हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #८३ – नवगीत – धुन… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – धुन

? रचना संसार # ८३ – गीत – धुन…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

वेणु की प्रभो प्यारी धुन है,

हे मनमोहन हे गिरधारी।

भीगी प्रीति फुहारों से है,

मधुवन में बृषभानु दुलारी।।

*

अन्तर्मन में प्रीति बसी है,

लोभ कपट सब छूटी माया।

अधरों को सिंचित करती है,

कामदेव सी तेरी काया ।।

धुन भाती वंशी की सबको,

महका दो जीवन फुलवारी।

*

पात -पात पर प्रीति पल्लवित,

स्वर्णमयी आभा फैलाती।

पावन धुन मुरली की बजती,

राधे ललिता प्रीति निभाती।।

कटुता की बेलें कटतीं हैं,

श्याम शरण पाते सुखकारी।

*

कण-कण में मनमोहन बसते,

नित उर नूतन आस जगाते।

वंशी धुन पर गोपी झूमे,

कान्हा जब भी रास रचाते।।

मंजुल नैना रूप मनोहर,

छवि कान्हा शुभ मंगलकारी।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९३☆ गीत – बुरा वक्त जब भी आता है… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय  गीत – बुरा वक्त जब भी आता है आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९३ ☆

गीत – बुरा वक्त जब भी आता है☆ श्री संतोष नेमा ☆

बुरा वक्त जब भी आता है।

कुछ हमको सिखला जाता है।

कौन हमारा कौन पराया,

समझ तभी हर नर पाता है।

वक्त बुरा जब भी आता है।।

*

कभी न आता समय बता कर।

लगे हुए जैसे इसको पर।

कभी दुखों के शूल चुभाता,

कभी लुटाता खुशियाँ भर-भर।

जीवन का सच बतलाता है।।

बुरा वक्त जब भी आता है।

*

वक्त किसी का सगा नहीं है।

कौन वक्त से ठगा नहीं है।।

मूल्यवान है समय बहुत ही,

खोता जो भी जगा नहीं है।।

खोकर फिर नर पछताता है

बुरा वक्त जब भी आता है।

*

उस ईश्वर का ध्यान करें हम।

श्रद्धा से गुणगान करें हम।

धर्म-कर्म से जोड़ें नाता,

खुद को भी रसखान करें हम।

वही ईश सबका दाता है।

बुरा वक्त जब भी आता है।

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १४ – कविता – परम प्रेम… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘परम प्रेम…’।)

☆ शशि साहित्य # १४ ☆

? कविता – परम प्रेम… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

❣️❣️❣️❣️

आज राधा ने मुख पर घूंघट है डाला,

श्याम की बेचैनी बढ़ती जाए..

देखी जाए ना सही जाए,

ऐसी हो गई कृष्ण की हाला..

हो गए “हिय प्यारी”  के दर्शन दुर्लभ,

मनवा हो गया बावरा..

सौ सौ चांद सा चमक रहा,

पर कृष्णा मेघ ने पेहरा डाला..

छलिया नित लीला करें,

करें नित नए प्रयास,

देख शरारत राधे की

अति व्याकुल हो गए आज..

हृदय  लगन लगी बस दरस की,

सजल नयन करे मनुहार..

प्राण प्रिय को व्याकुल देख,

विचलित हो गई कृष्ण प्रिया..

सरक गया कब घूंघट मुख से,

पल भर भी ना समय लगाया..

निरख अनुपम रूप को,

हो गए श्याम अनूप…

कृष्ण उर में बसे राधिका,

राधामय भये घनश्याम..🙏

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २८३ – दोषी…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २८३ – विजय साहित्य ?

☆ दोषी…!

(मात्रा वृत्त – २५ मात्रा)

माझ्याआधी, मलाच गेले, वाचून कोणी

उपदेशाचे, डोस पाजले, हासून कोणी. १

*

चेष्टा, टिंगल, आणी टवाळी, झाली कविता

आदर देता, सादर झाले, आतून कोणी.२

*

घनिष्ठ झालो, बघता बघता, ‌या मनी नांदलो

काळजास त्या, दिली उभारी, राहून कोणी. ३

*

हळवेली पण, मधाळ बोली, संजीवन ते

श्वास फुलांचे, अत्तर गेले, माखून कोणी.४

*

नको‌ तेवढे, वाटत गेलो, धन शब्दांचे

अक्षर काळे, भास्कर झाले, लाजून कोणी.५

*

जपली नाती, वेळ देऊनी हिशेब नाही

नाते गेले, मनासारखे, वागून कोणी.६

*

मतभेदाचे, आले वारे, कडकड नाही

घरात गेले, वहात तेव्हा, पाहून कोणी.७

*

हाकेसरशी, दमात एका, आधार झालो

विश्वासाला, हलाल केले, मागून कोणी.८

*

घर शेणाचे, घर मेणाचे, जमले नाते

अनुभवांचे, दार घेतले, लावून कोणी.९

*

हात लिहिते, थांबले कधीचे कळले नाही

विडा निरोपी, हातावरचा, चाखून कोणी.१०

*

लळा‌ लावूनी, गळा कापला, कविराजाचा

स्वभाव‌ ठरला, दोषीच तेव्हा, टाळून कोणी.११

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – क्षितिज ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – क्षितिज ? ?

छोटेे-छोटे कैनवास हैं

मेरी कविताओं के

आलोचक कहते हैं,

और वह बावरी

सोचती है

मैं ढालता हूँ

उसे ही अपनी

कविताओं में,

काश!

उसे लिख पाता

तो मेरी कविताओं का

कैनवास

क्षितिज हो जाता!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 21 दिवसीय आशुतोष साधना रविवार दि. 8 फरवरी से शनिवार 28 फरवरी तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ भी करेंगे 💥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

💥 मालाजप शिव पंचाक्षर स्तोत्र के साथ आत्मपरिष्कार एवं मौन-साधना भी नियमित रूप से चलेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २७९ ☆ पलाश : फागुन की अग्नि और प्रकृति का आध्यात्मिक स्पर्श… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना पलाश : फागुन की अग्नि और प्रकृति का आध्यात्मिक स्पर्श। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २७९ ☆ पलाश : फागुन की अग्नि और प्रकृति का आध्यात्मिक स्पर्श

भारतीय ऋतुचक्र में वसंत केवल मौसम का परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रकृति के अंतर्मन में जागते उत्सव का समय है। इसी ऋतु में वन-वन दहक उठता है पलाश (Butea monosperma) के केसरिया फूलों से। पत्तों से लगभग रिक्त शाखाओं पर जब ये अग्नि-सी आभा लिए पुष्प खिलते हैं, तब दूर से पूरा वन मानो दीपशिखाओं से आलोकित दिखाई देता है। इसीलिए पलाश को ‘वनाग्नि’ या ‘जंगल की ज्वाला’ भी कहा गया है।

भारतीय परंपरा में पलाश केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि पवित्रता और ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। वैदिक अनुष्ठानों में इसकी लकड़ी और पत्तों का उपयोग होता रहा है। कहीं इसे यज्ञ की पवित्र अग्नि का प्रतीक माना गया, तो कहीं यह आस्था और तप की आभा से जुड़ गया। लोकविश्वास यह भी कहता है कि इसके केसरिया फूलों में तप, त्याग और उत्सव — तीनों का संगम दिखाई देता है।

फागुन के दिनों में जब कई वृक्षों से पत्ते झर जाते हैं और वन का स्वर कुछ विरल-सा लगने लगता है, तभी पलाश अपनी दहकती छटा से उस सूनेपन को भर देता है। उसकी शाखाएँ जैसे घोषणा करती हैं कि जीवन की अग्नि कभी बुझती नहीं, वह समय-समय पर नए रंगों में प्रकट होती रहती है। यही अनुभूति कवि के मन में दोहों के रूप में प्रस्फुटित होती है—

*

वन में खिले पलाश जब, धधके जैसे धाम।

प्रकृति रचाए अग्नि सा, रंगों वाला ग्राम॥

*

पात झरे सब वृक्ष के, सूना लगे समाज।

खिलते हुए पलाश से, वन में बना सुराज॥

*

टेसू की ये आग सी, डाली-डाली झूम।

धरती में जैसे मचे, फागुन वाली धूम॥

*

रंग केसरी फूल का, जिससे जगे उजास।

सूखे मन में भी हुआ, आशा का विश्वास॥

*

वन में टेसू बोलता, सुनते सारे लोग।

धरा सजाए दिव्यता, भक्ति भाव संजोग॥

*

दरअसल पलाश का खिलना केवल प्रकृति का दृश्य नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म आध्यात्मिक संकेत भी है। यह हमें स्मरण कराता है कि जैसे सूखी शाखाओं पर भी अग्नि-सी आभा वाले फूल खिल उठते हैं, वैसे ही जीवन के निर्जन क्षणों में भी आशा और प्रकाश का उदय संभव है। शायद यही कारण है कि फागुन की हवा में झूमता पलाश हमें प्रकृति के साथ-साथ ईश्वर की सृजनात्मक लीला का भी आभास कराता है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २८७ ☆ बाल गीत – हो अपना मधुर व्यवहार… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २८७ ☆ 

☆ बाल गीत – हो अपना मधुर व्यवहार ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

सहज, सरल जीवन बने

मानव कर उपकार।

मूल मंत्र मधुविद्या का

करें मधुर व्यवहार।।

बिगड़े अपने काम बनेंगे

जीवन को हम महकाएँ ।

सत्यनिष्ठ, आचरण सुगंधित

फूलों – सा हम मुस्काएँ।

 *

मन पावन हो आचरण

बाँटें जग में प्यार।

मूल मंत्र मधुविद्या का

करें मधुर व्यवहार।।

 *

द्वेष, कपट सब मिट जाते हैं

मन निर्मल हो जाता है ।

सोच  – समझकर मीठा बोलें

जटिल प्रश्न हल हो जाता है।।

 *

सदाचार का पाठ ही

है जीवन का सार।

मूल मंत्र मधुविद्या का

करें मधुर व्यवहार।।

 *

जो भी मधु – सा मीठा बोलें

अपना ही उपकार करें।

गन्ने का रस मीठा बनकर

तन – मन में संस्कार भरें।

 *

भोजन शाकाहार का

करें प्रचार – प्रसार।

मूल मंत्र मधुविद्या का

करें मधुर व्यवहार।।

 *

कोमल मन पहचान बनाए

मधुर नेह को उपजाता।

शौर्य पराक्रम स्वयं मिलेगा

मानव अंबर छू पाता।

 *

सदभावों, गुणप्रेम से

खुद का हो उपकार।

मूल मंत्र मधुविद्या का

करें मधुर व्यवहार।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३१४ – कविता – ☆ यूँ ही, होली के बहाने, मोबाइल के अफसाने… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता यूँ ही, होली के बहाने, मोबाइल के अफसाने” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३१४ 

☆ यूँ ही, होली के बहाने, मोबाइल के अफसाने… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

वॉट्सपिटों की धूम है, फेसबुकिस्ट प्रचार।

टेगिष्टि   कॉपिस्ट   सँग, मेसेंजिष्ट   हजार।।

*

कॉपिस्टों की मार का, फैला हुआ बुखार।

वही – वही  संदेश फिर, मिलता बारम्बार।।

*

मोबाइल की भीड़ को, करें  क्लियर हम रोज।

ब्लॉक कभी हाइड करें, कभी करें हम क्लोज।।

*

कभी वायरस आ घुसे, हेंग कभी हो जाय।

या  करप्ट की मार से, अन्तर्मन कुम्हलाय।।

*

कहें, सुनें, देखें, लिखें,मोबाइल पर आज।

जीवन में यह यूँ घुसा,ज्यूँ खुजली में खाज।।

*

मिलना-जुलना,बातचीत, आना-जाना बंद।

मायावी  मोबाइल  के, आकर्षक  छलछंद।।

*

आत्ममुग्ध मद मोह में, यश-कीर्ति की चाह।

मोबाइल   से   हो   रही, नव  पीढ़ी  गुमराह।।

*

उठत-बठत, खावत-पिवत,मोबाइल में जान।

सतित पतित दुर्गतित सभी,चकित,थकित श्रीमान।।

*

यूँ  तो  उपयोगी  बहुत, जोड़े  देश – विदेश।

अति हो जाये जब कहीं, तब पहुँचाए क्लेश।।

*

समय  बचे  संवाद हो, नए पुराने  मित्र।

स्नेह भाव से देख लें, इक-दूजे के चित्र।।

*

हो उपयोग विवेक से, बहुत काम का यंत्र।

विश्व ज्ञान इसमें भरा, अभिनव  मैत्री मंत्र।।

*

मोबाइल का  हो  यदि, संयम  से  उपयोग।

ज्ञान ध्यान सम्मान के, बनें विविध संजोग।।

*

मोबाइल तो है हमें,  तकनीकी  वरदान।

भस्मासुर हम न बनें, करें नहीं विषपान।।

☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १३५ ☆ जाएँ तो कहाँ? ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “जाएँ तो कहाँ?”।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १३५ ☆ जाएँ तो कहाँ? ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

हम परिन्दों के लिए

डालते रहे दाना और पानी

और वे बिछाते रहे जाल

फँसाते रहे हैं सदा मछलियाँ

चुगते रहे हैं सबका दाना

बुन लिया गया है

उनके द्वारा ऐसा ताना-बाना

जिस तरह बुनती है मकड़ी

अपना जाल

और जब कोई कीट उलझता है

उस चक्रव्यूहनुमा जाल में

तब होता है शुरु शोषण

तब हम चाह कर भी नहीं निकल पाते

यह एक ऐसा व्यामोह है

जिसे ओढ़कर विवश हैं हम

और आने वाली पीढ़ियाँ

जीवन के इस संघर्ष में अपनी

जिजीविषा को लेकर जाएँ तो कहाँ?

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – बिटविन द लाइन्स ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – बिटविन द लाइन्स ? ?

वे सोचते थे

मेरी माँ

समझ नहीं पाती होगी

मेरी कविता में प्रयुक्त

शब्दों के अर्थ,

उस रोज़

मेरे काव्य पाठ में

शब्दों के चयन पर

वाह-वाह करती

भीड़ में

माँ की आँखों से

प्रवाहित आह ने

उन्हें झूठा साबित कर दिया,

मेरी पोएट्री लाइन्स पर

भीड़ तालियाँ कूटती रही,

केवल मेरी माँ

‘बिटविन द लाइन्स’

पढ़ती रही!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 21 दिवसीय आशुतोष साधना रविवार दि. 8 फरवरी से शनिवार 28 फरवरी तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ भी करेंगे 💥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

💥 मालाजप शिव पंचाक्षर स्तोत्र के साथ आत्मपरिष्कार एवं मौन-साधना भी नियमित रूप से चलेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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