स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – सूरज नहीं दिया…१ ।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८८ ☆
☆ – सूरज नहीं दिया…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
गुड़ियों से खेल रही है
‘भावना‘,
मिट्टी खा रही है
‘कामना‘
और
धनुष साध रहा है ‘हर्ष’–
इन्हें क्या मालूम
कि आज
कम हो गये हैं
मेरे जीवन के कितने वर्ष।
हाय! जिन्दगी कट रही है
किराये की छत में,
क्या दे पाऊँगा विरासत में?
अखबारों की कतरनें
बासी चिट्ठियाँ
और लाटरी की निर्जीव टिकिटें
भला
किस काम आयेंगीं?
‘संभावना की फसल‘ की
पुरानी प्रतियाँ
इन्हें क्या दे पायेंगी?
सच तो ये है-
दुहरी जिन्दगी जीने वाले
मास्टर का
जीना मरना बराबर है,
ये मँहगाई
जीवित शव पर लगा हुआ ‘कर‘ है।
क्रमशः अगले अंक में
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
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