हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मन…  ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी का स्वागत. आप सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मन’।)

? कविता – मन…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

मन पर कोई जोर चले ना,

मन का वेग अनंत,

कभी यहां तो कभी वहां,

विचरे लोक परलोक।

 

कठोर बने, तो पत्थर भी शर्माए,

कोमल इतना, मोम सा पिघला जाए,

कभी सूरज से ऊष्मा ले ले,

कभी शीतलता को ले अपनाए।

 

कभी मुखरित हो जाता है,

कभी धारण कर लेता है मौन,

कभी विश्व पर शासन करता,

कभी दुबक, सिमट, अपने में जाए।

 

मन की लीला मनमोहन जाने,

और जान सका ना कोई,

जिसने पाई मन की थाह,

सम ईश् तुल्य हो जाए।

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Poetry ☆ “संवेदनाशून्यता…” श्री संजय भारद्वाज (भावानुवाद) – ‘Impassive Insensitivity…’ ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present an English Version of Shri Sanjay Bhardwaj’s Hindi poetry “संवेदनाशून्यता…”.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) for this beautiful translation and his artwork.)

English Version by – Captain Pravin Raghuvanshi

?~ Impassive Insensitivity... ~??

☆

Heart attack,

Brain dead —

We keep inventing

New names for death

And I wonder…

When shall we declare

Impassive insensitivity

As death itself..?

~ Pravin Raghuvanshi

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

श्री संजय भारद्वाज जी की मूल रचना

? संजय दृष्टि – संवेदनाशून्यता… ? ?

हार्ट अटैक,

ब्रेन डेड,

मृत्यु के नये नाम

गढ़ रहे हम,

सोचता हूँ,

संवेदनशून्यता को,

मृत्यु कब

घोषित करेंगे हम?

?

♥ ♥ ♥ ♥

© संजय भारद्वाज  

मोबाइल– 9890122603, संजयउवाच@डाटामेल.भारत, writersanjay@gmail.com

☆☆☆☆☆

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३०० – कविता – ☆ चलो बुहारें… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “चलो बुहारें…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३०० ☆

☆ चलो बुहारें… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

☆

चलो जरा कुछ देर स्वयं के

अंतर में मुखरित हो जाएं

अपने मन को मौन सिखाएं।

*

जीवन को अभिव्यक्ति देना

शुष्क रेत में नौका खेना

दूर क्षितिज के स्वप्न सजाए

पंखहीन पिंजरे की मैना,

बधिर शब्द बौने से अक्षर

वाणी की होती सीमाएं।

अपने मन को…..

*

बिन जाने सर्वज्ञ हो गए

बिन अध्यन, मर्मज्ञ हो गए

भावशून्य, धुंधुआते अक्षर

बिन आहुति के यज्ञ हो गए,

समिधा बने, शब्द अंतस के

गीत समर्पण के तब गायें।

अपने मन को…..

*

तर्क वितर्क किये आजीवन

करता रहा जुगाली ये मन

रहे सदा अनभिज्ञ स्वयं से

पतझड़ सा यह है मन उपवन,

महक उठें महकाएं जग को

क्यों न हम बसन्त बन जाएं।

अपने मन को…..

*

कब तक भटकेंगे दर-दर को

पहचानें सांसों के स्वर को

खाली हों कल्मष कषाय से

चलो बुहारें अपने घर को

करें किवाड़ बन्द, बाहर के

फिर भीतर, एक दीप जलाएं।

अपने मन को….

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १२१ ☆ साँझ आई ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “साँझ आई”।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १२१ ☆ साँझ आई ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

साँझ आई

बाल दो बाती

नई यादों के सँग फिर

साँझ आई ।

 

धूप से जलकर

हुआ है ख़ाक मन

उम्र से कट कह रहा

फिर एक दिन

ज़मीं काई

पीट लो छाती

सुधि के आँगन में

ज़मीं काई।

 

चुरा लाई कहीं से

सन्नाटा हवा

चुप्पियों के स्वर सजे

ये क्या हुआ

एक परछाईं

विश्वासघाती

हँस रही पर्दों में

एक परछाई ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – आपबीती ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – आपबीती ? ?

मैं डुबकी लगाना

चाहता था गहरी,

सो गहरे लोगों की

संगत करने की सूझी,

फिर समय ने बताया,

अनुभव ने दोहराया,

आपबीती से पता चला था,

मैं उथला ही भला था..!

?

© संजय भारद्वाज  

प्रातः 7:20 बजे, 23 दिसंबर 2022

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी. 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १२५ ☆ सजल – तोड़कर फूल को नहीं फेंको… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “तोड़कर फूल को नहीं फेंको…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १२५ ☆

✍ सजल – तोड़कर फूल को नहीं फेंको… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

((तुकांत – आने, पदांत – में, गालगागा लगालगा  गागा, मात्रा भार – 17)

☆

क्या मिला आँख है दिखाने में

माल लगता न मुस्कराने में

 *

भूल जाओ बड़ा सरल कहना

साल लगते कई भुलाने में

 *

दाम मँहगे किसान तब मांगे

खून बहता फसल उगाने में

 *

तोड़कर फूल को नहीं फेंको

वृक्ष कितना सहा खिलाने में

 *

राह सच की कठिन मगर चलिए

साथ मत ढूढिये जमाने में

 *

आचरण नेक खींचता सबको

सज सँवर क्यों लगा रिझाने में

 *

प्यार फैला अरुण घृणा मेटो

कुछ लगे लोग बरगलाने में

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ग़ज़ल # ३२ – शब को आने का वादा किया है तूने… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – शब को आने का वादा किया है तूने…।)

✍ शब को आने का वादा किया है तूने… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

बारहा समझाईश, ख़ता होती रहे, ये मंजूर न होगा

मेरा अपना मुझे अपना न कहे, ये  मंजूर न होगा

हक़ है तुझको भी के तू मुझसे सवालात करे

पर जीस्त मेरी और तू ज़ब्त करे,  ये मंजूर न होगा

 *

वो रवादार है, बर्दाश्त कर रहा है सितम अब तक

पर ज़ुल्म की इंतेहा होती रहे, ये मंजूर न होगा

 *

मुमकिन है के पता ही न हो के मर्ज़ क्या है

पर जान कर भी तू ख़ामोश रहे, ये मंजूर न होगा

 *

तेरी हर क़ामयाबी पर ग़ुरूर है मुझको

पर शिकस्त हो और तू बिखर जाये, ये मंजूर न होगा

 *

शब को आने का वादा किया है तूने

तूने वादा बेवजह न निभाया तो, ये मंजूर न होगा

 *

मेरी कोशिश होगी ‘हेमंत’ के तल्ख़ियां न बढे

पर मैं ख़ामोश रहूं, और वो बदज़बानी करे, ये मंजूर न होगा

(बारहा = बावजूद, जीस्त = जिंदगी, ज़ब्त = नियंत्रित करना, रवादार = सहिष्णु)

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ जीवन की यह डगर…! ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  कविता ☆ जीवन की यह डगर…! ☆

जीवन की यह डगर

है अति कठिन!

है अति जटिल!

 

धीर-गंभीर सड़क सी

और

हम हैं पथिक।

जीवन के मुहावरों

की मानिन्द।

हम आये थे

बाल सुलभ निश्छलता लिये।

 

उंगली पकड़ कर चलना सीखा

कभी कुछ कम

और

कभी कुछ ज्यादा ही सीख लिया।

कुछ अनुभव से

कुछ आपसे

और

कुछ अपने आपसे।

 

सुना था

सब रोते हुये आते हैं

किन्तु,

मैं नहीं जानता

मैं कैसे आया था?

मुटठी खुली थी

या बन्द?

जब से होश संभाला

मुटठी को हमेशा  

बन्द ही पाया।

 

समेटता रहा

अच्छा या बुरा।

सही या गलत।

जो बुरा या गलत था

वापिस लौट आया

मेरे पास

मेरी बुराइयों की मानिन्द।

किन्तु,

अच्छा या सही

फैलता रहा

मेरे चारों ओर

उजाले की तरह

फिर भी

मुटठी रही बन्द

लगाती रही पैबन्द।

 

श्मशान जाने से डरता था।

इसलिये नहीं कि

आग में तपिश ज्यादा थी।

या कि-

दो गज जमीन छोटी थी।

किन्तु,

इसलिये कि

जीवन में

जो भी बातें सीखीं थी

सारी की सारी थोथी थी।

 

मैं दूर खड़ा देखता रहा

सभी नें आते जाते

ये पंक्तियां पढ़ी थी

कि-

“सोचो साथ क्या जायेगा?”

फिर भी

सबकी मुटिठयां बन्द थी।

आपकी तरह

मेरी मुटिठयां भी बन्द थी।

 

अन्त में

जीवन पथ पर

पलट कर देखता हूँ

आश्चर्य चकित

कुछ विस्मित

और

करता हूँ आकलन

क्या खोया – क्या पाया!

 

इन शब्दों के लिखते तक

कुछ साथ चले

कुछ छूट चले

कुछ टूट गये

कुछ रुठ गये

अपने पराये

भी छूट गये।

काफी पीछे,

इतने पीछे कि

स्मृतियों भी नहीं रहीं शेष

और अवशेष

मैं अकेला

चलता रहा।

चलता रहा।

जीता रहा वर्तमान में।

 

एक बिटिया ब्याह दी

एक बिटिया ब्याह लाया

अपना

सामाजिक दायित्व मानकर।

 

बस, अब

मित्रो-स्वजनों का स्नेह ही

पूंजी है मेरी।

बांध ही नहीं पा रहा हूँ  

अपनी मुटठी में

बांटना चाहता हूं सबमें

अपना दुख, अपना सुख

मुट्ठी खुली रखकर

शायद,

यही जीवन है

जीवन की डगर है।

 

मित्रों!

जीवन की यह डगर

है अति कठिन!

है अति जटिल!

 

©  हेमन्त बावनकर  

29 जून 2010

पुणे

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १२२ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २२ ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२२ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २२ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

मेरे अजीज मुझ पर तोहमत लगा गये, 

जो राजदाँ थे मेरे देकर दगा गये, 

जख्मों को सुलाया था लोरी सुना-सुना 

मरहम लगाने वाले फिर से जगा गये।

0

जो अगुआ थे अलगावों के, 

ठाठ बड़े उन नेताओं के, 

उन्हें फूल-फल रही फूट है 

जो कातिल हैं सद्भावों के।

0

चाल बदली है ताजदारों की, 

याद आयी है खाकसारों की, 

आ गया है चुनाव का मौसम 

लूटना है फसल बहारों की।

0

मैं सदा इम्तिहान से गुजरा, 

आग वाली उड़ान से गुजरा, 

जलजला, छोड़कर महल सारे 

मेरे जर्जर मकान से गुजरा।

0

विपदा से मेरी यारी है, 

ठोकर दौलत को मारी है, 

अपमानों के सुख, ठुकराये 

रखी सुरक्षित खुद्दारी है।

☆

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – संवेदनाशून्यता ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – संवेदनाशून्यता ? ?

हार्ट अटैक,

ब्रेन डेड,

मृत्यु के नये नाम

गढ़ रहे हम,

सोचता हूँ,

संवेदनशून्यता को,

मृत्यु कब

घोषित करेंगे हम?

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी. 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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