हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३६४ ☆ व्यंग्य – “फाइलें चल पड़ी हैं” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३६४ \ ☆

?  व्यंग्य – फाइलें चल पड़ी हैं ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

देश में इन दिनों फाइलों का मौसम हर दिशा में एक साथ चल पड़ा है। परसाई जी के भोलाराम का जीव अभी तक यमराज की सूची और  रिकॉर्ड रूम की फाइलों  के बीच पेंडुलम की तरह झूल ही रहा होगा, क्योंकि यहां फाइल का भविष्य तय होने में वही पुरानी कहावत लागू रहती है कि नौ दिन चले अढ़ाई कोस। भोलाराम की कहानी आज भी सरकारी दफ्तर की टेबल पर पड़ी एक नोटशीट की तरह जीवित है, जिसमें हर पृष्ठ पर केवल यह लिखा रहता है कि प्रस्तुत प्रकरण पर उच्चाधिकारियों के निर्देश अपेक्षित हैं। परसाई के व्यंग्य का निशाना बाबूगिरी थी और है, और उनकी रचना भोलाराम का जीव हमारे समय के लालफीताशाहों पर कालजयी टिप्पणी बनी हुई है।

पर दफ्तर से बाहर निकलते ही अब देश में फाइलें सिनेमा हॉल में भी खुलने लगी हैं। कश्मीर फाइल्स ने दो हजार बाइस में एक बड़ी बहस को जन्म दिया। किसी ने इसे इतिहास के अनसुने पन्नों की प्रस्तुति कहा, किसी ने इसे विद्वेष फैलाने वाली कथा माना, पर इतना तय रहा कि यह फिल्म बक्से से निकली उस फाइल की तरह थी जो बरसों तहखाने में पड़ी थी और एक दिन अचानक प्रकाश में लायी गयी। उस पर समर्थन हुआ, विरोध हुआ, टैक्स छूट हुई, राजनीतिक भाषण हुए, और दर्शक कतार में लगे रहे। यही वह बिंदु है जहां सिनेमा और फाइल संस्कृति का गठजोड़ होता दिखा, जहाँ कहानी, किरदार और फाइल्स में कैद इतिहास  एक साथ पर्दे पर पुनर्जीवित हो रहा है।

बंगाल फाइल्स का ट्रेलर कोलकाता में लॉन्च होना था। कार्यक्रम में तार कटे, हंगामा हुआ, आयोजन रोका गया, फिर किसी तरह जारी भी हुआ। एक फिल्म का ट्रेलर तक अटकती लटकती फाइल जैसा, कभी मंजूर, कभी स्थगित, कभी रद्द, फिर किसी नई मुहर की प्रतीक्षा। ट्रेलर प्रदर्शन भी अभिलेखागार  की खामोशी में बदल गया। यह दृश्य जैसे कह रहा था कि फाइल जहां भी जाती है, वहां बिना टिप्पणी के वापस नहीं आती।

इधर उदयपुर फाइल्स की फाइल अलग खुली हुई है। अदालतें, मंत्रालय, संशोधन, अस्वीकरण, और अंततः थिएटर तक पहुँचना। रिलीज से पहले किसी ने रोक लगाने की दलील दी, किसी ने रिहाई का तर्क रखा, और अंत में परदे पर रोशनी जली। इस दौरान पीड़ित परिवार की पीड़ा भी प्रदर्शनी का हिस्सा बन गई। अदालत और सेंसर की मुहरें, याचिकाएँ और आदेश, सब मिलकर वही पुराने कार्यालयी शब्दकोश के पन्ने पलटते हैं जिनमें कहा गया है कि अभिव्यक्ति और निष्पक्ष सुनवाई दोनों की रक्षा करनी है, बशर्ते फाइल सही डेस्क तक समय से पहुँच जाए।

और हां, फाइलों की यह खनक केवल दो चार शीर्षकों तक सीमित नहीं रही। दिल्ली फाइल्स का एलान भी हुआ, जो अलग पन्ने का इतिहास खोजती दिखाई दी, कभी इसे त्रयी का अंतिम अध्याय बताया गया। अब तो लगता है कि फाइल अभिव्यक्ति की एक विधा बन गई है, जैसे व्यंग्य उपन्यास, कहानी और कविता। यह सिनेमा का फाइलीय युग है, जहाँ कथानक कम और केस हिस्ट्री अधिक होती है, जहाँ स्क्रीनप्ले की पहली पंक्ति होती है कि प्रस्तुत विषय अत्यंत संवेदनशील है और दर्शकों से संयम की अपेक्षा है। पहले डिस्क्लेमर होता था कि किसी सत्य घटना से कहानी का मेल संयोग माना जाए , अब दर्शक ही इस तथ्य से जुड़ते हैं कि फिल्म सत्य घटना से प्रेरित है।

दफ्तर की फाइल हो या फिल्म की फाइल, दोनों में एक साझा तत्व है, विवाद। दफ्तर की फाइल बिना आपत्ति पत्र के आगे नहीं बढ़ती और फिल्म की फाइल बिना बहस अथवा कोर्ट केस  के बॉक्स ऑफिस तक नहीं पहुँच पाती। दफ्तर में नोटशीट पर लाल स्याही बोलती है, सिनेमा में सोशल मीडिया की नीली टिक। उधर बाबू लिखता है कि वांछित जानकारी उपलब्ध न होने से प्रस्ताव फिलहाल रोक दिया जाए, इधर किसी प्रवक्ता की प्रेस कॉन्फ्रेंस में वही वाक्य नया रूप ले लेता है कि विषय पर शांतिपूर्वक विचार चल रहा है। दोनों के बीच जनता खड़ी रहती है, जो कभी टिकट खिड़की पर, कभी जनसुनवाई में लाइन में लगती है, और हर बार आशान्वित होती है कि अगली तारीख निश्चित ही अंतिम होगी।

परसाई शायद आज भोलाराम का जीव लिखते तो पेपरलेस फाइल की दुनिया में यमराज के दफ्तर में भी कंप्यूटर क्रेश करना पड़ता तभी फाइल गुम हो सकती थी, यह आज के डिजिटल युग की व्यंग्य तस्वीर है। हमने कागज़ से पोर्टल तक लंबी यात्रा की, पर कर्सर भी वही करता है जो कभी बाबू की तर्जनी करती थी, स्क्रीन पर अपलोड फोल्डर लिखकर आपको वही पुराना वाक्य पढ़वा देता है कि पुनः प्रयास करें। सामान्य नागरिक की व्यथा वैसी ही बनी रहती है, बस गेट पास की जगह ओटीपी आ गया है, नोटिंग की जगह पीडीएफ लग गया है, और डाक की जगह लिंक। मनुष्य और व्यवस्था के बीच जो फाइल रखी जाती थी, वह अब भी बीच में पड़ी है, बस उसकी जिल्द का रंग बदल गया है।

सिनेमा ने फाइल को लोकप्रिय संस्कृति का पात्र बना दिया है। टिकट लेकर दर्शक फाइल के पन्ने पलटता है, दृश्य दर दृश्य। कभी पीड़ा, कभी रोष, कभी तालियाँ, कभी हूटिंग। अदालतें कहती हैं कि स्वतंत्रता और पूर्वाग्रह के बीच संतुलन चाहिए, सेंसर कहता है कि अस्वीकरण जोड़ दीजिए, निर्माता कहता है कि हमारी मेहनत और निवेश दांव पर है। यह पूरा तंत्र किसी बड़ी रिंग फाइल जैसा है, जिसमें अलग अलग विभाग अपनी अपनी नई शीट डालते जाते हैं और अंततः क्लिप बंद कर देते हैं। रिंग बंद होगी तो फिल्म चलेगी, रिंग खुली रह गई तो प्रेस रिलीज़ ही कहानी बन जाएगी।

सच्चाई यह भी है कि फाइलें केवल तथ्यों का पुलिंदा नहीं, भावनाओं का बहीखाता भी होती हैं। कश्मीर फाइल्स ने एक पुराने घाव को छुआ तो किसी ने ताली बजाई, किसी ने दरार की बात कही। उदयपुर फाइल्स एक ताजा दुख के पास से गुजरी तो परिवार के आँसू भी खबर बने। बंगाल फाइल्स राजनीति के उफान में उतरती है तो माइक के तार भी राजनीति का शिकार हो जाते हैं। हर फाइल के साथ एक राष्ट्र अपनी स्मृति से जूझता है कि क्या याद रखें, क्या भूल जाएँ, और क्या नए शब्दों में दोहराएँ। क्या नई पीढ़ी के लिए  फिर फिर दोहराया जाए क्या इतिहास में दफन किया जाए।

देश का सबसे बड़ा पात्र शायद फाइल ही है। यह उन हाथों की उँगलियों के आकार की हो जाती है जो उसे पलटते हैं, और उन आँखों की रोशनी जितनी तेज हो जाती है जितनी उसे पढ़ने वाले की इच्छा शक्ति। भोलाराम की फाइल यमलोक तक चली गई थी, हमारी फाइलें अभी धरती पर ही घूम रही हैं। अदालत की तारीख, मंत्रालय की मीटिंग, होटल का ट्रेलर लॉन्च, सेंसर की स्क्रीनिंग, सब एक ही महाकथा के अध्याय हैं। इस महाकथा का नायक न कोई स्थापित सितारा है न कोई मंत्री, यह वही पुराना कागज़ है जिसने अपने ऊपर अनगिनत हस्ताक्षर और मुहरें झेली हैं और हर बार चुपचाप अगली मेज तक चला गया है।

शायद हमें एक राष्ट्रीय त्यौहार भी रखना चाहिए, फाइल दिवस। उस दिन हर फाइल को एक बार खुला छोड़ दें कि वह खुद तय कर ले किस मेज पर जाना है। कौन जाने किसी फाइल की आत्मा भी भोलाराम के जीव की तरह आज़ादी माँग ले। और अगर ऐसा हो गया तो दफ्तर के गलियारे थोड़े चौड़े लगेंगे, सिनेमा में बहस थोड़ा संयत होगी, और नागरिक को यह यकीन होगा कि उसकी फाइल अब फाइल नहीं, उसका लिखा हुआ इतिहास है जो किसी भी दिन रिकॉर्ड रूम से, पाठ्यक्रम में लग सकता है। फिलहाल तो यही कह सकते हैं कि देश चलता रहे, फाइलें खुलती रहें, और हम सब दर्शक बनकर देखते रहें कि अगली आवाज किसकी आती है, आदेशित या स्थगित।

अंततः, फाइल की दुनिया में सत्य की परिभाषा भी फाइल जैसी ही है, कहीं आधिकारिक, कहीं वैकल्पिक, और कहीं विवादित। परसाई की कलम ने जो दिखाया था वह आज भी हमारे सामने है, बस मंच बदल गया है। एक ओर सरकारी टेबल, दूसरी ओर सिनेमा स्क्रीन। दोनों के बीच वही पुराना रिश्ता, पहले नोटिंग फिर अभिनय। और जनता, जो हर पंक्ति में अर्थ ढूँढती है, अगले पृष्ठ की प्रतीक्षा करती है, और अंत में ताली बजा देती है कि चलो आज फाइल सचमुच आगे बढ़ गई।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ उनकी चक्की का पता पूछते हैं लोग ☆ श्री तीरथ सिंह खरबंदा ☆

श्री तीरथ सिंह खरबंदा

(ई-अभिव्यक्ति में सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री तीरथ सिंह खरबंदाजी का हार्दिक स्वागत। आपने विधि विषय में पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की है। व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में सतत सक्रिय, विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन-प्रकाशन तथा हलफनामा, इक्कीसवीं सदी के अंतरराष्ट्रीय श्रेष्ठ व्यंग्यकार एवं हमारे समय के धनुर्धारी व्यंग्यकार, साझा संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित। वर्ष 2023 में पहला व्यंग्य संग्रह “सुना है आप बहुत उल्लू हैं” प्रकाशित हुआ। वर्ष 2024 में दूसरा व्यंग्य संग्रह “झूठ टोपियाँ बदलता रहा” प्रकाशित हुआ। वर्ष 2022 में भारतीय स्टेट बैंक द्वारा स्पंदन साहित्य सम्मानसंप्रति : इंदौर में विधि एवं साहित्य के क्षेत्र में सतत सक्रिय। आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – उनकी चक्की का पता पूछते हैं लोग)

☆ व्यंग्य ☆ उनकी चक्की का पता पूछते हैं लोग ☆ श्री तीरथ सिंह खरबंदा ☆

मोटेपन और चक्की का अद्भुत संबंध होता है लोगे अक्सर नव मोटे व्यक्तियों से उनकी चक्की का पता पूछते पाए जाते हैं । बताते हैं कि पश्चिम के देशों में पिछले दिनों तोंद का फैशन चला था उन दिनों बगैर तोंद वाले युवकों को युवतियाँ रिजेक्ट कर रही थीं, पता नहीं हमारे यहाँ यह फैशन अभी तक क्यों नहीं आ पाया है । यहाँ तो उल्टी हवा बह रही है मोटापा कम करने के लिए लोग हेल्थ क्लब, योगा क्लासों की तरफ दौड़ लगा रहे हैं । कई तो योगासन, व्यायाम करते-करते थक जाते हैं, सुबह-शाम भ्रमण करते जूते घिस जाते हैं परंतु वजन कम होने के बजाए इस तर्ज पर बढ़ता ही चला जाता है कि मर्ज़ बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा की ।

पिछले दिनों मोटेपन से संबंधित चंद समाचारों ने मेरा ध्यान आकर्षित किया, अब उन पर मैं आपका ध्यान चाहता हूँ । पहला समाचार था कि – सावधान कहीं आप मोबाइल फोन से मोटेपन के शिकार न हो जाएँ ! और विशेष समाचार विदेश से था कि सुविधा के साधनों में वृद्धि होने से इस शताब्दी के मध्य तक व्यक्तियों का औसत वजन दस किलोग्राम ज्यादा हो जाएगा ।

कहते हैं जब जागो तब सवेरा, तथा देर आए दुरुस्त आए, हम जब जागे तो मोटापा दुरुस्ती हेतु किस्म किस्म की दुकानें हमारे यहाँ भी खुल गईं । स्लिम फास्ट की दुकान वाले भी यह काम लगातार पूरी गारण्टी पर कर रहे हैं । सुनते हैं कि इसकी रोकथाम के लिए शीघ्र ही बाजार में कई नई वैक्सीन भी आ जाएँगी । हालांकि कुछ पेटू किस्म के लोगों का कहना है कि इन उपायों से मोटापन अस्थायी रूप से बिदा होकर बिन बुलाए मेहमान की तरह चंद दिनों के बाद ही पुनः लौट आता है ।

भाग्यवादी मानते हैं कि मोटापन, दुबलापन, लंबापन, छोटापन ये सब प्रकृति के उपहार हैं और मोटापन उनमें से एक अमूल्य उपहार है । एक विज्ञापन में जैसे बतलाया जाता था कि लिखते-लिखते लव हो जाता है, ठीक वैसे ही हँसते-हँसते व्यक्ति मोटा भी हो जाता है । कहते हैं हँसोड़ क्लब इसी सूत्र वाक्य की प्रेरणा से बने हैं । कहते हैं कि कभी कभी व्यक्ति हँसने पर फंस भी जाता है शायद इसीलिए कुछ लोग कहते हुए पाए जाते हैं कि ‘हँसा तो फँसा’ – ये शब्द जब स्त्रीलिंग रूप में व्यवहार में लाए जाते हैं तो वे अत्यंत जोखिम भरे हो जाते हैं जिनसे कहने वाले की साख उलट-पलट सकती है ।

सूत्र बतलाते हैं कि पिछले दिनों मोटेपन से त्रस्त व्यक्तियों ने अपना एक अलग संगठन बना लिया है । अपने वर्ग के लोगों को देखकर ये अत्यंत प्रफुल्लित होते हैं । वे अपने पक्ष में कहते हैं कि हमारे वर्ग का व्यक्ति ईमानदार होता है । वह कभी भी गिरहकट या जेबकतरा नहीं हो सकता है, दौड़ भाग के काम से अक्सर वह दूर ही रहना पसंद करता है । वह कभी भी भ्रष्टाचारी नहीं होता है, भरे पेट की नीयत एकदम साफ होती है । ऐसा व्यक्ति भरपूर जीवन जीता है भरपूर खाता और भरपूर पीता है और फिर भरपूर चैन की नींद सोता है । मोटे व्यक्ति के लिए राजनीति के सँकरे द्वार भी चौड़े हो जाते हैं । दरअसल ऐसे व्यक्ति जहां भी एक बार बैठ या खड़े हो जाएँ वे अपनी जगह खुद ब खुद बना लेते हैं ।

आजकल ऐसे लोगों की राजनीति में जबरदस्त मांग बनी हुई है इसीलिए राजनीति में नए नए आए दुबले पतले महत्वाकांक्षी व्यक्ति शीघ्र ही अपने आकार प्रकार में चौतरफा प्रगति कर लेते हैं  । दरअसल राजनीति में ऐसे व्यक्ति ही नेतृत्व करते जँचते हैं । और सच कहें तो ऐसे लोगों का ही आजकल राजनीति में बहुमत है । पैदल चलना इन्हें बिल्कुल भी नहीं सुहाता है इनसे पैदल चलने को कहना इनके लिए किसी कठोर सजा सुनाने से कम नहीं है ।

ईर्ष्यालु किस्म के कुछ लोग कहते फिरते हैं कि मोटापन एक बीमारी है जिसे ये लोग एक कोरी अफवाह बतलाते हैं और उस पर बिल्कुल विश्वास नहीं करते हैं, इस अफवाह के पीछे ये नितांत दुबले-पतले लोगों का हाथ बतलाते हैं और कहते हैं कि वे लोग अक्सर हमसे जलते रहते हैं ।

जानकार बताते हैं कि जो मोटापन जन्म से होता है वही असली है और जो जन्म के बाद  विकसित होता है वह नकली किस्म का होता है । असली मोटापन कभी भी निठल्लेपन से पनपा हुआ नहीं होता है और न ही कभी वह पराये धन से पोषित होता है । असली मोटेपन पर व्यक्ति गर्व करता है, जबकि नकली पर अक्सर शर्मिंदा होता है । असली मोटेपन पर व्यक्ति स्वयं हँसता है जबकि नकली पर दूसरे । असली मोटापन तो ईश्वर का वरदान है, हम उसकी बनाई गई समस्त आकार प्रकार कि अनूठी आकृतियों को नमन करते हैं ।

©  श्री तीरथ सिंह खरबंदा

ई-मेल : tirath.kharbanda@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 60 – ब्लू ड्रम ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं।

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना ब्लू ड्रम।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 60 – ब्लू ड्रम ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

यह भी एक अजीब दौर है। पहले प्रेम कहानियाँ लिखी जाती थीं, कविताएँ गढ़ी जाती थीं, लेकिन अब तो हर तरफ ‘ब्लू ड्रम’ की चर्चा है। यह ‘ब्लू ड्रम’ अब केवल एक ड्रम नहीं रहा, बल्कि एक प्रतीक बन गया है। प्रतीक उस प्रेम का, जो लाल रंग से नहीं, नीले रंग से लिखा गया है। प्रतीक उस त्याग का, जो पत्नी ने अपने पति के लिए नहीं, बल्कि अपने प्रेमी के लिए किया। और प्रतीक उस आधुनिकता का, जिसमें रिश्तों की डोर इतनी कमजोर हो गई है कि वह एक ड्रम और एक बोरी सीमेंट के भार को भी नहीं सह पाती।

वैसे तो हमारे समाज में प्रेम की परिभाषा बड़ी पुरानी है। लैला-मजनूं, हीर-रांझा, शीरीं-फरहाद – इन सबकी कहानियों में न तो कोई ड्रम था, न कोई सीमेंट। उस जमाने में प्रेम के लिए दीवारें फाँदी जाती थीं, रेगिस्तान पार किए जाते थे, और न जाने क्या-क्या पापड़ बेले जाते थे। लेकिन इस आधुनिक युग में, प्रेम के लिए सबसे आसान तरीका है – पति को मारकर उसे एक ड्रम में भर देना।

हमारे पड़ोस में एक श्रीमान खुसुरफुसुर रहते थे। उनका नाम खुसुरफुसुर इसलिए पड़ा, क्योंकि जब भी वह अपनी पत्नी से बात करते, उनकी आवाज इतनी धीमी होती थी कि कोई दूसरा सुन न पाए। लोग कहते थे, “मालिक, आप इतने धीरे क्यों बोलते हैं? पत्नी से प्रेम है तो चिल्ला कर कहिए!” इस पर श्रीमान खुसुरफुसुर मुस्कुराते हुए कहते, “प्रेम तो है, लेकिन अगर चिल्ला कर कहूँगा, तो सारा मोहल्ला सुन लेगा। फिर कहीं प्रेम की कहानी में कोई तीसरा किरदार न आ जाए।”

लेकिन श्रीमान खुसुरफुसुर की यह सावधानी काम नहीं आई। एक दिन उनके घर से नीले रंग का एक ड्रम बरामद हुआ। और उस ड्रम में सिर्फ सीमेंट ही नहीं, बल्कि श्रीमान खुसुरफुसुर का वह प्रेम भी था, जो उन्होंने अपनी पत्नी के लिए वर्षों से छिपा रखा था।

यह घटना सुनकर श्रीमान खलबली को बहुत दुख हुआ। वह अपने जमाने के आशिक थे, जो अपनी प्रेमिका के लिए सात समंदर पार करने की बात करते थे। लेकिन इस ब्लू ड्रम की कहानी ने उनका दिल तोड़ दिया।

“मास्साब,” उन्होंने मुझसे कहा, “यह क्या हो रहा है? क्या हमारे देश में प्रेम की यह नई परिभाषा है? पहले तो पति-पत्नी के रिश्ते में प्यार होता था, तकरार होती थी, लेकिन अब तो केवल ड्रम और सीमेंट है।”

मैंने उनसे कहा, “श्रीमान खलबली, यह नई परिभाषा नहीं, बल्कि एक नया आविष्कार है। यह प्रेम की ‘मेक इन इंडिया’ पॉलिसी का हिस्सा है। अब प्यार करने के लिए किसी पहाड़ पर नहीं जाना पड़ता, किसी नदी को पार नहीं करना पड़ता, बस एक ड्रम और कुछ बोरियाँ सीमेंट खरीदनी होती हैं। यह तो ‘अटल प्रेम योजना’ का एक हिस्सा है, जहाँ कम खर्च में प्रेम को स्थायी बनाया जा सकता है।”

इस घटना के बाद हमारे मोहल्ले में एक नई बहस शुरू हो गई। कोई कह रहा था कि पत्नी ने गलत किया, तो कोई कह रहा था कि पति ही गलत था। लेकिन एक बात पर सब सहमत थे – ड्रम का रंग नीले के बजाय लाल होना चाहिए था। कम से कम प्रेम तो लाल रंग का होता है।

इस घटना के बाद मैंने सोचा कि क्यों न एक नया बिजनेस शुरू किया जाए – ‘ब्लू ड्रम एम्बलम’। जो भी अपनी पत्नी के प्रेम से तंग आ जाए, वह यह ड्रम खरीद सकता है। और इस ड्रम के साथ एक गारंटी कार्ड भी मिलेगा, जिस पर लिखा होगा – ‘आपका पति अब सुरक्षित रहेगा, और आपका प्रेम स्थायी हो जाएगा।’

इस घटना ने मुझे यह भी सिखाया कि प्यार करने के लिए एक दिल ही काफी नहीं, बल्कि एक दिमाग भी चाहिए। और वह दिमाग जो यह सोच सके कि प्यार को स्थायी बनाने का सबसे आसान तरीका क्या है। अब तो प्रेम की कहानियों में न तो कोई राजकुमार होता है, न कोई राजकुमारी। अब तो केवल एक ड्रम होता है, एक सीमेंट की बोरी होती है, और एक ऐसी पत्नी होती है, जो अपने प्रेम को स्थायी बनाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 361 ☆ व्यंग्य – “आज फिर जीने की तमन्ना है… गुजरा हुआ जमाना” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 361 ☆

?  व्यंग्य – आज फिर जीने की तमन्ना है… गुजरा हुआ जमाना ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

एक तरफ़ तकनीक की उड़ान है, दूसरी ओर रिश्तों की रीढ़ टूट चुकी है। हमारी पीढी, इस सबके बीच, उस ट्रेन में सवार है जिसे न कोई स्टेशन समझ आया, न दिशा, बस ज़िंदगी की परिवर्तन “यात्रा” पर हम तेजी से बढ़े बढ़ते जा रहे है।

वो दिन भी थे जब “चिट्ठी आई है…” सुनते ही आँगन में उत्सव सा माहौल बन जाता था। अब तो “ब्लूटिक” नहीं दिखे तो ब्रेकअप हो जाता है। “कहीं दीप जले कहीं दिल…” की भावना अब बिजली के बिल की तरह बोझिल हो गई है। सारा प्यार अब “नेटफ्लिक्स ऐंड रिलैक्स” के डिब्बे में पैक होकर सीरियल बन चुका है। हमने इस परिवर्तन को जिया है।

“हम हैं राही प्यार के, फिर मिलेंगे चलते-चलते” , ऐसा लगता था मोहल्ले के नुक्कड़ पर किसी दिन पुराने दोस्त मिल ही जाएंगे। पर अब तो दोस्त फेसबुक पर मिलते हैं, और वहीं ब्लॉक भी हो जाते हैं! वर्किंग पति पत्नी तक चैट पर मिलते हैं। पहले मोहल्ला घर जैसा लगता था, अब घर भी होटल जैसा लगने लगा है।

कभी हम मिट्टी में लोट-पोट होते हुए “छोटा बच्चा जान के…” सच्चे बचपन का आनंद लेते थे, अब बच्चे हैं जो आईपैड के टचस्क्रीन को ही माँ की गोद समझ बैठे हैं। रायपुर में एक छोटी स्कूली बच्ची ने बीच सड़क पर आईफोन के लिए ऐसी जिद की कि ट्रैफिक जाम हो गया,पुलिस बुलानी पड़ी । गिल्ली-डंडा, सांप-सीढ़ी, सब हमारे संग इतिहास बन रहा है। अब बचपन भी मोबाइल खेल रहा है। रोते बच्चे को चुप कराने अब मां उसे मोबाईल पकड़ा रही हैं!”

“ना जाओ सैंया छुड़ा के बैयाँ…” जैसी मोहब्बत अब सोशल मीडिया के स्टेटस में सिमट गई है “इन अ कांप्लिकेटेड रिलेशनशिप विद कंफ्यूज़न”। पहले इश्क में खत चलते थे, अब स्क्रीनशॉट वायरल होते हैं। “कुछ तो लोग कहेंगे…” वाली चिंता अब ट्रोलिंग के डर में तब्दील हो गई है।

हमारी पीढ़ी ने देखा है कि कैसे “बारिश के बहाने” छत पर चढ़ कर “काग़ज़ की कश्ती” तैराई जाती थी।

“एक लड़की भीगी-भागी सी…” अब एसी की हवा में फ्रिज जैसी हो गई है। घरों की छतें अब टावरों से घिरी हैं और खिड़कियाँ बस विंडो XP तक सीमित हैं।

“प्यार हुआ इकरार हुआ है…” जैसे रिश्तों का दौर गया। अब प्यार ऑनलाइन डेटिंग ऐप पर होता है, और ‘डेट’ से पहले ‘डेटा पैक’ चेक होता है। पहले पंडित जी गोत्र पूछते थे, अब युवा पूछते हैं ” पासवर्ड शेयर करोगे ?”

“जीना यहाँ, मरना यहाँ…” जैसी बातें अब ई एम आई के टर्म्स और कंडीशन में लिखी जाती हैं। पहले ज़िंदगी एक त्यौहार थी, अब ‘लाइफस्टाइल’ बन गई है। रिश्ते अब रिश्ते नहीं रहे, वो ‘नेटवर्क सिग्नल’ बन गए हैं कमज़ोर पड़ते ही कट जाते हैं!

और राजनीति? “दिल तो पागल है…” वाली मासूमियत अब “जुमलों की बारात” बन चुकी है। पहले नेता जनता के बीच बैठते थे, अब जनता उनके सोशल मीडिया हैंडल पर DM भेजती है , ट्वीट पर समस्या हल हो जाए तो राष्ट्रीय खबर बन सकती है।

पर आशा का दीपक अभी बुझा नहीं। जैसे पुराने रेडियो पर अचानक “लग जा गले…” बज जाए और दिल प्रसन्न हो जाए, वैसे ही शायद भविष्य में एक दिन हम फिर से मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू को महसूस करेंगे। “आने वाला पल जाने वाला है…” – ये पंक्ति अब और गहराई से समझ आती है। जो बीत गया, वह केवल इतिहास नहीं, भविष्य का मार्गदर्शक भी है।

हमें फिर से सीखना होगा “जिंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मकाम…” बस उन्हीं की याद से इंसान बनता है। घर में बुज़ुर्ग अब एल्बम बन चुके हैं, और बच्चे इंस्टाग्राम रील। हमें उस पुल को संभालना है जो इन दो दुनिया को जोड़ता है।

“थोड़ा है, थोड़े की ज़रूरत है…” यही वास्तविकता है। हम जितना पीछे मुड़ कर अतीत से जुड़ कर भविष्य देखेंगे, अगली पीढियों को उतना बेहतर बना पाएँगे।

“चलते-चलते मेरे ये गीत याद रखना…” क्योंकि हमारी तेज परिवर्तन यात्रा के हर मोड़ पर एक सीख है।

“कितना बदल गया इंसान?”

इतना कि अब हर ‘लाइक’ में स्नेह की जगह प्रमोशन की गंध आने लगी है। फिर भी, दिल के किसी कोने में बिनाका गीतमाला आज भी बजती है, कहीं तारों भरी रातों में कोई पुरानी साँस फिर से आह भरती है… और हम मुस्कुरा उठते हैं।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – संस्मरण ☆ दस्तावेज़ # ३२ – मंत्री महोदय की यमलोक में छवि – ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

(ई-अभिव्यक्ति के “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से पुरानी अमूल्य और ऐतिहासिक यादें सहेजने का प्रयास है। श्री जगत सिंह बिष्ट जी (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker) के शब्दों में  “वर्तमान तो किसी न किसी रूप में इंटरनेट पर दर्ज हो रहा है। लेकिन कुछ पहले की बातें, माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, उनके जीवनकाल से जुड़ी बातें धीमे धीमे लुप्त और विस्मृत होती जा रही हैं। इनका दस्तावेज़ समय रहते तैयार करने का दायित्व हमारा है। हमारी पीढ़ी यह कर सकती है। फिर किसी को कुछ पता नहीं होगा। सब कुछ भूल जाएंगे।”

दस्तावेज़ में ऐसी ऐतिहासिक दास्तानों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है। इस शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है श्री जगत सिंह बिष्ट जी का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ मंत्री महोदय की यमलोक में छवि।) 

☆  दस्तावेज़ # ३२ – 🌚 मंत्री महोदय की यमलोक में छवि 🌚 श्री जगत सिंह बिष्ट ☆ 

(अगस्त 1990.  प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार जा रही थी और चंद्रशेखर जी भारत के नए प्रधानमंत्री का पदभार ग्रहण कर रहे थे। दोनों ही मंत्रिमंडल में चौधरी देवीलाल, उप-प्रधानमंत्री के रूप में, शोभायमान थे। राजनीतिक उथलपुथल का समय था। इस पृष्ठभूमि में, यह रचना, आज से लगभग पैंतीस वर्ष पूर्व, लिखी गई थी।)

वयोवृद्ध मंत्री महोदय गहरी नींद में सो रहे थे। मंत्रिमंडल पर छाए संकट के बादल हट गए थे। मध्यावधि चुनाव दो-चार महीनों के लिए टल गए थे।

उनका अचेतन मन एक रंग-बिरंगी स्वप्न श्रृंखला में खो गया। ‘जिंदाबाद’ के गगनभेदी नारों के बीच, वे लाखों किसानों की विशालकाय रैली को संबोधित कर रहे हैं। चारों दिशाओं में उनकी जय-जयकार गूंज रही है।

अपने चहते बेटे को उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान देखा। राजभवन की शोभा बढ़ाते हुए अपने दामाद को देखा। लेकिन यह क्या? बीच में फूलों से सजी यह तोपगाड़ी कहां से आ टपकी? सपने का सारा आनंद जाता रहा।

उन्हें महसूस हुआ कि कोई उनकी बांह पकड़कर, उन्हें खींचने का प्रयास कर रहा है। उनकी आंखों में अब भी हल्का-हल्का सुरूर था। उन्नींदे स्वर में, वे बड़बड़ाए, “कौन है?”

“यमदूत!” जवाब में भारी-भरकम आवाज सुनकर मंत्री महोदय चौंके।

आंखों को मलते हुए उन्होंने खोलने का प्रयत्न किया। देखते क्या हैं कि एक भयावह काली आकृति, उनके भारी शरीर को खींचने का प्रयास कर रही है।

उन्होंने कड़क कर पूछा, “इस वक्त क्या काम है?”

यमदूत बोला, “आपको यमलोक चलना होगा।”

मंत्री महोदय ने प्रश्न किया, “वहां तक जाने के साधन का प्रबंध कर लिया है?”

यमदूत ने कहा, “खिड़की के बाहर देखिए!”

बाहर एक जीर्ण-क्षीर्ण काले रंग का छोटा-सा विमान खड़ा था। उसे हिकारत से देखते हुए मंत्री महोदय ने कहा, “जाकर, कह देना यमराज से, हम दूसरे का मातम मनाने भी एयरबस से जाते हैं। इस टूटे-फूटे जहाज में बैठने हमारी शान के खिलाफ है। और, अभी मध्यावधि चुनाव से पहले, हमें फुर्सत भी नहीं है।”

यह सुनकर यमदूत सकते में आ गया। उसे कमज़ोर पाकर, अनुभवी मंत्री जी ने प्यार से उसका कंधा थपथपाया। फिर कहा, “तू कबसे यह मशक्कत का काम कर रहा है? अब तो तेरी उम्र भी ढलने लगी है। चल, छोड़ दे अब ये गंदा काम। कल सुबह आकर मुझसे मिलना। गवर्नर-शवर्नर लगवा दूंगा।”

यमदूत थोड़ा ढीला पड़ गया। धीरे से बोला, “अभी तो मेरा पॉलिटिकल कैरियर शुरू भी नहीं हुआ और आप हैं कि मुझे ठिकाने से लगा देना चाहते हैं।”

मंत्री महोदय बोले, “पॉलिटिक्स करने का इतना ही शौक है तो वहां जाकर भी कर सकता है। तुझे रोकता कौन है? अभी रात काफी हो गई है, तू भी थका होगा, बाहर बेंच पर थोड़ा आराम कर ले। सुबह देखेंगे।”

अब भी उसकी शंका का समाधान नहीं हुआ था। हिचकिचाते हुए बोला, “आपके मंत्रिमंडल का क्या भरोसा? कल को सरकार बदल गई तो मेरा क्या होगा? मैं न घर का रहूंगा, न घाट का!”

मंत्री जी बोले, “तू इसकी फ़िक्र मत कर। अगर सरकार बदल भी जाएगी तो मेरी पोजीशन में फर्क नहीं आने वाला। सरकारें गिराने वाला भी मैं हूं और बनाने वाला भी।”

यमदूत आश्वस्त होकर सो गया। अगली सुबह, एक विशेष विमान से वह रवाना हुआ।

फूलों की मालाओं से, राजभवन में ‘उनका’ भव्य स्वागत हुआ। राज्य के मुख्यमंत्री विशेष प्रसन्न लग रहे थे। उन्होंने विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की घोषणा की।

महामहिम राज्यपाल, पूरी राजकीय शान से, विधानसभा की ओर रवाना हुए। वहां असंतुष्ट विधायकों ने उनका रास्ता रोक लिया और “राज्यपाल वापस जाओ” के नारे लगाए। वे घबरा गए। धक्का-मुक्की होने लगी। भीड़ में से किसी ने उनकी टोपी उड़ा ली। उन्होंने वापस जाना ही श्रेयस्कर समझा।

शाम की फ्लाइट से वे वापस मंत्री महोदय के पास पहुंचे और बोले, “यह काम हमारे बस का नहीं। हम तुरन्त इस्तीफ़ा दे रहे हैं।”

मंत्री जी के होठों पर कुटिल मुस्कान लहरा रही थी। बोले, “तू तो बहुत जल्दी घबरा गया। अभी तो तूने एक मुख्यमंत्री को भी बर्खास्त नहीं किया। इतनी जल्दी तू इस्तीफ़ा नहीं दे सकता। हमारी सरकार की इमेज बिगड़ेगी। जा, तू आराम कर।”

उधर यमलोक में, जब पता चला कि एक यमदूत गायब है तो उसकी खोजबीन शुरू हुई। उसे ढूंढकर वापस लाया गया। ‘कारण बताओ’ नोटिस दिया गया। दो-चार कोड़े लगाए गए। आखिर, उसने सत्य उगल दिया।

सुनकर, यमराज के नेत्र क्रोध से लाल हो गए। उन्होंने तुरन्त चार हट्टे-कट्टे और विश्वसनीय यमदूतों को मंत्री महोदय को उठा लाने के लिए ‘डिप्यूट’ किया।

यह देखकर, दर्द से कराहता यमदूत चीख उठा, “गुस्ताखी माफ हो हुजूर! छोटा मुंह, बड़ी बात। आपका नामक खाया है, मालिक! मेरी सलाह मानें तो मंत्री महोदय जहां हैं, उनको वहीं रहने दें। उनका यहां आना, आपके हित में नहीं।”

पास ही खड़े, भयावह भैंसे ने जोरदार हुंकार से इसका समर्थन किया!

♥♥♥♥

© जगत सिंह बिष्ट

Laughter Yoga Master Trainer

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 299 ☆ व्यंग्य – कायदे का काम ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘कायदे का काम‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 299 ☆

☆ व्यंग्य ☆ कायदे का काम

मंत्री जी ने अपने विभाग में अंधाधुंध नियुक्तियां कीं। जब सरकार गिरी तो जांच पड़ताल में बात सामने आयी कि लाखों का लेन-देन हुआ। पत्रकारों ने पूर्व मंत्री जी से पूछा तो उन्होंने हथेली पर तंबाकू ठोकते हुए इत्मीनान से जवाब दिया, ‘सब बकवास है। हमने तो जनसेवा की है। हजारों लोगों को रोजगार दिया है। हवन करने में घी चुराने का आरोप लग रहा है। विरोधियों को शिकायत है तो जांच करा लें।’

उधर पूर्व मंत्री जी के द्वारा नियुक्त नये कर्मचारियों का एक विशेष सम्मेलन हुआ जिसमें सभी ने शपथ ली कि किसी भी हालत में और किसी भी दबाव में यह स्वीकार नहीं करना है कि उन्होंने नौकरी के लिए कोई रिश्वत दी, अन्यथा लगी लगायी नौकरी छूट सकती है। सम्मेलन में पूर्व मंत्री जी को धन्यवाद दिया गया और यह कामना की गयी कि वे बार-बार मंत्री बनें और बार-बार इसी तरह बेरोजगारी हटाने की मुहिम चलायें।

नये मंत्री ने शपथ लेते ही घोषणा की कि अब सब काम कायदे से और पारदर्शी तरीके से होगा और जो कर्मचारी कायदे के खिलाफ जाएगा उस पर सख्त अनुशासनात्मक कार्यवाही होगी।

घोषणा होते ही विभाग के हलकों में चर्चा शुरू हो गयी कि कायदे से काम का मतलब क्या है। अनेक टीकाकारों ने कायदे से काम के अनेक अर्थ प्रस्तुत किये। लोगों की शंका यह थी कि क्या अभी तक काम कायदे से नहीं होता था? जब फाइलें बाकायदा चली हैं और  जब उनमें बाकायदा टीपें दी गयी हैं तो काम कायदे से कैसे नहीं हुआ?

तब विभाग के आला अफसर ने दोयम दर्जे के अफसरों को एक दिन बताने की कृपा की कि कायदे से काम का मतलब यह है कि नियुक्तियों और दूसरे कामों में कोई लेन-देन नहीं होगा और जो अधिकारी या कर्मचारी मुद्रा या वस्तु के रूप में घूस लेगा उसे बिना रू-रियायत के पुलिस को सौंप दिया जाएगा। उसके बाद भले ही वह घूस देकर छूट जाए।

बात आला अफसर से चलकर नीचे तक आयी और पूरे विभाग में फैल गयी। फिर विभाग से चलकर पूरे प्रदेश में फैल गयी। चिन्तित चेहरे सड़कों पर घूमने लगे। यह कायदे का काम क्या होता है? क्या अब पुराने कायदे से काम बिलकुल नहीं होगा? विभाग के सभी दफ्तरों में लोग आ आकर पूछताछ करने लगे। जो पढ़ने-लिखने में थोड़ा पिछड़े, लेकिन धन-संपत्ति के मामले में अगड़े  हैं, उनकी नैया अब कैसे पार होगी? क्या सिर्फ योग्यता ही नौकरी का आधार बनकर रह जाएगी?

लोग विभाग के कर्मचारियों से हमदर्दी  जताने लगे— ‘हमें अपनी परवाह नहीं है। हमारा जो होगा सो होगा। इस विभाग में नौकरी नहीं लगी तो दूसरे में लगेगी। लेकिन आपका और आपके बाल-बच्चों का क्या होगा?’ सुनकर अधिकारियों- कर्मचारियों की आंखों से अश्रु  प्रवाहित होने लगे। हमदर्द उनकी दुखती रग छू रहे थे। बहुत से काम रुके पड़े हैं। किसी को मकान की तीसरी मंज़िल बनानी है तो किसी को पुत्र की शादी में पचास लाख खर्च करना है। किसी ने साले के नाम से ट्रक खरीदने की योजना बनायी है। कायदे से काम हुआ तो सब काम रुक जाएंगे।

दुख का आवेग बढ़ा तो कर्मचारियों के आंसुओं से फाइलें गीली होने लगीं। विभाग ने तुरन्त आदेश जारी किया कि सभी फाइलों पर प्लास्टिक के कवर चढ़ा दिये जाएं।

कायदे से काम वाला आदेश जारी होने के एक महीने के भीतर तीन चार कर्मचारी फूलपत्र लेते हुए पकड़े गये और मुअत्तल कर दिये गये। वे ऐसे आसानी से पकड़ लिये गये जैसे कोई शिकारी घायल पक्षी की गर्दन पड़कर ले जाता है। वजह  यह थी कि उन्हें अभी कायदे से काम करना नहीं आया था। बहुत से ऐसे थे जो बुढ़ापे में राम-राम बोलना सीख ही नहीं सकते थे।

‘कायदे से काम’ लागू होने से जनता कुछ प्रसन्न हुई। नये मंत्री जी का अभिनन्दन हुआ, तारीफ हुई। लेकिन विभाग की हालत चिन्ताजनक हो गयी। अफसरों-कर्मचारियों की जैसे जान निकल गयी थी। दफ्तरों में मनहूसी फैल गयी। काम करने के लिए किसी का हाथ ही नहीं उठता था। कर्मचारी उदास चेहरा लिये धीरे-धीरे दफ्तर में आते और मेज पर सिर टिका कर बैठ जाते। कुछ मुर्दों की तरह बाहर पेड़ों के नीचे पड़े रहते। आला अफसर  परेशान थे। किस-किस के खिलाफ कार्रवाई करें? कर्मचारियों से कुछ कहते तो वे आंखों में आंसू भरकर जवाब देते, ‘क्या करें सर! हाथ में जान ही नहीं रही। शरीर लुंज-पुंज हो गया है। जो सजा देनी हो दे दीजिए। जो भाग्य में होगा, भोगेंगे।’

मंत्री जी के पास रिपोर्ट पहुंची कि ‘कायदे से काम’ वाला आदेश लागू होने से कर्मचारियों के मनोबल में भारी गिरावट हुई है। दफ्तरों में उत्पादकता पहले से आधी भी नहीं रह गयी है। पहले जो काम एक दिन में पूरा होता था वह अब दस दिन में भी नहीं होता। अफसरों कर्मचारियों में प्रेरणा का पूर्ण अभाव हो गया है।

मंत्री जी ने चिन्तित होकर दौरा किया तो पाया कि विभाग के ज्यादातर कार्यालय श्मशान जैसे हो गये हैं। सब तरफ धूल अंटी पड़ी है। हवा चलती है तो सब तरफ धूल उड़ती है। फाइलों पर मकड़जाले तन गये हैं। चूहे धमाचौकड़ी मचाते घूमते हैं। कमरों में कुत्ते सोते हैं, उन्हें कोई नहीं भगाता। कोई काम न होते देख जनता ने आना बन्द कर दिया था।

मंत्री जी ने हर कार्यालय में मीटिंग की। कर्मचारी धीरे-धीरे आकर सिर लटकाये बैठ गये। मंत्री जी ने ‘कायदे से काम’ के फायदे गिनाये तो वे ऐसे सिर हिलाते रहे जैसे मुर्दों में बैटरी लगी हो। मंत्री जी मुर्दों को संबोधित कर, परेशान होकर उठ गये। कर्मचारी फिर धीरे-धीरे चलते हुए अपनी कुर्सियों पर सिर लटका कर बैठ गये।

दफ्तरों की चिन्ताजनक हालत की खबर अखबारों में छपी। मुख्यमंत्री जी ने मंत्री जी को तलब किया। उनकी ‘कायदे से काम’ की योजना की बखिया उधेड़ी। जब कोई काम ही नहीं होता तो कायदे से काम का क्या मतलब? मंत्री जी को हिदायत दी गयी कि किसी भी कीमत पर विभाग की कार्यक्षमता बढ़ायी जाए, अन्यथा उनका पोर्टफोलियो बदल दिया जाएगा।

दूसरे दिन आला अफसर को गोपनीय संदेश गया कि भविष्य में लकीर का फकीर होने के बजाय व्यवहारिक हुआ जाए और एक महीने के भीतर विभाग की कार्यक्षमता पुराने स्तर पर लायी जाए। अफसरों कर्मचारियों ने संदेश के भीतर निहित संदेश को पढ़ा और गुना, और फिर कुछ ही दिनों में दफ्तरों की धूल छंटने लगी। चूहों कुत्तों को अन्यत्र  शरण लेने के लिए हंकाला जाने लगा। कर्मचारियों के शरीर में जान और मुख पर मुस्कान लौट आयी। जनता फिर दफ्तरों के काउंटरों पर दिखायी देने लगी।

विभाग के सभी दफ्तरों में कर्मचारियों ने मीटिंग करके मंत्री जी को अपनी नीति में व्यवहारिक परिवर्तन करने के लिए धन्यवाद दिया और उन्हें विश्वास दिलाया कि वे अब निश्चिंत होकर सब कुछ कर्मचारियों पर छोड़ दें और देखें कि कर्मचारी अब विभाग को कहां से कहां पहुंचा देते हैं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 59 – किस्मतचंद और सरकारी शेर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं।

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना ‘किस्मतचंद और सरकारी शेर’)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # 59किस्मतचंद और सरकारी शेर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

पुराने ज़माने की बात है, जब राजा-महाराजा हुआ करते थे और उनके गुलाम भी। आज़ादी के इस आधुनिक युग में गुलाम तो नहीं, पर ‘व्यवस्था’ के मारे लोग ज़रूर हैं, जिनकी ज़िंदगी किसी गुलाम से कम नहीं। ऐसे ही एक ‘व्यवस्था-पीड़ित’ थे हमारे किस्मतचंद जी। उनकी ज़िंदगी किसी ‘सर्कस के शेर’ से कम न थी, जिसे रोज़ एक ही पिंजरे में, एक ही डंडे के इशारे पर नाचना होता है। सुबह उठो, दफ़्तर जाओ, कागज़ों के जंगल में खो जाओ, और शाम को थके-हारे घर लौट आओ। यह उनका रोज़ का ‘एक्ट’ था। उनकी ‘आज़ादी’ बस इतनी थी कि वो अपनी मर्ज़ी से किस लाइन में खड़े होकर बिल भरें या किस बाबू के सामने गिड़गिड़ाएँ। ‘जुल्म’ उन पर कम न होते थे। कभी बिजली का बिल ज़्यादा आ जाए, कभी पानी का मीटर तेज़ चलने लगे, कभी सरकारी दफ़्तरों में ‘चाय-पानी’ के नाम पर ‘शुद्ध घी’ की माँग हो जाए। किस्मतचंद जी का रोम-रोम इस ‘व्यवस्था’ से त्रस्त था। एक दिन तो हद ही हो गई। उनके मोहल्ले में सरकारी नल से पानी आना बंद हो गया, और जब वो शिकायत करने गए, तो बाबू ने ऐसे देखा, जैसे वो पानी नहीं, चाँद-तारे माँग रहे हों। बस, उसी दिन किस्मतचंद जी ने तय कर लिया, “बहुत हुआ सम्मान, अब तो ‘जंगल’ में ही शरण लेंगे!” उनका ‘जंगल’ था शहर के बाहर की वो वीरान ज़मीन, जहाँ कोई सरकारी दफ़्तर नहीं था, कोई बाबू नहीं था, बस धूल और सन्नाटा था। उन्हें लगा, कम से कम वहाँ कोई ‘व्यवस्था’ तो नहीं होगी, कोई ‘सिस्टम’ तो नहीं होगा जो उनकी साँसें भी नाप-नाप कर चले। वो भागे, हाँ, सचमुच भागे, जैसे कोई ‘आज़ाद पंछी’ पिंजरे से भागा हो, पर उन्हें क्या पता था कि ‘जंगल’ भी अब ‘सरकारी’ हो चुके हैं।

किस्मतचंद जी जब उस ‘वीराने’ में पहुँचे, जिसे वो ‘जंगल’ समझ रहे थे, तो देखा कि वहाँ पहले से ही एक ‘शेर’ मौजूद था। यह कोई आम शेर नहीं था, बल्कि ‘सरकारी शेर’ था – एक विशालकाय, जर्जर, और धूल फाँकता हुआ ‘सरकारी विभाग’ का दफ़्तर, जिसकी छत टपक रही थी और दीवारें ‘घूस’ के दाग़ों से रंगी हुई थीं। यह ‘शेर’ अपनी अंतिम साँसें गिन रहा था, क्योंकि ‘फ़ाइलें’ इसके पंजों में फँसी हुई थीं और ‘लाल फ़ीता’ इसके गले में कस चुका था। ‘सरकारी शेर’ बार-बार अपना ‘पंजा’ उठा रहा था, जैसे कह रहा हो, “कोई तो मेरी ‘फ़ाइल’ आगे बढ़ा दो!” किस्मतचंद जी पहले तो डरे। उन्हें लगा, “अरे बाप रे! यहाँ भी ‘सरकारी शेर’?” लेकिन फिर उनके मन में ‘अजीब सी सहृदयता’ जागी। उन्हें लगा, “चलो, कम से कम ये ‘शेर’ भूखा तो नहीं है, बस ‘कागज़ों का पेट’ भरा हुआ है।” वो धीरे से उस ‘शेर’ के पास गए। शेर के ‘पंजे’ में ‘काँटा’ नहीं, बल्कि ‘घोटाले की एक मोटी फ़ाइल’ चुभी हुई थी, जिसे कोई छूने को तैयार न था। किस्मतचंद जी ने सोचा, “क्या पता, अगर मैं इसकी मदद करूँ तो शायद ये मुझे न खाए, बल्कि कोई ‘सरकारी नौकरी’ ही दिला दे!” उन्होंने हिम्मत की और उस ‘घोटाले की फ़ाइल’ को निकालने की कोशिश की। फ़ाइल इतनी पुरानी थी कि छूते ही धूल का गुबार उठा। उन्होंने उसे झाड़ा, पोंछा, और जैसे-तैसे उसे ‘सही मेज़’ तक पहुँचाने का बीड़ा उठाया। यह कोई आसान काम न था, क्योंकि हर मेज़ पर ‘लाल फ़ीते के अजगर’ कुंडली मारे बैठे थे।

किस्मतचंद जी ने उस ‘सरकारी शेर’ की देखभाल शुरू कर दी। देखभाल का मतलब था, उस ‘घोटाले की फ़ाइल’ को एक मेज़ से दूसरी मेज़ तक पहुँचाना, हर बाबू के सामने ‘चाय-पानी’ की पेशकश करना, और हर ‘अधिकारी’ के सामने ‘जी-हुज़ूरी’ करना। उन्होंने कई दिनों तक उस ‘फ़ाइल’ को ‘ज़िंदा’ रखने की कोशिश की, जैसे कोई ‘डॉक्टर’ किसी ‘अंतिम साँसें गिनते मरीज़’ की देखभाल करता है। कभी वो ‘फ़ाइल’ को ‘रजिस्ट्री’ में जमा करते, तो कभी ‘डिस्पैच’ में उसे ‘पुनर्जीवित’ करते। इस ‘देखभाल’ से ‘सरकारी शेर’ को थोड़ा ‘आराम’ मिला। वो ‘फ़ाइल’ जो सालों से अटकी थी, वो ‘एक इंच’ आगे बढ़ गई! यह ‘सरकारी शेर’ के लिए किसी ‘चमत्कार’ से कम न था। ‘आभार’ में, ‘सरकारी शेर’ ने किस्मतचंद जी का ‘हाथ चाटना’ शुरू कर दिया। ‘हाथ चाटने’ का मतलब था, किस्मतचंद जी को एक ‘छोटी सी रसीद’ मिल गई, जिस पर लिखा था, “आपकी शिकायत पर विचार किया जाएगा।” यह रसीद उनके लिए किसी ‘नोबेल पुरस्कार’ से कम न थी। फिर ‘सरकारी शेर’ चुपचाप अपनी ‘गुफ़ा’ में चला गया, यानी वो ‘फ़ाइल’ फिर से किसी ‘अंधेरे कोने’ में गुम हो गई, लेकिन किस्मतचंद जी को एक ‘रसीद’ तो मिल गई थी! उन्हें लगा, “वाह! कम से कम मैंने एक ‘सरकारी काम’ तो करवा दिया, चाहे वो कितना भी छोटा क्यों न हो।” उनकी छाती गर्व से चौड़ी हो गई, जैसे उन्होंने कोई ‘एवरेस्ट’ फ़तह कर लिया हो।

इधर, ‘महामहिम श्रीमान ‘विकास पुरुष’’ के ‘सैनिक’ – यानी ‘विजिलेंस विभाग’ के ‘बाबू’ और ‘मीडिया के गिद्ध’ – किस्मतचंद जी को ढूंढ रहे थे। किस्मतचंद जी ने ‘सरकारी शेर’ की ‘फ़ाइल’ को ‘गलत तरीक़े’ से ‘सही’ करने की कोशिश की थी, और यह ‘सिस्टम’ के लिए ‘अक्षम्य अपराध’ था। ‘सिस्टम’ को ‘सही’ करने की कोशिश करना, ‘सिस्टम’ के ही नियमों के ख़िलाफ़ था! आख़िरकार, एक दिन किस्मतचंद जी पकड़े गए। उन्हें ‘महामहिम श्रीमान ‘विकास पुरुष’’ के सामने पेश किया गया। ‘विकास पुरुष’ बहुत नाराज़ थे। उनके चेहरे पर ‘विकास’ की जगह ‘क्रोध’ की लकीरें खिंची हुई थीं। उन्होंने गरजते हुए कहा, “इस ‘सिस्टम’ तोड़ने वाले को ‘भूखे शेर’ के सामने फेंक दो!” ‘भूखा शेर’ कोई और नहीं, बल्कि ‘जनता की अदालत’ थी, जहाँ ‘मीडिया ट्रायल’ होता था और ‘सोशल मीडिया’ पर ‘मीम्स’ बनते थे। यह ‘शेर’ भूखा इसलिए था, क्योंकि उसे रोज़ कोई ‘नया शिकार’ चाहिए होता था, कोई ‘नया मुद्दा’ चाहिए होता था जिस पर वो अपनी ‘दाढ़ें’ गड़ा सके। किस्मतचंद जी को लगा, “हे भगवान! मैंने तो बस एक ‘फ़ाइल’ आगे बढ़ाई थी, और अब मेरी ‘फ़ाइल’ ही बंद होने वाली है!” उन्हें अपनी ‘सहृदयता’ पर अफ़सोस होने लगा। उन्हें लगा, “काश, मैंने उस ‘सरकारी शेर’ को उसके हाल पर ही छोड़ दिया होता, तो आज मुझे ये दिन न देखना पड़ता!”

जिस दिन किस्मतचंद जी को ‘भूखे शेर’ के सामने फेंका जाना था, उस दिन शहर के ‘सबसे बड़े ऑडिटोरियम’ में ‘रोम’ की सारी ‘जनता’ इकट्ठा हुई। ‘जनता’ का मतलब था, ‘मीडियाकर्मी’, ‘सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स’, और कुछ ‘खाली बैठे लोग’ जिन्हें ‘मुफ़्त का तमाशा’ देखना था। सबके सामने किस्मतचंद जी को ‘भूखे शेर’ के ‘पिंजरे’ में फेंक दिया गया। ‘पिंजरा’ कोई और नहीं, बल्कि ‘मीडिया के कैमरों’ का घेरा था, और ‘भूखा शेर’ था ‘जनता का आक्रोश’, जिसे ‘मीडिया’ ने खूब हवा दी थी। किस्मतचंद जी डरे हुए थे। उन्हें ‘मौत’ नहीं, बल्कि ‘बदनामी’ सामने दिख रही थी। उन्हें लगा, “अब तो मेरी ‘छवि’ का ‘अंतिम संस्कार’ होने वाला है!” वो ‘ईश्वर’ को याद करने लगे, और साथ ही उन सभी ‘बाबू’ और ‘अधिकारियों’ को भी, जिन्होंने उनकी ‘फ़ाइल’ को ‘अटकाया’ था। ‘शेर’ – यानी ‘मीडिया’ – किस्मतचंद जी की ओर बढ़ा। ‘कैमरे’ उनकी ओर ज़ूम करने लगे, ‘माइक’ उनके मुँह के पास आ गए, और ‘रिपोर्टर’ ऐसे सवाल पूछने लगे, जैसे वो कोई ‘अंतर्राष्ट्रीय अपराधी’ हों। किस्मतचंद जी पसीने-पसीने हो गए। डर के मारे उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। लेकिन यह क्या? किस्मतचंद जी को ‘मारने’ के स्थान पर, ‘शेर’ – यानी ‘मीडिया’ – उनका ‘हाथ चाटने’ लगा। ‘हाथ चाटने’ का मतलब था, एक ‘पुराना रिपोर्टर’ जो कभी किस्मतचंद जी के ‘मोहल्ले’ का था, उसने उन्हें पहचान लिया और ‘माइक’ हटाकर धीरे से कहा, “अरे किस्मतचंद जी! आप? आपने तो उस ‘सरकारी विभाग’ की ‘फ़ाइल’ आगे बढ़ाई थी, जिसकी वजह से मेरा ‘पेंशन’ अटक गया था!” सम्राट हैरान था, सारी जनता हैरान थी और किस्मतचंद जी भी।

अंततः, किस्मतचंद जी समझ गए कि हो न हो, ये वही ‘सरकारी शेर’ है, जिसकी ‘घायल अवस्था’ में उन्होंने ‘देखभाल’ की थी। ‘मीडिया’ का वो ‘पुराना रिपोर्टर’ उस ‘सरकारी विभाग’ का ही ‘प्रतिनिधि’ था, जिसकी ‘फ़ाइल’ किस्मतचंद जी ने आगे बढ़ाई थी। वह किस्मतचंद जी को पहचान गया था, क्योंकि उस ‘एक फ़ाइल’ के आगे बढ़ने से उस रिपोर्टर का ‘पेंशन’ पास हो गया था। वह भी किस्मतचंद जी को ‘पुचकारने’ लगा और उनकी ‘पीठ पर हाथ फेरने’ लगा, यानी उसने ‘लाइव टेलीकास्ट’ में किस्मतचंद जी की ‘तारीफ़’ करनी शुरू कर दी। उसने कहा, “ये वो इंसान हैं, जिन्होंने ‘सिस्टम’ को ‘सही’ करने की कोशिश की थी, जबकि ‘सिस्टम’ उन्हें ‘ग़लत’ ठहरा रहा है!” यह देख ‘महामहिम श्रीमान ‘विकास पुरुष’’ ने ‘सैनिकों’ को किस्मतचंद जी को ‘पिंजरे’ से बाहर निकालने का आदेश दिया। ‘विकास पुरुष’ ने सोचा, “अरे! ये तो ‘पॉजिटिव पब्लिसिटी’ हो गई! चलो, इसे भुनाया जाए!” उन्होंने किस्मतचंद जी से पूछा, “तुमने ऐसा क्या किया कि ‘शेर’ – यानी ‘मीडिया’ – तुम्हें ‘मारने’ के स्थान पर तुम्हारा ‘हाथ चाटने’ लगा?” ‘विकास पुरुष’ के चेहरे पर अब ‘क्रोध’ की जगह ‘मुस्कुराहट’ थी, क्योंकि उन्हें ‘चुनाव’ जीतने थे और ‘पॉजिटिव इमेज’ बनानी थी। किस्मतचंद जी ने उन्हें ‘जंगल की घटना’ सुना दी और बोला, “महाराज, जब ‘सरकारी शेर’ – यानी वो ‘विभाग’ – ‘घायल’ था, तब मैंने कुछ दिनों तक ही इसकी ‘देखभाल’ की थी। इस ‘उपकार’ के कारण इसने मुझे ‘नहीं मारा’, बल्कि मेरी ‘तारीफ़’ की। लेकिन, आपकी ‘व्यवस्था’ की सेवा तो मैंने बरसों की है, ‘टैक्स’ भरे हैं, ‘नियम’ माने हैं, इसके बावजूद आप मेरी ‘जान’ ले रहे थे!”

‘महामहिम श्रीमान ‘विकास पुरुष’’ का ‘दिल पसीज़’ गया। उनका ‘दिल’ कागज़ का बना था, जो ‘पब्लिसिटी’ की बारिश में थोड़ा नरम हो गया था। उन्होंने किस्मतचंद जी को ‘आज़ाद’ कर दिया और ‘सरकारी शेर’ – यानी उस ‘विभाग’ को भी ‘जंगल’ में ‘छुड़वा’ दिया। ‘आज़ादी’ का मतलब था, किस्मतचंद जी को उनकी ‘पुरानी नौकरी’ तो नहीं मिली, लेकिन उन्हें ‘व्यवस्था सुधार समिति’ का ‘अवैतनिक सदस्य’ बना दिया गया। ‘अवैतनिक’ का मतलब था ‘बिना वेतन के’, यानी अब वो ‘सिस्टम’ को ‘फ्री में’ सुधारेंगे! और ‘सरकारी शेर’ को ‘जंगल में छुड़वाने’ का मतलब था, उस ‘विभाग’ को ‘बंद’ कर दिया गया, क्योंकि ‘घाटे’ में चल रहा था। किस्मतचंद जी ने सोचा, “वाह! मैंने जिस ‘शेर’ को ‘ठीक’ किया, उसे ही ‘बंद’ कर दिया गया! मेरी मेहनत का क्या हुआ?” उनकी आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने ‘आज़ादी’ पाई थी, पर वो ‘आज़ादी’ किसी ‘खाली पिंजरे’ जैसी थी। उन्हें लगा, “काश, मैं गुलाम ही रहता, कम से कम ‘रोटी’ तो मिलती!” ‘विकास पुरुष’ ने उन्हें ‘शाबाशी’ दी और कहा, “जाओ किस्मतचंद, आज से तुम ‘आज़ाद’ हो! और हाँ, ‘व्यवस्था सुधार’ में अपना ‘योगदान’ देते रहना!” किस्मतचंद जी ने देखा, ‘सरकारी शेर’ का ‘दफ़्तर’ अब ‘खंडहर’ में बदल चुका था। उनकी ‘मेहनत’ धूल में मिल गई थी।

किस्मतचंद जी अब ‘आज़ाद’ थे, पर उनकी ‘आज़ादी’ किसी ‘अनाथ बच्चे’ जैसी थी, जिसे ‘ज़िम्मेदारी’ तो दे दी गई थी, पर ‘सहारा’ कोई नहीं था। वो ‘व्यवस्था सुधार समिति’ की बैठकों में जाते, जहाँ ‘चाय-बिस्कुट’ के अलावा कुछ नहीं मिलता था। उनकी ‘पॉजिटिव पब्लिसिटी’ भी कुछ दिनों में ‘पुरानी ख़बर’ बन गई। अब उन्हें कोई ‘हीरो’ नहीं कहता था, बल्कि ‘फालतू का समाज-सेवक’ कहता था। उन्होंने उस ‘सरकारी शेर’ के ‘खंडहर’ को देखा, जहाँ कभी उन्होंने ‘फ़ाइल’ आगे बढ़ाई थी। उन्हें याद आया, कैसे उस ‘शेर’ ने ‘आभार’ में उनका ‘हाथ चाटा’ था। आज वो ‘हाथ’ खाली था, और ‘हृदय’ में एक ‘गहरा घाव’ था। उन्हें लगा, “मैंने ‘उपकार’ किया, तो ‘बदले’ में ‘बेरोज़गारी’ मिली! मैंने ‘कृतज्ञता’ की उम्मीद की, तो ‘बदले’ में ‘उपहास’ मिला!” उनकी आँखों से आँसू बहने लगे, पर ये आँसू ‘दुख’ के नहीं, ‘व्यंग्य’ के थे। उन्हें ‘अफ़सोस’ था कि उन्होंने ‘व्यवस्था’ को ‘सुधारने’ का ‘पाप’ क्यों किया। ‘सिस्टम’ ने उन्हें ‘आज़ाद’ किया था, पर ‘आज़ादी’ की कीमत इतनी ‘महँगी’ थी कि वो उसे ‘चुका’ नहीं पा रहे थे। उनकी ‘आह’ निकली, “काश, मैं उस ‘जंगल’ में ही रहता, जहाँ कम से कम ‘शेर’ तो ‘असली’ था, ‘सरकारी’ नहीं!” यह ‘कथा’ हमें सिखाती है कि ‘सहृदयता’ अच्छी चीज़ है, पर ‘सरकारी व्यवस्था’ में ‘सहृदयता’ का ‘फल’ अक्सर ‘कड़वा’ होता है। और ‘कृतज्ञता’? वो तो ‘सरकारी फ़ाइलों’ में ‘धूल’ खाती रहती है, जब तक कोई ‘नया घोटाला’ उसे ‘बाहर’ न निकाल दे। किस्मतचंद जी अब ‘आज़ाद’ थे, पर ‘आज़ादी’ ने उन्हें ‘पिंजरे’ से ज़्यादा ‘अकेला’ कर दिया था। उनकी ‘कहानी’ आज भी ‘व्यवस्था’ के ‘गलियारों’ में गूँजती है, एक ‘दर्दनाक व्यंग्य’ बनकर।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 361 ☆ व्यंग्य – “बेबी आन बोर्ड” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 361 ☆

?  व्यंग्य – बेबी आन बोर्ड ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

आजकल सड़क पर गाड़ी चलाना उतना ही आसान हो गया है जितना फेसबुक पर रिश्ते बनाना, ना जिम्मेदारी चाहिए, ना योग्यता, बस “स्टेटस” दिखना चाहिए! नया स्कूटर या कार खरीदते ही सबसे पहले आज क्या किया जाता है? नंबर प्लेट नहीं, बीमा नहीं, ना ही हेलमेट की फिक्र… सीधा “L” का स्टिकर चिपका दिया जाता है, वो भी बड़े-बड़े लाल अक्षरों में। ऐसा लगता है जैसे “L” नहीं, ‘लॉर्ड ऑफ द रोड’ की उपाधि हो।

कभी ध्यान से देखिए, जैसे ही कोई कार के पीछे “L” लिखा दिखता है, अन्य वाहन चालक अचानक दार्शनिक बन जाते हैं। “अरे, सीख रहा है बेचारा… जाने दो!” अब वो सीख रहा है या सिखा रहा है, ये अलग बात है। कार के भीतर बैठे “लर्निंग ड्राइवर” के बगल में उसका गुरु नजर ही नहीं आता । ड्राइवर गुरु हुआ भी तो उसका सारा ध्यान मोबाइल पर होता है, बीच-बीच में बोलते हैं, “एक्सेलेरेटर धीरे दबा बेटा…।

कुछ लोगों ने तो इस “L” को लाइसेंस की छूट का पासपोर्ट समझ लिया है। कोई भी गलत दिशा में गाड़ी घुमा दे, कोई वन-वे को टू-वे बना दे, कोई रेड लाइट को सजावट समझ कर पार कर दे, गाड़ी मन चाहे तरीके से पार्क कर लें, बस पीछे “L” लिखा होना चाहिए, जनता और ट्रैफिक पुलिस सब क्षमाशील हो जाते हैं। “लर्निंग है, सीख जाएगा…” जैसे ये ट्रैफिक स्कूल का ऑन-रोड इंटर्नशिप प्रोग्राम चल रहा हो!

एक और नुस्खा प्रचलन में है. कार में पीछे स्टिकर लगा रहे “बेबी आन बोर्ड” वाह! बच्चा कार में है, इसलिए कार को स्पेशल ट्रीटमेंट मिलेगा! बाकी गाड़ियों में यथा स्थिति बुज़ुर्ग ऑन बोर्ड, बीबीऑन बोर्ड, EMI ऑन बोर्ड जैसा कुछ लगवाया जाए तो शायद इन लोगों को भी थोड़ी इंपॉर्टेंस मिल जाए । बेबी आन बोर्ड स्टिकर के साथ गाड़ी के चारों ओर अदृश्य सुरक्षा कवच बन जाता है। सामने से ट्रक आ जाए, या फिर एंबुलेंस, या फायर ब्रिगेड बेबी आन बोर्ड की नजाकत बनी रहती है। हद तो तब होती है जब लोग “L” और “Baby on board” को एक साथ चिपका देते हैं। मतलब अब बच्चा सिखाएगा और ड्राइवर सीखेगा!

एक गाड़ी दिखी जिस पर लिखा था । “मिस ब्यूटीफुल ड्राइविंग ”। हम सोचने लगे कि ड्राइवर मिस ब्यूटीफुल है या कार! जब पास से निकले तो गाड़ी में तीन थे, एक लड़का, एक लड़की और एक तेज परफ्यू की महक।

रजिस्ट्रेशन प्लेट पर नंबर लिखवाने के रंग, आकार के रूल्स भी युवाओं की मर्ज़ी से चलते हैं, चालान बनाए जाते ही मोबाइल हाथ में आ जाता है और किसी नेता या पुलिस अधिकारी से बात करने को कहा जाता है।

“Mr. Rash on Wheels” भी दिखते हैं! कमाल के आत्म-प्रशंसक लोग हैं, जो खुद ही घोषित कर देते हैं कि वे अनियंत्रित हैं, फिर भी आप उनके स्पीड में बहकते स्कूटर को देखकर मुस्कराइए, हॉर्न मत बजाइए ।

सच पूछिए तो ये स्टिकर एक किस्म का हथियार बन गए हैं। एक तरफ “L” लगाकर ड्राइवर कानून की किताब बंद कर देता है, तो दूसरी तरफ Baby on Board लगाकर बाकी चालकों की सहनशक्ति की परीक्षा लेता है। किसी बड़े पद के अधिकारी, विधायक, पार्षद लिखी या पार्टी के झंडे की नंबर प्लेट और सबके बीच भीड़ में गुमशुदा सामान्य आदमी, जो नियम से गाड़ी चलाता है, लाइसेंस साथ रखता है और पार्किंग के लिए नियम मानता है, वो बेचारा ‘L’ वालों की स्पेशल ड्राइविंग देखता है, ‘बच्चे’ वालों के इमोशनल ब्लैकमेल से गुजरता है, और फिर घर पहुँचकर सोचता है “काश! मैंने भी गाड़ी के पीछे ‘Old but Gold’ लिखवा दिया होता।”

तो, अगली बार जब आप गाड़ी खरीदें, तो काग़ज़-पत्तर से पहले एक बढ़िया-सा स्टिकर तैयार करवाइए, जैसे “Slow Poet On Board” या “EMI Paying Legend Driving” क्योंकि आजकल ड्राइविंग में सिर्फ स्किल नहीं, स्टिकर सेंस ऑफ ह्यूमर भी नजर आती है!

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 298 – व्यंग्य – ‘गोदी’ पत्रकार और ‘गोदी’ लेखक ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य  – ‘‘गोदी’ पत्रकार और ‘गोदी’ लेखक ‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 298 ☆

☆ व्यंग्य ☆ ‘गोदी’ पत्रकार और ‘गोदी’ लेखक

अमेरिका-इराक की लड़ाई में पेंटागन ने अपनी फौजों के साथ कई ऐसे पत्रकार भेजे थे जिन्हें ‘एंबेडेड’ पत्रकार कहा गया। ‘एंबेडेड’ का मतलब ‘पैवस्त’, यानी जो अमेरिकी शासन की नीति का हिस्सा हों। ये पत्रकार पेंटागन का ही खाते और उसी की बजाते थे। जो पेंटागन दिखाये वही देखते थे और जो निषिद्ध किया जाए उसकी तरफ आंखें मूंद लेते थे। हमारे देश में भी कई पत्रकारों पर ‘गोदी’ मीडिया होने का ठप्पा लगता है क्योंकि वे वही देखते हैं जो सरकार दिखाती है। वे सरकार की आलोचना से परहेज़ करते हैं।

ऐसे ही कुछ पत्रिकाओं में ‘गोदी’ लेखक होते हैं जो पत्रिका और संपादक जी के प्रति पूर्ण निष्ठावान होते हैं और संपादक के इशारे पर नाना करतब करते हैं। ये संपादक जी की ‘किचिन कैबिनेट’ के सदस्य होते हैं और ये वही देखते हैं जो संपादक जी इन्हें दिखाते हैं। दूसरी चीज़ें देखते वक्त ये ‘रतौंधी’ के शिकार हो जाते हैं।

एक सवेरे एक संपादक जी के घर जाने का इत्तफाक़ हुआ। गेट पर आवाज़ लगायी तो बरामदे में से एक खाट से उठकर एक लुंगी- बनयाइन धारी सज्जन पेट खुजाते आये। गेट खोल कर बोले, ‘प्रणाम। पधारिए।’

मैंने पूछा, ‘विपिन जी हैं?’

वे बोले, ‘भैया तो जरूरी काम से सपरिवार बंबई गये हैं। परसों लौटेंगे। आप कैसे पधारे?’

मैंने कहा, ‘मैं दिल्ली के एक अखबार में हूं। यहां कुछ काम से आया था। विपिन जी से पुराना परिचय है।’ फिर पूछा, ‘आप उनके कौन हैं?’

वे बोले, ‘हम उनकी पत्रिका के लेखक हैं। आजकल घर सूना छोड़कर जाना ठीक नहीं। चोर नजर लगाये रहते हैं। हमने भैया से कहा आप निश्चिंत होकर जाइए, हम तो हैं, आपके घर पर पहरा देंगे। यहीं बैठे-बैठे दो चार रचनाएं फटकार लेंगे। मेरे साथ प्रख्यात कवि शलभ जी भी हैं।’

उन्होंने दूसरी खटिया की तरफ इशारा किया जिस पर एक बूढ़े से सज्जन बैठे हमारी तरफ आंखें मिचमिचा रहे थे।

मैंने पहले सज्जन से पूछा, ‘आपका परिचय?’

वे बोले, ‘मैं दीपक भारती हूं। प्रतिष्ठित कथाकार। हम दोनों भैया की पत्रिका में छपते रहते हैं। भैया की हम पर कृपा है।’

उन्होंने भक्ति भाव से आंखें बन्द कर हाथ जोड़े। फिर हंस कर बोले, ‘अभी शलभ जी को भागलपुर की एक संस्था का कविता-वारिधि पुरस्कार मिला है। उसी में मगन हैं।

शलभ जी ने दांत निकाल कर हाथ जोड़े।

मैंने कहा, ‘विपिन जी के प्रति आपकी निष्ठा प्रशंसनीय है।’

दीपक जी बोले, ‘हम भैया और उनकी पत्रिका के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं। कोई इन दोनों की तरफ आंख उठा कर भी देखे तो हमें बर्दाश्त नहीं होता।’

शलभ जी बोले, ‘भैया कहें तो दिन और भैया कहें तो रात। भैया मन प्राण में ऐसे बसे हैं कि एक छन के लिए नहीं निकलते।’

दीपक जी गर्व से बोले, ‘हम तो भैया के लिए बाकायदा फौजदारी करने को तैयार रहते हैं। साहित्यिक फौजदारी तो चलती ही रहती है। हम भैया के हुकुम पर पत्रिका में लेखकों की प्रशंसा और निन्दा करते हैं। जिसे भैया कहें उसे आसमान पर पहुंचा देते हैं और जिसे कहें उसे कूट कर पाताल में धंसा देते हैं। फिर जिन्दगी भर बिलबिलाते रहो।’

शलभ जी बोले, ‘हमारा जीवन भैया की सेवा के लिए है। दिन रात उनकी सेवा में खड़े रहते हैं। इसीलिए भैया हमें महत्व देते हैं। कोरे लेखन से क्या होता है? लेखन में तो सैकड़ो झक मार रहे हैं। सेवा-भाव होना चाहिए।’

दीपक जी भावुक होकर बोले, ‘भाभी जी हमें अपने बच्चों की तरह प्यार करती हैं। इतना प्यार तो हमें अपनी सगी मां ने भी नहीं दिया।’

उन्होंने फिर आंखें बन्द कर हाथ जोड़े।

शलभ जी बोले, ‘हम दोनों आज जो कुछ भी हैं, भैया की कृपा से हैं।उनके रिन से हम कभी उरिन नहीं हो सकते। उनके पैरों की धोवन जिन्दगी भर पियें तब भी उनका रिन नहीं उतरेगा।’

उन्होंने भी आंखें मूंद कर हाथ जोड़े।

उनकी बातें सुनकर मन भर गया था, इसलिए मैं वहां से भाग खड़ा हुआ। चलते-चलते दीपक जी बोले, ‘शाम को आइए। शाम को यहां भैया के प्रशंसक इकट्ठे होते हैं। आपको बहुत आनन्द आएगा। गंगा-स्नान हो जाएगा।

मैं ‘मुझे निकलना है’ कह कर गेट से बाहर हो गया।

कुछ दिन बाद एक और पत्रिका के दफ्तर जाने का सुयोग हुआ। संपादक जी के दफ्तर में घुसने लगा तो एक सज्जन ने प्रकट होकर इशारा किया, बोले, ‘पहले थोड़ा इधर आवें।’

वे मुझे एक छोटे से कमरे में ले गये जहां तीन और लोग विराजमान थे। मुझे कुर्सी देकर सब का परिचय कराया,बोले, ‘हम सभी भैया जी की पत्रिका के लेखक हैं। भैया जी के दर्शन से पहले कुछ ज़रूरी जानकारी देने की कृपा करें।’

उन्होंने मेरे बारे में पूछताछ की, बोले, ‘वाह, आप तो पत्रकार हैं। भैया जी और उनकी पत्रिका के बारे में आपकी क्या धारणा है?’

मैंने गोलमोल जवाब दे दिया।

वे बोले, ‘भैया जी से जलने वाले और उनके विरोधी बहुत हैं। दुर्मुख जी को जानते हैं?’

मैंने कहा, ‘नहीं।’

‘कर्कट जी को?’

मैंने कहा, ‘इनको भी नहीं जानता।’

वे बोले, ‘ये भैया जी के विरोधी संपादक हैं। निकृष्ट लोग हैं। आप इनको नहीं जानते यह जानकर निश्चिंतता हुई।’

फिर दो पन्ने का एक कागज निकाल कर बोले, ‘यह भैया जी का बायोडाटा है। फुरसत से पढ़िएगा। चमत्कृत कर देने वाला है। कभी भैया जी पर अपने अखबार में लेख लिखें। हम और आवश्यक सामग्री भेज देंगे। हम चाहते हैं भैया जी की कीर्ति पूरे देश में फैले।’

फिर उन्होंने फोन उठाया, बोले, ‘भैया जी, ये दिल्ली से नीरज जी आपके दर्शन के लिए आये हैं। भेजूं क्या?’

उधर से उत्तर पाकर बोले, ‘जाइए, मिल लीजिए। जूते यहीं उतार दीजिए। भैया जी का ऑफिस हमारे लिए मन्दिर है।’

कुछ महीने बाद दिल्ली में अचानक दीपक जी टकरा गये। नमस्कार के बाद मैंने पूछा, ‘क्या हाल है? विपिन जी कैसे हैं?’

वे मुंह बिगाड़ कर बोले, ‘उनकी बात मत कीजिए। उनकी नज़र में हमारी निष्ठा का कोई मूल्य नहीं है। आजकल वे बहुत पक्षपात करते हैं। अब हमारा उनसे कोई संबंध नहीं है।’

मैंने शरारत से पूछा, ‘तो अब आप किस पत्रिका से जुड़े हैं?’

वे हंस कर बोले, ‘अभी तो कहीं जुड़ा नहीं हूं। हम तो शिशुवत हैं। बिना किसी की गोद में बैठे चैन नहीं पड़ता। देखिए किस गोद में गिरते हैं।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ फाइल इतनी दीजिए… ☆ श्री धर्मपाल महेंद्र जैन ☆

श्री धर्मपाल महेंद्र जैन

संक्षिप्त परिचय

(सुप्रसिद्ध एवं वरिष्ठ साहित्यकार श्री धर्मपाल जी का जन्म रानापुर, झाबुआ में हुआ। वे अब कैनेडियन नागरिक हैं। प्रकाशन :  “गणतंत्र के तोते”, “चयनित व्यंग्य रचनाएँ”, “डॉलर का नोट”, “भीड़ और भेड़िए”, “इमोजी की मौज में” “दिमाग वालो सावधान” एवं “सर क्यों दाँत फाड़ रहा है?” (7 व्यंग्य संकलन) एवं Friday Evening, “अधलिखे पन्ने”, “कुछ सम कुछ विषम”, “इस समय तक” (4 कविता संकलन) प्रकाशित। तीस से अधिक साझा संकलनों में सहभागिता। स्तंभ लेखन : चाणक्य वार्ता (पाक्षिक), सेतु (मासिक), विश्वगाथा व विश्वा में स्तंभ लेखन। नवनीत, वागर्थ, दोआबा, पाखी, पक्षधर, पहल, व्यंग्य यात्रा, लहक, समकालीन भारतीय साहित्य, मधुमती आदि में रचनाएँ प्रकाशित। श्री धर्मपाल जी के ही शब्दों में अराजकता, अत्याचार, अनाचार, असमानताएँ, असत्य, अवसरवादिता का विरोध प्रकट करने का प्रभावी माध्यम है- व्यंग्य लेखन।” आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य फाइल इतनी दीजिए…।)

☆ व्यंग्य – फाइल इतनी दीजिए… ☆ श्री धर्मपाल महेंद्र जैन ☆

आजकल दफ़्तरों में फाइल गुम हो जाना सामान्य बात हो गई है। ऐसा लगने लगा कि फाइलों के बाबुओं की तरह पर निकल आए हैं और वे भी इनकी तरह दफ़्तर से सफलतापूर्वक ग़ायब होने में कामयाब हो जाती हैं। इस सिलसिले में मुझे पिछले दशक की एक घटना याद आती है। यह घटना एक भारतीय विश्वविद्यालय की है जिसमें दूसरे विश्वविद्यालयों की तरह हर छोटे-बड़े विषय के अलग-अलग ठेकेदार थे, दुकानें थीं, जिन्हें विभाग के नाम से जाना जाता था। शास्त्र सम्मत सामाजिक घटनाओं को घटाने का ठेका आज भी समाजशास्त्र विभाग का है। अतः इस महान घटना को समाज शास्त्र विभाग में ही घटित होना चाहिए था। सो यह घटना वहीं घटित हुई।

उन दिनों कैम्पस में एक साँड रहता था। साँड बुद्धिजीवी, मदमस्त, अल्हड़ और नौजवान कैम्पसियों जैसा था पर वह फाइलभक्षी था। एक दिन क्षुधा शांत करने के लिए वह समाजशास्त्र विभाग में जा घुसा और कुछ महत्वपूर्ण फाइलें खा कर चला गया। क्षुधा निरन्तर है, उसे फिर भूख लगी। वह पुनः आया तथा कुछ और फाइलें खा गया। यह क्रम चलता रहा। लोग तटस्थ होकर देखते रहे और साँड फाइलें खाता रहा। एक दिन सारी महत्वपूर्ण फाइलें ख़त्म हो गईं सिर्फ़ कचरा फाइलें बचीं तब साँड ने आना बंद कर दिया। महत्वपूर्ण फाइलों के गुम हो जाने की बात जब प्रशासन को मालूम हुई तो हल्ला मच गया। विभागीय जाँच हुई। इसका परिणाम वैसा ही गुड़-गोबर था जैसा तमाम विभागीय जाँचों का होता है। मुझे लगता है साँड फाइल कक्ष में घुसा होगा। उसके प्रवेश के साथ ही कक्ष में क्रान्तिकारी परिवर्तन आए होंगे, साँड ने सिंह गर्जना की होगी। तब अलमारियाँ स्वतः खुली होंगी और महत्वपूर्ण फाइलों ने बाहर निकल प्रार्थनारत हो कहा होगा, “हे साँड देवता, हम महत्वपूर्ण फाइलें हैं हमारा भक्षण करो। हमारे भक्षण से इस विभाग का भला होगा।” विघ्न विनाशक साँड देवता ने उन सभी फाइलों को उदरस्थ कर लिया होगा। क्षुधा शांत हो गई होगी और वह चला गया होगा। चूँकि क्षुधा चिर है वह फिर भड़की होगी और ऐसा ही होते रहने में सब महत्वपूर्ण फाइलें ख़त्म हो गई होंगी। जाँच अधिकारी की थीसिस भी इससे ज़्यादा भिन्न नहीं थी। इसलिए विभाग पर आया संकट टल गया। तब से मैं फाइलों को रफा-दफा करने में भगवान का हाथ मानता हूँ।

फाइलें सर्वव्यापी सत्य हैं। वह अमेरिका में भी है और बरेली में भी। फाइल त्रिलोकी है, ज़मीन, अंतरिक्ष और सागर पर भी। फाइलें त्रिकालदर्शी तो हैं ही। भूतकाल की फाइलें इतिहास लिखने वालों के संदर्भ ग्रंथ हैं तो भविष्यकाल की फाइलें अफरा-तफरी करने की वृहत योजनाएँ हैं। वर्तमानकाल की फाइलें आयोगों का रोज़गार हैं। फाइलों की इस गति पर देश की प्रगति टिकी है। मैंने पाया है कि तानाशाही हो या प्रजातंत्र, दुर्गम पर्वत हो या सात समन्दर, फाइलें बेखटके प्रधानमंत्रीजी की तरह इधर से उधर दौड़ती हैं। फाइल रुकी, काम अटका। साम्यवाद, पूँजीवाद, समाजवाद व चमचावाद सभी व्यवस्थाएँ फाइलवाद के सामने नतमस्तक हैं। फाइल भले ही पुट्ठे का गत्ता है पर वह बाबू का भत्ता है, अफ़सर की सत्ता है और राज्य सरकार के तख्ते का हत्था है। फाइल का लालफ़ीता प्रशासन की जान है, इसीलिए लालफ़ीताशाही सरकार का नाम है।

फाइलें ख़ुद तो भोली-भाली होती हैं, पर बाबुओं की क़िस्मत हो तो फाइलें मंत्रियों के साथ हवाईजहाजों में घूमती हैं तथा भाग्यहीन हो तो गट्ठरों में बंधी पड़ी रहती हैं और धूल चाटती रहती है फिर भी सभी फाइलों में कुछ सर्वमान्य गुण हैं। इनसे लोग कतराते हैं, बाबू टरकाते हैं और अफ़सर  धमकाते हैं। फाइलों का महायज्ञ करके कई सत्ताधारी महाविनाश से बचे हैं। सरकार बदलने पर कई पूर्व राजनेताओं ने सत्ता हस्तांतरण के समय फाइलों का हवन सामग्री की तरह उपयोग किया है।

प्रजातंत्र को अजर-अमर बनाए रखने के लिए फाइलों ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया है। पिछले वर्षों की एक घटना है। पवित्र भारत भूमि के एक राज्य में एक मुख्यमंत्री थे। वे बड़े घपला प्रिय थे। उन्होंने अपने घपलों को सार्वजनिक प्रशस्ति से बचाने के लिए ख़ुद ही एक जाँच आयोग बना डाला और अपनी महत्वपूर्ण फाइलें उसे दे दीं। फाइलें सरकार की दुखती नस होती हैं। कोई दबा दे तो सरकार कराह उठती है। फाइलें सौंप कर राज्य सरकार ने अपनी नस ख़ुद दबाना चाही। केन्द्र सरकार से ‘आ बैल मुझे मार’ वाला यह दर्द नहीं देखा गया, उसने दूसरा आयोग बना दिया, ताकि राज्य का दर्द कम हो सके। विचित्र स्थिति बन गई। फाइलें एक-एक थीं और आयोग दो। दूसरे आयोग ने फाइल माँगी। राज्य आयोग ने केन्द्र आयोग से कहा ‘जा, जा बड़ा आया फाइलें लेने।’ केन्द्र आयोग रुआँसा हो गया। उसने समझाया, छोटे भाई फाइल के बिना हमारा जन्म निरर्थक है। चलो फाइलों की फोटो कॉपी ही दे दो। उत्तर मिला ‘फोटोकॉपी बनने में पाँच साल लगेंगे।’ पाँच साल में खरबों रुपयों की पंचवर्षीय योजनाएँ बराबर हो जाती हैं तो फिर इन फाइलों की औकात ही क्या? फाइलों के झगड़े में राज्य सरकार दर्द मुक्त हो गई। न बाँस बचा न बाँसुरी बजी।

भारत जैसे विकासशील देश में फाइलों का स्थान महत्त्वपूर्ण मानना ही पड़ेगा। रोज़गार बढ़ाने वाली फाइलों को साहित्य में श्रीवृद्धि करने का तमगा प्राप्त है। भई, फाइल खिसकानी पड़ेगी, फाइल देखनी पड़ेगी, फाइल ढूँढनी पड़ेगी, फाइल बदलवानी पड़ेगी, फाइल पड़ी है, फाइल चल रही है आदि मुहावरे आम आदमी के पल्ले पड़े हैं। आप इन फाइली मुहावरों का अर्थ समझ जाएँ तो ठीक है, नहीं तो बाबू शुद्ध हिन्दी में आपको इनका अर्थ और अनर्थ समझा देगा।

बेचारा ऑफ़िसजीवी आदमी ‘फाइल से, फाइल द्वारा, फाइल के लिए’ हो गया है। मैं हर महीने की दूसरी तारीख़ से सोचता हूँ कि यदि फाइल का उद्भव न हुआ होता तो बाबुओं का दम निकल गया होता। इस महँगाई के ज़माने में क्या ओढ़ता, क्या बिछाता? तृतीय श्रेणी के ग्रेड में क्या ख़ुद खाता और परिवार को क्या खिलाता? उसने फाइल को अपना सर्वस्व माना तो बुरा नहीं किया। तारणहार हो गई हैं फाइलें। इसलिए प्रातः स्मरणीय प्रभु से तमाम बाबुओं की ओर से मेरी प्रार्थना है –

फाइल इतनी दीजिए जामे कुटुम्ब समाय।

मैं भी भूखा न रहूँ, बॉस न भूखा जाय।।

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© श्री धर्मपाल महेंद्र जैन

संपर्क – 22 Farrell Avenue, North York, Toronto, ON – M2R1C8 – Canada

वेब पृष्ठ : www.dharmtoronto.com

फेसबुक : https://www.facebook.com/djain2017

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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