हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 743 ⇒ चतुर्थ श्रेणी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चतुर्थ श्रेणी ।)

?अभी अभी # 743 ⇒ आलेख – चतुर्थ श्रेणी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

एक बच्चों का प्यारा सा गाना है –

एक, दो, तीन, चार

भैया बनो होशियार

सबका है कहना

अनपढ़ न रहना

जाओ गुरुजी के पास।

न जाने क्यों गिनती चार के आगे बढ़ती ही नहीं ! दौड़ में तो एक, दो, तीन से ही काम हो जाता है, लेकिन ज़िन्दगी में सब वन टू का फोर करने में लगे रहते हैं।

इंसान कितना भी पढ़ा-लिखा हो, उसे चतुर्थ श्रेणी से गुजरना ही पड़ता है। कॉपी किताब के कवर पर जहाँ चौथी कक्षा अथवा 4th क्लास लिखना होता था, वहाँ रोमन में IV तह क्लास लिखने का एक अलग ही मज़ा था। अगर गलती से डंडा आगे लग गया तो VI th क्लास हो जाता था। पुराने ज़माने की दीवार घड़ी में भी सभी अंक रोमन में ही लिखे रहते थे। आखरी अंक XII बारह का होता था।

परीक्षा में अंक कितने भी लाओ, उत्तीर्ण होने की तीन ही श्रेणियां होती थीं। प्रथम, द्वितीय और तृतीय। एक मेरा मित्र हमेशा गर्व से कहता था :

I never stood second!

क्योंकि वह हमेशा थर्ड डिवीज़न में ही पास होता था।।

अंग्रेजों के ज़माने में रेल में तीन श्रेणियां हुआ करती थी। फर्स्ट, सेकंड और थर्ड ! अंतराल में थर्ड क्लास हटा दी गई और थर्ड क्लास की सुविधाएँ सेकंड क्लास वालों को उपलब्ध करा दी गई। आज आप सेकंड क्लास से कम दर्जे में सफर नहीं कर सकते।

जो लोग ज़्यादा पढ़ाई नहीं कर पाते थे, वे या तो खेती बाड़ी या कोई काम धंधा संभाल लेते थे, या फिर शासकीय नौकरी से संतुष्ट हो जाते थे। शासकीय नौकरी एक समय बड़ी आसानी से मिल जाया करती थी, और मुश्किल से छूटती थी। आजकल मुश्किल से मिलती है और उसे बड़ी मुश्किल से पकड़े रखना पड़ता है।।

एक समय था जब चौथी पास व्यक्ति को एक चतुर्थ श्रेणी की शासकीय नौकरी आसानी से मिल जाती थी। आजकल स्नातकोत्तर को भी नहीं में उत्तर मिलने लगा है।

शासकीय कर्मचारियों की भी चार श्रेणियां होती हैं। प्रथम श्रेणी अधिकारी, द्वितीय श्रेणी अधिकारी, तृतीय श्रेणी कर्मचारी और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी। शासकीय गज़ट में केवल दो ही श्रेणियां हैं, प्रथम और द्वितीय, जिसे हम नौकरशाह अथवा ब्यूरोक्रेट भी कहते हैं और जिनके भरोसे हमारा देश चल रहा है।।

कहीं श्रेणी है, तो कहीं डिग्री !

चतुर्थ के ऊपर तृतीय है। तृतीय श्रेणी को थर्ड डिग्री भी कहते हैं। जो पुलिस के लिए थर्ड डिग्री है, वह रेकी चिकित्सा पद्धति में प्रथम और द्वितीय से भी ऊँची थर्ड डिग्री है। भारतीय त्योहारों और तिथियों में चतुर्थी अथवा चौथ का बड़ा महत्व है।

हमारी वर्ण व्यवस्था में भी चार श्रेणियां हैं। वहाँ भी पहली दो श्रेणी राजपत्रित है। आप उन्हें सुविधानुसार ब्राह्मण और क्षत्रीय कह सकते हैं। बड़े बाबू वणिक हैं। चतुर्थ श्रेणी भृत्य अथवा चपरासी के लिए सुरक्षित है।

समय बदल रहा है ! शिक्षा का स्तर सुधर रहा है। कोई बच्चा अनुत्तीर्ण ही नहीं होता ! फर्स्ट, सेकंड, थर्ड की जगह ग्रेड सिस्टम लागू हो गया है। 99/100 मार्क्स लाने पर प्रश्न किया जाता है, कि परीक्षक ने एक नंबर क्यूँ काटा।।

देश में समाजवाद तो संभव नहीं ! जब वर्ण व्यवस्था की ही कमर टूट गई है, तब अब इस चतुर्थ श्रेणी का औचित्य ही क्या है। जब स्वच्छ भारत अभियान में सभी अपना योगदान दे सकते हैं, तो अपना काम खुद क्यूँ नहीं कर सकते। क्यों साहब से मिलने से पहले चपरासी से मिला जाए। दिन भर कुर्सी तोड़ने और बार बार एक ग्लास पानी मँगवाने के दिन अब लद गए। सभी प्राइवेट ऑफिस में आदमी और मशीन काम करती है, कोई चपरासी नहीं।

पिछले चुनाव में देश में सभी चौकीदार हो गए थे। चुनाव में ही क्यों, और चौकीदार ही क्यों ? अगर हर इंसान अपना काम खुद करने लगे तो चतुर्थ श्रेणी की आवश्यकता ही नहीं पड़े। क्या पता, कल का चौकीदार, इस बार चपरासी बन अच्छे-अच्छोंको पानी पिला दे।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – जीवन यात्रा ☆ “स्मृति शेष शिक्षाविद, साहित्यकार विदग्ध जी ” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव☆

प्रो.चित्रभूषण श्रीवास्तव “विदग्ध

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है जीवन यात्आरा स्पतम्काभ के अंतर्गत आपका एक आलेख स्मृति शेष शिक्षाविद, साहित्यकार विदग्ध जी

☆ जीवन यात्रा ☆ “स्मृति शेष शिक्षाविद, साहित्यकार विदग्ध जी” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

संघर्ष-साधना से भरे सात्विक जीवन के साथ अध्ययन, चिंतन-मनन से प्राप्त परिपक्वता और आभा के तेज से जिनका मुखमंडल सदा दीप्त रहता था उन्हें हम सब कवि-साहित्यकार, अनुवादक, अर्थशास्त्री और शिक्षाविद प्रो.चित्रभूषण श्रीवास्तव “विदग्ध” के नाम से जानते हैं। हिंदी, अर्थशास्त्र एवं शिक्षा में स्नातकोत्तर उपाधियां प्राप्त करने के साथ ही आपने साहित्य में विशेष रुचि के कारण साहित्य रत्न की उपाधि भी प्राप्त की थी। विभिन्न नगरों के विद्यालयों में अपनी विद्वता एवं अध्यापन कौशल से इन्होंने अपने सहयोगियों और छात्रों से सदा विशिष्ट आदर व स्नेह प्राप्त किया। प्रो. चित्रभूषण जी केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक 1, जबलपुर के संस्थापक प्राचार्य थे। वे प्रान्तीय शिक्षण महाविद्यालय जबलपुर से प्राध्यापक के रूप में सेवानिवृत्त हुए।

1948 में देश की प्रतिष्ठित पत्रिका सरस्वती में विदग्ध जी की प्रथम रचना प्रकाशित हुई थी फिर निरन्तर देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाओं के प्रकाशन का सिलसिला जारी रहा। आकाशवाणी केन्द्रों एवं दूरदर्शन से भी उनकी रचनाओं का प्रसारण जब-तब होता रहा। ईशाराधन, वतन को नमन, अनुगुंजन, नैतिक कथाएं, आदर्श भाषण कला, कर्मभूमि के लिए, बलिदान, जनसेवा, अंधा और लंगड़ा, मुक्तक संग्रह, समाजोपयोगी उत्पादक कार्य, शिक्षण में नवाचार, मानस के मोती आदि उनकी चर्चित पुस्तकें हैं। प्रो.चित्रभूषण जी ने भगवतगीता, मेघदूतम एवं रघुवंशम के हिंदी अनुवाद के साथ ही संस्कृत एवं मराठी के अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों का हिंदी अनुवाद भी किया। सम सामयिक घटनाओं पर निर्भीकता से कलम चलाने वाले गांधीवादी साहित्यकार “विदग्ध”जी के प्रशंसकों में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी जी भी शामिल थे। शिक्षा विभाग की अनेक समितियों में पदाधिकारी/सदस्य रहे प्रो.चित्रभूषण जी जबलपुर सहित जिन-जिन नगरों में सेवारत रहे वहां की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं के माध्यम से प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने का कार्य भी करते रहे। उन्होंने मंडला में रेडक्रॉस समिति की स्थापना की। छात्र जीवन में हॉकी एवं वालीबॉल के खिलाड़ी रहे विदग्ध जी नई पीढ़ी को संदेश देते हुए कहते थे कि “नियमित एवं सादा जीवन मनुष्य को शारीरिक-मानसिक व्याधियों से दूर रखता है। ” वे गीता को धर्म विशेष का ग्रंथ न मान कर इसे समस्त मानव जाति का पथ प्रदर्शक मानते थे। उनके अनुसार जीवन में क्या उचित, क्या अनुचित है यही गीता में बताया गया है।

ज्ञान-साधना से प्राप्त अनुभवों को आजीवन उदारता पूर्वक समाज को वितरित करते रहने वाले प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव “विदग्ध” जी अब हमारे बीच नहीं हैं किंतु उनके द्वारा रचित साहित्य एवं उनका जीवन दर्शन सदा समाज का मार्गदर्शन करता रहेगा।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 742 ⇒ एक अनार ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एक अनार।)

?अभी अभी # 742 ⇒ आलेख – एक अनार ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

न जाने क्यों, जब भी एक अनार की बात आती है, सौ बीमार बीच में आ जाते हैं ! आज हम सिर्फ अनार की बात करेंगे, किसी बीमार की नहीं।

यह एक सर्वविदित तथ्य है कि एक बीज में पूरा वृक्ष समाया रहता है। जब तक बीज किसी स्थान पर सुरक्षित होता है, तब तक वह केवल एक बीज ही रहता है, लेकिन जैसे ही उसे भूमि में बो दिया जाता है, हवा पानी और प्रकाश की मदद से उसका स्फुरण हो जाता है, और कालांतर में शनैः शनैः वह एक वृक्ष अथवा पौधे में परिवर्तित हो जाता है। फलते-फूलते, पुष्प और फल से वह अलंकृत होता है। यह एक बीज की जन्म से विकास की यात्रा है।।

मेरे हाथ में एक अनार है ! मैं उसकी संरचना पर गौर कर रहा हूँ। एक टेस्ट क्रिकेट की लैदर बॉल की शक्ल अख्तयार किए, गोलाकार, स्वास्थ्यवर्धक अनार, जिसकी प्रशंसा में कसीदे कढ़े जाते हैं। 

ऊपर केवल मज़बूत छिलका, जो एक किले की तरह अनार के दानों को सुरक्षा प्रदान करता है।

अनार ऐसा फल नहीं कि केले की तरह इधर छीला, और उधर उदरस्थ ! न ही आम की मानिंद रस-भरा, उँगलियों से नर्म किया और चूस लिया। प्रकृति और ईश्वर एक ही महा-शक्ति के दो नाम हैं। उसकी हर रचना पर उसका कॉपीराइट होता है। आप उसकी नकल तो कर सकते हैं, पर उस रचना में प्राण नहीं फूँक सकते। अनार का अपना एक नेटवर्क होता है। लाल-लाल मोतियों से अनार के दाने इस खूबसूरती से एक झीने सफेद आवरण में सजे हुए होते हैं, कि आँखें फटी की फटी रह जाती है। मधुमक्खी के छत्ते की तरह ऐसे एक नहीं कई आवरणों में उन्हें सजाया जाता है। मानो उन्हें सात तालों में सुरक्षित रखा गया हो।।

अनार केवल छिलके को नहीं कहा जाता। वह तो केवल उसका बाहरी सुरक्षा कवच है।

रस भरे दानों की तुलना आप नींबू से भी नहीं कर सकते। नींबू के बीजों को तो निचोड़ते वक्त निष्ठुरतापूर्वक फेंकना पड़ता है। लेकिन रसयुक्त अनार के दानों में मौजूद बीज भी बड़े लाभकारी होते हैं। उलटबासी देखिये !

वास्तव में लाल लाल रसभरे दाने ही अनार हैं, लेकिन उनके अंदर के बीज को अनार-दाना कहते हैं। जिन्हें अनार नहीं पसंद, वे भी अनार-दाने के चूर्ण से इंकार नहीं कर सकते। यह स्वादिष्ट और पाचक दोनों होता है।

एक जान के कई दुश्मन। इस अनार को तो डाल पर लगते देख ही आज़ाद पंछी और चंचल-चपल बंदर टूट पड़ते हैं। इनकी सुरक्षा के लिए इन्हें कपड़े तक में बाँधना पड़ता है। रसभोगी कीड़े तक अनार को नहीं छोड़ते।।

इतनी कष्ट और संघर्षपूर्ण यात्रा के बाद बागान से बाज़ार, और बाज़ार से हमारे हाथों में पहुँचने वाला ईश्वर का यह अनमोल उपहार मैं पहले उसको अर्पित कर, पश्चात, प्रसाद रूप में ग्रहण करता हूँ !!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 741 ⇒ घुटने का दर्द ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घुटने का दर्द।)

?अभी अभी # 741 ⇒ आलेख – घुटने का दर्द ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

इसे कहते हैं, दुखती रग पर हाथ रखना! घुटने का दर्द भले ही आम लगता है, लेकिन अधिकतर यह महान लोगों को ही होता है।

बहुत वर्ष पहले एक परिचित मिले, बोले, मेरे भी घुटने में दर्द है! मैंने पूछा, मेरे भी का क्या मतलब ? वे बोले, क्या आप नहीं जानते, अटल जी को भी है!

और तो और दयालु शंकर अर्थात पूर्व राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा भी घुटनों के दर्द से परेशान रहते थे।

जिस तरह मनुष्य के शरीर में दो घुटने होते हैं, उसी तरह शब्द घुटने के भी दो अर्थ होते हैं।

घुटना शब्द घुटन से बना है। घुटने का दर्द तो चाल-ढाल से ही पकड़ में आ जाता है, लेकिन अंदर की घुटन को सिर्फ महसूस किया जा सकता है, बताया नहीं जा सकता। घुटने के दर्द के तो कई इलाज हैं, नारायणी तेल से मालिश अगर कारगर न हो तो, घुटने का प्रत्यारोपण भी करवाया जा सकता है, लेकिन घुटन का किसी वेद, हकीम, ओझा फ़क़ीर के पास कोई इलाज संभव नहीं। किसी प्यासे ने कहा भी है, इसको ही जीना कहते हैं तो, यूँ ही जी लेंगे। उफ़ न करेंगे, लब सी लेंगे, आँसू पी लेंगे।।

आज तक इस तथ्य पर ज़्यादा विचार नहीं हुआ, कि आदमी एड़ियाँ ज़्यादा घिसता है, या घुटने! बचपन में घुटने-घुटने चलने वाले इंसान का बड़े होकर जब एड़ियाँ घिसने से भी काम नहीं चलता, तब घुटने टेकने ही पड़ते हैं। इससे यह भी सिद्ध होता है कि एड़ियाँ, घुटनों से अधिक मजबूत होती हैं। वे घुटनों की तरह आसानी से घुटने नहीं टेक देती। वैसे भी घुटनों की तुलना में एड़ियाँ कम ही ख़राब होती हैं।

अंधेरे बंद कमरे, और कम हवादार स्थान पर जब साँस लेने में दिक्कत होती है, तब घुटन का अहसास होता है। खुले में, बाग-बगीचों में, और प्राकृतिक स्थानों पर कभी घुटन का अहसास नहीं होता। जो एकांतप्रिय है, जिसकी किसी से घुटती नहीं, वह तो ज़न्नत में भी घुटन का माहौल बना सकता है। मंथरा महलों में भी रहती है।।

जब इंसान अकेला होता है, किसी ग़म को गले से लगाए बैठा होता है, या जब कोई पुराना ज़ख्म हरा हो जाता है, तो वह अंदर से घुटने लगता है। कुछ लोग इस घुटन का इलाज कड़वे घूँट में भी ढूंढना चाहते हैं, लेकिन इससे घुटन और भी बढ़ती ही है, कम नहीं होती।

न जाने क्यों एक ज़माने में घुटनों के दर्द को पहलवानों से जोड़ा जाता था। लेकिन जब से यह पति-पत्नी दोनों को एक साथ होने लगा है, तब से जोड़ों का दर्द कहलाने लगा है।

घुटनों और घुटन दोनों का अगर समय रहते इलाज नहीं किया गया तो इसका शरीर और मन पर विपरीत असर पड़ने लगता है।

शारीरिक वज़न का संतुलन, नियमित व्यायाम, सकारात्मक जीवन और स्वस्थ मानसिकता ही दोनों तरह के दर्द का एकमात्र उपचार है। न कभी अपने आप में घुटें, न कभी आपको घुटने के दर्द का अहसास हो, ईश्वर से आज सुबह की यही प्रार्थना।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 141 – देश-परदेश – टोकन ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 141 ☆ देश-परदेश – टोकन ☆ श्री राकेश कुमार ☆

शब्द अंग्रेज़ी से है, लेकिन अब हमारे देश के सभी भागों में प्रतिदिन अनेक स्थानों पर उपयोग किया जाता है। बैंक उद्योग इसका उपयोग ग्राहक को अधिकतर भुगतान के लिए करते थे। जब सरकारी कार्यों के लिए बैंक में बहुत अधिक भीड़ रहती थी, तो ग्राहक टोकन प्राप्त कर लेने पर ये ही मान लेता था “Well begun is half done”

अनेक विदेशी भोजनालय, भोजन से पूर्व भुगतान लेकर एक स्टैंड जिस पर अंक या कोई निशान बना रहता है, ग्राहक को थमा देता, जिसको वो अपने टेबल पर रख देता है, ताकि वेटर उनकी पहचान कर सके। कुछ जगह तो टोकन से आवाज़ भी आ जाती, इसका तात्पर्य ये होता है, आप काउंटर पर जा कर आर्डर का भोजन स्वयं उठा सकें। हमारे देश में तो काउंटर वाला जोर से नंबर या आपका नाम लेकर भी आवाज़ दे देता है या आपके पहने हुए कपड़े के रंग आदि से पुकार लेता है।

डॉक्टर के क्लिनिक पर भी पेपर टोकन आदि देकर रोगी को इंतजार करवाया जाता है। हमारे घर के पास एक डॉक्टर साहब के यहां प्लास्टिक का टोकन दिया जाता था। रोगी के परिचित टोकन लेकर घर चले जाते थे, और टोकन वापस तक नहीं करते थे, इसलिए अब वहां गत्ते के टोकन कर दिए गए हैं। पुराने समय में एक डॉक्टर साहब के वहां तो कोई भी सिक्का रख कर नंबर लगता था, उस समय तो एक पैसे से लेकर दो रुपए के सिक्के जेब में भरपूर रहते थे।

“टोकन मनी” शब्द प्रॉपर्टी के सौदे में अग्रिम भुगतान के लिए उपयोग होता है। अंग्रेजी में token of love कहकर विवाह आदि में लिफाफा या कोई वस्तु भेंट स्वरूप दिए जाने की परंपरा बन चुकी है।

अंगूठा, प्रणाम, इमोजी आदि, जो भी आप हमारे व्हाट्स ऐप आलेखों पर अंकित करते हैं, वो सब भी तो हमारे प्रति आपके स्नेह का एक टोकन ही तो है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ कारगिल विजय दिवस विशेष… कुछ किस्से कारगिल के… ☆ श्री अजीत सिंह ☆

श्री अजीत सिंह

(हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन) हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं।  इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है आपका कारगिल विजय दिवस पर एक संस्मरणीय आलेख कुछ किस्से कारगिल के।)

☆ आलेख – कुछ किस्से कारगिल के…  ☆ श्री अजीत सिंह ☆

कारगिल युद्ध की रिपोर्टिंग के लिए जब मैं कारगिल पहुंचा तो एक हद तक यह एक सुनसान शहर था । मैं श्रीनगर से सेना द्वारा आयोजित मीडिया पार्टी का हिस्सा था । प्रमुख मीडिया नेटवर्क के संवाददाताओं वाली पार्टी ने युद्ध क्षेत्र में जाने के लिए सेना की अनुमति प्राप्त करने के लिए श्रीनगर में तीन सप्ताह से अधिक समय तक इंतजार किया था ।

मैं फिल्म डिवीजन की टीम के साथ डीएवीपी की वैन में सफर कर रहा था । हमने युद्ध क्षेत्र में कुछ कहीं फंस जाने की संभावना से निपटने के लिए ब्रेड, मक्खन, बिस्कुट और चावल का पर्याप्त कोटा साथ लिया था ।

मेरे पास मेरे टेपरेकॉर्डर के इलावा एक सैटेलाइट फोन भी था ।

12000 फीट ऊंचे ज़ोजिला दर्रे को पार करते हुए, हमारा पहला हाल्ट एक बोफोर्स तोप बैटरी थी जो ऊंची पहाड़ी के पार पाकिस्तान सेना पर भारी गोलाबारी कर रही थी ताकि हमारे सैनिक आगे बढ़ सकें। यह दृश्य मीडिया के लिए काफी लुभावना था । हम बोफोर्स तोप की मारक क्षमता से बड़े प्रभावित हुए।

उन दिनों भी इस तोप की खरीदी में भ्रष्टाचार का मुद्दा चल रहा था। पिछले शासन के दौरान स्वीडन से इसकी खरीद की गई थी।

कुछ आगे चल कर एक स्थान पर सेना के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा उस क्षेत्र और भारतीय सेना की स्थिति के बारे में एक ब्रीफिंग दी गई । दरास कस्बे के नजदीक टोलोलिंग रिज को पाकिस्तानी घुसपैठियों से खाली करा लिया गया था।

दोपहर के भोजन के समय हमने कुछ जवान फौजी अफसरों से भी बात की। वे बड़े उत्साहित लग रहे थे। उस समय मुख्य लड़ाई टाइगर हिल पर चल रही थी। टाइगर हिल दरास कस्बे के पश्चिम में एक सीधी ऊंची चोटी है। गाइडेड मिसाइलों के साथ बमबारी की फ्लैश लाइट दिखाई दे रही थी। वहां से हमने कारगिल शहर की ओर रुख किया जो पूर्व दिशा में पड़ता है।

संकरी सड़क एक नदी के किनारे चलती है और इसका कुछ हिस्सा काकसर रेंज की ऊंची पहाड़ियों पर बैठे पाकिस्तानी सैनिकों की फायरिंग रेंज में है ।

बीएसएफ के एक जवान ने कुछ जरूरी सावधानियों के लिए चेकपोस्ट पर हमारे वाहनों को रोका।

“आप दुश्मन की फायरिंग रेंज में हैं । अपने वाहनों के बीच लगभग 100 मीटर की दूरी रखें । अंधेरे के दौरान भी कोई लाइट न जगाएं। तेजी से ड्राइव करें और अगर आप पर फायरिंग भी हो जाए तो भी रुकें नहीं” ।

आखिरी निर्देश काफी डरावना था । हमने कुछ वाहनों के मलबे को नदी में नीचे देखा तो हमारा डर और भी बढ़ गया ।

देर शाम तक हम कारगिल के एक होटल में पहुंच गए । शहर को नियंत्रण रेखा के पार से रोजाना तोपखाने की गोलाबारी का सामना करना पड़ रहा था ।

होटल एक तीन मंजिला बिल्डिंग थी लेकिन सभी मीडियाकर्मी पहली मंजिल के कमरे चाहते थे । अब तक उन्हें पता चल चुका था कि टॉप फ्लोर पर तोप का गोला सीधी मार कर सकता है और अगर गोला होटल के कंपाउंड में फट जाता है, तो उसके छर्रे ग्राउंड फ्लोर के कमरों में जा सकते हैं ।

डीसी कारगिल भी पास के एक होटल से कार्य कर रहे थे क्योंकि उनका कार्यालय फायरिंग रेंज में था ।

कारगिल शहर के अधिकांश लोगों को जांस्कर मार्ग पर कुछ दूरी पर सुरक्षित स्थान पर तंबुओं में शिफ्ट किया गया था । अगले दिन हम वहां गए। लोग बड़ी मुसीबत में थे। उन्होंने अपने जानवरों को खुला छोड़ दिया था क्योंकि घर में उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था ।

उससे अगले दिन हमें उस सड़क पर ले जाया गया, जो सिंधु नदी के किनारे पांच गांवों में बसे आर्य लोगों की ओर जाती है । आर्यों में बहुसंख्यक लद्दाखी लोगों से काफी अलग विशेषताएं हैं । वे अपने सिर पर पगड़ी में फूलों को सजा कर रखते हैं, सिवाय उस समय के जब उनके परिवार में कुछ शोक होता है ।

वे आमतौर पर सेना के लिए मजदूर के रूप में काम करते हैं ।

यह एक आर्य चरवाहा ही था जिसने सबसे पहले सशस्त्र घुसपैठियों को देखा और सेना को सूचित किया । सेना ने पता लगाने के लिए अपनी एक खोजी टीम भेजी थी। पाकिस्तानी सैनिकों ने घात लगाकर उन्हे पकड़ लिया और बाद में सभी को बेरहमी से मार दिया गया। उनके क्षत-विक्षत शव भारतीय सेना को सौंप दिए गए । यह अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का स्पष्ट उल्लंघन था ।

हमने आर्य लोगों से बात की जिन्होंने पाकिस्तानी घुसपैठियों की जानकारी दी थी।

अगली शाम जब मैं सैटेलाइट फोन के जरिए अपनी खबर आकाशवाणी दिल्ली भेज रहा था तो होटल का मालिक मेरे कमरे में आया।

उन्होंने कहा कि लगभग एक साल पहले तक आकाशवाणी के समाचार बुलेटिनों में वह मेरा नाम सुनता रहा है। दिल्ली स्थानांतरित होने से पहले मैंने छह साल तक श्रीनगर में आकाशवाणी के वरिष्ठ संवाददाता के रूप में कार्य किया था ।

बातचीत में मैंने उसे एक दिलचस्प व्यक्ति पाया ।

“सर, यह भारतीय सेना को घुसपैठ की पाकिस्तानी योजनाओं के बारे में जानकारी तो पिछले साल अक्टूबर से थी पर इन्होंने ज़रूरी कदम नहीं उठाए। उनके पास पाकिस्तान में अपने जासूसी एजेंटों से पूरी जानकारी थी” ।

मैंने उसे यह कहते हुए टोका कि वह इतना सुनिश्चित कैसे हो सकता है ।

“सर, घुसपैठ के क्षेत्रों के सभी ब्यौरे का एक पत्र 1998 के अक्टूबर में प्राप्त हुआ था । यह उर्दू में था और मुझे इसे पढ़ने के लिए सेना के अधिकारी ने बुलाया था क्योंकि वे उर्दू नहीं पढ़ सकते थे”, उसने कुछ विस्तार से बताया । अब बात कुछ समझ में आ रही थी।

और फिर बात करते हुए वह सुबकने लगा । मैंने उसे सांत्वना देने की कोशिश की तो कहने लगा, “सर, पाकिस्तान हमारे लिए, कारगिल के लोगों के लिए कोई विकल्प नहीं है । हम शिया हैं और हम जानते हैं कि पाकिस्तान में शिया समाज पर क्या ज़ुल्म हो रहे हैं। हमें भारत में ही रहना है । हमारे लिए कोई दूसरा घर नहीं है । लेकिन भारतीय सेना हमारी रक्षा नहीं कर पाएगी” ।

आप ऐसा क्यों महसूस करते हैं? मैंने पूछा।

“शाम को जब मैं सेना के लिए उर्दू की चिट्ठी पढ़ने गया था तो मैंने वहां चौंकाने वाला नज़ारा देखा। सेना के अधिकारी एक-दूसरे की पत्नियों के साथ नाच रहे थे । पत्नियों की कमर पकड़े हुए वे नाच रहे थे और गा रहे थे एक ट्रेन बना कर स्कूली बच्चों की तरह खेल कर रहे थे। वे शराब पी रहे थे । उन्होंने मुझे ठंड के मौसम में मेस के बाहर एक घंटे से अधिक समय तक बैठा कर रखा। क्या आपको लगता है कि ऐसे लोग हमें बचा सकते हैं? जिस अधिकारी ने मुझे फोन कर बुलाया था वह भी नशे में था । हो सकता है कि उसने मेरी बात ठीक से सुनी ही न हो”।

वह थोड़ा उत्तेजित और कुछ हताश लग रहा था ।

मैंने सेना के एक अधिकारी को विश्वास में लेकर यह मामला बताया । उसने कहा, ” जासूसों के पत्र हर साल आते हैं। इन पर विधिवत ध्यान दिया जाता है लेकिन बात अक्सर बढ़ा चढ़ा कर लिखी गई या पूरी तरह से आधारहीन पाई जाती है । कुछ जासूस डबल एजेंट हैं । कभी कभी ये पत्र पाकिस्तान की एजेंसियों द्वारा भी लिखवा कर भिजवाए जाते हैं, हमें गुमराह करने के लिए। सर्दियों के दौरान ऊंची चोटियों पर सैनिक तैनात करना बेहद मुश्किल है ।

मैंने यह खबर नहीं भेजी। कच्ची खबर थी।

चौथे दिन, प्रेस पार्टी वापस श्रीनगर के लिए चल पड़ी। उसी दिन नई दिल्ली में सेना के प्रवक्ता कर्नल बिक्रम सिंह ने घोषणा की कि टाइगर हिल को मुक्त करा लिया गया है । कर्नल बिक्रम सिंह बाद में थल सेना अध्यक्ष भी बने। बीच में उनका एक ब्रिगेडियर के रूप में अनंतनाग में कार्यकाल रहा था ।

टाइगर हिल को फिर से जीतने की गाथा आने वाले हफ्तों और महीनों में सामने आने वाली थी । सिपाही संजय कुमार को 2020 के गणतंत्र दिवस पर परम वीर चक्र के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार से नवाजा जाना था ।

कारगिल युद्ध बहादुर भारतीय सैनिकों ने एक कुटिल दुश्मन की बुरी नीयत और उसके षडयंत्र को नाकाम करके जीता था। इसे इतिहास में याद किया जाता रहेगा। मेरी भी कुछ यादें इससे जुड़ी रहेंगी क्योंकि मैंने इसे अपनी आंखों से देखा था।

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स्क्वाड्रन लीडर लोकेंद्र सिंह को वरिष्ठ नागरिकों की श्रद्धांजलि

हिसार। जुलाई २६। राजस्थान में चूरू के पास वायु सेना युद्धाभ्यास के दौरान 9 जुलाई को विमान दुर्घटना में मारे गए स्क्वाड्रन लीडर लोकेंद्र सिंह को आज वरिष्ठ नागरिक क्लब हिसार में भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस बात का विशेष रूप से उल्लेख किया गया कि विमान में खराबी आने पर उन्होंने बेल आउट नहीं किया और अपनी जान की परवाह न करते हुए अपने फाइटर जेट को आबादी से दूर गिराया।

 स्क्वाड्रन लीडर लोकेंद्र सिंह अपने पीछे अपनी पत्नी सुरभि और एक महीने का पुत्र छोड़ गए हैं। सुरभि का परिवार हिसार में रहता है और वह गांव खरड़ अलीपुर का मूल निवासी रहा है।

 वरिष्ठ नागरिक क्लब की बैठक में उपस्थित सुरभि के पिता सुशील सहरावत ने बताया कि लोकेंद्र सिंह जैगुआर विमान के कुशल फाइटर पायलट थे और उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर में भी भाग लिया था।

 वायु सेना मुख्यालय से प्राप्त पत्र का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि स्क्वाड्रन लीडर लोकेंद्र सिंह बैटल फील्ड स्ट्राइक एक्सरसाइज में हिस्सा ले रहे थे और लोलेवल की उड़ान पर थे जब उनके विमान में खराबी आने के कारण वह गिरने लगा। हौसले और सूझ बूझ का परिचय देते हुए

उन्होंने फाइटर जेट का रुख आबादी से परे कर दिया पर वे स्वयं इस घटना में शहीद हो गए।

 वायु सेना मुख्यालय ने हरियाणा के चीफ सेक्रेटरी को लिखे पत्र में स्क्वाड्रन लीडर लोकेंद्र सिंह की कुर्बानी को बहादुरी की मिसाल करार देते हुए मांग की है कि सरकार उनकी पत्नी सुरभि की पीएचडी की योग्यता को देखते हुए उन्हें सिविल सर्विस या कोई अन्य क्लास वन जॉब दे जैसा कि राज्य के नियमों में प्रावधान है और जैसा कि मुख्य मंत्री नायब सैनी घोषणा भी कर चुके हैं।

 श्रद्धांजलि बैठक में पूर्व डिविजनल कमिश्नर युद्धवीर ख्यालिया भी उपस्थित थे। दो मिनट का मौन रख स्वर्गीय स्क्वाड्रन लीडर लोकेंद्र सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

 

फोटो कैप्शन:

  1. स्क्वाड्रन लीडर लोकेंद्र सिंह

 

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 © श्री अजीत सिंह

पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन हिसार।

मो : 9466647037

26.07.2025

(लेखक श्री अजीत सिंह हिसार से स्वतंत्र पत्रकार हैं । वे 2006 में दूरदर्शन केंद्र हिसार के समाचार निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए।)

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 299 – शिवोऽहम्…(2) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 299 शिवोऽहम्…(2)… ?

शिवोऽहम् के संदर्भ में आज निर्वाण षटकम् के दूसरे श्लोक पर विचार करेंगे।

न च प्राणसंज्ञो न वै पंचवायुः
न वा सप्तधातुः न वा पंचकोशः।
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायु
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।।

न मैं मुख्य प्राण हूँ और न ही मैं पंचप्राणों में से कोई हूँ। न मैं सप्त धातुओं में से कोई हूँ, न ही पंचकोशों में से कोई । न मैं वाणी, हाथ, अथवा पैर हूँ, न मैं जननेंद्रिय या मलद्वार हूँ। मैं सदा शुद्ध आनंदमय चेतन हूँ, मैं शिव हूँ , मैं शिव हूँ।

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के इस अद्भुत आत्मपरिचय को यथासंभव समझने का प्रयास जारी रखेंगे।

वैदिक दर्शन में प्राण को ही प्रज्ञा भी कहा गया। शाखायन आरण्यक का उद्घोष है,

यो व प्राणः सा प्रज्ञा, या वा प्रज्ञा स प्राणः

अर्थात जो प्राण है, वही प्रज्ञा है। जो प्रज्ञा है वही प्राण है।

प्राण, वायु के माध्यम से शरीर में संचरित होता है। संचरण करने वाली वायु पाँच स्थानों पर मुख्यत: स्थित होती है। इन्हें पंचवायु कहा गया है। पंचवायु में प्राण, अपान, समान, व्यान, और उदान समाविष्ट हैं।

स्थूल रूप से समझें तो प्राणवायु का स्थान नासिका का अग्रभाग माना गया है। यह सामने की ओर गति करने वाली है। प्राणवायु देह तथा प्राण की अधिष्ठात्री है। अपान का अर्थ है नीचे जाने वाली। अपान वायु गुदा भाग में होती है। मूत्र, मल, शुक्र आदि को शरीर के निचले भाग की ओर ले जाना इसका कार्य होता है। समान वायु संतुलन बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसका स्थान आमाशय बताया गया है। भोजन का समुचित पाचन इसका दायित्व है। व्यान वायु शरीर में सर्वत्र विचरण करती है। इसका स्थान हृदय माना गया है। रक्त के संचार में इसकी विशेष भूमिका होती है। उदान का अर्थ ऊपर ले जाने वाली वायु है। अपने उर्ध्वगामी स्वभाव के कारण यह कंठ, उर, और नाभि में स्थित होती है। वाकशक्ति मूलरूप से इस पर निर्भर है।

इसी तरह त्वचा, मांस, मेद, रक्त, पेशी, अस्थि एवं मज्जा, शरीर की सप्तधातुएँ हैं। इनमें से किसी एक के अभाव में मानवशरीर की रचना दुष्कर है। शरीर में इनका संतुलन बिगड़ने पर अनेक प्रकार के विकार जन्म लेते हैं।

अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनंदमय, शरीर के पंचकोश हैं। हर कोश का नामकरण ही उसे परिभाषित करने में सक्षम है। विभिन्न कोशों द्वारा चेतन, अवचेतन एवं अचेतन की अनुभूति होती है।

जगद्गुरु उपरोक्त श्लोक के माध्यम से अस्तित्व का विस्तार प्राण, पंचवायु, सप्तधातु, पंचकोश से आगे ले जाते हैं। तीसरी पंक्ति में वर्णित वाणी, हाथ, पैर, जननेंद्रिय अथवा गुदा तक, स्थूल या सूक्ष्म तक आत्मस्वरूप को सीमित रखना भी हाथी के जितने भाग को स्पर्श किया, उतना भर मानना है।

विवेचन करें तो मनुष्य को ज्ञात सारे आयामों से आगे हैं शिव। शिव का एक अर्थ कल्याण होता है। चिदानंदरूप शिव होना मनुष्यता की पराकाष्ठा है। इस पराकाष्ठा को प्राप्त करना, हर जीवात्मा का लक्ष्य होना चाहिए।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से रक्षाबंधन तदनुसार शनिवार 9 अगस्त तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगासाथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे। 💥 

💥 101 से अधिक मालाजप करने वाले महासाधक कहलाएंगे 💥

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 740 ⇒ पैदा होने का सुख ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पैदा होने का सुख।)

?अभी अभी # 740 ⇒ आलेख – पैदा होने का सुख ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पैदा होने वाले से, पैदा करने वाला बड़ा होता है। पैदा होना, जीव की नियति है, इसमें सुख और दुःख का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। पैदा होना, किसी का जन्मसिद्ध अधिकार भी नहीं। जो हो गया, सो हो गया। जो नहीं हुआ, सो नहीं हुआ। कहीं सिंगल चाइल्ड, तो कहीं वर्ल्ड इलेवन।

वैसे यह शीर्षक बड़ा भ्रामक है। असली समस्या पैदा होने में नहीं, पैदा करने में है। सृजन सुख जिसे हम मातृत्व सुख भी कह सकते हैं, इसमें पैदा होने वाला तो एक तरह से अकर्ता ही हुआ। सुख दुःख और प्रारब्ध की गठरी अपने सर पर लिए उसे तो बस, इस संसार में प्रवेश करना है। वह एक तरफ पड़ा रोता रहेगा, लोग उसके जन्म की खुशियां मनाते रहेंगे।।

सृजन, सृष्टि का विधान है, नियम है, चक्र है, नियति है। आज अगर हम पैदा नहीं होते, तो कहां होते, जैसे बेतुके और बेबुनियाद प्रश्नों का कोई जवाब नहीं होता। जो हो गया, सो हो गया, जो नहीं हुआ, सो नहीं हुआ। कहीं कोई निःसंतान है तो कहीं संतानों की कतार खड़ी है। इसमें होने वाले का कोई दोष नहीं, जिसके कोई संतान नहीं, उसके लिए भी कोई सहानुभूति नहीं, जिसने पैदा किया, उस पर जरूर आज नहीं तो कल गाज गिरने वाली है, क्योंकि आदमी पर जनसंख्या भारी है।

जो अच्छे संपन्न घरानों में पैदा हुए, चंदन के पालने में झूले, वे अपने आपको सुखी और भाग्यशाली मान सकते हैं, लेकिन रोहिंग्या शरणार्थी, जो न घर का है, न घाट का, कहीं घुसपैठिया है, तो कहीं आतंकवादी, उसके पैदा होने अथवा जिंदा रहने का क्या औचित्य ?

कंट्रोल, कंट्रोल, पेस्ट कंट्रोल !

मेरे घर में आजकल कॉकरोच और छिपकली का सामूहिक सत्संग चल रहा है। पूरा घर कीट पतंग प्रसूति गृह बना हुआ है। जनसंख्या अधिनियम के भरोसे मैं नहीं बैठ सकता। पेस्ट कंट्रोल मेरा अधिकार है। कीड़े मकोड़ों को जीने का अधिकार किसने दिया। अगर कण कण में भगवान है, तो इन्हें भगवान के पास पहुंचाने में ही समझदारी है।

करे कौन भरे कौन ! किसी लेखक की अच्छी रचना को नाम मिल जाता है, प्रसिद्धि मिल जाती है, लेखक और रचना अमर हो जाते हैं तो कुछ रचनाएं ऐसी भी होती हैं, जो पढ़ने के बाद संपादक द्वारा रद्दी की टोकरी में फेंक दी जाती है। उनकी भ्रूण हत्या हो जाती है, उन्हें इस संसार में आने ही नहीं दिया जाता। वे क्या जानें, किसी लेखक की रचना होने का सुख क्या होता है।।

जो पैदा हो गया, सो हो गया, जो रह गया सो रह गया ! किसी जैविक हथियार अथवा पेस्ट कंट्रोल से जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता। अभी तो हम अपने चुने हुए सांसद और विधायक को ही वापस नहीं बुला सकते, जिन्हें भगवान ने इस संसार में भेज दिया, उनका तो भगवान ही मालिक है लेकिन आइंदा अब पैदा होने का सुख इतना आसान भी नहीं होगा ! First come first serve! दो के बाद वैक्सीन ख़त्म।

कुछ कथित सेलिब्रिटीज लिव इन रिलेशन में रहकर दिखावे के लिए ही सही, अनाथ बच्चों को गोद ले रहे हैं। जो पैदा हो गए हैं, उन्हें बेहतर जिंदगी नसीब हो सके इसलिए जनसंख्या नियंत्रण का पालन करते हुए संपन्न लोग भी अगर कुछ have not बच्चों को पालने का संकल्प ले लें, तो शायद सरकार को कोई आपत्ति नहीं होगी। पैदा तो हो गए, पैदा होने का सुख भी अगर उन्हें नसीब हो, तो क्या बुरा है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 739 ⇒ । गुड़ गोबर। ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “। गुड़ गोबर।।)

?अभी अभी # 739 ⇒ आलेख – । गुड़ गोबर। ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

गुड़ – गोबर में अगर गुड़ का गोबर होना है तो प्यार में परिश्रम के बावजूद शिकस्त ही हाथ लगना है। एक समय था, जब करे कराए पर पानी फिर जाता था, आजकल लोग सीधे फ्लश चला देते हैं। रायता फैलाने में तो हम आजकल बहुत आगे निकल गए हैं।

अगर अंगूर को सुखाकर किशमिश और सड़ाकर शराब बनाई जा सकती है, तो गुड़ बेचारे ने ऐसा क्या बिगाड़ा है कि उसकी नियति गोबर होना है।

गूंगे का गुड़ होगा बेचारा, क्या बोले। वैसे आयुर्वेद में पुराने गुड़ का बहुत महत्व बताया गया है, नीबू का अचार और असली घी जितना पुराना होता है, उतना फायदेमंद होता है, लेकिन स्वास्थ्य के मान से आजकल सभी खाद्य पदार्थों की एक्सपायरी डेट होने लग गई है। ऐसे में गुड़ को गोबर होने में ज्यादा वक्त नहीं लगता।।

अनुवाद की अपनी समस्या है। शब्दानुवाद के साथ साथ अगर भाषानुवाद ना हो, तो अर्थ का अनर्थ होने से कोई नहीं रोक सकता। भाषा भाव को पकड़ती है, शब्द अर्थ को। बिमल मित्र एक बंगाली लेखक हुए हैं, जिनके कई उपन्यासों का हिंदी में अनुवाद हुआ है। इतनी रोचक भाषा, किस्सागोही और घटनाओं का तारतम्य पाठकों को इतना बाँध लेता है, मानो लेखक स्वयं सामने मौजूद हो। बेगम मेरी बिस्वास, इकाई दहाई सैकड़ा, खरीदी कौड़ियों के मोल, और हां, साहब बीवी और गुलाम। इन सभी उपन्यासों का अनुवाद दिनेश आचार्य ने किया है, लेकिन वे बीच में कहीं नहीं हैं। बिमल मित्र ही आपके रूबरू हैं।

हमारे व्याकरण के मास्टर जी को अनुवाद का बड़ा शौक था। वे स्वयं wren के ग्रामर और Roget के थिसारस थे। उनके हाथ में कभी पुस्तक नहीं होती थी। साक्षात सरस्वती उनके मुख में विराजमान थी। बस बोल दिया, कल गुड़ गोबर का अंग्रेजी में अर्थ और एक वाक्य बनाकर लाना। बेचारे बच्चे डिक्शनरी में से jaggery और dung शब्द निकालते और वाक्य बनाते।

दूसरे दिन उनकी क्लास ली जाती। लो कर दिया न गुड़ गोबर !

Love’s Labour Lost अंग्रेजी नाटककार विलियम शेक्सपियर का एक सुखांत नाटक है। अंग्रेजी में सुख को कॉमेडी और दुख को ट्रेजेडी कहते हैं। उनकी एक और कॉमेडी का नाम है,

All is well that ends well.

वे यहीं नहीं रुकते। अपने सुखांत नाटकों का अंत भी As you like it नामक play से करते हैं। हमारा नाटक उनके लिए खेल तमाशा ही तो है।।

शेक्सपियर की पूरी कॉमेडी का सीधा प्रसारण तो नहीं हो सकता, लेकिन पर्दे के पीछे उसका आनंद अवश्य लिया जा सकता है। इसके लिए शेक्सपियर को पढ़ना जरूरी नहीं, बस अपने टॉयलेट के कमोड को ही उनकी कॉमेडी मान लेना है। क्योंकि वहां तो वैसे भी सब गुड़ गोबर ही होना है।

रात को बड़े प्यार से छप्पन में विजय चाट का पेटिस और खमण, और बाद में मधुरम स्वीट्स की रसमलाई ! और तो और मोनिका गैलेक्सी की आइसक्रीम भी कोई काम नहीं आई। सुबह सब खाया पीया निकल गया। हुआ न Love’s Labour Lost. चलो इतने दिनों की कब्जियत से छुटकारा तो मिला। शेक्सपीयर ने गलत नहीं कहा, All is well that ends well. अच्छा ही हुआ, करे कराए पर फ्लश जो फिर गया। As you like it. अब आपको जैसा भी लगे।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #285 ☆ दर्द की इंतहा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख दर्द की इंतहा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 285 ☆

☆ दर्द की इंतहा… ☆

‘दर्द को भी आधार कार्ड से जोड़ दो/ जिन्हें मिल गया है दोबारा ना मिले’ बहुत मार्मिक उद्गार,क्योंकि दर्द हमसफ़र है; सच्चा जीवन-साथी है; जिसका आदि-अंत नहीं। ‘दु:ख तो अपना साथी है’ गीत की ये पंक्तियां मानव में आस्था व विश्वास जगाती हैं; मन को ऊर्जस्वित व संचेतन करती है। वैसे तो रात्रि के पश्चात् भोर,अमावस्या के पश्चात् पूर्णिमा व दु:ख के पश्चात् सुख का आना निश्चित है; अवश्यंभावी है। सुख-दु:ख दोनों मेहमान हैं और एक के जाने के पश्चात् ही दूसरा दस्तक देता है।

समय निरंतर अबाध गति से चलता रहता है; कभी रुकता नहीं। सो! जो आया है अवश्य जाएगा। इसलिए ऐ मानव! तू किसी के आने की ख़ुशी व जाने का मलाल मत कर। ‘कर्म-गति अति न्यारी/ यह टारे नहीं टरी।’ इसके मर्म को आज तक कोई नहीं जान पाया। परंतु यह तो निश्चित् है कि ‘जैसा कर्म करता,वैसा ही फल पाता इंसान’ के माध्यम से मानव को सदैव सत्कर्म करने की सीख दी गयी है।

अतीत कभी लौटता नहीं और भविष्य अनिश्चित् है। परंतु भविष्य सदैव वर्तमान के रूप में दस्तक देता है। वर्तमान ही शाश्वत् सत्य है,शिव है और सुंदर है। मानव को सदैव वर्तमान के महत्व को स्वीकारते हुए हर पल को ख़ुशी से जीना चाहिए। चारवॉक दर्शन में भी ‘खाओ-पीओ,मौज उड़ाओ’ का संदेश निहित है। आज की युवा पीढ़ी भी इसका अनुसरण कर रही है। शायद! इसलिए ‘वे यूज़ एंड थ्रो’ में विश्वास रखते हैं और ‘लिव इन’ व ‘मी टू’ की अवधारणा के पक्षधर हैं। वे पुरातन जीवन मूल्यों को नकार चुके हैं,क्योंकि उनका दृष्टिकोण उपयोगितावादी है। वे अहंनिष्ठ क्षणवादी सदैव हर पल को जीते हैं। संबंध-सरोकारों का उनके जीवन में कोई मूल्य नहीं तथा रिश्तों की अहमियत को भी वे नकारने लगे हैं,जिसका प्रतिफलन पति-पत्नी में बढ़ते अजनबीपन के एहसास के परिणाम-स्वरूप तलाक़ों की बेतहाशा बढ़ती संख्या को देखकर लगाया जा सकता है। सब अपने-अपने द्वीप में कैद एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हैं,जिसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा उनके आत्मज भुगत रहे हैं। वे मोबाइल व मीडिया में आकण्ठ डूबे रहते हैं और नशे की लत के शिकार हो रहे हैं जिसका विकराल रूप मूल्यों के विघटन व सामाजिक विसंगतियों के रूप में हमारे समक्ष है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं,रिश्तों की अहमियत रही नहीं और अपहरण,फ़िरौती,दुष्कर्म व हत्या के हादसों में निरंतर इज़ाफा हो रहा है। चहुंओर संशय व अविश्वास का वातावरण व्याप्त है,जिसके कारण इंसान पल भर के लिए भी सुक़ून की साँस नहीं ले पाता।

दूसरी ओर अमीर-गरीब की खाई सुरसा के मुख की भांति बढ़ती जा रही है और हमारा देश इंडिया व भारत दो रूपों में विभाजित परिलक्षित हो रहा है। एक ओर मज़दूर,किसान व मध्यमवर्गीय लोग,जो दिन-भर परिश्रम करने के पश्चात् दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पाते और आकाश की खुली छत के नीचे अपना जीवन बसर करने को विवश हैं। दूसरी ओर बाल श्रमिक शोषण व बाल यौन उत्पीड़न का घिनौना रूप हमारे समक्ष है। एक घंटे में पांच बच्चे दुष्कर्म का शिकार होते हैं; बहुत भयावह व चिंतनीय स्थिति है। दूसरी ओर धनी लोग और अधिक धनी होते जा रहे हैं,जिनके पास असंख्य सुख-सुविधाएं हैं और वे निष्ठुर,संवेदनहीन,आत्मकेंद्रित व निपट स्वार्थी हैं। शायद! इसी कारण गरीब लोग दर्द को आधार-कार्ड से जोड़ने की ग़ुहार लगाते हैं,ताकि छल-कपट से लोग पुन: वे सुविधाएं प्राप्त न कर सके। उनके ज़हन में यह भाव दस्तक देता है कि यदि ऐसा हो जायेगा तो उन्हें जीवन में पुन: अभाव व असहनीय दर्द सहन नहीं करना पड़ेगा,क्योंकि वे अपने हिस्से का दर्द झेल चुके हैं। परंतु इस संसार में यह नियम लागू नहीं होता। भाग्य का लिखा निश्चित् होता है,अटूट होता है,कभी बदलता नहीं। सो! उन्हें इस तथ्य को सहर्ष क़ुबूल कर लेना चाहिए कि कृत-कर्मों का फल जन्म-जन्मांतर तक मानव के साथ-साथ चलता है और उसे अवश्य भोगना पड़ता है। इसलिए सुंदर भविष्य की प्राप्ति हेतू सदैव अच्छे कर्म करें ताकि भविष्य उज्ज्वल व मंगलमय हो सके।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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