हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – शुभम भवतु !
☆ लघुकथा ☆ शुभम भवतु!☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
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सुबह-सुबह भक्त नहा-धोकर मंदिर पहुँचा। उसने दीप प्रज्वलित किया, दो अगरबत्ती जलाई, ग्यारह रुपए का प्रसाद और श्रीफल चढ़ाया, हाथ जोड़े, आँखें बंद की और आर्त्त स्वर में निवेदन किया- ‘प्रभु! प्लीज… प्लीज… कुछ कीजिए…!’
तभी भक्त को अपने कानों में प्रभु की मधुर स्वर सुनाई दिए- ‘भक्त क्या बात है…! बड़े उद्विग्न, भयाक्रांत और घबराए हुए लग रहे हो…! प्लीज़…के आगे भी कुछ कहोगे… या यूँ ही मेरे नाम की रट लगाए रहोगे।’
भक्त- ‘प्रभु! वो बात ऐसी है कि देश और दुनिया में घमासान मचा हुआ है। विभिन्न धर्मावलंबियों और देशों के मुखिया आपस में लड़-मरने पर आमादा हैं। उनके अहं की लड़ाई में अब तक कई निरीह और निर्दोष लोग बेमौत मारे जा चुके हैं। दुनिया में त्राहिमाम मचा हुआ है।’
प्रभु ने अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए कहा- ‘भक्त! यह जो कुछ तुम्हारे देश या दुनिया के दूसरे देशों में मारामरी, खूखराबा हो रहा है। इसके लिए न तो मैं दोषी हूँ, न ही ज़िम्मेदार। दरअसल तुम्हारी यह आदमजात क़ौम के नुमाइंदे हैं जो अपने और दूसरे देशों की अवाम पर अपना रुआब गाँठना और अपनी हुकूमत क़ायम करना चाहते हैं। दुनिया भर की सारी समस्याएँ इन्हीं अहंकारी और उजबकों द्वारा पैदा की हुई हैं, अतः समाधान भी उन्हीं आकाओं को मिल-बैठकर खोजना है। प्रभु ने अपने चक्षु बंद किए, भक्त को ‘शुभम भवतु’ का आशीर्वाद दिया और पलक झपकते अंतर्ध्यान हो गए…!
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘रुख बदलना होगा‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १५९ ☆
☆ लघुकथा – रुख बदलना होगा☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
अलसुबह चाय की चुस्कियों के साथ रेवा की शादी की बातें चल रही थीं। सासु जी बोलीं- “अरे बहू! यह बताओ रेवा की शादी में भात कौन देगा? तुम्हारे भाई तो है नहीं, दो बहनें ही हो।”
“अम्माँ! शादी में भात की रस्म भाई ही करता है क्या? ”- साधिका ने बड़े ही शांत भाव से पूछा।
“हाँ बहू! लड़की की माँ मिठाई, कपड़े, फल लेकर मायके अपने भाई को भात न्योतने जाती है। शादी में लड़की का मामा अपनी सामर्थ्य के अनुसार भात लेकर आता है, जिसमें बहन के परिवार के लिए कपड़े और लड़की के लिए साड़ी, गहने आदि होते हैं।”
“अम्माँ! तो मैं कल ही जाकर राधिका को भात न्योतकर आती हूँ। मेरी बेटी की शादी में उसकी मौसी भात लेकर आएगी।”
“बहू! अपने किसी ताऊ-चाचा के लड़के को कह दे भात देने को, मौसी को तो शादी में भात देते मैंने कभी नहीं देखा।”
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जीभारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त. सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंच, विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “सबहिं नचावत राम गोसाईं“.)
☆ कथा कहानी ☆ सबहिं नचावत राम गोसाईं—☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆
अरे बिलुआ देख उस टेबल पर चाय का चार जूठा गिलास अभी तक पड़ा हुआ हैं, उन्हें धोने के लिए दे दे और देख टेबल पर ठीक से पोछा मार देना कि मक्खी न लगे . दयाराम ने अपने नौकर बिलुआ को कहा. एक कालेज के सामने दयाराम की एक छोटी सी चाय की दूकान या उसे रेस्टोरेंट भी कह लो, थी. बिलुआ उस रेस्टोरेंट का अकेला वेटर था. उस रेस्टोरेंट में कुछ टेबल, कुर्सी थे, शीशे के जार में कुछ बिस्किट व नमकीन रखे रहते थे, पकौड़ी, समोसा और टिकिया दयाराम खुद ही बनाता था. रेस्टोरेंट के पीछे ही एक टिनशेड में दयाराम का छोटा सा परिवार भी रहता था. कालेज के लड़के/ लड़कियां अक्सर इस दूकान पर खाली समय में बैठे रहते. दयाराम की अच्छी बिक्री हो जाया करती थी.
एक दिन की बात एक लड़का चाय पीने के बाद अपना बैग तो अपने साथ ले गया लेकिन हिन्दी की एक पुस्तक वहीं टेबल पर भूल गया . थोड़ी देर बाद वह अपनी पुस्तक लेने लौटा तो देखा कि बिलुआ उस पुस्तक को बड़े ध्यान से पढ़ रहा था. बिलुआ पढ़ने में इतना व्यस्त था कि वह लड़का आ कर उसके बगल में खड़ा हो गया लेकिन बिलुआ को पता ही नहीं लगा और वह किताब पढ़ता ही रहा. थोड़ी देर बाद उस लड़के ने बिलुआ से पूछा तुम कहाँ तक पढ़े हो? चौंक कर बिलुआ ने सामने देखा और खड़ा हो गया. लड़का सामने की कुर्सी पर बैठ गया और फिर वही प्रश्न दुहराया कि बिलुआ तुम कहाँ तक पढ़े हो? बिलुआ ने कहा साहब क्या करेंगे जान कर. लड़के ने कहा कुछ करना नहीं है फिर भी बताओ. बिलुआ ने कहा कक्षा सात तक हम पढ़े हैं. फिर आगे क्यों नहीं पढ़े? लड़के ने पूछा . पैसा नहीं था साहब और घर में एक दिन बाबू जी से किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया और, फिर बाबू जी ने बहुत मारा और घर से निकाल दिया . तो हम भाग कर यहाँ चले आयें, पेट पालने के लिए कोई नौकरी खोजने लगे. एक दिन मुझे यहाँ पर नौकरी मिल गया. यहाँ पर दोनों समय खाना मिल जाता है, और यहीं रहने का ठिकाना भी मिल गया, फिर मुझे और क्या चाहिए ! यहीं रह गए. पढ़ने की इच्छा है क्या? उस लड़के ने आगे पूछा. साहब इच्छा से क्या होता है! अब तो यही काम करते हुए जिन्दगी ऐसे ही काटनी है! बिलुआ ने कहा .
लड़का, जिसका नाम अखिल था और वह कक्षा ग्यारह में पढ़ता था, और वह उसी कालेज के प्रधानाचार्य का बेटा था. घर लौटने पर अखिल ने अपनी माँ से बिलुआ के बारे में बताया और माँ से पूछा कि मम्मी बिलुआ क्या आगे पढ़ सकता है? माँ ने कहा कि उसके पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन वह स्कूल में पढ़ेगा तो चाय की दुकान पर नौकरी वह नहीं कर पायेगा, तो उसे पैसा कौन देगा? हमेशा तो कोई सहायता करेगा नहीं. अखिल ने कहा कि बात तो सही है . फिर अखिल की माँ ने आगे कहा कि बहुत हो सकता है तो हम उसे किताब व कापी दिला सकते हैं. दूसरी बात, जो कि बहुत ही महत्वपूर्ण है, वह यह कि उसकी स्वयं की पढ़ने की इच्छा है कि नहीं! जबरदस्ती किसी की सहायता करना नहीं. अखिल को माॅं की बात समझ में आ गयी और वह आगे कुछ नहीं बोला.
लगभग एक सप्ताह के बाद अखिल दयाराम की चाय के दूकान पर अपने दोस्तों के साथ पहुँचा. बिलुआ ने सामने पानी का गिलास रखा और पूछा कि साहब क्या खायेंगे? अखिल ने कहा कि पहले चार चाय ले आओ. जब बिलुआ चाय रख कर चला गया तो चाय पीने के बाद अखिल ने बिलुआ को बुलाया और पूछा कि बिलुआ एक बात बताओ कि क्या तुम पढ़ना चाहते हो . बिलुआ बोला साहब मैं पढ़ना तो चाहता हूँ, लेकिन कापी किताब के पैसे कहाँ हैं, दूसरे मैं यह नौकरी तो किसी हालत में नहीं छोड़ सकता. अखिल ने कहा कि तुम्हें नौकरी छोड़ने की कोई जरूरत नहीं है, मैं तुम्हें कक्षा आठ की पुरानी पुस्तकें दे दूंगा और कापी भी दे दूंगा और तुम्हें जब समय मिले, तुम पढ़ो. जब परीक्षा का समय आयेगा, तब तुम्हें मैं बताऊंगा कि आगे क्या करना है . मैं हर शनिवार को, शाम को दोस्तों के साथ यहाँ आऊंगा और तुम्हें जो समझ में न आये , तुम हम लोगों से पूछ लेना.
दूसरे दिन अखिल ने कक्षा आठ के कुछ विषयों के पुरानी किताबें और कुछ कापी बिलुआ को दिया. सामान्यतः दयाराम की दुकान शाम छ बजे के बाद बंद हो जाया करती थी, क्योंकि शाम पांच बजे के बाद कोई लड़का तो आता नहीं था. उस दिन से बिलुआ का स्वाध्याय शुरू हो गया. दयाराम रोज देखता कि बिलुआ कुछ पढ़ रहा है, लेकिन इस पर उसने कोई ध्यान नहीं दिया. इधर अखिल ने अपने पिता से कह कर बिलुआ का नाम पास के ही जूनियर हाई स्कूल में कक्षा आठ में लिखवा दिया और बिलुआ से आवेदन दिलवा कर उसका फीस भी माफ़ करवा दिया. बीच – बीच में अखिल और उसके दोस्त आ कर बिलुआ को कुछ पढ़ा देते अथवा जो उसको पूछना होता, बिलुआ पूछता. यह पढ़ने- पढ़ाने का क्रम अबाध गति से चलता रहा. दयाराम समझ रहा था कि बिलुआ पढ़ रहा है, लेकिन वह सोचता कि पढ़ कर यह बेचारा क्या करेगा और इस प्रकार से कितने दिन पढ़ेगा! उसका सोचना भी अपनी जगह सही था. लेकिन भविष्य कौन जानता? यह सोच कर दयाराम चुप रहता. दयाराम की पत्नी रामदेई भी बिलुआ के पढ़ाई को रोज बड़े ध्यान से देखती थी. रामदेई को कोई संतान नहीं था, इसका उसे दुख रहता था. बहुत पूजा पाठ भी करवाई, सामर्थ्य भर डाक्टर से इलाज भी किया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. एक दिन बैठे- बैठे उसके मन में विचार आया कि जब विधाता ने भाग्य में कोई संतान नहीं लिखा है तो क्यों न बिलुआ को ही संतान मान लें!
एक दिन रात में जब चाय की दुकान बंद करके दयाराम घर में आराम कर रहा था, रामदेई ने बिलुआ को संतान मानने की बात छेड़ी. दयाराम एकदम भड़क गया, बोला बिलुआ को बैठाकर खिलाऊं- पिलाऊं , फिर किसी और दूकानदार ने अधिक पैसा दिया और वह भाग गया तो! फिर जब बिलुआ को अपना संतान मान लेंगे तो दूसरा नौकर रखना पड़ेगा, तो क्या होगा! लगता था रामदेई इन सारे प्रश्नों के लिए पहले से तैयार थी . बोली देखो मैं ऐसा कुछ नहीं कह रही, लेकिन बिलुआ को पढ़ते देख मेरे मन में यह बात आयी कि आज मेरी कोई संतान होती तो क्या वह ऐसे पढ़ती! तो मैंने सोचा कि चलो बिलुआ मेरा कोई नहीं लगता, लेकिन उसे देख कर लगता है कि उसमें पढ़ने की बड़ी इच्छा है. तो क्यों न हम उसे थोड़ी पढ़ने की सुविधा दें. कल वह अगर छोड़ कर कहीं चला भी जायेगा तो कौन सा हमारा भाग्य ले जायेगा! दयाराम बोला देख रामदेई मेरे पास बहुत ज्यादा अक्ल है नहीं, इसलिए तूं सीधे – सीधे बात कर कि तुम्हारे मन में क्या है? घुमा फिरा कर बात करने की न तो मेरी आदत है और न ही मैं सुनना चाहता हूँ, सीधे अपने मन की बात कह दे.
रामदेई ने कहा कि देख मैं सीधे- सीधे बात कर रहीं हूँ. दूसरों के दिये गये पुराने किताबों और कापियों से कोई लड़का कितने दिन तक पढ़ाई करेगा, तूं ही बोल. तो उसे तूं नई किताब और कापियाँ दिला दे. बाकी वह जाने और उसका भाग्य! शायद इसी बहाने हमें कुछ पुण्य मिल जाये! दयाराम कुछ देर सोचा, फिर बोला चलो तुम्हारे कहने से इतना कर देंगे, बाकी बिलुआ का भाग्य! दूसरे दिन दयाराम बिलुआ को लेकर एक किताब की दुकान पर गया और बोला बिलुआ तुम्हें जो किताब कापी खरीदना हो ले लो. दुकानदार दयाराम और बिलुआ दोनों को पहचानता था. अचानक दयाराम का यह रुप देखकर और बिलुआ पढ़ भी सकता है, यह देखकर वह चौंक गया. खैर उसे तो किताब बेचने से मतलब था. बिलुआ ने कुछ किताबें और कापियाँ लिया. लेकिन बिलुआ मन ही मन अपने मालिक के व्यवहार में आये इस परिवर्तन को समझ नहीं पाया. दिन बीतता गया, बिलुआ का स्वाध्याय चलता रहा, अखिल और उसके दोस्तों का सहयोग बिलुआ को यथावत मिलता रहा. कक्षा आठ की वार्षिक परीक्षा में दयाराम ने बिलुआ को कुछ समय के लिए काम नहीं करने के लिए कह दिया. वार्षिक परीक्षा फल निकला और बिलुआ ने अच्छे नम्बर से कक्षा आठ की परिक्षा पास किया . अखिल और उसके दोस्त , और दयाराम और उसकी पत्नी रामदेई बहुत खुश हुए. बिलुआ को परिक्षा पास करने पर एक नये उत्साह का अनुभव हुआ. खैर अखिल ने उसका कक्षा नौ में प्रवेश दिला दिया और कुछ पुस्तकों और कापियों की व्यवस्था भी कर दिया और जो कुछ बाकी रह गया था, उसकी पूर्ति दयाराम ने कर दिया. बीच – बीच में दयाराम बिलुआ को स्कूल भी जाने देता कि जाओ कुछ कक्षा में भी पढ़ लो.
बिलुआ का पढ़ने का यह सिलसिला चलता रहा और दयाराम के दुकान पर उसका नौकर का काम भी यथावत चलता रहा, क्योंकि बिलुआ के लिए उसके अलावा तो कोई सहारा भी नहीं था. इधर उसको रामदेई का स्नेह भी कुछ अधिक ही मिलने लगा. बीच- बीच में कक्षा में बैठने से कक्षा के छात्र भी इसे पहचानने लगें और इसकी पढ़ने की लगन देख कर, उनमें बिलुआ के प्रति सम्मान का भाव भी उत्पन्न हो गया. कक्षा नौ भी बिलुआ ने अच्छे अंकों के साथ पास किया. जब कक्षा दस में बिलुआ ने प्रवेश लिया तो दयाराम ने कहा कि अगर चाहो तो कोई टियूशन कर लो . बिलुआ ने कहा नहीं काका मुझे टियूशन नहीं करना है, आप लोग मेरे लिए जितना कर रहे हैं, मेरे लिए वह ही बहुत अधिक है. यह तो अखिल भईया के कारण मैं पढ़ने लगा. हाईस्कूल की परिक्षा के समय दयाराम ने बिलुआ को कहा कि तुम दुकान पर काम नहीं करोगे, मैं अकेले सम्भाल लूंगा. रामदेई ने भी कहा कि बिलुआ तुम दुकान की चिंता मत करो, मैं कुछ दिन दुकान देख लूंगी.
हाईस्कूल की परिक्षा में बिलुआ को अपने स्कूल में चौथा स्थान मिला. जब यह खबर स्कूल में फैली तब स्कूल के प्रबंधन ने बिलुआ को यह जानने के लिए बुलाया कि कौन लड़का है. जब स्कूल के प्रबंधन को बिलुआ के बारे में पूर्ण जानकारी मिली कि उसने किस अवस्था में पढ़ाई की है तो वे आश्चर्यचकित हो गये. प्रबंधन ने बिलुआ के इण्टर के पढ़ाई के लिए फीस माफ कर दिया और पांच सौ रुपये का मासिक स्कालरशिप भी दे दिया. इधर दयाराम बिलुआ के हाईस्कूल के परिणाम से इतना खुश हुआ कि उसने बिलुआ को कह दिया कि वह अपना पूरा ध्यान और समय आगे की पढ़ाई में लगाये और दयाराम ने दुकान के लिए एक अतिरिक्त नौकर रख लिया. लेकिन बिलुआ पढ़ाई के साथ- साथ पूरा समय निकाल कर दुकान पर पहले की तरह नौकर का काम भी करता रहा. दयाराम और रामदेई के कहने के बावजूद भी उसने नौकर का काम नहीं छोड़ा. लेकिन अब पहले की तुलना में बिलुआ स्कूल में पढ़ने में समय अधिक बिताता था. अध्यापक और साथ के छात्र उसके प्रति आदर का भाव रखते थे और वे उसका हर तरह से सहयोग करने के लिए तत्पर रहते थे. इण्टर की परिक्षा में बिलुआ ने जिला में सर्वाधिक अंक प्राप्त कर पहला स्थान प्राप्त किया. इसके बाद फिर बिलुआ को कई संस्थानों से सहयोग व वजीफा मिलना शुरू हो गया और सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में बिलुआ का प्रवेश भी हो गया. दयाराम और रामदेई ने एक दिन बिलुआ से कहा कि आज से तुम हमारे बेटे की तरह हो और अब तुम दुकान पर काम नहीं करोगे, बल्कि हमारे घर में एक सदस्य के रूप में रहोगे. बिलुआ यह सुनकर बहुत ही भावुक हो गया और बोला काका आप लोगों के अलावा मेरा इस दुनिया में है कौन ! एक अखिल भईया हैं और दूसरे आप लोग.
इस बीच अखिल ने भी एम टेक करके एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में नौकरी कर लिया था, लेकिन बीच – बीच में वह बिलुआ से बात भी करता रहता था . बिलुआ ने भी समय पर बी टेक और एम टेक किया और आजकल बिलुआ रेलवे में इंजीनियर हो गया है.
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – “आत्ममुग्ध… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५१ ☆
लघुकथा – आत्ममुग्ध… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
संतोष जी को अपने अलावा किसी के अस्तित्व की जानकारी ही नहीं थी, ऐसा लगता था। तारीफ करते तो अपनी या अपनी संतान की जैसे किसी और की तो औलाद होती ही नहीं। उनकी नज़र में कोई कुछ नहीं जानता है सिवाय उनके। उन्हें इस बात की भी चिंता नहीं कि सुनने वाले पर क्या असर पड़ता है। बस अपनी बात कहने और सामने वाला कुछ कहने को उद्यत हो तो उसे रोक देते। फिर अपनी बात पूरी करके सामने वाले से तपाक् से हाथ मिला कर चल देते। साथ ही चलते चलते एक सप्ताह का अपना कार्यक्रम बताते जाते कि किस किस बड़े आदमी के साथ किस दिन क्या कार्यक्रम है, क्योंकि प्रसिद्ध व्यक्तियों से उनकी गहरी मित्रता रहती है।
सामने वाले सज्जन अवाक् रह गए। न कुछ कहते बना और न कुछ सोचते । ऐसे ही एक कार्यक्रम में संतोष जी मंच पर विराजमान थे। उसी कार्यक्रम में उनके एक सहयोगी शशिकांत भी उपस्थित थे जो उन्हीं की रैंक से रिटायर हुए थे परंतु नौकरी की शुरुआत में वे संतोष जी से जूनियर साथी रहे थे। कार्यक्रम के मध्याह्न में शशिकांत जी अपने एक मित्र के साथ वॉशरूम जा रहे थे तो संतोष जी मिल गए और मित्र का संतोष जी से अच्छा परिचय था तो उन्होंने शशिकांत जी का परिचय कराना चाहा तो संतोष जी तपाक् से बोले , “हाँ हाँ मैं शशिकांत को जानता हूँ, ही वाज़ माय जूनियर” और वाशरूम में घुस गए। शशिकांत जी ने महसूस किया कि संतोष जी को अपना सीनियरपन याद है पर उनकी प्रोन्नति नहीं, पद भी नहीं। नहीं याद है तो कहने की क्या आवश्यकता थी।
ऐसे ही एक कार्यक्रम में संतोष जी को कुछ कहने का अवसर मिला तो अपनी बात के समर्थन में किसी ग्रंथ, किसी विद्वान को उद्धृत न कर अपनी ही कविता या अपनी किसी उपलब्धि की कहानी उद्धृत करते रहे। उनकी आत्ममुग्धता पर उपस्थित जन कनखियों से एक दूसरे की ओर देखते हुए मुग्ध होते रहे।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – नई ऊर्जा।)
सीता जल्दी-जल्दी अपने कदम बढ़ा रही थी मंदिर की ओर तभी उसके मन में ख्याल आता है कि एक बार अपनी पूजा की थाली को देख लूं सब सामान बराबर रखी हूँ।
अरे! भगवान मुझसे गलती हो गई फूल रखना भूल गई?
वह सोचने लगती है। भगवान को जल चढ़ाऊंगी अक्षत चढ़ाऊंगी टीका लगाऊंगी आरती भी करूंगी पर फूल नहीं, तो अच्छा नहीं लगेगा तभी अचानक उसे सामने एक फूल वाला बैठे दिखता है।
“भैया फूल ₹5 के दे दो?”
“मेरा नाम मोहन है, मैं कोई भैया दूध वाला नहीं हूं?”
सीता ने गुस्से में कहा- “ओ मोहन ₹5 के फूल दे दो?”
मोहन ने कहा- “₹5 के फूल नहीं मिलेंगे?”
सीता ने कहा- “अरे! मुझे दो-चार फूल ही चाहिए है? कोई बात नहीं ₹10 के दे दो?”
मोहन सभी फूलों को एक कागज में रखता है।
सीता ने कहा- “ये लाल गुड़हल के २ फूल दो न? गौरी माता को जोड़ा फूल चढ़ाने की मन में इच्छा है।”
मोहन ने कहा – “मैडम यह फूल तो ₹5 का एक मिलता है एक फूल आपको दे रहा हूँ।”
सीता ने कहा – “फूल बेचने बैठे हो या सोना बेच रहे हो। अच्छा सुबह-सुबह मेरा दिमाग मत खराब करो,मुझे पूजा करना है।”
सीता मंदिर में प्रवेश करती है और भगवान शिव की पूजा करती है उन्हें फूल चढ़ाती है और सामने जब माँ गौरी के चरणों में जल चढ़ाती है और सिंदूर चढ़ाने के बाद जब वह फूल चढ़ाने लगती है तो देखी है कि उसके हाथ में दो फूल आ जाते हैं उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता और वह मां को श्रद्धापूर्वक नमन करती है और आरती पूजा करती है।
मंदिर में भगवान के सामने बैठकर वह सोचती है, भगवान से जो मांगो वह मिलता है माता तुम तो सब जानती हो जिस तरह दो फूल दिए हैं। इस तरह मेरी गोद भी भर देना।
दुनिया के तानों से अब मेरा मन भर गया है और सीता के मन में एक नई ऊर्जा का संचार होता है।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “ईमेज (व्यक्तित्व) वाला निमंत्रण कार्ड”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५३ ☆
🌻लघुकथा🌻ईमेज (व्यक्तित्व) वाला निमंत्रण कार्ड 🌻
सभी कहते हैं सोशल मीडिया ने रिश्ता तो खतम ही कर दिया अब तो भगवान भी दिन भर छाये रहते हैं।
पोस्टर बना बना भेज दिये। अब डिलीट करने वाला मोबाइल को सिर माथे लगा रट सपाट सभी ऊँगलियाँ चला डिलीट करते चलते हैं।
भला हो उस मेसेज का अभी कुछ दिनों से बंद है – – 👉 ये मेसेज दस लोगों को भेजों नहीं तो अनर्थ हो जायेगा।
बात करते हैं शादी ब्याह के सुंदर- सुंदर कार्डों का। किटी आयोजन में भरपूर उपयोगिता 😊
अपने दादा जी के साथ चाचा का कार्ड बाँटते बच्चा बड़ा खुश हो रहा था। घर आते ही कहने लगा इसमें मेरा नाम लिखा है आंटी पढिये।
यहाँ से वहाँ तक पूरा कार्ड अंग्रेजी के अक्षरों से भरा। हमें तो अंग्रेजी आती नहीं है।
भोले पन से बच्चे ने हिन्दी पर लिखें अक्षरों को दिखाते कहा – – ये है न हिन्दी आप पढ़ लिजियेगा।
और धीरे से कान के पास आकर बोला–गणपति बप्पा को भी अंग्रेजी कहाँ आती है। इसलिये उनका नाम बस हिन्दी में लिखा गया है।
सौ टके की बात कहते मासूम से बच्चे की मासूमियत पर ह्रदय सोचने पर मजबूर हो गया।
पूरे कार्ड में गणपति वंदन हिन्दी में लिख कर बाकी पढ़ने वाले भी उसी दो लाईन को पढते है बाकी तो इधर की जुबानी कुछ उधर की जुबानी।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– कारा…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ९२ —कारा—☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
दोनों कहते थे पिंजड़े में बंद उनका तोता उनके प्रेम का साक्षी है। तोते को दिखा कर वे हाथ पर हाथ रखते और कभी एक दूसरे को चूम लेते थे। तोता पिंजड़े में जैसे उनका यह प्रेम देख कर नाचने लगता था। आवाज़ तो वह खूब लगाता था। पर तोता एक दिन पिंजड़ा तोड़ कर उड़ गया। दोनों समझ रहे थे तोता उनके प्रेम का मोहताज नहीं था। वह भी एक जीव है। उसका अपना प्रेम कहीं और है।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “आज के संजय”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा है। महाभारत के युद्ध की दोनों सेनायें अपने अपने शिविरों में लौट रही हैं। रथों के घोड़े हिनहिना रहे है। कौन आज युद्ध में वीरगति पा गये और कौन कल तक बचे हुए हैं। संजय यह आंखों देखा हाल धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं। महाराज व्यथित होकर दिन भर का हाल सुन रहे हैं। गांधारी भी पास ही बैठी हैं।
वह एक युग था। तब संजय जन्मांध धृतराष्ट्र को युद्ध का हाल बताने के लिए मिली दिव्य शक्ति से सब वर्णन करते थे। कहा जा सकता है कि उस युग के पत्रकार थे संजय।
अब युग बदल गया। इन दिनों चुनाव की महाभारत है। महाभारत अठारह दिन चली थी लेकिन यह चुनाव प्रचार की महाभारत पूरे इक्कीस दिन चलती है। यहां किसी एक संजय को दिव्य शक्ति नहीं दी जाती। यहां तो सैंकड़ों संजय हैं जो ‘वीडियो’ नाम की दिव्य शक्ति लेकर आये हैं और कुछ भी वायरल कर देने की शक्ति रखते हैं! मनचाहा वीडियो बना कर सारा आंखों देखा हाल सुनाने में जुटे हैं। संजय तो एक राष्ट्रीय पत्रकार था और राष्ट्र की सेवा में जुटा था। निष्पक्ष! निरपेक्ष! ये आज के युग के संजय तो निष्पक्ष और निरपेक्ष नहीं। इन्हें तो रोटी रोटी कमानी है, अपनी गृहस्थी चलानी है। मनभावन शौक पूरे करने हैं। खाना पीना है और वह दिखाना है जो सामने वाला चाहता है लेकिन इसकी एक निश्चित कीमत है! जो चुकाये वह पा मनचाहा पा ले! नहीं चुकाये तो हश्र भुगते!
ये कैसे संजय हैं?
ये कलियुग के महाभारत के संजय हैं! जो अंधे लोगों को युद्ध का हाल नहीं सुनाते बल्कि ऐसा हाल सुनाते हैं कि आंखों वालों को ही अंधा बना रहे हैं! आप इन्हें पहचानते हैं?
(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित। पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – नेम प्लेट।
लघुकथा – नेम प्लेटसुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा
रात के खाने के बाद घर के सभी सदस्य इकट्ठे बैठे. पति, पत्नी, बेटा, बेटी और दूर कोने में कुर्सी पर बैठी उदासीन, स्वयं को उपेक्षित मानती मां. नया घर पूरा बन चुका था और अब उसके नाम के बारे में चर्चा चल रही थी.
“आशियाना” नाम कैसा रहेगा? बेटी उत्साह से बोली.
“कोई नया नाम सुझाओ… वैसे “ उपवन “ कैसा रहेगा..? बेटा उत्साह से बोला.
“अच्छा, “ हार्मनी “ या “ हरसिंगार “ कैसा रहेगा…? पत्नी ने अपनी राय रखी.
“दोनों अच्छे हैं. लेकिन मैं सोच रहा हूं पिताजी के नाम पर अगर” घनश्याम कृपा” रखा जाए तो कैसा रहेगा..? पति ने भी अपना सुझाव दिया.
सर्वसम्मति से इस नाम को स्वीकृति दे दी गई.
पति के जाने के बाद मां धीरे-धीरे स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगीं थीं जैसा अक्सर होता है. आजकल तो वे डाइनिंग रूम के कोने में कुर्सी पर बैठी रहतीं और वहीं पर खाना मांग लेती. शेष समय तो अपने कमरे में ही पड़ी रहतीं. बहू बेटे ने उन्हें कितनी ही बार समझाया कि शाम के वक्त आप सोसायटी में जहां बुजुर्ग बैठकर बतियाते, हंसते, गपशप, मनोरंजन करते हैं उनके पास जाकर बैठ जाया करें. आपका भी दिल बहल जाया करेगा लेकिन वह इस बात को मानने को तैयार ही नहीं थीं. उन्हें लगता उनसे दो घड़ी बातें करने के लिए किसी के पास वक्त नहीं था. सभी अपने अपने कार्यों में उलझे रहते हैं. कितनी ही बार पति की फोटो देखकर शिकायत करने लगतीं-“ मुझे बीच मँझधार में छोड़कर आप तो चले गए. कितनी अकेली रह गई हूं मैं आपके बिना… किसी को फुर्सत नहीं मेरे पास बैठने की, बातें करने की… ”
नेम प्लेट बनकर आ गई. काले रंग पर सुनहरे अक्षरों से “घनश्याम- रमा कृपा“ के चारों तरफ बेल बूटों से बनी हुई अत्यंत आकर्षक और सुंदर नेम प्लेट देखकर घर के सभी सदस्य चहक उठे.
सबके देख चुकने के बाद नेम प्लेट को लेकर पोती दादी के पास गई और बोली – “ देखो दादी अपने नए घर की नेम प्लेट, दादू और आपके नाम पर. है न सरप्राइज़… “
मां ने नेम प्लेट हाथ में ली एकटक उसे निहारती रहीं. फिर ना जाने क्या हुआ कि उसे आंखों से लगाकर लगातार चूमने लगीं. उनकी आंखों से निरंतर आंसुओं की झड़ी लग गई जिसमें बच्चों के प्रति उनके मन में जबरन पनपते उपेक्षा, अनगिनत शिकायतों, तिरस्कार के भाव धुलने लगे थे. आंखों में छाई धुंध भी छंटने लगी थी.
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय कहानी – साहब की घड़ी।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७९ – कहानी – साहब की घड़ी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
इस देश में समय का हाल वही है जो किसी सरकारी अस्पताल के वेंटिलेटर का—धड़कन चल रही है, पर भरोसा किसी को नहीं। लोग कहते हैं ‘समय बीत रहा है’, जबकि सच्चाई यह है कि हम बीत रहे हैं और समय हमें किसी पुराने अखबार की तरह रद्दी के भाव तौल रहा है।
एक महाशय थे, जो ‘पंचवर्षीय योजनाओं’ की तरह अपना भविष्य बुन रहे थे। उन्हें गुमान था कि वे समय के सारथी हैं। वे हाथ में ऐसी ‘स्मार्ट’ घड़ी बाँधते थे जो उनके दिल की धड़कन से लेकर उनके बैंक बैलेंस तक का हिसाब रखती थी। पर उस दिन मामला ‘ऊपर की अदालत’ का था। सुबह-सुबह उनके घर के बाहर एक आदमी आकर बैठ गया, जिसके चेहरे पर वैसी ही शांति थी जैसी किसी घोटाले की फाइल दब जाने के बाद किसी मंत्री के चेहरे पर होती है।
साहब ने पूछा, “कौन हो भाई? यहाँ क्यों धरना दे रखा है?” वह बोला, “हुजूर, मैं समय का पटवारी हूँ। आपकी सांसों का खसरा-खतौनी जाँचने आया हूँ। सुना है आप वक्त को मुट्ठी में करने की फिराक में हैं?”
साहब बिफर पड़े, “अबे, जा यहाँ से! हम वर्तमान के मालिक हैं और भविष्य के सट्टेबाज।” पटवारी मुस्कुराया—वैसी ही मुस्कान जैसे शेर शिकार को देखकर ‘शाकाहार’ पर प्रवचन देने से पहले देता है। वह बोला, “मालिक, आप तो ‘धोबी के कुत्ते’ वाली स्थिति में हैं। वर्तमान आपको पहचानता नहीं और भविष्य ने अभी गोद लिया नहीं। आप तो बस उस ‘त्रिशंकु’ की तरह लटके हैं जो सोचता है कि स्वर्ग जा रहा है, पर असल में ग्रेविटी का शिकार है।”
शहर में शोर मच गया कि साहब का ‘वक्त’ रुक गया है। साहब ने सेल बदला, घड़ी पटकी, यहाँ तक कि कैलेंडर के पन्ने भी फाड़ दिए। पर अजीब बात! बाहर सूरज ढल ही नहीं रहा था। चिड़ियाँ हवा में रुकी थीं और साहब की चाय का धुआं भी किसी ‘स्टैच्यू’ की तरह खड़ा था।
साहब को लगा कि वे अमर हो गए। उन्होंने अपनी पत्नी को पुकारा, पर पत्नी की आवाज़ ऐसे फंसी थी जैसे किसी ‘बफटिंग’ करते हुए वीडियो की तस्वीर। वे समझ गए—यह वरदान नहीं, यह ‘सस्पेंस’ का चरम है। क्या वे मर चुके हैं? या खुदा ने उनके लिए समय का चक्का ‘हाफ-क्लच’ पर छोड़ दिया है?
तभी उस पटवारी की आवाज़ आई, “साहब, इसे कहते हैं ‘सन्नाटा’। जब इंसान खुद को वक्त से ऊपर समझने लगता है, तब वक्त उसे अपनी लाइब्रेरी की एक ऐसी किताब बना देता है जिसे कोई नहीं पढ़ता। आप अपनी ‘महिमा’ के विज्ञापन छापते रहे, और यहाँ समय ने आपकी ‘एक्सपायरी डेट’ पर अपनी मुहर लगा दी।”
साहब घिघियाने लगे, “कोई तो रास्ता होगा? कोई तो रिश्वत? कोई तो गॉडफादर?” पटवारी ने एक कागज़ निकाला और कहा, “रास्ता एक ही है। अपनी इस ‘मैं’ वाली घड़ी को उतारकर उस ईश्वर की खूँटी पर टांग दो, जो बिना सुइयों के ब्रह्मांड चला रहा है। वरना आप ‘माया मिली न राम’ वाले मुहावरे का जीता-जागता विज्ञापन बन जाएंगे।”
साहब ने कांपते हाथों से अपनी स्मार्ट घड़ी उतारी। जैसे ही घड़ी ज़मीन पर गिरी, अचानक सब कुछ तेज़ी से घूमने लगा। सूरज बिजली की रफ़्तार से डूबा और उगा। साहब को लगा कि अब वे बच गए, अब वे भविष्य की गोद में हैं।
हवा चली, सन्नाटा टूटा। साहब ने चैन की सांस ली और अपने चेहरे पर हाथ फेरा। पर हाथ को चेहरा मिला ही नहीं! सामने वही पुराना पटवारी खड़ा था, जो अब हाथ में एक झाड़ू लिए फर्श साफ कर रहा था।
साहब ने चीखकर पूछा, “मैं कहाँ हूँ? मेरा भविष्य कहाँ है?” पटवारी ने इत्मीनान से जवाब दिया, “साहब, आप भविष्य की चिंता कर रहे थे, जबकि आप पिछले दस मिनट से एक ‘संस्मरण’ बन चुके हैं। अभी जो आपने जीया, वह आपकी आत्मा का ‘एक्जिट पोल’ था। अब आप न वर्तमान में हैं, न भविष्य में। आप बस इस कहानी का एक ‘फुल स्टॉप’ हैं, जिसे पाठक पढ़कर पन्ना पलटने वाला है।”
साहब गायब थे। कुर्सी खाली थी। घड़ी टूट चुकी थी। और ऊपर बैठा वह ‘महान मुनीम’ अपनी डायरी में लिख रहा था—”एक और गया, जो समझता था कि अलार्म लगाने से सूरज उसके इशारे पर जागता है।”