आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – ग़ज़लिका – मत रोको)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८० ☆

☆ ग़ज़लिका – मत रोको ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

मत रोको, जो होता है, हो जाने दो।

सोना खोना मत, सोना खो जाने दो।।

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सत्ता जिनका लक्ष्य उन्हें वह पाने दो।

उनको अपने मुख, अपना गुण गाने दो।।

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हम-तुम निर्धन, कम हो तो भी जी लेंगे।

चैन बिकी, बेचैन न हो बिक जाने दो।।

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क्रूर बेरहम हैं सारे सत्ताधारी।

पत्रकार चारण बनते बन जाने दो।।

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चलो पसीना सींच रोप लें आशाएँ।

कुछ कुम्हलाएँ-सूखेँ तो कुम्हलाने दो।।

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देव मूर्तियाँ दानव जैसी बना रहें।

नादां, मत रोको उनको बनवाने दो।।

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मन मंदिर में तन की पूजा मत करना।

चाह रहा जो तन, उसको तन पाने दो।।

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वनवासी के भक्त, भागते पद-पीछे।

सच को झूठ बताते तो बतलाने दो।।

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जो जा चुके, कोसकर उनको खुश होते

यदि कृतघ्न पामर कुछ तो हो जाने दो।।

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जन-गण मौन भले हो, गूँगा मत मानो।

पलटेगा यह तंत्र समय तो आने दो।।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.३.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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