श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दूर के रिश्ते।)

?अभी अभी # १०७७ ⇒ आलेख – दूर के रिश्ते ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या दूर के ढोल की तरह, दूर के रिश्ते भी सुहाने होते हैं ! रिश्ते भी ढोल की तरह ही तो होते हैं, रिश्तों में जीवन है, मिठास है, उत्सव है, परम्परा है। ढोल, रिश्तों को जश्न और धूमधाम से मनाने का ही तो प्रतीक है।

पास के रिश्तों का उत्सव पास के ढोल से ही मनाया जाता है। रिश्ता है तो ढोल है, ढोल है तो रिश्ता है। अगर रिश्ता नहीं, तो ढोल में पोल है।

रिश्तों में दरार आई, बेटा ना रहा बेटा, भाई ना रहा भाई। कोई नई बात नहीं ! पहले कहाँ हिंदू मुस्लिम और भारत पाकिस्तान था, हम ही तो कौरव पांडव भाई भाई थे। भारत में ही महाभारत था। जब भी पास के रिश्तों में फूट पड़ी है, दूर का रिश्ता पास आया है। कोई हमें लूटने बर्बाद करने तो कोई हमारा दिल जीतने। कोई हमारे आँसू पोंछता है तो कोई पीठ में छुरा भोंकता है।।

कोई करीबी इंसान क्यूँ अचानक जिन्दगी से बहुत दूर जाता है और कोई दूर का इंसान कब करीबी बन जाता है, दिल से अधिक यह देश, काल, परिस्थिति पर निर्भर करता है। दिल को ही परिस्थितियों से समझौता करना पड़ता है। परिस्थितियाँ कहाँ दिल की परवाह करती हैं।

दूर पास के रिश्तों में सामंजस्य ही तो खुशहाल जिंदगी का राज है। कभी ढोल के साथ हमें भी सबकी खुशी के लिए नाचना पड़ता है। तब ढोल के साथ कानों में शहनाई की आवाज भी गूंजती है, सबके साथ पांव थिरकने लगते हैं। पास के ढोल, पास के रिश्ते बड़े सुहाने लगते हैं। ।

इंसान पहले परिवार में प्यार तलाशता है। एक हँसते खेलते परिवार में कितना अपनापन लगता है। खुशियां दीवारों, खिड़की दरवाजों में समा नहीं पाती, घर के आसपास भी बिखर जाती हैं। महक रही फुलवारी। रिश्तों की डोर प्रेम से बंधी होती है। उधार की तरह स्वार्थ और नफ़रत भी प्रेम की कैंची है। जब करीबी रिश्तों में खटास आ जाती है तो दूर के रिश्ते तलाशे जाते हैं। जो दिल के करीब होता है, वही अपना कहलाता है।

इसी बीच रिश्तों की किताब में एक पन्ना और जुड़ गया जिसे फेसबुक नाम दिया गया। दूर के लोगों में कुछ करीबी नजर आने लगे। अचानक नए नए रिश्ते दस्तक देने लगे। मित्रता का संसार इतना वृहद भी हो सकता है, कभी कल्पना नहीं की थी।।

क्या पुस्तक खोलने से रिश्ते भी खुलते हैं, दूर के रिश्ते पास आने लगते हैं, दूर के ढोल सुहाने लगने लगते हैं। जिसे आभासी संसार नाम दिया गया है, वह क्या हमारी दिनचर्या का अंग नहीं बन गया है। कुछ आभासी रिश्ते तो परिवार में घुल मिल भी गए हैं। कौन कहता है, दूर के ढोल ही सुहाने होते हैं। जब इन रिश्तों की आवाज़ करीब आती है तो ये कानों में ही नहीं, मकानों में भी घुल मिल जाते हैं।

प्रेम एक ऐसा बंधन है, अगर निःस्वार्थ हो, तो मुक्त करता है।

सहमति, असहमति से परे होती है सच्ची दोस्ती, सच्चा प्यार, सच्चा रिश्ता। शर्तों पर नहीं निभाए जाते रिश्ते ! रिश्ते कभी अनफ्रेंड नहीं किए जाते, ब्लॉक नहीं किए जाते, बस निभाए जाते हैं। जब दूर के रिश्ते फेसबुक के जरिए पास आ सकते हैं, तो करीबी रिश्ते तो पहले से ही इतने करीब हैं। फिर रिश्तों के बारे में हम क्यों गरीब हैं। रिश्ते सुहाने हैं, ढोल सुहाने हैं।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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