(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “सभी अपने लगेंगे गैर दुनिया में नहीं कोई…“)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १३० ☆
सभी अपने लगेंगे गैर दुनिया में नहीं कोई… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – पता होता तो बता देता…।)
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लघुकथा – “बयान… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४५ ☆
लघुकथा – बयान… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
इंस्पेक्टर साहब, मेरा जन्म एक गरीब परिवार में हुआ । मेरे माता पिता गरीब जरूर थे पर संस्कारवान थे। धर्म में उनकी पूरी आस्था थी और न किसी का बुरा करते थे और न चाहते थे। विवाह योग्य उम्र होने पर उन्होंने मेरा विवाह सतीश के साथ कर दिया। सतीश पढे लिखे और समझदार आदमी थे। अपने माता-पिता तथा मेरा बहुत ख्याल रखते। घर में कोई कमी नहीं थी। जब मेरी बड़ी बेटी का जन्म हुआ तो उन्होंने बहुत खुशी मनाई। पूरे उत्साह के साथ। बेटी बड़ी होने लगी उतना ही उसके साथ खेलने लगे। दूसरी बार भी बेटी पैदा हुई तो उनका उत्साह कुछ कम दिखाई देने लगा।
बड़ी बेटी विवाह योग्य हुई तो उसका विवाह कर दिया। दामाद अच्छे मिले। अब छोटी बेटी की ही जिम्मेदारी रह गई । पता नहीं क्यों सतीश के व्यवहार में परिवर्तन आता गया। हफ्ते में एक दो बार शराब पीकर घर आने लगे। कुछ दिन मैं चुप रही पर जब उनका पीने का क्रम बढता गया तो टोका कि कोई टेंशन है क्या जो पीने लगे हो तो उन्होंने हाथ झटक दिया और मुझे एक थप्पड़ मार दिया। धीरे-धीरे रोज पीकर आने लगे। मैं कुछ बोलने के लिए जैसे ही मुंह खोलती तो तुरंत पीटने लगते। पीटने का क्रम रोजाना का क्रम बन गया। बस घर शराब पीकर आते और मेरी धुनाई शुरू कर देते। मेरा क्या अपराध था, मेरी समझ में कभी नहीं आया और न उन्होंने बताया। पड़ोसी बीच बचाव करने आते पर वे किसी की नहीं सुनते और दूसरे के सामने तो ज्यादा जोर से पीटते तथा गाली गलौज करते, तमाम अपशब्द कहकर मुझे नीचा दिखाते। कभी बेटी दामाद आते तो उनके सामने और ज्यादा पीटते गाली बकते। छोटी बेटी बीच में आती तो एकाध हाथ उसको भी पड़ जाता। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था।
पिछले महीने बेटी दामाद आए थे तो उनके सामने मुझे खूब पीटा गालियां दीं अपशब्द कहे। बेटी दामाद का कोई ख्याल नहीं रखा और वे अपने गांव चले गए। अभी एक हफ्ते पहले उन्होंने मुझे इतना पीटा कि मैं गिर गई। गिरी हुई होने पर भी लात मारते रहे। मेरे सिर के पीछे एक डंडा पड़ा था, जो मेरे हाथ पड़ गया और मैंने लेटे हुए ही वह डंडा सतीश के सिर पर दे मारा, वे गिर पड़े और मुझे क्या हुआ पता नहीं पर मैं उन्हें तब तक डंडे से मारती रही जब तक उनके प्राण न निकल गए। छोटी बेटी ने मुझे रोका और झिंझोड़ा तो मेरे हाथ रुके और सतीश को देखकर उनसे लिपट कर रोने लगी कि उन्हें यह क्या हो गया। बेटी ने बताया कि मां तुमने पापा को मार डाला। मैं घबरा गई और बेटी की सहायता से उनके शव को कमरे में अंदर ले गई ताकि कोई देख न ले। लेकिन मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि सतीश मर गए हैं। मुझे लगता रहा कि वे नशे में गहरी नींद सो गए हैं। ऐसे ही चार दिन बीत गए। मैं कुछ समझने लायक हुई तो पांचवें दिन उनके शव को आंगन में गड्ढा खोद कर गाड़ दिया। फिर बड़ी बेटी के यहां चली गई। बेटी और दामाद को सब बतला दिया।
मुझे नहीं मालूम इंस्पेक्टर साहब कि आपको कैसे पता चला और मुझे पकड़ लिया। पर सच में सतीश को मारना नहीं चाहती थी। आप ही बताइए कि हम दोनों में अपराधी कौन है। मैंने एकदम सच्चा बयान दिया है इंस्पेक्टर साहब, कुछ भी छुपाया नहीं है।
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टिप्पणी: 8 तारीख के दैनिक भास्कर पुणे में एक समाचार देखा कि एक स्त्री ने पीट पीट कर अपने पति को मार डाला प्रकाशित हुआ।इस समाचार ने मुझे झकझोर दिया और इस लघुकथा की कल्पना हुई।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – नवजीवन।)
अरे! सुबह-सुबह अलार्म क्लॉक की तरह आ जाती है उठाने, क्या तुझे ठंडी नहीं लगती कमल जी ने दरवाजा खोलते हुए अपनी नौकरानी झुमरी से कहा?
झुमरी ने कहा-बीबी ठंडी लगती है लेकिन आप बताओ पेट की आग कैसे बुझेगी?
बीबी जी आपको चाय नाश्ता देना है और दो घरों में और काम करना है हम काम करने वालों को क्या ठंडी क्या गर्मी और क्या बरसात बस गोलू के बॉल की तरह दिन रात काम करना है।
और मेरे पास तो दो बेटियां हैं उनकी पढ़ाई की चिंता रहती है अब वह बड़ी भी हो रही है।
कमल जी ने मुस्कुराते कहा हां सब पता है चल चाय बना और मुझे भी पिला और तू भी पी उसके बाद काम करना।
ठीक है बीबी जी झुमरी ने कहा।
बीबी आज आपको स्कूल नहीं जाना क्या?
जाना है ठंड के कारण अब स्कूल का टाइम बदल गया है।
दीदी जब से भैया लोग बाहर रहने चले गए हैं आप स्कूल में पढ़ाते हो और फिर पार्क में गरीब बच्चों को भी पढ़ते हो आप बहुत ही नेक काम करते हो। दीदी आप तो मेरी हर मदद करते हो और आराम करने को बोलते हो बोलते हो आज नहीं कल काम कर लेना और घरों में तो सब लोग ज्यादा काम करवाते हैं मजाल है जो जरा देर सांस भी ले लूं?
कमल जी ने कहा गंभीर स्वर में तुझे तो कितने बार कहा है कि मेरे घर में ही बस काम कर और सब घर छोड़ दे लेकिन तू मानती ही नहीं।
दीदी आप मेरे लिए बहुत कुछ करते हो लेकिन आप पर मैं कितना बोझ बनूँ आपके घर में तो अकेले हो कुछ काम भी नहीं रहता।
चलो दीदी बातों में मत उलझाओ आप तैयार हो जाओ अच्छा झुमरी तुम्हारे नाम से एक मेरे घर में चिट्ठी आई है?
दीदी मुझे कौन चिट्ठी लिखेगा झुमरी ने कहा?
दीदी आप पढ़ कर मुझे बताओ ना इसमें क्या लिखा है?
ठीक है सुन यह चिट्ठी किसी विनोद नाम के व्यक्ति ने लिखी है. यह विनोद कौन है अरे दीदी वही मेरा शराबी पति उसको छोड़कर मैं बच्चों को लेकर मायके आ गई थी ना मेरी दो बेटियां हैं मेरी कहानी तो आपको पता ही है ना?
अब क्यों वह मुझे याद कर रहा है अपने भाई भोजाई के साथ रहे ना।
कह रहा एक बार तुझे और बच्चों को देखना चाहता है।
आपको तो पता है दीदी जीवन के कुछ घाव भरते नहीं है ये दिल की चोट है दीदी आपको भी सब ने छोड़कर चले गए दूसरी औरत के चक्कर में और मेरे आदमी ने भी मुझे दो बेटी होने के बाद छोड़ दिया।
आज उसके खत में मुझे अतीत की याद दिला दी आंखों के सामने संपूर्ण दृश्य घूमने लगा है
दीदी आप भी तो अपनी जिंदगी में आगे ही बढ़ गए बच्चे भी आपको छोड़कर चले गए।
कमल जी ने कहा-हां झुमरी क्या करूं?
तेरी दोनों बेटियां अच्छे से पढ़ लिख ले बस यही चाहती हूं तू भी एक उद्देश्य को लेकर चल।
जीवन एक नदी की तरह है जैसे नदी सारी कठिनाई को पार करते हुए समुद्र में मिलती है और जिस जिस शहर नगर से हो गुजरती है वहां सभी को नवजीवन देती है।
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२७ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २७ ☆ आचार्य भगवत दुबे
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है श्री अमरेंद्र नारायण जी द्वारा लिखित “सम्मान–पथ…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९२ ☆
☆ “सम्मान–पथ…” – लेखक… श्री अमरेंद्र नारायण☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक चर्चा
“सम्मान–पथ”( प्रेरक उपन्यास)
लेखक.. अमरेंद्र नारायण
प्रकाशन.. बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन
चर्चा विवेक रंजन श्रीवास्तव
☆ एक दार्शनिक एवं सांस्कृतिक अन्वेषण – – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
यह उपन्यास सुप्रसिद्ध चिंतक और वरिष्ठ लेखक अमरेन्द्र नारायण जी का समाज और व्यक्ति के बीच के रिश्ते को सम्मान, प्रेम और मूल्य चेतना के आधार पर पुनर्गठित करने का आग्रह है। इसमें लेखक समकालीन युवा की भटकी हुई आकांक्षाओं, भोगवाद और नैतिक संकट को केवल नियमों से नहीं, बल्कि “मन के शिक्षण” और सामाजिक सह अनुभूति से बदलने की बात करते हैं।
श्री अमरेन्द्र नारायण
लेखक ने यह शाश्वत सत्य प्रतिपादित किया है कि मन और विचार ही मानव जीवन का केन्द्र हैं। मन ही जीवन में सुख दुख, सफलताअसफलता और नैतिकता अनैतिकता की दिशा तय करता है। यदि मन को ज्ञान, विवेक और सकारात्मक अनुभवों से संयमित नहीं किया जाए, तो वही ऊर्जा स्वार्थ, हिंसा और विकृति में बदल जाती है। इसलिए मन का शिक्षण, चरित्र–निर्माण की पहली सीढ़ी माना गया है। उदाहरण के तौर पर लेखक बताता है कि आज के कई युवा ऊँचे पद और अधिक धन तो चाहते हैं, परन्तु अपने कर्तव्य, श्रम और समाज के प्रति जिम्मेदारी को गौण मान लेते हैं, जिससे उनके जीवन में खालीपन और असंतोष बढ़ता जाता है।
आधुनिक युवा पीढ़ी ऐसी सामाजिक स्थितियों से घिर गई है कि वह भोगवादी संकट से गुजर रही है।
पुस्तक में आज के युवा को तकनीक समृद्ध, परन्तु लक्ष्य विहीन और मानसिक रूप से अस्थिर बताया गया है, क्योंकि उसने “अदृश्य सुख” को ही जीवन लक्ष्य मान लिया है। वह उस मरीचिका के पीछे भाग रहा है। लेखक कथानक इस प्रकार बुनता है कि पाठक के सम्मुख स्पष्ट चित्र बनते चलते हैं। करियर, प्रतियोगिता और उपभोग के दबाव में युवा अपने भीतर की नैतिक शक्ति को भूल कर केवल तात्कालिक लाभ की दौड़ में शामिल होता दिख रहा है। वे संकेत करते हैं कि कुछ युवा तेज़ी से पैसा कमाने के लिए अनैतिक साधन अपनाते हैं, जबकि वही ऊर्जा, यदि समाज सेवा, राष्ट्र निर्माण या सृजनात्मक कामों में लगाई जाए, तो वे स्वयं भी संतुष्ट होंगे और समाज का भी कल्याण होगा। अमरेंद्र जी युवाओं में व्यवहारिक प्रेम, लज्जा और सामाजिक अनुशासन के उदाहरण देते हुए अपना मंतव्य कुशलता से पाठकों के सम्मुख रखते हैं।
किताब में कई सांस्कृतिक धार्मिक प्रसंगों और लोक परम्पराओं के उदाहरण से बताया गया है कि समाज पहले प्रेम, लज्जा और आपसी सम्मान से ही स्व नियंत्रित रहता था। एक स्थान पर नवरात्र या अन्य पर्वों के संदर्भ में वर्णन आता है कि किस तरह पूरा गाँव स्वच्छता, सादगी और सामूहिक पूजा अनुष्ठान के माध्यम से एक दूसरे के प्रति संवेदनशील और अनुशासित होता था। वहाँ नियमों से अधिक “संकोच” और “आपसी नज़र” लोगों को गलती से रोकती थी। एक अन्य प्रसंग में भजन कीर्तन और लोकगीतों के माध्यम से स्त्रियों की परस्पर भागीदारी, सामूहिक श्रम और साझा उत्सव का चित्रण है, जो दिखाता है कि संस्कृति केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मूल्य संरक्षण का माध्यम भी है।
सम्मान पथ जीवन के समाधान का रास्ता सुझाता प्रेरक उपन्यास बन पड़ा है।
लेखक के अनुसार वर्तमान वैश्विक संकट की जड़ यह है कि युवा पीढ़ी ने “आत्मिक कार्य भाव” खो दिया और केवल निजी लाभ को छोड़ किसी बड़े उद्देश्य से नहीं जुड़ पा रही।
सच है आजादी के आंदोलन में अपनी जान दांव पर लगा देने वाली तत्कालीन युवा पीढ़ी ही तो थी।
इस उद्देश्य हीनता से सारी पीढी स्वयं हताश है और समाज में अपराध, हिंसा और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। इसलिए “सम्मान पथ” का मंतव्य है, अपने प्रति सम्मान, दूसरों के प्रति करुणा और समाज के प्रति कर्तव्य बोध को फिर से जन जीवन केन्द्र बनाना। लेखक ऐसे नागरिक की कल्पना करता है जो अपनी निजी सफलता के साथ साथ गाँव की सफाई, नशामुक्ति अभियान, स्त्री सम्मान या शिक्षा प्रसार जैसे कार्यों में भी सक्रिय रहे। उसके लिए यही वास्तविक “आत्म सम्मान” और “राष्ट्र सम्मान” है।
साहित्य का दायित्व और पाठक की भूमिका संप्रेषित करने में उपन्यास पूर्णतः सफल हुआ है।
पुस्तक इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि सिर्फ प्रश्न उठाने से समाज नहीं बदलता। साहित्य का दायित्व है कि वह दिशा भी दिखाए और पाठक के भीतर परिवर्तन की इच्छा जगाए। इसीलिए लेखक ने लेख, संस्मरण, धार्मिक प्रसंग और लोक गीतों का मिश्रण रचती शैली में स्वयं को अभिव्यक्त किया है। लेखक चाहता है कि पाठक केवल बौद्धिक बहस न करे, बल्कि भावनात्मक रूप से जुड़कर अपने जीवन में सम्मान, प्रेम और नैतिकता को सर्वोच्च जगह दे। इस अर्थ में “सम्मान पथ” प्रेरक और मूल्य केन्द्रित कृति है, जो आज के भटके हुए सामाजिक वातावरण में मनुष्य को फिर से मनुष्य बने रहने की राह दिखाने की कोशिश करती है।
किताब हर साहित्य प्रेमी को पढ़नी और गुननी चाहिए।
स्कूल, कॉलेज, ग्राम पंचायतों, सार्वजनिक पुस्तकालयों, हेतु किताब संग्रहणीय बन पड़ी है, जो प्रत्येक पाठक के मर्म को स्पर्श कर उसमें स्व परिवर्तन के भाव जगा सकेगी। भारतीय समकालीन संदर्भों में उपन्यासकार एक सामाजिक चेतना जगाने की महत्वपूर्ण भूमिका में कलम चलाते नजर आते हैं। बधाई।
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “साथ निभाना साथी…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “रिटर्न गिफ्ट ”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४८ ☆
🌻लघुकथा🌻 🎁रिटर्न गिफ्ट 🎁
घर में परिवार छोटा हो या बड़ा। गृहणी पर घर की जिम्मेदारियों का बोझ सर्वाधिक होता है। घर में किसी का जन्मदिन हो, किसी का आना- जाना हो, शादी – ब्याह हो, दुख- सुख हो, चाहे किसी भी प्रकार का आयोजन, रसोई घर से लेकर साज- सज्जा, मंदिर से लेकर हाट- बाजार सभी में उसकी सहभागिता होती है।
और उसके बिना कुछ काम होता भी नहीं है। भोजन व्यवस्था में खाने की फरमाइश सबकी अलग-अलग, सभी के पसंद- नापसंद का ख्याल रखते गृहणी सारा दिन रसोई में।
आज ऐसा ही जन्म दिवस का उत्सव मनाया जा रहा था। घर में सुबह से हल्ला-गुल्ला, गीत – संगीत, और खुशी का माहौल। काम करते-करते वह थक चुकी थी।
वह सब का इंतजाम करते-करते जब रात्रि भोजन पर सबके साथ बैठी तो आज अनायास उसके मुँह से निकला – – – वह बोल पड़ी – मुझे ना एक बात याद आ रही है भोजन बनाते- बनाते व्यवस्था देखकर जब मैं मरूंगी तो भगवान भी मुझे फिर से रसोईया ही बनाकर भेज देंगे।
पतिदेव ने बड़े प्यार से देखा और मुस्कुराते हुए कहा– अरे तुम्हें तो कम से कम रसोईया बनाकर भेजेंगे। हम तो न जाने तैतीस करोड़ जीव- जंतुओं में कहाँ भटकेंगे, इसका कोई ठिकाना नहीं है।
तुम्हें तो गर्व होना चाहिए तुम फिर से रसोईया बनकर इस धरा पर आओगी।
क्या? यही है मेरा रिटर्न गिफ्ट गृहणी सोचने लगी। नाहक ही मैं परेशान होती हूँ। मेरे बारे में कितना अच्छा सोचा जाता है। मेरी भावनाओं के लिए, इतनी अच्छी बातें, विचार आते ही खुशी से आँखें भर आई।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १५६ ☆ देश-परदेश – गोल गप्पा ☆ श्री राकेश कुमार ☆
गोल गप्पे खाना भी एक कला हैं। हर व्यक्ति के खाने का तरीक़ा अलग अलग होता हैं। कभी गोल गप्पे के ठेले पर चटोरे लोगों को कुछ दूरी से इत्मीनान से देखिए, कसम से मुंह में पानी की बाढ़ ना आ जाय।
आज उपरोक्त समाचार को पढ़ा तो किसी जमाने में इस पर की गई रिसर्च याद आ गई। यदि आप चार लोगों से कम के ग्रुप में है, और खाने की गति धीमी है, फिर तो आप नुकसान में रहेंगे। कुछ लोग तो मुंह के अंदर बहुत दूर तक उंगलियों के सहारे गोल गप्पे को अंदर तक सुरक्षित छोड़ कर, आंनद प्राप्त करते हैं। कुछ अन्य लोग जिनका मुंह कुछ छोटा होता है वो गोल गप्पे को जिह्वा पर रख, एक उंगली से अंदर धकेल देते हैं। कुछ लोग तो टुकड़ा कर गोल गप्पे खा पाते हैं। इनके मुंह का आकार बहुत छोटा होता है, लेकिन ये लोग बड़ी बड़ी बातें खूब करते हैं। इनको देख कर ही “छोटा मुंह, बड़ी बात” जैसी किंवदंती का जन्म हुआ होगा।
गोल गप्पे की ख्याति पूरे विश्व में हो चली हैं। अमेरिका जैसे देश के सबसे बड़े ब्रांड आउटलेट “कास्को” तक ने गोल गप्पों की बिक्री आरंभ कर दी हैं। गोल गप्पे शर्त लगा कर खाए जाने की परंपरा देश में विगत कई दशकों से चल रही है।
जब हम गोल गप्पे खाते थे, तो जब भी ठेले वाले से पूछते थे, हो गए क्या ? उसका एक ही जवाब होता था, बस एक और बचा है, जिसको मीठी चटनी, बिना पानी के ग्रहण किया जाता था। पत्ते की कटोरी से, कागज की प्लेट से चाइना क्ले की प्लेट में गोल गप्पों का रस्वादन के अलावा कई बार ठेले वाले के हाथ से ही सीधा मुख में ही गप्प कर जाते थे।
व्हाट्स ऐप पर गोल गप्पों को लेकर कई भ्रांतियां फैलाई गई, लेकिन गोल गप्पों की खपत दिन दो गुनी और शाम चौगुनी बढ़ रही हैं। इसलिए ऊपर छपी खबर से डरना नहीं है। हमारे कुछ पाठक तो आलेख को मध्य में छोड़ कर गोल गप्पों के ठेले पर भाग गए है, आप क्यों नहीं गए, अभी तक?