हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # 78 – आपका ही घर है…… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आपका ही घर है…।)

☆ लघुकथा # 78 – आपका ही घर है… श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

अवनीश जी ने चिल्लाकर गुस्से में कहा – क्या हुआ भाग्यवान अभी तक तुमने चाय नहीं बनाई?

क्या करूं घर के काम ही नहीं खत्म होते बना रही हूं, कमल जी ने धीमे में कहा।

चाय पी लो आज नाश्ता नहीं बनेगा सीधे मैं खाना ही बना रही हूं क्योंकि आपने अपनी बहन को बुला लिया है और उनके साथ बुआ जी भी आ रही हैं। अभी-अभी तो हमने बेटी श्रुति की शादी की है, अब बेटी दामाद को कब बुलाऊ कुछ समझ नहीं आ रहा है।

बेटी दामाद को भी बुला लो क्या मेरी बहन उनका खाना या कुछ छीन लेंगे या तुमसे कुछ लेती हैं।

कमल जी ने कहा- मुझसे तो कोई कुछ नहीं लेता, आप तो दुकान चले जाते हो सारा दिन सबके आराम का ख्याल तो मुझे ही रखना पड़ता है, राखी आ रही है, इस त्यौहार में मैं अपने भाई के यहां मायके तो नहीं जा पाती। ऊपर से दिनभर सब बैठकर ताने सुनाती रहेंगी।

अवनीश जी ने कहा -तुम बोलो तो उन्हें फोन करके मना कर दूं।

कमल जी ने कहा- नहीं नहीं, सभी को बुला लो और कोई बचा हो तो।

तुम चिंता मत करो झाड़ू पोछा बर्तन के साथ खाना बनाने के लिए भी बाई को रख लेंगे।या तुम कहो तो दिन भर एक काम वाले लड़के को दुकान से भेज देता हूं। बुआ जी तो बुजुर्ग है दीदी भी तुम्हारे काम में मदद कर देगी। मैंने दामाद जी और परख बिटिया को भी बुला लिया है।

इतने में दोनों दरवाजे पर देखते हैं तो बुआ और उसकी बहन रागिनी दोनों खड़े हुए सारी बातें सुनते हैं।

आप लोग बिटिया और दामाद को बुला लो और हमारी चिंता मत करो अब से हम राखी के दिन ही आकर राखी बांधकर चले जाया करेंगे क्या करें। इसी बहाने हम सभी को मायके आने का मौका मिलता है नहीं तो कोई आने नहीं देता कुछ दिन आराम से रहकर बचपन के दिन जीते हैं।

कमल जी की आंखें नम हो जाती है और आंसू निकलने लगते हैं, वे कहती है- आप लोग मुझे माफ कर दीजिए, आइये बैठिए आपका ही घर है दीदी।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 235 – भोले का अभिषेक ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “भोले का अभिषेक ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 235 ☆

🌻लघु कथा🌻 🛕भोले का अभिषेक 🚩

भारत में सनातनी धर्म, शिव शंकर को ध्याने वाले, अटूट श्रद्धा और विश्वास सानंद देखने को मिलाता है।

भोर होते भोले दरबार में काँवड यात्रा की भीड़, श्रद्धा और यात्रा में लगी होड़। शहर में पुन्य सलिला माँ नर्मदा का नीर भरकर लगभग 35 कि मी की पैदल यात्रा।

बीच-बीच में कहीं-कहीं कहीं पानी का पाऊच, बिस्किट, मेंगो फ्रुटी, चाय, फलहारी, केला बाँटे जा रहे थे।

महेश उम्र में तो कम, परन्तु जिम्मेदारी और गरीबी से लग रहा था कि सयाना हो चला था। एक झोले में सभी सामान भरते जा रहा था। उसका मन उल्लास, उमंग से भरा था बच्चों को दो दिनों तक थोड़ा-थोड़ा खाने का सामान दे देगें।

मंदिर प्रांगण में पहुँचने से पहले सभी का सामान देखा जा रहा पर यह क्या?!!!  महेश देखता ही रह गया—-

उसका सारा सामान एक जाली नुमा टंकी पर फेंक दिया गया। जिसे वह काँवड़ से भी ज्यादा संभाल कर चल रहा था।

बदले में 1/2लि दूध का पैकेट दिया गया। कुछ लोग तो फाड़- फाड़ कर दूध अभिषेक की बाल्टी में डाल रहे थे, परन्तु महेश कमीज में छुपाकर निकल गया। साथ में दो तीन फटे पैकेट उठाकर चलता बना, जिसमें दुध बचा हुआ था।

अभिषेक का जल नाली नुमा धार से बहा दिया गया। महेश बाते करते जा रहा था– प्रभु मेरे बच्चों ने खीर खाने की इच्छा की है। आप बड़े दयालु अंतर्यामी है।

दूध के पैकेट मिलने से पाँव के छाले का दर्द फीका पड़ गया। सहलाता हुआ दरवाजे पर गिरा चढ़ा नारियल और चिरौंजी दाने उठाता गदगद हो हर-हर बम-बम की टेर लगाता उल्लास के साथ घर की ओर बढ़ चला।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका#70 – सीमा – रेखा… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– सीमा – रेखा ..” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # 70 — सीमा – रेखा — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

संत अपने व्यक्तिगत कक्ष में अकेले खा रहा होता। जबकि लोग पंडाल में समूहगत बैठ कर खाते। उन लोगों में बड़ी आत्मीयता बनी हुई थी। उन्हें देखते संत का मन भारी हो रहा था। उसने माना जीने के लिए लोगों के साथ कौर लेने में उसकी हिस्सेदारी कभी न बन पाती थी। पर यह सीमा तो उसी ने निर्धारित की थी। आज उसे अनुभूति हुई वह समाज में ऊपर रह सकता है, लेकिन समाज में उतर नहीं सकता।

 © श्री रामदेव धुरंधर

24 / 07 / 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “प्यार की धुन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “प्यार की धुन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

मैं चौक पर किसी सवारी की इंतज़ार में खड़ा था। कुछ फासले पर एक विकलांग भी शायद इसी उम्मीद में खड़ा हुआ था। मैले कुचैले, गंदे से कपड़े पहने बैसाखियों के सहारे। मैं सोचने लगा कि इसे कौन अपने ऑटो में बिठायेगा ?

तभी एक ऑटो रुका। मैं पिछली सीट पर बैठ गया। वह ऑटो चालक उतरा और उस विकलांग को बड़े प्यार से अपने साथ वाली सीट पर बैठने में उसकी मदद करने लगा। मेरा भी हृदय पिघल गया। मैंने फैसला किया कि इसका किराया मैं ही चुका दूंगा।

कुछ स्टाॅपेज के बाद उस विकलांग का स्टाॅपेज आ गया। इससे पहले कि मैं कहता कि किराया मैं दूंगा ऑटो चालक ने उसे उतने ही प्यार से सहारा देकर उतारा और बैसाखियों के सहारे खड़ा कर दिया। और जैसे ही उस विकलांग ने पैसे देने के लिए जेब में हाथ डाला, ऑटो चालक ने बिना कुछ कहे ऑटो आगे बढ़ा दिया।

मैं ऑटो चालक के इस पुनीत भाव को देखकर जैसे हैरान था और भौचक्का भी। इसे कहते हैं सहयोग। बिना किसी प्रकार की हमदर्दी दिखाये या शोर शराबा मचाये .. और जैसे कहीं कोई बांसुरी की मधुर धुन बजने लगी ….या कहीं दूर मंदिर की घंटियां सुनाई देने लगीं….

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ दोन लघुकथा – ‘सैनिकाची आई‘ / ‘मातीतच संपतो‘ ☆ श्री मयुरेश देशपांडे ☆ श्री मयुरेश देशपांडे ☆

श्री मयुरेश देशपांडे

? जीवनरंग ?

☆ दोन लघुकथा – ‘सैनिकाची आई‘ / ‘मातीतच संपतो‘ ☆ श्री मयुरेश देशपांडे

१) सैनिकाची आई…

मी मागे वळून पाहिलं आणि हातातली सतार अलगद खाली ठेवली. शारदा ताईंना झोप लागली होती. मी हळूच खोली बाहेर आले. ओसरीच्या पायऱ्यांवर खांबाला टेकून निवांत बसले. हि रात्र माझ्या आयुष्यात दरवर्षी येते. सकाळपासूनच शारदा ताई अस्वस्थ होतात. मनोसोक्त रडतात. जुन्या आठवणी सांगतात. अगदी रात्री उशिरा पर्यंत त्यांना झोप येत नाही. मग मी देवघरातल्या समईची वात सारखी करते. हातात सतार घेऊन देवापुढे बसते व एकेक अभंग गायला सुरवात करते. शारदा ताईच काय सारा आश्रम तल्लीन होऊन ऐकत असतो. कोणी साथ देतो, कोणी तान देतो तर कोणी नुसतच गुणगुणतो.

पाहता पाहता सारा आश्रम शांत झोपी जातो. चार पाच अभंगांनंतर तर शारदा ताईंनाही झोप लागते. आणि मग मी अशीच बाहेर येऊन खांबाला टेकून ओसरीच्या पायऱ्यांवर बसते. साऱ्या आश्रमाला धीर देणाऱ्या शारदाताई स्वतःला मात्र कधीच धीर देऊ शकल्या नाहीत. सगळ्यांना दुःख विसरायला शिकविणाऱ्या शारदाताई स्वतःचे दुःख कधीच विसरु शकल्या नाहीत.

हेमंतराव शहिद झाले तेव्हा अगदीच सुरवातीचे काही दिवस वगळता, त्या धैर्याने उभ्या राहिल्या. आदित्यला सैनिकी शाळेमध्ये आधीच घातले होते. तिथून राष्ट्रीय संरक्षण प्रबोधिनी आणि मग लष्करातला बडा अधिकारी असा आदित्यचा प्रवास झपाट्याने झाला. तो वडिलांची जागा घेईल असे म्हणता म्हणता त्याने ती जागा घेतली सुद्धा. शारदा ताईंनी त्याला फोटोंमध्येच मोठा होताना पाहिले. आपले सर्व शिक्षण व लष्करातले पहिले पोस्टिंग संपवून पहिल्यावहिल्या अधिकृत सुट्टीवर तो घरी आला.

सुरुवातीला दार उघडले तेव्हा शारदाताईंना समोर हेमंतराव असल्याचाच भास झाला. तोच उंचधिप्पाड देह, तीच अधिकाऱ्याची टोपी, तोच कडक इस्त्री केलेला गणवेश, उजव्या खिश्याच्या वरती विविध पदकांची दाटी, पण मान मात्र विनम्रतेने खाली झुकलेली. आई आत घेणार नाहीयेस का? त्याच्या प्रश्नाने शारदाताई भानावर आल्या व समोर हेमंतराव नाही तर जणू त्यांचेच प्रतिरुप असलेला आपला मुलगा आदित्य आहे याची त्यांना जाणीव झाली.

आदित्य घरी आला आणि घराचे पुन्हा गोकूळ झाले. त्याच्या मित्रांचे येणे जाणे, त्यांचा गोंधळ, सारे काही त्या कानांत आणि डोळ्यांत साठवून घेत होत्या. त्याचे लाड पुरवता पुरवता त्याची सुट्टी कधी संपत आली हे कळलेच नाही. एके दिवशी भिंतीवरच्या कालनिर्णयावर फुली मारणाऱ्या आईला पाहून, आई मी सुट्टी वाढवून घेऊ का? तश्या बऱ्याच रजा आहेत बाकी, आदित्यने विचारले. इतर कोणाची आई असते ना, तर पटकन हो म्हणाले असते. पण मी एका सैनिकाची आई आहे, शारदाताईंनी आदित्यला आपले उत्तर सांगितले.

दुसऱ्या दिवशी सकाळी त्यांनी आदित्यला लवकर उठविले. आई झोपु दे ना, परत अशी झोप नाही मिळणार, आदित्य डोक्यावर गोधडी घेत म्हणाला. चल उठ लवकर, आज आपल्याला एका महत्वाच्या ठिकाणी जायचे आहे, शारदा ताईंनी एवढेच सांगितले. समोरच्या कमानीवर मोठ्या अक्षरांत मातोश्री वृद्धाश्रम असे लिहिले होते. त्याला काहीच कळत नव्हते. ते दोघे कार्यालयात गेले. या शारदा ताई, तुमचा फॉर्म भरुन तयार आहे, निर्मला ताईंनी दोघांचे हसून स्वागत केले.

आई हे काय चालले आहे? आदित्य जवळ जवळ ओरडलाच. शांत हो बाळा. आपण बाहेर पडल्यावर बोलू. हे बघ तुझे बाबा गेले तेव्हाच खरे तर मी एकटी पडले होते पण तुझी जबाबदारी होती म्हणून दिवस कसे गेले कळलेच नाही. आता तुझी जबाबदारी संपली आहे. तु कामावर चालला आहेस. कमीतकमी अकरा महिने तरी घरी परत येणार नाहीस. मग एवढे दिवस घर मला खायला उठेल. इथे माझ्या वयाच्या बायका आहेत, त्यांच्यात मी सहज मिसळून जाईन.

आदित्यला खरे तर आईचा निर्णय पटला नव्हता पण त्याचवेळी तिच्या चेहऱ्यावरचा आनंद त्याला निश्चिंत करत होता. आठवड्याभरात तो सैन्यात आणि शारदाताई आश्रमात परतल्या. इथे सगळ्यांबरोबर मिळून मिसळून राहता राहता इथल्या कधी झाल्या हेच कळाले नाही. मला तर त्यांनी आपली मुलगीच मानले होते. किंबहुना आश्रमातले सगळेच तसे म्हणतही होते. आम्ही दोघी एकमेकींवर जीवापाड प्रेम करत होतो. माझे संगीत माझे गाणे त्यांना प्रचंड आवडत होते.

तो दिवस आलाच, जो कुठल्याच सैनिकी कुटुंबाच्या जीवनात येऊ नये असे त्या कुटुंबाला कायम वाट असते. दारावरची तार आणि टिव्हीवरची बातमी एकाच वेळी आले. आदित्य नक्षलवाद्यांशी लढता लढता शहीद झाला होता. शारदा बाई कोसळल्याच. आणि यावेळी मात्र उभ्याच नाही राहिल्या. ज्यांनी आयुष्यात अनेकांना उभं केलं त्यांना कोणीच उभं करु शकले नाही. एरवी वर्षभर त्या नॉर्मल असतात. पण हा दिवस आला की कपाटात लपवलेला आदित्यचा फोटो बाहेर काढतात आणि दिवसभर रडत बसतात. अगदी रात्री उशिरा पर्यंत.

काही तरी वाजले आणि माझी तंद्री तुटली. मांजरच असावे बहुतेक. मी पुन्हा आत आले. शारदाताईंना शांत झोप लागली होती. त्यांच्या मानेखालची उशी नीट केली. अंगावर पांघरुण घातले आणि मीही आता बाजूच्याच पलंगावर झोपी गेले.

 – लेखक म. ना. दे. (होरापंडीत मयुरेश देशपांडे)

 +९१ ८९७५३ १२०५९

*  *  *   * 

(२) मातीतच संपतो… 

“ये अंबूजा सिमेंट से बनी दिवार है, तुटेंगी नहीं|”, भिंतीवरती पिवळ्या रंगावर निळ्या रंगाने लिहिलेली अंबूजा सिमेंटची जाहिरात तीने पाहिली आणि इथच घर बांधू असे ती पटकन म्हणाली. माझ्यासाठी ती एक साधी झोपडी असली तरी तिच्यासाठी तीच घर होत. तीच्या चेहऱ्यावरचा आनंद आणि उत्साह बघून मी हि तीथेच झोपडी उभारायचे ठरविले. त्याच सोसायटीमध्ये मी सुरक्षारक्षक म्हणून कामाला असल्याने कोणी विरोध करायचाही प्रश्न नव्हता.

तिने हातातली वळकटी खाली ठेवली. मी हि डोक्यावरचे ओझे उतरवले. तीला सामानापाशीच हुशारीने थांबायला सांगून झोपडी उभारण्यासाठीचे सामान शोधायला निघालो. जवळच हे मंडपवाला होता. खूप विनवणी केली तेव्हा त्याने त्याच्याकडचे त्याच्यासाठी टाकाऊ पण माझ्यासाठी उपयुक्त असे काही बांबू दिले. पुढे थोड्याच अंतरावर एका राजकीय पक्षाचे कार्यालय होते. कार्यालयाच्या मागच्या अडगळीत काही जूने फ्लेक्स पडलेले होते. विनंती करुन ते फ्लेक्स उचलून आणले.

सामान ठेवले होते तिथे आलो. वाट पाहून बायकोने रस्त्यावरच अंग टाकले होते. नुकताच डोळा लागला असावा. उठवावे वाटत होते पण नाही उठवले. मी एकट्यानेच झोपडी बांधायला घेतली. एकाला एक बांबू जोडले. बाजूने व वरून फ्लेक्स बांधले. आतली जमीन थोडी सारखी केली. किमान आडोसा होईल असे बांबूचेच एक दार बनविले. मग एकेक करुन सामान आत ठेवले. जेव्हा तिच्या डोक्या खालची वळकटी फक्त आत ठेवायची बाकी राहिली, तेव्हा तिला उठवले.

आपल्याला झोप लागली हे लक्षात आल्यावर तीची तीलाच लाज वाटली. पण मग जेव्हा समोर उभारलेला रंगीबेरंगी महाल बघितला तेव्हा तिच्या आनंदाला सीमा उरली नाही. क्षणाचीही उसंत न घेता तिने आजूबाजूचे आंगण झाडून काढले. दारासमोरल्या मातीवर रेघोट्या ओढत नक्षीदार रांगोळी काढली. मग यलम्मा देवीचे नाव घेत रीतसर उजव्या पायाने तिने झोपडीत प्रवेश केला. माझ्या झोपडीमध्ये आज खऱ्या अर्थाने लक्ष्मी आली.

जुजबी लिहिता वाचता येणाऱ्या तिने झोपडीत प्रवेश करताच ती ओळ पुन्हा वाचली.. ” ये अंबूजा सिमेंट से बनी दिवार है, तुटेंगी नहीं |” आणि स्वतःशीच हसली. तिला चुलीसाठी विटा व लाकडं आणून दिली. पण बनवायच काय? मस्तपैकी काळ्या कोंबड्याचं वशाट आणा. फक्कड तांबडा रस्सा बनविती तुमच्यासाठी. आज आपला पहिला दिवस हाय ना व्ह. यलम्मा देवीला छानपैकी नैवेद दाखवू आणि सुरवात करु. ” तिची भोळी बाबडी श्रद्धा बोलली.

नविनच सोसायटी होती. अजून बांधकाम शंभर टक्के पूर्णभी झाल नव्हतं. काही बिर्हाड राहिला आली होती, काही यायची होती. मला बिल्डरनेच सुरक्षारक्षक म्हणून कामाला लावले. सहा महिने झालं असतील. माझं नवीनच लग्न झालेलं. किती दिस बाहेरच खाणार आणि किती दिसं बायकोपासून लांब राहणार म्हणून या वक्ताला तीलाबी सोबत घेऊन आलो. गाठीशी थोडी दमडी जमली होती त्यातुनच वशाट आणलं आणि थोडी मीठ मिरची. खोटं कशाला सांगा, वाटेत मापट भर लावून आलो होतो. तीला सांगणार नव्हतोच पण चेहऱ्यावरची तरतरी बघून तीला समजलेच. पहिलाच दिवस म्हणून तीहि काय बोलली नाय.

किती दिसांनी जवळ झोपत होतो. रात्रभर दोघांच्या डोळ्याला डोळा लागला नाही. सकाळी उठायला उशीर झाला. मालक आले तेव्हा गेट उघडायला कोणीच नाही बघून चिडले पण पहिला दिवस म्हणून माफ केले. एकेक दिवस जाऊ लागले. आमचं बस्तान बसलं होतं. मी सुरक्षारक्षकाचं काम करत होतो. तीने पण सोसायटीत दोन कामे मिळवली होती. सगळे कसे छान चालले होते. आमचा संसार फुलला होता, त्याला दोन फळेबी आली होती.

एक दिवस ती काळरात्र आली. खरे तर गेली चार दिवस तुफान पाऊस पडत होता. पण आज जरा पावसाने रौद्ररुप धारण केले होते. कडाडणाऱ्या वीजा काळजात धडकी भरत होत्या. संध्याकाळी मालक गेला तसे मी गेट बंद करुन झोपडीकडे धाव घेतली. घराबाहेर पडता येत नाही म्हणून पोर कंटाळून गेली होती. त्यांच्याशी गप्पागोष्टी करता करता रात्र झाली. पावसाच्या आवाजाने झोप लागणे अशक्य होते, तरी दिवसभराच्या थकव्याने कशीबशी झोप लागली.

मध्यरात्री धडाम् करुन मोठा आवाज झाला. बायकोला पोरांपाशीच ठेवून मी बाहेर धावलो. सोसायटीच्या भिंतीला लागून असलेले मोठे झाड जमिन खचल्याने सोसायटीच्या कंपाउंड वॉलवर कोसळले होते. त्या कंपाउंड वॉलवर जीला लागून माझी झोपडी होती. मी मदतीसाठी धावणार तेवढयात दुसऱ्यांदा मोठा धडाम् आवाज झाला आणि त्या आवाजाबरोबर माझी दातखीळ बसली. कारण तो आवाज कंपाउंड वॉलची भिंत कोसळल्याचा होता. आणि त्या भिंतीखाली माझी संसार वेल तीला आलेली फळे सारे काही दबले गेले होते. त्यांचा आक्रोश त्या मातीखाली दाबला गेला होता कायमचाच.

माणूस मातीतून जन्म घेतो आणि मातीतच संपतो असे म्हणतात. मी आज ते अनुभवत होतो. मला राहून राहून माझ्या भोळ्याभाबड्या बायकोने जे वाक्य वाचले होते ते आठवत होते, ” ये अंबूजा सिमेंट से बनी दिवार है, तुटेंगी नहीं |”.

लेखक : म. ना. दे. (होरापंडीत मयुरेश देशपांडे)

C\O श्री मंदार पुरी, पहिला मजला, दत्तप्रेरणा बिल्डिंग, शिंदे नगर जुनी सांगवी, पुणे ४११०२७

+९१ ८९७५३ १२०५९  https://www.facebook.com/majhyaoli/

टीप: इथे “अंबुजा सिमेंट” हे नाव एक उदाहरण म्हणून घेतले आहे. प्रत्यक्षात माझा त्या कंपनीशी कोणताही हेवादेवा नाही.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – एकाकार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – एकाकार ? ?

‘मैं मृत्यु हूँ। तुम मेरी प्रतीक्षा का अंतिम विराम हो। मैं तुम्हारी होना चाहती हूँ पर तुम्हें मरा हुआ नहीं देख सकती..,’ जीवन के प्रति मोहित मृत्यु ने कहा।

‘मैं जीवन हूँ। तुम ही मेरा अंतिम विश्राम हो।  तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा क्योंकि मैं तुम्हें हारा हुआ नहीं देख सकता..’, मृत्यु के प्रति आकर्षित जीवन ने उत्तर दिया।

समय ने देखा जीवन का मृत होना, समय ने देखा मृत्यु का जी उठना, समय ने देखा एकाकार का साकार होना।

?

© संजय भारद्वाज  

12:56 बजे रात्रि, 13 जुलाई 2023

 अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से रक्षाबंधन तदनुसार शनिवार 9 अगस्त तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगासाथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे। 💥 

💥 101 से अधिक मालाजप करने वाले महासाधक कहलाएंगे 💥

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # 77 – बदली सोच… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बदली सोच।)

☆ लघुकथा # 77 – बदली सोच श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

बाहर गली में अमिता की दोस्त रागिनी ने आवाज दिया “क्या बात है आज तुम मेरे घर बुलाने नहीं आई? क्या कॉलेज नहीं जाना है?”

अमिता ने कहा- “चलना तो है लेकिन मेरे पास किताबें नहीं है?”

कोई बात नहीं कॉर्नर में जो दुकान है वहाॅं पर आओ चलो हम अंकल से बात करते हैं शायद  कुछ रास्ता निकल आए।”

“अंकल क्या आपके पास  फर्स्ट ईयर की किताबें हैं मिल जाएगी।”

दुकान वाले ने कहा – “रागिनी बेटा तुम्हारे पापा तो कल ही किताबें खरीद कर गए हैं?”

“अंकल मेरी सहेली के पास किताबें नहीं है उसे चाहिये। क्या कोई आपकी जानकारी में बच्चा है जो हमें पुरानी किताबें दे सके।”

“हाॅं बेटा कुछ लोग जब पढ़ाई उनकी खत्म हो जाती है तो वह सारी किताबें मेरे पास छोड़ जाते हैं कि यदि कोई जरूरतमंद बच्चा जिसके पास पैसे नहीं है? वह यह किताबें ले सकता है।”

“शर्त यह है कि तुम दोनों को पढ़ने के बाद जब साल पूरा हो जाएगा तब अपनी किताबें मुझे जाकर देनी पड़ेगी।”

अमिता के चेहरे खुशी के मारे आंसू निकल रहे थे और बिना कुछ कहे ही वह बहुत कुछ कह रही थी सारी किताबें बड़े अच्छे से इकट्ठा करने लगी।

अमिता की आंखों से ऑंसू गिर रहे थे।

रागिनी ने अंकल की दुकान से एक अच्छा सा बैग खरीदा और सारी किताबें  उसमें रख दी और एक ऑटो रिक्शा रोका और बोला रोते ही रहेगी कॉलेज नहीं जाना है क्या?

दोनों हंसते हुए ऑटो रिक्शा में बैठ जाती हैं।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ विवाह संस्था का दरकता स्थापत्य–शिलांग प्रकरण ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ आलेख ☆ विवाह संस्था का दरकता स्थापत्य–शिलांग प्रकरण ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

विगत कुछ वर्षों से सामाजिक संरचना में होनेवाले भयावह परिवर्तन दहशतनाक दृश्य उपस्थित कर रहे हैं। विकराल आसन्न संकट की

सूचना दे रहे हैं। जो स्त्री पुरुष संबंधों में दरकते विश्वास, प्रेम में धोखा, विकृत मानसिकता,माता-पिता की रूढ़िवादी सोच तथा सूचना संचार क्रान्ति से उपजी विस्फोटक स्थिति का तस्करा करती हैं।

कहने की जरूरत नहीं कि सदियों से सताई गयी असूर्यपश्या स्त्रियों के लिये शिक्षा और आत्मनिर्भरता के साथ उजालों की व्यवस्था की गयी ताकि वे इस आलोक मैं अपने वजूद को पहचान सकें।

स्त्री पैदा नहीं होती बना दी जाती है सिमोन द बोउआर के शब्दों का मर्म समझे। अपने दोयम दर्जे से मुक्त हो। उसे एक इन्सान की तरह जीने की सुविधा मिले।

इस विचारधारा के साइड इफेक्ट के रूप में एक ऐसा वर्ग उदित हुआ जो वीमेंस लिब के नाम पर स्वच्छन्दता और स्वैराचार का हिमायती हो गया। ऐसी में कितने ही अप्रिय और भीषण दृश्य सामने आने लगे।

ड्रग्स,ड्रिंक्स, स्मोकिंग ,मुक्त यौन संबंधों के चलते असंस्कृत प्रकरण समाज को दहलाने लगे।

सूक्ष्मवस्त्रधारिणी स्त्रियों ने स्लोगन दिया–मैं जो चाहे करूं मेरी मर्जी। वे स्टैंड अप काॅमेडी में अश्लील गालियां देती हुई पाई जा रही हैं।

ओ टी टी प्लेटफार्म पर प्रस्तुत, विकृत फिल्में हिंसा यौनाचार से जनता को उत्तेजित करती हैं। निर्माताओं को धन उगाहना है। देश जाये भाड़ में। सेंसर बोर्ड यानी बिजूका। टी वी पर क्राइम थ्रिलर भी दुष्टों को उकसाते हैं। उनकी कुत्सित सोच को खाद पानी देते हैं। स्मार्ट फोन भी पीछे नहीं। अश्लील साइट्स ने किशोरों की मानसिकता में जहर भरने का काम किया है। टीन एजर बच्चे जल्दी गिरफ्त में आते हैं। आजकल तीन साल के बच्चे को मोबाइल देने का फैशन है। कच्ची उम्र में माता पिता के मनोवैज्ञानिक ट्रीटमेंट की भारी जरूरत होती है। आधुनिकता के नाम पर निरंकुश आजादी के दुष्परिणाम समाज देख रहा है। । रेप और हत्याओं का सिलसिला इसी की परिणति है।

विश्वास ही एक ऐसी चीज है जिसके आधार पर राष्ट्र की हर इकाई, समाज परिवार और सारे रिश्ते परवान चढ़ते हैं। संस्कृति की दुहाई दी जा सकती है।

यह सारा कथानक इसलिए कि समाज का ढाँचा चरमरा रहा है। प्रेमी की मदद से पति की हत्या के प्रकरण लंबे अर्से से सुर्खियों में हैं। एक सुन्दर शिक्षित दुल्हन के रूप में कोई नागिन हत्यारिन डसने वाली है, ऐसी कल्पना भी कोई कैसे कर सकता है। मुस्कान ने प्रेमी के साथ पति के टुकड़े टुकड़े कर दिये और ड्रम में भर दिये। “—नीला ड्रम” लंबे समय तक दहशत का प्रतीक बना रहा।

और अब ताजातरीन “शिलांग प्रकरण”—इन्दौर की सोनम ने हनीमून के ख्वाब दिखाए और शिलांग में अपने पति राज रघुवंशी की हत्या करवाई। हैरानी है कि जो लड़की 20 लाख की सुपारी देकर इतने जघन्य कांड को अंजाम दे सकती है वह सीधे सीधे माता पिता से शादी के लिये मना कर सकती थी या प्रेमी संग भाग सकती थी। एक बेकसूर की हत्या कर डाली। अंततः सलाखों के पीछे ही उम्र गुजारेगी। ये किस प्रजाति की स्त्रियों का उदय हो रहा है। इन्हें परिणाम का भय नहीं होता। क्या इन्हें जरा भी अंदेशा नहीं होता कि फाँसी मिलेगी या आजीवन कारावास।

एक ने तो शादी के मंडप में वरमाला हाथ में लेकर दूल्हे से कह दिया कि वह किसी और से प्यार करती है लिहाजा ये शादी नहीं कर सकती। काश वह लड़की माता पिता की इज्जत की ऐसी धज्जियां न उड़ाती। और माता पिता को बेटी के प्रेम प्रकरण की भनक न हो ऐसा तो हो नहीं सकता।

पुणे का “लिव इन “कपल भूले नहीं होंगे लोग जहां पुरुष ने स्त्री को मारकर उसके टुकड़े फ्रिज में रख दिये थे।

इन दुर्दांत घटनाओं के अलावा डिवोर्स से लेकर एलीमनी गाँठना और प्रेमी संग ऐश करने की घटनाएं भी घटित हो रही हैं।

बेंगलुरु मेरठ आगरा मुंबई कितने शहरों के नाम लिये जायें। दुष्ट महिलाएं बेखौफ हैं। इधर शादी के आकांक्षी युवाओं में खौफ छाया हुआ है। दुल्हन के रूप में यमदूती न आ जाये कहीं। खून पसीने की कमाई एलीमनी की भेंट न चढ़ जाये।

यह विवाह संस्था के स्थापत्य की ढहती हुई दीवारों की ओर इशारा है।

अधिकांश कानून स्त्रियों के पक्ष में हैं। विवाहेतर संबंधों में स्त्री को पीड़िता का दर्जा दिया गया है। दहेज प्रताड़ना के दृश्य भी विचलित करते हैं। आश्चर्यजनक हैं ऐसी खबरें कि कुछ लड़कियां खुद भारी भरकम दहेज चाहती हैं। रक्षा के लिये निर्मित कानूनों का बेजा फायदा उठा रही हैं स्त्रियां। वे अपनी नैसर्गिक छवि का जनाजा निकाल रही हैं।

माता पिता –बच्चों की परवरिश और नैतिक मूल्यों को लेकर सचेत हों और समाज में नाक कटेगी इस सड़े विचार को लेकर समाज का ही नुकसान न करें। जब बेटी हत्या करवाती है तब नाक नहीं कटती ?

संबंधों की चूलें हिल चुकी हैं। अगर वक्त रहते पारिवारिक परिवेश और बासी बेकार मान्यताओं को लेकर लोग सजग न हुये तो और भी कई गुनाह जन्म ले सकते हैं। वक्त बेशक पीछे मुड़ना नहीं जानता पर परिवार प्रणाली का पुनरीक्षण करने की महती आवश्यकता है। शिलांग हत्याकांड के सूत्र हर रिश्ते को आईना दिखा रहे हैं। कोई भी गुनाह एक दिन के विचार की परिणति नहीं होती। वह समय के साथ परिवेश से खाद पानी लेता हुआ पल्लवित होता है। तब दायित्व के निर्वाह को लेकर हर रिश्ते को कठघरे में उपस्थित किया जाना चाहिए।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

नागपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – सुचालक ☆ सुश्री सविता मिश्रा ‘अक्षजा’ ☆

सुश्री सविता मिश्रा ‘अक्षजा

परिचय

शिक्षण : प्रयागराज विश्वविद्यालय से स्नातक (हिंदी, राजनीति-शास्त्र, इतिहास) 

सृजन की विधाएँ : लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, छंदमुक्त कविता, पत्र, आलेख, समीक्षा, जापानी-विधा हाइकु-चोका आदि।

प्रकाशित कृतियाँ : ‘रोशनी के अंकुर’ एवं  ‘टूटती मर्यादा’ लघुकथा संग्रह तथा  ‘सुधियों के अनुबंध’ कहानी संग्रह। अस्सी के लगभग विभिन्न विधाओं में साझा-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित। सम्पादन :  ‘खाकीधारी’ 2024{लघुकथा संकलन} ‘अदृश्य आँसू’ 2025 {कहानी संकलन} ‘किस्से खाकी के’ 2025 {कहानी संकलन} ‘उत्तर प्रदेश के कहानीकार’ 2025 {कहानी संकलन}

पुरस्कार : लघुकथा/समीक्षा/कहानी/व्यंग्य/कविता विधा में कई बार पुरस्कृत। आकाशवाणी आगरा से कहानी प्रसारित 

अनुवाद : ‘अदहने क आखर’ अवधी अनुबाद [लघुकथा-संकलन], कुछ लघुकथाएँ पंजाबी, उर्दू, नेपाली और उड़िया में अनूदित होकर प्रकाशित।

यू ट्यूब चैनेल :  ‘savita mishra akshja’ और ‘साहित्य एक समुन्दर: ‘अक्षजा’ नाम से।  ब्लॉग : ‘मन का गुबार’ एवं ‘दिल की गहराइयों से’।

सम्प्रति: परिवार की धुरी, ब्लॉगर, साहित्यकार, यूट्यूबर।

☆ लघुकथा – सुचालक ☆ सुश्री सविता मिश्रा ‘अक्षजा’ ☆

“आज मेरे मैसेज का तुमने कोई जवाब नहीं दिया।”

“सिर में दर्द हो रहा था यार।”

“क्यों! क्या हुआ?”

“अरे जानती ही हो, फेसबुक पर कहीं पार्टी विरोधी और समर्थकों की लम्बी हांक, तो कहीं जातिवाद का जहर।”

“अरे तो कौन कहता है कि फेसबुक की सारी पोस्ट पढ़ों!”

“सारी कौन पढ़ रहा। लेकिन फ्रेंडलिस्ट वालों की पोस्ट-कमेन्ट तो दिख ही जाती हैं। कमेन्ट ऐसे कि बुझ चुकी राख में भी आग पैदा कर दें।

“हटाओ अपनी फ्रेंड-लिस्ट से ऐसे सिर-दर्दो को, क्यों झेले पड़ी हो?”

“अरे यार! जातिवाद का जहर बोते देखकर क्रोध में दिल तो मेरा भी यही कहता है। उनकी प्रोफाइल खोलती भी हूँ, लेकिन अनफ्रेंड पर गया मेरा अँगूठा उस समय रुक जाता है, जब उनके द्वारा कहा गया दीदी/जिज्जी का सम्मानजनक संबोधन याद हो आता है।”

“भावनाओं में बहकर तुम उनके नकारात्मक विचारों को बढ़ावा दे रही हो, फिर से सोच लो!”

“नहीं यार, तू समझती क्यों नहीं है! ये दीदी/जिज्जी मेरे लिए सिर्फ शब्द नहीं है, बल्कि अपनेपन की मिठास है। मैं उन्हें अन्फ्रेंड करके इस रिश्ते को कसैला नहीं करना चाहती हूँ।”

“चाहे अपनी बात को शिष्टता से रखने पर भी वो तुम्हें अनफ्रेंड कर दें! पीठ पीछे तुम्हारी इस परम्परावादी सोच की चाहे हँसी ही क्यों न उड़ाएं! क्यों?” क्रोध की लकीरें दोनों के माथे पर उभर आई थीं।

“तू जानती है न कि स्त्रियाँ रिश्तों की सुचालक होती हैं। वे रिश्तों को तब तक जीना चाहती हैं, जब तक पानी सिर के ऊपर से न बहने लगे।” अब दोनों के चेहरे पर गर्वीली मुस्कान कानों तक खिंच गयी थी ।

© सुश्री सविता मिश्रा ‘अक्षजा’

सम्पर्क: फ़्लैट नंबर-302, हिल हॉउस, खंदारी अपार्टमेंट {हनुमान मन्दिर के बगल में} खंदारी, आगरा, {उ. प्र.} पिन-282002

ई-मेल: 2012.savita.mishra@gmail.com मोबाइल: 09411418621

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा कहानी – लघुकथा – “बच्चे पालने हैं…” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा कहानी – लघुकथा – “बच्चे पालने हैं ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

आज मेडिकल हाल बंद था ।

क्यों ? साथ वाले करियाना के दुकानदार से पूछा ।

कुछ बता नहीं पाया ।

काफी दिनों से यहीं दवाई लेने से एक मुस्कान का रिश्ता बन गया था और नम्बर भी ले लिया था । 

फोन मिलाया ।

-क्या हुआ ? मेडिकल हाल बंद क्यों है ?

-चालान हो गया ।

-क्यो ?

-नकली ग्राहक आया और बिना पर्ची वाली दवाई दे बैठा।

-फिर सात दिन मेडिकल हाल बंद करने का सरकारी हुक्म ।

-कब खुलेगा मेडिकल हाल ?

-बस । कल का दिन और बंद रहेगा ।

-जब इतनी बड़ी बात थी तो खोलने का हुक्म कैसे?

-ले लिया न माल इंस्पेक्टर ने ।

-अरे । ऐसे कैसे ?

-यह इंस्पेक्टर ऐसा ही है । कुछ दिन पहले सामने वाले केमिस्ट से भी ले गया ।

-तुमसे कितने ले गया ?

-छोड़ो जी ।

-क्यों ?

-बच्चे पालने हैं ।

-मैं तुम्हारे पैसे वापस दिला सकता हूं ।

-कैसे ?

-अधिकारियों तक मामला ले जाकर ।

-न जी । ऐसा न करना ।

-क्यों ?

-जो हो गया सो हो गया ।

-अरे ? कोई बड़ा जुर्म नहीं किया और बड़ी रकम ऐंठ ले गया और तुम चुप के चुप सह रहे हो जुल्म?

-बस जी । क्या करें ?…  बच्चे पालने हैं ।

शहीद भगतसिंह ने यदि एक बार भी सोचा होता कि बच्चे पालने हैं तो,,,,

मैं सोचता गया सोचता गया…

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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