श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण गीत “पूरब से चल रहीं हवाएँ…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # १९५ – गीत – पूरब से चल रहीं हवाएँ… ☆
(राधेश्याम छंद)
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पूरब से चल रहीं हवाएँ।
दीप्तिमान हो गईं दिशाएँ।।
कहलाएँ सोने की चिड़िया ।
फसलें खुशियों की लहराएँ।।
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हर आँखों के आँसू पौंछें।
भारत के ध्वज को फहराएँ…
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दुनिया भर के बने चहेते।
अंतरिक्ष की सैर कराते ।।
कीर्तिमान कर बढ़ते जाते।
सूर्य चाँद पर कदम बढ़ाते।।
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दिशा दिखाएँ मानवता की ।
सबको उन्नति राह सुझाएँ…
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क्षमताओं में कब हैं पीछे।
महाशक्तियों से हम आगे।।
जाग उठे हैं भारत वासी।
अब प्रगति के बुनेंगे धागे।।
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बनीं पाँचवीं अर्थ व्यवस्था।
विश्व गुरू बन राह दिखाएँ…
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दुश्मन सीमा पर है छलता।
करता नित प्रति कारिस्तानी।।
समझाने पर नहीं समझता।
कैसा है वह पाकिस्तानी।
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मेघ गर्जना करते देखो।
अरि-मर्दन को भुजा उठाएँ….
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दुनिया में बदनाम रहा है।
चीन हमारा बना पड़ोसी।।
करे हमेशा सीनाजोरी।
धरा हड़पने का है दोषी।।
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बहिष्कार हो सामानों का।
उसकी आर्थिक शक्ति ढहाएँ…
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विश्व पटल पर मान बढ़ा है।
सम्मानों का ताज गढ़ा है।।
नहीं युद्ध यह धरा बुद्ध की।
राम राज्य का पाठ पढ़ा है।।
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हिलमिल कर सबको है रहना।
सारे जग को हमीं लुभाएँ…
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© मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
30/8/24
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