युवाओं में प्रकाशित साहित्य की जगह, पॉडकास्ट, ई बुक, किंडल बुक्स आदि अधिक लोकप्रिय है।

अंततः साहित्यिक प्रकाशन केवल पन्नों का संकलन नहीं बल्कि एक जीवंत संवाद है जो अतीत की विरासत को भविष्य के सपनों से जोड़ता है। यदि समाज और सरकारें इन वैचारिक केंद्रों को संरक्षण नहीं प्रदान करेंगी तो आने वाले समय में हमारी बौद्धिक चेतना का धरातल संकुचित हो जाएगा। चुनौतियों के इस महासागर के बीच जो पत्रिकाएं और वेब पोर्टल निरंतर सक्रिय हैं वे वास्तव में शब्द की मशाल लेकर अंधेरों से लड़ने वाले प्रहरियों की तरह हैं जिनकी तपस्या ही साहित्य को सजीव बनाए रखे हुए है। प्रिंट के संघर्षों से लेकर वेब पत्रकारिता के इस नए आकाश तक की यात्रा यही सिखाती है कि माध्यम चाहे जो भी हो निष्ठा और गुणवत्ता ही अंततः पाठक के हृदय में स्थान बनाती है। दिव्य तूलिका इसी संघर्ष की आग में तप कर, मुरैना जैसे एक छोटे शहर से, अवस्थी जी के व्यक्तिगत प्रयासों से निखर रही है। मेरी अशेष मंगल कामनाएं सदैव पत्रिका के साथ हैं।  

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७३ – देश-परदेश – एल पी जी गैस: नई मुसीबत – भाग-१ ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७३ ☆ देश-परदेश – एल पी जी गैस: नई मुसीबत – भाग-१ ☆ श्री राकेश कुमार ☆

घर का चूल्हा ना जले, तो कितना बड़ा पहाड़ टूट पड़ता हैं। आप लोग अभी ये अनुभव नहीं करें होंगे। पुरानी कहावत है, जिस तन लगे वो ही तन जाने”, जिनको समझ ना आया हो तो ” it is bearer who knows where shoe pinches”

कल एक पुराने साथी का फोन आया, उसने बताया कि दस वर्ष पूर्व वो जयपुर में अपना गैस का कनेक्शन जमा करवा कर अपने गृह नगर आ गया था। अब उसको गैस बुक नहीं करने दी जा रही है। जयपुर के कनेक्शन के समय उसका आधार कार्ड लिंक किया गया था। उसको एजेंसी ने डिएक्टिवेट नहीं किया है।

मित्र ने ये भी कह दिया, यदि मेरा काम नहीं हुआ तो, वो अपने गृह नगर से हमारे यहां आ जायेगा। उसकी इस धमकी से हम भी डर गए, और तुरंत गैस एजेंसी चल पड़े।

गैस एजेंसी की दुकान से पांच सो गज़ पूर्व वाहन प्रतिबंधित थे। जिस तरफ भीड़ जा रही थी, हम भी उसका हिस्सा बन गए, अधिकतर लोग खाली सिलेंडर साथ लिए हुए थे।

हमें भी कुंभ मेले की याद आ गई, वहां जैसा मोहाल था। ऐसा लग रहा था आगे त्रिवेणी संगम हैं। सब हमसे आगे जाते हुए प्रतीत हो रहे थे। हम तो भरपेट भोजन किए हुए थे, इसलिए धीरे चल पा रहे थे। भीड़ वाले चेहरे परेशान से नज़र आ रहे थे। मानो कई दिनों से बिना भोजन किए जल्दी में थे। कुछ लोग वापिस भी आ रहे थे। खाली पेट “करो या मरो” जैसी स्थिति होती हैं। हमारे यहां भी कहा गया है, “भूखे भजन ना होई गोपाला”

अब हमें भी भूख लग रही है, आगे की जानकारी के लिए भाग 2 का इंतजार करें।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६५ ⇒ खिलाड़ी भावना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खिलाड़ी भावना।)

?अभी अभी # ९६५ ⇒ आलेख – खिलाड़ी भावना ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अगर किसी खेल में हार-जीत न हो, तो खेल का मज़ा ही क्या ! हर खेल जीतने के उद्देश्य से ही खेला जाता है। जो जीता वही सिकंदर कहलाता है। हारे को हरि नाम।

हर खेल में एक ही भावना होती है, प्रतिद्वंद्विता की भावना ! खेल की एक ही नीति होती है, रणनीति ! अगर भाई भाई भी कोई खेल खेलते हैं, तो एक हारता है, और एक जीतता है। महाभारत में युधिष्ठिर ने जुआ खेला था। पासे उल्टे पड़ते गए, वे सब कुछ हारते चले गए। राजसभा देखती रही, विदुर, भीष्म, कृष्ण कुछ न कर पाए और युधिष्ठिर द्रौपदी को भी हार बैठे। जहाँ शकुनि सामने होता है, हमेशा पासे उल्टे ही पड़ते हैं।।

आजकल सभी खेल पेशेवर हो गए हैं ! जीतने वाले को अगर बड़ी राशि और बड़ा पदक दिया जाता है, तो हारने वाले भी करोड़पति होने लग गए हैं। winner न सही, runner ही सही।

राजनीति भी एक खेल ही है ! यह सेवा का खेल है ! जो जीतेगा, सरकार बनाएगा, वही सेवा करेगा, जो हारेगा, वह न तो खेल छोड़ेगा और न ही सेवा करेगा। उसका खेला तो अब शुरू होता है। जो जीता है, उसे नहीं खेलने देना। वह एक ऐसी कबड्डी का खेल खेलता है, जिसमें सिर्फ टांग खींची जाती है। अगर सामने वाला गिर गया तो बच्चों की तरह ताली बजाई जाती है।।

खेल हो या राजनीति, जीतने के लिए हर तरह के खेल खेले जाते हैं। शक्ति प्रदर्शन, सूझबूझ और साम, दाम, दंड भेद सबका सहारा लिया जाता है। एक खेल मिलीभगत का भी होता है। जहाँ आर्थिक लाभ के लालच में शक्तिशाली हार जाता है और कमज़ोर विजयी हो जाता है। आईपीएल की भाषा में इसे सट्टा कहा जाता है। यह खेल भावना के विपरीत है।

राजनीति में चुनाव जीतने के लिए सभी तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। ये कंडे गोबर के होते हैं और हाथ से बनाये जाते हैं। जब कभी ये हथकंडे भी काम नहीं आते, तो यही कहा जाता है, सारा गुड़ गोबर हो गया। पैसा, शराब और चुनावी वादे भी हथकंडों की श्रेणी में ही आते हैं।।

हमारे देश में दो ही तो राष्ट्रीय खेल हैं, राजनीति और क्रिकेट। राजनीति में खिलाड़ी भावना वैसे तो कम देखने को मिलती है। लेकिन सौजन्यवश, अगर जीता हुआ प्रत्याशी, हारे हुए प्रत्याशी को उसके घर जाकर बधाई दे दे, तो इसे खेल भावना का परिचय कहा जा सकता है।

चूँकि खिलाड़ी भावना, जिसे अधिक प्रभावी ढंग से व्यक्त करने के लिए अंग्रेज़ी में स्पोर्ट्समैन स्पिरिट कहते हैं, जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, खेल से जुड़ी होती है, इसलिए आज भी खेल की हार-जीत केवल खेल के मैदान तक ही सीमित होती है। बाद में सभी हारे हुए, और जीते हुए खिलाड़ी पुरस्कार समारोह में एक दूसरे से हाथ मिलाते हैं, बधाई देते हैं। और खेल समाप्ति के बाद साथ साथ शॉपिंग करते हैं, प्रशंसकों को ऑटोग्राफ देते हैं।।

कितना विचित्र संयोग है ! इस बार चुनाव और आईपीएल टी-20 टूर्नामेंट, तकरीबन, साथ साथ ही चल रहे हैं। एक ओर अगर विश्व के सभी क्रिकेट के धुरंधर अपनी राष्ट्रीयता भूल एक बैनर के तले, पेशेवर तरीके से ही सही, अपनी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं, कोई जीत रहा है, कोई हार रहा है, लेकिन प्रशंसक हर बॉल पर, और हर शॉट पर तालियाँ बजा रहे हैं और स्टेडियम में बैठे दर्शक ही नहीं, घरों में टीवी के सामने बैठे शौकीन और जानकार इस जेंटलमैन’स् गेम अर्थात सभ्य पुरुषों के खेल का आनंद ले रहे हैं, तो दूसरी ओर चुनावी माहौल में केवल एक दूसरे पर कीचड़ उछाला जा रहा है। लोकतंत्र के पवित्र उत्सव का मज़ाक उड़ाया जा रहा है।

चलिए मान लिया, everything is fair in love and war ! लेकिन क्या हम चुनावी हार जीत को क्रिकेट की हार जीत की तरह नहीं ले सकते ? नहीं कदापि नहीं ! ये चुनाव देश का भविष्य निर्धारित करेंगे, देश का भाग्य बदलेंगे। और हम मतदाता भाग्य-विधाता हैं। हमारे लिए यह चुनाव जीवन मरण का प्रश्न है। आईपीएल कोई भी जीते, हमें कोई मतलब नहीं। हमारा ध्यान तो इस ओर है कि इस बार किसकी सरकार बनती है। कोई खिलाड़ी भावना नहीं। खुला खेल फरूखाबादी।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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