हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # १८९ ☆ “व्यंग्य : कल आज और कल” – ☆ आत्मकथ्य – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है आपके द्वारा लिखित  “व्यंग्य : कल आज और कल…” पर आपका आत्मकथ्य।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १८९ ☆

☆ “व्यंग्य : कल आज और कल” – ☆ आत्मकथ्य – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – “व्यंग्य : कल आज और कल”

लेखक – विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

पृष्ठ संख्या – १६६

प्रकाशक – न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन दिल्ली 

मूल्य – २२४ रु 

☆ एक दार्शनिक एवं सांस्कृतिक अन्वेषण – – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

व्यंग्य विधा के समय के साथ बदलते स्वरूप, चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं पर प्रकाश डालती यह नई किताब है। ‘व्यंग्य आलोचना के वर्गीकरण बिंदुय् लेख व्यंग्य के मूल्यांकन के लिए आवश्यक सैद्धांतिक ढांचे और मानदंडों की पड़ताल करती है, यह समझने का प्रयास है कि व्यंग्य की आलोचनात्मक समझ कैसे विकसित हो सकती है। पुस्तक व्यंग्य की अभिव्यक्ति की विविधता को भी रेखांकित करती है। काव्य रचनाओं में हास्य, व्यंग्यऔर हिंदी नाटकों में व्यंग्य जैसे लेख स्पष्ट करते हैं कि कैसे कविता की सघनता और नाटक की नाटकीयता में भी व्यंग्य अपनी पैनी धार बनाए रखता है। नुक्कड़ नाटकों में प्रायः व्यंग्य ही वह रोचक अस्त्र होता है जो दर्शकों को बांधे रखता है। इसी तरह लघुकथा में जो चमत्कृत करता अंत किये जाने की परंपरा दृष्टव्य है उसमें भी व्यंग्य का सहारा लघुकथा को आकर्षक बनाता है। ‘व्यंग्य के विविध आयाम’ लेख विधा की बहुरूपता को और विस्तार से व्याख्यायित करता है।

166 पृष्ठ की पुस्तक में व्यंग्य विषयक 22 अध्याय हैं। समकालीन महिला व्यंग्यकारों की चर्चा पर एक अध्याय है। परसाई, त्यागी, जोशी जी पर स्वतंत्र आलेख हैं तो समकालीन व्यंग्यकारों से चर्चा भी शामिल है। किताब का मूल्य 224 रु में अमेजन पर सुलभ है। पुस्तक न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन दिल्ली से अच्छे कागज पर साफ तरीके से पेपर बैक आवरण में प्रकाशित है। व्यंग्य संदर्भ है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # १९३ – कलयुगी – रावण ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “कलयुगी – रावण”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # १९३ – कलयुगी – रावण ☆

☆

गाँव की एक

भोली-भाली

युवती के मन में ,

विजया – दशमी

मनाने की चाह उमड़ी।

रात में वह अपने घर से,

दशहरा मैदान को

अकेले ही निकली ।

रास्ते में ही उसे

कुछ सदेह रावण मिल गए ।

जो सतयुगी रावण से

बहुत भारी पड़ गये ।

रावण को जलते हुये

देखने की चाह में

आज वह स्वयं ही

जिंदा जल रही थी ।

और एक नहीं ,

दस कलयुगी रावणों से

बुरी तरह घिर गयी थी ।

सदियों से चले आ रहे

इस पर्व के औचित्य पर

आज वह प्रश्न चिन्ह

लगा रही थी ।

और इस आधुनिक समाज से

न्याय की गुहार लगा रही थी ।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४३ – आलेख – महाआरती ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय आलेख “महाआरती ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४३ ☆

🌻आलेख🌻 🪔महाआरती 🪔

समय के साथ सब बदल जाता है। नही बदलता तो सिर्फ बड़े – छोटे, अमीरी – गरीबी, छल-छलावा, ऊँच- नीच, जात – पात।

मान सम्मान तो पलक झपकते ही बदल जाते हैं। ऊँचे भव्य पंडाल में महाआरती का आयोजन।

यदि कोई समान्य आमजन का पंडाल बना जिसमें मध्यमवर्गीय परिवार है। वो महाआरती के विशेष आयोजन को करने अपने से बड़ों को बुलाते हैं, परन्तु वही महाआरती जब कुछ उच्च वर्ग और अमीर पंडाल है तो  मध्यमवर्गीय को आरती दूर से देखने को मिलता है, परन्तु उतारा करके ग्रह दोष शांत कर भंडारा खिलाते उन्हें गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार को पंक्तियां बनवा देते हैं। और सभी लाईन लगकर भंडारा लेते भी है क्योंकि उन्हें वह बड़े आदमियों का प्रसाद वितरण लगता है।

माँ के आँचल में क्या अमीर क्या गरीब? पर हाय रे माया जीवन को सार्थक बनाने के लिए महाआरती करने के लिए पैसा और हैसियत दोनों का होना कितना जरुरी है।

जगजननी आज भी मोहनी रुप धारण करने का समय आ गया है। जहाँ पर पाप, बड़े अमीर, हैसियत, और बड़े रुदबे रुपी दानव से बचाकर संस्कार, सादगी, सहजता भावों को अमर करना होगा।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १४९ – देश-परदेश – छाता बनवा लो ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १४९ ☆ देश-परदेश – छाता बनवा लो ☆ श्री राकेश कुमार ☆

नब्बे के दशक तक ” छाता बनवा लो” जैसे शब्द कान में सुनाई दिया करते थे। अब तो ये शब्द सुने हुए एक लंबा अंतराल हो चुका हैं। पहले पैदल चलते हुए कांधे पर बड़े से झोले में अपनी पूरी दुकान को समेट कर द्वार द्वार से कारीगर अपनी सेवाएं देते थे।

आश्चर्य तो तब होता था, भरी बरसात में ये लोग स्वयं छाता वहन नहीं कर पाते थे। हमारे यहां गरीबी का ये अलाम है, दूध विक्रेता स्वयं दूध नहीं पी पाता हैं।

बाद के वर्षों में ये छाता सुधारक पुरानी साइकिल से गली कूचे पहुंच कर सेवा देने लगे थे। समय ने करवट ली, लोगों का रहन सहन, सुविधा जनक हुआ, लोग छत वाली कार में घूमने लगें। छाते का उपयोग ही कम हो गया, बाइक और स्कूटर वाले भी छाते का उपयोग कर पाने में असहज हैं। गरीब लोग तो प्रिपोपलाइन के पुराने बोरे से वर्षा ऋतु में काम चला लेते हैं।

हमने तो बचपन से लेकर आजतक भी काले रंग का जेब्रा ब्रांड का छाता ही उपयोग किया हैं। दुनिया तो अब रंगीन छातों की हो चुकी हैं। हमारे पिताश्री वर्षा ऋतु की समाप्ति पर छाते को धूप में अच्छे से सुखाकर और उसके अंदर लगी हुई धातु की डांडियों पर तेल लगाने के बाद ही रखते थे, ताकि उस में जंग आदि ना लगे। अब तो हर वर्ष नया खरीदने का रिवाज़ बन चुका हैं।

मुम्बई जैसे शहर जहां वर्षा तो अधिक होती ही है, लोग पैदल भी खूब चलते है, छाते अभी भी अपनी उपयोगिता प्रमाणित करते हैं। वहां इसकी मरम्मत का कार्य अधिकतर मोची ही कर लेते हैं।

चीन देश से सस्ते और घटिया छातों ने इन कारीगरों की रोजी रोटी छीन ली हैं। “उपयोग और फेंको ” पद्धति ने कुटीर उद्योगों की रीढ़ की हड्डी तो तोड़ी ही है, साथ ही साथ रिपेयर जैसे छोटे काम करने वाली क़ौम का प्रायः खात्मा ही कर दिया हैं।

ये कारीगर भी सीजनल कार्य की कर पाते थे। जून के अंत से सितंबर माह की समाप्ति तक ही इनकी आवश्यकता रहती हैं। अब सितंबर माह भी समाप्त हो रहा है, हम भी अपनी लेखनी को विराम देते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३०२ ☆ पाळ तोच वारसा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३०२ ?

☆ पाळ तोच वारसा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

☆

मोहजाळ भोवताल पोसलेस माणसा

सर्व राहते इथे नको करूस लालसा

*

रूप देखणे तरी अशांत चंद्र वाटतो

टाळतोय नेत्र धूर्त पाहतोय आरसा

*

मोह टाळ चादरीत मागतोस काय तू

ओंजळीत दान घे पुरेल एवढा पसा

*

वादळात का तुला असे उदास वाटते

दाखवून दे जगास तू कुठे असा तसा

*

दान धर्म पुण्य कर्म सागतात धर्म हे

त्यातलाच पंथ एक थोर होय खालसा

*

माणसास या इथे गुलाम तू करू नको

नेक काम कर असेच पाळ तोच वारसा

*

ठेच लागली म्हणून थांबणे नको इथे

वागणे असेच ठेव वाहतो झरा जसा

☆

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ माझी जडणघडण… वेगळ्या वाटा – भाग – ५९ ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

सौ राधिका भांडारकर

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☆ माझी जडणघडण… वेगळ्या वाटा – भाग – ५९ ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

(सौजन्य : न्यूज स्टोरी टुडे, संपर्क : ९८६९४८४८००)

वेगळ्या वाटा

देना बँकेत रुजू होण्याच्या काही दिवस आधी मी विलासला म्हटलं, ” सुरुवातीचे तरी काही दिवस आईंना आपण बोलवूया का? ”

विलास ने थोडा विचार केला. नंतर म्हणाला, ” हरकत नाही. आई येईलही. पण मला काय वाटतं आपण अशी सवय नको लावायला. आपले प्रश्न आपणच सोडवावेत. आपल्या समस्यांचं ओझं कुणाच्या डोक्यावर टाकून असं निवांत राहणं योग्य होईल का? ”

विलासचं हे म्हणणं मलाही पटलं होतं. क्षणभरच माझ्या मनात विचार आला होता की, ” आई येतीलच अशी याला खात्री वाटत नसेल का आणि खरोखरच आईंना, कारण कुठलंही असो पण नाहीच जमलं यायला तर स्वाभाविकपणे आपल्यालाही थोडी नाराजी वाटूच शकली असती. ” पण नंतर मलाही वाटलं आईंना तरी या ‘हो’ ‘नाही’ च्या पेचात आपण कशाला टाकायचं? आणि खरोखरच शेतीचा पसारा, कुटुंबाचा व्याप, सगळ्यांचं ‘हवं नको’ बघण्यातून त्या तरी अजून कुठे निवृत्त झाल्या आहेत? अशा परिस्थितीत आपण आपल्या सोयीसाठी विनाकारणच त्यांच्यावर हा मानसिक आणि नैतिक भार का म्हणून टाकायचा? विलास म्हणतो तेच बरोबर आहे.

दरम्यान मला दिवसभराची एक चांगली मदतनीस मिळाली. ‘विमल’ तिचे नाव. आमच्या घरासमोरच पोलीस कॉलनी होती. विमलचे वडील पोलीस होते आणि ते त्या वसाहतीत राहत होते. विमल सातवी आठवी पर्यंत शिकलेली होती पण नंतर तिने शाळा सोडली होती. तिची आईच तिला माझ्याकडे काम मिळावं म्हणून घेऊन आली होती आणि विमलचीही काम करण्याची इच्छा होती. प्रथमदर्शनीच मला ‘विमल’ शांत, समंजस आणि कामसू वाटली. मी तिला मदतीसाठी योग्य तो पगार देऊन ठेवून घेतली. तिला बजावून सांगितले, ” आम्ही दोघेही घरात नसताना ज्योतिकाला व्यवस्थित सांभाळण्याचं महत्त्वाचं काम तुझं” ज्योतिकाच्या खाण्यापिण्याच्या, झोपेच्या वेळांचं एक पत्रकच मी तिला लिहून दिलं होतं ज्योतिकासाठी भरपूर खेळणी आणली होती. कोणते खेळ तिच्याबरोबर कसे खेळायचे हे विमलला मी शिकवले. एकंदरच विमलला व्यवस्थित प्रशिक्षण दिल्यानंतरच मी बँकेत रुजू व्हायचं ठरवलं. शिवाय कॉलनीतल्या पांडे मावशी, पूनम मानुधने, अलका राणे(आम्ही एकाच शाळेतल्या विद्यार्थिनी. जग किती लहान असतं! ), सुचूची आई, क्षमा वाठ या सगळ्यांचा मनापासून आधार होता. विलासचंही ऑफिस घरापासून फार दूर नव्हतं. तो त्याच्या साईट व्हिजिट्स, गावातल्या, गावा बाहेरच्या, नव्या क्लाएंटच्या मीटिंग्ज वगैरे सांभाळून ज्योतिकासाठी, मी ऑफिसात असताना काही तासांसाठी तरी घरी येऊ शकत होता. त्याचा स्वतंत्र व्यवसाय असल्यामुळे त्याला “दहा ते पाच’ असं वेळेचं बंधन नव्हतं बऱ्याच वेळा मी घरी आल्यानंतर तो संध्याकाळ नंतर उशिरापर्यंत त्याच्या ऑफिसमध्ये काम करू शकत होता. शिवाय कामाव्यतिरिक्त उगीचच सोशल सर्कलमध्ये रमणारा तो नव्हता. तो कुटुंबवत्सल आणि घराची अत्यंत ओढ असणारा होता. थोडक्यात काहीशा चौकटीबाहेरच्या आमच्या जीवनाचा आराखडा संगनमताने, सहकार्याने नीट साधला गेला होता.

“देना बँक, स्टेशन रोड, नवी पेठ ब्रांच. ” सकाळचे पावणे अकरा वाजले होते. अकरा वाजता ग्राहकांसाठी शाखेचे काम सुरू होत असे. ११ ते ३ ग्राहक सेवा आणि तीन नंतर पाच साडेपाच पर्यंत दिवसभरच्या ट्रांजॅक्शनचा ताळमेळ जमवणे वगैरे इतर कामे..

बँकेत पहिलं पाऊल टाकल्याबरोबरच माझ्या एक लक्षात आलं की मुंबईच्या फोर्ट ब्रांच मधलं कॉस्मॉपोलीटन वातावरण आणि इथलं स्थानिक लोकांमधलं वातावरण यात खूप तफावत आहे. मी बिचकलेली, भांबवलेली, शिवाय घरातून निघताना विमलच्या कडेवर असलेल्या ज्योतिकाला “बाय” करून निघताना झालेली घालमेल घेऊनच बँकेत आले होते. पर्समधून माझं नेमणूक पत्र काढलं. कुणाकडे जावं तेच कळतच नव्हतं पण केबिनमध्ये बसलेल्या शाखाप्रमुखांनीच बाहेर येऊन “या या मॅडम, आत या” असे अगदी आदरपूर्वक म्हटले. एस. व्ही शहा त्यांचे नाव. उंच, गोरे, चेहऱ्यावर समंजस भाव, गोड खालच्या सूरात बोलणं आणि एकंदरच त्यांच्याकडे पाहिल्यावर हे शाखाप्रमुख आहेत असे न वाटणारे, अत्यंत साधं सर्वसाधारण कर्मचाऱ्यांसारखं त्यांचं वागणं होतं. पदाचा रुबाब, दरारा शून्य. मला हा माणूस आवडला. थोडंसं ओझं उतरल्यासारखं वाटलं. मी केबिनमध्ये त्यांच्यासमोर बसले. शहा सरांनी एक दोघांना आत बोलावून घेतले. त्यातले एक होते देशपांडे. (जे युनियन लीडर होते. हे नंतर मला कळले) आणि दुसरे “किशोरभाई शहा’ एक सीनियर किंवा जबाबदार स्टाफ मेंबर. (देना बँकेत शहांची कमी नव्हती. बहुतेक “केम छो” वाले.) असो! माझी त्यांच्याशी ओळख करून दिली. ” या भांडारकर मॅडम. मुंबईच्या आहेत बरं का! आज पासून आपल्याबरोबर असणार आहेत. त्यांना कामाचा अनुभव आहेच पण तरी त्यांचं डिपार्टमेंट आणि काम याबद्दल थोडं मार्गदर्शन तुम्ही करावे. ”

मला कुठल्याही डिपार्टमेंट विषयी काहीच अडचण नव्हती पण ज्यांच्या बरोबर आता मला काम करायचे होते त्यांचे आणि माझे सूर कितपत जुळतील याविषयी मी थोडी साशंक होते. कारण ही स्थानिक माणसे होती. त्यांची संस्कृती, विचार, जीवन पद्धती, त्यांचं खानदेशी बाजातलं मराठी किंवा गुजराथी बोलणं ही सगळी दुरावा निर्माण करणारी लांबलचक अंतरं होती. प्रत्येकाच्या नजरेत मला जाणवत होतं, ” मुंबईहून आलेली एक शिष्ट, स्वतःला काहीतरी समजणारी एक व्यक्ती, एक बलाच. जाऊ दे म्हणा आपल्याला काय करायचे आहे? ”

त्यांच्या नजरेतले हे भाव जरी मी टिपले होते तरी मला मात्र ही साधी माणसं, अजिबात स्टाईल न मारणारी गावातली माणसं चांगलीच वाटली होती. कधीतरी यांच्याशी आपली नक्की मैत्री होऊ शकेल याची खात्री वाटत होती. ती तशी का वाटत होती याचं नेमकं कारण मलाही माहीत नव्हतं. कदाचित मुंबईच्या वातावरणात नाईलाजाने सॉफीस्टीकेटेड असल्याचा आव आणणारी पण आतून बाळबोध साधी अशीच मी असेन. त्याचवेळी ‘किशोरभाई शहा’ मला म्हणाले, ” तुम्हाला कसलीही अडचण वाटली तर मला सांगा मॅडम. ”

खप्पड चेहऱ्याची, किरकोळ प्रकृतीची, अत्यंत अनाकर्षक अशी ही सावळी व्यक्ती होती. मात्र बँकिंग या विषयात परिपूर्ण आणि तरबेज. सुरेख वळणदार अक्षर. कामातला व्यवस्थितपणा, जाण यामुळे शाखाप्रमुखांचाही या व्यक्तीवर पूर्ण भरवसा होता हे माझ्या लक्षात आले आणि मग मीही, ” आल्याच अडचणी तर याच व्यक्तीला सांगू.. विचारू“असे तेव्हाच ठरवले.

एक सांगते एखादी संसारी स्त्री, घर, लहान मुलाबाळांचे सांभाळून जेव्हा वेगळ्या वाटेवर जगण्याची ईर्षा बाळगते तेव्हा ती तिच्या कामाच्या ठिकाणच्या वातावरणाशी जमवून घेऊन, सामावून घेऊन, स्नेहसंबंध जुळवून, स्वतःचं प्रभावी व्यक्तित्वही सांभाळू शकली तर मग कुठल्याच वाटा कठीण नसतात.

माझ्या जडणघडणीतला हाही एक महत्त्वाचा टप्पा ठरला.

 क्रमशः…

© सौ. राधिका भांडारकर

पुणे

मो.९४२१५२३६६९

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ॥ श्री जगद्धात्री स्तोत्रम् ॥ ☆ मराठी भावानुवाद – डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

डाॅ. निशिकांत श्रोत्री 

? इंद्रधनुष्य ?

☆ ॥ श्री जगद्धात्री स्तोत्रम् ॥ ☆ मराठी भावानुवाद – डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

☆ ☆ ☆ ☆

आधाररूपे चाधेये धृतिरूपे धुरन्धरे । 

ध्रुवे ध्रुवपदे धीरे जगद्धात्रि नमोऽस्तु ते ॥ १॥ 

*

शिवाकारे शक्तिरूपे शक्तिस्थे शक्तिविग्रहे । 

शाक्ताचारप्रिये देविजद्धात्री नमोस्तु ते ॥२॥ 

*
जयदे जगदानंदे जगदेकप्रपूजिते । 

जय सर्वगते दुर्गे जगद्धात्रि नमोऽस्तु ते ॥ ३॥ 

*
सूक्ष्मातिसूक्ष्मरूपे च प्राणापानादिरूपिणि । 

भावाभावस्वरूपे च जगद्धात्रि नमोऽस्तु ते ॥ ४॥ 

*
कालाधिरूपे कालेशे कालाकालविभेदिनि । 

सर्वस्वरूपे सर्वज्ञे जगद्धात्रि नमोऽस्तु ते ॥ ५॥ 

*

महाविघ्ने महोत्साहे महामाये वरप्रदे । 

प्रपञ्चसारे साध्वीशे जगद्धात्रि नमोऽस्तु ते ॥ ६॥ 

*
आगम्ये जगतामाद्ये माहेश्वरि वराङ्गने । 

अशेषरूपे रूपस्थे जगद्धात्रि नमोऽस्तु ते ॥ ७॥ 

*
तीर्थयज्ञा -तपोदान-योगसारे जगन्मयि । 

त्वमेव सर्वं सर्वस्थे जगद्धात्रि नमोऽस्तु ते ॥ ८॥ 

*
दयारूपे दयादृष्टे दयार्द्रे दुःखमोचनि । 

सर्वापत्तारिके दुर्गे जगद्धात्रि नमोऽस्तु ते ॥ ९ ॥ 

*
आगम्यधाम-धामस्थे महायोगीशहृत्पुरे । 

अमेयभावकूटस्थे जगद्धात्रि नमोऽस्तु ते ॥ १०॥ 

*
॥ इति श्रीजगद्धात्रीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

 *

☆ मराठी भावानुवाद  ☆

*

ब्रह्मांडाचा आधार संतोषी अतीत आकलनाला

सृष्टीधारिणी शाश्वत नमन अचल जगद्धात्रीला ॥१॥

*

शिवाकारी शक्तीरूपी विग्रह शक्तीचा जिला

शाक्तानुष्ठान प्रिय नमन करीतो जगद्धात्रीला ॥२॥ 

*

विजयदात्री आनंददायी शक्ती अमोघ अर्चनेला

जय सर्वगते दुर्गे नमन त्या जगद्धात्रीला ॥३॥

*

प्राणापान प्राणवायु सूक्ष्मातिसूक्ष्म जीवनशक्तीला

भावाभावस्वभाव रूपिणी नमन अशा जगद्धात्रीला ॥४॥

*

सूक्ष्म कालखंडातुनी समस्त व्यापिलेस तू सृष्टीला

सर्वव्यापि सर्वरूपी सर्वज्ञ नमन स्वयंभू जगद्धात्रीला ॥५॥

*
उत्साह भ्रम वा बाधा अस्तित्व सदैव वर द्यायाला

शक्तिरूपिणी विराटपुरुषाची नमन विशाल जगद्धात्रीला ॥६॥ 

*

ब्रह्मांडमूल अनाकलनीय वरांगने माहेश्वरी तुजला

अशेषरूपी अनंतरूपी नमन सृष्टीक्रिडा जगद्धात्रीला ॥७॥

*

तीर्थ यज्ञ तपोदान योग सकलांच्या साराला

तूचि सर्व सर्वात तूहि नमन सर्वव्यापि जगद्धात्रीला ॥८॥

*
दयारूपी कारुण्यदृष्टी करुणाभाव हारी दुःखाला

सर्वशक्ती अधिष्ठाती नमन दुर्गादेवी जगद्धात्रीला ॥ ९ ॥

*

निकेत धामाला यावे योगी हृदयी निवासाला

शिखरी भावांच्या दिव्य नमन देवी जगद्धात्रीला ॥१०॥

*

॥ इति निशिकान्त भावानुवादित श्रीजगद्धात्रीस्तोत्र सम्पूर्ण ॥

☆ ☆ ☆ ☆

मराठी भावानुवाद  © डॉ. निशिकान्त श्रोत्री

एम.डी., डी.जी.ओ.

मो ९८९०११७७५४ ईमेल nishikants@gmail. com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – चित्रकाव्य ☆ नमोस्तु दुर्गे ☆ श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

श्री प्रमोद वामन वर्तक  

?️?  चित्रकाव्य  ?️?

☆ नमोस्तु दुर्गे ☆ श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

☆

नारी शक्ती असते भारी 

देई प्रत्‍यय प्रसंगोत्‍पात,

तूच मायेचा असशी झरा 

किमया दाविसी विश्वात!*

होम करुनी अष्टमीला

तुझे स्तवन करती भक्त,

रात जागवुनी सारेजण

खेळती दांडिया मनसोक्त!

*

कधी होऊनि रणचंडीका 

करशी पाडाव दैत्याचा,

येता कोणी शरण तुजला 

उद्धार करशी त्याचा!

*

नऊ दिसाचे नऊ रंग 

शोभून दिसती तनुवरी,

तूच एक जगन्माता

साऱ्या विश्वाची संसारी!

*

अष्टभुजांनी सांभाळशी 

सकल विश्वाचा पसारा,

नमन करुनी आदिमायेस

करू साजरा दशमीला दसरा!

…करू साजरा दशमीला दसरा!

☆

© प्रमोद वामन वर्तक

संपर्क – दोस्ती इम्पिरिया, ग्रेशिया A 702, मानपाडा, ठाणे (प.) 400610 

मो – 9892561086 ई-मेल – pradnyavartak3@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २५२ – बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… ३ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं  आपकी भावप्रवण बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली…३।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २५२ – बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… ३  ✍

(बढ़त जात उजयारो – (बुन्देली काव्य संकलन) से) 

गात ऊजरौ देखकें, ऐंसो उठत बिचार /

जगत तारनी की भयीं, जैसे दो दो धार ||

*

एड़ी बेड़ी बँद रई, अपने जान अभाग ।

एड़ी जब पूरी बूँदी, बेड़ी भई सुहाग ॥

*

एड़ी ऐसी जँच रई, जैसे लगै कपास ।

अतर गुलाबी सौख कें, फेंकत रैत उजास ||

*

पगतल, करतल होत जब, ऐंसी परत गुमान ।

जैसे पीपर पात पै, दै गई औस निसान ||

*

पैंग बढाउत मन दिखै, गदराई सी देह ।

ऐंसो औसर पाय कें, नैना करें सनेह ॥

*

गोरी आई सासरे, लयें चौथ को चाँद ।

पाहूँ पाहूँ अमावस, बाँदे सकै सो बाँद ॥

*

अगहन महिना काम कौ, भओ जगत लौ लीन।

रात रतन धन लै भगी, रै गई भोर भलीन ||

*

सरद वरद रितु आ गई, गई मेघ की पाँत ।

फूले फूल तलाब में,

सिसिर सरोदे में रहौ,

भौंरन भीर बढ़ात ॥

चहो नारि कौ नेह ।

दुनिया भर को ताप तप, सिमट भरी बा-देह ।।

*

पावस कौ दिन रात-सो, रात रतौंधी होय ।

दिन दूनो हो रतजगा, जाग जगा के सोय ||

*

मानुस पंछी रूख पसु, सहैं जेठ उतपात ।

जेठन की भौं देखकें, धीरज धीर गमात ॥

*

चलत फिरत रसरी रहत, बस ही बस कर आज ।

कसमस कसमस कस करत, दोर खड़े रितुराज ||

☆

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २५२ – “बिखर न जाये…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “बिखर न जाये...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २५२ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “बिखर न जाये...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

 बूढी अम्मा दुबली सी

कुबडी लाठी टेके

चली जा रही किसी अनकही

मंजिल कुछ ले के

 

यह कुछ मुट्ठी भर आटा था

जो पिछले घर से

कई कई आवाज लगाके

मिल पाया फिरसे

 

“रोज रोज आजाती डायन

अशुभ शकल लेकर

मन करता कुछ भी न दूँ

टालूँ धक्के देके “

 

कई घरों से इसीतरह की

बदजुबान सुनना

उसकी आदत में शामिल

था केवल चुपरहना

 

बड़ापोस्टर जो विकास

का था उसकी छाया –

में ,मसोसकर मनरह जाती

बसपानी पी के

 

बना प्लास्टिक की बोतल से

चप्पल की सुविधा

बिखर न जाये दान फटी झोली

से यह दुविधा

 

किसी पार्टी का झंडा

सिर ढकने छायाको

सही सलीका सीख चलरही

दुनिया में जीके

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

28.9.2025

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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