श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपके विचारणीय “जय प्रकाश के दोहे – गर्मी” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १४३ ☆ जय प्रकाश के दोहे – गर्मी ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
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पाँवों में छाले पड़े, उधड़ रही है खाल
हरियाली के गाँव में, सूखे का भूचाल।
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नदी किनारे बैठकर, देख सुलगती रेत
नाव लहर को कोसती, बंजर गाते खेत।
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सड़क पिघलती धूप में, पगडंडी के पाँव
पनघट प्यासे रह गए, पेड़ न देते छाँव।
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पोंछ पसीना माथ से, बैठा समय किसान
धूप लिए कागज कलम, लिखती रोज मसान।
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लू लपटें अख़बार की, ख़बर सनसनीख़ेज़
सूरज पढ़ता रोज़ ही, तपते दस्तावेज़।
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© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)
मो.07869193927,
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





