हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १५७ ☆ ओ! बादल ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “ओ! बादल” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५७ ☆

☆ ओ! बादल ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

घिरो नहीं

तुम गिरो ओ!बादल

धरती प्यासी।

अभी-अभी

बस एक छटा

दिखलाकर रूठे

घुमड़े जब

घुँघराले बन

पर निकले झूठे

बनो बूँद

फिर झरो ओ!बादल

नदिया प्यासी।

खड़ी लहर

पंथ निहारे

घाट पड़े सूने

नाव बँधी

रेतीले मन

दुख लगते दूने

पीर कृषक

की हरो ओ!बादल

खेती प्यासी।

दुखिया जग

छप्पर छानी

प्यास नहीं बुझती

आँगन में

है धूप खिली

चिड़िया तन चुगती

अब तो तुम

कुछ करो ओ! बादल

माटी प्यासी।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

१२.७.२६

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मतलबी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – मतलबी ? ?

शहर के शहर

लिख देगा मेरे नाम

जानता हूँ…..,

मतलबी है,

संभाले रखेगा गाँव तमाम

जानता हूँ….!

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १६४ ☆ अपने बूते पार करना ज़ीस्त का सागर है अब… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “अपने बूते पार करना ज़ीस्त का सागर है अब“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६४ ☆

✍ अपने बूते पार करना ज़ीस्त का सागर है अब… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

इस खिज़ां के दौर में दहशत में हर इक़ फूल है

उठ रहे हर सू बबंडर उड़ती शक़ की धूल है

 *

आइना जिसको जरूरी देखना है शख़्स वो

हर किसी को आइना दिखलाने में मशगूल है

 *

मुफ्त बँटती रेबड़ी कुछ को वही कुछ के लिए

आ गया सतयुग कफ़न पर लग रहा महसूल है

 *

राहबर से रहबरी की बैठे जो उम्मीद में

राहबर से आपका उम्मीद करना भूल है

 *

अपने बूते पार करना ज़ीस्त का सागर है अब

वालिदैन अपने निकाले घर के जो मस्तूल है

 *

मुँह मियां मिठ्ठू न बनिये और बोले बात है

है गलत फहमी ये तुमको कि बड़ा मक़बूल है

 *

घर के आंगन की ये बुलबुल एक दिन करनी विदा

रोक सकते इसको कैसे सदियों की मामूल है

 *

गाल दूजा सामने करने का है कब दौर अब

हाथ जो उठ्ठा उसे अब तोबना माकूल है

 *

हर मुख़ालिफ़ पार्टी की ये रिवायत कब नई

काम को सरकार के देना अरुण बस तूल है

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६८ – चलते रहने का हुनर… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – चलते रहने का हुनर।)

☆ हेमंत साहित्य # ६८ ☆

✍ चलते रहने का हुनर… ☆ श्री हेमंत तारे  

लाज़िमी है कि चलते रहें,

हाथ-पाँव हिलाते रहें—

आख़िर ठहरा हुआ पानी

कब तक अपना आसमान सँभालता है?

 

कुछ न हो,

तो घर की चारदीवारी में ही

क़दमों की आहट बचाए रखें।

सोफ़ा, दीवान, बिस्तर—

ये सब अपने हैं,

मगर हर बार

इनकी बाँहों में सिमट जाना

भी तो ठीक नहीं।

 

माना, अब तन

साँझ की ढलती धूप-सा

कुछ अधिक ठहरना चाहता है।

उसकी थकान में

उम्र की सच्चाई है,

उसकी माँग में

कुछ भी ग़लत नहीं।

 

पर हर साँझ को

रात के हवाले कर देना

कहाँ की समझदारी है?

 

तन की सुनिए,

मगर उसकी हर ज़िद पर

अपनी राह मत बदल दीजिए।

क्योंकि आराम की चादर

कभी-कभी इतनी मुलायम होती है

कि उसके नीचे

चलने की आदत सो जाती है।

 

और फिर—

बिस्तर बुलाता नहीं,

खींचने लगता है।

 

इसलिए अभी

क़दमों में थोड़ी-सी धूप रहने दें,

आँगन में कुछ रास्ते बचाए रखें,

देह को पूरी तरह

साँझ न होने दें।

 

सत्तर-बाहत्तर की इस उम्र में

मंज़िल का सवाल नहीं—

बस इतना काफ़ी है

कि रास्ता पैरों के नीचे

बना रहे।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १५९ – बुन्देली कविता – ”दुख से खीब चिन्हारी कर लइ” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – बे गुस्सा सें हेरत जा रय।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५९ ☆

☆  बुन्देली कविता – दुख से खीब चिन्हारी कर लइ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

दुख से खीब चिन्हारी कर लइ

जीवन भर की यारी कर लइ

बातन फूल झराये हमने

उनने जीभ कटारी कर लइ

 *

भीख माँगबे के दिन आ गये

वर्षों मालगुजारी कर लइ

 *

राजनीति भड़ सोन मछरिया

नेता बन मछुआरी कर लइ

 *

मुंहड़े में करोंच दिख रइ है

दौलत कट्टी कारी कर लइ

 *

दांत कटी रोटी रइ, ऊने

बखत परे घरदारी कर लइ

 *

बासन भांडे तक बिक रय हैं

भगवत’ खीब उधारी कर लइ

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अनुराग… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अनुराग? ?

तुम,

मेरे इर्द-गिर्द रहती हो,

सर्वदा, हर क्षण

आसपास अनुभव होती हो,

सुनो प्रिये,

किसी संकेत की आवश्यकता नहीं,

ना कभी दरवाज़ा खटखटाना,

जब मन चाहे, दौड़ी चली आना,

मुझे अनुरक्त पाओगी,

सदैव प्रतीक्षारत पाओगी,

जैसे हवा में होती है प्राणवायु,

नमी में बहता है जल,

घर्षण में बसती है आग,

ध्वनि में सिमटता है आकाश,

देह में माटी तत्व भरा होता है,

स्थूल में सूक्ष्म विचरता है,

वैसे ही हर श्वास में

नि:श्वास बनकर रहती हो तुम,

एक बात बताओ-

अपनी होकर भी,

इतनी डरी सहमी

दबे पाँव क्यों आती हो तुम?

केवल एक बार

नेह प्रकट करोगी तुम,

पर मैं बाहें फैलाकर खड़ा हूँ,

आजीवन तुम पर रीझा हूँ,

जब कभी हमारा मिलन होगा,

यह वचन रहा-

मुझ में समाकर

जी उठोगी तुम,

उस रोज़ सृष्टि में

जन्म लेगी सातवीं ऋतु…,

तुम मुझे

सुन रही हो न मृत्यु..!

?

© संजय भारद्वाज   

प्रातः 7:35 बजे,  24 अगस्त 2024

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

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🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

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मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २३१ – रिश्तों की डोरी फिर टूटी…. ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – रिश्तों की डोरी फिर टूटी….। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३१ ☆

☆  रिश्तों की डोरी फिर टूटी…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

रिश्तों की डोरी फिर टूटी।

समझो अपनी किस्मत फूटी।।

*

सामाजिक प्राणी है मानव।

अपने परिवारों की खूटी।।

*

नेताओं की बात न पूछो।

धन दौलत जमकर है लूटी।।

*

दर्द विनाशक हैं सदियों से।

आयुर्वेद की जड़ी-बूटी।।

*

मानव रहा अकेले घर में।

आँगन कौदों-कुटकी कूटी।।

*

प्लेटफार्म पर मैं भी पहुँचा।

देख रहा था गाड़ी छूटी।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९८ – प्रायमरी का मास्टर…३ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  प्रायमरी का मास्टर…३।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९८ ☆

☆ –  प्रायमरी का मास्टर…३ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

शायद आप कहें-

क्या मास्टरों ने तुझे

वकील किया है ?’

जी माई बाप

न तो मैं वकालत पढ़ा हूँ और

न किसी ने मुझे वकील किया है

मैं मास्टर हूँ, मैंने खुद फील

किया है

 

लेकिन क्या कहें अपने राज को ?

क्या कुछ भी नहीं सूझता

इस बीसवीं सदी के सभ्य समाज को?

 

यह ठीक है कि हम दोषी ठहरा सकते हैं

ब्रिटिश राज को।

अब तो अपना ही राज है

जनता ही राजा है

तो ये वक्त का तकाजा है

कि समय रहते चेतना चाहिये

अपने शासन को,

कि राष्ट्र का निर्मातातरसता न रहे

दवा वस्त्र या राशन को।

कि अपनी सरकार करेगी कुछ विचार

मगर इसी संदर्भ में

एक कड़ी बात याद आती है-

कि भरोसे की भैंस 

वैसे तो मुझे है भरोसा

अक्सर

पड़ा ही ब्याती है। इसलिये

समाज से भी कुछ कहना।

मेरा फर्ज है।

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९५ – “उनकी छत पर कडी धूप…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत उनकी छत पर कडी धूप...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९५ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “उनकी छत पर कडी धूप...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

उनकी छत पर खड़ी धूप

जो उड़ती रहती है ।

जो उड उड कर अपने उजले

पंख बदलती है ॥

 

उड़ना तो वह रही चाहती

अमवा के ऊपर ।

उतर नदी की गहराई में

आ जाती भू पर ।

 

उनकी छत पर बड़ी धूप

कुछ गोलाई लेकर –

अपनी छाती पर उभारती

हुई मचलती है ॥

 

तनिक देर में खड़ी पहाड़ी

चढ़ जाया करती ।

और मुस्कराते वन प्रांतर को

भाया करती ।

 

उनकी छत पर कडी धूप

जो तपती रहती है –

पसरी हुई मौन लगती है

माला जपती है ॥

 

पास पहाडी झील लाल

होती होती लगती ।

माथे की ठहरी कुमकुम

जैसे बहती लगती ।

 

उनकी छत पर कड़ी धूप

कुछ ठंडी लगती है –

जो धीमे धीमें प्राणों में

ढलती लगती है ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

02 -08 -2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – पता नहीं…  ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – पता नहीं? ?

दृश्य बदल रहा है या

दृष्टिकोण बदल रहा है

पता नहीं…,

आशंका में संभावना गढ़ने वाला

संभावना में आशंका पढ़ रहा है,

यह अवसाद की वृद्धि है

या अनुभव की समृद्धि है,

पता नहीं…!

?

© संजय भारद्वाज   

22.8.18, प्रातः 9:35 बजे।

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

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मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

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