हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १४० ☆ मतलब की रेत पे रखी बुनियाद प्यार की… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “मतलब की रेत पे रखी बुनियाद प्यार की“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४० ☆

✍ मतलब की रेत पे रखी बुनियाद प्यार की… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

क्या क्या न कह गए दिले दिलगीर के लिए

कोई न भूल सकता कभी मीर के लिए

 *

गफ़लत न कीजियेगा कभी इस्तमाल में

अल्लाह ने न आँख दी शमशीर के लिए

 *

राहत जो मुफ़लिसी से दे वो दो दवा हमें

बहला रहा है रहनुमा अकसीर के लिए

 *

मतलब की रेत पे रखी बुनियाद प्यार की

पुख्ता मकाम चाहिए तामीर के लिए

 *

हिंदू व मुसलमां को चलो अब तो बख़्श दो

मौज़ू नए तलाशिये तक़रीर के लिए

 *

छाई है ज़हनो-दिल पे ज़िहालत की तीरगी

हम मुंतज़िर है ज़ीस्त में तनवीर के लिए

 *

जेहाद औ तलाक हलाला का सच है क्या

बेताब हूँ में जानने तफ़्सीर के लिए

 *

ख़ातून को भी दीजिये उड़ने को आसमां

तोड़ो हर एक रस्म की ज़ंजीर के लिए

 *

भूले मिसाल लोग भरत और राम की

भाई से भाई लड़ रहा जागीर के लिए

 *

कहते है इश्के आग सुलगती है दो तरफ़

उसपे अरुण को देखना तासीर के लिए

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ४६ – ख़ला की जानिब चल पडती है… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – ख़ला की जानिब चल पडती है  ।)

✍ ख़ला की जानिब चल पडती है… ☆ श्री हेमंत तारे  

हीना की मानिंद,  अपना वजूद खो जाने के बाद

तमाम उम्र सूरज की तपिश बर्दाश्त करने के बाद

ख़ला की जानिब चल पडती है  नामालूम शै कोई

वो रूह है, फौत होती नही दफन हो जाने के बाद

 *

बेमानी है अब रहम की बेइंतिहा बरसात जनाब

गो कि फ़रमाई है इनायत आपने पर मांगने के बाद

 *

उसका दिल टूटा,  ये हरगिज कोई गजब ही न था

खोला था दर आपने पर उसके चले जाने के बाद

 *

वो नाशुक्रा भी है  “हेमंत ” और तंग दिल इंसान भी

बहाता है अश्क बेशुमार पर जश्न ऐ बर्बादी के बाद

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५४ ☆ लघुकथा – इस्तेमाल… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “इस्तेमाल“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५४ ☆

✍ लघुकथा – इस्तेमाल… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

आदमी को आदमी

इस्तेमाल कर रहा

तरह तरह के

रिश्ते बना कर

एक दूसरे को

ठग रहा।

 

भरोसा करने वालों का

हर रोज

भरोसा टूट रहा

भरोसा तोड़ने वाला

ऐश कर रहा।

 

सत्य की खोज

करने वाला

खोज करता रहा

झूठ अपने आप में

पलता रहा।

 

ओ दुनिया बनाने वाले

सब कुछ बना कर

तुझे क्या मिल रहा

आदमी को क्यों

इस तरह

परेशान कर रहा।

 

बता दे तू भला

अक्ल देकर क्यों

अक्ल हर रहा

आदमी को क्यों

सिखाया जाल बुनना

जो बुन कर

उसी में फँस रहा।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ पिता कोई पैकेज नहीं होते… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आई आई एम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। आप सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत थे साथ ही आप विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में भी शामिल थे।)

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी ने अपने प्रवीन  ‘आफ़ताब’ उपनाम से  अप्रतिम साहित्य की रचना की है। आज प्रस्तुत है नव वर्ष पर आपकी अप्रतिम रचना “पिता कोई पैकेज नहीं होते…

? पिता कोई पैकेज नहीं होते… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆ ?

दोपहर के तीन बज रहे थे।

पुणे का श्मशान घाट धूप से झुलस रहा था।

आसमान चुप था।

धरती चुप थी।

और हवा में तैरती चंदन की गंध मानो किसी अदृश्य विदाई का संगीत बन गई थी।

एक काली चमचमाती कार आकर रुकी।

दरवाज़ा खुला।

आर्यन उतरा।

चौंतीस वर्ष।

लंदन की बहुराष्ट्रीय कंपनी में निदेशक।

विदेशी वेतन।

डॉलर में पैकेज।

कंधे पर महँगा लैपटॉप बैग।

कान में ब्लूटूथ।

कलाई पर ऐसी घड़ी, जिसकी कीमत उसके पिता की पूरे वर्ष की पेंशन से अधिक थी।

उसने घड़ी देखी।

तीन बजकर पाँच मिनट।

रात नौ बजे की फ्लाइट थी।

कल बोर्ड मीटिंग।

वह तेज़ कदमों से भीतर आया।

सब व्यवस्था हो चुकी थी।

लकड़ियाँ सजी थीं।

पंडित मंत्रों के पन्ने उलट रहे थे।

और सफेद कपड़े में लिपटा एक शांत शरीर पड़ा था।

वसंतराव।

अठहत्तर वर्ष।

पिता।

आर्यन कुछ पल ठिठका।

चेहरे पर झुर्रियाँ थीं, पर वही करुण मुस्कान अब भी अटकी थी।

वही चेहरा — जो कभी देर रात तक दरवाज़े पर बैठा उसका इंतज़ार करता था।

वही हाथ — जिन्होंने गिरते समय उसे उठाया था।

एक आँसू निकला।

उसने तुरंत पोंछ दिया।

गला साफ किया।

“सब जल्दी हो जाएगा ना? मेरी फ्लाइट है। कल बहुत ज़रूरी प्रेज़ेंटेशन है। प्लीज़ समय पर करा दीजिए।”

पास खड़े अनिरुद्ध ने उसकी ओर देखा।

वे अंतिम संस्कार की व्यवस्था करने वाली संस्था से थे।

उनकी आँखों में प्रश्न था —

क्या पिता के लिए भी समय स्लॉट तय होता है?

पर उन्होंने कुछ नहीं कहा।

मंत्र शुरू हुए।

घंटी बजी।

आर्यन सब करता रहा — जैसे किसी प्रोजेक्ट की प्रक्रिया पूरी कर रहा हो।

बीच-बीच में घड़ी देखता रहा।

फिर वह क्षण आया।

उसने अग्नि दी।

लपटें उठीं।

धीरे-धीरे ऊँची होने लगीं।

धुआँ ऊपर उठा —

जैसे वर्षों का परिश्रम, त्याग, भूख, चिंता और अनकहे सपने आकाश में विलीन हो रहे हों।

कुछ देर बाद आर्यन ने वॉलेट निकाला।

“कितना बिल है? अस्थि-विसर्जन भी आप करवा दीजिए। मैं दोबारा नहीं आ पाऊँगा। जितना भी है, अभी ट्रांसफर कर देता हूँ।”

अनिरुद्ध शांत स्वर में बोले —

“आपका बिल पहले ही जमा है।”

आर्यन ठिठका।

“किसने किया?”

“सात वर्ष पहले आपके पिता स्वयं आए थे। तब चल भी मुश्किल से पाते थे।

उन्होंने पूछा था —

‘सब व्यवस्था ठीक रहेगी न? मेरे बेटे को कोई परेशानी न हो।’

उसी दिन उन्होंने अग्रिम भुगतान कर दिया।

और यह पत्र छोड़ गए थे।”

लिफाफा उसके हाथ में था।

हाथ काँप रहे थे।

उसने पत्र खोला।

प्रिय आर्यन,

मुझे पता है तुम बहुत व्यस्त हो।

तुम्हारी दुनिया बड़ी है।

मीटिंग, लक्ष्य, प्रस्तुति, यात्राएँ।

मेरी खबर सुनकर तुम्हें सबसे पहले छुट्टी और टिकट की चिंता होगी।

और बेटा, यह स्वाभाविक है।

मैंने तुम्हें इसलिए पढ़ाया था कि तुम आगे बढ़ो।

तुम्हारी उड़ान मेरे सपनों की ऊँचाई है।

एक बूढ़े शरीर के कारण अपने काम में बाधा मत आने देना।

इसलिए मैंने सब पहले ही कर दिया है।

यदि आ सको तो अच्छा।

न आ सको तो भी कोई शिकायत नहीं।

बस एक छोटी सी बात —

जब तुम छोटे थे और सड़क पार करते थे,

मैं तुम्हारा हाथ कसकर पकड़ता था।

आज जब तुम मुझे अग्नि दो,

तो तुम्हारा हाथ ढीला न पड़े।

और हाँ —

जल्दी लौट जाना।

तुम्हारी मीटिंग छूटनी नहीं चाहिए।

तुम्हारा

बाबा

पत्र समाप्त हुआ।

आर्यन के हाथ से वॉलेट गिर पड़ा।

राख में धँस गया।

पर उससे कहीं गहरा कुछ और धँस चुका था —

उसका अभिमान।

उसकी उपलब्धियाँ।

उसकी तथाकथित सफलता।

वह वहीं घुटनों के बल बैठ गया।

“बाबा…!

मैं कमाता रहा…

और आप मेरे लिए मरने तक की तैयारी करते रहे…!”

उसकी आवाज़ फट गई।

“मैंने आपके लिए समय नहीं निकाला…

और आपने मेरी सुविधा के लिए अपनी मृत्यु तक नियोजित कर दी?”

लपटें तेज़ हो उठीं।

मानो उत्तर दे रही हों।

उस रात आर्यन ने फ्लाइट रद्द कर दी।

मीटिंग छूट गई।

फोन बंद कर दिया।

वह पूरी रात वहीं बैठा रहा —

जलती चिता के सामने।

पहली बार उसने घड़ी नहीं देखी।

क्योंकि समय अब उससे छूट चुका था।

उसे समझ में आया —

सुविधाएँ प्रीपेड हो सकती हैं।

बीमा पॉलिसी प्रीपेड हो सकती है।

अंतिम संस्कार की व्यवस्था भी प्रीपेड हो सकती है।

पर पिता का प्रेम कभी प्रीपेड नहीं होता।

वह उधार नहीं होता।

वह अनुबंध नहीं होता।

वह पैकेज नहीं होता।

वह अनंत होता है।

निःस्वार्थ होता है।

अपरिमेय होता है।

संस्था चिता सजा सकती है।

अस्थियाँ बहा सकती है।

पर जो हाथ बचपन में थामे गए थे —

उनका मूल्य कोई नहीं चुका सकता।

और जब संतानों की संवेदना सूख जाती है,

तब वे सफल तो रह जाते हैं —

पर पुत्र नहीं रह पाते।

पिता सचमुच

कोई पैकेज नहीं होते…!

~ प्रवीन रघुवंशी ‘आफताब’

© कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

पुणे

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १३८ – बुन्देली कविता – “नौके बेइ वकील भये हैं” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – नौके बेइ वकील भये हैं।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १३८ – बुन्देली कविता – “नौके बेइ वकील भये हैं” – ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

नौके बेइ वकील भये हैं

कइ नोट्स तामील भये हैं

*

बढ़तड़ जा रइ है आबादी

बड़े गाँव तैसील भये हैं

*

पैलउँ बड़ी दॉँतकाटी रइ

अंतर बीसों मील भये हैं

*

ओके घर में छापा पर गव

घर-दफ्तर सब सील भये हैं

*

हिलबिलान हो गये कहाँ पै

गायब सारे चील भये हैं

*

रय जंगल में ठौर-ठिकाने

भटकन बारे भील भये हैं

*

‘भगवत’ पोल खुलत जा  रइ है

मनो फिलम की रील भये हैं

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – जादू ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – जादू ? ?

तपता मरुस्थल,

निर्वसन धरती,

सूखा कंठ,

झुलसा चेहरा,

चिपचिपा बदन,

जलते कदम,

दूर-दूर तक

शुष्क और

बंजर वातावरण,

अकस्मात

मेरी बिटिया हँस पड़ी,

अब लबालब

पहाड़ी झरने हैं,

आकंठ तृप्ति है,

कस्तूरी-सा महकता तन है,

तलवों में जड़ी मखमल है,

उर्वरा हर रजकण है,

चहुँ ओर श्रावण है..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 21 दिवसीय आशुतोष साधना रविवार दि. 8 फरवरी से शनिवार 28 फरवरी तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ भी करेंगे 💥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

💥 मालाजप शिव पंचाक्षर स्तोत्र के साथ आत्मपरिष्कार एवं मौन-साधना भी नियमित रूप से चलेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २११ – नारी तेरी अजब कहानी ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “नारी तेरी अजब कहानी। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २११ – नारी तेरी अजब कहानी ☆

नारी तेरी अजब कहानी,

आँचल से तो दूध पिलाती,

पर आँखों से बहता पानी।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

बचपन में तो उछल कूदती,

घर आँगन में दौड़ लगाती।

देहरी के बाहर जाते ही-

अविरल आँसू रोज बहाती।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

अगनी में जब चाहे जलती,

तेजाबों से रोज नहाती।

सदियों से तू भोग रही है,

प्रतिक्षण हिंसक नई कहानी।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

अग्नि परीक्षा देते देते,

सदियाँ बीत गयी हैं तुझको।

अंगारों पर फिर भी चलती,

अपने मुख से उफ् न करती।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

हर समाज है शोषण करता,

अधिकारों से वंचित रखता।

कर्तव्यों का पाठ बताकर,

तोते सा पिंजड़े में रखता।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

धर्म के आगे तू हलाल है,

मानवता भी शर्मसार है।

आजादी अभिव्यक्ति नाम पर,

अब भी बुर्कों में जकड़ी है।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

कुछ बोला तो तीन शब्द में,

जब चाहे बनवास घड़ी है।

परिवर्तन की हर आँधी से

कब से कोसों दूर खड़ी है।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

चीर हरण अब भी होते हैं,

भीष्म द्रोण दुबके बैठे हैं।

भोग्या बनकर भोग रही है,

आदम युग से वही कहानी।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

आँचल से तो दूध पिलाती,

पर आँखों से बहता पानी।

नारी तेरी अजब कहानी…

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७३ – पहचान ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – पहचान।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७३ – पहचान ✍

(काव्य संग्रहशब्द नहीं रहे शब्द से )

मुझे भी आता है जोर से बोलना

मैं भी दे सकता हूँ

चुभता हुआ जवाब,

मुझे भी याद हैं गालियाँ

मैं भी तोड़ सकता हूँ

किसी के हाथ-पाँव

मैं भी सन्ना सकता हूँ पत्थर ।

मगर मैं

यह सब नहीं करता

करूँगा भी नहीं,

बात सिर्फ इतनी सी है

कि मैं

अपनी पहचान नहीं खोना चाहता।

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७२ – “ऋतु का संसार…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत ऋतु का संसार...”.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७२ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “ऋतु का संसार...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

(पैंतीस वर्ष पहले का नवगीत)

यह शीतल –

फरवरी ।

 

काँटों से घर –

आँगन झार ।

टाँक रही

ऋतु का संसार ।

 

फिर –

संगेमरमरी ॥

 

भीगी साँसों

का अहसास ।

पढ़ता हो जैसे

मधुमास –

 

आईने –

अकबरी ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

16-02-2026 

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चिरंजीव ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चिरंजीव ? ?

लपेटा जा रहा है

कच्चा सूत

पुराने बरगद के

चारों ओर..,

आयु बढ़ाने की

मनौती से बनी

यह रक्षापंक्ति

अपनी सदाहरी

सफलता की गाथा

सप्रमाण कहती आई है,

कच्चे धागों से बनी

सुहागिन वैक्सिन

अनंतकाल से

बरगदों को

चिरंजीव रखती आई है!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 21 दिवसीय आशुतोष साधना रविवार दि. 8 फरवरी से शनिवार 28 फरवरी तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ भी करेंगे 💥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

💥 मालाजप शिव पंचाक्षर स्तोत्र के साथ आत्मपरिष्कार एवं मौन-साधना भी नियमित रूप से चलेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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