डॉ. ऋचा शर्मा
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘आस‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १६० ☆
☆ लघुकथा – आस ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
“सर! अनाथालय से एक बच्ची का प्रार्थना पत्र आया है।”
“अच्छा, क्या लिखा है उसने ?”
“पत्र में लिखा है कि वह पढ़ना चाहती है, उसे स्कूल आना है.”
“क्या नाम है उसका?”
“रेणु।”
“रेणु ? पर अभी तक तो वह पढ़ने के लिए तैयार ही नहीं थी – वह अचंभित थे । कितना समझाया था हम लोगों ने उसे लेकिन वह स्कूल आई ही नहीं।”
स्कूल की शिक्षिका ने एक पत्र उनके हाथ में देते हुए कहा – “सर! आप रेणु का यह प्रार्थनापत्र पढ़िए — ”
“टीचर जी! मुझे बताया गया है कि विदेश से कोई मुझे गोद लेना चाहते हैं| वो मेरे मम्मी- पापा होंगे न! अंग्रेजी नहीं आएगी तो मैं अपने मम्मी -पापा से बात कैसे करूंगी ? मुझे उनसे बहुत सारी बातें करनी है। मुझे नहीं मालूम था कि मम्मी-पापा से बात करने के लिए स्कूल जाना जरूरी होता है, मुझे पढ़ना है टीचर! — रेणु “
© डॉ. ऋचा शर्मा
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