हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # १२ – कथा-कहानी – होनहार की तस्वीर ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # १२ ☆

☆ कथा-कहानी ☆ ~ होनहार की तस्वीर ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

अखिलेश के पास न अब सोचने के लिए समय था और न ही करने के लिए कोई काम था। नौकरी की तलाश में वह अहमदाबाद जरूर आ गया, लेकिन अहमदाबाद उसे रास नहीं आया।

कागज़ के गत्तो से कार्टन बनाने वाली एक फैक्ट्री में गत्ते की चादर पर लेटे अखिलेश को रोटी भी चबाते नहीं बन रही थी। कई दिनों की बटोरी रोटियाँ, धूप में सुख कर ककटी हो गई थी तभी मानस उसके पीछे आया और धीरे से बोला।

अखिलेश..अखिलेश इधर आना। अखिलेश बुरी तरह से डर गया। उसे लगा कि कोई और आफत फिर आकर खड़ी हो गई। पीछे मुड़कर देखा तो मानस खड़ा था।

अबे, सुन बे इधर आ!

कागज की गिलास में भरे चाय को अखिलेश को पकड़ाते हुए मानस इस तेजी से पीछे की तरफ भाग लिया कि कोई उसे देखना ले। चाय की गिलास में डूबी हुई रोटी है, अब जाकर थोड़ी सी मुलायम हो रही थी। अखिलेश को कई दिनों बाद पहली बार इतना स्वादिष्ट भोजन मिला था।

जिंदगी में धुली कड़वाहट मिटने का नाम नहीं ले रही थी।

अखिलेश बड़ी शिद्दत और मेहनत से उस कंपनी में काम करता था। जितना सब लोग काम करते थे, अखिलेश उनसे कई गुना काम निकाल देता था, लेकिन न जाने क्या हुआ एक दिन उसे क्या सूझी। कंपनी में गत्तों को पैक करने वाले छोटे छोटे दो तीन पिन अखिलेश ने उसे अपने पॉकेट में डाल लिए।

मेटल डिटेक्टर की घंटी बजी, तो गार्ड ने उसे किनारे खड़ा होने के लिए कहा। अखिलेश को यह नहीं समझ में आया कि आखिर उसे किनारे क्यों खड़ा किया जा रहा है।

तलाशी में उसके पाकेट से वे छोटे- छोटे दो तीन पिन निकले तो कंपनी के लिए बड़ा अपराध हो गया। कंपनी ने उसे एक हफ्ते ले लिए काम करने से मना कर दिया।

अखिलेश की कहानी जहां से शुरू हुई थी, वहीं समाप्त हो गयी। वह अपने साथियों से दूर नहीं जा सकता था और इससे अधिक मेहनत का काम भी नहीं कर सकता था। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री हासिल करने वाले अखिलेश को बेरोजगारी का मार झेलना पड़ रहा था। इस पढ़ाई के बाद उसे किसी प्रकार का संतोषजनक जॉब नहीं मिला। ऊपर से परिवार के तानों की मार बढ़ गई, तो मजबूरन उसे भाग कर अहमदाबाद पड़ा।

यहां खोजते खोजते काम मिला तो गत्ते की फैक्ट्री में गत्तों के बॉक्स बनाने का काम मिला।

जिंदगी का सूरज अभी ठीक से चमक भी नहीं पाया था कि घनघोर काले बादलों ने उसे ढक लिया।

चाय के साथ रोटी खाने से उसके मन को तृप्ति मिली तो बड़े दिनों बाद उसे गहरी नींद भी आयी।

वह वहीं गत्ते पर लेट गया।

रात का वक्त था इधर अचानक फैक्ट्री में अफरा तफरी मच गई थी। इलेक्ट्रिक जनरेट करने वाली टरबाइन में कोई खराबी आ गई, तो पूरा सिस्टम इस शट डाउन हो गया। कंपनी के इंजीनियर उसको बनाने में जुटे पड़े थे। एक पैनल का काम किसी को समझ में नहीं आ रहा। शायद फाल्ट भी उधर ही कहीं छिपा था। फैक्ट्री को रात में ही चलाना जरूरी था, क्योंकि कंपनी ने एक बहुत बड़ा ऑर्डर ले रखा था। जिसके माल की सप्लाई अगले दिन 11:00 बजे तक हर हाल में करनी थी। इंजीनियरों के पसीने छूट रहे। कंपनी का चीफ इंजीनियर अपने मातहतों को इस तरह से डांट रहा था, मानो वे उसके घरेलू नौकर हो। चीफ इंजीनियर को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। ऊपर से फैक्ट्री के मालिक का फोन उसके खोपड़ी को हिलाये दे रहा था।

काफी हिम्मत करके मानस चीफ इंजीनियर के बगल में जा पहुंचा और धीरे से बोला।

साहब… आपसे एक बात कहनी है।

अबे तू कौन? क्या बात करनी है तुमको?

मानस डर गया। डरते डरते बोला।

साहब! हमारी कंपनी में एक लड़का है, वह इलेक्ट्रिकल इंजीनियर है, लेकिन गत्ते का कार्टन बनाता है।

कहां है वह? बताओ? चीफ इंजीनियर ने अपनी गर्दन पीछे घुमाते हुए कहा।

साहब, है तो, लेकिन उसे निकाल दिया गया।

अबे साले…अब तक, क्या – क्या पहाड़ पढ़ रहा है।

लड़का है, इंजीनियर है, मजदूर है, निकाल दिया गया है। यह सब अनाप-शनाप क्या बक रहा है।

मानस ने एक बार और हिम्मत करके अपनी उंगली से अखिलेश की तरफ इशारा किया। अखिलेश अभी भी कार्टून के रद्दी गत्तों पर इस तरह से लेटा पड़ा था।

ठीक है उसे बुलाओ..

इंजीनियर का इतना कहना था कि मानस दौड़े दौड़े अखिलेश के पास पहुंचा।

अबे साले, उठ चल चल। कंपनी के एक मशीन खराब है बना देगा तो इंजीनियर बन जाएगा।

इंजीनियर बन जाएगा। अखिलेश कान में गयी ये आवाज उसे गाली जैसी लग रही थी। आंखें मिजते हुए अखिलेश उठा और सीधे टरबाइन के इलेक्ट्रिकल पैनल के पास पहुंच गया। इंजीनियर ने ऊपर से नीचे तक उसका हुलिया निहारा तो एक बार उसे लगा कि यह क्या मैं करने जा रहा हूँ।

लेकिन पता नहीं क्या इंजीनियर के दिमाग में आया कि चलो एक बार इस लड़के को भी अजामा लेते हैं।

उसके दिमाग में कहीं से आया कि न जाने किस भेष में नारायण मिल जाए।

मशीन को प्रणाम कर, जरूरी सेफ्टी गार्डस पहन, हाथ में कुछ टूल्स लेकर अखिलेश टरबाइन मशीन के यार्ड में चला गया।

चीफ इंजीनियर की न समझी पर, उसकेअधीन के असिस्टेंट इंजीनियरस और टेक्निशियनस एक जगह खड़े होकर उसका मजाक उड़ाने लगे। यह बॉस भी पागल हो गया है। हम लोग इतने देर से इस फाल्ट को ढूंढ रहे हैं, हम सबसे तो मिला नहीं। यह मजदूर ढूंढ के निकलेगा … ऐसा कहते हुए सभी ठहाका मार कर हंस पड़े।

इधर ठहाको की आवाज चीफ इंजीनियर के कान में गई, उधर पैनल की बत्ती लाल से ग्रीन हो गयी।

टरबाइन के इलेक्ट्रिकल सेक्शन से बाहर निकलकर, अखिलेश के चीफ इंजीनियर से कहा..

सर.. एक बार फिर स्टार्ट करवाइए, मुझे पूरा यकीन है की मशीन स्टार्ट हो जाएगी और इस बार ट्रिप नहीं होगी।

मशीन का स्विच दबाया गया, सिस्टम ऑन हुआ और मशीन चल पड़ी। इस बार मशीन चली तो दुबारा रुकने का नाम नहीं लिया। वहां खड़े सभी लोगों ने ख़ुशी से तालियां बजाई तो बगल में खड़े असिस्टेंट इंजीनियरस और टेक्नीशियन भी खुद को ताली बजाने से रोक नहीं सके।

उन्हें नहीं समझ में आया कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया, उन लोगों ने अपनी ताली रोकी और एक दूसरे का मुंह देख रहे थे। इधर चीफ इंजीनियर उनकी तरफ घूर करके देख रहा था, अब अखिलेश इंजीनियर की बाहों में था

इंजीनियर ने उसे बच्चों को प्रेम से अपने बाहों में लपेट लिया।

 अगले दिन की सुबह अखिलेश के लिए खास सुबह थी।

चीफ इंजिनियर : अपने डॉक्यूमेंट मेरे सामने रखो। कहां से बीटेक किया है ?

अखिलेश : सर..जबलपुर से।

 चीफ इंजिनियर : प्रैक्टिकल ट्रेनिंग कहां से किया था ?

 अखिलेश : सर..एनटीपीसी ऊंचाहार से।

एनटीपीसी ऊंचाहार का नाम आते ही चीफ इंजीनियर चेहरे की रंगती बदल गई। उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे।

 चीफ इंजिनियर : किस ईयर में तुमने प्रैक्टिकल ट्रेनिंग की थी ?

 अखिलेश : सर.. 2017, में।

वर्ष 2016 सुनते ही चीफ इंजीनियर, अखिलेश को गौर से देखने लगा।

चीफ इंजिनियर : किसके अंडर में तुमने इंटर्नशिप की थी।

अखिलेश : सर.. आपके ही अंडर में तो की थी।

यह कहते हुए अखिलेश की आंखों से झर झर आंसू गिरने लगे,

चीफ इंजीनियर ने अपनी मेमोरी रिकॉल की, तो उन्हें उस होनहार की तस्वीर अखिलेश चेहरे में नजर आई जिसे वह उसे बैच का सबसे होनहार और समझदार अप्रेंटिस स्टूडेंट मानता बहुत था।

अगले दिन अखिलेश अपने केबिन में बैठा था, तो चीफ इंजीनियर अखिलेश के केबिन के सामने से यह कहते हुए गुजरे …

कहो, इंजीनियर अखिलेश कैसे हो?

सर मैं ठीक हूं कहते हुए अखिलेश अपनी सीट से उठ खड़ा हुआ। उसके बगल में बैठा हुआ मानस भी उठ खड़ा हुआ।

अखिलेश ने मानस की तरफ इशारा करते हुए, चीफ इंजीनियर से बड़े ही स्नेहिल भाव से कहा।

सर…यह मानस है, इसने भी आईटीआई किया है। इसे भी टेक्नशियन के पद पर रख लीजिए न।

चीफ इंजीनियर ने मुस्कुराते हुए.. यस..यस कहते हुए गर्दन हिलाई, जिसमे उनकी मौन स्वीकृति झलक रही थी।

अखिलेश और मानव दोनों एक दूसरे को देख रहे थे, दोनों के चेहरों पर खुशियों के भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे थे।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – दुविधा ☆ प्रो. नव संगीत सिंह ☆

प्रो. नव संगीत सिंह

☆ लघुकथा ☆ दुविधा प्रो. नव संगीत सिंह

श्रुति और आकाश अलग-अलग कॉलेजों में प्रोफेसर थे। घर पहुंचने पर दोनों ने अपने-अपने हिसाब से सारे कामों को बांटा हुआ था। अक्सर आकाश को सब्जियां लाने और बाजार के कामों की जिम्मेदारी मिली हुई थी, जबकि श्रुति खाना बनाने और चाय-नाश्ता का ध्यान रखती थी। उन्होंने बर्तन साफ करने और कपड़े धोने के लिए एक नौकरानी रखी थी। आकाश जब भी घर से सब्जी खरीदने निकलता तो अक्सर दुकान पर जाकर अपनी पत्नी को फोन पर पूछता, “क्या लाऊं?” आटा गूंथती हुई पत्नी खीझकर बोलती, “मैं क्या जानूं?  दुकान पर तो तुम खड़े हो। जो पसंद हो, जो अच्छा हो, ले आओ।” बेचारा आकाश, असहाय होकर, जो भी सब्जियाँ मिल जातीं, ले आता और जब वह घर पहुँचता, तो अपनी पत्नी के ताना सुनता, “ओह, क्या ले आए हो तुम! कितनी बासी सब्जियाँ हैं ये सब! मिर्चें और धनिया नहीं लाए क्या?” आकाश चुपचाप सब कुछ विवश होकर सुनता रहता। श्रुति की बातों का उसके पास कोई जवाब नहीं था।

एक दिन पति-पत्नी दोनों शहर से बाहर कहीं गये हुए थे। घर लौटने से पहले वे सब्जी वगैरह खरीदने बाज़ार चले गए। आकाश कार में ही बैठा रहा, क्योंकि उसे कार पार्क करने के लिए उपयुक्त स्थान नहीं मिल रहा था, और उसे यह भी डर था कि अगर वे दोनों कार से बाहर निकल गए, तो नगर निगम वाले कहीं कार को उठाकर ले ना जाएं, क्योंकि कार सही जगह पर पार्क नहीं की गई थी। यह घटना उसके साथ पहले भी घटित हो चुकी थी। खैर…सब्जी वाले के पास जाकर श्रुति ने अपने पति को फोन किया और पूछा, “क्या लाऊं, मुझे तो कुछ समझ नहीं आता।” अब आकाश के पास उसके तानों का साफ जवाब था, “मुझे क्या पता, सब्जी वाले के पास तो तुम खड़ी हो! जो अच्छा लगे, ले आओ…”

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© प्रो. नव संगीत सिंह

संपर्क – # १, लता ग्रीन एन्क्लेव पटियाला-१४७००२ (पंजाब)

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #216 – लघुकथा – कुंठा – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम लघुकथा  “कुंठाकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 216 ☆

☆ लघुकथा- कुंठा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

रात की एक बजे सांस्कृतिक कार्यक्रम का सफल का सञ्चालन करा कर वापस लौट कर घर आए पति ने दरवाज़ा खटखटाना चाहा. तभी पत्नी की चेतावनी याद आ गई. ‘ आप भरी ठण्ड में कार्यक्रम का सञ्चालन करने जा रहे है. मगर १० बजे तक घर आ जाना. अन्यथा दरवाज़ा नहीं खोलुंगी तब ठण्ड में बाहर ठुठुरते रहना.’

‘ भाग्यवान नाराज़ क्यों होती हो.’ पति ने कुछ कहना चाहा.

‘ २६ जनवरी के दिन भी सुबह के गए शाम ४ बजे आए थे. हर जगह आप का ही ठेका है. और दूसरा कोई सञ्चालन नहीं कर सकता है ?’

‘ तुम्हे तो खुश होना चाहिए,’ पति की बात पूरी नहीं हुई थी कि पत्नी बोली, ‘ सभी कामचोरों का ठेका आप ने ही ले रखा है.’

पति भी तुनक पडा, “ तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि तुम्हारा पति …”

‘ खाक खुश होना चाहिए. आप को पता नहीं है. मुझे बचपन में अवसर नहीं मिला, अन्यथा मैं आज सब से प्रसिद्ध गायिका होती.”

यह पंक्ति याद आते ही पति ने अपने हाथ वापस खीच लिए. दरवाज़ा खटखटाऊं या नहीं. कहीं प्रसिध्द गायिका फिर गाना सुनाने न लग जाए. 

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

०२/०२/२०१७

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ सेवकराम की लघुकथाएं – शपथ ग्रहण परेड ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  लघुकथा ☆ सेवकराम की लघुकथाएं ☆

☆ शपथ ग्रहण परेड ☆

(मेरी लघुकथाओं के पात्र ‘सेवकराम’ के इर्दगिर्द रची गई कुछ लघुकथाओं को आपसे साझा करने का प्रयास।)

सीनियर सिटिज़न की बैठक में आज फिर व्हाट्स एप्प ग्रुप पर आए किसी संवेदनशील मुद्दे से संबन्धित पोस्ट को लेकर कुछ मित्रों के बीच में सामान्य चर्चा बहस में परिवर्तित होने लगी। कुलकर्णी जी और आत्माराम जी अपने अपने तर्क देते हुए एक दूसरे को गलत साबित करने का प्रयास कर रहे थे।

समय के साथ बहस तीखी होने लगी। अपने स्वभाव के अनुसार हरिलाल जी बीच बचाव करने का प्रयास करने लगे। हरिलाल और सेवकराम जी स्वयं को शांत रखते हुए ऐसी बेवजह की बहसों से दूर ही रहने का प्रयास करते थे।  

आज स्थिति बिगड़ने के आसार लग रहे थे। ऐसे में सेवकराम जी को लगा कि उन्हें चलना चाहिए। वे हमेशा की तरह हाथ जोड़कर विदा लेते हुए उठे।

इस बार हरिलाल जी को उनका इस तरह जाना अच्छा नहीं लगा। उनसे रहा न गया।

“अरे सेवकराम जी, थोड़ा रुक जाइए। आप ऐसे नहीं जा सकते।“

“हरिलाल भाई, क्या करूँ मैं रुक कर? मेरी बात तो किसी को अच्छी लगेगी नहीं।“

उनके इस बदले हुए व्यवहार को देख कर थोड़ी देर के लिए सभी शांत हो गए।

हरिलाल जी, कुलकर्णी जी और आत्माराम जी की ओर देखते हुए बोले – “अरे नहीं सेवकराम जी, आप तो बोलिए। हम सुन रहे हैं।“

सेवकराम जी वापस बेंच पर बैठते हुए बोले – “क्या आप लोगों ने कभी शपथ ग्रहण परेड के बारे में सुना है?

लगभग सभी के मुंह से एक साथ निकला – “नहीं”

अब सभी की दृष्टि सेवकराम जी की ओर थी। सेवकराम जी ने इत्मीनान से कहना शुरू किया।

“हम सभी ने राजनेताओं को मंत्री पद और विधानसभा/संसद सदस्यों को शपथ लेते हुए देखा है। किन्तु, शायद ही किसी को सैनिकों या सेना के अफसरों के पास-आउट परेड और शपथ/कसम परेड को देखने या जानने का अवसर मिला होगा। हम लोग सोशल मीडिया के संदेशों को सच मान कर आपस में वैमनस्य पैदा कर लेते हैं। लेकिन सेना और अनुशासित सैन्य जीवन से प्रेरणा क्यों नहीं लेते?”   

कुलकर्णी जी बोले – “हम समझे नहीं।“

सेवकराम जी ने सविस्तार बताने का प्रयास किया।

“भारतीय सेना में सभी धर्मों के धार्मिक शिक्षक या रिलिजियस टीचर (पंडितजी, ज्ञानी जी, पादरी, मौलवी, बौद्ध गुरु आदि) होते हैं जो कि जूनियर कमीशण्ड ऑफिसर (JCO) रेंक के होते हैं। प्रत्येक सैनिक किसी भी धर्म को मानने के लिए स्वतंत्र हैं। सैनिक प्रारम्भिक प्रशिक्षण सफलतापूर्वक उत्तीर्ण करने पर ‘पासिंग आउट परेड’ के दौरान शपथ ग्रहण करते हैं। सभी धार्मिक शिक्षक उन्हें अपने-अपने धार्मिक ग्रंथ की शपथ दिलाते हुए संविधान और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य की शपथ दिलाते हैं। उदाहरण हमारे सामने है कि किस तरह हमारे वीर सैनिक अपने-अपने धर्म का सम्मान करते हुए धर्म, जाति और संप्रदाय को भूलकर कंधे से कंधा मिलाकर राष्ट्रधर्म का पालन करते हुए हमारी और राष्ट्र की सुरक्षा करते हैं। और यहाँ हम जाने अनजाने लोगों और असामाजिक तत्वों द्वारा फैलाये गए व्हाट्सएप्प संदेशों पर बिना अपने विवेक का उपयोग किए विश्वास कर लेते हैं। फिर बेवजह की बहस कर समय बर्बाद करते हैं और आपसी संबंध खराब करते हैं। आंतरिक सुरक्षा को कमजोर करते हैं। सर्वधर्म समभाव की विचारधारा के साथ इतना समय यदि हम अपने घर परिवार, समाज और अपने आसपास कॉम्प्लेक्स/सोसायटी के परिवार की बेहतरी के लिए दें तो कैसा रहेगा? प्रत्येक व्यक्ति किसी भी धर्म या संप्रदाय को मानने के लिए स्वतंत्र है। आगे आप की इच्छा। सभी समझदार हैं। काश हमें भी नागरिकता की शपथ दिलाई गई होती।”

इतना कह कर वे हाथ जोड़कर उठे और घर की ओर चल दिये।

और सब अवाक एक दूसरे का मुंह देखने लगे।

©  हेमन्त बावनकर  

21 जून 2025, 11.50 रात्रि 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 232 – द्रौपदी का चीर ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “द्रौपदी का चीर”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 232 ☆

🌻लघुकथा 🔥द्रौपदी का चीर🔥

लगातार बारिश से चारों तरफ पानी ही पानी, देखते-देखते शहर, गाँव, नदी – नाले सभी पानी से जलाजल भर गए।

झुग्गी झोपड़ियों में भी जीवन बढ़ता, पलता, संवरता और प्रफुल्लित होता है। सूखे मौसम में सब कुछ अच्छा लगता है। तेज हवा का झोंका तपती सूर्य की किरणें, सब सहन हो जाता है, परंतु बारिश में जहाँ पानी ही पानी। वहाँ पर एक घास फूस पन्नी टूटे-फूटे सामानों से ढकी, झोपड़ी जहाँ पर वह अपने पति के साथ, पति क्या कहना दो अनाथ को एक साथ  मजदूरी करते-करते दो जून की रोटी ने हमसफर बना दिया।

जहाँ तन, मन, धन से वह एक जान हो गए थे। पति दो दिन से तेज ज्वर से पीड़ित था। गरीबी की मार और बारिश का खेल। सभी कुछ गीला, आटा चाँवल की तो बात ही न करें, चूल्हे में गीली लकड़ियाँ जलाकर वह आसपास के वातावरण को गरम करना चाहती थी।

परंतु सिसकती साँसे और सुलगती लकड़ियाँ, दोनों अपनी-अपनी कहानी कह रही थी।

पास में जड़ी बूटी बेचने वाला भी झोपड़ी बनाकर रहता था। परंतु उसकी झोपड़ी सूखी क्योंकि चारों तरफ से मोटी पल्ली, मिट्टी की दीवार से ढका हुआ था।

अपनी झोपड़ी पर रहता तो था, परंतु आँखें चौबीसों घंटे उस झोपड़ी पर रहती जिसमें रूपा अपने पति के साथ रहती थी।

दियासलाई की रोशनी दरवाजे पर दिखाई दी। रूपा काँपते हुए बोली– मेरे पति को दवाई देकर बचा लीजिए। आज वह मन ही मन खुश हो रहा था मौका और जरुरत दोनों है।

कुछ जड़ी – बूटी लेकर वह वहाँ पहुंच गया, नब्ज देख कर बोला – – – इसे तो ताप देना पड़ेगा। आग सुलगनी चाहिए।

कुछ जलाने का सामान ले आओ। रूपा ने चूल्हे की गीली लकड़ियाँ लगाई थी, उसको जलाने के लिए अपने शरीर पर उतना ही साड़ी का पल्ला बचाया जितनी जरूरी थी।

शेष साड़ी फाड़ कर चूल्हे में जला दी। लकड़ियाँ सुलग उठी।

ताप से पति को ज्वर और ठंड से आराम मिला।

परंतु रूपा आज चीर फाड़ते समझ चुकी थी कि– इस बारिश में झोपड़ी की आवाज,  सुलगती चीर, शायद कलयुग है, कान्हा जी को सुनाई नहीं दिया होगा।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका#66 – ~ काल नगरी ~ – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

रविंद्रनाथ टैगोर इंस्टिट्यूट, मॉरिशस के छात्रों द्वारा श्री रामदेव धुरंधर जी के जीवन पर आधारित एक लघु फिल्म बनाई गई थी जिसे आप इस लिंक 👉 https://www.facebook.com/share/v/16dYs5pG1o/ पर क्लिक कर अथवा निम्न  QR कोड को स्कैन कर देख सकते हैं – 

(This film is created by the Students of RTI Film Production graduation course as a final project for their second semester. This film is an interview based profile film of well-known Mauritian Hindi Writer Mr. Ramdeo Dhurandhar.) 

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– ~ काल नगरी ~” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # 66 — ~ काल नगरी ~ — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

सदाव्रत चक्षु विहीन था। ज्ञानी ‘नरोत्तम’ चालाकी से उससे तमाम अनकही बातें निकाल कर अपनी एक कृति लिख रहा था। एक दिन सदाव्रत ‘अनकही काल नगरी’ की बातें कर रहा था कि नरोत्तम सुनने पर काँप सा पड़ा। ‘अनकही काल नगरी’ की न अपनी कोई भित्ति थी और न वह स्वयं में कोई खंडहर थी। पर नरोत्तम को लगा कुछ अटूट अखंड सा तो है, जिसमें वह प्रवेश नहीं कर पाता। वह नि: शब्द हालत में वहाँ से लौट गया।

 © श्री रामदेव धुरंधर

20 / 06 / 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – अपशब्द ☆ प्रो. नव संगीत सिंह ☆

प्रो. नव संगीत सिंह

☆ लघुकथा ☆ अपशब्द प्रो. नव संगीत सिंह

यूं ही बातें करते-करते वह ऊंची आवाज में बोलने लगा – “अरे भाई, क्या हाल है, रिटायरमेंट के बाद… आजकल क्या कर रहे हो… तुम्हारे तो सारे दांत टूट गए हैं, देखो – मेरे सारे दांत पूरे हैं… बाल डाई करते हो क्या? देखो, मेरे सारे बाल सफेद हो गए हैं… बहुत पतले हो गए हैं, मैं तुमसे दस साल बड़ा हूं… फिर भी स्वस्थ दिखता हूं…” और मैं ‘हां-हां’ कहता रहा और उसे टालता रहा। लेकिन वह सोच रहा था कि मैं प्रतिक्रिया क्यों नहीं करता? कई अन्य अजीबोगरीब बातें करने के बाद उसने कहा, “क्या आप कभी अमेरिका गए हैं? वहां बहुत सारी सुविधाएं हैं। भारत में क्या है? समय की बर्बादी…। कभी आइए वहां मेरे पास…विदेशी शराब, अंग्रेजी कल्चर, झीलें, समुद्र, दृश्य, और भी बहुत कुछ है…”

उसने मुझे उत्तेजित करने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हो सका। वो बेचारा हाथ मलता ही रह गया, इस उम्मीद में कि शिकार आएगा, लेकिन मैं उसके जाल में नहीं फंसा। आज मुझे अपने पिता के शब्द सच लगे – ‘एक चुप सौ सुख।’ अगर मैं भी उसकी बातों पर प्रतिक्रिया देने लगता तो बात ‘तू-तू मैं-मैं’ से होती हुई बहुत आगे बढ़ जाती। फिर बाबा फ़रीद जी की ये पंक्तियां दोहराने से क्या फायदा – “फ़रीदा, बुरे दा भला कर, गुस्सा मन न हडाए। देही रोग न लगई, पलै सब किछ पाए।” आज मैंने बाबा फ़रीद के श्लोकों को असली रूप से जाना। इससे पहले मैं इन्हें केवल पढ़कर ही बात खत्म कर देता था। मुझे उनकी शिक्षाओं और श्लोकों का पालन करने पर गर्व महसूस हुआ।

© प्रो. नव संगीत सिंह

संपर्क – # १, लता ग्रीन एन्क्लेव पटियाला-१४७००२ (पंजाब)

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “सरकार का दिन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “सरकार का दिन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

घंटाघर चौक। काफी समय से खड़ा हूँ। लोकल बस वही आ रही। दो चार आईं भी तो बुरी तरह ठसाठस भरी हुईं। मैं कस्बे का आदमी ठहरा। धक्कमपेल से घबरा गया। इसी डर से रुका रहा।

– आप तांगे में चले जाये़ं !

एक भला आदमी सलाह देता है।

मिलना जरूर होगा। उससे मिले साल डेढ़ साल हो गया ! समय कम है मेरे पास ! फिर भी जाऊंगा। क्या सोचेगी? व्यस्तताओं के सरकंडे बिना वजह फैलते जा रहे हैं।

पांच कदम स्टेशन की ओर जाता हूँ। तांगा बिल्कुल खाली है। आगे की सीट पर एक काला, गोल मटोल, चौदह पंद्रह साल का लड़का बैठा है।

– नये बस अड्डे चलेगा?

– हां, साब !

– कितने पैसे?

– तीस।

– चल फिर।

– पीछे की सीट पर बैठ जाता हूँ।

– नये बस अडडे, नये बस अड्डे का शोर चौड़ा बाज़ार के आसपास गूंजने लगता है। दो बाबू और आते हैं। एक वृद्ध भी आ जाता है ! इस तरह आधा दर्जन सवारियां हो जाती हैं।

– चल मेरे शेर‌!

– लगाम खींच देता है और घोड़ा हिनहिनाकर चल पड़ता है।

– एक सवारी बस अड्डे!

– वह लड़का फिर आवाज़ लगाता है तब बाबू कहता है कि, सवारियां तो पूरी हैं। क्यों भर रहा है मुर्गियों की तरह !

– एक कप चाय बनाऊंगा साब !

– वह दयनीय स्वर में कहता है !

दो सवारियां और मिल जाती हैं। टप् टप् शुरू होती है और साथ ही घोड़े को हल्ला शेरी !

चौराहे पर पहुंचते ही विफल बजती है।

लाइसेंस निकाल !

– है नहीं, साब !

– है क्यों नहीं? ऊपर से बारह सवारियां  !

आज जाने दो, साब !

गवर्नर का पुत्तर है क्या? ला, पैसे निकाल, तेरा चालान करूं।

– माफ कर दो, साब !

सवारियों में खलबली मच गयी है‌। बस पकड़नी है। यहां जाना है, वहां जाना है।

सभी मिलकर कहते हैं कि इसे माफ कर दो  !

– अच्छा, जा बेटा !

आंखें निकाल कर सिपाही चौक पर अपनी ड्यूटी देने लगता है।

सवारियां सलाह देती हैं – फिर न बिठाना इतनी सवारियां ! लाइसेंस पास रखो ! अभी बच्चे हो।

– साब, खायेंगे कहाँ से? महीना बांध रखा है ! घंटाघर चौक पर पान वाले की दुकान पर पहुंचाते हैं। इस बार घर में फाकाकशी चल रही है। इसे कहां से दें? हफ्ते बाद तांगा निकाला है। और वह आज के दिन ही मांग रहा है पैसे !

इतने में एक टैक्सी सिपाही के पास रुकती है। कुछ नोट हाथ में थमाये जाते हैं और फिर फुर्र हो जाती है !

मुझे लगने लगता है कि सरकार के सारे कानून इस तांगे वाले लड़के पर ही लागू होते हैं !

टप् ! टप्! तांगा चल रहा है !

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – गलत गणित… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह तथा 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह। कुल 9 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कलेलकर पुरुसकर 2013 लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 35 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभरती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा गलत गणित

? लघुकथा – गलत गणित ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

सेठ रौनक मल के इकलौते बेटे की शादी का निमंत्रण पत्र मिला तो महेश ने अपने दोनों बच्चों से कहा –” देखो बेटा वहां ढेर से व्यंजन होंगे। आइसक्रीम , कोल्ड ड्रिंक्स, मिठाई सभी को जी भर कर खा लेना। आखिर ₹501 देने हैं पूरी तरह वसूल हो जाने चाहिए। पास खड़ी पत्नी भी मुस्कुरा दी।

पार्टी खत्म होने के बाद घर लौटते ही दोनों बच्चे बड़े उत्साह से चहकने लगे –” पापा मैंने तीन आइसक्रीम खाई ….. , मैंने दो कोलड्रिंक पी….”

“ शाबास , आज तो तुमने पूरे पैसे वसूल कर लिए….” महेश ने उनकी पीठ थपथपाई।

घंटाघर बीता होगा कि बड़ा बेटा मां के पास आया –” मम्मी पेट में दर्द हो रहा है ….”उसके साथ ही उसे उल्टियां होने लगी। पति पत्नी घबरा गए फौरन अस्पताल ले गए।

“ शायद उसे खाने में विषबाधा हो गई है दो-तीन दिन अस्पताल रखना पड़ेगा “डॉक्टर ने बताया। दवाइयों, इंजेक्शनों, ग्लूकोज से बेटे की हालत सुधरी। तीसरे दिन पांच हजार रुपए का बिल थमा कर जब घर लौटे तो शादी में दिए रुपयों के  हिसाब से मन मसोसते रह गए।

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ११ – कथा-कहानी – यह एक सुखद संयोग था ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ११ ☆

☆ कथा-कहानी ☆ ~ यह एक सुखद संयोग था ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

रुनझुन लिफ्ट से नीचे उतरकर अभी पहले तल पर ही पहुंची थी कि आकाश ने लिफ्ट में प्रवेश किया। आकाश को सातवें तल पर जाना था, जबकि रुनझुन को ग्राउंड फ्लोर जाना था। उसके बाद वह कहीं और जाने की तैयारी में थी।

लिफ्ट ग्राउंड फ्लोर पर पहुंच चुकी थी। रुनझुन लिफ्ट से बाहर निकलने वाली थी कि आकाश बोल पड़ा…

रुनझुन..मेरे साथ 7th फ्लोर पर चलो न !!!!!

रुनझुन ने बाहर निकलने की कुछ एक्टिंग सी क़ी लेकिन अचानक उसके मन में क्या आया कि वह 7th फ्लोर पर जाने के लिए राजी हो गई।

संयोग ऐसा हुआ कि ग्राउंड फ्लोर से लेकर 7th फ्लोर तक किसी भी फ्लोर पर किसी ने भी एंट्री नहीं की।

लिफ्ट बिना रुके तेजी से 7th फ्लोर ऊपर क़ी ओर चली जा रही थी। खास बात यह भी थी कि इस बीच रुनझुन और आकाश के बीच में किसी प्रकार का कोई वार्तालाप नहीं हुआ।

एक दो बार ऐसा हुआ कि आकाश ने रुनझुन की आंखों में आंखें डालकर देखा, तो रुनझुन ने भी शर्म से अपनी पलके नीचे झुका ली।

अब दोनों टावर के 7th फ्लोर पर बने ओपन काफी हाउस में टेबल पर आमने-सामने बैठे थे। कॉफी के दो कप आपस में गपशप कर रहे थे, लेकिन ये दोनों आपस में कुछ भी नहीं बोल रहे थे।

दो जोड़ों को एक साथ बैठे, लेकिन आपस में बात न करते देख, बेटर संजीव आश्चर्यचकित भी हो रहा था और सशंकित भी हो रहा था। संजीव ने जानबूझकर के अपनी जूठी प्लेट से दो दो चम्मचे उनके टेबल के पास गिरा दीं, ताकि इनकी खनक से शायद इन दोनों की तंद्रा टूट जाए और हुआ भी ठीक ऐसा ही।

अपनी चुप्पी तोड़ते हुए आकाश ने कहा,

मैं तुमसे एक बात करना चाहता हूँ..रुनझुन।

रुनझुन ने भी उसे कुछ भी कहने की मौन स्वीकृति दे दी।

आकाश कुछ कहते कहते अचानक रुक गया। उसके माथे पर पसीने की ढेर सारी बूंदें छिटक पड़ी। उसका शरीर स्थूल सा हो गया। उसे इस तरह से नर्वस देख, रुनझुन घबरा गई, और उठ खड़ी हुई। अपने दुपट्टे से उसके माथे के पसीने की बूंद को पोछते हुए, रुनझुन ने कहा, ..

क्या कहना चाहते हो आकाश.. कहो, बेहिचक कहो।

लगभग भावुक होते हुए आकाश ने कहा, रुनझुन.. कह दूँ।

आकाश के सिर पर अपना प्यारा सा हाथ फेरते हुए रुनझुन ने गर्दन धीरे से हिलाई, मानो वह उसकी स्वीकृति थी।

एक करोड़पति बाप का बेटा आकाश, जिसके आगे पीछे ऐश्वर्य और धन संपदा नर्तकियों जैसी नाचती है, वह इस वक्त काफी के टेबल पर अपने जीवन की असली खुशी को ढूंढ रहा था।

रुनझुन, .. मैं तुझे सगाई की अंगूठी आज और अभी पहनाना चाहता हूँ।

मैं किसी ऐसे अमीर करोड़पति ससुर का दामाद नहीं बनना चाहता जिसकी बेटी के एशोआराम, शौक और शोहरत के किस्से तो हर दिन सुनता हूँ, लेकिन उसके दिल की बात को जानता ही नहीं हूँ। कोई अनजान, मेरी जीवन संगिनी कैसे बन सकती है।

यह क्या कह रहे हो?..आकाश।

तुम मेरे साथ ऐसे बेमेल रिश्ते क़ी बात ही क्यों सोचते हो।

मेरी हैसियत और तुम्हारी हैसियत में जमीन आसमान का अंतर है। कहां तुम्हारे डैडी कई कंपनियों के ओनर है, वहीं मेरे बापू तुम्हारे डैडी क़ी एक छोटी सी कंपनी में, एक छोटी सीए क़ी नौकरी करते हैं।

आकाश, .!!! ये बेमेल रिश्ते, तुम्हारे परिवार और तुम्हारे होने वाले ससुराल वालों के परिवार के कितने सदस्यों के दिल तोड़ देंगे, क्या तुम्हें यह पता है !!

रुनझुन…! तो क्या तुम यह चाहती हो कि मेरा इकलौता दिल, जो शहर के एक बड़े रईसजादे के इकलौते वारिस का दिल है वह टूट जाए। क्या इस टूटे हुए दिल के दर्द को जानने के बाद मेरे डैडी और मम्मी बर्दाश्त कर पाएंगे।

रुनझुन तुम बेफिक्र रहो मैं सब कुछ मैनेज कर लूंगा। मेरे डैडी और मॉम सिर्फ एक अमीर- रईस बिजनेसमैन नहीं है बल्कि एक सच्चे दिल के इंसान भी है।

बेटर संजीव दूर से इन दोनों की बातों को बड़े ही ध्यान से सुन रहा था।

संजीव ने आनन फ़ानन में एक कॉफी टेबल को सजाते हुए एक छोटा सा केक लाकर धर दिया।

रुनझुन ने आकाश के हाथों में बड़े ही प्यार से हीरे की अंगूठी पहनाई, तो आकाश ने भी रुनझुन के हाथों में वैसी अंगूठी पहनाते हुए उसके माथे को चूम लिया।

कॉफी हाउस के मंद मंद प्रकाश में बैठे कई जोड़े खुद को रोक नहीं पाए, और आकाश के कॉफी टेबल के पास इन जोड़ों के प्रति प्यार लुटाने के लिए जमा हो गए।

अचानक दो बुजुर्ग जोड़ों को अपने पास देखकर आकाश और रुनझुन हक्के-बक्के रह गए। दोनों ने झुककर उन बुजुर्ग जोड़ों के पैर छुए तो, उन्होंने भी दोनों को अपने गले लगा लिया और आँखों में प्यार भरे स्नेहिल आंशुओ को भरते हुए हुए कहा, ..

बेटा.. आज से 30 बरस पहले आज ही के दिन इसी जगह पर मैंने तुम्हारी मॉम को सगाई क़ी अंगूठी पहनाई थी। आज इतिहास स्वयं को दुहरा रहा है।

आज उन्ही प्यारी यादों को ताजा करने के लिए हम दोनों तड़क-भड़क की दुनिया से दूर इस कॉफी हाउस आए थे और आज तुम दोनों यहाँ……

कॉफी हाउस की सारी लाइटे एक साथ जल गई, अब सभी सबको देख रहे थे। संगीत की मधुर धुन सबके कानों में जा रही थी। सभी एक साथ ठुमक रहे थे।

बेटर संजीव का खाली प्लेट भी ढेर सारे रूपयों से भर चुका था।

यह एक सुखद संयोग था।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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