हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३१६ – कविता – ☆ बिना हँसे रोये क्या पाया… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता टेम पब्लिसिटी का भैये” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३१६ 

☆ बिना हँसे रोये क्या पाया… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

जिनमें संवेदना नहीं,

वे कैसे रोयेगे

ओढ लबादे, ‘व्यर्थ सोच’ के

कैसे सोएंगे।

 

चेहरों पर जिनके

मुस्कान नहीं

सहज सरलता से

पहचान नहीं

जो गंभीर मुखौटे

ओछे बैठे हैं

प्रमुदित रहने का

है ज्ञान नहीं

शंकित मन जीवन में

कैसे खुशियाँ बोयेंगे…

 

जो न प्रकृति से

हँसना सीखे हैं

जो, जो भर

रोने से रोते हैं

हंसी-रुदन तो

जीवन के वरदान है

सुख-दुख बिन

जग के रस फीके हैं

बिना हँसे-रोए

क्या पाया है

जो खोएंगे…

 

है बसंत तो,

पतझड़ भी आएगा

दिवस बाद

अँधियारा भी छाएगा

मोर और संध्या में

जैसी समरसता है

हर्ष-शोक भी जीवन में

क्षमता लाएगा

सहज बनेंगे तब आंसू

तन मन को धोएंगे।….

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १३७ ☆ मज़दूर ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “क्यों?” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १३७ ☆ मज़दूर ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

शहर के हर चौराहे पर

आज भी इकट्ठे होते हैं लोग

काम की तलाश में

कहीं भटकते नहीं है

बस खड़े रहते है

इस आस में कि कोई ज़रूरतमंद

आकर उन्हें ले जाएगा

अपने साथ लेकर चलते हैं

दिन भर का भोजन पानी

जैसे-जैसे दिन ऊपर चढ़ता है

उनकी आस उसी तरह

कम होती जाती है

सर्वहारा वर्ग आज भी

आशाओं और व्यवस्था के बीच

झूलता लटकता अपना और

अपने परिवार का बोझ ढोता

ज़िंदा है इस कायनात में

इन असंगठित लोगों के लिए

सरकारों की प्रतिबद्धता

सिमट कर रह जाती है सिर्फ़ काग़ज़ों में

जो शायद ही कोई

साकार रूप ले पाती है

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – डस्टबिन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – डस्टबिन ? ?

क्रोध, आक्रोश

प्रेम, आवेश

भय, चिंता

पौरुष के सारे प्रवाहों का

‘डस्टबिन’ होती है औरत,

स्त्री विमर्शकों का

मंथन जारी था..,

असहाय होता है डस्टबिन

एकत्रित करता है कूड़ा

और दुर्गंध से सना रह जाता है,

सुनो-

विमर्शक नहीं हूँ मैं

किंतु

चिंतन में उठती हैं लहरें

माटी सोखती है

सारा चुका हुआ

सारा हारा हुआ,

माटी देती है

हर बीज को

अपनी उष्मा

अपना पोषण,

बीज उल्टा पड़ा हो या सीधा

टेढ़ा या मेढ़ा

आम का हो

या बबूल का,

सारे विमर्शों से परे

माटी अँकुआती है जीवन

धरती को करती है हरा

धरती को रखती है हरा

हरापन-

प्राणवान होने का प्रमाण है,

माटी फूँकती है प्राण

मित्रो!

स्त्री माटी होती है

और दुनिया के

किसी भी शब्दकोश में

माटी का अर्थ

‘डस्टबिन’ नहीं होता।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ वक्त बड़ा निष्ठुर है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण एवं विचारणीय कविता – वक्त बड़ा निष्ठुर है…!

☆ ॥ कविता॥ वक्त बड़ा निष्ठुर है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

राजा- रंक नहीं किसी की,

अनुनय-  विनय  सुनता है।

हरदम  ताने-बाने बुनता है,

ये  वक्त  बड़ा ही निष्ठुर है…!

कब  किसको  भूप बनाए,

कब  किसकी बैंड बजाए।

कैसे- कैसे  ये रंग दिखाए,

ये वक्त  बड़ा  ही निष्ठुर है…!

कब किसको सिर बिठाए,

कब किसको नाच नचाए।

कब  किसकी वाट लगाए,

ये  वक्त  बड़ा ही निष्ठुर है…!

कब  किसके भाग्य जगाए,

कब किसको  गले लगाए।

कब किसकी नाक कटाए,

ये  वक्त  बड़ा  ही निष्ठुर है…!

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १४२ ☆ मुहब्बत का असर तो देखिए… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “मुहब्बत का असर तो देखिए “)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४२ ☆

✍ मुहब्बत का असर तो देखिए… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

जरा सी हैसियत बढ़ते ही माज़ी भूलने लगते

मगर हरकत से ये ज़रदार फौरी है बने लगते

 *

जो अपनी हैसियत से उठाते वज़्न हैं बढ़चढ़

उन्हीं के पाँव चादर से निकलकर झाँकने लगते

 *

मुहब्बत का असर तो देखिए वो दूर है मुझसे

मगर हर वक़्त आँखों के मुझे है सामने लगते

 *

जिन्होंने ज़िन्दगी की धूप में देखा नहीं तपके

यही वो लोग है जो मुश्किलों से भागने लगते

 *

बुजुर्गों की  करो इज्ज़त  तज़ुर्बों का खजाना है

मगर बूढ़ा समझ कर  लोग रुख को मोड़ने लगते

 *

उधारी प्रेम की कैची है जिसने भी कहा सच है

बिगड़ता रब्त है जब भी उधारी माँगने लगते

 *

नए इस दौर के मुंसिफ अना का पास भूले है

नहीं दोगे जो नज़राना ये पेशी टालने लगते

 *

भले दुश्मन है ऐसे दोस्त से जो घात में रहकर

गले मिलते ही  देखा है की गर्दन नापने लगते

 *

भलाई का अरुण अंजाम दुनिया में यही देखा

मसीहा जो बना उसमें ही कीलें ठोकने लगते

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ४७ – प्रारब्ध… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – प्रारब्ध।)

✍ प्रारब्ध… ☆ श्री हेमंत तारे  

कभी-कभी,

जीत कर भी,

विजेता,

होता नहीं, बहुत खुश,

क्यों कि,

पता है उसे

जीता नहीं है वो,

जीता है, प्रारब्ध उसका,

कमतर थी कूबत उसकी

अपने ही प्रतिद्वंदी से,

जो,

पराजित, कुंठित और अपमानित बैठा है

किसी ठौर ।

 

कुरूक्षेत्र में

पराजित हुआ कर्ण,

विजित हुआ अर्जुन,

प्रारब्ध था दोनो का, अपना – अपना,

अपनी – अपनी

योग्यता और कौशल्य से परे ।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४० – बुन्देली कविता – ”बे गुस्सा सें हेरत जा रय” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – बे गुस्सा सें हेरत जा रय।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४० – बुन्देली कविता – बे गुस्सा सें हेरत जा रय ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

बे गुस्सा सें हेरत जा रय

कैंसी आँख तरेरत जा रय

*

मौंड़ा ऐंसे गर्रेला हैं

बे भग रय, हम टेरत जा रय

*

एक तरफ सें लेने पर हैं

तुम तौ बिही नबेरत जा रय

*

कइयक ढुरवा बिदक जात हैं

येई सें बे घेरत जा रय

*

मैं लड़ाइ खें बरका रव हों

बे उनखें उसकेरत जा रय

*

काम-धाम नइँ करें निठल्ले

बउ-दद्दा खें पेरत जा रय

*

मोरे करे-धरे पे देखौ

‘भगवत’ पानी फेरत जा रय

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ आज सूरज को मैंने… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? कविता ?

☆ आज सूरज को मैंने… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

आज सूरज को मैंने मना कर दिया

और देखो अंधेरा घना कर दिया

 *

ठंड लगने लगी उनको बरसात से

मैंने बारिश को गुनगुना कर दिया…

 *

तेरी बाते जो दिल को जलाती रही

उन्ही बातों को ही अनसुना कर दिया

 *

प्यार के बदले में जो वफ़ा मांगली

ऐसा ना सोच हमने गुन्हा कर दिया

 *

तेरी ख़ामोशी ऐसी बला बन गयी

तुने दुश्वार मेरा जीना कर दिया

 *

कोई खंजर नहीं और तीर भी नहीं

अपने हातो से खुद को फ़ना कर दिया

 *

हरे पत्ते को पिसा ओ ज़ख़्मी हुए

उन्ही पत्तों को तुमने हिना कर दिया

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कविता.. ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – कविता.. ? ?

कुछ अश्लील-सी

उपमाएँ चुनें

कामुकता का

प्रत्यक्ष या परोक्ष

उपयोग करें,

‘मादा’देह में

नग्नता का

बघार लगाकर

रचें एवरग्रीन कविता,

लंबे समय

चर्चा में रहेगी

ये कविता;

शोध का विषय

बनेगी ये कविता,

प्रगतिशील और

नवोन्मेषवादी

कहलायेगी

ये कविता,

हो सकता है

ऐसा होता हो,

कोई बता रहा था

ऐसा ही होता है,

पर ये सब लागू है

उन पर

जिनके लिए

कमॉडिटी है कविता,

खरीद-फरोख्त

चर्चित होने की

रेमेडी है कविता,

अलबत्ता-

मैं ऐसा हरगिज़

नहीं कर सकता

पयपान को विषाक्त

नहीं कर सकता,

मेरे लिए

निष्पाप, अबोध

अनुभूति है कविता,

पवित्र संवेदना की

अभिव्यक्ति है कविता,

मेरी आराधना है कविता

मेरी साधना है कविता,

मेरी आह है कविता

मेरी माँ है कविता!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१३ – जीवन में सम्मान की ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “जीवन में सम्मान की। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१३ – जीवन में सम्मान की ☆

जीवन में सम्मान की, सबको रहती चाह।

अगर दाम है जेब में, आसाँ है तब राह।।

*

सम्मानों का है सजा, मनचाहा बाजार।

छोटा बड़ा मझोल है, बोली लगें हजार।।

*

हर आयोजक चाहता, लक्ष्मी का वरदान।

सरस्वती को तब मिले, मन चाहा सम्मान।।

*

संयोजक की चाहना, श्रोता दर्शक मंच।

संसाधन बिन शून्य है, कैसे होगा लंच।।

*

अतिथि मंच पर बैठते, पहले तो नाराज।

करतल ध्वनि जब गूँजती, मन में बजते साज।।

*

मंचों पर जो बैठते, संस्थाओं में ज्येष्ठ।

या वरिष्ठ हों आयु में, तो ही होते श्रेष्ठ।।

*

वक्ता अपने ज्ञान की, घुटी पिलाता घोल।

श्रोता सारे मौन हो, शब्द सुने अनमोल।।

*

ज्ञानवान होते वही, बोलें मधुमय बोल।

श्रोताओं की दाद से, प्रवचन दें दिल खोल।।

*

दर्शक श्रोता सामने, लेते हैं आनंद।

आपस में वे तौकबलते, खट्टा मीठा कंद।।

*

कुछ तो केवल चाहते, अच्छा खासा लंच।

तृप्ति भाव पर ही कहें, अति उत्तम है मंच।।

*

हम तो बस यह चाहते, ऐसा हो सम्मान।

स्वाभिमान सबका बचे, नैतिकता का मान।।

*

गुणवानों की कद्र हो, उनका हो गुणगान।

हम तो नहीं है चाहते, बंद करें सम्मान।।

*

लक्ष्मी माँ कुछ कृपा कर, दे ऐसा वरदान।

राह सुगमता से मिले, सबका हो कल्यान।।

*

ज्ञानी का सम्मान हो, यही रचें संसार।

स्वागत हो जयकार हो, है उत्तम सुविचार।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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