हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 725 ⇒ घंटियाँ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी आलेख – “घंटियाँ।)

?अभी अभी # 724 ⇒ घंटियाँ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

घण्टा बड़ा होता है और घंटियाँ छोटी। 24 घंटे मिलकर एक दिन बनता है, जिसमें रात भी शामिल होती है। 60 मिनिट मिलकर एक घंटा बना सकते हैं लेकिन सभी घंटियाँ मिल-जुलकर एक घण्टा नहीं बना सकती। घण्टा, घण्टा है, घंटी घंटी।

घंटा-घर में कोई घंटा नहीं होता, एक घड़ी ज़रूर होती है, जो हर घंटे का अहसास दिलाती है,

टन टन की ध्वनि पैदा करती है। घड़ी भले ही खराब हो, घंटा घर को कोई फर्क नहीं पड़ता।।

घरों में पूजा-घर में घंटियाँ होती हैं, जो आरती के समय बजाई जाती है। बड़े बड़े मंदिरों में छोटे-बड़े घंटे-घंटियाँ बज उठती हैं, सुबह शाम, जब आरती का वक्त होता है।

आते-जाते, घंटों से छेड़छाड़ करना, छोटे बच्चों को गोद में लेकर घंटी बजाना बड़ा सुखद और मनोरंजक मंज़र होता है।

बचपन में अपने पाँवों पर खड़े होते ही पिताजी ने एक पहिये वाली साईकल दिलवा दी थी, जिसमें एक घंटी लगी हुई थी। घूमते पहिये के साथ-साथ घंटी की भी आवाज़ आती थी। दो पहिये की साईकल में अगर घंटी ना हो, तो चालान बन जाता था।

समय के साथ घंटी का स्थान हॉर्न ने ले लिया। कभी किसी घंटी वाले को निवेदन नहीं करना पड़ता था, कृपया घंटी बजाएँ।

जब कि भारी वाहनों के पीछे उसूलन लिखना पड़ता है, हॉर्न प्लीज।।

घर की डोअर बेल, दूध वाले की घंटी और गर्मी में कुल्फी-आइसक्रीम की घंटी पर सबका ध्यान रहता था। कितना भी पढ़ाकू छात्र क्यों न हो, छुट्टी की घंटी बरबस ध्यान आकर्षित कर ही लेती थी। गाँव में तो जानवरों के गले में भी घंटी बाँधने का रिवाज है। कहीं जंगल में चरने बहुत दूर न निकल जाए।

एक कहावत मेरे गले आज तक नहीं उतरी ! बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे ? ठीक है, बिल्ली शेर की मौसी है, लेकिन इतनी खूँखार भी नहीं। कभी कभी मेरी बिल्ली मुझसे भी म्याऊं कर लेती है, लेकिन मेरे लिए मेरी बिल्ली के गले में घंटी बाँधना कोई टेढ़ी खीर नहीं। लेकिन केवल किसी कहावत को गलत सिद्ध करने के लिए बिल्ली की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ गले में घंटी बाँधना मुझे मंजूर नहीं। चोरी-चुपके चूहे का शिकार करने वाली बिल्ली क्या घंटी बजाकर शिकार करेगी ! बिल्ली के गले में घंटी बाँधना, उसके पेट पर लात मारने जैसा है।।

बच्चों के पाँव में पैजनियाँ और किसी नृत्यांगना के पाँव में घुँघरू, घंटी का ही, लघुतम स्वरूप है। जो कानों में मधुर रस घोल दे, वह घंटी। किसी की फ़क़त याद से ही दिल में घंटियाँ बजनी शुरू हो जाएं, वह स्थिति सबसे श्रेयस्कर है। ऐसे भी अवसर आते हैं जीवन में, साहब घंटी बजाते रह जाते हैं, और चपरासी का कहीं पता नहीं रहता। और वह बाहर बैठा साहब को कोस रहा होता है, क्या घर में भी बीवी को घंटी बजाकर बुलाते हैं। अपने हाथ से एक ग्लास पानी तक नहीं पी सकते साहबज़ादे।

सभी आवाज़ों के ऊपर अन्तरात्मा की आवाज़ की तरह, अचानक टेलीफोन की घंटी मेरा ध्यान आकर्षित करती है।

जब तक ना उठाओ, घर को सर पर उठा लेती है। मैं फ़ोन उठाकर घंटी की ध्वनि को विराम दे देता हूँ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 138 – देश-परदेश – राष्ट्रीय घड़ी दिवस: 19 जून ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 138 ☆ देश-परदेश – राष्ट्रीय घड़ी दिवस: 19 जून ☆ श्री राकेश कुमार ☆

घड़ी के उपयोग द्वारा, समय के सदुपयोग के लिए घड़ी का प्रचार प्रसार करने के लिए आज 19 जून को राष्ट्रीय घड़ी दिवस के रूप में चयन किया गया होगा।

सन 1950 तक तो लोग समय देखने के लिए घंटाघर जाते थे। ये सुविधा तो मात्र कुछ शहरों में हुआ करती थी। रेडियो भी समय की जानकारी प्राप्त करने का एक मुख्य स्रोत हुआ करता था। साठ का दशक आते आते घरों में घड़ी नामक यंत्र पैर पसारने लगा था। अमीरों के यहां पेंडुलम वाली घड़ी होती थी। एच एम टी ने लोगों को कलाई में घड़ी बांधना सिखाया था। चाबी से चलने वाली अलार्म घड़ी ने हमारे अनेकों सपनों को अधूरा रखने का कार्य बखूबी निभाया था।

हर कमरे में घड़ी, हर कलाई घड़ी, हर हाथ के मोबाइल में घड़ी पहुंच चुकी है। इस के बावजूद समय नहीं है, समय देखने का, हम अधिकतर सब जगह देरी से ही पहुंचते हैं।

क्या फ़ायदा ऐसी घड़ियों का जो समय का अनुशासन सिखाने में असफल रही हो। हवाई जहाज से यात्रा करने वाले औसतन 5% यात्री अपनी यात्रा नहीं कर पाते हैं। ट्रेन और बस के हालात इस से भी गए बीते हैं।

देरी से गंतव्य पर पहुंचने का ठीकरा अब ट्रैफिक जाम के माथे मढ़ना पुराना बहाना माना जाता है। स्वयं की अपनी इस लेट लतीफी की आदत को “राष्ट्रीय समय सूचक” ( I S D) तक कहने में हम सब अग्रणी रहते हैं।

ईश्वर ने पूरे विश्व में 24 घंटे का समय सब को दिया है। लोग फिर भी कह देते है, मरने का भी टाइम नहीं है। घड़ी के नाम से अब स्मार्ट वॉच भी आ गई है, लेकिन समय की पाबंदी को ना मानने वाले, जीवन में कभी भी स्मार्ट नहीं बन सकते हैं।

आप सबने भी इस फालतू का लेख पढ़ने में बहुत समय व्यर्थ कर दिया है, क्योंकि तय समय पर कार्य करने की खराब आदत अब क्या ठीक होगी।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 723 ⇒ एक भारतीय आत्मा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एक भारतीय आत्मा।)

?अभी अभी # 723 ⇒ एक भारतीय आत्मा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जिक्र होता है जब एक भारतीय आत्मा का, दद्दा माखनलाल चतुर्वेदी की बात होती है। दद्दा का जन्म 1889 ईसवी में होशंगाबाद जिले के बाबई ग्राम में हुआ था। वैसे हमारा पैतृक निवास भी बाबई और सेमरी हरचंद ही है। हमारे बाप दादा भी वहीं पैदा हुए। देखिए, हमारी आत्मा भी कितनी भारतीय है। वैसे देखा जाए तो आज देश की सभी १४० करोड़ आत्माएं भी भारतीय ही हैं। भारत का रहनेवाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं।

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा, की तर्ज पर अगर आत्मा से पूछा जाए कि आत्मा रे आत्मा तेरा स्वरूप कैसा, तो शायद वह भी यही कहे, जिस जीव में विद्यमान, उस जैसा। आत्मा के बारे में गीता से अधिक ज्ञान कहां से मिल सकता है। बात सीधी नैनं छिन्दंति शस्त्राणि, नैनं दहति पावक: तक पहुंच जाती है। संक्षेप में हमारे जन्म के साथ ही आत्मा का प्राण के साथ हमारे शरीर में प्रवेश हो जाता है और जब प्राण पखेरू उड़ जाते हैं तो आत्मा भी परमात्मा में विलीन हो जाती है। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा। ।

लेकिन जब तक यह आत्मा हमारे शरीर में रहती है, इसे मन के अधीन रहना होता है और सारे सांसारिक प्रपंचों का साक्षी बनना पड़ता है। अगर हमारी आत्मा भारतीय है तो दुनिया के हर देशवासी की आत्मा भी उसी देश की वासी होगी। यथा An American Soul, A British Soul अथवा A Chinese Soul. एक देशसेवक फौजी जब अपने देश की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगाता है तो उसका शरीर और आत्मा एकरूप हो जाते हैं। आत्मा की तरह वह भी अमर हो जाता है।

जो अपने वतन अथवा मानवता के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर देते हैं, उनकी आत्मा उनसे अलग नहीं होती और वे जन्म मरण के बंधन से सदा सदा के लिए मुक्त हो जाते हैं।

यह तो स्पष्ट है कि हमारे शरीर में कहीं न कहीं आत्मा है जरूर और उसी आत्मा में परमात्मा का भी वास है। उंगली में अंगूठी, अंगूठी में नगीना ! लेकिन काम, क्रोध, लोभ और मोह का आवरण हमें शुद्ध आत्मा तक नहीं पहुंचने देता। हम तो कम परेशान हैं, बेचारी आत्मा बहुत दुखी और परेशान है। सब गीता ज्ञान धरा रह जाता है, जब हमारी आत्मा दुखी सुखी होती है। हम कलेजे को ही आत्मा समझ बैठते हैं।

किसी आत्मा को अच्छी आत्मा और किसी आत्मा को दुष्टात्मा समझ बैठते हैं। ।

हमारी आत्मा कब कर्ता बनकर दुआ और बद्दुआ देने लगती है, हमें पता ही नहीं चलता। तुमने हमारी आत्मा को कष्ट पहुंचाया, ईश्वर तुम्हें देख लेगा। जब हमसे कुछ नहीं बन पड़ा, तो ईश्वर की धौंस दे दी। वाह रे मानुस की जात ?

जात पात तो हमसे छूटती नहीं, बड़े आत्मा परमात्मा की बात करते हैं। बात एक भारतीय आत्मा से शुरू हुई थी, ज्यादा दूर तलक नहीं गई। आत्मा का अपना दायरा है। आत्मा को भारतीय ही रहने दें चलेगा। देखा जाए तो बस वही परम सत्य और सनातन है। कम से कम इसे तो धर्म और राजनीति से दूर रखें। बड़ी मुश्किल होगी, अगर आत्मा भी कांग्रेस बीजेपी अथवा हिंदू मुसलमान हो गई। ।

कबीर बार बार जिस चादर की बात करते हैं और हमारे साहिर साहब जिस चुनरी के दाग के लिए फिक्रमंद हैं, क्या यह वही आत्मा तो नहीं। ओढ़ने की चुनरी हो या चादर, बात तो एक ही है।

आत्मा का क्या है, वह तो नित्य, शुद्ध और मुक्त है। वह तो काया का पिंजरा छोड़ परमात्मा में विलीन हो जाएगी और चित्रगुप्त अपने बही खाते खोलकर बैठे होंगे और घर में गरुड़ पुराण का पाठ चल रहा होगा। करते रहो दान पुण्य मृतात्मा की शांति और मुक्ति के लिए। लागा चुनरी में दाग, छुपा लो, छुपा सको तो।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 295 – हर काल, हर हाल ! ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 295 हर काल, हर हाल !… ?

संध्या समय प्राय: बालकनी में मालाजप या ध्यान के लिये बैठता हूँ। देखता हूँ कि एक बड़ी-सी छिपकली दीवार से चिपकी है। संभवत: उसे मनुष्य में काल दिखता है। मुझे देखते ही भाग खड़ी होती है। वह भागकर बालकनी के कोने में दीवार से टिकाकर रखी इस्त्री करने की पुरानी फोल्डिंग टेबल के पीछे छिप जाती है।

बालकनी यूँ तो घर में प्रकाश और हवा के लिए आरक्षित क्षेत्र है पर अधिकांश परिवारों की बालकनी का एक कोना पुराने सामान के लिये शनै:-शनै: आरक्षित हो जाता है। इसी कोने में रखी टेबल के पीछे छिपकर छिपकली को लगता होगा कि वह काल को मात दे आई है। काल अब उसे देख नहीं सकता।

यही भूल मनुष्य भी करता है। धन, मद, पद के पर्दे की ओट में स्वयं को सुरक्षित समझने की भूल। अपने कथित सुरक्षा क्षेत्र में काल को चकमा देकर जीने की भूल। काल की निगाहों में वह उतनी ही धूल झोंक सकता है जितना टेबल के पीछे छुपी छिपकली।

एक प्रसिद्ध मूर्तिकार अनन्य मूर्तियाँ बनाता था। ऐसी सजीव कि जिस किसीकी मूर्ति बनाये, वह भी मूर्ति के साथ खड़ा हो जाय तो मूल और मूर्ति में अंतर करना कठिन हो। समय के साथ मूर्तिकार वृद्ध हो चला। ढलती साँसों ने काल को चकमा देने की युक्ति की। मूर्तिकार ने स्वयं की दर्जनों मूर्तियाँ गढ़ डाली। काल की आहट हुई कि स्वयं भी मूर्तियों के बीच खड़ा हो गया। मूल और मूर्ति के मिलाप से काल सचमुच चकरा गया। असली मूर्तिकार कौनसा है, यह जानना कठिन हो चला। अब युक्ति की बारी काल की थी। ऊँचे स्वर में कहा, ‘अद्भुत कलाकार है। ऐसी कलाकारी तो तीन लोक में देखने को नहीं मिलती। ऐसे प्रतिभाशाली कलाकार ने इतनी बड़ी भूल कैसे कर दी?” मूर्तिकार ने तुरंत बाहर निकल कर पूछा,” कौनसी भूल?”  काल हँसकर बोला,” स्वयं को कालजयी समझने की भूल।”

दाना चुगने से पहले चिड़िया अनेक बार चारों ओर देखती है कि किसी शिकारी की देह में काल तो नहीं आ धमका? …चिड़िया को भी काल का भान है, केवल मनुष्य बेभान है। सच तो यह है कि काल का कठफोड़वा तने में चोंच मारकर भीतर छिपे  कीटक का शिकार भी कर लेता है। अनेक प्राणी माटी खोदकर अंदर बसे कीड़े-मकोड़ों का भक्ष्ण कर लेते हैं। काल, हर काल में था, काल हर काल में है। काल हर हाल में रहा, काल हर हाल रहेगा।  काल से ही कालचक्र है,  काल ही कालातीत है। उससे बचा या भागा नहीं जा सकता।

थोड़े लिखे को अधिक बाँचना, बहुत अधिक गुनना।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ हमारी अगली साधना श्री विष्णु साधना शनिवार दि. 7 जून 2025 (भागवत एकादशी) से रविवार 6 जुलाई 2025 (देवशयनी एकादशी) तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ नमो नारायणाय।💥

💥 इसके साथ ही 5 या 11 बार श्री विष्णु के निम्नलिखित मंत्र का भी जाप करें। साधना के साथ ध्यान और आत्म परिष्कार तो चलेंगे ही –

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ||

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 722 ⇒ पर्दा फिल्मी और फेसबुकी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी गद्य आलेख – “अंतिम साँसें।)

?अभी अभी # 722 ⇒ आलेख – पर्दा फिल्मी और फेसबुकी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जीवन केवल सच्चाई और वास्तविकता से नहीं जीया जाता ! सपने सच नहीं होते, फिर भी सपने सुहाने लगते हैं। जीवन का सफर कभी सुहाना होता है, तो कभी काँटों भरा। मन को बहलाना ही मनोरंजन है। दुःख को कुछ समय के लिए भुलाना ही क्षणिक निवृत्ति है।

संगीत, कला और साहित्य जीवन को एक दिशा देते हैं, रोजमर्रा की उबाऊ दिनचर्या को रोचक और आकर्षक बना देते हैं। दुनिया फिल्मी हो, साहित्यिक हो, या फिर संगीतमय, जीवन में रस की सृष्टि करते हैं। साहित्य और संगीत अगर खास विधा है तो फ़िल्म एक आम विधा।।

संगीत अगर कानों में रस घोलता है तो दृश्य मन को आनंदित और आंदोलित करते हैं। आलमआरा और जहाँआरा जैसी फिल्मों से शुरू हुआ यह फिल्मी सफर आज उस मुकाम पर आ गया है, जहाँ सिनेमाहॉल का बड़ा पर्दा पहले टीवी का छोटा पर्दा हुआ और अब एंड्रॉयड के जरिये हमारी हथेली में कैद हो गया।

याद कीजिए सहगल, पृथ्वीराज कपूर, महिपाल, दिलीप, देव और राजकपूर की फिल्मों का दौर ! सिनेमाघरों में दर्शकों की भीड़। नर्गिस, मीनाकुमारी, साधना और सायराबानो की फिल्मों के पोस्टर्स। बिनाका गीत माला की धूम। हर पान वाले की दुकान पर बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं, जैसे गानों पर झूमते श्रोतागण। अभिनय सम्राट, संगीत सम्राट और हास्य सम्राट का त्रिवेणी संगम।।

समय का पंछी उड़ता जाए !

संचार क्रांति ने हरित क्रांति को पीछे छोड़ दिया। आज सिनेमाघर गिनती के हैं। जितने पहले शहर में सिनेमाघर थे, उससे अधिक आज मॉल हैं। दो आने की मूँगफली से पूरी ढाई घंटे की फ़िल्म देख ली जाती थी। आज 200 ₹ का पॉप कॉर्न कॉम्बो वह स्वाद नहीं देता।

आज मेरे हाथ में कोई बुक नहीं, फेसबुक है। बस इसे खोलने की देर है। एक झाड़ पर बैठे बंदरों से अधिक app मेरी उंगलियों तले दबे बैठे हैं। टीवी की पिक्चर ट्यूब की अब मुझे चिंता नहीं, एक टीवी दीवार से चिपका है तो एक मेरी आँखों से। यू ट्यूब में मैं जब चाहे सङ्गीत की महफ़िल सजा सकता हूँ। 24 x 7 मेरे सामने एक बोन्साई रजतपट है, सभी अभिनेताअभिनेत्रियों की फिल्में खुल जा सिम सिम की तरह केवल एक क्लिक की मोहताज है।।

फिल्मी पर्दे से फेसबुक के पर्दे तक का मेरा यह सफर बड़ा रोचक है। जो काम सन् 70 के दशक में संगीत, फिल्में और किताबें करती थी, वे सब आजकल केवल फेसबुक अकेली कर रही हैं। पहले किताबें बोलती नहीं थीं, आजकल लेखक से आपका जीवंत परिचय और संवाद होता है। रचना प्रक्रिया पर घर बैठे बहस होती है। सभी पुरानी फिल्में और क्लासिकल संगीत यू ट्यूब में उपलब्ध हो चुका है।

बस केवल एक पर्दे की जरूरत है, और वह है आँखों का पर्दा।

फेसबुक ओपन हुई और पर्दा खुला। किसी ने शायद इसी स्थिति को भाँपकर आज से कई वर्ष पहले इस गीत की रचना की होगी ;

पर्दा उठे सलाम हो जाए

बात बन जाये, काम हो जाए

फेसबुक का पर्दा उठ चुका है, आपसे सुबह का सलाम हो ही जाए ! सुप्रभात …

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #282 ☆ ग़लत सोच : दु:खों का कारण… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ग़लत सोच : दु:खों का कारण। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 282 ☆

☆ ग़लत सोच : दु:खों का कारण… ☆

ग़लत सोच के लोगों से अच्छे व शुभ की अपेक्षा-आशा करना हमारे आधे दु:खों का कारण है, यह सार्वभौमिक सत्य है। ख़ुद को ग़लत स्वीकारना सही आदमी के लक्षण हैं, अन्यथा सृष्टि का हर प्राणी स्वयं को सबसे अधिक बुद्धिमान समझता है। उसकी दृष्टि में सब मूर्ख हैं; विद्वत्ता में निकृष्ट हैं; हीन हैं और सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम हैं। ऐसा व्यक्ति अहंनिष्ठ व निपट स्वार्थी होता है। उसकी सोच नकारात्मक होती है और वह अपने परिवार से इतर कुछ नहीं सोचता, क्योंकि उसकी मनोवृत्ति संकुचित व सोच का दायरा छोटा होता है। उसकी दशा सावन के अंधे की भांति होती है, जिसे हर स्थान पर हरा ही हरा दिखाई देता है।

वास्तव में अपनी ग़लती को स्वीकारना दुनिया सबसे कठिन कार्य है तथा अहंवादी लोगों के लिए असंभव, क्योंकि दोषारोपण करना मानव का स्वभाव है। वह हर अपराध के लिए दूसरों को दोषी ठहराता है, क्योंकि वह स्वयं को ख़ुदा से कम नहीं समझता। सो! वह ग़लती कर ही कैसे सकता है? ग़लती तो नासमझ लोग करते हैं। परंतु मेरे विचार से तो यह आत्म-विकास की सीढ़ी है और ऐसा व्यक्ति अपने मनचाहे लक्ष्य की प्राप्ति कर सकता है। उसके रास्ते की बाधाएं स्वयं अपनी राह बदल लेती हैं और अवरोधक का कार्य नहीं करती, क्योंकि वह बनी-बनाई लीक पर चलने में विश्वास नहीं करता, बल्कि नवीन राहों का निर्माण करता है। अपनी ग़लती स्वीकारने के कारण सब उसके मुरीद बन जाते हैं और उसका अनुसरण करना प्रारंभ कर देते हैं।

ग़लत सोच के लोग किसी का हित कर सकते हैं तथा किसी के बारे में अच्छा सोच सकते हैं; सर्वथा ग़लत है। सो! ऐसे लोगों से शुभ की आशा करना स्वयं को दु:खों के सागर के अथाह जल में डुबोने के समान है, क्योंकि जब उसकी राह ही ठीक नहीं होगी; वे मंज़िल को कैसे प्राप्त कर सकेंगे? हमें मंज़िल तक पहुंचने के लिए सीधे-सपाट रास्ते को अपनाना होगा; कांटों भरी राह पर चलने से हमें बीच राह से लौटना पड़ेगा। उस स्थिति में हम हैरान-परेशान होकर निराशा का दामन थाम लेंगे और अपने भाग्य को कोसने लगेंगे। यह तो राह के कांटों को हटाने लिए पूरे क्षेत्र में रेड कारपेट बिछाने जैसा विकल्प होगा, जो असंभव है। यदि हम ग़लत लोगों की संगति करते हैं, तो उससे शुभ की प्राप्ति कैसे होगी ? वे तो हमें अपने साथ बुरी संगति में धकेल देंगे और हम लाख चाहने पर भी वहां से लौट नहीं पाएंगे। इंसान अपनी संगति से पहचाना जाता है। सो! हमें अच्छे लोगों के साथ रहना चाहिए, क्योंकि बुरे लोगों के साथ रहने से लोग हमसे भी कन्नी काटने लगते हैं तथा हमारी निंदा करने का एक भी अवसर नहीं चूकते। ग़लती छोटी हो या बड़ी; हमें उपहास का पात्र बनाती है। यदि छोटी-छोटी ग़लतियां बड़ी समस्याओं के रूप में हमारे पथ में अवरोधक बन जाएं, तो उनका समाधान कर लेना चाहिए। जैसे एक कांटा चुभने पर मानव को बहुत कष्ट होता है और एक चींटी विशालकाय हाथी को अनियंत्रित कर देती है, उसी प्रकार हमें छोटी-छोटी ग़लतियों की अवहेलना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इंसान छोटे-छोटे पत्थरों से फिसलता है; पर्वतों से नहीं।

‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’ अक्सर यह संदेश हमें वाहनों पर लिखित दिखाई पड़ता है, जो हमें सतर्क व सावधान रहने की सीख देता है, क्योंकि हमारी एक छोटी-सी ग़लती प्राण-घातक सिद्ध हो सकती है। सो! हमें संबंधों की अहमियत समझनी चाहिए चाहिए, क्योंकि रिश्ते अनमोल होते हैं तथा प्राणदायिनी शक्ति से भरपूर  होते हैं। वास्तव में रिश्ते कांच की भांति नाज़ुक होते हैं और भुने हुए पापड़ की भांति पल भर में दरक़ जाते हैं। मानव के लिए अपेक्षा व उपेक्षा दोनों स्थितियां अत्यंत घातक हैं, जो संबंधों को लील जाती हैं। यदि आप किसी उम्मीद रखते हैं और वह आपकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता, तो संबंधों में दरारें पड़ जाती हैं; हृदय में गांठ पड़ जाती है, जिसे रहीम जी का यह दोहा बख़ूबी प्रकट करता है। ‘रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय/ टूटे से फिर ना जुरै, जुरै तो गांठ परि जाए।’ सो! रिश्तों को सावधानी-पूर्वक संजो कर व सहेज कर रखने में सबका हित है। दूसरी ओर किसी के प्रति उपेक्षा भाव उसके अहं को ललकारता है और वह प्राणी प्रतिशोध लेने व उसे नीचा दिखाने का हर संभव प्रयास करता है। यहीं से प्रारंभ होता है द्वंद्व युद्ध, जो संघर्ष का जन्मदाता है। अहं अर्थात् सर्वश्रेष्ठता का भाव मानव को विनाश के कग़ार पर पहुंचा देता है। इसलिए हमें सबको यथायोग्य सम्मान ध्यान देना चाहिए। यदि हम किसी बच्चे को प्यार से आप कह कर बात करते हैं, तो वह भी उसी भाषा में प्रत्युत्तर देगा, अन्यथा वह अपनी प्रतिक्रिया तुरंत ज़ाहिर कर देगा। यह सब प्राणी-जगत् में भी घटित होता है। वैसे तो संपूर्ण विश्व में प्रेम का पसारा है और आप संसार में जो भी किसी को देते हो; वही लौटकर आपके पास आता है। इसलिए अच्छा बोलो; अच्छा सुनने को मिलेगा। सो! असामान्य परिस्थितियों में ग़लत बातों को देख कर आंख मूंदना हितकर है, क्योंकि मौन रहने व तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त न करने से सभी समस्याओं का समाधान स्वतः निकल आता है।

संसार मिथ्या है और माया के कारण हमें सत्य भासता है। जीवन में सफल होने का यही मापदंड है। यदि आप बापू के तीन बंदरों की भांति व्यवहार करते हैं, तो आप स्टेपनी की भांति हर स्थान व हर परिस्थिति में स्वयं को उचित व ठीक पाते हैं और उस वातावरण में स्वयं को ढाल सकते हैं। इसलिए कहा भी गया है कि ‘अपना व्यवहार पानी जैसा रखो, जो हर जगह, हर स्थिति में अपना स्थान बना लेता है। इसी प्रकार मानव भी अपना आपा खोकर घर -परिवार व समाज में सम्मान-पूर्वक अपना जीवन बसर कर सकता है। इसलिए हमें ग़लत लोगों का साथ कभी नहीं देना चाहिए, क्योंकि ग़लत व्यक्ति न तो अपनी ग़लती से स्वीकारता है; न ही अपनी अंतरात्मा में झांकता है और न ही उसके गुण-दोषों का मूल्यांकन करता है। इसलिए उससे सद्-व्यवहार की अपेक्षा मूर्खता है और समस्त दु:खों कारण है। सो! आत्मावलोकन कर अंतर्मन की वृत्तियों पर ध्यान दीजिए तथा अपने दोषों अथवा पंच-विकारों व नकारात्मक भावों पर अंकुश लगाइए तथा समूल नष्ट करने का प्रयास कीजिए। यही जीवन की सार्थकता व अमूल्य संदेश है, अन्यथा ‘बोया पेड़ बबूल का, आम कहां से खाए’ वाली स्थिति हो जाएगी और हम सोचने पर विवश हो जाएंगे… ‘जैसा बोओगे, वैसा काटोगे’ का सिद्धांत सर्वोपरि है, सर्वोत्तम है। संसार में जो अच्छा है, उसे सहेजने का प्रयास कीजिए और जो ग़लत है, उसे कोटि शत्रुओं-सम त्याग दीजिए…इसी में सबका मंगल है और यही सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् है।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 249 ☆ नियमितता की ताकत… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना नियमितता की ताकत। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 249 ☆ नियमितता की ताकत…

व्यक्ति अपने भविष्य का स्वयं निर्माता होता है। अक्सर देखने में आता है कि कोई बहुत मेहनती है, किंतु अपने जिद्दी स्वभाव के चलते सबके साथ सामंजस्य नहीं बैठा पाता और पास आयी हुयी सफलता को ठोकर मारकर चल देता है।

समाज में जहाँ भिन्न- भिन्न विचारधारा के लोग रहते हैं, वहाँ सबके अनुसार तो बदलाव नहीं किया जा सकता पर कहीं न कहीं सूझ -बूझ की अपेक्षा तो इंसान एक दूसरे से कर ही सकता है। बदलाव को स्वीकार करो, इससे भले ही कंफर्ट जोन छिन जाए पर तरक्की पास आने लगेगी। दिखावे के चलते बिना सोचे विचार पैसे खर्च करना, छोटी- छोटी बातों में मुँह फुलाना, स्वामित्व की भावना को बलवती करना, बात न मानने पर चीखना-चिल्लाना, बैल की तरह बिना विचारे तोड़- फोड़ करना, आलस्य के चलते कार्य में सुस्ती, मानसिक व शारीरिक शिथिलता ये सब उदासी को जन्म देते हैं।

अवसर क्रमिक गति से आते -जाते रहते हैं, बस धैर्य के साथ सत्य की राह पकड़ कर नियमित रूप से चलते रहें।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 294 – युद्ध के विरुद्ध ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 294 युद्ध के विरुद्ध… ?

मनुष्य कंदराओं में रहता था। सभ्यता के विकास के साथ उसने सामुदायिक उन्नति को आधार बनाया। परिणामस्वरूप नगर बसे, मनुष्य में अनेकानेक कलाओं का विकास हुआ। सारी विकास-यात्रा में  तथापि भीतर का आदिम न्यूनाधिक बना रहा।

इसी आदिम का एक पर्यायवाची है युद्ध। वस्तुत: युद्ध मनुष्य को ज्ञात और मनुष्य द्वारा विकसित एक ऐसी विद्रूप कला है जो मनुष्यता को ही विनाश के मुहाने पर ले आई। केवल विगत सौ वर्ष का इतिहास उठाकर देखें तो पाएँगे कि प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में तीन दशक से भी कम का अंतराल रहा। उसके बाद भी दुनिया निरंतर छोटे-बड़े युद्धों से जूझती रही है।

युद्ध की विभीषिका का दुष्परिणाम मनुष्य और मनुष्यता पर किस तरह से और कितना हुआ, इसका  आँखें खोलने वाला एक प्रमाण 31 मार्च 2015 को एक फोटो के रूप में सामने आया था।

‘सरेंडर्ड’

(युद्धग्रस्त सीरिया के शरणार्थी शिविर में रहने वाली 4 वर्षीय बच्ची हुडिया)

यह फोटो युद्धग्रस्त सीरिया के शरणार्थी शिविर में रहने वाली 4 वर्षीय बच्ची हुडिया का था। फोटो जर्नलिस्ट ने जब फोटो खींचने के लिए अपना कैमरा इस बच्ची की ओर घुमाया तो युद्धग्रस्त क्षेत्र की बिटिया ने कैमरे को बंदूक समझा और क्षण भर भी समय लगाए बिना भय से आत्मसमर्पण की मुद्रा में अपने दोनों हाथ ऊपर उठा दिए। ‘सरेंडर्ड’ शीर्षक का यह मर्मस्पर्शी चित्र शेष बची मनुष्यता के हृदय पटल पर गहराई से अंकित हो गया।

साथ ही यह चित्र अनेक प्रश्नों को विस्तृत कैनवास पर खड़ा कर गया। मनुष्य शनै:-शनै: युद्ध का आदी होता जा रहा है। युद्ध का आदी होने का अर्थ है कि मृत्यु और विनाश, बर्बरता और विद्रूपता अब हमारी संवेदना पर तुलनात्मक रूप से काफ़ी कम प्रभाव डालते हैं। यह प्रक्रिया आगे चलकर मनुष्य को पूरी तरह से संवेदनहीन कर देती है।

इससे भी अधिक घातक और दुखदाई है कि मानुष से अमानुष होने की इस यात्रा पर कोई चिंतित नहीं दिखाई देता। पिछले लगभग दो वर्ष से विश्व दो बड़े युद्ध देख रहा है। प्रकृति का निरंतर विनाश हो रहा है। मनुष्य के उन्माद ने अंतरिक्ष को प्रक्षेपास्रों का अड्डा बना दिया है तो सागर की गहराइयों में संहारक क्षमता वाली पनडुब्बियाँ उतार दी हैं। धरती, सागर, आकाश सब बारूद के ढेर पर बैठे हैं। उस पर तुर्रा यह कि अब तो शांति के लिए युद्ध को अनिवार्य बता कर नोबल प्राप्त करने का अभियान भी चल रहा है। सचमुच यह मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य पर विचार करने का समय है।

विचार करने पर खुली आँखों से दिखता तथ्य है कि महा शक्तियों के लिए युद्ध व्यापार हो चला है। हर कोई अपने तरीके से युद्ध बेच रहा है। जो युद्ध की परिधि में हैं, वे तिल-तिल कर जी रहे हैं, उनका मरना भी तिल- तिल कर ही है। जो प्रत्यक्ष युद्ध की परिधि से बाहर हैं उनके लिए युद्ध मनोरंजन भर है। बमों के धमाकों की, मिसाइल की, युद्ध के अंतरराष्ट्रीय समीकरणों की चर्चा  करते समय प्राय: मारे जा रहे लोग, पीड़ित स्त्रियाँ, आतंकित बच्चे मनुष्य की आंखों में नहीं तैरते। कुछ देर युद्ध की ख़बरें देखना लोगों के लिए असंख्य चैनलों में एक और विकल्प भर रह गया है।

अपनी कविता ‘युद्ध के विरुद्ध’ स्मरण हो आई है-

कल्पना कीजिए,

आपकी निवासी इमारत

के सामने वाले मैदान में,

आसमान से एकाएक

टूटा और फिर फूटा हो

बम का कोई गोला,

भीषण आवाज़ से

फटने की हद तक

दहल गये हों

कान के परदे,

मैदान में खड़ा

बरगद का

विशाल पेड़

अकस्मात

लुप्त हो गया हो

डालियों पर बसे

घरौंदों के साथ,

नथुनों में हवा की जगह

घुस रही हो बारूदी गंध,

काली पड़ चुकी

मटियाली धरती

भय से समा रही हो

अपनी ही कोख में,

एकाध काले ठूँठ

दिख रहे हों अब भी

किसी योद्धा की

ख़ाक हो चुकी लाश की तरह,

अफरा-तफरी का माहौल हो,

घर, संपत्ति, ज़मीन के

सारे झगड़े भूलकर

बेतहाशा भाग रहा हो आदमी

अपने परिवार के साथ

किसी सुरक्षित

शरणस्थली की तलाश में,

आदमी की

फैल चुकी आँखों में

उतर आई हो

अपनी जान और

अपने घर की औरतों की

देह बचाने की चिंता,

बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरुष

सबके नाम की

एक-एक गोली लिए

अट्टहास करता विनाश

सामने खड़ा हो,

भविष्य मर चुका हो,

वर्तमान बचाने का

संघर्ष चल रहा हो,

ऐसे समय में

चैनलों पर युद्ध के

विद्रूप दृश्य

देखना बंद कीजिए,

खुद को झिंझोड़िए,

संघर्ष के रक्तहीन

विकल्पों पर

अनुसंधान कीजिए,

स्वयं को पात्र बनाकर

युद्ध की विभीषिका को

समझने-समझाने  का यह

मनोवैज्ञानिक अभ्यास है,

मनुष्यता को बचाए

रखने का यह प्रयास है!

अलबत्ता यह भी सच है की कभी-कभी युद्ध अपरिहार्य होता है। ‘शठे शाठ्यं समाचरेत्’ के सूत्र से सहमत होते हुए भी यथासंभव युद्ध रोकने के सारे प्रयास किए जाने चाहिएँ। अठारह अक्षौहिणी सेना को निगल जाने वाले महाभारत युद्ध को रुकवाने के लिए योगेश्वर भी दुर्योधन के पास गए थे। युद्ध तब भी अंतिम विकल्प था, अब भी अंतिम विकल्प ही होना चाहिए।

नौनिहालों का आत्मसमर्पण, मनुष्यता के आत्मसमर्पण की घंटी है। यदि हम सच्चे मनुष्य हैं तो बचपन के चेहरे से आत्मसमर्पण के भाव को हटवा कर  फोटो खिंचवाने की प्रसन्नता में बदलने की मुहिम में जुटना होगा।  मानवता कराह रही है, मानवता बुला रही है। क्या हम सुन पा रहे हैं इस स्वर को?

© संजय भारद्वाज 

प्रात: 6:44 बजे, 28 जून 2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ हमारी अगली साधना श्री विष्णु साधना शनिवार दि. 7 जून 2025 (भागवत एकादशी) से रविवार 6 जुलाई 2025 (देवशयनी एकादशी) तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ नमो नारायणाय।💥

💥 इसके साथ ही 5 या 11 बार श्री विष्णु के निम्नलिखित मंत्र का भी जाप करें। साधना के साथ ध्यान और आत्म परिष्कार तो चलेंगे ही –

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ||

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 718 ⇒ पवित्र रिश्ता ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पवित्र रिश्ता।)

?अभी अभी # 718 ⇒ पवित्र रिश्ता ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जब भी पवित्र रिश्ते का जिक्र होता है, पतित पावन का स्मरण हो आता है। जो पतित को भी पावन कर दे, वह केवल परम पिता परमेश्वर ही हो सकता है।

हम संसारी तो रिश्तों में ही पवित्रता तलाशते रह जाते हैं।

रिश्ते अच्छे खराब तो हो सकते हैं, लेकिन क्या पवित्र और अपवित्र भी होते हैं। मां बेटे, भाई बहन, बेटी दामाद, सभी रिश्ते तो पवित्र होते हैं। क्या सच्चे प्यार का पवित्र होना भी जरूरी है। क्या किसी रिश्ते को गंगाजल से पवित्र किया जा सकता है। केवल पति पत्नी के रिश्तों को अग्नि की साक्षी में सात फेरों के बाद पवित्र माना जाता है। अब तो सुप्रीम कोर्ट लिव इन रिलेशन को भी पवित्र बनाने पर तुली हुई है।।

समाज हमें नैतिकता सिखा सकता है, कानून में बांध सकता है, लेकिन किसी रिश्ते को पवित्र अथवा अपवित्र नहीं ठहरा सकता। मीरा ने कुल की मान मर्यादा सब छोड़ दी। संतों के साथ बैठ बैठकर लोक लाज तक तज दी। अपने पति को पति नहीं, जाके सर मोर मुकुट, मेरो पति सोई, ऐलान कर दिया। समाज ने उसे पवित्रता सिखाने के लिए दंडित भी किया लेकिन बात नहीं बनी।

लोग हंसते हैं, कुंती पुत्र कर्ण की तरह द्रौपदी पर, जो केवल कुंती के कहने पर पांच पांडवों की पत्नी बन गई ! वही कुंती, जो सूर्य पुत्र कर्ण को अपना बेटा घोषित नहीं कर पाई। और उसी द्रौपदी के बारे में यह कहा गया कि उसके जैसी कोई सती स्त्री नहीं। कृष्ण की पत्नी न होते हुए भी सभी प्रेम से राधे कृष्ण कहते हैं, सीता राम की तरह रुक्मणि कृष्ण नहीं।।

जिस तरह पारस लोहे को सोना बना देता है, अपवित्र को पवित्र करने का शॉर्ट कट भी है, यह मंत्र ;

ॐ अपवित्र: पवित्रो

वा सर्वा वस्थां गतोपि वा।

बाहर भीतर की पवित्रता का शर्तिया नुस्खा। इसी तरह एक तुलसी पत्र यानी तुलसी का पत्ता अपवित्र को पवित्र कर देता है। पूजा, आरती के पश्चात् जब पंडित जी पवित्र जल का भक्तजनों पर छिड़काव करते हैं, तो यह भाव जरूर मन में आता है, कि उस पवित्र जल का एक छींटा हम पर भी पड़ ही जावे।

चित्त की निर्मलता और आचरण की शुद्धता ही हमारे चरित्र का निर्माण करती है। फिर भी किसी को पवित्र अथवा अपवित्र घोषित करने का अधिकार ईश्वर ने मनुष्य को नहीं दिया। वह सबमें व्याप्त है। जिन समाज के ठेकेदारों में खुद ही चरित्र ना हो, वे किसी भी लाचार को चरित्रहीन घोषित कर सकते हैं। ऐसे चरित्र प्रमाण पत्र बांटने वालों से सावधान रहें। विष्णु प्रभाकर ने आवारा मसीहा जैसी जीवनी रचकर ‘ चरित्रहीन ‘ शरदचंद्र को अमर कर दिया।।

निष्ठा, त्याग, समर्पण और नि :स्वार्थ प्रेम ही पवित्रता की सच्ची पहचान है। यही ईश्वरीय प्रेम है। जो इन गुणों से युक्त हो, प्राणी मात्र से प्रेम करता है, है, वह सर्वगुण संपन्न होकर, मानव कहलाने की योग्यता रखता है …!!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 717 ⇒ आषाढ़ का एक दिन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आषाढ़ का एक दिन।)

?अभी अभी # 717 ⇒ आषाढ़ का एक दिन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आषाढस्य प्रथम दिवसे पर अगर कालिदास का कॉपीराइट है तो आषाढ़ के एक दिन पर मोहन राकेश का। मुझे संस्कृत नहीं आती, अतः मैं कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तल, कुमारसंभव और मेघदूतम् नहीं पढ़ पाया। कालिदास को हिंदी में पढ़ना शेक्सपीयर को हिंदी में पढ़ने जैसा है। जिसे संस्कृत नहीं आती, वह सुसंस्कृत नहीं कहलाता और जिसे अंग्रेजी नहीं आती, आजकल वह पढ़ा लिखा नहीं कहलाता। हमने मोहन राकेश का आषाढ़ का एक दिन पढ़ लिया और संस्कृत नहीं आने के अपराध बोध से मुक्त हो गए।

हमारे अभिन्न मित्र श्री हृदयनारायण जी, जब प्रेम के ढाई अक्षरों में भी धाराप्रवाह संस्कृत बहा देते हैं, तो हमारी हिंदी हमें थाम नहीं पाती। जिसे तैरना नहीं आता, उसे भाषा के प्रवाह में बह जाना चाहिए। भाषा का प्रवाह सबको पार लगा देता है। जिसे एक बार भाषा का ज्ञान हो जाता है फिर वह ज्ञान के सागर में डुबकियां लगाता रहता है। ज्ञान के मोती भी उसी के हाथ लगते हैं।।

आषाढ़ के प्रथम दिन का शायद मेघदूत से संबंध है। इस बार आषाढ़ के पहले दिन ही एक बूंद भी पानी नहीं गिरा। शुक्र है फागुन की तरह, आषाढ़ के दिन चार नहीं होते, अभी आधा आषाढ़ पड़ा है, मेघदूत जल्दी कर, हरी अप।

इस बार आषाढ़ के दिनों में और भी कई दिन मिक्स हो गए। एक दिन तो ऐसा आया जिस दिन कई दिन एक साथ आ गए। आजकल दिन, दिवस हो जाता है, और दिवस, डे।

साल में वैसे तो सिर्फ 365 दिन होते हैं लेकिन अगर मदर्स डे, वेलेंटाइन्स डे और फादर्स डे की तरह अन्य दिवस अर्थात days का हिसाब लगाया जाए, तो वे 365 से अधिक ही बैठेंगे, कम नहीं। फरवरी का तो पूरा सप्ताह days’ week अर्थात् दिवसों का सप्ताह कहा जा सकता है। रोज़ डे, प्रोमिस डे, चॉकलेट डे, दिल दे, दिल ले, इत्यादि इत्यादि।

अभी अभी टाइपराइटर्स डे निकला, फादर्स डे भी अकेला नहीं आया, साथ में योग दिवस भी लेकर आया। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ, रोज दिन में तीन चार बार चाय पीने वाले हम भारतीय, चाय दिवस भी मनाते हैं। बस मैगी दिवस और पास्ता दिवस की कमी है शायद।।

मेरे लिए ” आषाढ़ का एक दिन ” बहुत महत्वपूर्ण है। कथाकार और नाटककार स्व.मोहन राकेश का यह पहला नाटक (1958) है। जो संस्कृत के ज्ञाता हैं, वे कालिदास को पढ़ें, हमारे जैसे हिंदीभाषी लोगों के लिए मोहन राकेश एक बहुत बड़ा काम कर गए। कितने कम समय में कोई इंसान सृजन के क्षेत्र में इतना कुछ कर जाता है ;(1925-1972) कि विश्वास ही नहीं होता। उनके दो और नाटक भी यहां उल्लेखनीय हैं, आधे अधूरे और लहरों के राजहंस।

अभी देव सोये नहीं हैं। मेघ हम पर मेहरबान हो रहे हैं। बादल गरज रहे हैं, बिजली चमक रही है। आषाढ़ के किसी भी दिन झमाझम हो सकती है। आप भी आषाढ़ के किसी एक दिन फुर्सत निकालकर मोहन राकेश का “आषाढ़ का एक दिन”, पढ़ ही लें। अगर पढ़ भी लिया हो, तो भी बार बार पढ़ने लायक है। जो नाट्य विधा अर्थात् स्टेज से जुड़े हैं, वे इसकी मंचीय खूबियों से भली भांति अवगत होंगे।

स्वागत, अभी आषाढ़ मास के कई दिन बाकी हैं।।

आषाढ़ के एक दिन की तरह शायद एक दिन विश्व नाट्य दिवस का भी अवश्य होगा। संस्कृत में कालिदास के अलावा भास और भवभूति भी नाटककार हैं। उधर अंग्रेजी साहित्य में भी विलियम शेक्सपियर और क्रिस्टोफर मार्लो के अलावा भी कई नाटककार हुए हैं।

हमारे देश में आज हिंदी की अपेक्षा मराठी मंच अधिक सक्रिय है।

कारण अच्छे मंचीय कलाकारों की फिल्मों में मांग। फिलहाल तो लगता है राजनीति साहित्य और संस्कृति को पूरी तरह लील रही है। कहीं हमें ऐसा दिन ना देखना पड़े कि लोग पूछें कौन कवि कालिदास और कौन मोहन राकेश..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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