सुश्री मंजिरी “निधि”
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता ‘नभ से ओझल होते खग‘।)
☆ मंजिरी साहित्य # १३ ☆

कविता – नभ से ओझल होते खग ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
आज फिर लगा कि वे दिन जल्द लौटेंगे
जब नभ रंग बिरंगे खगों से परिपूर्ण होगा l
कि फिर खिड़की पर टुकटुक करती चिड़िया दिखेगी l
मुड मुड, उड़ उड़ जोर जोर से
शीशे से लड़ती दिखेगी l
खो चुकी हैं चहचहाटें जिंदगी की रफ़्तार में l
जहाँ तहाँ मोबाईल टॉवर, पेड़ कट रहे अंधाधुंध l
खामोश हो गये सारे खग संघर्ष के तूफान में ll
एक समय ऐसा भी था जब लौट आते थे पंछी घरोंदो में अपने l
पर आज फिर शाम होते ही वहाँ भी बंजर वसुधा मिली l
सूरज की लाली उषा से मिलकर प्रातः बातें आज भी करती हैं l
पुष्कर की झिलमिल बूंदे पुष्प कमल की पंखुड़ियों पर मोती आज भी जड़ती है l
मंद मंद इठलाती शीतल हवा कानों में आज भी कुछ कहती है l
पर प्रातः काल के नील गगन से खग ओझल हो रहे हैं l
ये देख मन उद्विग्न हुआ और फिर अंतर्मन से आवाज आई कि वे दिन जल्द ही लौटेंगे जब नभ रंग बिरंगे खगों से परिपूर्ण होगा l
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© सुश्री मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




