हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १४ ☆ गीत – जीवन ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  गीत – जीवन।)

☆ मंजिरी साहित्य # १४ ☆

? गीत – जीवन ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

जीवन को अनमोल बनाओ l

संघर्षो से मत घबराओ ll

*

बधाओं से पार निकलना l

सतत वेग से आगे चलना ll

हसते और हँसाते जाओ l

संघर्षो से मत घबराओ ll

*

सुख दुःख पथ के अविरल राहीl

कर्म बनेंगे मंजिल चाही ll

नित सोपान चढ़ते जाओ l

संघर्षो से मत घबराओ ll

*

असत्य राह त्याग कर जाएं l

मन को सुख की राह दिखाएंll

जीवन बगिया तुम महकाओ l

संघर्षो से मत घबराओ ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २८ – कविता – प्रेरणा… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘प्रेरणा।)

☆ शशि साहित्य # २८ ☆

? कविता – प्रेरणा…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

कोई हमको याद करे,

क्यों बने मोहताज…

यादों में बस जाएं,

ऐसे रखें जज्बात…

कदमों के निशां ढूंढ़ें,

बनें सहज सुजान…

कर्मों से रौशन करें,

बन जाएं वो मशाल…

मेहनत की जयकार हो,

रचना है यह इतिहास…

प्रयास ये, कि संग सबका हो विकास…

नहीं थमना, नहीं रुकना अब,

समय मिलता है अल्प…

बने सबकी मुस्कान का कारण,

लेना है यह संकल्प…

स्वार्थ त्याग से ही होता है,

वंदित, जग में नाम,

यादों में बस जाएं,

बस… करना है ऐसे काम…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ सिर्फ पहली बार…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – सिर्फ पहली बार…!

☆ ॥ कविता॥ सिर्फ पहली बार…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

सिर्फ पहली बार

गलती से गलत रास्ते पर

आगे बढ़ने का

निर्णय भर करने की देरी है।

 

फिर तो आप बिना

परिश्रम-प्रयास के

नाले के पानी की मानिंद

रसातल की ओर

स्वतः लुढ़कते चले जाएँगे।

 

पर ऊपर शिखर पर

चढ़ने के लिए पँजे की पकड़,

साँसों पर नियंत्रण

और पसीना बहाना पड़ता है।

 

वस्तुतः मानव का

मन और बुद्धि मिलकर

रसातल की गहराई और

शिखर की ऊँचाई-सी

अनबूझ पहेली को गढ़ते हैं।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२४) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२४) ? ?

शोर से सख़्त चिढ़ है,

वह चुप्पी चाहता है,

फिर देखकर मरघट,

बस्ती को चला आता है!

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 10:28 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०० ☆ बाल कविता – इल्लम इल्ली , म्याऊँ – बिल्ली… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०० ☆ 

☆ बाल कविता – इल्लम इल्ली , म्याऊँ – बिल्ली ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

इल्लम – इल्ली , म्याऊँ – बिल्ली।

भागी – दौड़ी पहुँची दिल्ली।।

 *

दिल्ली में था चूहा मोटा।

हाथ न आया पहुँचा कोटा।।

 *

कोटा में फिर करी पढ़ाई।

वहाँ गई बिल्ली की ताई।

 *

ताई को कुत्ते दौड़ाते।

चढ़ी पेड़ पर पकड़ न पाते।।

 *

पेड़ पे थे बड़के लंगूर।

पूँछ लगीं पहुँची मैसूर।।

 *

चूहों ने बिल्ली दौड़ाई।

लौट के बुद्धू घर को आई।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४९ ☆ जनगणमन की व्यथा ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆ —

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “इंतज़ार” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४९ ☆

जनगणमन की व्यथा ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

होना क्या है

किसे पता है

शेष कुशल है यही कथा है।

 

लाँघ गए चौखट

अतीत की

बजती कोई धुन

सुगीत की

करना क्या है

किसे पता है

जनगण मन की यही व्यथा है ।

 

वर्तमान पीड़ित

उलझन से

राह निकलती है

करमन से

दुविधा क्या है

किसे पता है

अकर्मण्यता बनी प्रथा है ।

 

उग आए जंगल

आँखों में

सिमटे सपने सब

पाँखों में

उड़ना क्या है

किसे पता है

गंतव्यों की आत्मकथा है ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(१४.८.२५)

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५६ ☆ तबाही रोकिए अब… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “तबाही रोकिए अब“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५६ ☆

✍ तबाही रोकिए अब… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

मिले है ज़ख़्म मुझको इश्क़ में अक्सर ही फूलों से

गिला कोई नहीं दिल में मुझे अपने रक़ीबों से

 *

पिलालो दूध कितना दोसती होती न सापों से

विवशता से नहीं रिश्ते सँवरते भावनाओं से

 *

ग़ज़ल कोई मुक़म्मल दोस्त आसानी से कब होती

कुरेदो ज़ख़्म दिल के सब्ज़ करने आप शूलों से

 *

बुरे अच्छे करो जो काम रखता वो अलग खाते

न पीछा छूटता इंसान का करता जो पापों से

 *

विसात इंसान की क्या है सितम करना नहीं इन पर

पिघल जाता है लोहा मुफ़लिसों की  निकली आहों से

 *

नबाजे हमको जो क़ुदरत अकड़ को छोड़ देना है

सबक ये सींख लें हम भी झुकी फलदार डालों से

 *

निजी कामों को करने सिर्फ़ ये  हमने नहीं पाईं

उठाएं गिर गए है जो ख़ुदा की बख्शी बाहों से

 *

तबाही रोकिए अब युद्ध  घातक मोड़ पर पहुँचा

जमीं को पाट देगे आप क्या लोगों की लाशों से

 *

बड़ा है दोगला गिरगिट से अपने रंग ये बदले

नहीं अनजान रहना है अरुण दुश्मन की चालों से

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२३) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२३) ? ?

मेरी चुप्पी का

जवाब पूछने आया था वह,

मेरी चुप्पी का

एन्सायक्लोपीडिया देखकर

चुप हो गया वह!

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 9:45 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “मुझे कुछ कहना है” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – मुझे कुछ कहना है… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मुझे तेज़ उजाले से बहुत ख़ौफ़ रहा है

ये आंखें चौधिंया कर

बड़ा खेल, खेल जाते हैं

अंधेरे में सरक कर आती धीमी रोशनी

 हालात को संभालने का अवसर देती है

यही आरोहण दिल मोह लेता है

मुझे इसका दर्शन पसंद है

अंधेरे और धीमी रोशनी

जीवन को समझने का धैर्य देती है

अंधेरे में पलकर

शनैः शनैः विकसित हुए पौधे भी

कभी आसमानी ऊंचाईयां छू लेते हैं

तेज उजालो ,मुझे नहीं चाहिए

सत्य को छिटकती तुम्हारी तीव्रता

मुझे आहिस्ता आहिस्ता

ज़िंदगी जीने का सलीका सीखने दो

तुम अपनी दिशाओं को उस ओर मोड़ दो

जिन्हें एक घूंट में तृप्ति की लालसा हो

बस तुम उधर रुख़ कर लो

तुम उधर का रुख कर लो…!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६० – आवारगी में गुजारे दिन… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक रचना  – आवारगी में गुजारे दिन।)

☆ हेमंत साहित्य # ६० ☆

✍ आवारगी में गुजारे दिन… ☆ श्री हेमंत तारे  

उधर चश्म पूरनम हुई तो बादल याद आ गये

इधर आँख खुली तो वो हसीं पैकर याद आ गये

माना के गुजरा वक्त कभी लौट आता नहीं

मगर उन संग जो गाये वो तराने याद आ गये

 *

बारिश मौसम तो है, सुकूँ भी है यार

बेवजह ही सही, वो ख़मदार – गैसू याद आ गये

 *

ये मिट्टी की महक औ बून्दो की छमाछम

इक छाते तले तै किये फ़ासिले याद आ गये

 *

देखा उस बेफिक्र को सिगरेट जलाते 

तो आवारगी में गुजारे दिन याद आ गये

 *

मुन्तजिर हूँ “हेमंत” सियाह अब्र बरसते रहे

वो आवारगी में गुजारे जमाने याद आ गये

पैकर = चेहरे, ख़मदार- गैसू = घुंघराले बाल

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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