डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय कथा – ‘माया-मोह की फांस‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४० ☆
☆ लघुकथा ☆ माया-मोह की फांस ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆
नायक जी के दुआरे पर बड़ा समूह इकट्ठा है। पुरुष और स्त्रियां दोनों हैं। दरअसल नायक जी नर्मदा यात्रा पर निकल रहे हैं। करीब पंद्रह दिन नर्मदा के किनारे किनारे चलेंगे। फिर अगली बार यात्रा वहीं से उठाएंगे जहां से उसे छोड़ा था। ऐसे ही किश्तों में यात्रा होती है।
नायक जी के साथ आठ दस लोग जा रहे हैं। उनकी पत्नियां उन्हें विदा करने आयी हैं। समूह में दो बोझा ढोने वाले हैं जो बहंगी में सामान लेकर चलेंगे। बोझा मतलब राशन-पानी, खाना खाने और बनाने के बर्तन। कुछ तैयार नाश्ते का सामान भी।
भीड़ में गोपाल भी है। सामान की उठा-धराई में मदद कर रहा है।
दल का एक सदस्य गोपाल से पूछता है, ‘तुम भी चल रहे हो?’
जवाब मिलता है, ‘नहीं, अभी नहीं। अभी नर्मदा मैया की कृपा नहीं है।’
सदस्य कहता है, ‘क्यों! चलो। ऐसा मौका फिर कहां मिलेगा? पुन्य कमाने का मौका बार-बार नहीं मिलता।’
गोपाल जवाब देता है, ‘क्या करें! बड़ी मजबूरी है। पिताजी की तबियत ठीक नहीं है। डेढ़ साल से उठने बैठने से लाचार हैं। हमीं को पूरी देखभाल करनी पड़ती है। चौबीस घंटे की ड्यूटी है। कहीं जाने की कहूं तो हाथ पकड़ कर रोने लगते हैं।
सदस्य कहता है, ‘घर में और लोग भी तो होंगे। लड़के बच्चे तो होंगे।’
गोपाल बोला, ‘सब हैं, लेकिन पिताजी हमें ही ढूंढ़ते हैं। और किसी को अपने को छूने नहीं देते।’
सदस्य बोला, ‘फालतू माया-मोह में फंसे हो। एक बार निकल पड़ो। लौट कर पाओगे कि तुम्हारे बिना भी सब ठीक-ठाक चलता है। हम तो अपना झोला उठाकर निकल पड़ते हैं। लौट कर आते हैं तो सब ठीक मिलता है। लेकिन हम सोचते हैं कि दुनिया हमारे बिना नहीं चल सकती।’
गोपाल हाथ जोड़कर बोला, ‘आप ठीक कहते हो, लेकिन हमारा मन नहीं मानता। उन्हें छोड़कर कैसे चले जाएं?’
जत्था ‘नर्मदे हर’ का घोष करके रवाना हो गया और गोपाल अपने घर की तरफ चल पड़ा जहां उसके पिता नींद से जाग कर उसके लिए गुहार लगा रहे थे।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






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धन्यवाद, बिष्ट जी।