हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १३६ ☆ पूछ रहे हैं यारी क्या है ? ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “पूछ रहे हैं यारी क्या है ?” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १३६ ☆ पूछ रहे हैं यारी क्या है ? ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

अपने दुःख से भारी क्या है

सुख की हिस्सेदारी क्या है ।

*

मज़हब अब धंधा लगता है

पूजा भजन पुजारी क्या है ।

*

नहीं जानते दाँव-पेंच हम

क्या जानें मक्कारी क्या है ।

*

उन्हें नहीं अहसास भूख का

रोटी की लाचारी क्या है ।

*

लेकर के हाथों में खंजर

पूछ रहे हैं यारी क्या है ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १४१ ☆ तरही ग़ज़ल… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “तरही ग़ज़ल…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४१ ☆

✍ तरही ग़ज़ल… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

ठसक दिखती अबध के आज भी इसमें नवाबों की

झलक मिलती नहीं है आदमी में एहतिसाबों की

* 

लरजते होंठ नम आँखें ये बिखरे ठूठ सिगरिट के

बयाँ करते है मेरी दास्ताँ बस इज़्तिराबों की

 *

ये पूजीवाद के हामी समझ लें वक़्त की आहट

उठी है आधियाँ चारों तरफ से इंक़लाबों की

 *

ग़मों के शहर में रहकर समझ में आ गया मुझको

किताबे ज़ीस्त में कितनी कमी खुशियों के बाबों की

 *

ज़ुबाँ ख़ामोश है आँखों में है मंज़र तबाही का

मुसल्लत हैं मेरे दिल पर अभी घड़ियाँ अजाबों की

 *

कभी ज़ुल्मो सितम की टूटना तय है सिलासिल का

सदा कब तक दबाई जाएगी आखिर इताबों की

 *

मुआफ़िक ढाल कर हर हाल में है जानती चलना

बड़ी दुश्वार होती ज़िंदगी यारो सराबों की

 *

सजाए जिसके आँखों में  किया तन्हा वही मुझको

उठाये फिर रहा हूँ लाश मैं अपने ही ख़्वाबों की

*

उदासी साथ मेरे ओढ़ कर शामो-सहर बैठे

नहीं अब रास आती सुर्ख कलियाँ भी गुलाबों की

 *

न जाने गुल मेरे किस हाल में होगें जो रख भेजे

अरुण को फ़िक़्र बिलकुल भी नहीं है उन किताबों की

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ४६ – ये बातें तुम्हें ज़ैब नही देती… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – ये बातें तुम्हें ज़ैब नही देती…।)

✍ ये बातें तुम्हें ज़ैब नही देती… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

कुछ और लफ़्फ़ाजी कर लिया करो

बस, तहम्मुल की तनकीद मत किया करो

किबला, ये बातें तुम्हें ज़ैब नही देती

शहद न सही, पर जहर तो न घोला करो

 *

जिस के बूते तुम इकतीदार क़ाबीज़ हुए

वो राम है जनाब, उसे याद कर लिया करो

 *

बहुत हो गयी नफ़रत की सियासत यारों

मुहब्बत की दुकान है खुली, वहां जाम टकराया करो

 *

फिर रहें है कई चाक-दामन ओढे हुए

कभी नये कपडे खरीदो, उनको पहनाया करो

 *

हिक़ारत ने उन्हें अंधा कर दिया “हेमंत”

बेनियाज़ है गुल उन्हें देखो और  दिखाया करो

☆

लफ़्फ़ाजी = वाचालता, बकवास, ज़ैब = शोभा, क़िबला = महाशय, तनकीद = समीक्षा, तहम्मुल = सहिष्णुता, इकतीदार = सत्ता, पद, क़ाबिज़ = कब्जा, चाक- दामन= फटाआंचल, हिकारत = घृणा, बेनियाज़ = स्वतंत्र, बेपरवाह

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५५ ☆ कविता – होली… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता  – “होली… “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५५ ☆

✍ कविता – होली… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

*

हो  ली सो होली अब तक

आज तो प्रेम करो सबको,

जली होलिका स्वयं  ही में

प्रल्हादी जीवन दो सबको।

*

एक रंग में रँगे जो दोनों

राधा श्याम बना दो सबको,

प्रेम रंग में सब रँग जाएँ

नफ़रत से उबार दो सबको।

*

स्वागत नये अन्न  का करके

भूख विहीन कर दो सबको,

क्या बच्चा,  क्या बूढ़ा जवां

खुशियाों से भर दो सबको।

*

जात धर्म भाषाई दुराव

होली में जला दो सबको,

हिल मिल खेलो होली तब

प्रेम रंग में डुबा दो सबको।

*

यह होली का त्यौहार

भारत का संदेश हो सबको

ऐसे खेलो होली मित्रों

 चकित करा दो जगको।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मुक्तक – होली ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ मुक्तक – होली ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

☆

होली मस्ती लेकर आई, खेल रहे कन्हाई।

बरसाने से राधारानी, दौड़ी-दौड़ी आई।

खेल रहे ग्वाले-ग्वालाएँ, मुखड़े हैं रंगीन,

रंग-अबीरों की आभा तो, सारे ब्रज में छाई।।

* 

खेल रहे देवर-भौजाई, उल्लासित है तन-मन।

जीजू और सालियाँ खेलें, इतराता है आँगन।

मची हुई हुड़दंग आज तो,  हुरियारों का ज़ोर,

लगता है पल में जी लेंगे, अब तो सारा जीवन।।

 *

गले मिल रहे प्रीति लिए दिल, ख़त्म हुई सब दूरी।

आज सभी होली में डूबे, नहीं शेष मजबूरी।

गाँव-शहर, गलियों-सड़कों में, रँग डालो का शोर,

बीवी लगती मदिरा जैसी, और प्रेमिका नूरी।।

 *

चला रही है आज पड़ोसन, नयनों से तो तीर।

अपुन हो गए घायल ज़्यादा, दिल ने पाई पीर।

मैंने मौका पाकर उसका मुख कर डाला लाल,

मैंने मन के अरमानों को पिला दिया मृदु नीर।।

 ☆

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १३९ – बुन्देली कविता – “काम-काज का लूघर कर है” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “काम-काज का लूघर कर है“।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ बुन्देली कविता – “काम-काज का लूघर कर है” ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

काम-काज का लूघर कर है

सबकी इज्जत धो खें धर है

*

दिन चढ़ आव अबै सोउत है

पूजा होने, कबै सपर है

*

पिछली साल परो तो छेटा

आसों आमा खूबइ फर है

*

उखरी-मूसर कितै बिला गय

काहे में अब चाँउर छर है

*

अबै पढ़ाव, ब्याव ने सोचौ

भौतइ कच्ची अबै उमर है

*

झाड़-पेड़ सब काटत जा रय

अब कंडों की होरी जर है

*

कितनी नईं आरती रट लइँ

‘भगवत’ मौड़ी गुनी निकर है

☆

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ होली पर चारः क्षणिकाएँ…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – होली पर चारः क्षणिकाएँ…!

☆ ॥ कविता॥ होली पर चारः क्षणिकाएँ…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

☆ 

॥ एक ॥

नकटों दरमियाँ…!

ज़ोर की बहस छिड़ी है

मेरी नाक से

तेरी नाक कैसे बड़ी है…!

 

॥ दो ॥

बौने के द्वारा…!

बड़प्पन का

स्वांग रचा जा रहा है

आईने से रुबरू

होने से बचा जा रहा है…!

 

॥ तीन ॥

चतुर सुजान…!

अपने दुश्मन को

कब्र में दफ्नाने तुले हैं

लेकिन एक दिन

सबका नम्बर आना है

इस सच्चाई को भुले हैं…!

 

॥ चार ॥

प्रदर्शन…!

प्रदर्शन…!

प्रदर्शन…!

वर्तमान का एकमात्र

यही है वैश्विक दर्शन…!

☆

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कलिंग ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – कलिंग ? ?

नेति, नीति

सब अतीत हुए अब,

रक्त पिशाचों के निर्वासन,

अवैध घोषित हुए अब,

वीभत्स का नामकरण

रसीला हुआ अब,

आदिम ही आधुनिक है,

नए संशोधन प्रकाशित हुए अब,

लड़े जाते हैं रोज़ाना

भीषण युद्ध अब,

पर विनाश से करुणा

का उद्गम नहीं होता अब,

धौलागिरी बन चुका है

समूचा जगत अब,

पर किसी कलिंग युद्ध से

कोई अशोक जन्म नहीं लेता अब…!

 ?

© संजय भारद्वाज  

12:11 बजे, 1.03.2026

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१२ – फागुन के दिन आ गये… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “फागुन के दिन आ गये…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१२ – फागुन के दिन आ गये… ☆

☆

फागुन के दिन आ गये, मन में उठे तरंग।

हँसी-ठहा के गूँजते, नगर गाँव हुड़दंग ।।

कि होली आई है, रंगों को लाई है ।।

बसंती ऋतु छाई, सभी के मन-भाई

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

* 

अरहर झूमे खेत में, पहन आम सिरमौर।

मधुमासी मस्ती लिये, नाचे मन का मोर।

गाँव की किस्मत चमकी, घरों में खुशियाँ दमकीं।

ये बालें पक आईं, खेत में लहराईं

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

 *

जंगल में टेसू खिले, प्रकृति करे शृंगार।

चम्पा महके बाग में, गाँव शहर गुलजार।।

वो कोयल कूक रही है, मधुरिमा घोल रही है।

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

 *

प्रेम रंग में डूब कर, कृष्ण बजावें चंग ।

राधा पिचकारी लिये, डाल रही है रंग।।

कृष्ण-राधे की जोड़ी, खेलती बृज में होली

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

 *

लट्ठ मार होली हुई, लड्डू की बौछार।

रंग डालते प्यार से, पहनाएं गल-हार।।

नाचती रसिया टोली, करें मिल हँसी ठिठोली।।

यही मथुरा की होली, यही वृज की है होली।।

 *

दाऊ पहने झूमरो, झूमें मस्त मलंग।

होरी गा-गा झूमते, टिमकी और मृदंग।।

ग्वाले सब घर हैं जाते, नाच गा धूम मचाते।

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

 *

महिलाओं की टोलियाँ, हम जोली के संग।

बैर बुराई भूलकर, खेल रहीं हैं रंग ।।

यही संस्कृती हमारी, रही दुनिया से न्यारी

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

 *

फाग-ईसुरी गा रहे, गाँव शहर के लोग।

बासंति पुरवाई में, मिटें दिलों के रोग।।

चलो जी हँसलो भाई, भुला दो सभी लड़ाई।

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

 *

जीवन में हर रंग का, अपना है सुरताल ।

पर होली में रंग सब, मिलें गले हर साल ।।

सहिष्णुता हमें लुभाई, सभी हम भाई भाई

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

 *

दहन करें मिल होलिका, मन के जलें मलाल ।

गले मिलें हम प्रेम से, घर-घर उड़े गुलाल ।।

कि एकता हर्षाई, प्रगति की डगर दिखाई

सुनो प्रिय श्रोता भाई,बजाओ मिलकर ताली

ये होली आई है, रंगों को लाई है ।।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७४ – वन्देमातरम् ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – वन्देमातरम्…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७४ – वन्देमातरम् ✍

(काव्य संग्रह – शब्द नहीं रहे शब्द से )

प्रतिध्वनि टकराती है कानों से

झंकार उठती है प्राणों से

वन्देमातरम्! वन्देमातरम्!

और मैं

कुछ जागा सा,

कुछ

सोया सा

अतीत में खोया सा- देखता हूँ

मानवों का महासागर

उत्ताल तरंगों से नक्कारे और नारे

तरह तरह की बोलियाँ

चलती हुई गोलियाँ

और

पूरे जोश से उच्चरित होता- वन्देमातरम्।

आज लगता है

हम तुम ये वे सब

वन्देमातरम् का मर्म भूल गये

वे कौन थे. कैसे थे

जो वन्देमातरम् गाकर

फाँसी पर झूल गये?

वे भारत माँ की संतानें

हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख

या नहीं ईसाई थे

वे तो राष्ट्रभक्त इंसान थे

भाई-भाई थे।

उन्होनें जीवन में उतारा था

जननी जन्भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

का महामन्त्र

और विफल किये थे

अंग्रेजी सल्तनत के षड्यन्त्र ।

हम

मन्त्ररहित होकर

षडयन्त्रों में घिर गये हैं

गिर गये हैं- दलों के दलदल में

बहुत नीचे

और आँख मींचे

बैठे हैं शुतुरमुर्ग की मुद्रा

हमें दिखाई नहीं देती

में।

कृ

प्रपा

पूर्वोत्तर की आग

या केसर क्यारी के नाग

हम तो

छाती से चिपटाये हैं

जाति-धर्म-भाषा और प्रदेश

हमें कैसे याद रहेगा

वन्देमातरम् का सन्देश ।

है

एक ओर है हमारा क्षुद्र अहम्

ओर दूसरी ओर है

वन्देमातरम्!

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares