श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # १२ ☆
☆ कथा-कहानी ☆ ~ होनहार की तस्वीर ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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अखिलेश के पास न अब सोचने के लिए समय था और न ही करने के लिए कोई काम था। नौकरी की तलाश में वह अहमदाबाद जरूर आ गया, लेकिन अहमदाबाद उसे रास नहीं आया।
कागज़ के गत्तो से कार्टन बनाने वाली एक फैक्ट्री में गत्ते की चादर पर लेटे अखिलेश को रोटी भी चबाते नहीं बन रही थी। कई दिनों की बटोरी रोटियाँ, धूप में सुख कर ककटी हो गई थी तभी मानस उसके पीछे आया और धीरे से बोला।
अखिलेश..अखिलेश इधर आना। अखिलेश बुरी तरह से डर गया। उसे लगा कि कोई और आफत फिर आकर खड़ी हो गई। पीछे मुड़कर देखा तो मानस खड़ा था।
अबे, सुन बे इधर आ!
कागज की गिलास में भरे चाय को अखिलेश को पकड़ाते हुए मानस इस तेजी से पीछे की तरफ भाग लिया कि कोई उसे देखना ले। चाय की गिलास में डूबी हुई रोटी है, अब जाकर थोड़ी सी मुलायम हो रही थी। अखिलेश को कई दिनों बाद पहली बार इतना स्वादिष्ट भोजन मिला था।
जिंदगी में धुली कड़वाहट मिटने का नाम नहीं ले रही थी।
अखिलेश बड़ी शिद्दत और मेहनत से उस कंपनी में काम करता था। जितना सब लोग काम करते थे, अखिलेश उनसे कई गुना काम निकाल देता था, लेकिन न जाने क्या हुआ एक दिन उसे क्या सूझी। कंपनी में गत्तों को पैक करने वाले छोटे छोटे दो तीन पिन अखिलेश ने उसे अपने पॉकेट में डाल लिए।
मेटल डिटेक्टर की घंटी बजी, तो गार्ड ने उसे किनारे खड़ा होने के लिए कहा। अखिलेश को यह नहीं समझ में आया कि आखिर उसे किनारे क्यों खड़ा किया जा रहा है।
तलाशी में उसके पाकेट से वे छोटे- छोटे दो तीन पिन निकले तो कंपनी के लिए बड़ा अपराध हो गया। कंपनी ने उसे एक हफ्ते ले लिए काम करने से मना कर दिया।
अखिलेश की कहानी जहां से शुरू हुई थी, वहीं समाप्त हो गयी। वह अपने साथियों से दूर नहीं जा सकता था और इससे अधिक मेहनत का काम भी नहीं कर सकता था। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री हासिल करने वाले अखिलेश को बेरोजगारी का मार झेलना पड़ रहा था। इस पढ़ाई के बाद उसे किसी प्रकार का संतोषजनक जॉब नहीं मिला। ऊपर से परिवार के तानों की मार बढ़ गई, तो मजबूरन उसे भाग कर अहमदाबाद पड़ा।
यहां खोजते खोजते काम मिला तो गत्ते की फैक्ट्री में गत्तों के बॉक्स बनाने का काम मिला।
जिंदगी का सूरज अभी ठीक से चमक भी नहीं पाया था कि घनघोर काले बादलों ने उसे ढक लिया।
चाय के साथ रोटी खाने से उसके मन को तृप्ति मिली तो बड़े दिनों बाद उसे गहरी नींद भी आयी।
वह वहीं गत्ते पर लेट गया।
रात का वक्त था इधर अचानक फैक्ट्री में अफरा तफरी मच गई थी। इलेक्ट्रिक जनरेट करने वाली टरबाइन में कोई खराबी आ गई, तो पूरा सिस्टम इस शट डाउन हो गया। कंपनी के इंजीनियर उसको बनाने में जुटे पड़े थे। एक पैनल का काम किसी को समझ में नहीं आ रहा। शायद फाल्ट भी उधर ही कहीं छिपा था। फैक्ट्री को रात में ही चलाना जरूरी था, क्योंकि कंपनी ने एक बहुत बड़ा ऑर्डर ले रखा था। जिसके माल की सप्लाई अगले दिन 11:00 बजे तक हर हाल में करनी थी। इंजीनियरों के पसीने छूट रहे। कंपनी का चीफ इंजीनियर अपने मातहतों को इस तरह से डांट रहा था, मानो वे उसके घरेलू नौकर हो। चीफ इंजीनियर को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। ऊपर से फैक्ट्री के मालिक का फोन उसके खोपड़ी को हिलाये दे रहा था।
काफी हिम्मत करके मानस चीफ इंजीनियर के बगल में जा पहुंचा और धीरे से बोला।
साहब… आपसे एक बात कहनी है।
अबे तू कौन? क्या बात करनी है तुमको?
मानस डर गया। डरते डरते बोला।
साहब! हमारी कंपनी में एक लड़का है, वह इलेक्ट्रिकल इंजीनियर है, लेकिन गत्ते का कार्टन बनाता है।
कहां है वह? बताओ? चीफ इंजीनियर ने अपनी गर्दन पीछे घुमाते हुए कहा।
साहब, है तो, लेकिन उसे निकाल दिया गया।
अबे साले…अब तक, क्या – क्या पहाड़ पढ़ रहा है।
लड़का है, इंजीनियर है, मजदूर है, निकाल दिया गया है। यह सब अनाप-शनाप क्या बक रहा है।
मानस ने एक बार और हिम्मत करके अपनी उंगली से अखिलेश की तरफ इशारा किया। अखिलेश अभी भी कार्टून के रद्दी गत्तों पर इस तरह से लेटा पड़ा था।
ठीक है उसे बुलाओ..
इंजीनियर का इतना कहना था कि मानस दौड़े दौड़े अखिलेश के पास पहुंचा।
अबे साले, उठ चल चल। कंपनी के एक मशीन खराब है बना देगा तो इंजीनियर बन जाएगा।
इंजीनियर बन जाएगा। अखिलेश कान में गयी ये आवाज उसे गाली जैसी लग रही थी। आंखें मिजते हुए अखिलेश उठा और सीधे टरबाइन के इलेक्ट्रिकल पैनल के पास पहुंच गया। इंजीनियर ने ऊपर से नीचे तक उसका हुलिया निहारा तो एक बार उसे लगा कि यह क्या मैं करने जा रहा हूँ।
लेकिन पता नहीं क्या इंजीनियर के दिमाग में आया कि चलो एक बार इस लड़के को भी अजामा लेते हैं।
उसके दिमाग में कहीं से आया कि न जाने किस भेष में नारायण मिल जाए।
मशीन को प्रणाम कर, जरूरी सेफ्टी गार्डस पहन, हाथ में कुछ टूल्स लेकर अखिलेश टरबाइन मशीन के यार्ड में चला गया।
चीफ इंजीनियर की न समझी पर, उसकेअधीन के असिस्टेंट इंजीनियरस और टेक्निशियनस एक जगह खड़े होकर उसका मजाक उड़ाने लगे। यह बॉस भी पागल हो गया है। हम लोग इतने देर से इस फाल्ट को ढूंढ रहे हैं, हम सबसे तो मिला नहीं। यह मजदूर ढूंढ के निकलेगा … ऐसा कहते हुए सभी ठहाका मार कर हंस पड़े।
इधर ठहाको की आवाज चीफ इंजीनियर के कान में गई, उधर पैनल की बत्ती लाल से ग्रीन हो गयी।
टरबाइन के इलेक्ट्रिकल सेक्शन से बाहर निकलकर, अखिलेश के चीफ इंजीनियर से कहा..
सर.. एक बार फिर स्टार्ट करवाइए, मुझे पूरा यकीन है की मशीन स्टार्ट हो जाएगी और इस बार ट्रिप नहीं होगी।
मशीन का स्विच दबाया गया, सिस्टम ऑन हुआ और मशीन चल पड़ी। इस बार मशीन चली तो दुबारा रुकने का नाम नहीं लिया। वहां खड़े सभी लोगों ने ख़ुशी से तालियां बजाई तो बगल में खड़े असिस्टेंट इंजीनियरस और टेक्नीशियन भी खुद को ताली बजाने से रोक नहीं सके।
उन्हें नहीं समझ में आया कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया, उन लोगों ने अपनी ताली रोकी और एक दूसरे का मुंह देख रहे थे। इधर चीफ इंजीनियर उनकी तरफ घूर करके देख रहा था, अब अखिलेश इंजीनियर की बाहों में था
इंजीनियर ने उसे बच्चों को प्रेम से अपने बाहों में लपेट लिया।
अगले दिन की सुबह अखिलेश के लिए खास सुबह थी।
चीफ इंजिनियर : अपने डॉक्यूमेंट मेरे सामने रखो। कहां से बीटेक किया है ?
अखिलेश : सर..जबलपुर से।
चीफ इंजिनियर : प्रैक्टिकल ट्रेनिंग कहां से किया था ?
अखिलेश : सर..एनटीपीसी ऊंचाहार से।
एनटीपीसी ऊंचाहार का नाम आते ही चीफ इंजीनियर चेहरे की रंगती बदल गई। उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे।
चीफ इंजिनियर : किस ईयर में तुमने प्रैक्टिकल ट्रेनिंग की थी ?
अखिलेश : सर.. 2017, में।
वर्ष 2016 सुनते ही चीफ इंजीनियर, अखिलेश को गौर से देखने लगा।
चीफ इंजिनियर : किसके अंडर में तुमने इंटर्नशिप की थी।
अखिलेश : सर.. आपके ही अंडर में तो की थी।
यह कहते हुए अखिलेश की आंखों से झर झर आंसू गिरने लगे,
चीफ इंजीनियर ने अपनी मेमोरी रिकॉल की, तो उन्हें उस होनहार की तस्वीर अखिलेश चेहरे में नजर आई जिसे वह उसे बैच का सबसे होनहार और समझदार अप्रेंटिस स्टूडेंट मानता बहुत था।
अगले दिन अखिलेश अपने केबिन में बैठा था, तो चीफ इंजीनियर अखिलेश के केबिन के सामने से यह कहते हुए गुजरे …
कहो, इंजीनियर अखिलेश कैसे हो?
सर मैं ठीक हूं कहते हुए अखिलेश अपनी सीट से उठ खड़ा हुआ। उसके बगल में बैठा हुआ मानस भी उठ खड़ा हुआ।
अखिलेश ने मानस की तरफ इशारा करते हुए, चीफ इंजीनियर से बड़े ही स्नेहिल भाव से कहा।
सर…यह मानस है, इसने भी आईटीआई किया है। इसे भी टेक्नशियन के पद पर रख लीजिए न।
चीफ इंजीनियर ने मुस्कुराते हुए.. यस..यस कहते हुए गर्दन हिलाई, जिसमे उनकी मौन स्वीकृति झलक रही थी।
अखिलेश और मानव दोनों एक दूसरे को देख रहे थे, दोनों के चेहरों पर खुशियों के भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे थे।
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© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”
लखनऊ, उप्र, (भारत )
दिनांक 22-02-2025
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈














