हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९२ ⇒ कार निषेध दिवस ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कार निषेध दिवस।)

?अभी अभी # ७९२ ⇒ आलेख – कार निषेध दिवस ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

NO CAR DAY •

आज हमारी स्थिति ऐसी हो गई है कि हम एक दिन बिना प्यार के तो रह सकते हैं, लेकिन बिना कार के नहीं रह सकते। एक समय था जब पैसा या प्यार जैसी फिल्में बनती थी, आज अगर कार और प्यार में से किसी एक को चुनना पड़े, तो इंसान को दस बार सोचना पड़ेगा। हमने तो आजकल, दे दे प्यार दे की तर्ज पर, लोगों को आपस में, दे दे कार दे, कार दे, कार दे, कार दे कहते हुए, कार मांगते भी देखा है।

ट्रैफिक जाम और प्रदूषण का हाल ये देखा कि, एक दिन के लिए कार छोड़ दी मैने। एक समय था, जब हर तरफ आदमी ही आदमी नजर आता था, और आज यह नौबत आ गई कि हर तरफ कार ही कार। हर चौराहे पर बत्तियां बदलती रहती हैं और ट्रैफिक केंचुए की तरह रेंगता रहता हैं। चारों ओर से हॉर्न की कर्कश आवाज यही दर्शाती है कि हमने अपना मानसिक संतुलन खो दिया है।।

अंततोगत्वा, ये तो होना ही था ! नो व्हीकल जोन की तरह आप इसे नो व्हीकल डे भी कह सकते हैं। लेकिन वाहन बिन सब सून ! बड़ी ज्यादती हो जाती है। वाहन में तो दो पहिया, तीन पहिया, सिटी बस, स्कूल बस, सभी आते हैं। चलिए, इसे कार तक ही सीमित करते हैं। एक दिन बिना कार का। अब आपको, नो कार डे, से ही समझौता करना पड़ेगा। इसके हिंदी में अनुवाद के चक्कर में मत पड़िए, इंडिया भारत हो गया, यही क्या कम है।

आज की स्थिति में आखिर कार क्यूं, जैसा प्रश्न पूछना ही बेमानी है। जो अपने परिवार से करे प्यार, वो कार से कैसे करे इंकार। जब हम दो थे, तो आराम से, आसानी से वेस्पा, लैंब्रेटा, राजदूत और हीरो होंडा मोटर साइकिल से काम चला लेते थे। हमने भी देखे हैं, चल मेरी लूना के दिन।।

फिर हम दो से, हमारे दो हुए। पहिए भी दो से चार हुए। बाल बच्चों वाला घर, कार का क्या, बेचारी घर के बाहर ही सो जाती है रात को। ठंड, गर्मी, बरसात, कोई शिकायत नहीं, बस सुबह कपड़ा मार दो, चमक जाती है। इंसान होती तो चाय पानी करवा देते, पर उसकी खुराक तो डीजल पेट्रोल है। सबको पेट काट काटकर पालना पड़ता है।

क्या जिनके पास कार नहीं, उनका परिवार नहीं, या वे बेकार हैं। अपनी अपनी हैसियत है, जरूरत है, मेहनत करते हैं, पसीना बहाते हैं, हर महीने कार की किश्त चुकाते हैं, तब कार का शौक पालते हैं।

अपना अपना नसीब है। आप क्यों हमसे जलते हैं।।

नो कार डे को आप बेकार डे नहीं कह सकते। हफ्ते पंद्रह दिन में, कुछ लोग उपवास रखते हैं, अन्न की जगह कुछ और खा लेते हैं। एक पंथ दो काज ! थोड़ा धरम करम, थोड़ा व्रत उपवास, पिज़्ज़ा बर्गर पास्ता की छुट्टी। क्या कहते हैं उसे, संयम। कुछ लोगों से तो कंट्रोल ही नहीं होता।

महीने पंद्रह दिन में अगर कार से भी परहेज किया जाए तो कोई बुरा नहीं। अन्य साधन उपलब्ध तो हैं ही। बस अगर सामूहिक इच्छा शक्ति हो, तो हमारी बहुत ही समस्याओं का निदान तो हम ही कर लें।

जिस तरह बूंद बूंद से घड़ा भरता है, आपके एक दिन कार नहीं चलाने से भी बहुत फर्क पड़ सकता है।

बिना कार कहें, बहिष्कार कहें, आप चाहें तो इसे नो कार डे भी कहें, सब चलता है।।

बढ़ती कारों की संख्या आप रोक नहीं सकते। नए वाहनों के क्रय पर भी आप बंदिश भी नहीं लगा सकते। गैरेज का पता नहीं, कार सड़कों पर रखी जा रही हैं। कार पार्किंग की समस्या भी आज की सबसे बड़ी समस्या है।

जहां सामान खरीदना है, वहीं कार खड़ी कर दी। दो कदम पैदल चल नहीं सकते। पूरी सड़कें गलत पार्किंग से भरी रहती हैं, ट्रैफिक तो बाधित होता ही है। प्रशासन चालान काट काट कर हार गया। भगवान भरोसे शहर की ट्रैफिक व्यवस्था है। फिर भी हम खुश हैं, क्योंकि हमारे पास तो कोई कार ही नहीं है। एवरी डे इज अ, “नो कार डे”।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ नवरात्रि विशेष – नौ संकल्प ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

? नवरात्रि विशेष – नौ संकल्प  ?

श्री संजय भारद्वाज

 ☆ यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: ☆ 

इस नवरात्रि पर्व में शास्त्रोक्त एवं परंपरागत पद्धति से उपासना अवश्य करें। अनुरोध है कि साथ ही निम्नलिखित नौ संकल्पों की सिद्धि का व्रत भी ले सकें तो निश्चय ही दैवीय आनंद की प्राप्ति होगी। इस दृष्टि से नवरात्रि अर्थात शक्तिपर्व महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है।

  1. अपने बेटे में बचपन से ही स्त्री का सम्मान करने का संस्कार डालना देवी की उपासना है।
  2. घर में उपस्थित माँ, बहन, पत्नी, बेटी के प्रति आदरभाव देवी की उपासना है।
  3. दहेज की मांग रखनेवाले घर और वर तथा घरेलू हिंसा के अपराधी का सामाजिक बहिष्कार करना देवी की उपासना है।
  4. स्त्री-पुरुष, सृष्टि के लिए अनिवार्य पूरक तत्व हैं। पूरक न्यून या अधिक, छोटा या बड़ा नहीं अपितु समान होता है। पूरकता के सनातन तत्व को अंगीकार करना देवी की उपासना है।
  5. स्त्री को केवल देह मानने की मानसिकता वाले मनोरुग्णों की समुचित चिकित्सा करना / कराना भी देवी की उपासना है।
  6. हर बेटी किसीकी बहू और हर बहू किसीकी बेटी है। इस अद्वैत का दर्शन देवी की उपासना है।
  7. किसीके देहांत से कोई जीवित व्यक्ति शुभ या अशुभ नहीं होता। मंगल कामों में विधवा स्त्री को शामिल नहीं करना सबसे बड़ा अमंगल है। इस अमंगल को मंगल करना देवी की उपासना है।
  8. गृहिणी 24 x 7 अर्थात पूर्णकालिक सेवाकार्य है। इस अखंड सेवा का सम्मान करना तथा घर के कामकाज में स्त्री का बराबरी से या अपेक्षाकृत अधिक हाथ बँटाना, देवी की उपासना है।
  9. स्त्री प्रकृति के विभिन्न रंगों का समुच्चय है। इन रंगों की विविध छटाओं के विकास में स्त्री के सहयोगी की भूमिका का निर्वहन, देवी की उपासना है।

या देवि सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

💐 शारदीय नवरात्रि की हार्दिक मंगलकामनाएँ 💐 

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© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना सोमवार दि. 22 सितम्बर 2025 से बुधवार 1 अक्टूबर तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा-

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।

इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। माला जप के साथ मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार साधना चलेंगी। 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९१ ⇒ कर्नाटक संगीत ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कर्नाटक संगीत।)

?अभी अभी # ७९१ ⇒ आलेख – कर्नाटक संगीत ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या यह शीर्षक कुछ कुछ राग दरबारी जैसा नहीं ! जब किसी ने मुझे राग दरबारी पढ़ने की सलाह दी तो पहले मुझे अपने आप पर हँसी आई, जिसे शास्त्रीय संगीत का सा रे ग म नहीं मालूम, उसे राग दरबारी पढ़ने की सलाह दी जा रही है। लेकिन जब राग दरबारी पढ़नी शुरू की, तो पता चला, व्यंग्य की भी सरगम होती है, कभी खुशी, कभी गम होती है।

कर्नाटक संगीत के साथ ऐसा नहीं ! यह किसी उपन्यास का नाम नहीं। सभी जानते हैं, कर्नाटक एक प्रदश है, जिसकी भाषा कन्नड़ है और जहां कावेरी नदी के जल को लेकर तमिलनाडु से अक्सर विवाद चलता रहता है। कर्नाटक की दो विधाएं महत्वपूर्ण हैं एक नाटक और संगीत। जहां शीर्षक ही कर्नाटक हो, वहां नाटक ना हो, यह संभव नहीं। संगीत की तरह नाटक भी एक विधा है जिसके लिए कर्नाटक जाना जाता है। फिर चाहे वह नाटक थियेटर का हो अथवा राजनीतिक। ।

जब भी देश में कहीं राजनीतिक उथल पुथल हुई है, दलबदल हुआ है, किसी प्रदेश के लोकतंत्र के सेवकों ने अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनी है, विधायकों को किसी सुदूर, गुप्त स्थान पर नजरबंद किया गया है। न जाने क्यों, इस सियासी नाटक के लिए बेंगलुरु एक सुरक्षित स्थान माना गया है। विश्वास अथवा अविश्वास के मत के दौरान ही देश के ये भावी कर्णधार अचानक अज्ञातवास से प्रकट हो जाते हैं, और लोकतंत्र की रक्षा कर उसे और मजबूत कर देते हैं।

एक कुशल अभिनेता और रंगकर्मी गिरीश कर्नाड का नाम किसने नहीं सुना। वे कर्नाटक के ही नहीं, पूरे नाट्य जगत के गौरव रहे हैं। गिरीश कर्नाड के नाटक तुगलक का सभी भाषाओं में सफलतापूर्वक मंचन ही नहीं हुआ, इस नाटक पर उन्हें संगीत नाट्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत भी किया गया है। लोक नाट्य और लोक संगीत में हमारी सभ्यता और संस्कृति रची बसी है। नाटक और संगीत के बिना जीवन नीरस है। ।

कर्नाटक संगीत और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में बहुत समानता है, क्योंकि जहां सरगम है, वहीं संगीत है। संगीत गायन भी है और वादन भी। एक हिंदी फिल्म आई थी मोहरा। जिसका एक गीत बहुत मशहूर हुआ था। तू चीज बड़ी है मस्त मस्त ! बोल कुछ अटपटे, फूहड़ से लगे थे लेकिन चूंकि यह गीत राग भीम पलासी पर आधारित था, इसलिए खूब चला। इसके बीच के आलाप में आपको कर्नाटक गायन शैली साफ नजर आती है। जो हमारे लिए राग यमन है वह कर्नाटक संगीत में कल्याणी है।

अगर आपने फिल्म पड़ोसन के गीत और संगीत पर ध्यान दिया होगा तो यह उत्तर और दक्षिण के संगीत का एक दुर्लभ फ्यूजन है।

लता का गीत शर्म आती है मगर, अभोगी की एक उत्कृष्ट प्रस्तुति है। राग हंस ध्वनि कर्नाटक शैली का ही राग है।

जा तो से नहीं बोलूं कन्हैया।

राह चलत पकड़ी मोरी बैंया। ।

एक और कमाल।

कहते हैं, संगीत गंधर्व लोक की देन है। कर्नाटक के धारवाड़ जिले में जन्मे शिवपुत्र सिद्धारमय्या कोमकली मठ, जिन्हें हम कुमार गंधर्व के नाम से जानते हैं, इस कथन की पुष्टि करते प्रतीत होते हैं। कर्नाटक शैली के इस गायक ने देवास की माता चामुण्डा देवी की शरण में अपनी संगीत साधना की धूनी ऐसी जमाई कि फिर वापस कर्नाटक जाने का नाम नहीं लिया। भीमसेन जोशी के अभंग से हटकर कबीर के भजनों को मालवी लोकगीतों

की शैली में, अध्यात्म को अपने सुरों में पिरोने का को काम कुमार गंधर्व ने किया वह शास्त्रीय संगीत की अमूल्य धरोहर है। ।

कृष्णा कावेरी का जल जिस तरह कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र, तमिलनाडु की ही नहीं, जन जन की प्यास बुझाती है। हमने देश, प्रदेश ही नहीं, नदी पहाड़ों को भी बांट दिया। कहीं हवा और पानी का भी बंटवारा किया जाता है। कर्नाटक, नाटक और संगीत ही नहीं, अब तो आई टी सेक्टर में भी कमाल दिखा रहा है। नाटक हो या संगीत, हम कैसे भूलें कर्नाटक और वहां के नाट्य पुरुष गिरीश कर्नाड और सवाई कुमार गंधर्व के संगीत और गायन के क्षेत्र में उनके योगदान को। कुमार जी के ही शब्दों में ;

अवधूता, गगन घटा गहराई ..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३७३ ☆ आलेख – “महात्मा गांधी और नवरात्रि” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७३ ☆

?  आलेख – महात्मा गांधी और नवरात्रि ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हमारी संस्कृति में वर्ष में दो बार नवरात्रि वह सुअवसर होता है जब हम अपना मन तन का कंप्यूटर रिफ्रेश और रिफ्रेगमेंट कर लेते हैं।

नवरात्र पर्व व्रत आत्मसंयम, पूजा साधना, और धार्मिक अनुष्ठान का पर्व होता है। दशहरे पर रावण दहन बुराइयों के अंत करने के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।

समाज यह सत्य याद रखे इसलिए हर साल सार्वजनिक रूप से रावण जलाया जाता है। गुजरात में गरबा नृत्य के उत्सव होते हैं।

गांधीजी ने कभी “नवरात्रि व्रत” को धार्मिक पारंपरिक रूप से  नहीं किया, पर वे राजनीती में सदैव अनशन और उपवास की ताकत से ही विजय प्राप्त करते रहे।

उनके जीवन में व्रत, त्याग और त्योहारों के प्रति एक विशेष दृष्टिकोण रहा है।

गांधीजी ने अपने आत्मअनुशासन के प्रयोगों में व्रत को महत्वपूर्ण भूमिका दी। उनकी “आत्मकथा, सत्य के प्रयोग” (The Story of My Experiments with Truth) में वर्णन है कि किशोरावस्था में माँ से प्रेरणा लेकर वैष्णव और शिव व्रतों का पालन किया करते थे। ज्यों ज्यों उनकी समझ विकसित हुई व्रत उनके लिए सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, अहिंसा और सत्य के मार्ग पर चलने का माध्यम बन गया।

उनके व्रतों की सूची बताती है कि उन्होंने राजनीतिक अथवा सामाजिक कारणों से अनेक लंबे अवधि के उपवास किए। चौरी चौरा घटना के बाद हिंसा की निंदा के लिए, हिंदू-मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक उथल-पुथल के समय शांति बहाल करने के लिए, अस्पृश्यता के खिलाफ व अन्य अनेक अवसरों पर गांधी जी ने उपवास को ही अपना अस्त्र बनाया। गांधी की विचारधारा में यह द्वंद्व नहीं कि व्रत धर्म से बाहर हो बल्कि उन्होंने व्रत के  धार्मिक और नैतिक आयाम को स्वीकार किया उसे महत्व दिया। ऐसा कोई इतिहास नहीं  कि गांधीजी ने विशेष रूप से नवरात्रि व्रत को राजनीतिक या सार्वजनिक रूप से मनाया हो। त्यौहारों में भाषण देना या धार्मिक आयोजनों का नेतृत्व करना उनकी फितरत में नहीं था।

इतिहास मिलता है कि लंदन में भारतीय समुदाय के एक दशहरा उत्सव आयोजन में, जहाँ गांधी जी और विनायक दामोदर सावरकर को “दशहरा समारोह” का हिस्सा बनने का निमंत्रण मिला, उस अवसर पर गांधी ने भगवान राम की अहिंसात्मक भूमिका की चर्चा की थी और उन्होंने यह शर्त रखी कि भाषणों में राजनीतिक प्रचार न हो। इस प्रकार दशहरा के धार्मिक, सामाजिक आयोजनों में भी गांधी जी की उपस्थिति अधर्म पर धर्म की विजय के प्रवक्ता रूप में मिलती है।

उन्होंने  त्याग, सत्य, अहिंसा, आत्म नियंत्र के जो मूल्य दिए वे भारतीय संस्कृति से ही प्रेरित थे।

गांधी जी ने नवरात्रि व्रत या दशहरा उत्सव को पारम्परिक भक्तिपूर्ण तरीके से प्रमुखता नहीं दी, परन्तु उनके द्वारा स्वयं को  आत्म शुद्धि और सामाजिक लक्ष्य से जोड़ने की जो प्रवृत्ति विकसित हुई उसमें यही नवरात्रि दशहरा जैसे पर्वों की पारंपरिक साधना है। यदि गांधी के सिद्धांतों का अनुकरण किया जाए तो त्याग, संयम, अहिंसा, सभी के लिए समान भाव से दशहरा, नवरात्रि पर्व मनाया जाए तो वह गांधी जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४२ – छाया रूपेण संस्थिता ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपका आलेख “छाया रूपेण संस्थिता ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४२ ☆

🌻आलेख 🚩छाया रूपेण संस्थिता 🚩

सदियो से चली आ रही— वह दुर्गा की छाया ही तो है। माँ, कन्या, बहन, बेटी, बहु, अर्धांगिनी, स्वामिनी, दासी, सेविका, तत सम भाव रुप और ममता बदलते हुये।

जगह- जगह देवी कहलाने का अधिकार क्या ? सिर्फ नवरात्रे पर ही होती है। वात्सल्य, ममता को आँचल में छिपाये, वंश को पल्लवित करते, अपार नेह बरसाते, आशीष देते वह छाया ही तो है।

कभी शैलपुत्री, ब्रम्ह चारणी, चन्द्र घंटे, कुष्मांडा, स्कंध, कात्यायनी, कालरात्रि, दुर्गा, सिद्धिदात्री सभी रुप गुणों में पूजी जाती है।

स्व और समाज की प्रवृति से चंचला– आज भामिनी से भोगिता, भोगिनी की ओर बढ़ते – छाया रूपेण संस्थिता की श्रेष्ठता- श्रद्धा दोनों खंडन- खंडित, मूरत दर्शिता की भावना रंजित होते चली जा रही है।

या देवी सर्व भूतेशु श्रद्धा रूपेण संस्थिता को पावन करें जगदंबिका।

माँ के नवरात्रे पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं 💐🙏

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १४८ – देश-परदेश – न्याय व्यथा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १४८ ☆ देश-परदेश – न्याय व्यथा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

आप पूरे भारत के किसी भी पुलिस स्टेशन में जाएंगे वहां बहुत सारे गाड़ियां सड़ती हुई आपको मिलेंगी…

यह गाड़ियां पूरी तरह से सड़ जाती हैं और एक अनुमान के मुताबिक भारत को हर साल लगभग 20000 करोड रुपए का नुकसान हो जाता है।

ब्रिटिश पार्लियामेंट में 1872 में ब्रिटिश एविडेंस एक्ट 1872 पारित किया था इसके अनुसार अपराधी के पास बरामद सारी चीजें एविडेंस के तौर पर पेश की जाएंगी और उन्हें सुरक्षित रखा जाएगा और उन्हें अदालत में पेश किया जाएगा।

1872 में तो साईकिल का भी अविष्कार नहीं हुआ था फिर जब यही कानून ब्रिटिश सरकार ने भारत पर लागू कर दिया फिर यह भारतीय एविडेंस एक्ट 1872 बन गया था।

यानी यदि कोई अपराधी अपराध किया है फिर उसे पकड़ा जाता है तो वो जिस गाड़ी में होगा उस गाड़ी को भी एविडेंस बना लिया जाता है या किसी गाड़ी में अपराध हुआ है तो उसे भी एविडेंस एक्ट के तहत जप्त कर लिया जाता है या फिर दो गाड़ियों का एक्सीडेंट हुआ है तब दोनों गाड़ियों को एविडेंस एक्ट में जप्त कर लिया जाता है।

आश्चर्य होता है, किसी भी सरकारी वाहनों को इनसे मुक्त क्यों रखा गया है ? अगर ट्रेन में अपराध होता है तो आज तक नहीं देखा की पुलिस पूरी ट्रेन को जप्त कर के थाने में खड़ा की हो या किसी सरकारी बस में कोई अपराध हुआ हो या सरकारी बस या विमान में कोई मुजरिम पकड़ा गया हो तो पुलिस ने एविडेंस एक्ट के तहत सरकारी बस या विमान को उठाकर थाने में रखा हो।

और यह जितने भी वाहन पकड़े जाते हैं यह जब तक केस का फाइनल फैसला नहीं आ जाता तब तक थाने में पड़े रहते हैं और गर्मी बारिश सब झेलते हैं।

आपको तो पता ही है कि भारत में 50 से 60 साल मुकदमे की सुनवाई में लग जाती है तब तक यह वाहन पूरी तरह से सड़ जाते हैं और जब केस का निपटारा हो जाता है। तब यह वाहन कबाड़ तो छोड़िए सड़कर  जंग बन जाते हैं

सरकार ने एक बार कहा था कि हमने ब्रिटिश जमाने से चले आ रहे बहुत से कानूनों में बदलाव किया है। लेकिन अब इंडियन एविडेंस एक्ट 1872 में भी बदलाव करने की जरूरत है।

सोचिए कि एक वाहन बनाने में कितने घंटे की मजदूरी कितनी पावर कितना कच्चा माल लगा होगा और वह सब कुछ सड़ जाता है किसी के काम नहीं आता…!!

विचार करने वाली बात ये है, कि ये गाड़ियां किस काम आया ना पब्लिक के ना सरकार के… पूरा व्यर्थ हो जाता है..!

राष्ट्रीय क्षति और सीमित संसाधनों का खुले आम दुरुपयोग भी कहा जा सकता हैं। पुलिस स्टेशन के आसपास   कचरे के ढेर के सामान पड़ी हुई बाइक, कारें, ट्रक आदि से कीड़े पतंगे भी पैदा होते है। थाने में कार्यरत पुलिस वालों को तो मच्छर काटते ही है, वहां शिकायत करने जा रहे लोगों को भी मच्छर नहीं छोड़ते हैं।

यदि कुत्तों के मामले से फुर्सत हो गया हो, तो इस मामले में भी संज्ञान ले सकते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९० ⇒ छत्तीस का आंकड़ा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “छत्तीस का आंकड़ा।)

?अभी अभी # ७९० ⇒ आलेख – छत्तीस का आंकड़ा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

शुभ अशुभ की दुनिया में हमने आंकड़ों को भी नहीं छोड़ा। शादी की पत्रिका में जब गुण मिलाए जाते हैं तो बत्तीस शुभ माने जाते हैं और अगर यही गुण 36 हो गए तो समझिए पति पत्नी के बीच छत्तीस का आंकड़ा। भारतीय दंड संहिता में धोखाधड़ी और और बेईमानी की एक धारा है, 420 .इसी से शब्द बन गया है चार सौ बीसी। महान राजकपूर ने इसके आगे भी श्री लगाकर इन्हें श्री 420 बना दिया। नौ और दो ग्यारह होते हैं, लेकिन यहां तो हमने लोगों को भी, रायता फैलाने के बाद, नौ दो ग्यारह होते देखा है।

परीक्षा में कभी 33 % पर छात्र को उत्तीर्ण घोषित किया जाता था। अगर किसी को छत्तीस प्रतिशत अंक आ गए, तो समझो बेड़ा पार। शादी के लिफाफे में कभी ग्यारह, ५१, और 101 रुपए का रिवाज था। सिद्ध महात्माओं और जगतगुरू के आगे केवल 108 लगाने से काम नहीं चलता, श्री श्री 1008 लगाना ही पड़ता है।।

मालवा के बारे में एक कहावत है, “मालव धरती गहन गंभीर, पग पग रोटी, डग डग नीर “।

प्रदेश का प्रमुख शहर इंदौर कभी मुंबई का बच्चा कहलाता था। यहां एक नहीं, छः छः टेक्सटाइल मिल्स थी, जो मजदूरों की रोजी रोटी का प्रमुख साधन था। शहर में तब नर्मदा नहीं थी, लेकिन एक नहीं चार चार तालाब थे, यशवंत सागर, पिपल्या पाला, सिरपुर और बिलावली। लेकिन केवल यशवंत सागर ही इतना सक्षम था, कि पूरे नगर की प्यास बुझा दे। सब तरफ हरियाली थी और कभी यहां नौलखा यानी एक ही इलाके में नौ लाख पेड़ थे।

मानसून इस शहर पर हमेशा मेहरबान रहा है। कभी 36 तो कभी 56 बस, इसी के बीच, यहां का औसत बारिश का आंकड़ा रहा है। कालांतर में कपड़ा मिले बंद जरूर हुई लेकिन शहर का विकास नहीं रुका। तीन चरणों में नर्मदा मैया के चरण इस अहिल्या की नगरी पर पड़े और उसके बाद इस शहर का मानो कायाकल्प हो गया।।

आज यह महानगर स्मार्ट सिटी बनने जा रहा है। जिस शहर में कभी टेम्पो चला करते थे, अब वहां के लोग मेट्रो में सफर करेंगे। भाग तो सभी के जागे हैं लेकिन पानी की समस्या कम होने के बजाय बढ़ती ही चली जा रही है। अप्रैल माह से ही बस्तियों में और सुदूर बहुमंजिला आवासीय परिसरों में पानी के टैंकर दौड़ने लग जाते हैं।

कल जहां खेत और गांव थे आज वहां कॉलोनियां बस गई हैं। ना तू जमी के लिए है और ना आसमान के लिए तेरा वजूद है सिर्फ 2BHK और 3 BHK के लिए। इस बार बारिश का आंकड़ा 36 इंच भी पार नहीं कर पाया है। आसमान से बारिश होती है, पानी जमीन में नहीं जाता सड़कों पर ही जमा हो जाता है। हमारा काम भी अब 36 इंच बारिश से नहीं। इंद्र सुनें और योग्य कार्यवाही करें। हम तो सिर्फ यह प्रार्थना ही कर सकते हैं ;

अल्लाह मेघ दे, पानी दे, छाया दे रे रामा मेघ दे श्यामा मेघ दे

अल्लाह मेघ दे, पानी दे, छाया दे रे रामा मेघ दे।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३०७ – श्राद्ध पक्ष के निमित्त ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ संजय उवाच # ३०७ ☆ श्राद्ध पक्ष के निमित्त… ?

पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं। भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक श्राद्धपक्ष चलता है। इसका भावपक्ष अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और कर्तव्य का निर्वहन है। व्यवहार पक्ष देखें तो पितरों को  खीर, पूड़ी व मिष्ठान का भोग इसे तृप्तिपर्व का रूप देता है। जगत के रंगमंच के पार्श्व में जा चुकी आत्माओं की तृप्ति के लिए स्थूल के माध्यम से सूक्ष्म को भोज देना लोकातीत एकात्मता है। ऐसी सदाशय व उत्तुंग अलौकिकता भारतीय दर्शन में ही संभव है। यूँ भी सनातन परंपरा में प्रेत से  प्रिय का अतिरेक अभिप्रेरित है। पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने की ऐसी परंपरा वाला श्राद्धपक्ष संभवत: विश्व का एकमात्र अनुष्ठान है।

इस अनुष्ठान के निमित्त प्राय: हम संबंधित तिथि को संबंधित दिवंगत का श्राद्ध कर इति कर लेते हैं। अधिकांशत: सभी अपने घर में पूर्वजों के फोटो लगाते हैं। नियमित रूप से दीया-बाती भी करते हैं।

दैहिक रूप से अपने माता-पिता या पूर्वजों का अंश होने के नाते उनके प्रति श्रद्धावनत होना सहज है। यह भी स्वाभाविक है कि व्यक्ति अपने दिवंगत परिजन के प्रति आदर व्यक्त करते हुए उनके गुणों का स्मरण करे। प्रश्न है कि क्या हम दिवंगत के गुणों में से किसी एक या दो को आत्मसात कर पाते हैं?

बहुधा सुनने को मिलता है कि मेरी माँ परिश्रमी थी पर मैं बहुत आलसी हूँ।…क्या शेष जीवन यही कहकर बीतेगा या दिवंगत के परिश्रम को अपनाकर उन्हें चैतन्य रखने में अपनी भूमिका निभाई जाएगी?… मेरे पिता समय का पालन करते थे, वह पंक्चुअल थे।…इधर सवारी किसी को दिये समय से आधे घंटे बाद घर से निकलती है। विदेह स्वरूप में पिता की स्मृति को जीवंत रखने के लिए क्या किया? कहा गया है,

यद्यष्टाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो: जनः।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।

अर्थात श्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण देता है, दूसरे मनुष्य उसी का अनुसरण करते हैं। भावार्थ है कि अपने पूर्वजों के गुणों को अपनाना, उनके श्रेष्ठ आचरण का अनुसरण करना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

विधि विधान और लोकाचार से पूर्वजों का श्राद्ध करते हुए अपने पूर्वजों के गुणों को आत्मसात करने का संकल्प भी अवश्य लें। पूर्वजों की आत्मा को इससे सच्चा आनंद प्राप्त होगा।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना सोमवार दि. 22 सितम्बर 2025 से बुधवार 1 अक्टूबर तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा-

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।

इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। माला जप के साथ मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार साधना चलेंगी। 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७८९ ⇒ विवेक के पन्ने ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विवेक के पन्ने।)

?अभी अभी # ७८९ ⇒ आलेख – विवेक के पन्ने ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ज़िन्दगी एक डायरी है, जिसे आप चाहे लिखें, न लिखें ! कुछ पन्ने विधाता लिखता है, कुछ हमारे द्वारा लिखे जाते हैं। फिर भी कुछ पन्ने कोरे ही रह जाते हैं। मेरी डायरी में भी एक पन्ना विवेक का है, जिस पर आज तक कुछ नहीं लिखा गया। कभी तो श्रीगणेश करना ही है ! सोचा, आज से ही क्यों न कर दूँ।

बुद्धि और ज्ञान के प्रदाता, ऐसा कहा जाता है, मंगलमूर्ति श्रीगणेश हैं ! विवेक के बारे में जब बात करो, तो लोग विवेकानंद तक चले जाते हैं। जब किसी बुद्धिमान को समझा-समझाकर हार जाते हैं, तो मज़बूरन कहना पड़ता है, भाई !अपने विवेक से काम लो।।

ऐसा कहा जाता है, बुद्धि का संबंध मन से है, और विवेक का अन्तर्मन से ! मन से तो हमेशा यही शिकायत रहती है, कि वह मनमानी करता है। इसीलिए कभी भी किसी बुद्धिमान व्यक्ति की मति फिर सकती है। विवेक का मामला थोड़ा अलग है। उस पर मन का नहीं अन्तर्मन का अंकुश जो है।

कभी कभी इंसान का विवेक भी काम नहीं आता। एक सज्जन किसी ज्ञानी के प्रवचन सुन घर लौटे ! ज्ञानी पुरुष की एक बात उन्होंने गाँठ बाँध ली थी ! हर काम विवेक से पूछकर किया करो अब तक वे स्वावलंबी थे। अपना काम स्वयं करते थे।

अब वे सारा काम विवेक से पूछकर करने लगे। विवेक पर भरोसा किया, और धोखा खाया, क्योंकि विवेक तो उनके लड़के का ही नाम था।।

बुद्धि और मन से परे प्रज्ञा का निवास है और विवेक उसकी रखवाली करता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, और मत्सर का अन्तर्मन में प्रवेश वर्जित है। वैसे भी इनका कार्य-क्षेत्र मन तक ही सीमित है। केवल संयम ही हमें विवेक का मार्ग दिखला सकता है। और बिना मन को बस में किये संयम भी हाथ नहीं आता। योगानुशासन की यम-नियम ही बुनियाद हैं। हाथ-पाँव को तोड़ना-मरोड़ना कोई योग नहीं।

विवेक का पन्ना अति-वृहद है ! लेकिन यह स्थूल ज्ञान के शब्दों में नहीं समेटा जा सकता। जितना सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हम होते जाएँगे, विवेक के पन्ने अपने आप खुलते जाएँगे। आइए, मन से पार चलें।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७८८ ⇒ धीमी गति ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “धीमी गति।)

?अभी अभी # ७८८ ⇒ आलेख – धीमी गति ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

लिप्टन माने अच्छी चाय, और धीमी गति माने स्लो मोशन !कभी आकाशवाणी पर धीमी गति के समाचार प्रसारित होते थे। जब हम किसी को डिक्टेशन देते हैं, तो हमें अपने बोलने की गति को धीमा करना पड़ता है। वह पहले सुनता है, समझता है, और फिर लिखता है। सुनने और लिखने में तालमेल को ही डिक्टेशन कहते हैं।

हिंदी में धीमा और तेज़ के लिए दो शब्द प्रचलित हैं, चुस्त और सुस्त। लोग चुस्ती को तंदुरुस्ती और सुस्ती को बीमारी अथवा आलस्य से जोड़ लेते हैं। लाइफबॉय है जहाँ तंदुरुस्ती है वहाँ। टी वी के एक विज्ञापन में तो एक मोटे बच्चे का साबुन भी स्लो बताया गया है, धीते रहो, धोते रहो ! वहीं एक लड़की सिर्फ हैंड वाश लगाती है, और बैक्टीरिया ग़ायब। साबुन भी कहीं स्लो होता है। विज्ञापन क्या न कराए। ।

कुछ लोग चाय चुस्कियां ले लेकर पीते हैं, गर्म चाय को फूँक मार-मारकर ठंडी होने पर पीते हैं, तो कुछ इधर मुँह पर लगाई, और उधर खत्म। भोजन को चबा-चबाकर खाना चाहिए। कुछ लोग भोजन को चबाते ही रह जाते हैं, और सामने वाला पंगत छोड़कर उठ खड़ा होता है। जीवन में कहीं गति है, तो कहीं धीमी गति। कुछ तेज चलते हैं, कुछ धीमे ! जो धीमे चलते हैं, वे यह मानकर चलते हैं, जल्दी का काम शैतान का। धीरे चलिए, सुरक्षित पहुँचिये। और शैतान बाज़ी मार ले जाता है। इनका निर्णय सुरक्षित रखा रह जाता है।

कुछ लोग तेज आवाज में बात करते हैं, तो कुछ इतना धीरे बोलते हैं, कि शायद वे खुद भी नहीं सुन पाते। जो तेज़ आवाज़ में बात करते हैं, उनकी बात ग़लत होते हुए भी सही प्रतीत होती है, और जो धीमी आवाज़ में बातें करते हैं, वे मनमोहनसिंह कहलाते हैं। ।

कुछ की आवाज़ की गति तेज होती है तो कुछ लोग बड़े आराम से बोलते हैं। उनका एक वाक्य एक पेरेग्राफ जितना लंबा होता है, शब्दों की लंबाई के कारण नहीं, बोलने में ठहराव के कारण। एक उदाहरण पेश है।

हमारे शाखा प्रबंधक बहुत आराम से, रूक-रुककर बातें करते थे। वह मोबाइल का नहीं, ट्रंक कॉल का ज़माना था। बड़ी मुश्किल से कॉल लगता था, और तीन मिनिट में समाप्त हो जाता था। आप या तो कॉल एक्सटेंड करें, या फिर से लगाएं !

सुबह एकाएक उनके केबिन की घंटी बजी, उन्होंने टेलीफोन उठाया ! गुड मॉर्निंग सर, (pause)दिस इज़ बैंक ऑफ इंडिया, (pause) लक्ष्मी बाई नगर ब्रांच, (pause) इंदौर। (एक मिनिट पूरा) आय एम आर. आर. जोशी, (pause) ब्रांच मैनेजर, (pause)स्पीकिंग। ( दो मिनिट पूरे ) व्हाट कैन आय डू फ़ॉर यू सर्। और फ़ोन कट गया। तीन मिनिट पूरे। उन्होंने फिर से फ़ोन लगाया, लाइन नहीं मिली। । (अतिशयोक्ति अलंकार)

जो लोग बहुत आराम से बोलते हैं, उन्हें आप आराम से ही सुन सकते हैं ! अगर आप जल्दी में हैं, तो उनकी पूरी बात शायद ही सुन पाएँ। यही बात धीमी गति और तेज़ गति पर लागू होती है। पति-पत्नी साथ-साथ टहलने निकलते हैं, मुश्किल से दो कदम ही साथ चल पाते हैं, कि पति और पत्नी के बीच फासले बढ़ने शुरू हो जाते हैं। पति महोदय पीछे मुड़कर भी नहीं देखते कि उनकी पत्नी किस मोड़ पर है।

जहाँ गति है, वहाँ विकास है, प्रगति है, उन्नति है ! जहाँ धीमी गति है, वहाँ झुग्गी है, झोपड़ी है, चॉल है। अगर गति तेज है, तो स्मार्ट सिटी है, हेल्थ क्लब है, ट्रेड सेंटर है, ऑर्बिट मॉल है।।

हमारी गति चाहे धीमी हो या तेज़। हम जल्दी जल्दी बोलें या आराम से, कोई फर्क नहीं पड़ता। हम सब अपने गंतव्य तक आराम से पहुँच जाते हैं। जीवन में कहीं कछुआ चाल है, तो कहीं खरगोश की गति और कहीं कहीं तो भेड़-चाल ! हम सबकी गति एक ही होना है। हम सब अपनी अपनी चाल से अपने गंतव्य तक पहुंचें, ईश्वर से यही प्रार्थना है। बहुत भागमभाग है जीवन में, थोड़ा सुस्ता लें।

शायद हमारे लिए ही सचिन दा कह गए हैं –

दम ले ले, दम ले ले घड़ी भर !

ये छैयां पाएगा कहाँ।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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