डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय ऐतिहासिक लघुकथा ‘सत्य का साहस। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १६१ ☆

ऐतिहासिक लघुकथा – सत्य का साहस ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆ 

दरबार खचाखच भरा हुआ था। पेशवा राज्य के प्रधान न्यायधीश राम शास्त्री, नारायणराव की हत्या के संदर्भ में अपना निर्णय सुनानेवाले थे।

सत्ता के लोभ में रघुनाथराव ने अपने भतीजे नारायण राव की हत्या करवा दी थी। जनता सच जानती थी लेकिन जल में रहकर मगर से बैर कैसे करे? पेशवा के खिलाफ आवाज उठाने का साहस भी किसी में नहीं था। नारायणराव की हत्या से मन ही मन व्यथित कुछ लोगों ने पेशवा राज्य के प्रधान न्यायधीश राम शास्त्री के पास जाकर न्याय की गुहार लगाई।

राम शास्त्री अपने निष्पक्ष न्याय के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने रघुनाथराव पर लगे आरोपों की गहरी जाँच-पड़ताल की और पेशवा के दरबार में अपना निर्णय सुनाया –‘मैं पेशवा राज्य का प्रधान न्यायधीश हूँ। तमाम तथ्यों के आधार पर प्रमाणित होता है कि रघुनाथराव और आनंदीबाई ने मिलकर योजनाबद्ध तरीके से नारायणराव की हत्या करवाई है। सत्य सबके सामने है। महाराष्ट्र की जनता ही आपको दंड देगी, अब मैं आपके राज्य में नहीं रह सकता।‘ यह कहकर वह निडर न्यायधीश वहाँ से चला गया।

पेशवा रघुनाथराव अपने सिंहासन पर बैठे राम शास्त्री को दृढतापूर्वक जाते हुए देखते रह गए।

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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