मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 54 – पंढरीची वारी ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

(आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  एक भावप्रवण कविता  “पंढरीची वारी”।  यह कैसी विडम्बना है कि आज भक्त अपने हृदय में भक्तिभाव के रहते हुए भी प्रभु के दर्शन नहीं कर पा रहे हैं और प्रभु भी अपने भक्तों को दर्शन नहीं दे पा रहे हैं। आज सब के पैर महामारी के प्रकोप से बंधे हुए हैं । बरसों  पुरानी परंपरा थम सी गई है मानों प्रभु कह रहे हों आज पंढरपुर बंद है, अपने घरों में ही मुझे स्मरण करो। मैं स्वयं तुम्हारे घर पर ही दर्शन दूंगा। एक अप्रतिम रचना । सुश्री प्रभा जी द्वारा रचित  भक्तिभावपूर्ण रचना के लिए उनकी लेखनी को सादर नमन ।  

मुझे पूर्ण विश्वास है  कि आप निश्चित ही प्रत्येक बुधवार सुश्री प्रभा जी की रचना की प्रतीक्षा करते होंगे. आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी  के उत्कृष्ट साहित्य को  साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 54 ☆

☆ पंढरीची वारी ☆ 

पंढरीच्या राया

नाही आता वारी

तूच ये सत्वरी

घरी माझ्या!

❃

केली ज्यांनी वारी

सदोदित पायी

घेई हृदयाशी

देवा त्यांना

❃

 एकदाच गेले

वारी मध्ये तुझ्या

 केली मनोमन

नित्य  पूजा

❃

थकले पाऊल

अवेळीच माझे

नाही आले पुन्हा

तुझ्या भेटी

❃

 आली महामारी

जगतात सा-या

पंढरीच्या फे-या

बंद आता

❃

तूच माझी भक्ती

तूच माझी शक्ती

देई बळ फक्त

जगण्याचे

❃

 सांग आता भक्ता

येऊ नको दूर

रे पंढरपूर

बंद आता

❃

 हे लाॅकडाऊन

सर्वांनी पाळावे

घरीच रहावे

सुरक्षित

❃

 पांडुरंग ध्यानी

पांडुरंग मनी

झाले मी हो जनी

अंतर्बाह्य

❃

© प्रभा सोनवणे

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ फेरा ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ फेरा ☆

अथाह अंधेरा

एकाएक प्रदीप्त उजाला

मानो हजारों

लट्टू चस गए हों,

नवजात का आना

रोना-मचलना

थपकियों से बहलना,

शनै:-शनै:

भाषा समझना,

तुतलाना

बातें मनवाना

हठी होते जाना,

उच्चारण में

आती प्रवीणता,

शब्द समझकर

उन्हें जीने की लीनता,

चरैवेति-चरैवेति…,

यात्रा का

चरम आना

आदमी का हठी

होते जाना,

येन-केन प्रकारेण

अपनी बातें मनवाना,

शब्दों पर पकड़

खोते जाना,

प्रवीण रहा जो कभी

अब उसका तुतलाना,

रोना-मचलना

किसी तरह

न बहलना,

वर्तमान भूलना

पर बचपन उगलना,

एकाएक वैसा ही

प्रदीप्त उजाला

मानो हजारों

लट्टू चस गए हों

फिर अथाह अंधेरा..,

जीवन को फेरा

यों ही नहीं

कहा गया मित्रो!

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।

©  संजय भारद्वाज, पुणे

प्रात: 10:10 बजे, शनिवार, 26.5.18

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 33 – बापू के संस्मरण-7 बा, बापू और सुभाष बाबू की चाय ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. 

आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह गाँधी विचार  एवं दर्शन विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है.  लेख में वर्णित विचार  श्री अरुण जी के  व्यक्तिगत विचार हैं।  ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक  दृष्टिकोण से लें.  हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ  प्रत्येक बुधवार  को आत्मसात कर सकें। आज प्रस्तुत है “बापू के संस्मरण – बा, बापू और सुभाष बाबू की चाय”)

☆ गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  विशेष ☆

☆ गांधी चर्चा # 33 – बापू के संस्मरण – 7 – बा, बापू और सुभाष बाबू की चाय ☆ 

 

सुभाषचन्द्र  बोस महात्मा गांधी से मिलने सेवाग्राम आश्रम मे आए थे। वे चाय पीने के आदी थे। कस्तूरबा   उनके  लिए चाय  बना   रही  थी। उधर से गांधीजी गुजरे और बा को चाय  बनाते  बिफर गए। ‘क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि आश्रम मे चाय बनाना और पिलाना मना है । तुम ऐसा क्यो  कर रही हो ?  कस्तूरबा ने कोई उत्तर नहीं दिया और सुभाष बाबू की तरफ चाय का प्याला बढा  दिया।

गांधी जी को यह अच्छा नहीं लगा और वे कोई टिप्पणी करते उसके पहले कस्तूरबा ने उत्तर दिया – मुझे सब मालूम है लेकिन मेहमानो के लिए नियम लागू नहीं होते। गांधीजी निरुत्तर हो गए और वहाँ से चले गए। यह था कस्तूरबा का प्रभाव जिससे गांधीजी भी प्रभावित थे।

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

(श्री अरुण कुमार डनायक, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं  एवं  गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित हैं। )

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 3 – नफरत का बीज कहाँ पैदा होता है? ☆ – श्री प्रह्लाद नारायण माथुर

श्री प्रहलाद नारायण माथुर

( श्री प्रह्लाद नारायण माथुर जी  अजमेर राजस्थान के निवासी हैं तथा ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से उप प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपकी दो पुस्तकें  सफर रिश्तों का तथा  मृग तृष्णा  काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दो पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य । आज से प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा  जिसे आप प्रति बुधवार आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता  नफरत का बीज कहाँ पैदा होता है?

 

Amazon India(paperback and Kindle) Link: >>>  मृग  तृष्णा  

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 3 – नफरत का बीज कहाँ पैदा होता है?  ☆

 

उड़ना चाहता हूँ आसमान की ओर,

देखना चाहता हूँ नफरत का बीज कहाँ पैदा होता है ||

उड़ना चाहता हूँ परिंदो की तरह,

देखना चाहता हूँ दुनिया में पाप कहाँ पैदा होता है ||

 

रहना चाहता हूँ दोस्तों में घुल मिलकर,

देखना चाहता हूँ अब सुदामा सा दोस्त कहाँ होता है ||

रहना चाहता हूँ रिश्तों की हवेली में,

देखना चाहता हूँ रिश्तों का धागा कैसे मजबूत होता है ||

 

जीना चाहता हूँ मैं सब के लिए,

देखना चाहता हूँ मेरे लिए दुनिया में कौन जीना चाहता है ||

माफ़ी चाहता हूँ सबसे अपनी हर गलती के लिए,

देखना चाहता हूँ खुद की गलतियां मान कौन मुझे गले लगाता है ||

 

© प्रह्लाद नारायण माथुर 

8949706002

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हिन्दी साहित्य ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य # 32 ☆ हमको दर्द छिपाने होंगे ☆ श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’  

( श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’ जी  एक आदर्श शिक्षिका के साथ ही साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे गीत, नवगीत, कहानी, कविता, बालगीत, बाल कहानियाँ, हायकू,  हास्य-व्यंग्य, बुन्देली गीत कविता, लोक गीत आदि की सशक्त हस्ताक्षर हैं। विभिन्न पुरस्कारों / सम्मानों से पुरस्कृत एवं अलंकृत हैं तथा आपकी रचनाएँ आकाशवाणी जबलपुर से प्रसारित होती रहती हैं। आज प्रस्तुत है  एक भावप्रवण कविता हमको दर्द छिपाने होंगे। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य # 32 ☆

☆ हमको दर्द छिपाने होंगे ☆

 

अपने दूर ठिकाने होंगे

हमको दर्द छिपाने होंगे.

 

हमें पता तुम नहीं मिलोगे

तुम पर कई बहाने होंगे.

 

इस जग की तो रीति पुरानी

हमको मन समझाने होंगे.

 

बसे तुम्हीं तन-मन में मेरे

सब इससे अनजाने होंगे.

 

टीस उठी है मन में कोई

रिसते घाव पुराने होंगे.

 

© श्रीमती कृष्णा राजपूत  ‘भूमि ‘

अग्रवाल कालोनी, गढ़ा रोड, जबलपुर -482002 मध्यप्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 40 ☆ वो चीखें ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एडिशनल डिविजनल रेलवे मैनेजर, पुणे हैं। आपका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है।आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  कविता “ वो चीखें  ”।  यह कविता आपकी पुस्तक एक शमां हरदम जलती है  से उद्धृत है। )

आप निम्न लिंक पर क्लिक कर सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी के यूट्यूब चैनल पर उनकी रचनाओं के संसार से रूबरू हो सकते हैं –

यूट्यूब लिंक >>>>   Neelam Saxena Chandra

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 40 ☆

☆ वो चीखें  ☆

सुनो,

औरतों की यह गूँजती चीखें

मुझसे बर्दाश्त नहीं होतीं-

भेद जाती हैं मेरे कानों को,

टुकड़े कर देती हैं मेरे ज़हन के

और मुझे हिला जाती हैं!

 

मेरे देश में

जहां देवियाँ पूजी जाती हैं,

वहीँ आजन्म कन्याओं को

कोख में ही मार दिया जाता है;

जब दम तोड़ते हुए

वो लडकियां चीखती हैं ना-

मेरे दिल का एक कोना

सुन्न हो जाता है!

 

आज भी मेरे देश में

दहेज़ के नाम पर

एक बेचारा पिता

सब कुछ गिरवी रख देता है,

अपना घर, अपना खेत, अपनी इज्ज़त;

पर फिर भी जलाई जाती हैं

उनकी बेटियाँ…

जब कोई बेटी इस तरह

अपने प्राण त्यागते वक़्त चीखती है ना-

तड़प उठता है मेरा मन!

 

अभी कुछ दिन पहले

बड़ा हल्ला मचा था

जब दामिनी का बलात्कार कर

उसे निर्दयता से मार दिया गया था-

कहाँ बंद हुई है अभी भी

वो निष्ठुरता?

अब भी लडकियां और औरतें

हैवानियत का शिकार बनती ही रहती हैं

और जब वो चीखती हैं न-

एक खामोशी मेरे ज़हन को घेर लेती है!

 

सुनो,

इन औरतों से कह दो ना

वो चुप रहा करें-

न बोला करें कुछ भी,

सब कुछ सह लिया करें

और चीखा तो बिलकुल न करें…

मेरा दम घुटता है!

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 56 ☆ व्यंग्य – नया भारत ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का एक अतिसुन्दर व्यंग्य   “ नया भारत ”।  यह बिलकुल सच है कि मार्केटिंग ने न केवल फ़ास्ट मूविंग कंस्यूमर गुड्स  अपितु हमारे जीवन में भी अहम् भूमिका निभा रहे हैं। श्री विवेक जी की लेखनी को इस अतिसुन्दर  व्यंग्य के  लिए नमन । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य # 56 ☆ 

☆ व्यंग्य –  नया भारत ☆

मार्केटिंग का फंडा है जब किसी ब्रांड नेम की वैल्यू कुछ कम लगने लगे तो उसका नया अवतार प्रस्तुत करके लोकप्रियता बरकरार रखी जाती है. इसके लिये स्पार्कलिंग कलर्स में पैकेजिंग बदली जाती है, नये स्लोगन और टैग लाईन दी जाती है. हिन्दी में पढ़े उपसर्ग व प्रत्यय का भी समुचित उपयोग करके ब्रांड वैल्यू की रक्षा की जाती है.  नाम के आगे “नया ” उपसर्ग लगा देने से सब कुछ नया नया सा हो जाता है. लोग पुराने की कमियां भूल जाते हैं, और नये के स्वप्न में खो जाते हैं. इस तरह लकड़ी की हांडी बारम्बार चढ़ाई जा सकती  है. निजी क्षेत्र में तो एम बी ए पास युवा अपने इसी हुनर की मोटी तनख्वाहें पाते हैं. पूरे विश्वास से प्रोडक्ट बिना बदले ” भरोसा वही, पैकिंग नई ” का स्लोगन प्राईम टाईम पर विज्ञापन बाला बोलती है और सेल्स के आंकड़े बढ़ने लगते हैं, क्योकि जो दिखता है वही तो बिकता है. एक संस्थान का नाम उसके लोगो पर केपिटल लैटर्स में लिखा जाता था, फंड मैनेजर की  नीयत में कुछ खोट आ गई, घोटाले का क्या है,हो गया. जांच वगैरह बिठा दी गईं, पर संस्थान तो नहीं बिठाया जा सकता था, लोगो बदल दिया गया, कैपिटल लैटर्स की जगह स्माल लैटर्स में संस्था का नया नाम लिख दिया गया. फंड फिर चल निकला. आखिर हर साल इस देश में करोड़ो की आबादी बढ़  रही है, पुरानो को न सही नयो को तो नये से परिचित करवाया ही जा सकता है. फ़ास्ट मूविंग कंस्यूमर गुड्स  में एक नही अनेक प्रोडक्ट हैं,जो कभी गुणवत्ता में कम ज्यादा निकल आते हैं, कभी किसी मिलावट  के शिकार हो जाते हैं, कभी कोई कीटाणु निकल आता है पैक्ड बोटल में पर मजाल है कि सेल्स के फिगर गिर जायें, लोगो की स्मृति कमजोर होती है, विज्ञापन की ताकत और नाम के आगे “न्यू” का प्रिफिक्स बेड़ा पार करवा ही देता है. एक टुथपेस्ट के सेल्स फिगर गिरे तो उसने प्रोडक्ट में नमक, तुलसी, बबूल, जाने क्या क्या मिलाकर एक के अनेक उत्पाद ही परोस दिये. खरीदो जो पसंद आये पर खरीदो हमसे ही.

देश के मामले भी तकनीकी मनोविज्ञान के सहारे मैनेज किये जाते हैं. अभी तक गरीबी हटाओ के नारो को, अच्छे दिनों के सपनो को, सुनहरे कल के सफर के तिलिस्म को, बेहतरी के लिये बदलाव को अखबारो के फुल पेज विज्ञापनो के सहारे वोटो में तब्दील करने के ढ़ेरो प्रयोग कईयो ने कई कई बार किये हैं. पर अब कुछ बेहतर की जरूरत लग रही है. इसलिये नामुमकिन से ना हटा दिया गया है. वहां से न लेकर या में मिलाकर,  “नया” उपसर्ग जुड़ा ताकतवर  रत पूरे भरोसे और श्रद्धा  के साथ प्रस्तुत है. मेरी कामना है कि सचमुच ही मेरा भारत  दिखने में स्मार्ट, व्यवहार में गंभीर, ताकत में फौलादी  नया भारत हो जावे, तो फिर किसी को विज्ञापन में बोलना न पड़े काम खुद ही बोले आरोप लगाने से पहले आरोप लगाने वाला सौ दफा सोचे..

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 50 – कविता – जन्म जन्म की प्रीत निभाने…….☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत हैं उनकी  एक अप्रतिम कविता  “जन्म जन्म की प्रीत निभाने……..”।  भारत में वैवाहिक बंधन की रस्में अविस्मरणीय तो होती ही हैं साथ ही एक एक पल  भी अविस्मरणीय होता है जिसके एक अंश को श्रीमती सिद्धेश्वरी जी  ने  इस शब्दचित्र के माध्यम से बखूबी लिपिबद्ध किया है।  इस सर्वोत्कृष्ट  रचना के लिए श्रीमती सिद्धेश्वरी जी को हार्दिक बधाई।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 49 ☆

☆ कविता  – जन्म जन्म की प्रीत निभाने …….. ☆

 

पांव की सुंदरता देख

लग गई दिल पर हाजिरी

लाल लाल मेहंदी सजी

पहने राजस्थानी मोजरी

 

नूपुर की सुंदरता धामे

झूलन मोतियों की लगी

पांवों की सुंदरता सोच

मुख देखन की आस लगी

 

थम थम  जब चलेगी गोरी

खन खन खनकेगा कंगना

सुर ताल छेड़ती नूपुर भी

जाएगी पिया के अंगना

 

सिर सिंदूरी लाल लगाई

हाथों लाली लाली सजाई

घूंघट की ओर से दिखे

सुर्ख लाल होठों की लाली

 

देख लाल जोडे पर दुल्हन

साजन भी लजाए लाल

जनम जनम साथ निभाने

मांथे  तिलक लगाए लाल

 

प्रकृति की सुंदर रचना

मेंहदी ने दिखाया अपना रंग

जन्म जन्म की प्रीत निभाने

सात फेरे लिए दोनों संग संग

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ उत्सव कवितेचा # 8 – ऐन थंडीत ☆ श्रीमति उज्ज्वला केळकर

श्रीमति उज्ज्वला केळकर

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपके कई साहित्य का हिन्दी अनुवाद भी हुआ है। इसके अतिरिक्त आपने कुछ हिंदी साहित्य का मराठी अनुवाद भी किया है। आप कई पुरस्कारों/अलंकारणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपकी अब तक 60 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें बाल वाङ्गमय -30 से अधिक, कथा संग्रह – 4, कविता संग्रह-2, संकीर्ण -2 ( मराठी )।  इनके अतिरिक्त  हिंदी से अनुवादित कथा संग्रह – 16, उपन्यास – 6,  लघुकथा संग्रह – 6, तत्वज्ञान पर – 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  हम श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी के हृदय से आभारी हैं कि उन्होने साप्ताहिक स्तम्भ – उत्सव कवितेचा के माध्यम से अपनी रचनाएँ साझा करने की सहमति प्रदान की है। आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता  ‘ऐन थंडीत’ एवं इस मूल कविता का  श्री भगवान् वैद्य ‘प्रखर’ जी द्वारा  ऐन सर्दियों में  शीर्षक से हिंदी  भावानुवाद किया गया है जिसे आप निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

कविता का लिंक  >>>>   ☆ ऐन सर्दियों में ☆

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – उत्सव कवितेचा – # 8 ☆ 

☆ ऐन थंडीत ☆

या आश्वस्त वृक्षांनीच

विश्वासघात केला आमचा

ऐन थंडीत.

आसरा अव्हेरणं

त्यांना अशक्य झालं,

तेव्हा त्यांनी

विटा काढून घेतल्या

आपल्या घराच्या भिंतींच्या

आता उघडे पडलेले आम्ही

वाट बघतोय

पिसे झडण्याची

किंवा

कुणा शिका-याच्या

मर्मभेदी बाणाची.

 

© श्रीमति उज्ज्वला केळकर

176/2 ‘गायत्री ‘ प्लॉट नं12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ , सांगली 416416 मो.-  9403310170

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 53 ☆ पावसाचे थेंब ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक अत्यंत मार्मिक, ह्रदयस्पर्शी एवं भावप्रवण कविता  “पावसाचे थेंब”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 53 ☆

☆ पावसाचे थेंब☆

 

असंख्य पावसाचे थेंब

डोकं आपटून घेतात

रस्त्यावर, खडकावर,

ओघळ होऊन वाहतात,

खड्ड्यांची तळी निर्माण करतात,

डोंगरावरून कोसळतात,

नदीत धावतात,

धरणात साटतात,

मातीला सुखावतात,

अन्नाच्या निर्मितीत योगदान देतात,

सजीवांत जगवण्याची उमेद निर्माण करतात,

समुद्रात माशांना जगवतात,

भूतलावर प्राण्यांना वाढवतात,

कधी पानांच्या कुशीत

मोत्यांचं रूप घेऊन विसावतात,

कधी गोठून घेतात स्वतःचंच अस्तित्व

कधी आग झेलतात, बाष्प होतात,

बहुरुप्यासारखी रुपं बदलतात

पावसाचे थेंब

या साऱ्या उपकाराच्या बदल्यात

काय मागतात ते तुमच्याकडे

पाणी वाचवा पाणी जिरवा

इतकच ना ?

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

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