हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # ११ – कविता – रिसते हुए रिश्ते… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “रिसते हुए रिश्ते“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # ११ ?

? कविता – रिसते हुए रिश्ते… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

भूल गए और कहते हो, ये अपनापन है

रिश्तों में ना गर्माहट ना कोई तपन है

 *

बचपन में जो सिखलाया था, वह सब भूले

अब रिश्ता बस सुविधाओं का अनुबंधन है

 *

थोथे वादे, भाषण सारे और प्रलोभन

मुफ़्त बाँटने की बातें बस आयोजन है

 *

लक्ष्य तुम्हारा क्या है, हमने जान लिया है

साध्य नहीं इंसा, आसन का बस साधन है

 *

सिक्कों में बिकते देखे  हैं हमने सपने

महज़ नफ़े ही नफे़ के सौदों में चिंतन है

 *

भीड़ में भी चेहरा तन्हा-सा, बुझा-बुझा है

मन के भीतर उम्मीदों का मरा हिरन है

 *

भरता हुआ कुलाँचे बचपन कहाँ खो गया

जीवन में ‘राजेश’, जहाँ देखो उलझन है

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १८४ ☆ गीत – ।। आपका व्यक्तित्व ही आपकी पहचान बन जाता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १८४ ☆

☆ गीत ।। आपका व्यक्तित्व ही आपकी पहचान बन जाता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

आपका व्यक्तित्व ही आपकी पहचान बन जाता है।

आपका कृतित्व ही आपका    सम्मान बन    जाता है।।

**

अच्छी संगत जरूर जीवन में अच्छा ही रंग  पाता है।

आपकी अच्छी सोच को आपका साथ-संग ही लाता है।।

आपका दृष्टिकोण आपका जीवनअभियान बन जाता है।

आपका व्यक्तित्व ही आपकी पहचान बन जाता है।।

**

आपकी जीवन की हर समस्या निदान जीवन के पास है।

मत आत्म विश्वास को खोना यही जीवन की आस है।।

आपकी कार्यशीलता ही आपका सुपरिणाम बन जाता है।

आपका व्यक्तित्व ही आपकी पहचान बन जाता है।।

**

सफल व्यक्ति कभी भी समय   अनादर नहीं करते हैं।

असफलता हाथआती जब वक्त काआदर नहीं करते हैं।।

जब उलझने बढ़ाते नहीं तो जीवन आसान बन जाता है।

आपका व्यक्तित्व ही आपकी पहचान बन जाता है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२४८ ☆ कविता – इस दुनियाँ में हरेक का अलग अलग संसार… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – इस दुनियाँ में हरेक का अलग अलग संसार। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २४८

☆ इस दुनियाँ में हरेक का अलग अलग संसार…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

चेहरा है शरीर का ऐसा अंग प्रधान

जिससे होती आई है हर जन ही पहचान।

 *

द्वेष भाव संसार में है एक सहज स्वभाव

जाता है बड़ी मुश्किल से कर ढेरों उपाय।

 *

स्वार्थ, द्वेष हैं शत्रु दो सबके प्रबल महान

जो उपजाते हृदय में लोभ और अभियान।

 *

होती प्रीति की भावना गुण-दोषों अनुसार

पक्षपात होता जहाँ दुखी वही परिवार।

 *

जिनका मन वश में सदा औ खुद पर अधिकार

उन्हें डरा सकता नहीं कभी भी यह संसार।

 *

इस दुनियाँ में हरेक का अलग अलग संसार

वैसा करता काम जन जैसा सोच विचार

 *

बहुतों को होता नहीं खुद का पूरा ज्ञान

क्योंकि उनकी बुद्धि को हर लेता अभिमान।

 *

हर एक जैसा सोचता वैसे करता काम

सहना पड़ता भी किये करमो का परिणाम।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३०० ☆ अनदेखे फलित सपने… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अनदेखे फलित सपने। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३०० ☆

☆ अनदेखे फलित सपने… ☆

‘कुछ लोग उन चीज़ों को देखते हैं; जिनका अस्तित्व है और पूछते हैं कि वे ऐसी क्यों हैं? मैं उन चीज़ों के स्वप्न देखता हूं; जो कभी नहीं थीं और कहता हूं–वे क्यों नहीं हो सकतीं?’ जार्ज बर्नार्ड शॉ का यह कथन उनकी कुशाग्र बुद्धि का परिचायक है कि संसार में जिन वस्तुओं का अस्तित्व है; उनके बारे में ज्ञान प्राप्त करना सामान्य सी बात है। वास्तव में जिनका अस्तित्व नहीं है,जो कल्पना व स्वप्न हैं; जिनका अस्तित्व कभी नहीं था; उनके बारे में भी अपनी धारणा बनानी चाहिए कि वे क्यों नहीं हो सकतीं? ऐसी कल्पना विलक्षण प्रतिभा का धनी व्यक्ति ही कर सकता है। इस कथन को सार्थक करती हैं दुष्यंत की पंक्तियां– ‘कौन कहता है/ आकाश में सुराख़ हो नहीं सकता/ एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।’ संसार में असंभव कुछ भी नहीं है। जो नहीं है,उसके बारे में चिंतन व शोध करना और उसे सबके के समक्ष प्रकट कर देना ही चमत्कार है। न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण व एडिसन का बल्ब की खोज व अन्य वैज्ञानिकों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में उन वस्तुओं के अस्तित्व व रूपाकार को स्पष्ट करना किसी अजूबे से कम नहीं है। ऐसे कार्य प्रभु-प्रदत्त प्रतिभा,दृढ़ निश्चय व अथक परिश्रम द्वारा संभव हो सकते हैं। इसमें सबसे अधिक योगदान रहता है आत्मविश्वास का; जो हमें निरंतर कर्म करने की प्रेरणा देता है तथा बीच राह से लौटने नहीं देता; न ही थककर निराशा का दामन थामने देता है।

सपने में होते हैं, शजो हम खुली आंखों से देखते हैं,क्योंकि वे हमें सोने नहीं देते और बंद आंखों से देखे गए सपनों का कोई अस्तित्व नहीं होता। अब्दुल कलाम की यह सोच मानव मन को ऊर्जस्वित करती है और वह इंसान तब तक चैन से नहीं बैठता; जब तक उसके सपने साकार नहीं हो जाते। इस संदर्भ में महात्मा बुद्ध का यह कथन अत्यंत सार्थक है कि ‘मनुष्य युद्ध में सहस्त्रों पर विजय प्राप्त कर सकता है, लेकिन जब वह  स्वयं पर विजय पा लेता है; सबसे बड़ा विजयी होता है,क्योंकि उसे आत्मावलोकन द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। जीवन में कठिनाईयाँ तो हमसाये की भांति हमारे अंग-संग रहती हैं। यदि हम उन्हें कष्टकारी मानते रहेंगे,तो वे हमें असीम पीड़ा व दु:ख पहुंचाएंगी। यदि हम उन्हें परछाई के रूप में स्वीकार लेंगे तो वे हमारा पथ- प्रशस्त करेंगी और हम आत्मविश्वास के बल पर दाना मांझी की भांति पर्वत काटकर बीस किलोमीटर लंबी सड़क अकेले ही बना पाने का साहस जुटा पाएंगे। वास्तव में चुनौतियां हमें प्रेरणा देती हैं और जब हम उन्हें जीवन का हिस्सा स्वीकार लेते हैं; वे हमारी पथ-प्रदर्शक बन निरंतर कार्य-रत रहने को प्रेरित करती हैं। सो! उनसे मुक्ति पाने का उपाय,उनकी  सहज-स्वीकार्यता ही है।

बाबा आमटे बचपन में मन के अनुकूल न होने पर नाराज़ हो जाते थे,जो उनकी माता को बहुत अखरता था। एक बार वे पतझड़ के मौसम में उन्हें बगीचे में ले गयीं और दिखाया कि वृक्ष अपने पत्तों का त्याग कर रहे हैं और उनके स्थान पर नए पत्ते आकार ग्रहण कर रहे हैं। सो! मानव को भी सुखद जीवन जीने के लिए मन के दुराग्रह व धारणाओं का त्याग करके संबंधों को नवीन ढंग से सींचना चाहिए और अपने अप्रिय अनुभवों को पुराने पत्तों की भांति त्याग देना चाहिए। आमटे पर उक्त सीख का सकारात्मक प्रभाव पड़ा और वे तुरंत अपने नाराज़ मित्र से मिलने पहुंच गए। वास्तव में यही जीवन है; सृष्टि का क्रम है। जीवन-मृत्यु का सिलसिला तो निरंतर चलता रहता है। संतोषानंद जी की यह पंक्तियां ‘जीवन का मतलब तो आना और जाना है/ परछाइयाँ रह जाती रह जातीं, रह जाती निशानी है।’ आज तक कोई भी इस रहस्य को नहीं जान पाया है कि इंसान कहाँ से आता है और कहाँ चला जाता है? धन-दौलत, महल-चौबारे व सगे-संबंधी सब यहीं धरे रह जाते हैं; केवल उसके कर्मों की गठरी ही उसके साथ जाती है। इसलिए मानव को सत्कर्म व सबसे प्रेम-पूर्वक व्यवहार करने की सीख दी गई है।

मालवीय जी के मतानुसार ‘जो मनुष्य अपनी निंदा सुन लेता है; वह सारे जगत् पर विजय प्राप्त कर लेता है अर्थात् वह सामर्थ्य केवल उसी व्यक्ति में होता है; जिसमें अहं भाव नहीं होता। टैगोर का ‘एकला चलो रे’ संदेश भी अनुकरणीय है कि ‘जो लोग बने-बनाए रास्ते पर न चलकर अपनी राह का निर्माण ख़ुद करते हैं; वे ही मील के पत्थर स्थापित करते हैं।’ टैगोर की भांति वे अपने सृजन अर्थात् कृत-कर्मों से कभी भी संतुष्ट नहीं होते। जीवन के अंतकाल में जब टैगोर बीमार पड़ गए थे तो विनोबा भावे उन्हें देखने गए और उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा की। उन्होंने पचपन हज़ार गीतों की रचना कर इतिहास रच दिया है तथा टेनिसन, शैले आदि गीतकारों को भी पीछे छोड़ दिया है। परंतु उन्होंने यह उत्तर दिया कि ‘वे संतुष्ट नहीं हैं, क्योंकि अभी वे उन गीतों का सृजन नहीं कर पाए हैं; जो वे करना चाहते थे। वास्तव में वे गीत, जो गाये नहीं गए; आज भी उनके ज़हन में हैं,अधूरे हैं।’

सृजन एक साधना है और उत्तम साहित्यकार निरंतर साधना-रत रहता है और उसके हृदय में उत्कृष्ट सृजन का भाव सदैव विद्यमान रहता है। प्रत्येक साहित्यकार एक नयी कृति के सृजन को पाठकों तक पहुंचाने के मध्य प्रसव-पीड़ा से गुज़रता है। उस स्थिति में समाज के हर व्यक्ति की पीड़ा उसकी पीड़ा बन जाती है और वह उसे आत्मसात् कर जब तक उसकी अभिव्यक्ति नहीं कर लेता; चैन से नहीं बैठ सकता। उसे उन पात्रों के दर्द को जीना पड़ता है और जब तक वह अनुभूत पीड़ा उसी रूप में पाठकों के हृदय को आंदोलित नहीं करती; उसका सृजन सार्थक नहीं होता। काव्य-शास्त्र में यह विधा साधारणीकरण कहलाती है और नाटक में त्रासदी को देखते हुए जब दर्शकों के नेत्रों से अश्रुपात होने लगता है और वे उस क़िरदार की मनोदशा में पहुंच जाते हैं,तो वह सृजन सफल माना जाता है; जिसे पाश्चात्य काव्य-शास्त्र में विरेचन की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। सोहनलाल द्विवेदी जी की ये पंक्तियां ‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती/ लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती’ अर्थात् जो लहरों से डरकर किनारे पर बैठे रहते हैं; उनकी नौका कभी भी पार नहीं उतर सकती। सो! मानव को निरंतर प्रयासरत चाहिए।

किंग ब्रूसली ने एक मकड़ी को अपने जाले से बार-बार गिरते व चढ़ते देख उससे प्रेरणा प्राप्त की और पुन; युद्ध करने पर उन्हें विजय प्राप्त हुई। सो! जीवन में निरंतर संघर्ष-रत रहना चाहिए; कभी पराजय को स्वीकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि ‘मन के हारे हार है,मन के जीते जीत।’ वैसे भी जो हम सोचते हैं और जैसा हमारा नज़रिया होता है; वही घटित हो जाता है। इसलिए कहा जाता है कि नज़रें बदलने से नज़ारे बदल जाएंगे और नज़रिया बदलने से ज़िंदगी बदल जाएगी; जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण बदल जाएगा। अंत में स्वरचित पंक्तियों के माध्यम से मैं यह कहना चाहूंगी कि ‘मौसम भी बदलते हैं/ दिन रात बदलते हैं/ यह समां बदलता है/ जज़्बात बदलते हैं/ यादों से महज़ मिलता नहीं/ दिल को सुक़ून/ ग़र साथ हो सुरों का/ नग़मात बदलते हैं’ अर्थात् समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं,परंतु सृष्टि का क्रम अनवरत चलता रहता है। इसलिए ‘दु:खों से मत घबरा मानव/ यह समां भी गुज़र जाएगा।’ रात्रि के पश्चात् स्वर्णिम भोर नयी आशा व नवीन स्वप्न लेकर दस्तक देती है और हमें ऊर्जस्वित करती है। इसलिए आशा का दामन थाम रखिए; जीवन में अप्रत्याशित करिश्में हो जाएंगे; जिसकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ संजय दृष्टि – कौन रोया रात भर? — कवयित्री – डॉ. ज्योति कृष्ण ☆ समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। आज से प्रत्येक शुक्रवार हम आपके लिए श्री संजय भारद्वाज जी द्वारा उनकी चुनिंदा पुस्तकों पर समीक्षा प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

? संजय दृष्टि –  समीक्षा का शुक्रवार # 26 ?

?कौन रोया रात भर? — कवयित्री – डॉ. ज्योति कृष्ण ?  समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज ?

पुस्तक का नाम : कौन रोया रात भर?

विधा : कविता

कवयित्री : डॉ. ज्योति कृष्ण

प्रकाशन : क्षितिज प्रकाशन, पुणे

 

? अनुभव में पगी नवोदित रचनाएँ  श्री संजय भारद्वाज ?

‘कौन रोया रात भर’ कवयित्री डॉ. ज्योति कृष्ण का प्रकाशित होनेवाला दूसरा संग्रह है। चूँकि उनका पहला और दूसरा कविता संग्रह एकसाथ ही प्रकाशित हुए हैं, अत: एक अर्थ में वे नवोदित हैं। दूसरा पहलू यह कि वे दीर्घकाल से लेखन कर रही हैं, अत: उनकी रचनाओं में जीवन का अनुभव उतरा है। फिर वे मनोविज्ञान की विद्यार्थी रही हैं, फलत: मनोभावों को बेहतर अनुभव करना और अनुभूति को कविता के माध्यम से अभिव्यक्ति देना, इस कविता संग्रह में प्रखरता से दृष्टिगोचर होता है।

अनुभव जब शब्दों में उतरता है तो कुछ इस तरह अभिव्यक्त होता है-

वक़्त अपने साथ भी बिता लीजिए,

फ़ुर्सत मिले तो कुछ गुनगुना लीजिए।

अनुभव की एक और बानगी देखिए-

पार उतरने वालों ने मूल्य नहीं दिया,

अब स्वयं दे रहा नदी पर पहरा पानी है।

आयु के साथ चेहरे पर झुर्रियों का आना प्राकृतिक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में अनुभव से उपजे दर्शन के दर्शन कुछ यूँ होते हैं-

दुखी मत होना ख़ुुद को आईने में देखकर,

सारे सिलवटें तब्दील हो जाएँगी राख में।

सिलवटों का राख होना जीवन की नश्वरता का प्रतीक हो सकता है। साथ ही यह आशावाद का उदाहरण भी हो सकता है। कारण स्पष्ट है कि विसर्जन के बाद ही सृजन होगा।

अनुभवी जानता है कि समय अपना लेखा-जोखा यहीं पूरा कर लेता है। कविता में कुछ इस तरह उतरा है यह लेखा-जोखा-

किसने क्या किया और क्यों किया,

सबसे सवाल-जवाब कर लेगा।

हमें ज़रूरत नहीं है जोड़ने-घटाने की,

व़क्त  सारा हिसाब कर लेगा।

शिक्षित होने का अर्थ केवल साक्षर होना नहीं होता। नेह, अपनत्व न हो तो निरा अक्षर ज्ञान किसी काम का नहीं।

शिक्षित होने का इतना प्रमाण काफ़ी है मुझे,

मेरे मानस पर तुम्हारा स्नेह का हस्ताक्षर हो।

दाम्पत्य का प्राणतत्व है प्रेम। इसमें अनुकूलता, प्रतिकूलता, सहमति, असहमति सबका इंद्रधनुष अंतर्निहित होता है । इस इंद्रधनुष के अनेक रंगों को अपनी लेखनी की स्याही में भरकर कवयित्री कुछ चित्र उकेरती हैं-

1)

अपने मज़बूत इरादों से तुम हामी भरवा ही लेते हो,

लेकिन अब इच्छा है मेरी आनाकानी तुम तक पहुँचे।

2)

सोचा था कि कुछ पढ़ूँगी देर रात तक जाग कर,

और उनकी ख़्वाहिश थी कि बंद करके किताब रख दूँ।

सामान्यतः दो ध्रुवों का आत्मीय समन्वय होता है दाम्पत्य। यही दाम्पत्य का आकर्षण है और सहधर्मिता का सौंदर्य भी। इसकी यह बानगी देखिए-

बंधन होता है अगर सात जन्मों का, तेरे मेरे साथ का ये पहला जनम है।

जब तक साथ है, हाथों में ये हाथ है, हाथ ये छुड़ा ले नहीं किसी में भी दम है।

शब्दों का अपना सामर्थ्य है, अपने अर्थ हैं, अपनी अभिव्यक्ति है, तथापि मौन की मुखरता का आयाम  विस्तृत होता है।

अंतर्मन के द्वंद्व को, समझ सका है कौन।

वाणी जब सकुचा गई, मुखर हो गया मौन॥

फिर स्त्री का मानिनी रूप अपनी ख़ामोशी को मनवाना भी चाहता है।

जिन्हें फ़र्क पड़ता हो मेरी ख़ामोशियों से,

मना लेें वे मुझे आकर, रूठे हुए हैं हम।

प्रेम की विशेषता है रूठना, मनाना, एक दूसरे की भावना को समझना और उसे मान देना। राधा रानी रूठती थीं तो कृष्ण मनाते थे। सिक्के का दूसरा पहलू है कि कृष्ण मनाते थे तो राधा रानी रूठती थीं।

हम इक्कीसवीं सदी का नागरिक होने का कितना ही ढोल पीट लेें पर घर-परिवार, समाज में स्त्री को उसका समुचित स्थान और सम्मान देने में हमारा हाथ तंग ही रहा है। इस विसंगति की अभिव्यक्ति कवयित्री के शब्दों में कुछ इस तरह से स्थान पाती है-

परिवार को अपनी ममता और स्नेह से बाँध रखा,

रिश्तों की इस गर्माहट के प्रति रही है सर्द दुनिया।

सामूहिक थे तो परिवार थे, एकल हुई तो ‘फैमिली’ हो गए। समूह से एकल होने की यात्रा ने विश्व के किसी भी अन्य समुदाय की अपेक्षा भारतीय समाज को अधिक प्रभावित किया है। ऐसे में सामूहिकता का आनंद और सुरक्षा चक्र देख चुकी कवयित्री का युवाओं को स्पष्ट संदेश है-

घोसलों में अपने लौट कर परिंदे भी आते हैं,

भूल मत कभी करना, घर अलग बसाने की।

एकल होना यानी जड़ों से कटना, अपनों से कटना। जो अपनों का ना हो सका, उसका किसी अन्य से जुड़ सकने का विचार ही अतार्किक है। 

दूसरों में क्या जुड़ेंगे, जुड़ न पाए अपनों से जो,

बढ़ रहा है सामर्थ्य लेकिन भावनाएँ घट रही हैं।

एकल से एकाकी होता है मनुष्य। फिर इच्छा जागती है कि कोई जाने, पूछे उसके दुख को। इस पीड़ा की यह अभिव्यक्ति देखिए,

हमें भी ख़्वाहिश है कि मन के बोझ को हल्का करें,

पूछोगे तो बता देंगे कि क्यों इतने उदास हैं।

स्त्री को दो घरों की ज्योति यूँ ही नहीं कहा जाता है। डॉ ज्योति कृष्ण का मायका बिहार है जबकि उनकी ससुराल उत्तर प्रदेश है। दोनों राज्यों के भौगोलिक और सांस्कृतिक दर्शन पर उनकी कविताएँ इस संग्रह में हैं। यह सम्बंधों के लिए उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है तो मायके और ससुराल के प्रति उनके ममत्व को भी अभिव्यक्त करता है।

इस संग्रह में प्रकृति की सुंदरता, उसकी अठखेलियोेंं का वर्णन है। कहीं वसंत का ख़ुमार शब्द पाता है, कहीं वर्षा की बयार की सौंध से कहन महक उठती है। कहीं काम की तलाश में गाँव से शहर की ओर होते पलायन का चित्रण है तो कहीं पर्यावरण पर चिंता शब्दों में ढलती है। इस संग्रह में माँ से सम्बंधित कविता है, पिता पर आधारित कविता है, अपने मकान से मध्यम वर्ग के जुड़ाव को दर्शाया गया है। संग्रह में मनुष्य की वाणी के महत्व पर रचना है तो देशभक्ति की वीणा की झंकार भी है।

पेड़-पौधों लता-गुल्मों से पर्यावरण हरा रहे,

विनाश से बची रहे, दीर्घायु धरा रहे।

सामूहिक हो या एकल, रिश्तो में वह प्रगाढ़ता नहीं रही जिसके चलते रिश्तों को रिश्ता कहा जाता था। सांप्रतिक स्थिति का यह सटीक बिम्बात्मक वर्णन देखिए-

रिश्तों की रौनकें आबाद अगर रहतीं,

घरों में मकड़ियों के जाले नहीं होते।

कहा जाता है, ’बेसिक्स नेवर चेंज।’ कितनी ही प्रौद्योगिक उन्नति हो जाए, सुख, सुविधा के साधन आ जाएँ, मूलभूत कभी नहीं बदलता। इसकी यह बानगी देखिए-

ज़िंदगी एक मोड़ पर थक कर बैठ जाती है,

अगर चलते रहना है तो पाँव से रिश्ता रखना।

‘य: क्रियावान स पंडित:।’ बिना उद्यम, बिना श्रम के कभी कोई परिणाम नहीं मिलता।

सोचा बहुत कुछ, किया कुछ नहीं,

तभी हाथ मेरे, लगा कुछ नहीं॥

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। हमारा संविधान हमारा मार्गदर्शक है। कवयित्री को संविधान की प्रस्तावना मानो कंठस्थ है। इस संदर्भ में वे कहती हैं-

संविधान की हर पंक्ति सर आँखों पर,

प्रस्तावना के शब्द ज़बानी याद रहेें।

सृजन मनुष्य को विचार देता है। विचार मेेंं मनुष्य को चमत्कृत करने की क्षमता छिपी होती है। उसके चिंतन और मनन का कैनवास बड़ा हो जाता है। इस संदर्भ में शब्दों का यह चमत्कार देखिए-

जाने कौन चुपके से, ख़्वाब अपने रखकर गया,

चौकसी करनी पड़ेगी अब हमें सिरहाने की।

डॉ. ज्योति कृष्ण की कविता यात्रा जीवन के सारे खट्टे- मीठे अनुभवों को जोड़कर चलती है।  उनकी रचनाएँ स्वयं को जलाकर रोशनी करने की मानिंद हैं।

एक छंद मिला उस पार नदी के,

एक पर्वत के पार मिला।

पुष्प-पराग से अक्षर निकले,

शब्दों को शृंगार मिला॥

*

भाव मिले सागर के अंदर,

भाषा स्वर्ण खदानों से।

सब जोड़ा तब जाकर कवि के,

अंतस को उद्गार मिला॥

प्रस्तुत पुस्तक का मुखपृष्ठ प्रसिद्ध चित्रकार संदीप राशिनकर ने बनाया है। यह चित्र शीर्षक को बहुआयामी बनाता है।

जीवन के उत्तरार्द्ध में प्रकाशित हुए कवयित्री के अंतस के उद्गारों के इस संग्रह के लिए कहा जा सकता है कि ‘देर आयद, दुरुस्त आयद।’ कामना है कि उनका यह संग्रह उन्हें साहित्य के क्षेत्र में समुचित प्रतिष्ठापना दे।

© संजय भारद्वाज  

नाटककार-निर्देशक

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #७२ – नवगीत – विश्वासों की होरी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतविश्वासों की होरी

? रचना संसार # ७२ – गीत – विश्वासों की होरी…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

बुझी नहीं अब तक दुनिया में,

जलते विश्वासों की होरी।

मिला प्रीति में देख छलावा,

रोती जीवन भर ये गोरी ।।

*

खंडित युगों-युगों से होती,

विश्वासों की नैया देखो।

खेवनहार डुबोते इसको,

बीच भँवर में भैया देखो।।

मिलता इसको कहाँ किनारा,

लिपटी घातों की है डोरी।

*

बुझी नहीं अब तक दुनिया में,

जलते विश्वासों की होरी।।

**

स्वार्थ भरा नाते-रिश्तों मे,

मानवता भी घायल होती।

बाजारों में छम-छम बजती

पायल की रुन-झुन भी रोती।।

डसने को अजगर बैठे हैं,

नित्य करे वे जोरा -जोरी।

*

बुझी नहीं अब तक दुनिया में,

जलते विश्वासों की होरी।।

**

दौलत में अंधा हर कोई,

छुरी पीठ पर नित चलती है।

धर्म-कर्म सब भूले बैठे,

मानवता हरपल छलती है।।

बुझी नेह की ज्योति जगत् में,

भूले बचपन की भी लोरी।

*

बुझी नहीं अब तक दुनिया में,

जलते विश्वासों की होरी।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३०१ ☆ भावना के दोहे – प्यार ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – प्यार )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३०१ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – प्यार ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

नेह छिपा दिल में रहा, नहीं बताया यार।

नयनों से बस देखते, बसता उरमें प्यार।।

*

देखा हमने ख्वाब तो, तुम तो मेहरबान।

फिसल गया वो हाथ से, रूठ गए अरमान।।

*

देख रहे है हम उन्हें, नहीं सँभलते आज।

प्यार नहीं उनको मिला, पिछड़ा हुआ समाज।।

*

दाग लगा है प्यार का, दामन बिल्कुल साफ।

बढ़ती फिर भी मुश्किलें, करें नहीं वो माफ।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२८२ ☆ बुन्देली पूर्णिका – राधा कृष्ण पर दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके दोहे – राधा कृष्ण पर दोहे आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८२ ☆

☆ राधा कृष्ण पर दोहे☆ श्री संतोष नेमा ☆

प्रेम दवा है रोग भी, प्रेम राधिका नाम |

मोहन राधे में रमे, राधा  मन घनश्याम ||

*

हरि जिसके हैं सारथी, उसके ही मन मीत |

हर मुश्किल में सर्वदा, होती उसकी जीत ||

*

जय राधे वृषभानुजा, कृष्ण चरण सुखधाम |

लेकर अपनी शरण में, करें सफल सब काम ||

*

जय मोहन मुरली धरा, मोहक मौलिक रूप |

मधुसूदना मनोहरा, माधव मदन अनूप ||

*

मोहन मुरली बज उठी, झुकी कदम की डाल |

राधा रम कर रास में, होतींं खूब निहाल ||

*

राधा जोगन प्रेम की, खोजे नवल किशोर |

नैन बसाये सांवरे, थामे प्रेमहिं डोर ||

*

वंशीवट की छाँव तले, सुन मुरली की तान |

राधा डूबी श्याम में, नित नित सुन नव गान ||

*

गलियाँ गोकुल की लगें, मुरलीधर का धाम |

अंत समय आता कहाँ, मुख से कृष्णा नाम ||

*

बृज की रज चंदन लगे, पावन यमुना धार |

कुंज गली अति पावनी, बृज का अनुपम प्यार ||

*

राधा प्रेम में बावरी, कृष्ण चरण अनुराग |

छलिया से जब मन लगा, बढ़ी प्रेम की आग ||

*

राधे राधे बोलिये, सुनते कृष्ण पुकार |

राधे कृष्णा नाम ही, साँचा प्रेमाधार ||

*

रंग बदलता ये जहाँ, देखा जग व्यवहार |

टूटे दिल को भा गया, कृष्णा तेरा प्यार ||

*

राधे राधे बोलिए, पावन राधा नाम |

नाम जाप से आ मिलें, मनमोहन घनश्याम ||

*

अहसासों का नाम ही, होता सच्चा प्यार |

दर्द किसी का झेल कर, दूजा सहता भार ||

*

चढ़े रंग जब प्रेम का, रंग न दूजा भाय |

इंद्रधनुष के रंग भी, फीके तब  पड़ जाय ||

*

रंग चढ़े जब प्यार का, चढ़े न दूजो रंग |

सबसे गहरा रंग यह, भीगे हर इक अंग ||

*

राधे राधे कह उठा, चरण शरण “संतोष” |

कृष्ण भक्ति देकर सदा, हरिये मेरे दोष ||

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २ – कविता – मेरा हौसला… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता मेरा हौसला।)

? कविता – मेरा हौसला…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

पंख मिले, हौसला मिला,

अभी उड़ान बाकी है, ,

आसमां तो छू लिया,

चांद आगोश, लेना बाकी है,

डोर विश्वास की थाम ली मैंने,

अभी अंकुश हटाना बाकी है,

पंख तो फैला ही लिए हैं,

इतिहास रचना बाकी है,

दिए की बेखौफ लहराती लौ,

तूफानों से बचाना बाकी है,

सपने तो सुहाने सज गए,

सपनों में रंग भरना बाकी है,

इस सुहाने सफर में,

तेरा हमसफ़र बनना बाकी है,

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २७२ – आनंद पर्वणी…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २७२ – विजय साहित्य ?

☆ आनंद पर्वणी…!

विषय – चुलीवरचे जेवण

[वृत्त अनलज्वाला. – ८ ८ ८ – २४ मात्रा. (२४ ओळी.)]

शिजे चुलीवर ,रुचकर भोजन

धगधगणारे

स्वाद आगळा निसर्ग निर्मित,‌

रसरसणारे.१

 

सुकी लाकडे, शेण गोवऱ्या सालपटांनी

चुलीत शिजती,पदार्थ सारे, रटरटणारे.२

 

वायन देई, चुलीस जागा, दिसे निखारा

पचना हलके ,पदार्थ बनवी,  चमचमणारे.३

 

पारंपारिक, रित तयाची, चव जीभेवर

पोषक आणिक,पौष्टिक व्यंजन, लखलखणारे.४

 

भूक भागवी, जाळत काया,  कळते आई

व्यंजनास त्या, सहजी बनवी ,

खळखळणारे.५

 

आग आतली, जिला समजली,

रांधे माया

शेणसारवण, विस्तव हाती, घमघमणारे.६

 

ताजी भाकर,वरण आमटी, भाजी रुचकर

चुली सारखे,भोजन नाही, दरवळणारे.७

 

पाटा भानस, अंग चुलीचे, करते माया

पाककलेचे, तिच्या दाखले,

सळसळणारे.८

 

चुली सारखे,नाही कोणी, जीवनदायी

पोटी विस्तव,देई भोजन,

शांतवणारे.९

 

थाट वेगळा, घाट आगळा, या विश्वाचा

इथे माणसा, जीवन कळते,  तळमळणारे.१०

 

ओढ लावते, घराघराला,

जळता जळता

सतत चुलीवर, शिजते काही, लुभावणारे.११

 

स्नेह भोजना, एक पर्वणी, 

आनंदाची

कधी चुलीचे,जेवण जेवा,

सुखावणारे.१२

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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