हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७५७ ⇒ खुदकुशी और जिजीविषा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खुदकुशी और जिजीविषा ।)

?अभी अभी # ७५७  ⇒ आलेख – खुदकुशी और जिजीविषा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जिंदगी के कई रंग रूप हैं ;

तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं

वापस बुला ले, मैं सजदे में गिरा हूं

मुझको है मालिक उठा ले..

अब एक रंग यह भी देखिए ;

जिंदगी कितनी खूबसूरत है जिंदगी कितनी खूबसूरत है

आइए, आपकी जरूरत है। ।

आज फिर जीने की

तमन्ना है,

आज फिर मरने का

इरादा है ;

ऐसी तमन्ना और इरादा सिर्फ गीतकार शैलेन्द्र का ही हो सकता है। यूं तो एक आम आदमी, रोज जीता और मरता है, लेकिन वह कभी खुदकुशी करने की नहीं सोचता। मेरा नाम जोकर में यही बात शैलेन्द्र के साहबजादे शैली शैलेन्द्र ने भी दोहराई है ;

जीना यहां मरना यहां

इसके सिवा जाना कहां। ।

इंसान भी अजीब है। एक तरफ वह कहता है, गम उठाने के लिए मैं तो जिये जाऊंगा, और अगर उसे अधिक खुशी मिले तो भी वह कह उठता है, हाय मैं मर जावाँ।

प्यार में लोग साथ साथ जीने मरने की कसमें खा लेते हैं, अगर दिल टूट गया तो कह उठे, ये दुनिया ये महफिल मेरे काम की नहीं, और अगर खोया प्यार मिल गया तो;

तुम जो मिल गए हो,

तो ऐसा लगता है

कि जहान मिल गया। ।

सुख दुःख और आशा निराशा के इस सागर में कोई डूब जाना चाहता है, तो कोई किनारा चाहता है। हाथ पांव सब मारते हैं, किसी की नैया पार लग जाती है, तो कोई मझधार में ही डूब जाता है। माझी नैया ढूंढे सहारा।

खुशी खुशी कौन खुदकुशी करता है, क्योंकि शास्त्रों के अनुसार आत्महत्या पाप है, और कानून के अनुसार एक अपराध। एक ऐसा अपराध जिसका प्रयास तो दंडनीय है, लेकिन अगर प्रयास सफल हो गया, तो कानून के हाथ बंधे हैं। ।

एक फौजी जब सरहद पर हंसते हंसते अपने प्राण न्यौछावर करता है, तो यह वीरता कहलाती है और उसे शहीद का दर्ज़ा दिया जाता है तथा संसार उसे नमन करता है। जापान में हाराकिरी को एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अभ्यास के रूप में देखा जाता है, लेकिन आजकल यह भी वहां वैध नहीं है। जब जन्म पर आपका अधिकार नहीं है तो क्या मौत को इस तरह गले लगाना, ईश्वरीय विधान को चुनौती देने की अनधिकार चेष्टा नहीं। अगर आप खुद को इस तरह दंडित करते हो, ऊपरवाला इसको अमानत में ख़यानत का अपराध मान कठोर दंड देता है। वहां कोई सुप्रीम कोर्ट नहीं, कोई राष्ट्रपति नहीं जो आपका अपराध माफ कर दे।

दुख दर्द, शारीरिक और मानसिक कष्ट एवं भावनात्मक आवेग के वशीभूत होकर कोई भी व्यक्ति खुदकुशी के लिए प्रेरित हो सकता है, लेकिन जीने की चाह, जिसे जिजीविषा कहते हैं, हमेशा उसे ऐसा करने से रोकती रहती है। कीड़े मकौड़ों और पशुओं से हमारा जीवन लाख गुना अच्छा है। पशु पक्षियों में जंगल राज होते हुए भी, कोई प्राणी स्वेच्छा से मौत के मुंह में जाना पसंद नहीं करता। मूक प्राणियों की तुलना में मनुष्य अधिक सभ्य और सुरक्षित है। जब एक गधे को भी अपने जीवन से कोई शिकायत नहीं, तो वह इंसान गधा ही होगा जो खुदकुशी करने की सोचेगा। ।

आज के भौतिक युग में कुंठा, संत्रास, अवसाद अथवा मादक पदार्थों के सेवन के प्रभाव से भी व्यक्ति आत्मघाती प्रवृत्ति का हो जाता है। नास्तिकता और विकृति के कारण कई युवा अपनी जान गंवा बैठते हैं। ।

सकारात्मक सोच और विवेक के अभाव में फिर भी किसी व्यक्ति के जीवन में ऐसे नाजुक क्षण आ जाते हैं, कि क्षणिक आवेश में वह अपनी इहलीला समाप्त कर बैठता है। यह एक ऐसा गंभीर जानलेवा कदम है, जो कभी वापस नहीं लिया जा सकता। यहां कोई भूल चूक लेनी नहीं, किसी तरह का भूल सुधार संभव नहीं।

अगर जीवन में एकांत है तो नीले आकाश और उड़ते पंछियों को निहारें, फूल पौधों और तितलियों से प्यार करें।

कहीं कोई नन्हा सा बच्चा दिख जाए, तो उससे बातें करें। बच्चों से आप ढेर सारी बातें कर सकते हैं। बच्चे कभी नहीं थकते क्योंकि बच्चों में ही तो भगवान होते हैं। अपने से कमजोर, अधिक दुखी और त्रस्त इंसान से प्रेरणा लें।

आखिर वह भी तो जिंदा है ;

एक बंजारा गाए

जीवन के गीत सुनाए।

हम सब जीने वालों को जीने की राह बताए। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #२८८ ☆ सत्संगति प्रभावहीन नहीं… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सत्संगति प्रभावहीन नहीं। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २८८ ☆

☆ सत्संगति प्रभावहीन नहीं… ☆

‘झूठ कहते हैं, संगति का असर होता है… आज तक न कांटों को महकने का सलीका आया और न फूलों को चुभना आया’ कितना विरोधाभास निहित है इस तथ्य में…यह सोचने पर विवश करता है, क्या वास्तव में संगति का प्रभाव नहीं होता? हम वर्षों से यही सुनते आए हैं कि अच्छी संगति का असर अच्छा होता है। सो! बुरी संगति से बचना ही श्रेयस्कर है। जैसी संगति में आप रहेंगे, लोग आपको वैसा ही समझेंगे। बुरी संगति मानव को अंधी गलियों में धकेल देती है, जहां से लौटना नामुमक़िन होता है तथा उसे ही दलदल अथवा कीचड़ की संज्ञा दी गयी है। यदि आप कीचड़ में कंकड़ फेंकेंगे, तो उसके छींटे अवश्य ही आपके दामन को मलिन कर देंगे। सो! इनसे सदैव दूर रहना चाहिए। इतना ही क्यों ‘Better alone than a bad company.’ अर्थात् ‘बुरी संगति से अकेला रहना कहीं अच्छा है।’ परंतु पुस्तकों को मानव का सबसे अच्छा मित्र स्वीकारा गया है, क्योंकि वे हमें सत्मार्ग पर ले जाती हैं।

परंतु इस दलील का क्या… ‘आज तक न कांटों को महकने का सलीका आया, न फूलों को चुभना रास आया’–हमारे मन में ऊहापोह की स्थिति उत्पन्न करता है। यह तथ्य मनोमस्तिष्क को उद्वेलित ही नहीं करता, झिंझोड़ कर रख भी रख देता है। इस स्थिति में हम सोचने पर विवश हो जाते हैं कि आखिर सत्य क्या है? उसके बारे में जानकारी प्राप्त करना तथा शब्दबद्ध करना उसी प्रकार असम्भव है, जैसे परमात्मा की सत्ता व उसके गुणों का बखान करना। इसीलिए लोग ‘नेति-नेति’ कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं, क्योंकि परमात्मा निर्गुण, निराकार, निर्विकार,अनश्वर व सर्वव्यापक है। उसकी महिमा अपरम्पार है तथा वह सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है। उसकी महिमा का गुणगान करना मानव के वश की बात नहीं। यहां भी विरोधाभास स्पष्ट झलकता है कि जो निराकार है…जिसका रूप व आकार नहीं; जो निर्गुण है.. सत्, रज, तम तीनों गुणों से परे है; जो निर्विकार अर्थात् दोषों से रहित है; परंतु वह अनश्वर है…उसमें शील, शक्ति व सौंदर्य का  समन्वय है…वह विश्व में श्रद्धेय है, आराध्य है, पूजनीय है, वंदनीय है।

प्रश्न उठता है, कि जो शब्द ब्रह्म मानव के अंतर्मन में निवास करता है, उसे बाहर ढूंढने की आवश्यकता नहीं… उसे मन की एकाग्रता द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। एकाग्रता ध्यान केंद्रित करने से आती है। सो! हमें  अंतरात्मा में झांकने की आवश्यकता है। यह ध्यान की वह स्थिति है, जिस में मानव क्षुद्र व तुच्छ वासनाओं से ऊपर उठ जाता है और उसे केवल सत्य-स्वरूप ब्रह्म ही नज़र आता है, क्योंकि ‘ब्रह्म सत्यम्, जगत् मिथ्या।’ परन्तु सांसारिक प्रलोभनों व मायाजाल में लिप्त बावरा मानव, मृग की भांति उस कस्तूरी को पाने के निमित्त इत-उत भटकता रहता है और वह भूखा-प्यासा रेगिस्तान में सूर्य की किरणों में जल का आभास पाकर निरंतर भागता रहता है…परंतु अंत में अपने प्राण त्याग देता है। सो! वही दशा मानव की है, जो नश्वर व भौतिक संसार में उसे मंदिर-मस्जिदों में तलाशता रहता है, जबकि वह तो उसकी अंतरात्मा में निवास करता है। परंतु मृग- तृष्णाएं उसे पग-पग पर उलझाती व भटकाती हैं और भ्रमित मानव उस मायाजाल से आजीवन मुक्त नहीं हो पाता… लख चौरासी तक मोह-माया के बंधनों में उलझा रहता है। परिणामत: उसे कहीं भी सुक़ून, आनंद अथवा कैवल्य की स्थिति प्राप्त नहीं होती।

जहां तक  कांटों को महकने का सलीका न आने का प्रश्न है, वह प्रकाश डालता है–मानव की आदतों पर; जो लाख प्रयास करने पर भी नहीं बदलतीं, क्योंकि वे हमें पूर्व-जन्म  के संस्कारों के रूप में प्राप्त होती हैं। कुछ संस्कार पूर्वजों द्वारा प्रदत्त होते हैं और विभिन्न संबंधों के रूप में हमें प्राप्त होते हैं, जिन्हें पल्लवित-पोषित करने में हमारा कोई अहम् योगदान नहीं होता। परंतु उनका निर्वहन करने को हम विवश होते हैं और कुछ संस्कार हमें माता-पिता, गुरुजनों व हमारी संस्कृति द्वारा प्राप्त होते हैं, जो हमारे चारित्रिक गुणों को विकसित करते हैं। अच्छे संस्कार हमें आदर्शवादी बनाते हैं और बुरे संस्कार हमें पथ-विचलित करते हैं; हमें संसार में अपयश दिलाते हैं।  यह संबंध हम स्वयं बनाते हैं, अक्सर यह संबंध स्वार्थ के होते हैं, जिन पर विश्वास करना स्वयं को छलना होता है। परंतु कुसंस्कारों के कारण समाज में हमारी निंदा होती है और लोग हमसे घृणा करना प्रारंभ कर देते हैं। बुरे लोगों का साथ देने के कारण हम पर अंगुलियां उठना स्वाभाविक है… क्योंकि ‘यह मथुरा काजर की कोठरी, जे आवहिं ते कारे’ अर्थात् ‘जैसा संग, वैसा रंग’। कुसंगति का रंग अर्थात् काजल अपना प्रभाव अवश्य छोड़ता है। कबीरदास जी की यह पंक्ति’ कोयला होई ना ऊजरा, सौ मन साबुन लाय’ अर्थात् कोयला सौ मन साबुन से धोने पर भी, कभी उजला नहीं हो सकता अर्थात् मानव की जैसी प्रकृति, प्रवृत्ति, सोच व आदतें होती हैं; उनके अनुरूप ही वह कार्य-व्यवहार करता है।

इंसान अपनी आदतों का ग़ुलाम होता है और सदैव उनके अंकुश में रहता है; उनसे मुक्ति पाने में कभी भी समर्थ नहीं हो सकता। इसलिए कहा जाता है कि इंसान की सोच,आदतें व प्रवृत्तियां चिता की अग्नि में जलने के पश्चात् ही बदल सकती हैं। सो! प्रकृति के विभिन्न उपादान फूल, कांटे आदि अपना स्वभाव कैसे परिवर्तित कर सकते हैं? फूलों की प्रकृति है हंसना, मुस्कराना, बगिया के वातावरण को महकाना व आगंतुकों के हृदय को आह्लादित-उन्मादित करना। सो! वे कांटो के चुभने के दायित्व का वहन कैसे कर सकते हैं? इसी प्रकार मलय वायु, जो शीतल, मंद व सुगंधित होती है… याद दिलाती है अपने प्रिय की, जिसके ज़हन में आने से समस्त वातावरण आंदोलित हो उठता है और मानव अपनी सुधबुध खो बैठता है।

यह तो हुआ स्वभाव, प्रकृति व आदतों के न बदलने का चिंतन, जो सार्वभौमिक सत्य है। परंतु अच्छी आदतें सुसंस्कृत व अच्छे लोगों की संगति द्वारा बदली जा सकती है। हां! हमारे शास्त्र व अच्छी पुस्तकें इसमें महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती हैं; बेहतर योगदान दे सकती हैं; उचित मार्गदर्शन कर जीवन की दशा व दिशा बदल सकती हैं। जो मनुष्य नियमित रूप से ध्यान-मग्न रहता है; सत्शास्त्रों का केवल अध्ययन ही नहीं; चिन्तन-मनन करता है; आत्मावलोकन करता है; चित्तवृत्तियों पर अंकुश लगाता है; इच्छाओं की चकाचौंध में फंसकर  असामान्य व्यवहार नहीं करता तथा उनकी दासता स्वीकार नहीं करता; वह दुष्प्रवृत्तियों के इस मायाजाल से स्वत: मुक्ति प्राप्त कर सकता है…कुसंस्कारों का त्याग कर सकता है और अपने स्वभाव को बदलने में समर्थ हो सकता है।

सो! हम उपरोक्त कथन को मिथ्या सिद्ध कर सकते हैं कि सत्संगति प्रभावहीन होती है, क्योंकि फूल और कांटे अपना सहज स्वभाव-प्रभाव हरगिज़ नहीं छोड़ते। कांटे अवरोधक होते हैं; सहज विकास में बाधा उत्पन्न करते हैं; सदैव चुभते हैं; पीड़ा पहुंचाते हैं तथा दूसरों को कष्ट में देखकर आनंदित होते हैं। दूसरी ओर फूल इस तथ्य से अवगत होते हैं कि जीवन क्षणभंगुर है, फिर भी वे निराशा का दामन कभी नहीं थामते… अपना महकने व मुस्कुराने का स्वभाव कभी नहीं त्यागते। इसलिए मानव को उनसे संदेश लेना चाहिए तथा जीवन में सदैव हंसना-मुस्कुराना चाहिए, क्योंकि खुश रहना जीवन की अनमोल कुंजी है; जीवन जीने का उत्तम सलीका है। इसलिए हमें सदैव प्रसन्न रहना चाहिए ताकि दूसरे लोग भी हमें देखकर उल्लसित व आनंदित रह सकें और अपने कष्टों के भंवर से मुक्ति प्राप्त कर सकें।

अंत में मैं कहना चाहूंगी कि परमात्मा ने सबको समान बनाया है। इंसान कभी अच्छा-बुरा नहीं हो सकता… उसके सत्कर्म व दुष्कर्म ही उसे अच्छा व बुरा बनाते हैं…उसकी सोच को सकारात्मक व नकारात्मक बनाते हैं। अपने सुकर्मों से ही प्राणी सब का प्रिय बन सकता है। जैसे प्रकृति अपना स्वभाव नहीं बदलती; धरा, सूर्य, चंद्र, नदियां, पर्वत, वृक्ष आदि निरंतर कर्मशील रहते हैं; नियत समय पर अपने कार्य को अंजाम देते हैं; अपने स्वभाव को विषम परिस्थितियों में भी नहीं त्यागते; स्थिर रखते हैं…सो! हमें इनसे प्रेरणा प्राप्त कर सत्य की राह का अनुसरण करना चाहिए, क्योंकि इनमें परोपकार की भावना निहित रहती है…ये किसी को आघात नहीं पहुंचाते और किसी का बुरा भी नहीं चाहते। हमारा स्वभाव भी वृक्षों की भांति होना चाहिए। वे धूप, आतप, वर्षा, आंधी, तूफ़ान आदि के प्रहार सहन करने के पश्चात् भी तपस्वी की भांति अडिग खड़े रहते हैं, जबकि वे जानते हैं कि उन्हें अपने फलों का स्वाद नहीं चखना है। परंतु वे परोपकार हित सबको शीतल छाया व मीठे फल प्रदान करते हैं, भले ही कोई इन्हें कितनी भी हानि क्यों न पहुंचाए। इसी प्रकार सूर्य की स्वर्णिम रश्मियां सम्पूर्ण विश्व को आलोकित करती हैं, चंद्रमा व तारे अपने निश्चित समय पर दस्तक देते हैं तथा निद्रा देवी थके-हारे मानव व समस्त प्राणी-जगत् को अपने आग़ोश में सुला लेती है ताकि वे भोर होते नव-चेतना व ताज़गी अनुभव कर, प्रफुल्लता से पुन: अपनी दिनचर्या में तल्लीन हो सकें। इसी प्रकार वर्षा के होने से धरा पर हरीतिमा छा जाती है और जीवनदायिनी फसलें लहलहा उठती हैं। इन सबसे बढ़कर ऋतु-परिवर्तन हमारे जीवन की एकरसता को मिटाता है।

मानव का स्वभाव चंचल है। वह एक-सी मन:स्थिति में लम्बे समय तक रहना पसंद नहीं करता। परंतु जब हम प्रकृति से छेड़छाड़ करते हैं, तो उसका संतुलन बिगड़ जाता है; जो भूकंप, सुनामी, भयंकर बाढ़, दुर्भिक्ष, महामारी, भू-स्खलन आदि के रूप में समय-समय पर प्रकट होता है। यह कोटिशः सत्य है कि जब प्रकृति के विभिन्न उपादान अपना स्वभाव नहीं बदलते, तो मानव अपना स्वभाव क्यों बदले … जीवन में बुरी राह का अनुसरण करे तथा दूसरों को व्यर्थ हानि पहुंचाए? इस तथ्य से तो आप अवगत हैं कि जैसा व्यवहार आप दूसरों से करते हैं; वही लौटकर आपके पास आता है। इसलिये ‘सदैव अच्छा सोचिए, अच्छा बोलिए, अच्छा कीजिए, अच्छा दीजिए व अच्छा लीजिए।’ यदि दूसरा व्यक्ति आपके प्रति दुर्भावना रखता है व दुष्कर्म करता है, तो कबीरदास जी के दोहे का स्मरण कीजिए ‘जो ताको कांटा  बुवै, तू बूवै ताको फूल’ अर्थात् आपको फूल के बदले फूल मिलेंगे और कांटे बोने वाले को शूल ही प्राप्त होंगे। इसलिए इस सिद्धांत को जीवन में धारण कर लीजिए कि शुभ का फल शुभ अथवा मंगलकारी होता है। इसलिए सदैव अच्छा ही अच्छा कीजिए। यह भी शाश्वत सत्य है कि कुटिल मनुष्य कभी भी अपनी कुटिलता का त्याग नहीं करता, जैसे सांप को जितना भी दूध पिलाओ; वह काटने का स्वभाव नहीं त्यागता। इसलिए ऐसे दुष्ट लोगों से सदैव सावधान रहना अपेक्षित है…उनकी फ़ितरत पर विश्वास करना स्वयं को धोखा देना व संकट में डालना है तथा उनका साथ देना अपने चरित्र पर लांछन लगाने व कालिख़ पोतने के समान है। सो! मानव के लिए दूसरों के व्यवहार के अनुरूप व प्रतिक्रिया-स्वरूप अपना स्वभाव न बदलने में ही उसका अपना व प्राणी-मात्र का हित है, मंगल है।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७५६ ⇒ गणमान्य बनाम सेलिब्रिटी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गणमान्य बनाम सेलिब्रिटी।)

?अभी अभी # ७५६  ⇒ आलेख – गणमान्य बनाम सेलिब्रिटी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अक्सर जो गणमान्य होते हैं, वे अतिथि ही होते हैं। जो दर्शकगण और श्रोतागण को मान्य हो, वह गणमान्य हो ही जाता है। अतिथि तो भगवान होता है, आप किसे भी अतिथि बनाकर बैठा दें, वह गणमान्य हो जाएगा।

आयोजन के पहले और पश्चात गणमान्य एकदम सामान्य हो जाता है। केवल मंच और सम्मान, उसे गणमान्य बनाता है। गणमान्य अतिथि का जो स्वागत करता है, कुछ समय के लिए वो भी असामान्य हो जाता है। कभी कभी तो ऐसी नौबत आ जाती है कि स्वागत करने वाला गणमान्य होता है, और स्वागत करवाने वाला अति-सामान्य। लेकिन क्या भरोसा, समय कब किसे गणमान्य बना दे और किसे सामान्य। ।

जब भी शहर में किसी विशिष्ट व्यक्ति का देहावसान होता है, विशेष शोकसभा आयोजित की जाती है, जिसमें नगर के गणमान्य नागरिक, पत्रकार, बुद्धिजीवी, साहित्यकार, राजनेता, समाजसेवी और धार्मिक नेता शोक संवेदना प्रकट करते हैं। 

जिसे हम हिंदी में हस्ती कहते हैं, उसे अंग्रेज़ी में सेलिब्रिटी कहते हैं। हाल ही में हिंदी के एक सेलिब्रिटी को हिंदी से ही ग्लानि होने लगी। मुझे भी जब तक सेलिब्रिटी का हिंदी पर्याय नहीं सूझा, मुझे अपने आप से ग्लानि होने लगी। मैं धन्य हुआ, जब अवचेतन से स्वनामधन्य जैसा शब्द प्रकट हुआ। फिर तो मानो हिंदी में सेलिब्रिटीज की लाइन लग गई। हम पहले सेलिब्रिटी को तुर्रम खां कहते थे। वी आई पी तो हमारे शहर में पान की दुकान का नाम है।

जो गणमान्य होते हैं, वे भी एक तरह से सेलिब्रिटी ही होते हैं, लेकिन जब होटल रेडीसन पर ट्रैफिक जाम होता है, तब वे भी काँच का शीशा खोलकर ट्रैफिक हवलदार से पूछ ही लेते हैं, भई क्या बात है ? हवलदार लापरवाही से जवाब देता है, कोई सेलिब्रिटी ठहरा है होटल में, शायद विराट कोहली, उसी की भीड़ है। आगे बढिए !गणमान्य, सेलिब्रिटी के भाग्य को सराहता हुआ आगे बढ़ जाता है। ।

गणमान्य शहर का होता है, सेलिब्रिटी आन गाँव का सिद्ध ! सेलिब्रिटी के आगे पीछे टीवी कैमरे लगे रहते हैं, मानो कोई शूटिंग चल रही हो। सेलिब्रिटी फ़िल्म कलाकार भी हो सकता है और क्रिकेट खिलाड़ी भी। नेता भी सेलिब्रिटी होते हैं, लेकिन उनके लिए केवल कार्यकर्ताओं की भीड़ एकत्रित होती है, आम आदमी की नहीं।

सेलिब्रिटी का कोई व्यक्तिगत जीवन नहीं होता। उसका एक बयान, या एक ट्वीट दुनिया हिला सकता है। उसके एक ट्वीट पर टीवी पर बहस हो सकती है, धरना, प्रदर्शन हो सकते हैं, उसे गिरफ्तार करने की माँग भी हो सकती है। ।

किसे मालूम है जब राजीव गाँधी एक साधारण पायलट थे, सराफे में चुपचाप रबड़ी खाकर चले जाते थे, पीएम बनते ही, इस दुनिया से ही चले गए।

अखबार, सोशल मीडिया, टीवी चैनल सब सेलिब्रिटीज के लिए ही बने हैं। अगर सेलिब्रिटीज न हों, तो न तो लक्स साबुन बिके और न ही फेयर एंड लवली। क्या आप जानते हैं, पहला केंट, R O वाटर फ़िल्टर कौन लाया ? स्वप्न सुंदरी हेमा मालिनी ! अगर बिग बी ठंडा ठंडा कूल कूल नवरत्न तेल का विज्ञापन लेकर नहीं आते, तो क्या आपको पता चलता, यह कितना कूल है। ।

सेलिब्रिटी होना, अगर एक वरदान है तो एक अभिशाप भी। एक स्वतंत्र देश का नागरिक होते हुए भी न तो वह आज़ादी से जी सकता है, न मर सकता। उसके व्यक्तिगत जीवन पर निगाहें रखी जाती है। वह खुली सड़क पर, अपना सीना तानकर नहीं निकल सकता। उसकी मौत भी एक रहस्य बन जाती है। कॉफ़ी किंग वीजी सिद्धार्थ को ही ले लीजिए ! वे आज नहीं हैं, पर उनकी चर्चाएँ बहुत हैं।

ईश्वर हमें सब कुछ बनाए, कभी गणमान्य न बनाए, कोई सेलिब्रिटी न बनाए। एक आज़ाद पंछी की तरह अपनी ज़िंदगी जीयें, और समय आने पर फुर्र से उड़ जाएँ। न कोई शोकसभा न किसी किस्म का राष्ट्रीय शोक। शौक से जीयें, शौक से मरें। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 142 – देश-परदेश – बिल्ली मौसी ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 142 ☆ देश-परदेश – बिल्ली मौसी ☆ श्री राकेश कुमार ☆

अभी पांच अगस्त को श्वान घसीटी दिवस था, अब ये बिल्ली दिवस भी आ गया है। पश्चिम ने क्या नए त्यौहार बना दिए हैं। हमारे यहां तो घर में बिल्ली प्रवेश कर ले, तो उसे डंडा दिखा कर भगा दिया जाता है, उसके बाद वहां हाइजीन के कारण सफाई की जाती है।

देखा जाय तो बिल्ली का प्रयोग मुहावरों में खूब किया गया है, बिल्ली के भाग्य से छींका टूटना, खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे आदि। बचपन में बिल्ली छाप जूते की पॉलिश से जूते चमकाए जाते थे। बिल्ली के परिवार से ही जंगल का राजा आता है। ऐसा हमारी प्राचीन कहानियों में लिखा हुआ मिलता है।

पश्चिम ने तो स्त्रीयों की सुंदरता नापने के लिए ” बिल्ली चाल” को एक पैमाना तक बना दिया हैं। हमारे यहां चोर बिल्ली चाल से अपना काम करते हैं। हमारे यहां तो “हिरणी जैसी चाल” या “हिरणी जैसी आंखों” से ही खूबसूरती आंकी जाती है। क्रूर महिलाओं की तुलना बिल्ली से अवश्य की जाती है।

हमारा देश भी अब बदल गया है। बिल्ली पालना, कुत्ते पालना के बाद अमीरों का सबसे बड़ा शौक बन चुका है। पहले बिल्लियां पाली नहीं जाती थी, इधर उधर घूम कर अपना जीवन व्यतीत कर लेती थी। अब तो इनके पालनहार घर में पूरी व्यवस्था करते हैं। इनके लिए एक अलग कमरा और स्नानगृह भी होता है। उनको भी जीवन में निजता की आवश्यकता होती है।

बड़े स्टोर्स में बिल्लियों के सामान का अलग काउंटर होता है। इनके गर्मी, सर्दी के अलग अलग वस्त्र भी उपलब्ध होते हैं। विदेश में तो इनके लिए बेकरी भी अलग से होती हैं।

हम मानवों ने तो बिल्लियों में रंग भेद की भावना कर दी है। सुनहरे रंग की बिल्ली संपन्नता लाती है। काली बिल्ली को अशुभ माना जाता है। बिल्ली अगर रास्ता काट जाए, तो हम लोग रास्ता ही बदल लेते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७५५ ⇒ घुटने का दर्द ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घुटने का दर्द।)

?अभी अभी # ७५५  ⇒ आलेख – घुटने का दर्द ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

इसे कहते हैं, दुखती रग पर हाथ रखना ! घुटने का दर्द भले ही आम लगता है, लेकिन अधिकतर यह महान लोगों को ही होता है।

बहुत वर्ष पहले एक परिचित मिले, बोले, मेरे भी घुटने में दर्द है ! मैंने पूछा, मेरे भी का क्या मतलब ? वे बोले, क्या आप नहीं जानते, अटल जी को भी है !

और तो और दयालु शंकर अर्थात पूर्व राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा भी घुटनों के दर्द से परेशान रहते थे।

जिस तरह मनुष्य के शरीर में दो घुटने होते हैं, उसी तरह शब्द घुटने के भी दो अर्थ होते हैं।

घुटना शब्द घुटन से बना है। घुटने का दर्द तो चाल-ढाल से ही पकड़ में आ जाता है, लेकिन अंदर की घुटन को सिर्फ महसूस किया जा सकता है, बताया नहीं जा सकता। घुटने के दर्द के तो कई इलाज हैं, नारायणी तेल से मालिश अगर कारगर न हो तो, घुटने का प्रत्यारोपण भी करवाया जा सकता है, लेकिन घुटन का किसी वेद, हकीम, ओझा फ़क़ीर के पास कोई इलाज संभव नहीं। किसी प्यासे ने कहा भी है, इसको ही जीना कहते हैं तो, यूँ ही जी लेंगे। उफ़ न करेंगे, लब सी लेंगे, आँसू पी लेंगे।।

आज तक इस तथ्य पर ज़्यादा विचार नहीं हुआ, कि आदमी एड़ियाँ ज़्यादा घिसता है, या घुटने ! बचपन में घुटने-घुटने चलने वाले इंसान का बड़े होकर जब एड़ियाँ घिसने से भी काम नहीं चलता, तब घुटने टेकने ही पड़ते हैं। इससे यह भी सिद्ध होता है कि एड़ियाँ, घुटनों से अधिक मजबूत होती हैं। वे घुटनों की तरह आसानी से घुटने नहीं टेक देती। वैसे भी घुटनों की तुलना में एड़ियाँ कम ही ख़राब होती हैं।

अंधेरे बंद कमरे, और कम हवादार स्थान पर जब साँस लेने में दिक्कत होती है, तब घुटन का अहसास होता है। खुले में, बाग-बगीचों में, और प्राकृतिक स्थानों पर कभी घुटन का अहसास नहीं होता। जो एकांतप्रिय है, जिसकी किसी से घुटती नहीं, वह तो ज़न्नत में भी घुटन का माहौल बना सकता है। मंथरा महलों में भी रहती है।।

जब इंसान अकेला होता है, किसी ग़म को गले से लगाए बैठा होता है, या जब कोई पुराना ज़ख्म हरा हो जाता है, तो वह अंदर से घुटने लगता है। कुछ लोग इस घुटन का इलाज कड़वे घूँट में भी ढूंढना चाहते हैं, लेकिन इससे घुटन और भी बढ़ती ही है, कम नहीं होती।

न जाने क्यों एक ज़माने में घुटनों के दर्द को पहलवानों से जोड़ा जाता था। लेकिन जब से यह पति-पत्नी दोनों को एक साथ होने लगा है, तब से जोड़ों का दर्द कहलाने लगा है।

घुटनों और घुटन दोनों का अगर समय रहते इलाज नहीं किया गया तो इसका शरीर और मन पर विपरीत असर पड़ने लगता है।

शारीरिक वज़न का संतुलन, नियमित व्यायाम, सकारात्मक जीवन और स्वस्थ मानसिकता ही दोनों तरह के दर्द का एकमात्र उपचार है। न कभी अपने आप में घुटें, न कभी आपको घुटने के दर्द का अहसास हो, ईश्वर से आज सुबह की यही प्रार्थना।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७५४ ⇒ छतरी और साइकिल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “छतरी और साइकिल।)

?अभी अभी # ७५४  ⇒ आलेख – छतरी और साइकिल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आज भी डूबते को तिनके के सहारे की तरह, किसी भीगते इंसान को छाते का ही सहारा होता है। गाड़ी में पेट्रोल खत्म होने पर, अथवा गाड़ी खराब होने पर, आज भी आपातकालीन विकल्प एक साइकिल ही है, लेकिन अफसोस, कल की जरूरत, आज यह द्वि चक्र वाहिनी महानगर में घोर उपेक्षा की शिकार है।

सन् ६० के दशक में हर मध्यमवर्गीय परिवार में एक अदद एटलस साइकिल और काली छतरी अवश्य होती थी।

तब शहर की दीवारें आज की तरह स्वच्छता का चौका जैसे नारों से नहीं, हम दो हमारे दो वाले विज्ञापनों से सजी होती थी। यह अलग बात है कि हर घर में कम से कम सात आठ सदस्य तो आसानी से नज़र आ ही जाते थे। हम दो, हमारे दो, के हिसाब से चार तो वैसे ही हो ही गए, थोड़ा बहुत कम ज्यादा तो इसमें भी चलता था। अगर शुरू में ही तीन बेटियां हो गईं तो इसमें किसका दोष ? एक बेटे की आस किसे नहीं होती।।

तब गजब का भाईचारा था भाई साहब ! मेहमां जो हमारा होता था, वो जान से प्यारा होता था। गांव से एक बार आता था, तो फिर जाने का नाम ही नहीं लेता था। पड़ोसी भी चाय शकर की तरह कभी छाता तो कभी साइकिल मांगकर ले जाते, अभी लाया, जरा बबली को स्कूल छोड़ आऊं। यह बारिश भी ना, एकदम बरस पड़ती है।

घर में स्त्री पुरुष की ही तरह छाते और साइकिल की भी लेडीज और जेंट्स की जोड़ी होती थी। लेडीज साइकिल, जेंट्स साइकिल, और जेंट्स काली छतरी और लेडीज रंग बिरंगी छोटी छतरी।

लेडीज साइकिल तो कोई भी चला लेता, लेकिन जेंट्स साइकिल जेंट्स ही चलाते थे।।

बाबूजी कुर्ता पायजामा पहनते थे, उनकी अपनी अलग साइकिल और छतरी थी। साइकिल चलाने के पहले वे पायजामे को नीचे से मोड़, दोनों पांवों पर एक लोहे की पतली चूड़ी नुमा रिंग चढ़ा लेते थे, जिससे पायजामा साइकिल की चेन में ना फंसे। वैसे साइकिल में भी चेन कवर होता था। जो लोग दिलीप कुमार टाइप बावीस इंच की मोहरी वाली पैंट पहनते थे, उनको भी इसी तरह, साइकिल चलाते वक्त, पैंट की सुरक्षा करनी पड़ती थी। छतरी को भी वापरने के बाद, पूरी तरह से सुखाकर और समेटकर, कायदे से एक बटन द्वारा बंद किया जाता था।

तब बरसात में बाजार में छाते ही छाते नजर आते थे। जितने सर उतने छाते। बेचारे काम करने वाले सब्जी बेचने वाले और मजदूर एक बोरेनुमा बरसाती से ही अपना तन सुरक्षित कर लेते थे। स्कूटर और मोटर साइकिल के साथ छतरी का कोई मेल नहीं था। तब तक रेनकोट मार्केट में जो आ गए थे। जेंट्स और लेडीज दोनों बरसातियों के बावजूद छाते फिर भी शान से सर पर तनते ही रहे, और आम आदमी की मेंटेनेंस फ्री साइकिल भी सड़क के बीचोबीच चलती ही रही।।

आज साइकिल भले ही घर में छोटे बच्चों को सवारी बनकर रह गई हो, एक अदद छाता हर कार वाले की जरूरत बन गया है। कार में बरसते पानी में चढ़ते उतरते वक्त, बेहतर है, छतरी की सेवाएं ले ही ली जाएं।

हम कितने भी डिजिटल हो जाएं, पेट्रोल के विकल्प में ई वाहन ले आएं, पॉवर क्राइसिस हमारा पीछा नहीं छोड़ने वाला ! हमें घूम फिरकर वापस साइकिल पर आना ही होगा। अब मेट्रो आपके घर आने से तो रही। खैर, फिलहाल हम बारिश का सामना करें, और अपनी अपनी छतरी तान लें।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 301 – शिवोऽहम् … (4) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 301 शिवोऽहम्*…(4) ?

आदिगुरु शंकराचार्य महाराज के आत्मषटकम् को निर्वाणषटकम् क्यों कहा गया, इसकी प्रतीति चौथे श्लोक में होती है। यह श्लोक कहता है,

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खं

न मंत्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञः।

अहम् भोजनं नैव भोज्यम् न भोक्ता

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।।

मैं न पुण्य से बँधा हूँ और न ही पाप से। मैं सुख और दुख से भी विलग हूँ, इन सबसे मुक्त हूँ। अर्थ स्पष्ट है कि आत्मस्वरूप सद्कर्म या दुष्कर्म नहीं करता। इनसे उत्पन्न होनेवाले कर्मफल से भी कोई सम्बंध नहीं रखता।

मंत्रोच्चारण, तीर्थाटन, ज्ञानार्जन, यजन कर्म सभी को सामान्यतः आत्मस्वरूप का अधिष्ठान माना गया है। षटकम् की अगली पंक्ति  सीमाबद्ध को असीम करती है। यह असीम, सीमित शब्दों में कुछ यूँ अभिव्यक्त होता है, ‘मैं न मंत्र हूँ, न तीर्थ, न ही ज्ञान या यज्ञ।’ भावार्थ है कि आत्मस्वरूप का प्रवास कर्म और कर्मानुभूति से आगे हो चुका है।

मंत्र, तीर्थ, ज्ञान, यज्ञ, पाप, पुण्य, सुख, दुखादि कर्मों पर चिंतन करें तो पाएँगे कि वैदिक दर्शन हर कर्म के नाना प्रकारों का वर्णन करता है। तथापि तत्सम्बंधी विस्तार में जाना इस लघु आलेख में संभव नहीं।

आगे आदिगुरु का कथन विस्तार पाता है, ‘मैं न भोजन हूँ, न भोग का आनंद, न ही भोक्ता।’ अर्थात साधन, साध्य और सिद्धि से ऊँचे उठ जाना। विचार के पार, उर्ध्वाधार। कुछ न होना पर सब कुछ होना का साक्षात्कार है यह। एक अर्थ में देखें तो यही निर्वाण है, यही शून्य है।

वस्तुत: शून्य में गहन तृष्णा है, साथ ही गहरी तृप्ति है। शून्य परमानंद का आलाप है। इसे सुनने के लिए कानों को ट्यून करना होगा। अपने विराट शून्य को निहारने और उसकी विराटता में अंकुरित होती सृष्टि देख सकने की दृष्टि विकसित करनी होगी।  शून्य के परमानंद को अनुभव करने के लिए शून्य में जाना होगा।… अपने शून्य का रसपान करें। शून्य में शून्य उँड़ेलें, शून्य से शून्य उलीचें। तत्पश्चात आकलन करें कि शून्य पाया या शून्य खोया?

शून्य अवगाहित करती सृष्टि,

शून्य उकेरने की टिटिहरी कृति,

शून्य के सम्मुख हाँफती सीमाएँ

अगाध शून्य की  अशेष गाथाएँ,

साधो…!

अथाह की कुछ थाह मिली

या फिर शून्य ही हाथ लगा?

साधक एक बार शून्यावस्था में पहुँच जाए तो स्वत: कह उठता है, ‘मैं सदा शुद्ध आनंदमय चेतन हूँ, मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ, शिवोऽहम्..!

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से रक्षाबंधन तदनुसार शनिवार 9 अगस्त तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगासाथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे। 💥 

💥 101 से अधिक मालाजप करने वाले महासाधक कहलाएंगे 💥

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७५३ ⇒ गृह-शांति ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गृह-शांति।)

?अभी अभी # ७५३ ⇒ आलेख – गृह-शांति ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हम जहाँ रहते हैं, उसको घर कहते हैं ! घर को ही गृह भी कहा जाता है। घर वह स्थान होता है, जहाँ हम घर जैसा महसूस करते हैं। जब ऐसा नहीं होता, तब घर कभी कबाड़खाना लगता है तो कभी, कोई अनजान स्थान भी हमें घर जैसा ही लगने लगता है। घर में शांति न मिलने के वैसे तो कई कारण होते हैं, लेकिन ज़्यादा गंभीर स्थिति होने पर बात वास्तु-दोष तक पहुँच जाती है।

जब भी नया घर बनाया जाता है, तो पहले भूमि-पूजन होता है, वास्तु-पूजन होता है, गृह का निर्माण होता है और गृह-प्रवेश के पहले ग्रह-शान्ति होती है।

गृह-प्रवेश के पहले, ग्रह-शान्ति !

जी हाँ। क्योंकि आपके पहले ही वहाँ नवग्रह विराजमान हो जाते हैं।।

कभी आपने रात में तारे गिने हैं !

क्या ग्रह और नक्षत्रों को कभी पहचान पाए हैं। चलिए आसमान की बात छोड़िए, अपनी जनम-पत्री ही देख डालिए। सोम-मंगल, बुध-रवि, गुरु-शुक्र तो छोड़िए, चंद्रमा और राहु-केतु भी आपकी जनम-पत्री में विराजमान है।

और है उस जनम-पत्री में आपका कच्चा-चिट्ठा ! आज जनम लिए बालक का भविष्य-फल। उन ग्रहों के आधार पर अब आपका नामकरण होगा। और तो और आपका भविष्य भी साथ होगा।

कर लो, क्या कर लेते हो?

क्या कहा ! आप ज्योतिष में विश्वास नहीं करते, भाग्य में विश्वास नहीं करते, अपनी जनम-पत्री के ग्रहों से नहीं डरते। आपने बड़ा होकर अपना नाम भी अपनी मर्ज़ी से तोड़-मरोड़ लिया, लेकिन जिस भी घर में शांति से रहना चाहोगे, अपनी मर्ज़ी से भले ही नहीं, पर परिवार-परिजनों, माता-पिता, पत्नी-पुत्र और रायचंदों के विचार-विमर्श के आगे नत-मस्तक हो, गृह-प्रवेश के पहले ग्रह-शान्ति तो करवानी ही पड़ेगी। अपनी ज़िद के पीछे आप घर-वालों की आस्था, श्रद्धा और सुरक्षा के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते।।

जो पहले वास्तुविद थे, आज आप उन्हें आर्किटेक्ट (architect) कहते हैं। कौन से कोण में क्या किचन होगा और कौन से कोण में आपका बेड-रूम, वह पहले आपको नक्शे में बताएगा। आप नाक-भौं सिकोड़ेंगे, तो विकल्प भी बताएगा, लेकिन घर वही बनाएगा। बाद में शान से भले ही आप कहते फिरें, यह घर मैंने इतने लाख में बनवाया।

गृह और ग्रह से परे भी एक चीज़ है, जिसे मन की शांति कहते हैं।

मन अशांत हुआ तो राहु-केतु और शनि की महादशा शुरू हो जाती है। लो जी ! हमारे उनको तो साढ़े-साती लग गई ! अब कांग्रेस साढ़े-सत्तर साल तक सत्ता से बाहर हो गई। देखा लालू और आसाराम बापू का हाल ! सब ग्रहों की ही दशा है।।

याने हमारे देश में, और घर में शांति का ठेका हमने तांत्रिकों और ज्योतिषियों को दे दिया है।

सब ईश्वर का बनाया हुआ है।

आप नास्तिकों जैसी बातें नहीं कर सकते। इंदिरा के समय में भी उनके गुरु धीरेन्द्र ब्रह्मचारी थे। आनंदमयी माँ में भी उनकी श्रद्धा थी। नरसिंहाराव और चंद्रशेखर जैसे कई राजनेताओं के गुरु तांत्रिक चंद्रास्वामी रहे हुए हैं। यह आस्था और विश्वास का मामला है जी।

हमारे धर्म, आस्था और विश्वास की जड़ें बहुत गहरी हैं। हम कब अपने गृह को आसमान के ग्रहों से मुक्ति दिला पाएँगे, कब तक नौकरी और बच्चा न होने पर पत्रिका लेकर ज्योतिषी के घर के चक्कर लगाएंगे ! पितृ-दोष और काल-सर्प दोष के निवारण के लिए कभी उज्जैन तो कभी त्रयम्बकेश्वर की परिक्रमा लगाएंगे।।

वाकई हमारा देश चमत्कारों का देश है ! सभी विसंगतियों के बाबजूद अनूठा, निराला, अद्भुत !

असहमति, सहमति के बीच, तमाम संकल्प-विकल्पों के चलते, हम अपनी राह निकाल ही लेते हैं। आसमान में बैठे, हमारे जनम-पत्री में जमे समस्त ग्रहों की परवाह न करते हुए गृह की शांति का आनंद भी लेते चले आ रहे हैं। न चेहरे पर कोई शिकन, न तनाव। शायद इसे ही कहते हों,

सब का साथ,

आपका विकास . . .!!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # १८ – दस्तावेज ☆ मारीशस ~ पत्थर के नीचे सोना होता है़… ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # १८ ☆

☆ दस्तावेज ☆ मारीशस ~ पत्थर के नीचे सोना होता है़… ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

भारत से गिरमिटिया देशों को पहुंचे भारतीय मजदूर, जो हमारे ही पूर्वज थे, ने अपने धैर्य, संघर्ष, एवं श्रम के दम पर तथा इसके साथ अपने साथ ले गयी भारतीय सांस्कृतिक विरासत की पूंजी के बल पर विरान द्वीपों को एक अत्याधुनिक, खूबसूरत, सुविधा सम्पन्न राष्ट्र में बदल दिया।

भारत से मजदूर के रूप में गिरमिटिया देशों को पहुंचे हमारे पूर्वजों ने समुद्र के किनारे वीरान पड़े द्वीपों को न सिर्फ स्वर्ग सा बना दिया, बल्कि स्वयं को सत्ता के शिखर पर स्थापित कर लिया। इन्होंने चौमुखी विकास किया। आज आधुनिकता के दौर में, जब हम भारत में रहते हुए अपनी संस्कृतियों से विमुख हो रहे हैं। ऐसे समय में भी इन गिरमिटिया मजदूरों के वंशज आज भी भारतीय साहित्य संस्कृति और कला के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान कर रहे हैं। इन साहित्यकारों के साहित्य अतीत की पीड़ा से लेकर वर्तमान के उजाले को अपने साहित्य में रोपित करती हुई दिखती है। कम से कम मॉरीशस साहित्यकार रामदेव धुरंधर के पथरीला सोना उपन्यास के सात खंड इस यात्रा को बखूबी प्रमाणित करते हैं।

डॉ दीपक पाण्डेय एवं डॉ नूतन पाण्डेय जी द्वारा संपादित पुस्तक “रामदेव की रचना धर्मिता” के पृष्ठ 24 पर डॉ.हरेराम पाठक जी का आलेख रामदेव धुरंधर का साहित्य समाजैतिहासिक दस्तावेज में #श्री_रामदेव_धुरंधर के ऐतिहासिक उपन्यास पथरीला सोना को कोट को करते हुए डॉक्टर पाठक लिखते हैं –

“पथरीला सोना श्रम संस्कृति का महाआख्यान है। कारण इसमें श्रम की पीड़ा ही नहीं, बल्कि उसके सौंदर्य का भी अनुलेखन है। कोई भी मजदूर जब श्रम करता है तो उसके श्रम के बराबर उसे मजदूरी नहीं मिल पाती तो भी वह श्रम करना नहीं छोड़ता है। आखिर कहां से आती है उसमें यह शक्ति? क्या राज है उसकी कठोर जीवटता का, जो कभी उसे हार मानने नहीं देता है। धुरंधर स्पष्ट का उत्तर देते हुए कहते हैं –

शादी विवाह के गीत, भक्ति काव्य और इस तरह के भारतीय कृतियां और संस्कृति का इस देश में विस्तार होता चला गया था। जो लोग साधारण लोग थे उनके अंतस में भी समाने लगा था कि अपने भारत की इतनी सारी धरोहर से हम इस देश में अपने को धन्य पा रहे हैं। ” अर्थात भारतवर्ष की आस्था मूलक संस्कृति धरोहर ही उस समय प्रवासी भारतीयों की थाती थी जिसके बल पर शोषित होते हुए भी कठोर श्रम साधना के बल पर वे सुदूर मॉरीशस में अपने पैर जमा सके।

“उपन्यास की एक पात्र धानी कहती है – “मैं धरती और आसमान से तो नहीं लड़ सकती लेकिन कुदाल से काम करना मुझे आता है” ( पथरीला सोना खंड तीन पृष्ठ 309 )

श्री धुरंधर जी का यह उपन्यास सन 1834 से लेकर 1912 तक के भारतीय श्रम शूरवीरों की जीवट कथा है, जिन लोगों ने मॉरीशस को अपनी कर्मभूमि बनाया। आज अपनी श्रम संस्कृति एवं कर्म बल से उन्होंने मॉरीशस की बंजर भूमि को उपजाऊ बनाया है एवं वहां की सरकार खुद उनकी सरकार है।

डॉ अमित कुमार गुप्ता एवं सुश्री ज्योति कुशवाहा द्वारा संपादित पुस्तक भारतीय संस्कृति के उन्नयन में प्रवासी साहित्यकार यह शीर्षक “मॉरीशस साहित्य का है।

#श्री_अभिमन्यु_अनत_युग” में प्रोफेसर रेखा पी मेमन एक गिरमिट गीत का उदाहरण देती है –

“सुन कहानी गिरमिटियन के।

काटे कलजन सुन सुन के

भइल मोहताज मजूरिया जब देशवा में,

फ़सलन मीठी बतिया दलालवा के,

पहुंचन मिरिचिया या जहाजी भाई बनन के,

गुलाम बनलन साहब गोरवन के,

मिलल झोपड़ियां हसवा पियासवासवा,

ओढ़ावन बिछावन पहनावा गोनिया के,

न सिक लीव न लोकल लिव न परब कोईई

बीतल समैय बांच चौपाइयां रामायण के,

बचाओलन धर्वा पूजा पाठ करके। ।

मॉरीशस के प्रख्यात नाटककार #श्री_सोमदत्त_बखोरी का एक नाटक “गुमान की गोली” जिसे डॉक्टर नूतन पाण्डेय जी की कृति “मरिशसीय हिंदी नाटक साहित्य और सोमदत्त बखोरी” के एक नाटक “गुमान की गोली” का एक पात्र सोमनाथ कहता है कि-

सोमनाथ : जिंदगी में ऐसी ऐसी ठोकर खाकर ही आंखें खुलती है। जिस क्रांति ने हमारे दिल में घर कर लिया है वह कब शांत होने वाली कवि में केवल रोने और गाने के गुण नहीं होते, कवि कल्पना का खिलौना नहीं, कवि समय आने पर निर्जीव हड्डियों में जान भी फूंक सकता है। आज तक मेरी कलम से कोमलता टपकती आई है। अब मैं चाहता हूं कि उसमें आग की लपटे निकले ताकि अन्याय, अनिति, शोषण दमन अत्याचार की दुनिया से हार कर मत जाए, ताकि हर एक मालिक समझ जाए कि गरीबों के ही भी पहलू में एक इंसान का दिल होता है ( पृष्ठ 118 )

रामदेव की रचना धर्मिता पुस्तक के अपने एक आलेख में डॉ. दीपक पांडेय सहायक निदेशक केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली एवं पूर्व द्वितीय सचिव ( भाषा – संस्कृति ) भारतीय उच्चायोग त्रिनिडाड एवं टोबैगो अपने आलेख शीर्षक “रामदेव धुरंधर की लघु कथाओं का वैशिष्टय” के (पृष्ठ 230 ) रामदेव धुरंधर की लघुकथा “घर एक बसेरा” के हवाले से लिखते हैं कि-

“किसी भी परिस्थिति में अपने कर्तव्यों से विमुख न होना मानव का लक्ष्य है। परिस्थितियों से पलायन किसी समस्या का समाधान नहीं है। बल्कि समस्याओं का सामना करना ही समस्याओं पर विजय प्राप्त करने का एकमात्र साधन है। “

उपरोक्त संदर्भों आलेखों को पढ़कर हम कह सकते हैं कि प्रवासी साहित्यकार अपने लिखे के माध्यम से उन प्रवासी जनों की बात करते हैं, जो कोई दूसरे नहीं बल्कि हमारे ही पूर्वज थे। जिन्होंने दूसरे देश जाकर के मौज मस्ती नहीं मनाई बल्कि उन्होंने एक बड़ा संघर्ष किया। संघर्ष इतना बड़ा था, जिसकी सीमाए नहीं थी। दिशाएं तय ही नहीं थी। संघर्ष का अंत कहां है, इसका पता उनको नहीं चल रहा था।

संघर्ष की सीमा तो समुद्र के भीतर पानी के जहाज में जब वे बैठे तो उन प्रवासी मजदूरों को भी नही समझ में आ रही थी, जहां दूर-दूर तक धरती ही नजर ही नहीं आ रही थी।

पानी के जहाज पर के तांबूल पर बैठे हुए पक्षी की मनोस्थिति कैसी होती है – इसे ऐसे ही जान सकते हैं कि जैसे उड़ जहाज को पंछी फिर जहाज पर आवे।

“जाना कहां-कहां है रुकना कुछ भी उनको पता नहीं”

ऐसी मन:स्थिति को मैंने अपनी कृति काव्य कथा विथिका ” के माध्यम से लिखा था –

[ इस रचना के शीर्षक का भाव मुझे मारीशस के हिंदी साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी के ऐतिहासिक उपन्यास पथरीला सोना से मिला ]

पत्थर के नीचे सोना होता है़ ……

*

भारत की संस्कृति और ताकत,

श्रम के श्वासों मेंं बसती है़।

सेवा और श्रम के इर्द गिर्द,

शीतल बयार बन बहती है़ ॥

*

श्रम, सेवा का प्रतिमान बने,

हनुमान यहाँ पूजे जाते।

जन जन के मन मेंं बसते हैं,

वानर तन सुन्दर कहलाते ॥

*

पत्थर की चाकी मेंं पिस कर,

रोटी का आटा बनता है।

छाते की नोको से घिस कर,

श्रमयोगी का भाल चमकता है़ ॥

*

काली अधियारी स्याह भरी,

झोपड़ी मेंं सोना होता है़।

श्रमिको का भी संकल्प यही,

पत्थर के नीचे सोना होता है़।

*

निर्धन माँ बाप के बेटे भी,

इस देश के मुखिया बनते हैं।

श्रम के सोपान पर चढ़ कर के,

भारत का भाग्य बदलते है़ ॥

*

श्रम, और समर्पण, राष्ट्र प्रेम,

मिल कर शक्ति बन जाती है़।

फिर सात समुन्दर पार पहुँच,

अपना परचम लहराती है़ ॥

राजेश कुमार सिंह “श्रेयस “

अवधी साहित्य के श्रेष्ठ साहित्यकार डॉ राम बहादुर मिश्र जी जब श्री रामदेव धुरंधर की एक कहानी ‘ वास्तविक रचनाकार” पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं –

भारतीय वाग्मय में इस बात की अवधारणा ही स्थापित की जाती है। धुरंधर जी ने भी लघुकथा की एक त्रासदी को सुखान्त बनाया है।

मॉरीशस के भारतीय उच्चायोग में द्वितीय सचिव ( भाषा एवं संस्कृति ) के पद पर रह चुकी डॉ नूतन पाण्डेय, सहायक निदेशक केंद्रीय हिंदी निदेशालय नई दिल्ली, प्रवासी साहित्यकारों के योगदान के विषय में लिखती हैं कि-

हम अतीत में न जाकर अब मॉरीशस में हिंदी के प्रचार प्रसार की बात करते हैं। फ्रेंच और ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के द्वारा एग्रीमेंट के तहत भारतीयों को गिरमिटिया मजदूर के रूप में कर 1834 में मॉरीशस दीप में लाया गया था। मॉरीशस पहुंचे भारतीय मजदूर ने इस अपरिचित दीप में भारतीय भाषा और संस्कृति के जो बीज रोपे थे वे वट वृक्ष बनकर हिंदी साहित्य को ऑक्सीजन पहुंचाने का दायित्व निभा रहे हैं।

इन सभी बातों और इन सभी आलेखों के आधार पर हम कह सकते हैं कि –

भारत से गिरमिटिया देश पहुंचे भारतीय मजदूरो ने प्रत्येक क्षेत्र में एक बड़ी जमीन तैयार की, जहां आज भी भारतीय कला, संस्कृति, संस्कार और साहित्य की सुगंध महसूस की जा सकती है।

हम भारतीय उनके ऋणी है, तथा उनके संघर्ष को नमन करते हैं कारण की उन्होंने एक बहुत बड़ा कार्य किया। ऐसा भी होता कि वह किसी देश में जाते, अभावो के साथ जाते और फिर वहां एक लुप्त प्राय समूह बनाकर रह जाते। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, उन्होंने तो ऐसा कर दिया कि हमारा सीना गर्व से ऊंचा हो गया। उन्होंने ऐसे कई देशों में जाकर न सिर्फ भारतीय संस्कृति और भारतीयता का बीज रोपण किया, बल्कि स्वयं को एक विशाल वट वृक्ष की तरह से स्थापित किया।

आज भी उनके वंशज अपने कलम के दम पर, हमारी भाषा संस्कृति और सभ्यता के साथ कदम ताल करते हुए चल रहे है। यह कम गौरव की बात नहीं है।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 05 अगस्त 2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #287 ☆ क्रोध बनाम पश्चाताप… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख क्रोध बनाम पश्चाताप। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 287 ☆

☆ क्रोध बनाम पश्चाताप… ☆

‘क्रोध मूर्खता से प्रारंभ होता है और पश्चाताप पर समाप्त होता है’ पाइथागोरस का यह कथन कोटिश: सत्य है कि मूर्ख व्यक्ति ही क्रोधित होता है,क्योंकि वह इस तथ्य से अवगत नहीं होता कि इसकी सबसे अधिक हानि क्रोधी को ही उठानी पड़ती है। क्रोध के समय मानव का विवेक नष्ट हो जाता है और वह आत्म-नियंत्रण में नहीं रहता। वह तुरंत प्रतिक्रिया दे देता है; जो आग में घी का काम करती है। इसलिए वह मूर्ख कहलाता है,क्योंकि अपने अहित के बारे में वह सोचता ही नहीं। अक्सर क्रोध की स्थिति में वह प्रतिपक्षी के प्राण लेने पर भी उतारू हो जाता है। वह वाणी पर भी आत्म-नियंत्रण खो देता है। उस स्थिति में वह ऊल-ज़लूल सोचता ही नहीं; दूषित भावों को बढ़ा-चढ़ा कर अकारण उगल देता है। एक अंतराल के पश्चात् उसे अपनी ग़लती का एहसास होता है और वह पश्चाताप की अग्नि में जलने लगता है, जिसका कोई लाभ नहीं होता,क्योंकि समय व अवसर हाथ से निकल जाने के पश्चात् व्यक्ति हाथ मलता रह जाता है, जैसा कि ‘फिर पछताय होत क्या,जब चिड़िया चुग गई खेत।’

गुस्सा और मतभेद बारिश की तरह होना चाहिए,जो बरस कर समाप्त हो जाए और प्रेम हवा की तरह ख़ामोश होना चाहिए और सदैव आसपास रहना चाहिए–यह सोच अत्यंत सार्थक है। दूसरे शब्दों में क्रोध दूध के उबाल जैसा होना चाहिए और मतभेद बारिश की तरह होने चाहिएं। जिस प्रकार बादल उमड़-घुमड़ कर आते हैं और बरस कर शांत हो जाते हैं; तप्त धरा को शीतलता प्रदान करते हैं,जिसके उपरांत मन-आँगन प्रफुल्लित हो जाता है। जैसे बारिश सब कुछ बहाकर ले जाती है और धरा हरी-भरी हो जाती है। उसी प्रकार हृदय में पल्लवित मलिनता व मनोमालिन्य भी तुरंत समाप्त हो जाने चाहिए। पति-पत्नी में विचार-वैषम्य   बारिश की तरह होने चाहिए और मानव को अपने मन की बात कहने के पश्चात् शांत हो जाना चाहिए; मनो-मालिन्य को घर में आशियां नहीं बनाने देना चाहिए, क्योंकि वह स्थिति अत्यंत घातक होती है,जिसका भयावह परिणाम बढ़ते तलाक़ों के रूप में हमारे समक्ष हैं। बच्चे व परिवारजन सब इस एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हैं। दूसरी ओर प्रेम मलय वायु की झोंकों की भांति होना चाहिए, जो ख़ामोशी के रूप में सदैव आपके अंग-संग रहे। स्नेह, प्रेम व सौहार्द का बसेरा मौन में ही संभव है। सो! इसके लिए सहनशीलता अपेक्षित है,जो मौन की प्राथमिक शर्त है। प्रेम प्रतिदान नहीं चाहता; त्याग व समर्पण चाहता है,जो विनम्रता के भाव के रूप में जीवन में पदार्पण करता है। सो! जहां प्रेम है; वहां देवता निवास करते हैं; लक्ष्मी का वास रहता है तथा पारस्परिक वैमनस्य भाव का स्थान नहीं होता।

‘मरहम होते हैं कुछ लोग/ शब्द बोलते ही दर्द गायब हो जाता है/ ऐसे लोगों की वाणी में माधुर्य होता है और उनकी वाणी ज़ख्मों पर मरहम की भांति कार्य करती है।’ उस स्थिति में स्व-पर व राग-द्वेष के भाव समाप्त हो जाते हैं। उनमें ऐसी आकर्षण शक्ति होती है कि मन उनके आसपास रहने और सत्वचन सुनने को तत्पर रहता है। इसलिए कहा जाता है कि मानव अपने शब्दों द्वारा दूसरों की पीड़ा हर सकता है। ‘वीणा के तार ढीले मत छोड़ो/ ढीला छोड़ने व  अधिक खींचने से उसका स्वर मधुर व सुरीला नहीं

निकलता।’ इतना ही नहीं, यदि  वीणा के तारों को अधिक कसा जाए; वे टूट जाएंगे’ के माध्यम से सदैव मीठे वचन बोलने की सीख दी गई है। मीठी बातों से सर्वत्र सुख प्राप्त होता है। सो! कठोर वचनों का त्याग करना वशीकरण मंत्र है–तुलसीदास जी की यह सोच अत्यंत सार्थक है।

मनुष्य जब अपनी ग़लतियों का वकील और दूसरों की ग़लतियों का जज बन जाता है, फैसले नहीं फ़ासले बढ़ जाते हैं। सो! मानव को अपनी ग़लती को स्वीकारने में संकोच  कर लज्जा का अनुभव नहीं करना चाहिए,क्योंकि व्यर्थ वाद-विवाद से दिलों में दरारें पनप जाती हैं–जिन्हें पाटना असंभव हो जाता है। ‘ऐ मन! सीख ले तू/ ख़ुद से बात करने का हुनर/ खत्म हो जाएंगे/ सारे दु:ख द्वंद्व/ नहीं रहेगा तू अकेला जहान में/ साथ देंगे तेरे अपने ही दुश्मन/ तू सबका प्रिय बन जाएगा।’ स्वरचित पंक्तियां स्वयं से बात करने की सीख देती हैं। मौन नवनिधि है और सबसे कारग़र दवा है, जिससे रिश्ते पनपते हैं। ‘अपनी ऊंचाई पर कभी घमंड न करना ऐ दोस्त!/ सुना है बादलों को भी पानी ज़मीन से उठाना पड़ता है।’ दूसरी और कोई तुम्हारे लिए दरवाजा बंद कर ले,तो उसे एहसास दिला देना कि कुंडी दोनों ओर होती है। इससे तात्पर्य है कि मानव को रिश्तों को बनाए रखने व स्थायित्व प्रदान करने हेतु झुकने व समझौता करने में तनिक भी संकोच नहीं  चाहिए। परंतु अपने आत्म-सम्मान व  अस्तित्व को बनाए रखना उसकी प्राथमिक व आवश्यक शर्त है।

जीवन में आधा दु:ख ग़लत लोगों से उम्मीद रखने से होता है और बाकी का आधा दु:ख सच्चे लोगों पर संदेह अर्थात्  शंका करने से आता है। इसलिए सदैव अच्छे लोगों की संगति में रहना चाहिए। वह इंसान कभी हार नहीं सकता, जो बर्दाश्त करना जानता है। सो! मानव तो सहना चाहिए, कहना नहीं,क्योंकि ‘सहने’ से समाधान निकलता है और ‘कहने’ से राई का पर्वत बन जाता है। रिश्तों का निबाह करने के लिए मानव को सहन करना आना चाहिए; कहना नहीं। प्लेटो के मतानुसार ‘मानव व्यवहार तीन मुख्य स्रोतों से निर्मित होता है– इच्छा,भाव व ज्ञान और ऐसे व्यक्ति को सदैव संभाल कर रखना चाहिए,जिसने आपको यह तीन चीज़ें भेंट की हों–साथ, समय व समर्पण।’ ऐसे लोग सदैव मानव के सुख-दु:ख के साथी होते हैं।

कोई कितना भी बोले व स्वयं को शांत रखें; आपको अकारण प्रभावित नहीं कर सकता,क्योंकि धूप कितनी भी तेज़ हो; समुद्र को सुखा नहीं सकती। मन को शांत रखना जीवन को सफल बनाने का अनमोल खज़ाना है। वाशिंगटन के मतानुसार ‘अपने कर्त्तव्य में लगे रहना और चुप रहना– बदनामी का सबसे सबसे अच्छा जवाब है।’ वैसे बोलना भी एक सज़ा है। सो! इंसान को यथायोग्य,यथास्थान उचित बात कहनी चाहिए। यदि सच्ची बात मर्यादा में रहकर मधुर भाषा में कही जाए,तो सम्मान दिलाती है,वरना कलह का कारक बन जाती है। ग़लत बात बोलने से चुप रहना उचित व श्रेयस्कर है। वाणी से निकला हर एक कठोर शब्द घाव करके महाभारत करा सकता है। यदि वाणी की मर्यादा को ध्यान में रखकर बात कही जाए,तो बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ रोकी जा सकती हैं। इसलिए कबीर जी कहते हैं कि ‘मीठी वाणी बोलना/ काम नहीं आसान/ जिसको आती यह कला/ होता वही सुजान।’

‘चुपचाप कहते रहो तो सब अच्छा है। अगर बोल पड़े तो आपसे बुरा कोई नहीं’ के माध्यम से मानव को मौन रहकर सहन करने का संदेश दिया जाता है। इसलिए कहा जाता है कि संसार में वही व्यक्ति सफल है,जिसने जीवन में सर्वाधिक समझौते किए होते हैं। परंतु सहनशीलता तभी तक अच्छी होती है; जब तक उसे आत्म-सम्मान से समझौता नहीं करना पड़ता। हर वस्तु की अधिकता हानिकारक होती है और उसका खामियाज़ा मानव को अवश्य भुगतना पड़ता है। सो! जीवन में समन्वय की राह पर चलते हुए सांमजस्यता प्राप्त करने की आवश्यकता होती है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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