हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 734 ⇒ सावन को आने दो ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सावन को आने दो।)

?अभी अभी # 734 ⇒ आलेख – सावन को आने दो ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सावन आए, न आए, जिया जब झूमे सावन है ! सुना है, सावन के महीने में पवन सोर करता है ! इस बार पवन का कोई ज़ोर नहीं चल रहा, पवन सोर नहीं कर रहा।

आषाढ़ चला गया, फिर क्यों सावन रूठ रहा ! सावन के बारे में ऐसी मान्यता है कि वह गरजता, बरसता आता है। कुछ का कहना है वह झूमकर आता है। सब बकवास है। यहाँ तो सावन सूखा जा रहा है।।

मुझे धीरज रखने को कहा जा रहा है। इस बार सावन मास का आगाज़ गुरु पूर्णिमा से हुआ ! आसमान से गुरु कृपा तो बरस गई, बारिश नहीं हुई। ग्रहण तो चाँद को लगा था, बारिश को तो नहीं। इधर की तरह उधर भी इम्-बैलेंस है। मुम्बई में मानसून आ गया। मुम्बई ने समय पर उसे इंदौर की ओर रि-डायरेक्ट भी कर दिया। अब कोई डंडा लेकर बारिश तो नहीं करवा सकता। कहीं बाढ़ है कहीं सूखा ! वही बात हुई, कहीं भोजन फेंका जा रहा, तो कहीं कोई भूखा सो रहा।

विविध भारती के अनुसार, पड़ गए झूले, सावन ऋतु आई रे ! कुछ शायराना तबीयत के लोग इसका फ़ायदा उठाना चाहते हैं। सावन के महीने में, एक आग सी सीने में, लगती है तो, पी लेता हूँ, दो चार घड़ी जी लेता हूँ।।

यह आग कब बुझेगी ! हम सीने की नहीं, धरती की आग की बात कर रहे हैं। एक हमारे कुमार गंधर्व साहब नहीं मान रहे ! अवधूता, गगन घटा गहरानी रे। किसान को खेत में पानी देना है, खेत सूख रहे हैं। अभी ऐसी नौबत नहीं आई है कि राग मेघ मल्हार गाया जाए।

यहां तक तो ठीक है, लेकिन एक बात समझ में नहीं आती, सावन के आते ही, ये देव क्यों सो जाते हैं ! ऐसा प्रतीत होता है, देव अपना चार्ज, हरी भरी वसुंधरा को सौंप निश्चिंत हो सो जाते हैं। दो जून की रोटी पानी की व्यवस्था हो गई। शादी ब्याह सब ठप पड़े हैं। करने वाले फिर भी कर ही रहे हैं। सावन तो समझदार है, समय पर आ गया ! अब देवों से नहीं, देवराज इंद्र से ही उम्मीद है। समय पर आ ही जाएँगे ! अगर नहीं आए, तो आखिर हम कहाँ जाएँगे।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 298 – शिवोऽहम् ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 298 शिवोऽहम्… ?

।। चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।।

गुरु द्वारा परिचय पूछे जाने पर बाल्यावस्था में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा दिया गया उत्तर निर्वाण षटकम् कहलाया। वेद और वेदांतों का मानो सार है निर्वाण षटकम्। इसका पहला श्लोक कहता है,

मनोबुद्ध्यहङ्कार चित्तानि नाहं

न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।

न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥

मैं न मन हूँ, न बुद्धि, न ही अहंकार। मैं न श्रवणेंद्रिय (कान) हूँ, न स्वादेंद्रिय (जीभ), न घ्राणेंद्रिय (नाक) न ही दृश्येंद्रिय (आँखें)। मैं न आकाश हूँ, न पृथ्वी, न अग्नि, न ही वायु। मैं सदा शुद्ध आनंदमय चेतन हूँ, मैं शिव हूँ , मैं शिव हूँ।

मनुष्य का अपेक्षित अस्तित्व शुद्ध आनंदमय चेतन ही है। आनंद से परमानंद की ओर जाने के लिए, चिदानंद से सच्चिदानंद की ओर जाने के लिए साधन है मनुष्य जीवन।

सर्वसामान्य मान्यता है कि यह यात्रा कठिन है। असामान्य यथार्थ यह  कि यही यात्रा सरल  है।

इस यात्रा को समझने के लिए वेदांतसार का सहारा लेते हैं जो कहता है कि अंत:करण और बहि:करण, इंद्रिय निग्रह के दो प्रकार हैं।  मन, बुद्धि और अहंकार अंत:करण में समाहित हैं। स्वाभाविक है कि अंत:करण की इंद्रियाँ देखी नहीं जा सकतीं, केवल अनुभव की जा सकती हैं। संकल्प- विकल्प की वृत्ति अर्थात मन, निश्चय-निर्णय की वृत्ति अर्थात बुद्धि एवं स्वार्थ-संकुचित भाव की वृत्ति अर्थात अंहकार। इच्छित का हठ करनेवाले मन, संशय निवारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाली बुद्धि और अपने तक सीमित रहनेवाले अहंकार की परिधि में मनुष्य के अस्तित्व को समेटने का प्रयास हास्यास्पद है।

बहि:करण की दस इंद्रियाँ हैं। इनमें से चार इंद्रियों आँख, नाक, कान, जीभ तक मनुष्य जीवन को बांध देना और अधिक हास्यास्पद है।

सनातन दर्शन में जिसे अपरा चेतना कहा गया है, उसमें निर्वाण षटकम् के पहले श्लोक में निर्दिष्ट आकाश, भूमि, अग्नि, वायु, मन, बुद्धि, अहंकार जैसे स्थूल और सूक्ष्म दोनों तत्व सम्मिलित हैं। अपरा प्रकृति केवल जड़ पदार्थ या शव ही जन सकती है। परा चेतना या परम तत्व या चेतन तत्व या आत्मा का साथ ही उसे चैतन्य कर सकता है, चित्त में आनंद उपजा सकता है, चिदानंद कर सकता है।

आनंद प्राप्ति में दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। दृष्टिकोण में थोड़ा-सा परिवर्तन, जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन लाता है। मनुष्य का अहंकार जब उसे भास कराने लगता है कि उसमें सब हैं, तो यह भास, उसे घमंड से चूर कर देता है। दृष्टिकोण में परिवर्तन हो जाए तो वह धन, पद, कीर्ति पाता तो है पर उसके अहंकार से बचा रहता है। वह सबमें खुद को देखने लगता है। सबका दुख, उसका दुख होता है। सबका सुख, उसका सुख होता है। वह ‘मैं’ से ऊपर उठ जाता है।

यूँ विचार करें करें कि जब कोई कहता है ‘मैं’ तो किसे सम्बोधित कर रहा होता है? स्वाभाविक है कि यह यह ‘मैं’ स्थूल रूप से दिखती देह है। तथापि यदि आत्मा न हो, चेतन स्वरूप न हो तो देह तो शव है। शव तो स्वयं को सम्बोधित नहीं कर सकता। चिदानंद चैतन्य, शव को शिव करता है  और जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के शब्द सृष्टि में चेतनस्वरूप की उपस्थिति का सत्य, सनातन प्रमाण बन जाते हैं।

इसीलिए कहा गया है, ‘शिवोहम्’,..मैं शिव हूँ..’मैं’ से शव का नहीं शिव का बोध होना चाहिए। यह बोध मानसपटल पर उतर आए तो यात्रा बहुत सरल हो जाती है।

यात्रा सरल हो या जटिल, इसमें अभ्यास की बड़ी भूमिका है। अभ्यास के पहले चरण में निरंतर बोलते, सुनते, गुनते रहिए, ‘शिवोऽहम्।’

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से रक्षाबंधन तदनुसार शनिवार 9 अगस्त तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगासाथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे। 💥 

💥 101 से अधिक मालाजप करने वाले महासाधक कहलाएंगे 💥

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 733 ⇒ भुट्टा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतिम साँसें।)

?अभी अभी # 733 ⇒ आलेख – भुट्टा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

C O R N

फिल्म श्री 420 की यह पहेली तो आपने भी सुनी होगी ;

इचक दाना बिचक दाना,

दाने ऊपर दाना

छज्जे ऊपर लड़की नाचे

लड़का है दीवाना ..

द ग्रेट छलिया, आवारा राजकपूर इसी गीत में आगे फरमाते हैं ;

हरी थी, मन भरी थी

लाख मोती जड़ी थी,

राजा जी के बाग में

दुशाला ओढ़े खड़ी थी।

कच्चे पक्के बाल हैं उसके,

मुखड़ा है सुहाना

बोलो बोलो क्या ?

बुड्ढी, नहीं भुट्टा …

इचक दाना …!!

हमें भी दुशाला ओढ़े यह जीव भुट्टा नहीं भुट्टो नजर आता है, और हमारा देशभक्त दुशासन जाग जाता है। हम इसका चीरहरण शुरू कर देते हैं, दुष्ट हो अथवा दुश्मन उसके चीरहरण के वक्त तो द्वारकाधीश भी लाज बचाने नहीं आते। जब इसका वस्त्र तार तार हो जाता है, तो अंदर से बेनजीर नहीं, जुल्फिकार अली भुट्टो निकल आते हैं, हम उनकी दाढ़ी मूंछ भी नोच लेते हैं, लेकिन उसे कच्चा नहीं चबाते। हमारे भी कुछ संस्कार हैं, हम उसे भूनकर खाते हैं।

पहले तो हिंदुस्तान पाकिस्तान भी एक ही था और भुट्टे की फसल यहां से वहां तक लहराती थी। बाद में भुट्टा हमने रख लिया और भुट्टो पाकिस्तान में चला गया। आज बिलावल भुट्टो का कोई नाम लेने वाला नहीं और हम इस मौसम में हमारे भुट्टे को छोड़ने वाले नहीं।।

पता नहीं, यह देसी भुट्टा कब अमेरिका चला गया और वहां से पढ़ लिखकर अमरीकन भुट्टा बनकर भारत आ गया। हम तो बचपन से ही देसी भुट्टा खाते चले आ रहे हैं, और इधर सुना है, भुट्टे के बच्चे भी पैदा होने लग गए हैं, जिन्हें बेबी कॉर्न कहा जाने लगा है।

सब बड़े घरों के चोंचले हैं।

हमने ना तो कभी बचपन में कॉर्न फ्लेक्स खाया और ना ही स्वीट कॉर्न। हां भुट्टे के कई व्यंजन खाए हैं, मसलन भुट्टे का कीस, भुट्टे की कचोरी और भुट्टे के पकौड़े। भुट्टे के तो खैर लड्डू भी बनते हैं।।

यही दाने सूखने पर मक्का कहलाते हैं। मक्के की रोटी और सरसों का साग में अगर पंजाब की खुशबू है तो मक्के के ढोकलों में गुजरात का स्वाद। जिसे हम मक्के की धानी कहते हैं, उसे अंग्रेजी में पॉपकॉर्न कहते हैं। अगर आईनॉक्स

(INOX) मॉल में फिल्म देखने जाएं, तो नाश्ते के कॉम्बो की कीमत तीन अंकों में होती है। फिर भी लोग पॉपकॉर्न खाते हुए पॉर्न देखना पसंद करते हैं। शरीफ लोग घर पर ही हॉट कॉफी पीते हुए हॉट स्टार और नेटफ्लिक्स से काम चला लेते हैं।

इस बार पानी बाबा सावन में नहीं आए, अब भादो में ककड़ी भुट्टा साथ लाए हैं।

दाने दाने पर खाने वाले का नाम लिखा है। दांत अगर अच्छे हैं, तो भुट्टे को सेंककर मुंह से खाइए और अगर दांत जवाब देने लग गए हैं तो भुट्टे का कीस, प्रेम से खाइए खिलाइए। अधिक नाजुक मिजाज लोगों के लिए कॉर्न सूप और बेबी कार्न है न।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 732 ⇒ सब – मिट ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सब – मिट।)

?अभी अभी # 732 ⇒ आलेख – सब – मिट ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

| submit |

हर शब्द का एक संदर्भ होता है, एक अर्थ होता है।

कुछ नियम व्याकरण के होते हैं और कहीं कहीं कुछ शब्दों के बारे में कोई तर्क नहीं चलता। आज के शीर्षक में एक शब्द हिंदी का है और एक अंग्रेजी का। लेकिन साथ साथ लिखा होने के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि यह अंग्रेजी का submit शब्द है जिसका अर्थ पेश करना अथवा प्रस्तुत करना होता है। अक्सर इस सबमिट शब्द से रिपोर्ट शब्द भी जुड़ा हुआ है। हिंदी में जिसे हम मामले की विस्तृत जानकारी पेश करना कहते हैं।

हिंदी में सब मिट केवल एक शब्द नहीं, एक अधूरे वाक्य का अंश है। अगर इस अधूरे वाक्य को पूरा करें तो सब मिट गया अथवा सब मिट जाएगा जैसे कई वाक्य बन सकते हैं।।

हम जितने अपनी मातृभाषा में सहज होते हैं उतने अन्य भाषा में नहीं !

अंग्रेजी को तो वैसे भी फनी लैंग्वेज कहा गया है। Put पुट और but बट का कोई स्पष्टीकरण नहीं है। कहीं psychology में p silent है तो walk, talk और chalk में एल। जब तक हम पूरा वाक्य नहीं पढ़ेंगे nose और knows का फर्क कैसे पता करेंगे। जहां उच्चारण एक जैसा हो वहां sun और son में केवल स्पेलिंग से ही अंतर स्पष्ट होता है।

हमारे रिश्ते या तो प्रेम के होते हैं या फिर खून के, हम कभी कानून को बीच में नहीं लाते। लेकिन अंग्रेजी में रिश्तों के बीच कानून बार बार अपनी टांग अड़ाता है। अच्छे भले ससुर फादर इन लॉ हो जाते हैं तो सास मदर इन लॉ ! और तो और, साली आधी घर वाली, को भी कानूनन बहन बना देते हैं ससुरे और साले को ब्रदर इन लॉ। बेटी पराई होते हुए भी कानूनी रूप से लड़की ही रहती है, यानी डॉटर इन लॉ लेकिन दामाद तो वैधानिक रूप से पुत्र ही बन बैठते हैं। सन इन लॉ। ।

एक शब्द है well .वेल, इसका अर्थ कुआं भी हो सकता है और यह आपकी अच्छी तबीयत भी बयां कर सकता है। How are you ? I am quite well. यहां इस quite शब्द ने फिर भटकाया ! और अगर आपने ज्यादा तर्क वितर्क किए तो आपको यह हिदायत भी दी जा सकती है, please keep quiet. और अगर सामने वाला इतनी सी बात पर अपना आपा खो बैठे तो आप पर बरस भी सकता है। Please shut your mouth.

कुछ अंग्रेजी शब्द तो बड़े अपने अपने से लगते हैं। उनकी वॉल और हमारी दीवाल में ज्यादा अंतर नहीं। हमारा उनका mood कितना कॉमन है। हमारा भी मूड कभी अच्छा कभी खराब होता है और उनका भी। बस bad और bed में थोड़ा अंतर है। इंसान का बेडरूम अच्छा होना चाहिए लेकिन आदमी ना तो bad होना चाहिए और ना ही बदनाम। क्योंकि जिसका bad name होता है, हमारी भाषा में वही तो बदनाम होता है। ।

हमारी हां अगर उनकी yes है तो हमारी ना इनकी no. लेकिन यह no कब no से not और फिर not से knot बन जाती है, कुछ पता ही नहीं चलता। हां लेकिन उनकी knot हमारी गांठ से थोड़ी बहुत तो मिलती जुलती ही है।

हमारी हिंदी अंग्रेजी की बड़ी सुखद और रोचक यह सांठगांठ है। जितना प्रेम इन दो भाषाओं में है, काश हम सबमें, आपस में भी उतना प्रेम होता तो कितना अच्छा होता। जिन्हें अंग्रेजी के ढाई अक्षर भी नहीं आते, उन्हें भी लव मैरेज करने से कोई नहीं रोक सकता। भाषा हमें जोड़ती है। Language is only language.

Neither veg.nor non veg. It’s just a language. भले ही सब कुछ जाए मिट, प्रेम की भाषा अमिट।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #284 ☆ अनुभव और निर्णय… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अनुभव और निर्णय। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 284 ☆

☆ अनुभव और निर्णय… ☆

अगर आप सही अनुभव नहीं करते, तो निश्चित् है कि आप ग़लत निर्णय लेंगे–हेज़लिट की यह उक्ति अपने भीतर गहन अर्थ समेटे है। अनुभव व निर्णय का अन्योन्याश्रित संबंध है। यदि विषम परिस्थितियों में हमारा अनुभव अच्छा नहीं है, तो हम उसे शाश्वत् सत्य स्वीकार उसी के अनुकूल निर्णय लेते रहेंगे। उस स्थिति में हमारे हृदय में एक ही भाव होता है कि हम आँखिन देखी पर विश्वास रखते हैं और यह हमारा व्यक्तिगत अनुभव है–सो! यह ग़लत कैसे हो सकता है? निर्णय लेते हुए न हम चिन्तन-मनन करना चाहते हैं; ना ही पुनरावलोकन, क्योंकि हम आत्मानुभव को नहीं नकार सकते हैं?

मानव मस्तिष्क ठीक एक पैराशूट की भांति है, जब तक खुला रहता है, कार्यशील रहता है–लार्ड डेवन का यह कथन मस्तिष्क की क्रियाशीलता पर प्रकाश डालता है और उसके अधिकाधिक प्रयोग करने का संदेश देता है। कबीरदास जी भी ‘दान देत धन न घटै, कह गये भक्त कबीर’ संदेश प्रेषित करते हैं कि दान देते ने से धन घटता नहीं और विद्या रूपी धन बाँटने से सदैव बढ़ता है। महात्मा बुद्ध भी जो हम देते हैं; उसका कई गुणा लौटकर हमारे पास आता है–संदेश प्रेषित करते हैं। भगवान महाबीर भी त्याग करने का संदेश देते हैं और प्रकृति का भी यही चिरंतन व शाश्वत् सत्य है।

मनुष्य तभी तक सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम, सर्वगुण-सम्पन्न व सर्वपूज्य बना रहता है, जब तक वह दूसरों से याचना नहीं करता–ब्रह्मपुराण का भाव, कबीर की वाणी में इस प्रकार अभिव्यक्त हुआ है ‘मांगन मरण एक समान।’ मानव को उसके सम्मुख हाथ पसारने चाहिए, जो सृष्टि-नियंता व जगपालक है और दान देते हुए उसकी नज़रें सदैव झुकी रहनी चाहिए, क्योंकि देने वाला तो कोई और…वह तो केवल मात्र माध्यम है। संसार में अपना कुछ भी नहीं है। यह नश्वर मानव देह भी पंचतत्वों से निर्मित है और अंतकाल उसे उनमें विलीन हो जाना है। मेरी स्वरचित पंक्तियाँ उक्त भाव को व्यक्त करती हैं…’यह किराये का मकान है/ जाने कौन कब तक ठहरेगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे/ खाली हाथ तू जाएगा’ और ‘प्रभु नाम तू जप ले रे बंदे!/ वही तेरे साथ जाएगा’ यही है जीवन का शाश्वत् सत्य।

मानव अहंनिष्ठता के कारण निर्णय लेने से पूर्व औचित्य- अनौचित्य व लाभ-हानि पर सोच-विचार नहीं करता और उसके पश्चात् उसे पत्थर की लकीर मान बैठता है, जबकि  उसके विभिन्न पहलुओं पर दृष्टिपात करना आवश्यक होता है। अंततः यह उसके जीवन की त्रासदी बन जाती है। अक्सर निर्णय हमारी मन:स्थिति से प्रभावित होते है, क्योंकि प्रसन्नता में हमें ओस की बूंदें मोतियों सम भासती हैं और अवसाद में आँसुओं सम प्रतिभासित होती हैं। सौंदर्य वस्तु में नहीं, दृष्टा के नेत्रों में होता है। इसलिए कहा जाता है ‘जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि।’ सो! चेहरे पर हमारे मनोभाव प्रकट होते हैं। इसलिए ‘तोरा मन दर्पण कहलाए’ गीत की पंक्तियाँ आज भी सार्थक हैं।

दोषारोपण करना मानव का स्वभाव है, क्योंकि हम स्वयं को बुद्धिमान व दूसरों को मूर्ख समझते हैं। परिणामत: हम सत्यान्वेषण नहीं कर पाते। ‘बहुत कमियाँ निकालते हैं/ हम दूसरों में अक्सर/ आओ! एक मुलाकात/ ज़रा आईने से भी कर लें।’ परंतु मानव अपने अंतर्मन में झाँकना ही नहीं चाहता, क्योंकि वह आश्वस्त होता है कि वह गुणों की खान है और कोई ग़लती कर ही नहीं सकता। परंतु अपने ही अपने बनकर अपनों को प्रताड़ित करते हैं। इतना ही नहीं, ‘ज़िन्दगी कहाँ रुलाती है/ रुलाते तो वे लोग हैं/ जिन्हें हम अपनी ज़िन्दगी समझ बैठते हैं’ और हमारे सबसे प्रिय लोग ही सर्वाधिक कष्ट देते हैं। ढूंढो तो सुक़ून ख़ुद में है/ दूसरों में तो बस उलझनें मिलेंगी। आनंद तो हमारे मन में है। यदि वह मन में नहीं है, तो दुनिया में कहीं नहीं है, क्योंकि दूसरों से अपेक्षा करने से तो उलझनें प्राप्त होती हैं। सो! ‘उलझनें बहुत हैं, सुलझा लीजिए/ बेवजह ही न किसी से ग़िला कीजिए’ स्वरचित गीत की पंक्तियाँ उलझनों को शीघ्र सुलझाने व शिक़ायत न करने की सीख देती हैं।

उत्तम काम के दो सूत्र हैं…जो मुझे आता है कर लूंगा/ जो मुझे नहीं आता सीख लूंगा। यह है स्वीकार्यता भाव, जो सत्य है और यथार्थ है उसे स्वीकार लेना। जो व्यक्ति अपनी ग़लती को स्वीकार लेता है, उसके जीवन पथ में कोई अवरोध नहीं आता और वह निरंतर सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ता जाता है। ‘दो पल की है ज़िन्दगी/ इसे जीने के दो उसूल बनाओ/ महको तो फूलों की तरह/ बिखरो तो सुगंध की तरह ‘ मानव को सिद्धांतवादी होने के साथ-साथ हर स्थिति में खुशी से जीना बेहतर विकल्प व सर्वोत्तम उपाय  है।

बहुत क़रीब से अंजान बनके निकला है/ जो कभी दूर से पहचान लिया करता था–गुलज़ार का यह कथन जीवन की त्रासदी को इंगित करता है। इस संसार म़े हर व्यक्ति स्वार्थी है और उसकी फ़ितरत को समझना अत्यंत कठिन है। ज़िन्दगी समझ में आ गयी तो अकेले में मेला/ न समझ में आयी तो भीड़ में अकेला…यही जीवन का शाश्वत्  सत्य व सार है। हम अपनी मनस्थिति के अनुकूल ही व्यथित होते हैं और यथासमय भरपूर सुक़ून पाते हैं।

तराशिए ख़ुद को इस क़दर जहान में/ पाने वालों को नाज़ व खोने वाले को अफ़सोस रहे। वजूद ऐसा बनाएं कि कोई तुम्हें छोड़ तो सके, पर भुला न सके। परंतु यह तभी संभव है, जब आप इस तथ्य से अवगत हों कि रिश्ते एक-दूसरे का ख्याल रखने के लिए होते हैं, इस्तेमाल करने के लिए नहीं। हमें त्याग व समर्पण भाव से इनका निर्वहन करना चाहिए। सो! श्रेष्ठ वही है, जिसमें दृढ़ता हो; ज़िद्द नहीं, दया हो; कमज़ोरी नहीं, ज्ञान हो; अहंकार नहीं। जिसमें इन गुणों का समुच्चय होता है, सर्वश्रेष्ठ कहलाता है। समय और समझ दोनों एक साथ किस्मत वालों को मिलती है, क्योंकि अक्सर समय पर समझ नहीं आती और समझ आने पर समय निकल जाता है। प्राय: जिनमें समझ होती है, वे अहंनिष्ठता के कारण दूसरों को हेय समझते हैं और उनके अस्तित्व को नकार देते हैं। उन्हें किसी का साथ ग़वारा नहीं होता और एक अंतराल के पश्चात् वे स्वयं को कटघरे में खड़ा पाते हैं। न कोई उनके साथ रहना पसंद करता है और न ही किसी को उनकी दरक़ार होती है।

वैसे दो तरह से चीज़ें नज़र आती हैं, एक दूर से; दूसरा ग़ुरूर से। ग़ुरूर से दूरियां बढ़ती जाती हैं, जिन्हें पाटना असंभव हो जाता है। दुनिया में तीन प्रकार के लोग होते हैं–प्रथम दूसरों के अनुभव से सीखते हैं, द्वितीय अपने अनुभव से और तृतीय अपने ग़ुरूर के कारण सीखते ही नहीं और यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है। बुद्धिमान लोगो में जन्मजात प्रतिभा होती है, कुछ लोग शास्त्राध्ययन से तथा अन्य अभ्यास अर्थात् अपने अनुभव से सीखते हैं। ‘करत- करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान’ कबीरदास जी भी इस तथ्य को स्वीकारते हैं कि हमारा अनुभव ही हमारा निर्णय होता है। इनका चोली-दामन का साथ है और ये अन्योन्याश्रित है।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 731 ⇒ अंतर्ज्ञान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतर्ज्ञान।)

?अभी अभी # 731 ⇒ आलेख – अंतर्ज्ञान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

= INTUITION =

जानने की प्रक्रिया को ज्ञान कहते हैं। इसके लिए ईश्वर ने हमें एक नहीं पांच पांच ज्ञानेंद्रियां प्रदान की हैं। पांच ही कर्मेंद्रियों से मिल जुलकर इस मनुष्य का यह विलक्षण व्यक्तित्व बना है। चेतन शक्ति, आप जिसे चाहें तो प्राण भी कह सकते हैं, हमारे पंच तत्वों से निर्मित शरीर में सतत प्रवाहित होती रहती है। हमारा उठना, बैठना, सोना, जागना, ऊंघना, हंसना, रोना, देखना, सुनना, बोलना, चखना, छूना जैसी सभी नियमित क्रियाएं मन मस्तिष्क द्वारा संचालित होती है। हमें लगता है, हम ही सब कुछ कर रहे हैं। जब कि सब कुछ अपने आप ही ही रहा है।

अगर आप ही कर्ता हैं, सब कुछ कर रहे हैं, तो रोक दीजिए सब कुछ। आँखें खुली रखिए और कुछ मत देखिए, मत सुनिए कुछ भी इन दोनों कानों से, सांस तो आप ही ले रहे हैं न। मत लिजिए एक दो दिन सांस, क्या बिगड़ जाएगा।

भूख प्यास का क्या है, रह लेंगे कुछ दिन भूखे प्यासे।

आते जाते विचारों पर भी पहरा बिठा दीजिए। अगर विचार अतिक्रमण करते हैं, तो उन पर बुलडोजर चला दीजिए।।

मन, बुद्धि और अहंकार भी आपका नहीं है। इसलिए अब मान भी जाइए, आपका अपना कुछ भी नहीं है। आपको इस पावन धरा पर उतारा गया है और आप अपने आप में एक सर्वगुण संपन्न, एक मानव हैं। A perfect human being creation of God, The Almighty!

मनुष्य जब पैदा होता है तो एक अबोध बालक होता है। शारीरिक विकास के साथ साथ ही उसका मानसिक विकास भी होता चला जाता है। सीखने की प्रवृत्ति उसकी जन्मजात ही होती है। परिवार और परिवेश के अलावा स्कूल वह स्थान होता है, जहां से वह सीखता है, ज्ञान अर्जित करता है। अनुशासित ज्ञान को अध्ययन कहते हैं। ज्ञान के स्तर को डिग्री में विभाजित किया गया है। आप पढ़ते रहें, डिग्रियां हासिल करते रहें।

अध्ययन के लिए हमें ट्यूशन भी लेनी पड़ती है जो आज की भाषा में कोचिंग कहलाती है। सीखना एक सतत प्रक्रिया है जो अनुशासित डिग्रियां हासिल करने के पश्चात भी कभी खत्म नहीं होती। बाहरी ज्ञान की कोई सीमा नहीं। नौकरी धंधे और कामकाज में लग जाने के बाद कौन इंसान बाल भारती भाग १ और फिजिक्स केमिस्ट्री, मैथ्स और बायोलॉजी पढ़ता है। अब काहे की पढ़ाई, काहे की ट्यूशन और काहे की परीक्षा। अब तो गाड़ी चल निकली।।

ट्यूशन अगर बाहरी ज्ञान है, तो इन्ट्यूशन अंतर्ज्ञान ! एक ज्ञान का भंडार हमारे अंदर भी है जिसका बाहरी ज्ञान से कोई संबंध नहीं होता। हम सोचते, समझते ही नहीं, चिंतन मनन भी करते हैं। हमारी कुछ आंतरिक प्रतिभाएं समय और परिस्थिति के साथ उभरकर बाहर आती हैं।

साहित्य, संगीत और अन्य ललित कलाओं को बस एक बार अवसर मिला और टूटे बांध की तरह वह प्रवाहित होने लगती है।

धुन, ध्यान और अंतर्ज्ञान को आप अलग नहीं कर सकते। बाहरी प्रकृति और हमारे अंदर की सृजन की प्रवृत्ति का जब मेल होता है तो एक महाकाव्य की रचना होती है। संगीत की कोई धुन किसी किताब अथवा साज से नहीं निकाली जाती, वह धुन अंदर से प्रकट होती है बाहर तो सिर्फ उसका स्वरूप ही दिखाई देता है।

टैगोर की गीतांजलि किसी शब्दकोश अथवा थिसारस या इनसाइक्लोपीडिया की उपज नहीं, यह कवि का अंतर्ज्ञान है जो सरिता की तरह सतत प्रवाहित होता रहता है।।

विश्व के अधिकांश वैज्ञानिक प्रयोग, खोज हों या अविष्कार, धुन, ध्यान और अंतर्ज्ञान का ही परिणाम हैं। कितनी विचित्र विधा है यह अंतर्ज्ञान ! ज्ञान पहले अंदर गया और बाद में कोई सिद्धांत बनकर बाहर निकला। एक चेतन मन तो है ही, एक अवचेतन मन

भी है, जिसकी स्मृति के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। चेतना के ऊपर पराचेतना का भी अस्तित्व है। अंतर्दृष्टि और अंतर्ज्ञान असीमित है।

एक गीत है, एक आवाज है, एक धुन है। हमें सिर्फ सुनाई देती है लेकिन उसका प्रभाव देखिए, आंख खोलकर नहीं, आंख बंद कर कर, कान खोलकर ;

मेरी आंखों में बस गया कोई रे,

मैं क्या करूं …

क्या यह अतिक्रमण नहीं। रोक सकें तो रोकिए इसे। चलाइए बुलडोजर। यह धुन है, ध्यान है, अंतर्ज्ञान है। नमन उन अनंत विलक्षण

प्रतिभाओं को जिनका प्रकाश सूर्य की तरह सदा, सर्वत्र दैदीप्यमान है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 251 ☆ सफलता का मूलमंत्र… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना विस्तार है गगन में। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 251 ☆ सफलता का मूलमंत्र…

गुरु चरणों में धारिए, सहज सरल मनप्रीत।

आशिषमय सब काज हो, छोड़ हार अरु जीत।।

*

बिन गुरु पूरण हो नहीं, सकल काज ये जान।

गुरुवर से यह सृष्टि है,  उनसे सकल जहान।।

*

गुरु चरणों में बस रहा, जीवन का  विज्ञान।

गुणा भाग सब छोड़ दे, नेहिल सरस सुजान।।

आत्म मंथन- चिंतन छोड़कर पूर्ण मनोयोग से गुरु आज्ञा को जो शिरोधार्य करता है वो जल्दी ही सफलता  वरण करता जाता है।

खुशी चाहिए- आर्थिक स्वतंत्रता से मिलेगी या सपनों के पूरा होने से ये तो आपके दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। उद्देश्य जो भी हो कार्य करते रहना चाहिए। वास्तव में मुझे क्या चाहिए इस पर गुरुवर का मार्गदर्शन मिले तो राह आसान होने लगती है। आलस, टालामटोली व श्रेष्ठ करने की जिद कार्य को अधूरा रखता है। हर मनुष्य में ये ताकत होती है कि वो अपने दिमाग़ पर राज कर सकता है बस सही दिशा की ओर बढ़ने की देर है। चरैवेति – चरैवेति के संकल्प के साथ मंजिल को चल पड़ें उम्मीद से अधिक सहजता से मिलने लगेगा।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – आदर्श ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – आदर्श ? ?

संघर्ष निरंतर जारी है। हर वर्ग का हुजूम मिलकर उस एक शब्द को शब्दकोश से बहिष्कृत करने में जुटा है। मुट्ठी भर हाथ हैं जो प्रतिकूल स्थितियों में भी अपना सर्वस्व दांव पर लगाकर हुजूम से लोहा ले रहे हैं। इन मुट्ठी भर लोगों की अडिगता से ही शब्दकोश में ‘आदर्श’ अब भी साँसे भर रहा है।

?

© संजय भारद्वाज  

 अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से रक्षाबंधन तदनुसार शनिवार 9 अगस्त तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगासाथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे। 💥 

💥 101 से अधिक मालाजप करने वाले महासाधक कहलाएंगे 💥

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 730 ⇒ फेंकने और झेलने की कला ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फेंकने और झेलने की कला।)

?अभी अभी # 730 ⇒ आलेख – फेंकने और झेलने की कला ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

 ©CATCH & THROW©

हम छोटे थे तब से ही कैचम कैच की प्रैक्टिस किया करते थे। दो व्यक्ति और एक वस्तु, जो जरूरी नहीं कि गेंद ही हो। फिर चाहे वह बिस्तर का तकिया ही क्यों न हो। फेंकना और झेलना !

शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा होगा जिसने जीवन में कोई वस्तु फेंकी ना हो, अथवा झेली ना हो। यह एक ऐसी सहज क्रिया है, जिस पर उतनी ही सहज प्रतिक्रिया भी होती है। श्रीमान जी जल्दी में गाड़ी की चाबी भूल गए और पचास सीडियां नीचे उतर गए। अब वे वहीं से श्रीमती जी को आवाज लगाते है, जरा गाड़ी की चाबी फेंक देना, ऊपर ही रह गई है।

कौन सा भाला फेंकना है, श्रीमती जी साधकर ऊपर से चाबी फेंकती है और श्रीमान जी झट से उसे झेल लेते हैं। बहुत वर्षों से बहुत कुछ झेल रहे हैं।

क्रिकेट हो, सामाजिक जीवन हो, अथवा राजनीति फेंकना और झेलना कहां नहीं चलता। अगर कोई झेलने वाला ना हो और कोई फेंकता ही रहे, तो लोग उसे पागल कहते हैं।

हमने गुस्से में लोगों को बहुत कुछ फेंकते देखा है।।

अंग्रेजी में एक कहावत है, two is a company, three is a crowd! लेकिन क्रिकेट और राजनीति में ऐसा नहीं है। क्रिकेट के मैदान में सिर्फ गेंद ही फेंकी जाती है और झेली जाती है। एक गेंदबाज होता है जो लगातार गेंद फेंकता ही रहता है और एक बेचारा विकेट कीपर होता है, जिसे हर गेंद झेलनी पड़ती है। गेंदबाज और विकेट कीपर के बीच एक बल्लेबाज भी होता है जो बल्ले से धुलाई तो गेंद की करता है, लेकिन वह कहलाती गेंदबाज की धुलाई ही है। अगर गेंदबाज की फेंकी गई गेंद बल्लेबाज और विकेट कीपर दोनों से छूटकर बाउंड्री पार कर जाती है तो बल्लेबाज को चार रन एक्स्ट्रा बाय के मिल जाते हैं। चेतन शर्मा की फेंकी आखरी गेंद पर अगर कोई मियां दाद छक्का जड़ दे, तो जो क्रिकेट नहीं समझता, वह भी अपना सर पकड़ ले। आज अगर ऐसा होता तो हम मियां दाद की कॉलर पकड़ लेते।

झेलने में हमारे धोनी जी का जवाब नहीं। एक विकेट कीपर को केवल गेंद झेलनी ही नहीं पड़ती, हाथों हाथ फुर्ती से गेंदबाज को स्टंप भी करना पड़ता है। गेंदबाज की भी एक लक्ष्मण रेखा है, जिसे क्रीज़ (कमीज़ की नहीं) कहते हैं, खेलते वक्त थोड़ी भी रेखा पार की, और धोनी ने अपना कमाल बताया।।

जो तेज फेंकते हैं उन्हें तेज गेंदबाज कहते हैं, और जो घुमावदार गेंदबाजी करते हैं उन्हें स्पिन गेंदबाज कहते हैं। मुरली की गुगली में बल्लेबाज किस गली में धरा जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। अजीब खेल है क्रिकेट ! मैदान में चारों तरफ क्षेत्ररक्षक खड़े हुए हैं, जिनका काम रन को रोकना ही नहीं, गेंद को वापस फेंकना भी है। बल्लेबाज के शॉट को झेलकर उसे पेवेलियन भी पहुंचाना है।

राजनीति भी एक खेल ही तो है। झूठे सच्चे वादे, आश्वासन, और नेताओं की बड़ी बड़ी बातें, जनता को झेलनी ही पड़ती है। जिस भाषण पर राशन नहीं, उसे तो झेलना ही है। एक फेंकनेवाला गेंदबाज और १४० करोड़ झेलने वाले क्षेत्ररक्षक और फिर भी गेंद सीमा रेखा के पार।।

एक इंसान जीवन में क्या क्या नहीं झेलता। बचपन में घर में बड़े बूढ़े और स्कूल में मास्टर जी की रोज रोज की डांट ! कब तक झेले बेचारा। कभी गुस्से में बस्ता फेंकता है तो कभी जूते। बड़ा होकर भी उसे बहुत कुछ झेलना है।

गृहस्थी का बोझ, महंगाई की मार। उस बेचारे के पास फेंकने के लिए कुछ नहीं। उसे तो बस झेलते ही जाना है।

पहले घरों में रोशनदान होते थे, जिससे घर में रोशनी और हवा की आवाजाही बनी रहती थी, तथा कमरों में घुटन नहीं रहती थी। आजकल हवा फेंकने का काम पंखे, कूलर और ए.सी. करते हैं। रसोईघर और प्रसाधन कक्ष में प्रदूषित हवा बाहर फेंकने के लिए एग्जास्ट फैन लगाए जाते हैं।।

इंसान भी कब तक सब कुछ झेलता ही रहे। उसे अंदर का तनाव और कुंठा बाहर फेंकना ही चाहिए।

हमारी घर की महिलाएं भी क्या क्या नहीं झेलती। इसका विरेचन आवश्यक हो जाता है। हमारी आधी बीमारियों की जड़ सीमा से अधिक सहन करना और चुप रहना है। हमें क्यों तनाव और नेता क्यों मस्त। बस यही कारण, कोई फेंक रहा है, और कोई झेल रहा है। कहीं कोई आपके साथ खेल तो नहीं रहा है ?

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 139 – देश-परदेश – वही बनेगी तरकारी! जो आदेश होगा सरकारी!! ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 139 ☆ देश-परदेश – वही बनेगी तरकारी! जो आदेश होगा सरकारी!! ☆ श्री राकेश कुमार ☆

हमारे देश में तो उपरोक्त कहावत हास्य विनोद के लिए प्रयोग की जाती हैं। हम सब लोग तो अपनी मर्जी के मालिक होते है, अधिकतर नियम तो किताबों तक ही सीमित रह जाते हैं। नियम तो तोड़ने के लिए बनाए जाते हैं, ऐसा कहकर हम नियम का पालन नहीं करने वाले को प्रोत्साहित करते हैं।

 

उपरोक्त साइन बोर्ड, अमेरिका के एक सार्वजनिक स्थल पर लगा हुआ था। जिस देश में कुत्ते जैसा प्राणी भी नियमों से बंधा हुआ हो, तो मानव जाति कहना ही क्या ?

कुत्ते की रस्सी/चैन की अधिकतम लंबाई छह फुट से अधिक नहीं रख सकते हैं। यहां तो कुत्ते चैन में बंधे हुए ही पाए जाते हैं। गली के कुत्ते जिसको सभ्य लोग स्ट्रीट डॉग कहते है, यहां ये नस्ल नहीं पाई जाती हैं। यहां के कुत्ते कभी भी स्वच्छंद रूप से विचरण नहीं कर सकते। कभी किसी वाहन के पीछे भी कुत्ते दौड़ते हुए नहीं मिलते। इसलिए यहां के लोग कुत्तों को एक्सरसाइ करने के लिए उनके जिम लेकर जाते हैं। बहुत अमीर लोगों के कुत्ते के लिए उनका निजी ट्रेनर घर पर ही आता है।

इसके अलावा यहां के कुत्ते भौंकते हुए भी नहीं दिखते। हमारे देश में तो कुत्ते और मानव आवश्यकता से अधिक ही भौंकते हैं। मोबाइल पर भी सार्वजनिक स्थानों पर स्पीकर के माध्यम से वार्तालाप करने का चलन बढ़ रहा है।

हमारे देश में अमरीकी राष्ट्रपति आदि के आगमन के समय वहां के सुरक्षा कुत्ते भी साथ ही आते हैं। उनके रहने के लिए भी ए सी कमरे की व्यवस्था की जाती है। हमारे देश के स्ट्रीट डॉग तो किसी गरीब व्यक्ति के साथ ही अपना जीवन यापन कर लेते हैं। दुनिया के सबसे अमीर देश के कुत्ते भी “अमीर कुत्ते” ही कहलाते हैं।

© श्री राकेश कुमार

@ बोस्टन (यू एस ए) 

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares