हिन्दी साहित्य – कविता ☆ विश्व कविता दिवस विशेष – मैं मंच का नहीं, मन का कवि हूँ! ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  विश्व कविता दिवस विशेष – मैं मंच का नहीं, मन का कवि हूँ! ☆

जी हाँ!

मैं स्वांतः सुखाय ही लिखता हूँ।

 

जब अन्तर्मन में कुछ शब्द बिखरते हैं

जब हृदय में कुछ उद्गार बिलखते हैं

 

तब जैसे

शान्त जल-सतह को

कंकड़ तरंगित करते हैं।

तब वैसे  

शब्द अन्तर्मन को स्पंदित करते हैं।

 

बस

कोई घटना ही काफी है।

बच्चे का जन्म

बच्चे की किलकारी

फूलों की फुलवारी

राष्ट्रीय संवाद

व्यर्थ का विवाद

यौवन का उन्माद

गूढ़ चिंतन सा अपवाद। 

इन सबके उपरान्त

किसी अपने का

किसी वृद्ध का देहान्त 

हो सकता है एक कारण

कुछ भी हो सकता है कारण

तब हो जाता है कठिन

रोक पाना मन उद्विग्न।

 

तब जैसे

मन से बहने लगते हैं शब्द

व्याकुल होती हैं उँगलियाँ

ढूँढने लगती हैं कलम

और फिर

बहने लगती है शब्द सरिता

रचने लगती है रचना

कथा, कहानी या कविता।

शायद इसीलिए

कभी भी नहीं रच पाता हूँ

मन के विपरीत

शायरी, गजल या गीत।

नहीं बांध पाता हूँ शब्दों को

काफिये मिलाने से

मात्राओं के बंधों से

दोहे चौपाइयों और छंदों से।

 

शायद वो प्रतिभा भी

जन्मजात होती होगी। 

जिसकी लिखी प्रत्येक पंक्तियाँ

कालजयी होती होंगी

आत्मसात होती होंगी।

 

मैं तो बस

निर्बंध लिखता हूँ

स्वछंद लिखता हूँ

मन का पर्याय लिखता हूँ

स्वांतः सुखाय लिखता हूँ। 

 

जी हाँ!

मैं स्वांतः सुखाय ही लिखता हूँ।

 

किन्तु, 

मन को आपसे साझा जो करना है

शायद इसीलिये

मैं मंच का नहीं मन का कवि हूँ।

 

©  हेमन्त बावनकर  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २५ – कविता – सार… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “तो जानें…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २५ ?

? कविता – सार… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

-1-

ये तथ्य हैं उनींदे, जगाओ झिंझोड़कर

रखा गया है जिनको, गर्दनें मरोड़ कर

-2-

ये तो मुँह तलक़ हैं, लबालब भरे हुए

ज़ोख़िम ले कौन ऐसे चिकने घड़े फोड़कर

-3-

भूमिका पढ़ी न, उपसंहार ही पढ़ा

रख दी क़िताब उसने, एक पृष्ठ मोड़कर

-4-

न दी ज़मीन जिसने, सुई की नोंक बराबर

एक दिन चला गया वो साम्राज्य छोड़कर

-5-

मांग सजाने की थी जो, मांग तुम्हारी

लाया हूँ आसमाँ से, चाँद-तारे तोड़कर

-6-

सरकार बना डाली, गुणा-भाग जोड़कर

खा रहे हैं माल आप, कथरी ओढ़कर

-7-

चिंतन की धूप बिन लगे, ज़ेहन में फफूँदी

‘राजेश’ ने लाया है, सार यह निचोड़कर

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १९८ ☆ मुक्तक – ।। हे माँ दुर्गा पापनाशनी, तेरा वंदन बारम्बार है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १९८ ☆

☆ मुक्तक ।। हे माँ दुर्गा पापनाशनी, तेरा वंदन बारम्बार है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

=1=

सुबह शाम की  आरती और माता का जयकारा।

सप्ताह का हर दिन बन गया शक्ति का भंडारा।।

केसर चुनरी चूड़ी रोली हे माँ करें तेरा सब श्रृंगार।

सिंह पर सवार माँ दुर्गा आयी बन भक्तों का सहारा।।

=2=

तेरे नौं रूपों में समायी शक्ति बहुत असीम है।

तेरी भक्ति से बन जाता व्यक्ति संस्कारी प्रवीण है।।

हे वरदायनी पपनाशनी  चंडी रूपा कल्याणी तू।

लेकर तेरे नाम मात्र से हो जाता व्यक्ति दुखविहीन है।।

=3=

नौं दिन की  नवरात्रि मानो कि ऊर्जा का संचार है।

भक्ति में लीन तेरे  भजनों  की नौ दिन भरमार है।।

कलश सकोरा जौ और  पानी आस्था के  प्रतीक।

हे जगत पालिनी माँ दुर्गा  तेरा वंदन बारम्बार है।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६१ ☆ कविता – जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !! ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६१ ☆

☆ जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !! ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

दर्शन के लिये, पूजन के लिये, जगदम्बा के दरबार चलो

मन में श्रद्धा विश्वास लिये, मां का करते जयकार चलो !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

* 

है डगर कठिन देवालय की, माँ पथ मेरा आसान करो

मैं द्वार दिवाले तक पहुँचू, इतना मुझ पर एहसान करो !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

 *

उँचे पर्वत पर है मंदिर, अनुपम है छटा, छबि न्यारी है

नयनो से बरसती है करुणा, कहता हर एक पुजारी है !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

 *

मां ज्योति तुम्हारे कलशों की, जीवन में जगाती उजियाला

हरयारी हरे जवारों की, करती शीतल दुख की ज्वाला !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

 *

जगजननि माँ शेरावाली ! महिमा अनमोल तुम्हारी है

जिस पर करती तुम कृपा वही, जग में सुख का अधिकारी है !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

 *

तुम सबको देती हो खुशियाँ, सब भक्त यही बतलाते हैं

जो निर्मल मन से जाते हैं वे झोली भर वापस आते है !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #८६ – नवगीत – गुरुवर वंदना… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – गुरुवर वंदना…।

? रचना संसार # ८६ – गीत – गुरुवर वंदना…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

अंतस में विश्वास भरो गुरु,

तामस को चीर।

प्रेम भाव से जीवन बीते,

दूर हो सब पीर।।

 

मान प्रतिष्ठा मिले जगत में,

उर यही है आस।

शीतल पावन निर्मल तन हो,

सुखद हो आभास।।

कोई मैं विधा नहीं जानूँ

गुरु सुनो भगवान।

भरदो शिक्षा से तुम झोली,

दो ज्ञान वरदान।।

शिष्य बना लो अर्जुन जैसा,

धनुषधारी वीर ।

 

बैर द्वेष तज दूँ मैं सारी,

खोलो प्रभो द्वार।

न्याय धर्म पर चलूँ सदा मैं,

टूटे नहीं तार।।

आप कृपा के हो सागर,

प्रभो जीवन सार।

रज चरणों की अपने देदो,

गुरु सुनो आधार।।

सेवा में दिनरात करूँ प्रभु,

रहूँ नहीं अधीर।

 

एकलव्य सा शिष्य बनूँ मैं,

रचूँ फिर इतिहास।

सत्य मार्ग पर चलता जाऊँ,

हो जग उजास।।

ब्रह्मा हो गुरु आप विष्णु हो,

कहें तीरथ धाम।

रसधार बहादो अमरित की,

जपूँ आठों याम।।

दीपक ज्ञान का अब जला दो,

गुरुवर दानवीर।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१४ ☆ भावना के दोहे – नवसंवत्सर ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – नवसंवत्सर।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१४ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – नवसंवत्सर ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

नवसंवत्सर आ गया, खुशियाँ लेकर आज।

चैत्र मास का आगमन, हर्षित हुआ समाज।।

* 

माँ का स्वागत कर रहे, नवराते त्योहार।

माँ नौ रूपों में सजी, उत्सुक सब घर द्वार।।

 *

महिमा तेरी खूब है, करती हो कल्याण।

सबकी विपदा तुम हरो, करते माँ हम ध्यान।।

 *

करते  माँ  से याचना, आओ सबके द्वार।

नव दुर्गा का आगमन, नौ दिन का त्योहार।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मंजिरी  की कुंडलिया – बसेरा ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है ‘मंजिरी  की कुंडलिया – बसेरा‘।)

? मंजिरी  की कुंडलिया – बसेरा ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

-1-

करे बसेरा देख लो, सारा विहग समाज।

काटो कानन तुम नहीं, भटके सारे आज ll

भटके सारे आज, करे मानव मनमानी l

आओ हम सब साथ, शपथ हैं लेते बानी ll

कहे मंजिरी आज, वृक्ष है साथी मेरा l

सबको देता लाभ, कीश भी करे बसेरा ll

-2-

रैन बसेरा है जगत, नहीं ठिकाना आज l

जीवन जीते हम सभी, अलग अलग अंदाज ll

अलग अलग अंदाज,  चलें हैं सूनी राहें l

अश्कों से है आज, देख ये भरी निगाहें ll

कहे मंजिरी आज, बढ़े घनघोर अँधेरा l

अंजानी है राह, मिले कब रैन बसेरा ll

-3-

करें बसेरा बाँस पर, बगुलों का परिवार l

करते हैं कलरव मधुर, नीड़ करें तैयार ll

नीड़ करें तैयार, रोज खोजे वे खाना l

योगी का रच ढोंग, लक्ष्य मछली को पाना।।

कहे मंजिरी आज, आस से भरा सवेरा l

बगुला गाता गान, नीड़ में करें बसेरा ll

☆

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९६ ☆ मानवता अब हार रही है… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी  भावप्रवण कविता – मानवता अब हार रही है… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९६ ☆

☆ कविता – मानवता अब हार रही है… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

मानवता अब  हार  रही  है  |

होकर द्रवित  पुकार रही है  ||

बेटा करता कत्ल  बाप  का |

जाने   कैसी   रार   रही   है ||

कैसे  बदला वक्त आज का |

रिश्ते सभी  बिसार रही  है ||

*

खूब बँटे हम  जाति धर्म  पर |

रखा न बिल्कुल ध्यान कर्म पर ||

रखा ताक  पर मानवता  को |

दिखें  न कितने दाग मर्म पर ||

भेद-भाव   दीवार  रही   है |

मानवता  अब  हार   रही  है

*

हथियारों  की   जंग  देख  लो |

बारूदों   के    रंग   देख   लो ||

रखें  अहम  को   सबसे  आगे |

अब   देशों  के  ढंग   देख  लो ||

झूठी शान अकड़ वालों को|

अब दुनिया धिक्कार  रही है  ||

मानवता   अब  हार   रही   है  |

*

चौराहों   पर   खड़े    दुशासन |

भूखे   दानव   नोच   रहे   तन ||

बदली चाल समय  की देखो |

अब   नारी  के  टूट   रहे   मन ||

कब   आयेंगे   कृष्ण   कन्हैया |

अबला   क्यों  लाचार  रही  है ||

मानवता   अब  हार   रही   है  |

*

भय परमाणु  सामरिकता   का |

बढ़ती नित्य पाशविकता  का ||

मची   होड़   है   हथियारों  की |

काम  नहीं अब नैतिकता   का ||

अब  ‘संतोष’  शांति की  खातिर |

सबकी   यही   पुकार   रही   है |

मानवता   अब   हार   रही    है  |

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १६ – कविता – नदिया की धार… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘नदिया की धार…‘।)

☆ शशि साहित्य # १६ ☆

? कविता – नदिया की धार…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

🫟🫟🫟🫟🫟

मस्त मगन वो बहती धार,

फूलों ने थमने, प्यार से लिया पुकार…

मदमाती वो हंसती रही,

मंद गति वो चलती रही…

खेत खलिहानों को,

वन और उपवनों को…

जीवनदान, जो लिया है ठान,

यही तो है उसके अस्तित्व का सार…

पूजनीय वह वंदिता,

महिमा उसकी अपरंपार…

रुकना उसके वश में नहीं,

मोह में पड़ना ,ठीक नहीं,

रुकी जलधार, होगा प्रकृति प्रहार…

थमना राह का रोड़ा है,

फिर समुद्र मिलन भी होना है…

तन्मय हो वो बह चली…

बन रसवंती धार….

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ नव संवत्सर के दोहे  ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ नव संवत्सर के दोहे ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

☆

नव संवत्सर आ गया, गाने मंगल गीत।

प्रियवर अब दिल में सजे, केवल नूतन जीत।।

* 

चैत्र महीना प्रतिपदा, जो लाया उजियार।

यही हमारा वर्ष है, विजय करे श्रंगार।।

 *

ब्रम्हा जी ने सृष्टि का, किया नवल – निर्माण।

शुक्ल पक्ष तो सोहता, मौसम मेँ नव प्राण।।

 *

उज्जयिनी महाराज ने, देकर चोखा काल।

मंगलमय गणना शुरू, भारत हुआ निहाल।।

 *

संवत्सर कितना शुभम्, देता सबको नेह !

अंतर इसका आसमय, उल्लासित है देह।।

 *

फिर से नव संकल्प हो, फिर से नव उत्थान।

हिन्दू होने की खुशी, जयति जय नव गान।।

 *

नया वर्ष ले आ गया, नया शौर्य, नव ताप ! 

संस्कारों के वेग को, कौन सकेगा माप।।

 *

राज विक्रमादित्य ने, दिया हमें नव वर्ष!

आगे हम बढ़ते रहें, धारण करके हर्ष।।

 *

चैत्र प्रतिपदा मांगलिक, बाँँट रही उत्साह।

बात तभी बन पायगी, बनो वक़्त के शाह !!

 *

दोस्त, मित्र, बंधू, सखा, रक्खो सँग नववर्ष।

मिले तुम्हें खुशियां “शरद”, मिले सुखद जीतो हर संघर्ष।।

 ☆

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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